चरक संहिता हिन्दी भाष्य — पृष्ठ 121–130
चरक संहिता हिन्दी भाष्य · Chaukhamba · पृष्ठ 121–130
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( १ ) निश्चेष्ट होता है । गुण चरकसंहिता ( १ ) चेष्टा स्वरूप ही है । ( २ ) द्रव्य का सिद्ध धर्म है अर्थात् गुण अपने | ( २ ) साध्यावस्था में रहता है उसके स्वरूप स्वरूप को प्राप्त कर चुका होता है का अन्तिम निर्णय नहीं हो सकता है कि इसका परिणाम क्या होगा । ( ३ ) संयोग - विभाग का स्वतन्त्र कारण नहीं ( ३ ) संयोग - विभाग में स्वतन्त्र कारण होता है । होता है । ( ४ ) अमूर्त द्रव्य में भी होता है जैसे आकाश, | ( काल, दिशा, आत्मा में । मूर्त द्रव्य का लक्षण - इयत्तावछिन्नपरिमाणयोगित्वं मूर्तम् ( सप्तपदार्थी ) । ४ ) केवल मूर्त द्रव्य में होता है जैसे पृथिवी, जल, वायु, तेज, मन में । अमूर्त का लक्षण निम्न है ( जो अमूर्त होता है वह विभु ( व्यापक ) होता है ) सकलमूर्तसंयोगित्वं विभुत्वम् । ( सप्तपदार्थी ) लौकिक कर्म तीन प्रकार का होता है ( १ ) सत्प्रत्यय, ( २ ) असत्प्रत्यय, ( ३ ) अप्रत्यय | सत्प्रत्यय कर्म ज्ञानपूर्वक होता है जैसे -- जब हम ज्ञानपूर्वक अपना हाथ ऊपर - नीचे करते हैं तो उस कर्म को सत्प्रत्यय कहा जाता है । असत्प्रत्यय - यह अज्ञानपूर्वक होता है जैसे - ज्ञानपूर्वक रबर के गेंद को ऊपर फेका गया है तो वह पुनः नीचे गिर कर भूमि से उछल कर ऊपर गया तो यह कार्य अज्ञानपूर्वक होता है या मस्तिष्क - सौपुश्निक ज्वर ( Meningitis ) में रोगी ज्ञानपूर्वक एक पैर जब बटोरना है तब दूसरा पैर भी अज्ञानपूर्वक बटोर जाता है । यह चेतन द्रव्य में होता है । अप्रत्यय -- यह कर्म केवल अचेतन में होता है इसका कारण ( १ ) नोदन, ( २ ) गुरुत्व, ( ३ ) वेग या संस्कार — ये तीन हैं । नोदन - नोइन अर्थ है प्रेरण - ढकेलना जैसे पंक में पैर डाला तो पंक हिल जाता है । गुरुत्व जैसे -- घट के आधार को हटा दिया तो घट अपने गुरुत्व के द्वारा नीचे गिर जाता है । वेग - जैसे धनुष से छुटा बाण दूर तक चला जाता है । इत्युक्तं कारणं— इस प्रकार जगत के सभी कार्य समूहों के कारणों का निर्देश कर दिया गया है । विमर्श - यहाँ ६ कारणों का निर्देश किया गया है जैसे ( १ ) सामान्य - यह कारण है, इसका कार्य वृद्धि करना और एक में मिलाना है, ( २ ) विशेष - कारण है, इसका कार्य हास करना और अलग करना है ( ३ ) समवायि कारण है इसका कार्य अपृथग्भाव अर्थात् सभी भावों को मिलाना है ( ४ ) द्रव्य - कारण है, इसका कार्य गुण - कर्म के आश्रयभूत मूर्ति, जैसे - घट आदि है । ( ५ ) गुण-कारण है, इसका कार्य निश्चेष्ट सजातीय गुण विशेष है । ( ६ ) कर्म - कारण है, इसका कार्य सजातीय-विजातीय कर्म संयोग और विभाग है ।
* - कार्यं धातुसाम्यमिहोच्यते ।
धातुसाम्यक्रिया चोक्ता तन्त्रस्यास्य प्रयोजनम् ॥ ५३ ॥
( ३ ) धातु साम्य तथा त्रिदोष विज्ञान आयुर्वेद तन्त्र का प्रयोजन --- इस आयुर्वेद शास्त्र में धातुओं को साम्य करना कार्य है । इस ( तन्त्र - ग्रन्थ ) शास्त्र का प्रयोजन भी धातु को साम्य करना ही है ॥ ५३ ॥
विमर्श - धातुसाम्य का अर्थ आरोग्य उत्पादन करना है जैसा कि ' विकारो धातुवैषम्यं साम्यं प्रकृतिरुच्यते । सुखसंज्ञकमारोग्यं विकारो दुःखमेव च ॥ ' ( सू ० अ ० ९ ) । ' वारणाद् धातवः स्मृताः ' जो शरीर का धारण करता है उसे धातु कहते हैं, इस परिभाषा के अनुसार
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सूत्रस्थानम् २६ वातादि दोष, रसासक् आदि दूष्य, स्वेदादि मल धातु कहे जाते हैं । इनकी विकृति होना रोग है - इनको समावस्था में लाना ही आयुर्वेद शास्त्र का कार्य है और इस शास्त्र के प्रणयन का प्रयोजन भी धातुसाम्य करना हो है । यह क्रिया सामान्यतः आयुर्वेद के प्रयोजनद्वय में निहित है स्वस्थ व्यक्ति के स्वास्थ्य की रक्षा और आतुर व्यक्ति का रोग - प्रशमन यह दोनों कार्य धातुओं की समता पर ही निर्भर है । कालबुद्धीन्द्रियार्थानां योगो मिथ्यान चाति च । द्वयाश्रयागां व्याधीनां त्रिविधो हेतुसंग्रहः ॥ रोगों के त्रिविध कारण - शरीर और मन के आश्रयभूत व्याधियों की उत्पत्ति होने में काल, बुद्धि और इन्द्रियों के विषयों का मिथ्या योग, अयोग, अतियोग इन तीन हेतुओं का संक्षेप में संग्रह किया गया है ॥ ५४ ॥
विमर्श - पहले सामान्यरूप से जगत एवं रोगों के कारण का निर्देश, षट्पदार्थों के रूप में किया गया है अव आयुर्वेद शास्त्र में मुख्य रूप से रोगों के कारण का वर्णन प्रारम्भ किया जाता है | प्रथम त्रिसूत्रों का वर्णन करते हुए हेतु, लिङ्ग, औषध ज्ञान में सर्वप्रथम हेतु कहा गया है अतः हेतु का संग्रह तीन रूप में बनाया है - ( १ ) काल का मिथ्यायोग, अयोग, अतियोग रोगों का कारण होता है । काल - शीत, उष्ण और वर्षा भेद से तीन प्रकार होता है । यदि काल अपने नियम के अनुसार शीन, वर्षा, गर्मी से युक्त न हो या कभी तीव्र लक्षणयुक्त, कभी हीन लक्षणयुक्त, कभी सम लक्षणयुक्त हो तो उसे मिथ्यायोग कहा जाता है जैसे -- ग्रीष्मऋतु में दस दिन प्रबल गर्मी का होना, दस दिन अधिक शीत का होना और दस दिन समशीतोष्ण होना आदि । काल का अयोग, जैसे — गर्मी के दिनों में अत्यल्प गर्मी होना या गर्मी बिल्कुल न होना । काल का अतियोग, जैसे — ग्रीष्म ऋतु में इतनी अधिक गर्मी का पड़ना जिससे पेड़, पत्ती, नदी, तालाब सूख जायँ । ( २ ) बुद्धि - यहाँ बुद्धि से बुद्धीन्द्रिय लिया जाता है अर्थात् आँख, कान, नाक, जिड्डा, त्वचा इन इन्द्रियों का रूप, शब्द, गन्ध, रस, स्पर्श इन अपने - अपने विषयों के साथ मिथ्यायोग, अयोग, अतियोग का होना रोग का कारण होता है । जैसे— नेत्र का मिश्रया योग - जिन वस्तुओं को नेत्रेन्द्रिय देखना नहीं चाहती, जैसे- सड़ा गला वस्तु, घृणित वस्तु आदि, उससे नेत्र का संयोग होना मिथ्या योग है । नेत्र का अयोग - नेत्र इन्द्रिय प्रकाश में अपना कार्य करती है यदि प्रकाश की न्यूनता हो या नेत्र से बिलकुल न देखा जाय तो अयोग कहते हैं । नेत्रेन्द्रिय का अतियोग - जैसे अतिप्रकाश वाले सूर्य या अधिक शक्ति की बिजली का देखना या अधिक नेत्र से कार्य करना, जैसे — प्रेस आदि में अक्षर नियोजन का कार्य करना । इस प्रकार कर्ण, नासिका आदि इन्द्रियों का अतियोग, अयोग, मिथ्यायोग का संग्रह इसी स्थान के ११ वें अध्याय में आगे किया गया है, उसे वहीं देखना चाहिये । कुछ लोग बुद्धि से ज्ञान और इन्द्रिय से कर्मेन्द्रिय का ग्रहण करते हैं, उनका भी अतियोग, अयोग, मिथ्यायोग रोग का कारण होता है । इसी आधार पर रोग का तीन आयतन बताते हुए ' अर्थानां कर्मणः कालस्य चानियोगायोगमिथ्यायोगाः । ' ( सू. अ. ११ ) बताया गया है । कुछ लोग बुद्धि का अर्थ प्रज्ञा करते है और प्रज्ञापराध से होने वाले रोगों का संग्रह यहाँ किया गया है ऐसा मानते हैं अन्यत्र प्रज्ञापराध, परिणाम और असारम्येन्द्रियार्थसंयोग यह तीन रोग का हेतु माना है । यहाँ काल का परिणाम, बुद्धि का प्रज्ञापराध, इन्द्रियार्थ का असात्मेन्द्रियार्थसंयोग से अभिन्नता मानकर संक्षेप में तीन हेतु माना है । यहाँ सर्वप्रथम काल का इसलिए निर्देश किया है कि वह सभी प्राणियों के लिये दुष्परिहार्य होता है । इसके बाद बुद्धि का निर्देश है क्योंकि बुद्धि के अपराध - स्वरूप ही इन्द्रियों का अनियोग, अयोग और मिथ्यायोग होता हैं । कहा भी है- ' प्रज्ञापराधाद्धयहितानर्थान् पञ्च निषेवते । " ( सू. अ. २८ ) यद्यपि असात्म्येन्द्रियार्थसंयोग प्रज्ञापराध में ही प्रविष्ट हो जाता है । तथापि
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३० चरकसंहिता प्रज्ञापराध परम्परया असात्म्येन्द्रियार्थसंयोग में कारण है और असात्म्येन्द्रियार्थसंयोग रोगोत्पत्ति में साक्षात्कारण होता है अतः इसे अलग पढ़ा गया है । तथा प्रज्ञापराध से असान्येन्द्रियार्थसंयोग होता है पर इससे अतिरिक्त काय, मन, वाग् का अपराध भी प्रज्ञापराध में आता है अतः प्रज्ञापराध का पृथक् पढ़ना युक्तिसंगत है । प्रज्ञापराध में ही कर्मज रोग भी आते हैं जैसे कि - ' क्रियाप्ताः कर्मजा रोगाः ' ( शा. अ. १ ) कहा है । कर्मज रोग का अधर्म कारण होता है । कुछ लोग अधर्म को काल में ग्रहण करते हैं क्योंकि अधर्म काल से ही रोगोत्पादक होता है । पर यह मत ठीक नहीं है क्योंकि ११ अध्याय में प्रज्ञापराध के अन्दर ही अधर्म का समावेश किया गया है । प्रज्ञापराध से अधर्म की उत्पत्ति होती है बाद में अवान्तर व्यापार होता है वह कर्मज रोगों का कारण होता है । कुछ लोग - पालनरिणाम से ही कर्मज रोग होता है अतः इसे काल में समावेश करते है जैसा कि - ' कालस्व परिणामेन जरामृत्युनिभिन्नाः । रोगाः स्वाभाविका दृष्टाः स्वभावो निष्प्रतिक्रियः ॥ ' ( शा. अ. १ ) कहा है । पर ऐसा कहने पर अनात्म्येन्द्रियार्थसंयोग को भी काल ही मानना पड़ेगा क्योंकि असात्म्येन्द्रि-यार्थसंयोग भी कियत् कालानन्तर गोपादक होता है । अतः यह स्पष्ट है कि काल में कर्म का समा बेश नहीं है! जो शा ० १ अध्याय में - ' श्रीधृतिस्मृतिविभ्रंशः, सन्प्राप्तिः कालकर्मणाम् । असात्म्येन्द्रि-यार्थसंयोग विशेया रोगहेतवः || ' यह कह कर साभाविक एवं कर्मज रोगों का अन्तर्भाव कालज में किया है, जैसा कि — ' कालस्य परिणामेन ' इस पद्य से स्पष्ट है तथा - निर्दिष्टं ' देवसंज्ञं तु कर्मयत्पर्य-दैहिकन् । हेतुस्तदपि कालेन रोगाणामुपलभ्यते ॥ ' ( शा. अ. १ ) से भी कर्मज रोग काल में समाविष्ट होता है ऐसा है यह भी ठीक नहीं क्योंकि यहाँ भी मिथ्याबुद्धिजन्य अधर्म को प्रज्ञापराध में ही माना जाता है । सामान्यतः जो रोग कालविशेष से होते हैं - चाहे वे रोग कालमिथ्यायोग से हों या असा-रम्येन्द्रियर्थसंयोग से हों या प्रज्ञापराध से हों पर काल ( समय ) विशेष में उनकी अभिव्यक्ति होती है उनको कालसंप्राप्ति से उत्पन्न माना जाता है । पर वस्तुतः उन्हें कालमिथ्यायोगादि से उत्पन्न नहीं माना जाता है । सन्ततादि विषम ज्वर कालजन्य होते हैं ऐसा कहा गया है यथा-' सन्ततः सततोऽन्येद्युस्तृतीयक चतुर्थकौ । स्वे स्वे काले प्रवर्तन्ते काले ह्येषां वलागमः ॥ ' ( शा.अ. १ ) पर यहाँ कालज कहने का तात्पर्य यह नहीं है कि कालमिथ्यायोगजन्य यह रोग है । क्योंकि सन्ततादि ज्वर में काल का मिथ्यायोग, अयोग या अनियोग कारण नहीं होता है किन्तु असात्म्येन्द्रियार्थ संयोग या प्रज्ञापराध ही कारण होता है । स्वाभाविक रोगों में भी काल का मिथ्यायोगादि कारण नहीं होता है | अतः कालज रोग है इसका अर्थ काल ( समय ) पर रोगों का अभिव्यक्त होना है अर्थात् जो रोग विशेष विशेष काल में होते हैं उन्हें कालज रोग कहते हैं न कि कालमिथ्यायोगजन्य रोगों को काल कहा जाता है । इसी लिये धीधृति आदि पद में ' संप्राप्तिः कालकर्मणाम् ' ऐसा पढ़ा गया है, न कि ' कालो मिथ्या न चाति च ' ऐसा पढ़ा गया है । दूसरी बात यह है ' वीधृति ' इत्यादि पद में काल से कर्म को अलग पढ़ा है इसलिये काल में कर्म का ग्रहण करना न्यायसंगत नहीं है वाग्भट ने भी ' कालार्थकर्मगां योगो हीनमिथ्यातिमात्रकः । सम्यग्योगश्च विशेयो रोगारोग्यैककारणः ॥ ' काल से कर्म को पृथक रखा है । कर्मज रोग का कारण प्रज्ञापराध है यह बात ' उन्माद - निदान ' में साक्षान् कहा गया है । यथा - ' प्रज्ञापराधात्सम्भूते व्याधौ कर्मज आत्मनः । नाभिशंसेद बुधो देवान्न पितृन्न च राक्षसान् ' ( नि.अ. ७ ) तथा ' विमानस्थान ' में ' तस्य मूलमधर्मस्तन्मूलं चासकर्म पूर्वकृतं तयोर्योनिः प्रज्ञापराध एवं ' ( वि. अ. ३ ) कुछ विद्वान स्वाभाविक व्याधियों को कालज माना है पर यह भी उचित नहीं है क्योंकि काल आदि के सम्यग्योग होने पर भी स्वाभाविक क्षुत्पिपासा आदि रोग होते हैं । सम्यग्योग को रोगों की कारणता नहीं है । अतः कालप्रतिनियत रोगों का भी असात्म्येन्द्रियार्थ संयोग ही कारण होता है । इस प्रकार काल- मिथ्यायोगातियोग से होने वाले रोगों का कारण भी
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सूत्रस्थानम् ३१ साम्येन्द्रियार्थसंयोग को ही मानना पड़ेगा पर यह उचित नहीं है अतः यहाँ यह विचार करना उचित होगा कि महज रोग निष्प्रतिक्रिय होते है अतः उसका कारण अयोगातियो गमिन्दारोग नहीं होता है । स्वभाव से भी सहज ही माने जाते है अनायास्वभाव रोगों चिकित्सा सग प्रधान द्रव्य की सेवा करना है उसी प्रकार स्वाभाविक पिपासा आदि रोगों की चिकित्सा कालभोजन रसायन आदि द्रव्यों का सेवन है । नियत समय से भोजन आदि न करने से पास आदि रोगों की उत्पत्ति होती है । नियत समय से भोजन आदि न करना प्रज्ञापराध ही माना जाता है जैसा कि - ' कर्मकालातिपातश्च मिथ्यारम्भश्च कर्मणाम् । विन-साचारलोपश्च * ' ' ' ' ' ' ' ' प्रहारार्थ तं शिष्टा ने व्याधिकारणम् ' ( शा. १ ) काज पिपासा आदि रोगों का भी कारण प्रज्ञापराध ही है । अतः रोगों का कारण भिन्न होते हुए भी ( १ ) काल ( परिणाम ) ( २ ) बुद्धि ( प्रज्ञापराध ) ( १ ) इन्द्रिया का मिथ्यायोग २ प्रयोग २ प्रतियोग ये तीन कारण संक्षेप में कई गये है । जब तीनों कारणों का छान हो जाता है -सामे ' संक्षेपतः क्रियायोगो निदानपरिवर्जनम् । ' तथा ' हेतोरसेवा विहिता यथैव जातस्य रोल्स्य भवेच्चि -किसा ' के अनुसार दीपों की माम्यावस्था लाने में इन कारणों का त्याग किया जाता है । ऋशरीरं सत्त्वसंज्ञं च व्याधीनासाश्रयो मतः । तथा सुखानां, योगस्तु सुखानां कारणं समः ॥५५ ॥
रोग का आश्रय -- शरीर और मन दोनों रोगों के आश्रय स्थान ) है तथा सुख का भी आश्रय ये ही मन और शरीर है । कालबुद्धीन्द्रियार्थ का समयोग सुख का कारण होता है । ५५ ॥ विमर्श -- यहाँ सर्वप्रथम रोग का आश्रय शरीर को बताया है कि शरीर होना प्रत्यक्ष दृष्टिगोचर होता है । मन का व्याधिग्रस्त होना लक्षणों के आधार पर अनुमान द्वारा निश्चित किया जाता है । अतः शरीर के बाद मन का निर्देश किया गाया है । ' सत्त्वसंच ' ऐसा कहने से आत्मसंयुक्त मन रोग का अधिष्ठान होता है तथा आत्मसंयुक्त शरीर भी रोगाधिष्ठान होता है । यद्यपि शारीरिक रोग कालान्तर में मानस और मानस रोग शारीरिक हो जाते हैं पर दो अधिष्ठान कहने का अर्थ यह है कि जिन रोगों का प्रथम शरीर पर प्रभाव पड़ता है उसे शारीरिक और जिनका मन पर प्रथम प्रभाव पड़ता है उसे मानस रोग कहा जाता है । शारीरिक रोग जैसे-ज्वर, अतिसार, शोथ, शोप, श्वास, प्रमेह, कुष्ठ आदि, मानस रोग जैसे -- काम, क्रोध, लोभ, मोह, ईर्ष्या, मान, शोक, भय आदि शरीर और मन के आश्रयभूत रोग - संन्यास, मूर्द्धा, उन्माद, अपस्मार आदि । * निर्विकारः परस्यात्मा सवभूतगुणेन्द्रियैः । चैतन्ये कारणं निस्यो द्रष्टा पश्यति हि क्रिया ॥५६ ॥
आत्मा रोग का आश्रय नहीं - पर ( श्रेष्ठ या सूक्ष्म ) आत्मा निविकार ( सुख दुःख से रहित ) है । वही आत्मा सत्य ( मन ), भूत ( पचमहाभूत ), गुण ( भूतों का गुण - शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध या सत्व, रज, तम ) और दस इन्द्रियों से युक्त होता है तब चैतन्य ( ज्ञान प्राप्त करने ) में कारण होता है । वह आत्मा नित्य है, सभी चराचर जगत् का दर्शक है और क्रियाओं को देखता है ॥ ५६ ॥
विमर्श - आत्मा का भेद दो प्रकार का किया जाता है ( १ ) पर आत्मा -- अर्थात् परमात्मा वह निविकार - सुख - दुःख से रहित, शान्त, रज, तम से रहित होता है ( २ ) जीवात्मा यही आत्मा, मन, भूतगुण और इन्द्रियों से युक्त होता है तो अचेतन शरीर मेंचेतनता उत्पन्न करता है । सामान्यतः आत्मा शब्द से दोनों परमात्मा और जमा लिये जाते हैं किन्तु दोनों में यह १. ' मनः भूतगुणाः शब्दादयः इन्द्रियाणि चक्षुरादीनि तैः करणभूतये कारण भवाय च वामन जायते व्यज्यते वा अत एव सरवादीनां ज्ञानकारणानां सर्वाभवा सर्वगतेऽप्यात्मनि न सर्वत्र ज्ञानं भवति ' इति चक्रः ।
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३२ चरकसंहिता भेद है कि श्रेष्ठ आत्मा में दुःख - सुख कुछ नहीं होता है । जीवात्मा में दुःख - सुख का भान होता है पैसा कि ' संयोगे पुरुषस्यैष्टो विज्ञेयो वेदनाकृतः वस्तुतः आत्मा सर्वथा निर्विकार है सत्वादि के संयोग होने पर वेदना केवल आत्माभिधित मन में होती है न कि शा में आना में सुख - दुख कुछ नहीं होता केवल जैसे कमल के पत्तों के ऊपर जल गिरता है पर पत्ती में वह लगता नहीं है, उसी प्रकार आत्मा में सुख का संयोग यद्यपि सत्वादि के संयोग से होता है पर वह सुख-दुःख मन में होना है आत्मा निर्लेप ही रहता है । केवल सत्त्वादि के सम्बन्ध से आत्मा में वेदना होती है - ऐसी प्रनोति होती है किन्तु सुख - दुःख से आत्मा अलग है । बहुधा यह प्रयोग किया जाता है - मेरी आमा दुखी है - इसका तात्पर्य यह है आत्माश्रयी मन दुखी है - इसी प्रकार ' निर्व्यथे चान्तरात्मनि ' में ' अन्तरात्मा ' शब्द से मन का ग्रहण किया जाता है । अथवा आत्मा शब्द का प्रयोग शरीर के लिए भी आता है जैसा कि पशिमनोवृतीनां धर्मस्य कीर्तेर्यशसः श्रियश्च । तथा शरीरस्य शरीरिणश्व स्वाद् द्वादशस्त्रिङ्गित आत्मशब्दः ॥ ' इन १२ अर्थों में आमा शब्द का प्रयोग किया जाता है तो आत्मा दुखी है इसका अर्थ-- शरीर दुखी है -- - यह होता है । केवल आत्मा ज्ञान का कारण नहीं होता है किन्तु सत्त्वादि के संयोग होने पर आत्मा को होना है यह कहा जाता है जैसा कि आत्मा का ज्ञानं स्वस्थ प्रवर्तते । करणानामवैमल्यादयोगाद्वा न वर्तते ॥ ( शा. अ. १ ) बनाया गया है । अतः आत्मा इन्द्रियों के संयोग होने पर ज्ञाता और सत्वादि इन्द्रियों के संयोगाभाव में अशाना होता है । जब आरमा अज्ञ और ज्ञ दोनों हुआ तो नित्य है या अनित्य इसके उत्तर में कहा गया है कि आत्मा नित्य किन्तु आत्मा नित्य होते हुए का धर्म शान जब अनित्य अनित्य होते हुए शब्द-इसलिए जन्मान्तर में है । अर्थात् उभय- ( पर आत्मा और जीव अत्मा ) आत्मा नित्य है भी उसका ज्ञान अनित्य होना है । यदि यह कल्पना करें की आत्मा है तब धर्मी आत्मा भी अनित्य हैं । यह ठीक नहीं क्योंकि शब्द गुण के धर्मी आकाश अनित्य नहीं होता है अतः आत्मा नित्य ही होता है, अनुभूत विषयों को अगले जन्मान्तर में अनुसन्धान करता है जिससे अज्ञात विषयों को भी ग्रहण करता है जैसे जन्म के समय माताएँ बालक का मुख स्तन में लगाती हैं और बच्चा दूध पीने लगता है - तो बच्चा विना शिक्षा दिये ही स्तन चूसना प्रारम्भ कर देता है । जन्मजन्मान्तर में स्तन को चूमा है अतः जन्मान्तर के अनुभव पर बिना शिक्षा के ही स्तन म का दूध पीना है । यदि आत्मा को अनित्य माना जायगा तो जन्मान्तर की वानों का स्मरण न होगा, उसके अभाव में बच्चा का दूध पीना असम्भव होगा क्योंकि शिक्षा का अभाव है । जन्मान्तर में दूसरे आत्मा से अनुभूत विषयों को जन्मान्तर में अभ्य आत्मा से वह विषय अनुस्तुत नहीं होगा । अतः आत्मा को अभिव्य मानने से व्यवहार नहीं बन सकेगा । आत्मा को ' द्रष्टा ' बनाया है तात्पर्य यह है जिस प्रकार राग - द्वेष से शून्य आप्त कोई योगी जो जीवन्मुक्त है जगत् के सारे वस्तुओं को देखता है, पर राग - द्वेष न होने के कारण न किसी को प्रेम से या द्वेष से देखता है, पर सामान्य रूप से ही सभी को देखना है और इसे उन वस्तुओं को देखने से भी सुख - दुःख नहीं होता है । वैसे आत्मा देखता सब कुछ है पर रज और तम के अभाव के कारण उसमें मुख या दुःख नहीं होता है अतः ' द्रष्टा ' बताया है । इसे ही ' क्रिया पश्यति ' से और स्पष्ट किया है केवल देखता है, न कि करता है और न उससे लिप्त होता है । वायुः पित्तं कफयोक्तः शारीरो दोपसंग्रहः । मानसः पुनरुदिष्टो रज तम एव च ॥ ५७ ॥
शारीरिक और मानसिक दोष - संक्षेप में बात, पित्त और कफ ये शारीरिक दोष कहे जाते है, और फिर रज एवं तम मानस दोष कहे जाते हैं ॥ ५७ ॥
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दीर्घञ्जीवितीयाध्यायः १ ] सूत्रस्थानम् ३३ विमर्श - उपर्युक्त श्लोक में दोष - संग्रह का विचार करते समय जो वात दोष की ही सर्वप्रथन गणना की गयी है उसका आधार निम्नांकित हो सकता है । ( १ ) ' पित्तं पशु कफः पङ्गुः पङ्गवो मलधातवः । वायुना यत्र नीयन्ते तत्र गच्छन्ति मेघवत् ॥ ' ( शार्ङ्ग ० ) अर्थात् पित्त और कफ में स्वतः गमन की शक्ति नहीं है केवल बात की सहायता से ही वे यत्र - तत्र गमन करते हैं, अतः वान प्रधान है । ( २ ) शीघ्र और भयङ्कर रोगों का कारण जैसा वात होता है वैसा पित्त और कफ नहीं होते, जैसा कि ' आशुकारी मुहुश्चारी ' ( सु. नि. अ. १ ) से स्पष्ट है । ( ३ ) नानात्मज रोग वात से ८०, पित्त से ४० और कफ से २० प्रकार के होते हैं । इसलिए संख्या में अधिक रोग उत्पन्न करने के कारण भी वात प्रधान होता है । बात के बाद पित्त दोष के वर्णन में अधोलिखित कारण हो सकते हैं । ( १ ) कफ की अपेक्षा पित्त से अधिक रोग उत्पन्न होते हैं । ( २ ) कफ की अपेक्षा पित्त, रोग उत्पन्न करने में आशुकारी होता है । ( ३ ) पित्त ही अग्नि है, अग्नि के प्राकृत रहने से ही शरीर की स्थिति बनी रहती है - ' आयुर्वर्णो बलं स्वास्थ्यमुत्साहोपचयौ प्रभा । ओज-स्तेजोऽग्नयः प्राणाश्चोक्ता देहाग्निहेतुकाः ॥ ' ( च. चि. १५ ) । अतः यहाँ कफ से पूर्व पित्त की गणना की गयी है । ' दोष- संग्रह ' शब्द का अभिप्राय यह है कि दोषों का यहाँ संक्षेप में संग्रह किया गया है । विस्तार से वर्णन तो सू. अ. १७ में ' थुल्वणैकोल्वणैः षट् स्युहींनमध्याधिकैश्च षट् ' से किया जायगा । शङ्का - यहाँ केवल वात, पित्त और कफ इन तीन को ही दोष माना गया है तथा ' वायुः पित्तं कफश्चेति त्रयो दोषाः समासतः ' ( वा. सू. अ. १ ) यह कहकर वाग्भट ने भी तीन ही दोष माना है । पर चरक ( चि. अ. ५ ) में ' कफे वाते जितप्राये पित्तं शोणितमेव वा । यदि कुप्यति वातस्य क्रियमाणे चिकित्सिते । यथोल्वणस्य दोषस्य तत्र कार्य भिषग्जितम् ॥ ' इस वचन द्वारा रक्त को भी दोष स्वीकार किया है । तथा सुश्रुत ने भी रक्त को दोष माना है - ' संचयं च प्रकोपञ्च प्रसरं स्थानसंश्रयम् । व्यक्तिभेदं च यो वेत्ति दोषाणां स भवेद्भिषक् ॥ ' और प्रसर गिनाते समय रक्त का भी प्रसर बताया है । अतः संशय होता है कि वस्तुतः रक्त चौथा दोष है या नहीं क्योंकि जिस प्रकार वातादि दोषों का ( १ ) अपना स्वरूप ( २ ) स्थान ( ३ ) कुपित होने का विशेष कारण ( ४ ) रोग और ( ५ ) चिकित्सा होती है उसी प्रकार रक्त का भी वर्णन मिलता है । जैसे ( १ ) रक्त का स्वरूप -- ' तपनीयेन्द्रगोपाभं पद्मालक्तकसन्निभम् । गुञ्जाफलसवर्णे च विशुद्धं विद्धि शोणितम् ॥ ' ( सू. अ. २४ ) । ( २ ) रक्त का स्थान - ' प्लीहानं च यकृच्चैव तदधिष्ठाय जायते । स्रोतांसि रक्तवाहीनि तन्मूलानि हि देहिनाम् ॥ ' ( चि. अ. ४ ) तथा ' द्वितीया रक्तधरा नाम मांसस्याभ्यन्तरतः तस्यां शोणितं विशेषतः शिरासु यकृत्प्लीह्वोश्च भवति ' ( सु. शा. अ. ४ ) । ( ३ ) रक्त के कुपित होने में कारण - ' छर्दिवेगप्रतीघातात् काले चानवसेचनात् । श्रमा-भिघातात् सन्तापैरजीर्णाध्यशनैस्तथा । शरत्कालस्वभावाच्च शोणितं सम्प्रदुष्यति ॥ ' ( सू. अ. २४ ) । ( ४ ) रक्तज रोग – ‘ कण्ड्वरुःकोठपिडकाकुष्ठचर्मदलादयः । विकाराः सर्व एवैते विज्ञेयाः शोणिता-श्रयाः ॥ ' ( सु. अ. २४ ) | ( ५ ) रक्तज रोगों की चिकित्सा - ' कुर्याच्छोणितरोगेषु रक्तपित्तहरी क्रियाम् । विरेकमुपवासं च स्रावणं शोणितस्य च ॥ ' ( सू. अ. २४ ) । इस प्रकार दोषों का समान वर्णन होने के कारण रक्त को भी चौथा दोष मानना चाहिये । समाधान - परन्तु दोष शब्द की निरुक्ति पर विचार करने से रक्त में दोष का लक्षण नहीं घटना, क्योंकि ' स्वातन्त्र्येण दुष्टिकर्तृत्वं दोषत्वम् ' अर्थात् स्वतन्त्र रहते हुये जो दूषित करने वाला होता है उसे दोष संज्ञा दी जाती है । रक्त स्वतन्त्र होकर किसी को दूषित नहीं करता, अतः दोष की श्रेणी में नहीं आता । वात, पित्त और कफ ये स्वतन्त्र होकर दूषित करते हैं अतः इनकी ३ च ० सं ०
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३४ चरकसंहिता दोष संज्ञा है । रक्त, जब तक वातादि दोषों से दूषित नहीं होता तब तक वह रोगोत्पादक नहीं होता । जो रक्त - दुष्टि का हेतु ऊपर बताया है वह हेतु भी वानादि - दोषयुक्त ही रक्त को दूषित करता है । अर्थात् वहाँ भी यदि वातादि दोष प्रकुपित न होंगे तो रक्त दूषित न होगा, अतः दूषित करने वाले वातादि दोष ही माने जाते हैं । कहा भी है ' यस्माद्रक्तं विना दोषैर्न कदाचित्प्र-कुप्यति । तस्मात्तस्य यथादोषं कालं विद्यात् प्रकोपणे ॥ ' रक्त के कुपित होने का समय दोपों के अनुसार ही समझना चाहिये अर्थात् जिस दोष से रक्त दूषित होगा उस दोष के कुपित होने का जो समय वर्षा, शरद और वसन्त ऋतु में, या प्रातः, मध्याह्न और सायंकाल में होगा उसी समय में रक्त भी कुपित होगा । अतएव रक्त को दूष्य माना जाता है क्योंकि स्वतन्त्र दूषित करने की शक्ति दूष्यों में नहीं पायी जाती । उदाहरणार्थं दोषों के समान ही मांसदुष्टि के कारण - ' मांसवाहीनि दुष्यन्ति भुक्त्वा च स्वपतां दिवा ' ( वि.अ. ५ ), मांसदृष्टि के लक्षण -- ' शृणु मांसप्रदोषजान् । अधिमासार्बुदं कीलं गलशालूक-शुण्डिके ॥ ' ( सू. अ. २८ ) और मांसदुष्टि की चिकित्सा - ' मांसजानां तु संशुद्धिः शस्त्रक्षाराग्निकर्म च ' ( सू.अ. २८ ) इत्यादि के प्राप्त होने पर भी मांस को दोष नहीं कहा जाता । किन्तु जहाँ दूष्यों की प्रबलता होती हैं वहाँ यद्यपि कार्य दोषों का ही होता है पर ' भूयसा व्यपदेशः ' के सिद्धान्त से यह कहा जाता है कि यह रोग रक्तज है, मांसज है इत्यादि । जिस प्रकार कोई व्यक्ति गरम घृत से जल जाय तो वह कहता है कि मैं घृत से जल गया पर यह कहना उसका युक्तियुक्त नहीं है । क्योंकि घृत प्रकृति से ही शीतल होता है, उसमें दाहक शक्ति का अभाव है । वस्तुतः गरम घृत में जो अग्नि है, वह जलाने वाली होती हैं - ' रसादिस्थेषु दोषेषु व्याधयः सम्भवन्ति ये । तज्जानित्युपचारेण तानाहुघृतदग्धवत् ॥ ' इसी तरह मात्रा से बढ़े हुए दूष्यों में दोष ही दूषित करने वाला होता है किन्तु प्रधानता दूष्यों की रहती है अतः दूष्यों को कारण माना गया है । सामान्यतः पीड़ाकारक होने से जो दोष नहीं भी है उसे भी कहीं कहीं दोष उपचार से मान लिया गया है । जैसे - ' स्वयं प्रवृत्तं तं दोषमुपेक्षेत हिताशनैः ' ( चि. अ. ५ ) से पुरीष को भी दोष माना है । अब पुनः शङ्का करते हैं कि - जिस प्रकार रोगोत्पत्ति में रक्त में स्वतन्त्रता का अभाव है उसी प्रकार पित्त और कफ भी स्वतन्त्र नहीं हैं क्योंकि ' पित्तं पङ्गु ' इत्यादि पद से कफ और पित्त दोनों को पंगु बताया गया है । जब वायु की सहायता उन्हें प्राप्त होती है तभी वे कार्य करते हैं । अतः स्वतन्त्र न होने से पित्त और कफ भी दोष नहीं कहे जा सकते इसलिए दोष का पूर्ण लक्षण ' प्रकृत्यारम्भकत्वे सति दुष्टिकर्तृत्वं दोषत्वम् ' यह माना जाता है अर्थात् जो देह प्रकृति का निर्माण करते हुये दूषित करने वाले हों, उन्हें दोष कहते हैं । देह प्रकृति का निर्माण वात, पित्त और कफ ये तीन ही करते हैं, रक्त से किसी देह - प्रकृति का निर्माण नहीं होता, अतः रक्त दोष नहीं है । वात, पित्त और कफ ये तीन ही शारीरिक दोष होते हैं - ' सर्वेषां च व्याधीनां वातपित्तश्लेष्माण एव मूलं तलिङ्ग-त्वाद् दृष्टफलत्वादागमाच्च । यथा हि कृत्स्नं विकारजातं सत्त्वरजस्तमांसि न व्यतिरिच्यन्ते, एवमेव कृत्स्नं विकारजातं विश्वरूपेणावस्थितमव्यतिरिच्य वातपित्तश्लेष्माणो वर्तन्ते ' ( सु. सू. अ. २४ ) । मानस दोष रज और तम होते । इनमें रज प्रधान होता है क्योंकि विना रज की प्रवृत्ति ही नहीं होती - ' नारजस्कं तमः प्रवर्तते ' ( वि. अ. ६ ) । अतः रज पहले बता कर बाद में तम बताया है । सत्त्व अविकारकारी और प्रकाशक होता है अतः यह दोष नहीं है किन्तु गुण है । अन्यत्र भी कहा है- ' रजस्तमश्च द्वौ दोपौ मनसः समुदाहृतौ ' । इसीलिये यहाँ ५७ वें श्लोक में ' एव ' शब्द का निर्देश किया गया है कि मानस दोष दो ही होते हैं । पहले ५४ वें श्लोक में रोगों के विप्रकृष्ट कारणों का निर्देश किया गया है । यहाँ वात, पित्त और कफ में
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दीर्घञ्जीवितीयाध्यायः १ ] सूत्रस्थानम् ३५ शरीर दूषित करने की शक्ति है यह दिखाते हुये रोगों के सन्निकृष्ट कारण होने से इनका बाद में वर्णन किया गया है । इसी प्रकार रज और तम भी मानस रोगों में सन्निकृष्ट कारण होते हैं अतः शारीरिक और मानसिक रोगों के सन्निकृष्ट कारणों का यहाँ वर्णन किया गया है । उपर्युक्त विमर्श की मूल भावना चक्रपाणि सम्नत है । * प्रशाम्यत्यौषधैः पूर्वो दैवयुक्तिन्यपाश्रयैः । मानसो ज्ञानविज्ञानधैर्यस्मृतिसमाधिभिः ॥ शारीर एवं मानस रोगों का चिकित्सा सूत्र - शारीरिक दोष या रोग देवव्यपाश्रय और युक्तिव्यपाश्रय औषध से शान्त होते हैं । मानस रोग ज्ञान, विज्ञान, धैर्य, स्मृति और समाधि से शान्त होते हैं ॥ ५८ ॥
विमर्श - दैवव्यपाश्रय चिकित्सा के साधन ये हैं - ' मन्त्रौषधिमणिमङ्गलबल्युपहारहोमनियम-प्रायश्चित्तोपवासस्वस्त्ययनप्रणिपातगमनादि ' ( सू. अ. ११ ) । प्रायः दैवव्यपाश्रय चिकित्सा कर्मज रोगों में की जाती है । कहीं - कहीं दोषज रोगों में भो दैवव्यपाश्रय चिकित्सा का प्रयोग होता है जैसे- ' विष्णुं सहस्रमूर्धानं चराचरपतिं विभुम् । स्तुवन् नामसहस्रेण ज्वरान् सर्वान् व्यपोहति ॥ ' ( चि. अ. ३ ) तथा - ' व्रतदमयमसेवात्यागशीलाभियोगो, द्विजसुरगुरुपूजा-सर्वसत्त्वेषु मैत्री । शिवशिवसुतताराभास्कराराधनानि, प्रकटितमपलापं कुष्ठमुन्मूलयन्ति ॥ ' ( अ. हृ. चि. अ. १ ९ ) । परन्तु विशेष रूप से कर्मज ( पूर्वकर्मज ) एवं आगन्तुक रोगों में ही इसके अनुसार चिकित्सा होती है, जैसे कर्मज रोग में-- ' दानैर्दयाभिरपि च द्विजदेवतागोर्गु-र्वर्चनाप्रणतिभिश्च जपैस्तपोभिः । इत्युक्तपुण्यनिचयैरपचीयमानाः प्राकूपापजा यदि रुजः प्रशमं प्रयान्ति ॥ ' और आगन्तुक रोग में – ' शापाभिचारोद्भूतानामभिषङ्गाच्च यो ज्वरः । दैवव्यपाश्रयं तत्र सर्वमौषधमिष्यते ॥ ' ( चि. अ. ३ ) । युक्तिव्यपाश्रय – आहार, औषध, चूर्ण, वटी, रस, भस्म इत्यादि की योजना ( युक्ति ) जो देश, काल, वय, प्रकृति, सात्म्य, मात्रा आदि का विचार कर की जाती है उसे युक्तिव्यपाश्रय कहते हैं । यह चिकित्सा प्रायः दोषज रोगों में की जाती है । प्रायः का तात्पर्य यह है कि उपर्युक्त दोनों चिकित्सायें दोनों प्रकार के रोगों में की जाती हैं परन्तु पूर्व - कर्मज एवं आगन्तुज रोगों में विशेष दैवव्यपाश्रय और दोषज रोगों में विशेष युक्तिव्यपाश्रय चिकित्सा की जाती है । इस दृष्टि से रोग के तीन प्रकार माने जा सकते हैं - ( १ ) दोषज ( २ ) कर्मज ( ३ ) दोषकर्मज । जो रोग मिथ्या आहार - विहार इत्यादि से उत्पन्न हो वह दोषज, जो नियमित दिनचर्या, रात्रिचर्या, ऋतुचर्या इत्यादि का पालन करते रहने पर भी उत्पन्न हो जाय वह कर्मज -- ' सत्याश्रये वा द्विविधे यथोक्ते पूर्वं गदेभ्यः प्रतिकर्म नित्यम् । जितेन्द्रियं नानुपतन्ति रोगास्तत्कालयुक्तं यदि नास्ति दैवम् ॥ ' ( शा. अ. २ ) और जो रोग अल्प कारण होने पर भी अधिक मात्रा में बढ़ जाय वह दोषकर्मज कहा जाता है, यथा- ' अल्प के हेतौ महान् आरम्भो दोषकर्मजः ' । मानस रोगों की चिकित्सा ज्ञान ( आत्मविज्ञान ), विज्ञान ( शास्त्रज्ञान ), धैर्य ( धीरता ), स्मृति ( स्मरणशक्ति ) और समाधि ( मन को विषयों से हटा कर आत्मा में नियमन करना ) द्वारा की जाती हैं । वाग्भट ने भी ' धीधैर्यात्मादिविज्ञानं मनोदोषौषधं परम् ' ( अ. हृ. सू. अ. १ ) इत्यादि द्वारा मानस रोगों में यही व्यवस्था बतायी है । चरकसंहिता सूत्रस्थान के ११ वें अध्याय में तीसरी प्रकार की चिकित्सा सत्त्वावजय बतायी गई है । उसका तात्पर्यं सत्त्व ( मन ) का अवजय ( जीतना ) है | ज्ञान, विज्ञान, धैर्य, स्मृति इत्यादि का प्रयोग तब तक नहीं हो सकता जब तक मन को स्थिर न किया जाय अतएव मानस रोगों में सत्त्वावजय ही मूल चिकित्सा है । यहाँ मानस रोगों की चिकित्सा में यद्यपि सत्त्वावजय का नाम नहीं लिया गया है तथापि उसका भाव इसमें अन्तर्निहित है । सत्त्वावजय को आजकल की भाषा में ' Psycotherapy ' कह सकते हैं |
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३६ चरकसंहिता * रूक्षः शीतो लघुः सूक्ष्मश्चलोऽथ विशदः खरः । विपरीतगुणैर्द्रव्यैर्मारुतः संप्रशाम्यति ॥ वात का लक्षण और चिकित्सासूत्र - • वायु रूक्ष, शीतल, लघु, सूक्ष्म, चल ( चञ्चल ), विशद और खर इन भौतिक गुणों से युक्त होता है । इन गुणों के विपरीत गुण वाले द्रव्यों से वायु का शमन होता है ॥ ५ ९ ॥ विमर्श - प्राकृत वायु के गुणों के विपरीत स्निग्ध, उष्ण, गुरु, स्थूल, स्थिर, पिच्छिल और श्रृक्ष्ण गुण होते हैं । इन गुणों वाले द्रव्यों से प्रकुपित वायु का शमन होता है । उपर्युक्त सभी गुण एक ही द्रव्य में मिलें ऐसा जरूरी नहीं है जैसा कि ' तत्र तैलं स्नेहौष्ण्यगौरवोपपन्नत्वाद् वातं जयति सततमभ्यस्यमानं वातो हि रौक्ष्यशैत्यलाघवोपपन्नो विरुद्ध ( विपरीत ) गुणो भवति ' ( वि. अ. १ ) से स्पष्ट है । यहाँ तेल वात के सर्वथा विपरीत नहीं है फिर भी प्रकुपित वायु का शमन करता है । अतः यहाँ यह अर्थं करना चाहिए कि जो सर्वथा गुण में विपरीत होता है वह शीघ्र ही प्रकुपित वायु का शमन करता है, इसीलिए मूल श्लोक में आचार्य ने ' सम् ' और ' प्र ' उपसर्ग लगाये हैं । जो द्रव्य अल्पांश में या अधिकांश में गुणविपरीत होते है वे भी प्रकुपित वायु का शमन करते हैं किन्तु शीघ्र नहीं । अतएव वहाँ ' सततमभ्यस्यमानम् ' यह संकेत करने के बाद बताया गया है कि ' विरुद्धगुणसन्निपाते हि भूयसा अल्पं ह्यवजीयते ' अर्थात् लगातार सेवन के बाद जब वात के विपरीत गुणों की अधिकता हो जाती है तब तेल प्रकुपित वात का शमन करता है । चरकसंहिता के सूत्रस्थान के २० वें अध्याय में वायु के बारे में ' रौक्ष्यं शैत्यं लाघवं वैशद्यं गतिर-मूर्तत्वं च वायोरात्मरूपाणि ' तथा सुश्रुतसंहिता नि. अ. १ में ' अव्यक्तो व्यक्तकर्मा च रूक्षः शीतो लघुः खरः । तिर्य्यग्गो द्विगुणश्चैव रजोबहुल एव च ॥ ' भी बताया गया है । यहाँ वात को शीतल माना गया है पर प्रत्यक्ष में वह शीतल नहीं होता - ' योगवाहः परं वायुः संयोगादुभयार्थकृत् । दाह-कृत् तेजसा युक्तः शीतकृत् सोमसंश्रयात् ' ( चि. अ. ३ ) । इससे जब वायु को योगवाही तथा भाषा-परिच्छेद में - ' अनुष्णाशीतस्पर्शस्तु पवनो मतः ' से वायु को अनुष्णाशीत माना गया है, तो यहाँ उसको शीत कैसे कहा गया? इसका आशय यह हो सकता है कि वायु शीत द्रव्यों के संयोग तथा विहार से कुपित होता है तथा उष्ण द्रव्य एवं विहार से शान्त होता है । इस बात को देख कर ही सुश्रुत ने वात को शीत कह दिया है । यहाँ विपरीत गुणों से वात की शान्ति बतायी गई है, गुणविपरीत रस, वीर्य, विपाक, प्रभाव का उपलक्षण प्रतीत होता है अर्थात् जो द्रव्य रस से, वीर्यं से, विपाक से और प्रभाव से बात के विपरीत होगा वह भी बात को शान्त कर सकता है । * सस्नेहमुष्णं तीक्ष्णं च द्रवमम्लं सरं कटु । विपरीतगुणैः पित्तं द्रव्यैराशु प्रशाम्यति ॥६० ॥
पित्त का लक्षण एवं चिकित्सा सूत्र -- पित्त ईषत् स्नेहयुक्त, गरम, तीक्ष्ण, द्रव, अम्ल, सर और कटु गुण युक्त होता है । इनसे विपरीत गुण वाले द्रव्यों के प्रयोग से पित्त का शमन होता है । विमर्श -- पित्त का स्वरूप ' औष्ण्यं तैक्ष्ण्यं द्रवमनतिस्नेहो, वर्णश्च शुक्लारुणवर्जी, गन्धश्च विस्रो, रसौ कटुकाम्लौ, सरश्च, पित्तस्यात्मरूपाणि ' ( सू. अ. २० ) में स्पष्ट है । पित्त को ' अनतिस्नेह ' यहाँ कहा गया है इसी के आधार पर ' सस्नेह ' का अर्थ ' अनतिस्नेह ' अर्थात् ईषत् स्नेह किया जाता है । शुक और अरुण वर्ग को छोड़ कर शेष वर्ण पित्त में होता है, गन्ध में पित्त विस्र ( दुर्गन्धि ) होता है और रस में कटु और अम्ल होता है । इस प्रकार वर्ण और गन्ध का निर्देश करते हुए यहाँ अम्ल रस का स्वतन्त्र रूप से निर्देश भी किया गया है । इसी बात को सुश्रुत ने भी कहा है ' पित्तं तीक्ष्णं द्रवं पूति नीलं पीतं तथैव च । उष्णं कटुरसचैव विदग्धं चाम्लमेव च ॥ ’ ( सु. सू. अ. २१ ) | पित्त के रस में अम्ल रस को साक्षात् न कह कर विदग्धावस्था में अम्लरस सुश्रुत ने भी स्वीकार किया है । विपरीत गुण वाले द्रव्यों के प्रयोग से पित्त शान्त होता है । पित्त
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दीर्घञ्जीवितीयाध्यायः १ ] सूत्रस्थानम् ३७ के गुणों से विपरीत गुण पूर्णस्नेह, शीत, मृदु, सान्द्र, स्थिर एवं मधुर, तिक्त तथा कषाय रस हैं, ऐसे द्रव्यों से पित्त की शान्ति होती है । यहाँ ' प्रशाम्यति ' पद से पित्त के शमन का उपदेश किया गया है । यद्यपि संशोधन से भी पित्त की शान्ति होती है पर यहाँ पित्त के सर गुग के विपरीत स्थिर गुण का प्रयोग करने से संशोधन नहीं होगा क्योंकि संशोधन द्रव्य स्वतः सर गुण वाले होते हैं अतः ऐसा प्रतीत होता है कि यहाँ संशमन से पित्त की शान्ति का उपदेश किया है । गुरुशीतमृदुस्निग्धमधुरस्थिरपिच्छिलाः । श्लेष्मणः प्रशमं यान्ति विपरीतगुणैर्गुणाः ॥ ६१ ॥
कफ का लक्षण एवं चिकित्सा - सूत्र - गुरु, शीत, मृदु, स्निग्ध, मधुर, स्थिर और पिच्छिल गुण वाला कफ होता है | इन गुणों से विपरीत गुण वाले द्रव्यों से कफ का शमन होता है ॥ ६१ ॥
विमर्श - कफ का स्वरूप ' चैत्य शैत्यगौरव स्नेहमाधुर्य्यपैच्छिल्यमात्स्न्यनि श्लेष्मण आत्म-रूपाणि ' ( सू. अ. २० ) में स्पष्ट है । इसमें चरक ने कफ का वर्णं श्वेत बताया है । सुश्रुत ने भी ' इलेष्मा श्वेतो गुरुः स्निग्धः पिच्छिलः शीत एव च । मधुरस्त्वविदग्धः स्याद्विदग्धो लवणः स्मृतः ’ ( सु. सू. अ. २१ ) कहकर कफ को श्वेतवर्ण बताया है । विपरीत गुणों से अर्थात् लघु, उष्ण, कठिन, रूक्ष, कटु, चल, विशद इन गुणों वाले द्रव्यों से प्रकुपित कफ के गुण शान्त होते हैं । इसका तात्पर्य यह है कि गुण की शान्ति से गुणी कफ की शान्ति होती है । गुण आधेय ( आश्रय ) होता है, गुण आधार ( आश्रयी ) होता है । सामान्यतः यह नियम है कि आश्रय के नाश से आश्रयी का नाश और आश्रयी के नाश से आश्रय का नाश होता है - ' तेनैषामाश्रयाश्रयिणां मिथो यदेकस्य तदन्यस्य वर्धनक्षपणौषधम् । ' ( वा. सू. अ. ११ ) । अतः आश्रय गुर्वादि कफ के गुण जब विपरीत गुण वाले द्रव्य नष्ट हो जाते हैं तब आश्रयी कफ का भी नाश हो जाता है । अथवा आहार एवं औषध दोनों द्रव्य पाञ्चभौतिक होते हैं । वात, पित्त और कफ दोष की भी उत्पत्ति पञ्चमहाभूतों से ही है । जो पाञ्चभौतिक आहार एवं औषध जिस दोष के समान गुण वाले होते हैं, वे उस दोष को वृद्ध करते हैं और जो पाञ्चभौतिक आहार एवं औषध जिस दोष के विपरीत गुण वाले होते हैं, वे उस दोष के गुणों को नष्ट करते हुए उस दोष को शान्त करते हैं । कपिल ने त्रिदोष का लक्षण निम्नलिखित प्रकार से किया है - ' कट्वम्लं लवणं पित्तं स्वाद्वम्ललवणः कफः । कषायतिक्तकटुको वायुर्दृष्टोऽनुमानतः ॥ ' * विपरीतगुणैर्देशमात्रा कालोपपादितैः । भेषजैर्विनिवर्तन्ते विकाराः साध्यसंमताः ॥ ६२ ॥
साधनं न त्वसाध्यानां व्याधीनामुपदिश्यते । साध्य रोगों का चिकित्सा - सूत्र और असाध्य रोगों में चिकित्साभाव - जब देश ( भूमि और रोगी का शरीर ), मात्रा ( समुचित मात्रा जो वय, बल, शरीर, अग्नि, सात्म्य आदि का विचार करने के बाद दी गई हो ) और काल ( आवस्थिक और नित्यग ) के विपरीत गुण वाले ( हेतु और व्याधि से विपरीत या विपरीतार्थकारी भेषज ) औषध का प्रयोग युक्तिपूर्वक किया जाता है तव साध्यरोग नष्ट हो जाते हैं । असाध्य रोगों की चिकित्सा का उपदेश नहीं किया जाता ॥ ६२ ॥
विमर्श - यहाँ देश शब्द से दोष, भेषज, देश, काल, बल, शरीर, आहार, सात्म्य, सत्त्व, इनमें देश, मात्रा, काल, भेषज का - प्रकृति, वय, आदि परीक्ष्य विषयों का ग्रहण करना चाहिये । निर्देश शब्दतः किया गया है । साध्य रोगों की ही चिकित्सा होती है न कि असाध्य रोगों की, अतः साध्य रोगों में ही चिकित्सा का विधान किया गया है क्योंकि असाध्य रोगों में चिकित्सा प्रायः सफल नहीं होती - ' तद्वत् प्रत्याख्येयं त्रिदोषजम् । क्रियापथमतिक्रान्तं सर्वमार्गानुसारिणम् ॥ औत्सुक्यारतिसम्मोहकरमिन्द्रियनाशनम् । दुर्बलस्य सुसंवृद्धं व्याधिं सारिष्टमेव च ॥ ' ( सू.अ. १० ) तथा ' अनुपक्रम एव स्यात्स्थितोऽत्यन्तविपर्यये । औत्सुक्यमोहारतिकृद्दृष्टरिष्टोऽक्षनाशनः ॥ ’