चरक संहिता हिन्दी भाष्य — पृष्ठ 1091–1100
चरक संहिता हिन्दी भाष्य · Chaukhamba · पृष्ठ 1091–1100
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१००२ चरकसंहिता शय्या पर आघात करता है अर्थात् पैर उठा - उठाकर खाट पर पटकता है तो वह रोगी जीवित नहीं रहता ॥ २० ॥
विमर्श - वैद्य जब रोगी के घर में निरीक्षण के लिए जाता है उस समय इन लक्षणों को रोगी में देखे तो उसकी मृत्यु निश्रित समझे । अथवा रोगी के परिचारक वर्गों से इस प्रकार के अरिष्ट लक्षणों को सुनकर मृत्यु का निश्चय किया जा सका है । * यैर्विन्दति पुरा भावैः समेतैः परमां रतिम् । तैरेवः रममाणस्य ग्लास्त्रोर्सरणमादिशेत् ॥ और भी - जिन भाव पदार्थों के उपस्थित होने पर रोग से पूर्वावस्था में परम प्रसन्नता होती थी, उन्हीं वस्तुओं के उपस्थित होने पर कोई आनन्द का अनुभव न होता हो किन्तु ग्लानि होती हो तो उसकी मृत्यु निश्चित होती है ॥ २१ ॥
विमर्श - कोई भी व्यक्ति जो स्वस्थावस्था में पुत्र, मित्र, कलत्र आदि के संयोग से आनन्द का अनुभव करता हैं पर रोगावस्था में इनको शत्रु समझ कर या किसी भी कारण से उसको दुःख होता है तो यह मृत्यु का सूचक है I * न बिभर्ति शिरो ग्रीवा न पृष्ठं भारमात्मनः । न हनू पिण्डमास्यस्थमातुरस्य मुमूर्षतः ॥ और भी - मरणासन्न रोगी की ग्रीवा शिर के भार को धारण नहीं करती । अर्थात् मरणासन्न रोगी का शिर लटक जाता है । पृष्ठवंश शरीर के भार को धारण करने में समर्थ नहीं रहता अर्थात् रोगी बैठ नहीं सकता । यदि रोगी के मुख में अन्न का ग्रास रखा जाय तो उसे धारण नही करता । इसी तरह हनु को भी धारण नहीं करता । अर्थात् उसका हनु अपना कार्य करने में समर्थ नहीं होता ॥ २२ ॥
विमर्श - भोजन का ग्रास केवल उपलक्षण मात्र है मुख में रखने से जल, औषधि आदि कोई भी पदार्थ टिक नहीं पाता । सहसा ज्वरसंतापस्तृष्णा मूर्च्छा बलक्षयः । विश्लेषणं च सन्धीनां मुमूर्षोरुपजायते ॥ २३ ॥
और भी - मरणासन्न पुरुषो में सहसा ज्वर का तीव्र वेग, अधिक तृष्णा, मूर्च्छा, वल का क्षय और सन्धियों में शिथिलता हो जाती है ॥ २३ ॥
विमर्श - प्रायः इस प्रकार की विकृति सन्निपातज ज्वर में अधिक पाई जाती हैं । * गोसर्गे वदनाद्यस्य स्वेदः प्रच्यवते भृशम् । लेपज्वरोपतप्तस्य दुर्लभं तस्य जीवितम् ॥२४ ॥
जिस व्यक्ति को स्वेद के अधिक निकलने से यह प्रतीत होता हो कि मेरे शरीर में कोई वस्तु लेन कर दी गयी और वह व्यक्ति ज्वर से सन्तप्त हो यदि ऐसी अवस्था में प्रातःकाल गोसर्ग ( गो छोड़ने के समय ) के समय शरीर से अधिक स्वेद निकलता हो तो उसका जीवित रहना दुर्लभ होता है ॥ २४ ॥
विमर्श - आचार्य गङ्गाधर ने ' लेपज्वरोपतप्तस्य ' का अर्थ प्रलेपक ज्वर माना है और चक्रपाणि ने स्वल्पशीतयुक्त कफज्वर माना है । इन ज्वरों में प्रातःकाल वदन ( मुख ) से स्वेद निकलना असाध्यता का सूचक है । नोपैति कण्ठमाहारो जिह्वा कण्ठमुपैति ' च । आयुष्यन्तं गते जन्तोर्बलं च परिहीयते ॥२५ ॥
और भी — जब रोगी की आयु नष्ट हो जाती हैं तो आहार गले से कण्ठ तक नहीं जाता अर्थात् वह आहार को निगल नहीं सकता और जिह्वा कण्ठ में चली जाती है अर्थात् देखने पर जिहा छोटी प्रतीत होती है और सहसा रोगी का बल नष्ट हो जाता है ॥ २५ ॥
शिरो विक्षिपते कृच्छ्रान्मुञ्चयित्वा प्रपाणिकौ । ललाटप्रस्रुतस्वेदो मुमूर्षुश्च्युतबन्धनः ॥२६ ॥
१. ' मुमूर्षुः श्रथबन्धनः ' इति पा ० ।
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यस्यश्यावनिमित्तीयेन्द्रियाध्यायः ९ ] इन्द्रियस्थानम् १००३ औरभी - जो व्यक्ति अपने हाथ के अग्र भाग को शिर के पास लाकर कठिनता से शिरं को हिलाता है । जिसके ललाट से स्वेद अधिक निकलता है और सन्धियों का बन्धन शिथिल हो गया है उसे मुमूर्षु समझना चाहिए ॥ २६ ॥
तत्र श्लोकः-इमानि लिङ्गानि नरेषु बुद्धिमान् विभावयेतावहितो मुमूर्षुषु ।
क्षणेन भूत्वा पयान्ति कानिचिन्न चाफलं लिङ्गमिहास्ति किञ्चन ॥ २७ ॥
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते इन्द्रियस्थानेऽवाक्शिरसीय-मिन्द्रियं नामाष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥
S बुद्धिमान् चिकित्सक को सावधानीपूर्वक बार - बार मनुष्यों में बनाये हुए इन अरिष्ट लक्षणों को जानना चाहिए | क्योंकि अरिष्ट लक्षण कुछ ऐसे होते हैं जो शरीर में उत्पन्न होकर शीघ्र ही नष्ट हो जाते हैं । जो लक्षण शरीर में स्थायी रूप से होते है उनका ज्ञान करना सहज होता है । पर जो शीघ्र ही नष्ट होते हैं उनका ज्ञान करना बिना सावधानी के नहीं सम्भव है । जो अरिष्ट लक्षण इन अध्यायों में बताये गये हैं उनमें कोई भी लक्षण विफल नहीं होते । अर्थात् मृत्यु रूप फल अवश्य होता है ॥ २७ ॥
विमर्श - यद्यपि पूर्व के अध्यायों में बनाये हुए अरिष्ट लक्षण भी निश्चित मृत्यु के सूचक हैं । पर अध्याय में बताये हुए अरिष्ट लक्षण शीघ्र ही निश्चित रूप से मारक होते हैं । अतः सावधानी पूर्वक इनका ज्ञान करना चाहिए । इसी आशय से आचार्य ने कहा है कि ये अफल नहीं है अर्थात् इस अध्याय में कहे गये अरिष्ट लक्षण अवश्य मृत्यु रूप फल को देते है । इस प्रकार चरक के द्वारा प्रतिसंस्कृत अग्निवेशकृत तन्त्र ( चरक संहिता ) के इन्द्रिय स्थान में अवाक्शिरसीय इन्द्रिय नामक आठवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ ८ ॥
अथ नवमोऽध्यायः अथातो यस्यश्यावनिर्मित्तीयमिन्द्रिय व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्माह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
अ ( अवाक्शिरसीय इन्द्रिय के बाद ) यस्यश्यावनिमित्तीय इन्द्रिय की व्याख्या की जायगी । जैसा कि भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥ १-२ ॥ यस्यश्यावे परिध्वस्ते हरिते चापि दर्शने । आपन्नो व्याधिरन्ताय ज्ञेयस्तस्य विजानता ॥ नेत्रविषयक अरिष्ट - जिस व्यक्ति के दोनों नेत्र च्युत हो जायँ, या नष्ट हो जायँ यदि उसे कोई भी श्याम वर्ण के हो जायें, अपने स्थान से रोग आक्रान्त करता है तो विज्ञ वैद्य को समझना चाहिए कि यह रोग उस प्राणी का अन्त करने आया है ॥ ३ ॥
निःसंज्ञः परिशुष्कास्यः संमृद्धो व्याधिभिश्च यः । उपरुद्वायुषं ज्ञात्वा तं धीरः परिवर्जयेत् ॥ विविध अरिष्ट - जो किसी भी रोग से पीडित होकर ज्ञानशून्य हो, उसका मुख सूखा हो और जो अनेक रोगों के समुदाय से समृद्ध हो तो उसकी आयु की गति रुक गयी है, ऐना जानकर धीर वैद्य उसकी चिकित्सा न करें ॥ ४ ॥
१. ' यस्यश्यावीय ' इति पा ० २. ' संविद्ध: ' इति पा ० ।
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१००४ चरकसंहिता हरिताचं सिरा यस्य लोमकूपाश्च संवृताः । सोऽम्लाभिलाषी पुरुषः पित्तान्मरणमश्नुते || ५ || और भी - जिस पुरुष के सारे शरीर में हरित वर्ण की शिराएँ उभरी हुई हों, रोमकूप बन्द हों और जो खट्टे रस खाने की अधिक इच्छा रखता हो, उस पुरुष की मृत्यु पित्तज रोग से होती है ॥ ५ ॥
* शरीरान्ताश्च शोभन्ते शरीरं चोपशुष्यति । बलं च हीयते यस्य राजयक्ष्मा हिनस्ति तम् ॥ राजयक्ष्माविषयक अरिष्ट • जिस पुरुष के शरीरान्त ( हाथ - पैर ) पूर्ववत् कान्तियुक्त हों, पर शरीर सूखता जाता हो, और बल प्रतिदिन क्षीण होता जाता हो तो राजयक्ष्मा उस रोगी को मार डालता है || ६ ॥ अंसाभितापो हिक्का च च्छर्दनं शोणितस्य च । आनाहः पार्श्वशूलं च भवत्यन्ताय शोषिणः ॥ और भी - राजयक्ष्मा रोग से पीडित रोगियों में अंस ( कन्धे ) में अभिताप ( जलन ) का होना, हिक्का, रक्त का वमन, आनाह और पसलियों में वेदना का होना अन्त ( मृत्यु ) के लिए होता है ॥ ७ ॥
* वातव्याधिरपस्मारी कुष्टी शोफी तथोदरी । गुल्मी च मधुमेही च राजयक्ष्मी च यो नरः ॥ अचिकित्स्या भवन्त्येते बलमांसक्षवं सति । अन्येष्वपि विकारेषु तान् भिषक् परिवर्जयेत् ॥ अष्ट महारोगविषयक अरिष्ट - १. वातव्याधि, २. अपस्मार, ३. कुष्ठ, ४. शोफ, ५. उदररोग, ६. गुल्म, ७. मधुमेह और ८. राजयक्ष्मा रोग से पीडित रोगी वल और मांस के क्षय होने पर अचिकित्स्य अर्थात् चिकित्सा करने योग्य नहीं होते । ऐसी स्थिति अगर अन्य विकारों में भी हो तो चिकित्सक को उस रोग से पीड़ित व्यक्ति को छोड़ देना चाहिए अर्थात् उसकी चिकित्सा नहीं करनी चाहिए ॥ ८ - ९ ॥ विमर्श - किसी - किसी पुस्तक में ' अल्पेष्वपि ' पाठान्तर है, उसका अर्थ यह है कि रोगी उपर्युक्त अल्प विकार से युक्त हो और फिर भी बल और मांस का क्षय होता जाता हो तो उस
रोगी का त्याग कर देना चाहिए ।
* विरेचनहृतानाहो यस्तृष्णानुगतो नरः । विरिक्तः पुनराध्माति यथा प्रेतस्तथैव सः ॥
आनाहविषयक अरिष्ट - यदि किसी व्यक्ति को आनाह रोग हुआ हो और वह विरेचन द्वारा दूर किया जाय पर प्यास लगकर पुनः विरेचन के बाद आध्मान हो जाय तो उसे मृत व्यक्ति के समान समझना चाहिए ॥ १० ॥
पेयं पातुं न शक्नोति कण्ठस्य च मुखस्य च । उरसश्च विशुष्कत्वाद्यो नरो न स जीवति ॥
विविध अरिष्ट - जो रोगी कण्ठ, मुख और छाती के सूख जाने से किसी भी पेय पदार्थ जैसे दूध जल आदि को पी नहीं सकता हो वह जीवित नहीं रहता ॥ ११ ॥
स्वरस्य दुर्बलीभावं हानिं च बलवर्णयोः । रोगवृद्धिमयुक्त्या च दृष्ट्वा मरणमादिशेत् ॥१२ ॥
और भी - स्वर का दुर्बल होना, बल और वर्ण की हानि होना और अनुचित रूप से रोग का बढ़ना देख कर रोगी का मरण अवश्य होगा यह समझना चाहिए ॥ १२ ॥
ऊर्ध्वश्वासं गतोष्माणं शूलोपहतवङ्खगम् । शर्म चानधिगच्छतं बुद्धिमान् परिवर्जयेत् ॥१३ ॥
और भी - किसी भी रोग से पीड़ित रोगी को ऊर्ध्वश्वास हो गया हो, शरीर में गर्मी न हो ( शीतल हो गया हो ), वंक्षण प्रदेश में शूल अधिक होता हो और रोगी को बेचैनी इतनी अधिक हो १. ' हरिताभा: ' इति पा ० । २. ' रक्ती ' इति पा ० । ३. ' पेयं पातुं न शक्नोति शुष्कत्वादास्यकण्ठयोः । उरसश्च विद्धत्वाद्यो नरो न स जीवति ' इति पा ० ।
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यस्यश्यावनिमित्तीयेन्द्रियाध्यायः ९ ] इन्द्रियस्थानम् १००५ कि किसी भी दशा में या किसी भी औषध प्रयोग से शान्ति न मिलती हो तो बुद्धिमान् वैद्य उसकी चिकित्सा न करें ॥ १३ ॥
अपस्वरं भाषमागं प्राप्तं मरणमात्मनः । श्रोतारं चाप्यशब्दस्य दूरतः परिवर्जयेत् ॥ १४ ॥
जो रोगी वैद्य से, या अपने हित, मित्र और परिवार के व्यक्तियों से यह अपशब्द ( अशकुन शब्द ) कहता है कि मेरा मृत्युकाल आ गया है, अब मैं मर जाऊंगा आदि आदि, उस रोगी को दूर से त्याग दे ॥ १४ ॥
यं नरं सहसा रोगो दुर्बलं परिमुञ्चति । संशयप्राप्तमात्रेयो जीवितं तस्य मन्यते ॥ १५ ॥
और भी — आत्रेय पुनर्वसु का यह मत है कि जिस दुबल रोगी को रोग सहसा त्याग देता है उसके जीवन में सन्देह हो जाता है अर्थात् यह अनिश्चित अरिष्ट है ॥ १५ ॥
अथ चेज्ज्ञातयस्तस्य याचेरन् प्रणिपाततः । रसेनाद्यादिति ब्रूयान्नास्मै दद्याद्विशोधनम् ॥१६ ॥
मासेन चेन्न दृश्येत विशेषस्तस्य शोभनः । रसैश्चान्यैर्बहुविधैर्दुर्लभं तस्य जीवितम् ॥ १७ ॥
यदि रोगी के जाति - परिवार आदि के व्यक्ति बहुत ही नम्रतापूर्वक वैद्य से प्रार्थना करें कि यह रोगी दया का पात्र है, दीन है, मैं प्रार्थना करता हूँ आप इसकी चिकित्सा अवश्य करें, तो वैद्य रोगी को मांसरस के साथ आहार देने को कहे । इस प्रकार बलवर्द्धक मांस रस का प्रयोग एक मास तक करावे और फिर भी उसका फल उत्तम न हो अथवा बहुत प्रकार के अन्य उत्तम रसों का प्रयोग एक मास तक करावे पर उसका भी कोई उत्तम फल न हो तो उसका जीवित रहना दुर्लभ है ॥ १६-१७ ॥ * निष्टतं च पुरीषं च रेतश्चाम्भसि मज्जति । यस्य तस्यायुषः प्राप्तमन्तमाहुर्मनीषिणः ॥ १८ ॥
निष्टते यस्य दृश्यन्ते वर्णा बहुविधाः पृथक् । तञ्च सीदत्यपः प्राप्य न स जीवितुमर्हति ॥ निष्ठत शुक्र और पुरीष विषयक अरिष्ट - जिस व्यक्ति का थूक और मल एवं शुक्र जल में डूब जाय, मनीषी वैद्य उस व्यक्ति की आयु का अन्तकाल उपस्थित हो गया है, ऐसा कहते हैं । जिस व्यक्ति के थूक में अनेक प्रकार के अलग - अलग वर्ण जैसे लाल, हरा, पीला, काला आदि दिखाई दें और यदि उसे जल में डाल दिया जाय और वह डूब जाय तो वह रोगी जीने में समर्थ नहीं होता ॥ १८-१९ ॥ विमर्श - थूक का जल में डूब जाना सर्वथा अरिष्ट होता है । यह बात पहले के लोक से स्पष्ट की गयी है और दूसरे से अमेक रूपों के साथ जल में डूबना अरिष्ट बताया है । भिन्न विषय होने से अलग - अलग बताया गया है । थूक में अनेक वर्ण होने पर भी यदि जल में न डूबे तो अरिष्ट नहीं होता । पित्तमूष्मानुगं यस्य शङ्खौ प्राप्य विमूच्छेति । स रोगः शङ्खको नाम्ना त्रिरात्राद्धन्ति जीवितम् ॥ शंखकरोग विषयक अरिष्ट - ऊष्मा के साथ पित्त जब शङ्ख प्रदेश में मूच्छित होता है अर्थात् उस स्थान में सूख जाता है, तो उस रोग का नाम शंखक होता है । वह रोग मनुष्य को तीन दिन में मार डालता है ॥ २० ॥
विमर्श - शंखक रोग का वर्णन सूत्र स्थान के १८ वें अध्याय में आया है । वहीं द्रष्टव्य है । सफेनं रुधिरं यस्य मुहुरास्यात् प्रसिच्यते । शूलैश्च तुद्यते कुक्षिः प्रत्याख्येयस्तथाविधः ॥ विविध अरिष्ट - जिस रोगी के मुख से बार - बार फेन साथ रक्त निकलता है, उदर में सूई चुभोने की तरह शूल होता है वह रोगी असाध्य होने के कारण प्रत्याख्येय होता है ॥ २१ ॥
१. ' तच्च सीदेत् पयः प्राप्य दुर्लभं तस्य जीवितम् ' इति पा ० । २. ' विशुष्यते ' इति पा ० ।
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१००६ चरकसंहिता बलमांसक्षयस्तीव्रो रोगवृद्धिररोचकः । यस्यातुरस्य लक्ष्यन्ते त्रीन् पक्षान्न स जीवति ॥२२ ॥
तीन पक्ष का अरिष्ट - जिस रोगी के तीव्रता के साथ बल और मांस का क्षय हो रहा हो और तीव्रता के साथ ही रोग की वृद्धि होती हो एवं रोगी अरोचक से पीड़ित हो तो ये लक्षण जिन रोगियों में लक्षित होते हैं वे रोगी तीन पक्ष ( डेढ़ मास ) से अधिक जीवित नहीं रहते || २२ || तत्र श्लोकौ — विज्ञानानि मनुष्याणां मरणे प्रत्युपस्थिते । भवन्त्येतानि संपश्येदन्यान्येवंविधानि च ॥२३ ॥
तानि सर्वाणि लक्ष्यन्ते न तु सर्वाणि मानवम् ।
विशन्ति विनशिष्यन्तं तस्माद्बोध्यानि सर्वतः ॥ २४ ॥
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते इन्द्रियस्थाने यस्यश्याव-निमितीयमिन्द्रियं नाम नवमोऽध्यायः ॥ ९ ॥
G-अरिष्ट का सम्पूर्ण रूप से ज्ञान आवश्यक - • मनुष्यों में मृत्युकाल उपस्थित होने पर जो इन पूर्वोक्त अध्यायों में लक्षण बताए गये हैं उनका विचार करे, और इन्हीं लक्षणों के समान और अन्य जो भी लक्षण रोगी में उपस्थित हों उनका भी विचार करे, ये बताये हुए सभी अरिष्ट लक्षण मरने वाले मनुष्यों में लक्षित होते हैं । पर मरने वाले मनुष्यों में सभी लक्षण सभी में नहीं पाये जाते अर्थात् कुछ लक्षण कुछ व्यक्तियों में और कुछ लक्षण कुछ व्यक्तियों में पाए जाते हैं । इसलिये बनाए हुए सभी अरिष्ट लक्षणों का सभी प्रकार से ज्ञान करना चाहिए ॥ २३ - २४ ॥ इस प्रकार चरक के द्वारा प्रतिसंस्कृत अग्निवेशकृततन्त्र ( चरक संहिता ) के इन्द्रियस्थान में यस्यश्यावनिमित्तयेन्द्रिय नामक नौवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ ९ ॥
अथ दशमोऽध्यायः अथातः सद्योमरणीयमिन्द्रियं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इनि ह स्माह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
अब इसके बाद सद्योमरणीय इन्द्रिय की व्याख्या की जायगी । जैसा कि भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥ १-२ ॥ विमर्श - इस अध्याय में शीघ्र ही मरने वाले रोगियों में जो अरिष्ट लक्षण पाये जाते हैं उनका वर्णन किया जायगा । चक्रपाणि मतानुसार ' सद्यः ' का तात्पर्य कुछ लोग तीन दिन और कुछ लोग सात दिन करते हैं । सुश्रुत ने ' तत्र सद्यः प्राणहराणि सप्त रात्राभ्यन्तरान्मारयन्ति से ' सद्यः ' का अर्थ सात दिन माना है । सद्यस्तितिक्षतः प्राणांल्लक्षणानि पृथक् पृथक् । अग्निवेश! प्रवक्ष्यामि संस्पृष्टो यैर्न जीवति ॥ हे अग्निवेश अब शीघ्र ही प्राण को छोड़ने वाले पुरुषों के उन लक्षणों को जिन लक्षणों से युक्त रोगी जीवित नहीं रहता उसे अलग - अलग कह रहा हूँ ॥ ३ । । * वाताष्टीला सुसंवृद्धा तिष्ठन्ती दारुणा हृदि । तृष्णयाऽभिपरीतस्य सद्यो मुष्णाति जीवितम् ॥ हृदयविषयक अरिष्ट --- जिस रोगी के हृदय में अत्यन्त बड़ी कठोर गोलाकार वाताष्ठीला उत्पन्न
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सद्योमरणीयेन्द्रियाध्यायः १० ] इन्द्रिथान १००७ हो जाती है और उस काल में रोगी प्यास से अधिक पीड़ित रहता है तो उस रोगी के प्राण को अरिष्ट लक्षण शीघ्र ही ले लेते हैं ॥ ४ ॥
पिण्डिके शिथिलीकृत्य जिह्मीकृत्य च नासिकाम् ।
वायुः शरीरे विचरन् सद्यो मुष्णाति जीवितम् ॥ ५ ॥
जिस रोगी के शरीर में चलती हुई वायु पिण्डलियों को शिथिल कर और नासिका को टेढ़ाकर शरीर में चलती हैं वह शीघ्र ही उसकी जीवन लीला समाप्त कर देती है ॥ ५ ॥
aat यस्य च्युते स्थानादन्तर्दाहश्च दारुणः ।
तस्य हिक्काकरो रोगः सद्यो मुष्णाति जीवितम् ॥ ६ ॥
विविध अरिष्ट - जिस व्यक्ति की भौंहें अपने स्थान से च्युत हो गई हैं शरीर के भीतरी भागों में भयंकर दाह हो रहा है ऐसी दशा में यदि रोगी में हिक्का रोग हो जाय तो वे रोग शीघ्र ही जीवन को चुरा लेते हैं ॥ ६ ॥
क्षीणशोणितमांसस्य वायुरूर्ध्वगतिश्चरन् । उभे मन्ये समे यस्य सद्यो मुष्णाति जीवितम् ॥ वायुविषयक अरिष्ट - जिस रोगी का रक्त और मांस क्षीण हो गया है और उसके शरीर में ऊर्ध्वगति करती हुई वायु दोनों मन्याओं को एक ही समय आकर्षित करे तो रोगी शीघ्र ही जीवन को समाप्त कर देता है ॥ ७ ॥
अन्तरेण गुदं गच्छन् नाभिं च सहसाऽनिलः ।
कृशस्य वंक्षणो गृह्णन् सद्यो मुष्णाति जीवितम् ॥ ८ ॥
और भी — गुदा और नाभि के बीच में वायु सहसा जाती हुई दोनों वंक्षणों को जकड़ कर कृश पुरुष के जीवन को समाप्त कर देती है ॥ ८ ॥
वितस्य पर्शुकाग्राणि गृहीत्वोरश्व मारुतः ।
स्तिमितस्यायताक्षस्य सद्यो मुष्णाति जीवितम् ॥ ९ ॥
और भी – जिस व्यक्ति का सम्पूर्ण शरीर गीले वस्त्र से ढके हुए के समान हो, या स्तब्ध शरीर हो और जिसका नेत्र विस्फारित हो ऐसे व्यक्तियों के शरीर में कुपित वायु छाती को पकड़ कर वेदना उत्पन्न कर पर्शुकाओं के अग्र भाग को फैलाकर बहुत शीघ्र ही मृत्यु कर देती है || हृदयं च गुदं चोने गृहीत्वा मारुतो बली । दुर्बलस्य विशेषेण सद्यो मुष्णाति जीवितम् ॥ विशेष कर दुर्बल व्यक्तियों के शरीर में कुपित बलवान् वायु हृदय और गुदा को जकड़कर प्राण को ले लेती है ॥ १० ॥
वङ्खणं च गुदं चोभे गृहीत्वा मारुतो बली । श्वासं संजनयञ्जन्तोः सद्यो मुष्णाति जीवितम् ॥ औरभी - बली वायु जिन व्यक्तियों के वंक्षण प्रदेश और गुदा में वेदना उत्पन्न कर श्वास को उत्पन्न करती है उन व्यक्तियों का जीवन शीघ्र ही समाप्त हो जाता है ॥ ११ ॥
और भी
-नाभि मूत्रं वैस्तिशीर्षं पुरीषं चापि मारुतः ।
प्रच्छिन्नं जनयन्छूलं सद्यो मुष्णाति जीवितम् ॥ १२ ॥।
जिस व्यक्ति के शरीर में कुपित हुई वायु नाभि को और बस्ति के ऊर्ध्वं प्रदेश में छेदन के समान वेदना उत्पन्न कर शूल उत्पन्न करती है उस रोगी की शीघ्र मृत्यु होती है || १२ || विमर्श - गङ्गाधर ने ' प्रच्छिन्नम् ' के स्थान पर ' विवध्य ' ऐसा पाठ किया है । ' विवध्य ' का १. ' गुदं नाभि चान्तरेण गृह्णाति ' इति पा ० । ३. ' नाभि वस्तिशिरो मूत्रम् ' इति पा ० । २. ' गृह्णाति ' इति पा ० । ४. ' विबध्य ' इति पा ० ।
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१०० = चरकसंहिता अर्थ ' बाँध ' कर होता है । नाभि और बस्ति के प्रदेश में बन्धन के समान वेदना और मल-मूत्र में विबन्ध उत्पन्न कर शूल मारक होता है । भिद्येते वंक्षणौ यस्य वातशूलैः समन्ततः । भिन्नं पुरीपं तृष्णा च सद्यः प्राणाञ्जहाति सः ॥ और भी - जिस पुरुष के शरीर में उत्पन्न वातज शूल से सभा ओर स वक्षणा में भेदन की तरह वेदना होती हो, मल पतला आता हो और प्यास बढ़ी हुई हो वह रोगी शीघ्र ही प्राण को छोड़ देता है ॥ १३ ॥
सद्यो जह्यात् स जीविनम् ॥ मल पतला आता हो, तृष्णा आप्लुतं मारुतेनेह शरीरं यस्य केवलम् । भिन्नं पुरीषं तृष्णा च जिस पुरुष का सारा शरीर वात - विकृति से व्याप्त हो गया हो अधिक बढ़ी हुई हो उसके जीवन को रोग शीघ्र ही समाप्त कर देता है ॥ १४ ॥
* शरीरं शोफितं यस्य वातशोफेन देहिनः । भिन्नं पुरीषं तृष्णा च सद्यो जह्यात् स जीवितम् ॥ और भी -• जिस व्यक्ति का सारा शरीर वातज शोथ से आक्रान्त हो, मल पतला होता हो, प्यास बढ़ी हुई हो, वह रोगी अपनी जीवन लीला को शीघ्र समाप्त कर देता है ॥ १५ ॥
* आमाशयसमुत्थाना यस्य स्यात् परिकर्तिका । भिन्नं पुरीषं तृष्णा च सद्यः प्राणाञ्जहाति सः ॥ और भी — जिस व्यक्ति के आमाशय प्रदेश में कँची से काटने की तरह वेदना उत्पन्न होती हो, और अतिसार हो साथ ही प्यास बढ़ी हुई हो तो वह रोगी शीघ्र ही अपने जीवन को समाप्त कर देता है ॥ १६ ॥
विमर्श - कहीं - कहीं ' मिन्नं पुरीषम् ' के बदले ' गुदग्रहः ' पाठ है तो वहाँ अर्थ ' विबन्ध ' किया जाता है । पक्वाशयसमुत्थाना यस्य स्यात् परिकर्तिका । तृष्णा गुदग्रहश्वोग्रः सद्यो जह्यात् स जीवितम् ॥ जिस व्यक्ति के शरीर में पक्काशय प्रदेश में कैंची से काटने के समान पीढ़ा हो और प्यास तथा उग्र विबन्ध हो तो उस व्यक्ति का जीवन शीघ्र ही नष्ट हो जाता है ॥ १७ ॥
पक्वाशयमधिष्ठायं हत्वा संज्ञां च मारुतः । कण्ठे घुघुरकं कृत्वा सद्यो हरति जीवितम् || १८ || और भी - वायु पक्वाशय का आश्रय लेकर संज्ञा समाप्त कर देती है तथा कण्ठ में घुरघुर शब्द उत्पन्न कर रोगी के प्राण का सद्यः हरण करती है ॥ १८ ॥
दन्ताः कर्दमदिग्धाभा मुखं चूर्णकसन्निभम् । सिप्रायन्ते च गात्राणि लिङ्गं सद्यो मरिष्यतः ॥ विविध अरिष्ट - • जिस व्यक्ति के दाँत मल की अधिकता से ऐसे प्रतीत हों जैसे कीचड़ का लेप किया गया हो, मुख पर चूना के समान श्वेत कण लगे हों, और सारा शरीर स्वेद के बिन्दुओं से भरा हुआ प्रतीत हो, तो वह शीघ्र ही मर जाता है ॥ १ ९ ॥। तृष्णाश्वासशिरोरोगमोहदौर्बल्यकूजनैः । स्पृष्टः प्राणाञ्जहात्याशु शकृद्भेदेन चातुरः ॥ २० ॥
विविध अरिष्ट - - किसी भी रोग से आक्रान्त रोगियों में तृष्णा, श्वास, शिरोरोग, मूर्च्छा पतले, दुर्बलता, गले से साफ शब्द न निकलना ये उपद्रव दृष्टिगोचर होते हों और उस रोगी को मल निकलते हों तो वह शीघ्र ही प्राण त्याग देता है ॥ २० ॥
तत्र श्लोकः-एतानि खलु लिङ्गानि यः सम्यगवबुध्यते । स जीवितं च मर्त्यानां मरणं चावबुध्यते ॥२१ ॥
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते इन्द्रियस्थाने सद्योमर-णीयमिन्द्रियं नाम दशमोऽध्यायः ॥ १० ॥
१. ' आमाशय मधिष्ठाय ' इति पा ० ।
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अणुज्योतीयेन्द्रियाध्यायः ११ ] इन्द्रिय सूत्रस्थानम सद्योमरणीय अरिष्टविषयक उपसंहार जो चिकित्सक इन सद्यःमारक अरिष्टों के लक्षणों को ठीक - ठीक जानता है वह मनुष्यों के जीवन और मरण को ठीक - ठीक जान लेता है ॥ २१ ॥
इस प्रकार चरक के द्वारा प्रतिसंस्कृत अग्निवेशकृततन्त्र ( चरक संहिता ) के इन्द्रिय स्थान में सद्योमरणीय इन्द्रिय नामक दशवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ १० ॥
अथैकादशोऽध्यायः अथातोऽणुज्योतीय मिन्द्रियं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्माह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
अब अणुज्योतीय इन्द्रिय की व्याख्या की जायगी । जैसा कि भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥
* अणुज्योतिरनेकाम्रो दुश्छायो दुर्मनाः सदा । रतिं न लभते योति परलोकं समान्तरम् ॥
एक वर्ष का अरिष्ट - जिस व्यक्ति की सारे शरीर की ज्योति ( कान्ति ) अणु ( अल्प ) हो गयी हो अथवा जठराग्नि विलकुल मन्द हो गयी हो, रोगी का चित्त चंचल रहता हो, शरीर की छाया सुन्दर न प्रतीत होती हो, मन निरन्तर दुःखी रहता हो और कहीं भी किसी कार्य में उसका मन न लगता हो तो ऐसा व्यक्ति एक वर्ष के भीतर परलोक की यात्रा करता है ॥ ३ ॥
* बलिं बलिभृतो यस्य प्रणीतं नोपभुञ्जते । लोकान्तरगतः पिण्डं भुङ्क्ते संवत्सरेण सः ॥४ ॥
बलिविषयक अरिष्ट - - जिस व्यक्ति के द्वारा दी हुई बलि बलि खाने वाले जीव ( कौए, कुत्ते आदि ) नहीं खाते वह व्यक्ति एक वर्ष के भीतर परलोक में जाकर श्राद्ध में दिये हुए पिण्डों को खाता है । अर्थात् एक वर्ष के अन्दर मर जाता है ॥ ४ ॥
सप्तर्षीणां समीपस्थां यो न पश्यत्यरुन्धतीम् । संवत्सरान्ते जन्तुः स संपश्यति महत्तमः ॥ अरुन्धती तारा - विषयक अरिष्ट – जो पुरुष सप्तर्षियों के समीप में रहने वाले अरुन्धती नाम तारा को नहीं देखता वह वर्ष के अन्त में महा अन्धकार स्वरूप यमपुरी को देखता है ॥ ५ ॥
विमर्श - उत्तर दिशा में ध्रुव तारा बहुत ही प्रसिद्ध है जिससे आधुनिक जगत् भी दिशाओं का ज्ञान करता है । उसी के समीप में चमकते हुए सात बड़े - बड़े नक्षत्र के गण हैं । उन्हीं के मध्य में बहुत ही छोटी अरुन्धती नामक एक नक्षत्र है । उसे नेत्र में रोगों के न रहते हुए जो नहीं देखता उसकी मृत्यु उसी वर्ष के अन्तिम भाग में हो जाती है ।
* विकृत्या विनिमित्तं यः शोभामुपचयं धनम् ।
प्राप्नोत्यतो वा विभ्रंशं समान्तं तस्य जीवितम् ॥ ६ ॥
एक्क वर्ष का अरिष्ट - जो व्यक्ति बिना किसी कारण के शोभा, शरीर की पुष्टि और धन - धाम-सूचक रेखा आदि को शरीर में प्राप्त करते हैं । अथवा शोभा, पुष्टि और धन - धाम - सूचक चिह्नों का सहसा जिनके शरीर से नाश हो जाता है उसका जीवन वर्ष के अन्त में समाप्त हो जाता है ॥ ६ ॥
* भक्तिः शीलं स्मृतिस्त्यागो बुद्धिर्बलमहेतुकम् ।
षडेतानि निवर्तन्ते षड्भिर्मासैर्मरिष्यतः ॥ ७ ॥
अरिष्ट - जो व्यक्ति ६ माह में मरने वाला होता है उसकी क्रमशः भक्ति, ६ मास का स्वभाव, स्मरण - शक्ति, त्याग ( वस्तुओं के त्याग करने की शक्ति ), बुद्धि और बल बिना कारण ही नष्ट हो जाते हैं ॥ ७ ॥
१. ' गन्ता ' इति पा । ६४ च ० सं ०
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१०१० चरकसंहिता धमनीनामपूर्वाणां जालमत्यर्थशोभनम् । ललाटे दृश्यते यस्य षण्मासान्न स जीवति || ८ || और भी — जिस पुरुष के मस्तक पर जो पहले से नहीं है ऐसी धमनियों का सुन्दर जाल दिखाई पड़े उस व्यक्ति की ६ मास में निश्चित मृत्यु हो जाती है ॥ ८ ॥
लेखाभिश्चन्द्रवक्राभिर्ललाटमुपचीयते । यस्य तस्यायुषः षड्भिर्मासैरन्तं समादिशेत् ॥९ ॥
और भी -- जिस व्यक्ति के ललाट के ऊपर चन्द्रमा की तरह टेढ़ी रेखाओं का समुदाय दिखाई पड़ता है उस व्यक्ति की आयु ६ मास में समाप्त हो जाती हैं, ऐसा समझना चाहिये || ९ ||
* शरीरकम्पः संमोहो गतिर्वचनमेव च । मत्तस्येवोपलभ्यन्ते यस्य मासं न जीवति ॥१० ॥
१ मास का अरिष्ट - जिस रोगी का शरीर बिना कारण ही काँप रहा हो, मूर्च्छा होती हो, चलना - फिरना और बोलना, मतवाले पुरुष की तरह हो वह व्यक्ति एक मास तक भी जीवित नहीं रहता ॥ १० ॥
* रेतोमूत्रपुरीषाणि यस्य मज्जन्ति चाम्भसि । स मासात् स्वजनद्वेष्टा मृत्युवारिणि मज्जति ॥ शुक्रमूत्रपुरीषविषयकअरिष्ट जिस व्यक्ति के वीर्य, मूत्र और पुरीष ( मल ) जल में डालने से डूब जाते हों और वह व्यक्ति अपने परिवार, हितैषी, मित्र वर्गों से द्वेष करता हो तो वह मृत्यु रूपी जल में डूब जाता है ॥ ११ ॥
विमर्श -- प्रायः जिस आदमी की मृत्यु समीप में आती है उसका स्वभाव धीरे - धीरे परिवर्तित हो जाता है । इसलिये वह मित्र को शत्रु और शत्रु को मित्र समझता है । यद्यपि मूत्र, मल आदि के जल में डूबने को पहले भी अरिष्ट बताया गया है, यहाँ बताना पुनरुक्त है तथापि इस अध्याय में जिसमें कि मरने का समय निश्चित किया गया है उसमें पहले इसका वर्णन नहीं आया है । इस प्रकार के लक्षण होने पर एक मास के अन्दर मनुष्य मर जाता है, यह बताने के लिये पुनः इस अध्याय में इसका वर्णन आया हैं ।
हस्तपादं मुखं चोभे विशेषाद्यस्य शुष्यतः ।
शूयेते वा विना देहात् स च मासं न जीवति ॥ १२ ॥
जिस मनुष्य के हाथ, पैर और मुख विशेष रूप से सूख गये हों, या शोध को प्राप्त हो गये हों और मध्य शरीर अपने स्वाभाविक रूप में हो, तो वह व्यक्ति एक मास तक नहीं जीवित रहता ॥ * ललाटे मूर्ध्नि बस्तौ वा नीला यस्य प्रकाशते । राजी बालेन्दुकुटिला न स जीवितुमर्हति ॥ १ मास का अरिष्ट - जिस व्यक्ति के ललाट पर और वस्ति के ऊपरी भाग में चन्द्रमा की तरह कुटिल नील रेखायें प्रतीत होती हों वह १ मास से अधिक जीवित नहीं रहता ॥ १३ ॥
* प्रवालगुटिकाभासा यस्य गात्रे मसूरिकाः ।
उत्पद्याशु विनश्यन्ति न चिरात् स विनश्यति ॥ १४ ॥
मसूरिकाविषयक अरिष्ट - जिस व्यक्ति के सारे शरीर पर प्रवाल की गोली की तरह कान्तिवाली लाल मसूरिकायें उत्पन्न होकर शीघ्र ही नष्ट हो जाती हों उस व्यक्ति की मृत्यु बहुत शीघ्र ही होजाती है ॥ १४ ॥
ग्रीवावमर्दो बलवाजिह्वाश्वयथुरेव च । ब्रघ्नास्यगलपाकश्च यस्य पक्कं तमादिशेत् ॥ १५ ॥
विविध अरिष्ट: - जिस पुरुष के गर्दन में मर्दन करने की तरह पीड़ा हो, जिह्वा में अत्यधिक शोथ हो, ब्रध्न रोग और मुख एवं गले में भयंकर पाक हो गया हो उस पुरुष को पका हुआ समझना चाहिए अर्थात् उसकी मृत्यु शीघ्र ही हो जाती है ॥ १५ ॥
१. ' मासाद्विनश्यति ' इति पा ० । २. ' विलीयन्ते ' इति पा ० ।
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ज्योतीन्द्रियाध्यायः ११ ] इन्द्रियस्थानम् १०११ संभ्रमोऽतिग्रलापोऽतिभेदोऽस्थनामतिदारुणः । कालपाशपरीतस्य त्रयमेतत् प्रवर्तते ॥१६ ॥
और भी — जो व्यक्ति कालरूपी जाल में फँस जाता है और उसके शरीर में ये तीन लक्षण उत्पन्न होते है जैसे, १. शिर में भयंकर चक्कर का आना, २. अत्यधिक प्रलाप करना और ३. अस्थियों में भेदन करने की तरह पीड़ा का होना ॥ १६ ॥
प्रमुह्य लुञ्चयेत् केशान् परिगृह्णात्यतीव च । नरः स्वस्थवदाहारमबलैः कालचोदितः ॥१७ ॥
और भी • जो मनुष्य ज्ञानशून्य होकर अपने केशों को नोचता है और जोरों से पकड़ता है और रोगी होते हुए भी स्वस्थावस्था के समान ही अधिक भोजन करता है और दुर्बल हो तो उसे काल से प्रेरित समझना चाहिए ॥ १७ ॥
समीपे चक्षुषोः कृत्वा मृगयेताङ्गुलीकरम् । स्मयतेऽपि च कालान्ध ऊर्ध्वगानिमिषेक्षणः ॥ नेत्रविपयक अरिष्ट - जो व्यक्ति नेत्र के समीप में हाथों को रखकर, अङ्गुलियों को खोजता हो, आश्चर्य करता हो कि हाथ रहते हुए हमारी अङ्गुलियाँ कैसे नष्ट हो गईं? नेत्र ऊपर की तरफ टॅगे हुये हों, निर्निमेष हो गये हों तो उसे काल ने अन्धा कर दिया है ऐसा समझना चाहिए अर्थात् उसकी मृत्यु शीघ्र हो जाती है ॥ १८ ॥
शयनादासनादङ्गात् काष्ठात् कुड्यादथापि वा ।
सन्मृगयते किञ्चित् स मुह्यन् कालचोदितः ॥
१ ९ ॥
विविध अरिष्ट - मोह से ग्रस्त जो व्यक्ति शय्या, आसन, अपने अङ्ग, काष्ठ आदि किसी पर भी नहीं रखी हुई वस्तु को खोजता है या किसी भी वस्तु को खोजता है, उसे काल से प्रेरित समझना चाहिए || १ ९ ॥
अहास्यहासी संमुह्यन् प्रलेढि दशनच्छदौ । शीतपादकरोच्छ्वासो यो नरो न स जीवति ॥
और भी -- जो व्यक्ति मोह को प्राप्त होकर अर्थात् ज्ञानशून्य होकर हंसी का विषय न होने पर भी अधिक हंसता है, ओष्ठों को बार - बार जिह्वा से चाटता है और जिसके हाथ - पैर एवं श्वास शीतल हो गए हों तो वह जीवित नहीं रहता ॥ २० ॥
आह्वयंस्तं समीपस्थं स्वजनं जनमेव वा । महामोहावृतमनाः पश्यन्नपि न पश्यति ॥२१ ॥
और भी - जो व्यक्ति काल के वशीभूत होकर भयंकर मोह से आवृत मन वाला हो, वह समीप में रहने वाले आत्मीय वर्गों को या अन्य व्यक्तियों को उच्च स्वर से बुलाते हुए उसे देखने पर भी नहीं देखता अर्थात् पहचान नहीं पाता ॥ २१ ॥
* अयोगमतियोगं वा शरीरे मतिमान् भिषक् । खादीनां युगपद्द्द्ष्ट्वा भेषजं नावचारयेत् ॥२२ ॥
पञ्चमहाभूतविषयक अरिष्ट - पञ्चमहाभूत के लक्षणों का शरीर में एक साथ अयोग और अतियोग का लक्षण देखकर बुद्धिमान् वैद्य चिकित्सा करने की चेष्टा न करे ॥ २२ ॥
विमर्श - पंचमहाभूतों के शरीर में होने वाले लक्षणों का वर्णन शारीर - स्थान के पहले अध्याय में बताया गया है, उनमें किसी एक, दो, या तीन, महाभूतों के लक्षण शरीर में न्यून हो जाय, साथ ही दूसरे एक, दो या तीन महाभूतों के लक्षण अपनी मात्रा से अधिक हो जाँय । जैसे खरता अधिक हो जाय, और उष्णता अत्यधिक न्यून हो जाय, या उष्णता अधिक बढ़ जाय और रूक्षता अत्यल्प हो जाय तो उस रोगी की मृत्यु शीघ्र ही हो जाती है । १. ' पर्वभेदश्च दारुणः ' इति पा ० । ३. ' स्वस्थवदाहारवचन: ' इति पा ० । ५. ' यो लेढि ' इति पा ० । २. ' परान् गृह्णात्यतीव च ' इति पा ० । ४. ' ऊर्ध्वाक्षोऽनिमिपेक्षण: ' इति पा ०!