चरक संहिता हिन्दी भाष्य — पृष्ठ 181–190
चरक संहिता हिन्दी भाष्य · Chaukhamba · पृष्ठ 181–190
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८८ ग्राही १ कटुप्रधान रस २ उष्णवीर्य ३ अग्निमहाभूतप्रधान ४ वातशामक चरकसंहिता ! स्तम्भन कषायप्रधान रस शीतवीर्य वायुमहाभूतप्रधान वातकृत् ( वातवर्धक ) फूल, ( ९ ) पद्मा ( ब्राह्मणयष्टिका - चक्र ०, भारङ्गी ), ( १० ) कमल का केशर, ये दश औषधियाँ पुरीष ( मल ) का संग्रहण ( धारण - निरोध ) करती हैं । विमर्श - जो औषध द्रवीभूत मल को, अतिसार रोग में बार - बार निकलने वाले पुरीष को बाँध कर निकालता है उसे पुरीषसंग्रहणीय द्रव्य कहते हैं । चरकसंहिता में केवल पुरीषसंग्रहणीय महाकषाय का वर्णन मिलता है । सुश्रुत ने सांग्राहिक द्रव्यों में वायु महाभूत का प्राधान्य माना है क्योंकि वायु में शोषण की शक्ति है, जब कि बाद के संग्रह - ग्रन्थ शार्ङ्गधरसंहिता में ' ग्राही ' तथा ' स्तम्भन ' दो प्रकार के कर्मों का वर्णन है तथा उनके उदाहरणों में औषधियों का भी वर्णन किया गया है जैसा कि निम्नांकित श्लोकों से ज्ञात होगा- ' दीपनं पाचनं यत्स्यादुष्णत्वाद् द्रवशोषकम् । ग्राहि तच्च यथा शुण्ठी जीरकं गजपिप्पली ॥ ' तथा ' रौक्ष्याच्छैत्यात्कषायत्वाल्लघु-पाकाच्च यद्भवेत् । वातकृत् स्तम्भनं तत्स्याद्यथा वत्सकटुण्डकौ ॥ ' ( शार्ङ्ग ० ) । शार्ङ्गधर के ग्राही ( उष्णवीर्य ) तथा स्तम्भन ( शीतवीर्य ) के वर्णन के आधार पर ही उसके टीकाकार आढमल्ल ने संग्राहक द्रव्यों के दो भेद ( १ ) आम - संग्राहक ( ग्राही ) तथा ( २ ) पक्क संग्राहक ( स्तम्भन ) करके संहिता तथा संग्रह - ग्रन्थों के मतभेदों का समाधान करने का प्रयास किया है । ग्राही तथा स्तम्भन का निम्नांकित तुलनात्मक अध्ययन इस सम्बन्ध में सहायक होगा । प्रायः आम दोष का संग्रहण नहीं किया जाता यथा - ' न तु संग्रहणं दद्यात्पूर्वमामाति-सारिणे । विवध्यमानाः प्राग्दोषा जनयत्यामयान् बहून् ॥ ' किन्तु विशेष परिस्थिति में आम दोष का भी संग्रह किया जाता है, यथा - ' क्षीणधातुवलश्चापि बहुदोषोऽतिनिस्रुतः । आमोऽपि स्तम्भनीयः स्यात्पाचनान्मरणं भवेत् ॥ ' अतः अवस्थानुसार पुरीषसंग्रहणीय औषधों का प्रयोग किया जाना है । सुश्रुत ने पुरीषसंग्रहणीय के ३ भेद किये हैं- ( १ ) न्यग्रोधादिगण को संग्राही के उदाहरण में, ( २ ) रोधादिगण को स्तम्भन के उदाहरण में और ( ३ ) प्रियंग्वादि एवं अम्बष्ठादि गण को पक्वातिसारनाशक के उदाहरण में बताया है । चरकसंहिता के जो उदाहरण दिये गये हैं वह पक्क-संग्राहक या शीतसग्राहकवर्ग के हैं । जम्बुशल्लकीत्वक्चच्छुरामधूक शाल्मली श्रीवेष्टक भृष्टमृत्पय स्योत्पलतिलकणा इति दशेमानि पुरीषविरजनीयानि भवन्ति ( ३२ ), ( ३२ ) पुरीषविरजनीय महाकषाय [ Correctives of Fecal - Pigments ] — ( १ ) जामुन, ( २ ) शल्लकी ( कुन्दुरु ) की छाल, ( ३ ) कैवाच, ( ४ ) महुवा, ( ५ ) शाल्मली ( सेमर ), ( ६ ) श्रीवेष्टक ( गन्धाविरोजा ), ( ७ ) भूनी हुई मिट्टी, ( ८ ) पयस्या ( विदारीकन्द ) ( ९ ) नील कमल, ( १० ) तिल, ये दश औषधियाँ पुरीपविरजनीय हैं । विमर्श - जो द्रव्य पुरीप के दोषों को दूर कर उसके वर्ण को प्राकृत कर दे उसे पुरीष-विरजनीय कहते हैं जैसे जम्बू, मुलेठी आदि, यथा - ' पुरीषस्य विरजनं विगतं रजनं ( रागः ) रागसंबन्धनिरासः तस्मै हितं पुरीषविरजनीयम् । पुरीष में वर्ण के विकार प्रायः पित्त के कारण होते हैं क्योंकि रञ्जन कर्म ( रञ्जक ) पित्त का है । अतः ये द्रव्य प्रायः पित्तशामक होते हैं ।
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षड्विरेचनशताश्रितीयाध्यायः ४ ] सूत्रस्थानम् ८६ * जम्ब्वाम्रप्लक्षवटकपीतनोदुम्बराश्वत्थभल्लातकाश्मन्तकसोमवल्का इति दशेमानि -मूत्रसंग्रहणीयानि भवन्ति ( ३३ ), ( ३३ ) मूत्रसंग्रहणीय [ Urinary Astringents ] ~ ( १ ) जामुन, ( २ ) आम, ( ३ ) प्लक्ष ( पाकड़ ), ( ४ ) बरगद, ( ५ ) कपीतन ( गन्धमुण्डः चक्र ० ), ( ६ ) उदुम्बर ( गूलर ), ( ७ ) पीपल, ( ८ ) भिलावा, ( ९ ) अश्मन्तक, ( १० ) सोमवल्क ( खदिर: ये दश औषधियाँ मूत्र को रोकने वाली होती हैं । चक्र ० ), विमर्श - जो मूत्र की प्रवृत्ति को कम करे उसे मूत्रसंग्रहणीय कहते हैं - यथा जामुन, आम आदि । इनमें कुछ द्रव्य आग्नेय हैं जो जलांश को कम करके मूत्र का प्रमाण घटाते हैं तथा कुछ कषायरस हैं जो रूक्षता के कारण जलांश के शोषण में सहयोग देते हैं जिससे मूत्र कम आता है । आग्नेय द्रव्यों के उदाहरण भल्लातक आदि तथा वायव्य द्रव्यों के उदाहरण आम, जामुन आदि हैं । पद्मोत्पलनलिनकुमुदसौगन्धिकपुण्डरीकशतपत्रमधुकप्रियङ्गुधातकीपुष्पाणीति दशे-मानि मूत्रविरजनीयानि भवन्ति ( ३४ ), ( ३४ ) मूत्रविरजनीय महाकषाय [ Corrective of Urinary Pigments ] ( १ ) पद्म ( कमल ), ( २ ) उत्पल ( नील कमल ), ( ३ ) नलिन, ( ४ ) कुमुद, ( ५ ) सौगन्धिक ( शुन्धी चक्र ० ), ( ६ ) पुण्डरीक, ( ७ ) शतपत्र ( कमलभेद ), ( ८ ) मुलेठी, ( ९ ) प्रियङ्गु, ( १० ) धायफूल, ये दश औषधियाँ दोषों से दूषित मूत्र के विकृत वर्ण को दूर कर उसमें प्राकृत वर्णं लाती हैं । विमर्श - यहाँ ( १ ) पद्म, ( २ ) उत्पल, ( ३ ) नलिन, ( ४ ) कुमुद, ( ५ ) सौगन्धिक, ( ६ ) पुण्डरीक, ( ७ ) शतपत्र ये सात कमल के भेदविशेष हैं । इनमें से तीन का परस्पर भेद राजनिघण्टुकार ने इस प्रकार दिया है - ' ईषच्छ्वेतं विदुः पद्ममीषनीलमथोत्पलम् । ईषद्रक्तं तु नलिनं क्षुद्रं तच्चोत्पलत्रयम् ॥ ' ( रा. नि. ४ वर्ग ) । मूत्रविरजनीय द्रव्य मूत्र के वर्ण को प्राकृत अवस्था में लाते हैं । मूत्र की वर्ण - विकृति की दृष्टि से हारिद्रमेह, माजिष्ठमेह, कालमेह इत्यादि वर्णनीय । यह सब पैत्तिक मेह के भेद हैं अतएव इनको प्राकृतावस्था में लाने के लिये प्रायः शीतवीर्य औषधियों का ही ऊपर वर्णन किया गया है, जिसमें कमल के भेद प्रधान हैं । जो द्रव्य मूत्र के वर्ण को प्राकृत बनावे उसे मूत्रविरजनीय कहते हैं यथा कमल के फूल, मुलेठी आदि । * वृक्षादनीश्वदंष्ट्रावसुकवशिरपाषाणभेददर्भ कुशकाशगुन्द्रेत्कट मूलानीति दशेमानि मूत्र-विरेचनीयानि भवन्ति ( ३५ ), इति पञ्चकः कषायवर्गः ॥ १५ ॥
( ३५ ) मूत्रविरेचनीय महाकषाय [ Diuretics ] ( १ ) वृक्षादनी ( बन्दाको विदारी-कन्दो वा चक्र ० ), ( २ ) गोखरू, ( ३ ) वसुक ( पुनर्नवा ), ( ४ ) वशिर ( सूर्यावर्तः- चक्र ० ), ( ५ ) पाषाणभेद, ( ६ ) दर्भ, ( ७ ) कुश, ( ८ ) कास, ( ९ ) गुन्दा ( होगला या जलजदर्भ ), ( १० ) इत्कटमूल ( शरमूल ), ये दश औषधियाँ मूत्र को अधिक मात्रा में निकालने वाली होती हैं । इस प्रकार यह पांच महाकपाय वर्गों का वर्णन समाप्त हुआ ॥ १५ ॥
जो द्रव्य मूत्र को अधिक मात्रा में लाते हैं उन्हें ' मूत्रविरेचनीय ' कहते हैं । इसे ‘ वस्तिशोधन ’ और ' मूल ' भी कहते हैं । मूत्र जलीय + आग्नेय है, अतः इसको प्रवृत्त करने वाले द्रव्य भी जलीय ( शीतवीर्य ) और आग्नेय ( उष्णवीर्य ) दोनों होते हैं । जलीय द्रव्य मूत्र में जल का परिमाण अधिक बढ़ा कर तथा
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६० चरकसंहिता सूक्ष्म नलिकाओं ( Urinary Tubules ) से जलांश के शोषण का अवरोध कर मूत्र की मात्रा बढ़ा देते हैं । आग्नेय द्रव्य मूत्रोत्सिकाओं ( Glomeruli ) में रक्तभार बढ़ा कर तथा वृक्कों में क्षोभ उत्पन्न कर मूत्रस्राव बढ़ाते हैं । शीतवीर्य द्रव्यों के उदाहरण तृणपञ्चभूल तथा उष्णवीर्य द्रव्यों के उदाहरण मरिच, पुनर्नवा आदि हैं । इसके अतिरिक्त, मूत्रल द्रव्य मधुर, अम्ल, लवण, द्रव तथा उपक्लेदी होते हैं । मूत्रविरेचनीय कर्म के सम्पादन के लिये निम्नांकित बातें शरीरक्रिया की दृष्टि से अवश्य मिलनी चाहिए - १. वृक्कों में जलांश का आधिक्य । २. रक्त में अम्लता की वृद्धि । ३. मूत्रोत्सिकाओं में निरन्तर, तीव्र और भारयुक्त रक्तप्रवाह । उपर्युक्त अवस्थायें होने पर मूत्र अधिक मात्रा में निकलता है और विपरीत स्थिति अर्थात् जलांश की कमी, रक्तप्रवाह होने पर मूत्र कम बनता है । आधुनिक दृष्टि से, मूत्रविरेचनीय द्रव्यों के अनेक वर्ग किये गये हैं - १. क्रियाशील मूत्रोत्सिकाओं की संख्या बढ़ाने वाले - यथा कैफीन, यूरिया । २. वृक्कों में रक्तसंवहन बढ़ाने वाले — यथा हृत्पत्री, कैफीन, मद्य आदि । ३. रक्तगत अम्लता बढ़ाने वाले - यथा नौसादर, लवण आदि । ४. वृक्कों में क्षोभ उत्पन्न कर रक्तभार बढ़ाने वाले - यथा ( क ) तैलमक्षिका आदि । ( ख ) अम्ल, क्षार आदि । ग ) कटु एवं तीक्ष्ण द्रव्य - मरिच, हपुपा, कंकोल आदि । ५. रक्तगत जलांश को बढ़ाने वाले तथा सूक्ष्म नलिकाओं के जल के पुनः शोषण को रोकने वाले - यथा जल, दुग्ध, शर्करा, लवण, गोमूत्र आदि । मूत्रविरेचनीय द्रव्यों का प्रयोग शरीर से जलीयांश को बाहर निकालने के लिये किया जाता है । निन्नांकित अवस्थाओं में इनका उपयोग लाभकर होता है— १. हृदय तथा फुफ्फुस के विकारों में जब मूत्राल्पता हो तब इन्हें प्रयोग करना आवश्यक होता है अन्यथा शोध उत्पन्न हो जाता है । २. मूत्रक्षय में रक्तगत विषाक्त पदार्थों या मलों को बाहर निकालने के लिये इन्हें देते हैं यथा - ' मूत्रक्षये पुनरिक्षुरसवारुणीमण्डद्रवमधुराम्ललवणोपक्लेदिनाम् ’ ( च. शा. ६ ) । ३. जलोदर, फुफ्फुसावरणशोथ आदि अवस्थाओं में जहाँ शरीर के किसी भाग में द्रव का संचय हो जाता है । ४. बस्ति तथा मूत्रप्रसेक के विकारों में मूत्र को पतला और हलका बनाने के लिये मूत्रल औषध देते हैं । अश्मरी रोग में शर्करा को बाहर निकालने के लिये तथा भविष्य में अश्मरी की उत्पत्ति रोकने के लिये इसका प्रयोग करते हैं । यूनानी में मूत्रल द्रव्य को ' मुद्रिर्र बौल ' कहते हैं । * द्राक्षाभयामलकपिप्पली दुरालभाश्शृङ्गीकण्टकारिकावृश्वीरपुनर्नवातामलक्य दशेमानि कासहराणि भवन्ति ( ३६ ), इति ( ३६ ) कासहर महाकषाय [ Bronchial Sedatives ] - ( १ ) मुनक्का, ( २ ) हर्रे, ( ३ ) आँवला, ( ४ ) पिप्पली, ( ५ ) दुरालभा ( हिंगुआ ), ( ६ ) काकड़ासींगी, ( ७ ) कटेरी, ( ८ ) वृश्वीर ( श्वेत पुनर्नवा ), ( ९ ) पुनर्नवा ( रक्त ), ( १० ) तामलकी ( भूम्यामलकी चक्र ० ) ये दश द्रव्य कासहर है 1 विमर्श - कास के वेग को शान्त करने वाले द्रव्य को कासहर कहते है यथा द्राक्षा, हरीतकी आदि । काम एक प्रत्यावर्तित क्रिया ( Reflex Action ) है जो वातजन्य क्षोभ के कारण होता है । उदानानुगत प्राणवायु से कास की उत्पत्ति बतायी गयी है । अतएव कासहर द्रव्य माधुर्य, स्निग्धता तथा उष्णता के कारण वात की शान्ति कर कास को दूर करते हैं । कासहर द्रव्य को यूनानी में ' मुज़य्यल सुफ़ ' कहते हैं । * शटीपुष्करमूलाम्लवेतसैलाहिङ्ग्वगुरुसुरसातामलकीजीवन्तीचण्डा इति दशेमानि श्वासहराणि भवन्ति ( ३७ ),
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षड्विरेचनशताश्रितीयाध्यायः ४ ] सूत्रस्थानम् II ( ३७ ) श्वासहर महाकपाय [ Bronchial Anti - Spasmodics ] - ( १ ) कबूर, ( २ ) पुष्करमूल, ( ३ ) अम्लवेतस ( ४ ) छोटी इलायची, ( ५ ) हिङ्गु, ( ६ ) अगर, ( ७ ) नुरसा ( तुलसी ), ( ८ ) भूम्यामलकी, ( ९ ) जीवन्ती ( १० ) चण्डा ( चोरपुष्पी ), ये दश औषधियाँ श्वासहर होती है । विमर्श - प्राणवायु का अधिक मात्रा में ऊर्ध्वगामी होना, जिसमें वक्षःस्थल भांधी के समान गति करे, श्वास कहलाता है, यथा - ' श्वासस्तु भस्त्रिकाध्मानसमवातोर्ध्वगामिता । ' इसे लोक में ' दम फूलना ' या ' दमा ' कहते हैं । शारीरक्रिया की दृष्टि से यह श्वासकष्ट ( Dyspnoea } की एक अवस्था है । इस अवस्था को जो द्रव्य दूर करे उसे ' श्वासहर ' कहते हैं । कफप्रधान वायु के विकार से यह अवस्था होती है । आधुनिक विकृतिविज्ञान की दृष्टि से भी, श्वास-प्रणालिकाओं की श्लेष्मल कला में शोथ हो जाने से वायु - पथ संकीर्ण हो जाता है और परसांवेदनिक ( प्राणदा ) नाड़ी सूत्रों में उत्तेजना होने के कारण श्वासप्रणालिकीय पेशियाँ संकुचित हो जाती है । जिससे वायु का मार्ग अवरुद्ध हो जाता है और श्वास में कष्ट उत्पन्न हो जाता है । अतः श्वासहर द्रव्य उष्णवीर्य एवं कफवातहर होते है, यथा शटी, पुष्करमूल आदि । यूनानी में श्वासहर द्रव्यों को ' मुसक्किन तनफ्फुस ' कहते हैं । पाटलाग्निमन्थश्योनाकविल्वकाश्मर्यकण्टकारिका बृहतीशालपर्णीपृश्निपर्णीगोक्षुरका इति दशेमानि श्वयथुहराणि भवन्ति ( ३८ ), ( ३८ ) शोथहर महाकषाय [ Anti - Dropsy drugs ] - ( १ ) पाढ़ल, ( २ ) अरणी ( गनियार ), ( ३ ) सोनापाठा, ( ४ ) बेल, ( ५ ) गम्भार, ( ६ ) कटेरी, ( ७ ) बड़ी कटेरी, ( ८ ) सरिवन, ( ९ ) पिठिवन, ( १० ) गोखरू, ये दश औषवियाँ शोथ को दूर करती है 1 विमर्श - विदार्यादि तथा करमर्दादिगण को सुश्रुत ने शोथहर बताया है । सामान्यतः रस से समस्त धातुओं का पोषण होता है और एक धातु का पोषण करने के बाद अवशिष्ट रस स्रोतों द्वारा अन्य धातुओं के पास पोषणार्थ चला जाता है । वैकृत अवस्था में वायु का प्रकोप होने पर रस, पित्त और कफ सभी दूषित हो जाते है और इनके द्वारा रस की गति अवरुद्ध हो जाती है जिससे उसका संचय त्वचा और मांस के बोच ( अधस्त्वकधातु ) में होने लगता है । इसी को शोथ कहते है, यथा- ' रक्तपित्तकफान् वायुदुष्टो दुष्टान् बहिः सिराः । नीत्वा रुद्धगतिस्तहिं कुर्यात्त्वङ्माससंश्रयम् ॥ उत्सेधं सहजं शोयं तमाहुनिचयादतः । ' ( मा. नि. ) । इस प्रकार यह होता तो त्रिदोषज है किन्तु वायु की प्रधानता रहती है । इस शोथ " को दूर करने वाले द्रव्य शोहर कहलाते है । चरक ने पाटला, अग्निमन्ध आदि दस द्रव्यों को ' शोथहर ' गण में रक्खा है और सुश्रुत ने इन्हें ' दशमूल ' कहा है । दशमूल उष्णवीर्य होने के कारण बात को तथा कपाय और तिक्त रस के कारण पित्त और कफ को शान्त करता है, इसलिए त्रिपन्न है, यथा- ' दशमूलं त्रिदोषघ्नन् ' ( भा. ) । ऊपर कहा गया है कि शोथ रोग में तीनों दोष प्रकुवित रहते है किन्तु उनमें वात की प्रधानता रहती है, तदनुसार दशमूल ( शोथहर द्रव्य ) भी मुख्यतः वातशामक होते है, यथा - ' महत्पंचनूलं कपायं तिक्तानुरसं वानं शमयति, उष्ण-वीर्यत्वात् ' ( सु. सू. ४० ) और अन्य दोषों का भी शमन साथ - साथ करते हैं । दोषशमन के साथ-साथ प्रभावात् शोथ को भी दूर करते हैं अतएव उभय - विपरीत औषध बतलाये गये हैं, यथा-' शीतगुणतोऽतिवृद्ध वातशोथे दशमूलमुष्णं शीत हेतुविपरीतं वातशोथविपरीतञ्च ' ( मधुकोश ) । रसवैशेषिक ने सर्वरसात्मक, शीत - मृदु - पिच्छिल - गुणयुक्त जलीय पार्थिव द्रव्यों को शोथहर ( विलायन ) लिखा है, यथा- ' सर्वान् रसान् शीनमृदुपिच्छिलांश्च गुणान् विलायनम् । तत् सौम्यं
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: ६२ चरकसंहिता पार्थिवं च ' ( र. वै. ४ । १ ९, २० ) । उनके मत में शोथ वायु और अग्नि से होता है क्योंकि ये दोनों ऊर्ध्वगामी होने के कारण त्वचा को उठा देते हैं और इस प्रकार शोधजनन में समर्थ होते हैं अतः शोथहर द्रव्य वायु और अग्नि के गुणों से विपरीत गुणवाला होना चाहिये, यथा — ' अग्निवायू विश्लेषणं कृत्वोर्ध्वमुद्धूय शोथजननसमर्थौ भवतः । तस्य विलायनं तत्प्रतिपक्षभूतनिर्वन्तितं भवति ' ( र. वै. भा. ) । किन्तु वस्तुतः शोथ में वात की ही प्रधानता रहती है अग्नि की नहीं, जैसा कि शास्त्र में शोथ की संप्राप्ति में बतलाया गया है । अतः श्वयथु - विलायन द्रव्य में शीतगुण होना कथमपि अभीष्ट नहीं हो सकता है । यह संभव है कि शस्त्राचार्य सुश्रुत के अनुयायी होने के कारण श्री नागार्जुन ने शोथसामान्य का विचार न कर यहाँ व्रणशोथ के विलायन का विचार किया हो । ऐसे प्रसंग में तो यह ठीक ही है क्योंकि व्रणशोथ में पित्त का उल्बण रहता ही है । यूनानी में शोथहर द्रव्य को ' मुहल्लिल वर्म ' कहते हैं । * सारिवाशर्करापाठामञ्जिष्टाद्राक्षा पीलुपरूषका भयामलकबिभीतकानीति ज्वरहराणि भवन्ति ( ३ ९ ), दशेमानि ( ३ ९ ) ज्वरहर महाकषाय [ Anti- Pyretics ] - ( १ ) अनन्तमूल, ( २ ) शर्करा, ( ३ ) पाठा, ( ४ ) मजीठ, ( ५ ) मुनक्का, ( ६ ) पीलु, ( ७ ) फालसा, ( ८ ) हर्रे, ( ९ ) आँवला, ( १० ) बहेरा, ये दश औषधियाँ ज्वरनाशक हैं । विमर्श -ये ही औषधियाँ ज्वरहर हैं ऐसा वृद्ध वाग्भट ने बताया है परन्तु उन्होंने शर्करा का वर्णन न कर गिलोय का समावेश किया है, यथा - ' द्राक्षापीलुपरूषक मञ्जिष्ठासारिवामृतापाठाः । त्रिफला चेति गणोऽयं ज्वरस्य शमनाय निर्दिष्टः ॥ ' ( अ. सं. सू. अ. १५ ) । सन्ताप ( तापक्रम का अधिक होना ) ज्वर का प्रत्यात्मक ( विशिष्ट ) लक्षण कहा गया है । सामान्यतः नाप की उत्पत्ति और क्षय इस परिमाण में होता है कि उसका सन्तुलन बना रहता है और शरीर का तापक्रम एक निश्चित बिन्दु पर स्थिर रहता है । शारीर- तापक्रम का यह सन्तुलन मस्तिष्क स्थित तापनियामक केन्द्र ( Heat Regulating Centre ) के अधीन है । इस केन्द्र में किंचित भी विकृति होने से तापसंबन्धी विकार प्रकट हो जाते हैं । ज्वर में आमदोष प्रधान हेतु बतलाया गया है तथा उसमें शीत और उष्ण की अनुभूति भी होती है । कुछ ज्वर नियत समय पर भी आने वाले हैं । इन सब में ताप का विकार लक्षित होता है । अतः इस प्रकरण में इन सभी का वर्णन किया जायगा । ( १ ) सन्ताप - निवारक ( Antipyretic ) – जो द्रव्य ज्वर के सन्ताप को कम करें उन्हें ' सन्तापनिवारक ' कहते हैं । ये द्रव्य अनेक प्रकार से कर्म करते हैं: -( क ) कुछ द्रव्य सन्ताप के कारणभूत दोष पित्त को शान्त करते हैं जिससे ज्वर कम हो जाता है - यथा द्राक्षा सारिवा आदि । ( ख ) कुछ द्रव्य तापकेन्द्र पर कम करते हैं, यथा वेतस, कुनैन आदि । ( ग ) कुछ द्रव्य त्वचा की रक्तवाहिनियों का प्रसार करते है जिससे ताप का क्षय अधिक होता है - यथा मद्य, अञ्जन, वत्सनाभ आदि । ( घ ) कुछ द्रव्य स्वेदजनन कर्म से उष्णता का क्षय करते हैं - यथा स्वेदन द्रव्य । ( च ) कुछ द्रव्य शीतस्पर्श होने के कारण साक्षात् संपर्क ( स्पर्श ) से ताप का क्षय करते हैं, यथा - ' मद्यारनालक्षीरसौवीरदधिघृतसलिल सेकावगाहाश्च सद्यो दाहज्वरमपनयन्ति शीतस्पर्शत्वात् ' ( च.चि. ३ ) । ( छ ) कुछ व्याधि- प्रत्यनीक औषध कारणभूत जीवाणु का नाश कर सन्ताप कम करते हैं -यथा कुनैन आदि । सन्तापनिवारक द्रव्यों को यूनानी में ' दाफ़िअ हुम्मा ' कहते हैं ।
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षड्विरेचनशताश्रितीयाध्यायः ४ ] सूत्रस्थानम् १३ ( २ ) आमपाचन - आमदोष के कारण ज्वर प्रारम्भ होता है और वह प्रायः सात दिनों तक रहता है । आमदोष के अनुसार ही सन्ताप की गति रहती है । प्रारम्भ में आमदोष अधिक रहने पर ज्वर अधिक रहता है तथा आमदोष के क्षीण होने पर ज्वर मृदु हो जाता है । अतः आम का पाचन करने वाले द्रव्य ज्वरहर होते हैं । तिक्तरस के द्रव्य ' आमपाचन ' माने गये हैं, यथा --- ' स्वेदनं लंघनं कालो यवाग्वस्तिक्तको रसः । पाचनान्यविपक्कानां दोषाणां तरुणे ज्वरे ॥ ( च.चि. ३ ) । उदाहरण के लिये चिरायता, पटोल आदि । ( ३ ) नियतकालिक - ज्वर - प्रतिबन्धक ( Anti - Periodic ) - ये नियतकाल पर आने वाले ज्वरों को रोकते हैं । ये ज्वर आयुर्वेद में विषमज्वर कहे जाते हैं अतः इन द्रव्यों को ' विषमज्वरन्न ' भी कहते हैं । विषमज्वर में दोप धातुगत होते हैं अतः इसमें वे ही द्रव्य लाभकर होते हैं जो धातुओं तक पहुँचने की गंभोर शक्ति रखते हैं । सन्तापनिवारण एवं आमपाचन का कर्म भी सामान्यतः इनसे होता हैं क्योंकि ये अधिकांश तिक्तरस होते हैं । इसके उदाहरण करञ्ज, सप्तपर्ण, कुनैन आदि हैं । यूनानी में नियतकालिक ज्वर - प्रतिबन्धक द्रव्यों को ' मानिअ नौबत दुम्मा ' कहते हैं । द्राक्षाखर्जूर प्रियालबदरदाडिमफल्गुपरूषकेत्तुय वषष्टिका इति दशेमानि श्रमहराणि भवन्ति ( ४० ), इति पञ्चकः कषायवर्गः ॥ १६ ॥
( ४० ) श्रमहर महाकपाय [ Anti- Fatigue drugs or Acopies ] - ( १ ) मुनक्का, ( २ ) खजूर, ( ३ ) ( प्रियाल ), ( ४ ) बेर, ( ५ ) अनार, ( ६ ) फल्गु ( अंजीर ), ( ७ ) फालसा, ( ८ ) ईख, ( ९ ) यव, ( १० ) सांठी चावल ये दश औषधियाँ श्रम को दूर करती हैं । इस प्रकार यह पाँच महाकषायवर्गों का वर्णन समाप्त हुआ ॥ १६ ॥
विमर्श - मांसपेशियों के श्रम ( Fatigue ) को दूर करने वाले द्रव्य ' श्रमहर ' कहलाते हैं यथा द्राक्षा आदि । श्रम से वायु की वृद्धि होती है और ये द्रव्य मधुर - स्निग्ध होने से वात को शान्त करते हैं । नत्र्य दृष्टि से, पेशियों में शर्करा के ज्वलन से शक्ति उत्पन्न होती है और तत्परिणामस्वरूप उत्पन्न मल के कारण श्रम उत्पन्न होता है । मधुर स्निग्ध द्रव्यों से शर्करा और स्नेह की प्राप्ति होती है जिससे नवीन शक्ति का संचार होता है । अभ्यङ्ग, यथा- ' खरत्वं स्तब्धता रौक्ष्यं श्रमः सुप्तिश्च पादयोः । सद्य एवोपशाम्यन्ति पादाभ्यङ्गनिषेवणात् ॥ ' ( च. सू. ५ ) और स्नान, यथा — ' पवित्रं वृष्यमायुष्यं श्रमस्वेदमलापहम् । शरीरवलसन्धानं स्नानमोजस्करं परम् ॥ ' ( च.सू. ५ ) से श्रम के हेतुभूत मल के निःसरण में सहायता मिलती है अतः ये श्रमहर हैं और स्वस्थवृत्त में प्रतिदिन इनके सेवन का विधान है । लाजाचन्दनकाश्मर्यफलमधूकशर्करानीलोत्पलोशीर सारिवागुडूचीहीबेराणीति दशेमा-नि दाहप्रशमनानि भवन्ति ( ४१ ) ( ४१ ) दाप्रशमन महाकषाय [ Anti - Burning Syndrome drugs or Refrigerants ] ~ ( १ ) लाजा, ( २ ) चन्दन, ( ३ ) गम्भार का फल, ( ४ ) महुवा, ( ५ ) शर्करा, ( ६ ) नीलकमल, ( ७ ) खस, ( ८ ) अनन्तमूल, ( ९ ) गिलोय, ( १० ) हीबेर ( सुगन्धवाला ), ये दश औषधियाँ दाह को दूर करती हैं । विमर्श - अष्टाङ्ग संग्रह में गुड्डूची के स्थान में ' पद्मक ' पढ़ा गया है - ' पद्मकलाजोशीरं मधुकोत्पलसारिवासितोदीच्यम् । कामर्यफलं चन्दनमेष गणो दाहहा प्रोक्तः ॥ ' सुश्रुत ने सारिवादि, अञ्जनादि, न्यग्रोधादि, गुट्टच्यादि और उत्पलादिगण को दाहनाशनगण बताया है ।
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६४ चरकसंहिता जो द्रव्य बाह्य और आभ्यन्तर दाह को शान्त करे वह दाहप्रशमन कहलाता है — यथा कमल, चन्दन आदि । दाह पित्त का पैत्तिक विकारों तथा दाहज्वर में लक्षण है अतः ये द्रव्य शीतवीर्य और पित्तशामक होते हैं । इनका प्रयोग किया जाता है । यूनानी में दाहप्रशमन द्रव्य को ' मुत्फी ', ' मुबरिंद ', ' तक्लील हरारत ' और ' मुसक्किन हरारत ' कहते हैं । नगरागुरुधान्यकशृङ्गवेरभूतीकवचाकण्टकार्यग्निमन्थश्योनाकपिप्पल्य इति दशेमानि शीतप्रशमनानि भवन्ति ( ४२ ), ( ४२ ) शीतप्रशमन महाकषाय [ Calefacients ] - ( १ ) तगर, ( २ ) अगर, ( ३ ) धनियाँ, ( ४ ) सोंठ, ( ५ ) भूतीक ( यवानिका चक्र ० - अजवायन ), ( ६ ) बच, ( ७ ) कटेरी, ( ८ ) गनिवार, ( ९ ) सोनापाठा, ( १० ) पिप्पली, ये दश औषधियाँ शीत को शान्त करने वाली हैं । विमर्श - जो द्रव्य शीत ( ठंढक ) को दूर करे वह शीतप्रशमन कहलाता है । शैत्य वान और कफ से होता है यथा- ' त्वक्स्थौ इलेष्मानिलौ शीतमादौ जनयतो ज्वरे । तयोः प्रशान्तयोः पित्तमन्ते दाहं करोति च ॥ ' ( मा. नि. ) । अतः ये द्रव्य उष्णवीर्य होते हैं और बात - कफ को शान्त करते हैं । वातकफज विकारों में तथा शीतज्वर में इनका प्रयोग किया जाता है । निन्दुक प्रियालवदरखदिरकदर सप्तपर्णाश्वकर्णार्जुनासनारिमेदा इति दशेमान्युदर्दप्रशम-नानि भवन्ति ( ४३ ), ( ४३ ) उदर्डप्रशमन महाकपाय ( Anti - Urticarials ) - ( १ ) तिन्दुक ( केन्दु चक्र ० ), ( २ ) प्रियाल ( चिरौंजी ), ( ३ ) वेर, ( ४ ) खदिर ( खैर ), ( ५ ) कदर ( विट खदिर - चक्र ० सफेद खैर ), ( ६ ) सप्तपर्ण, ( ७ ) अश्वकर्ण ( शाल ), ( ८ ) अर्जुन, ( ९ ) असन ( विजयसार ), ( १० ) अरिमेद ( खदिरमेव चक्र ० ) ये दश औषधियाँ उदर्द रोग को ज्ञान्त करने वाली होती है । विमर्श -- शीतपित्त ( Urticaria ) का एक भेद है तथा त्रिदोषजन्य होते हुये भी इसमें कफ की प्रधानता होती है, यथा - ' वरटीइष्टसंस्थानः शोध: सञ्जायते वहिः । सकण्डू-र्दोषवहुलश्छर्दिज्वरविदाहवान् ॥ उदर्दमिति तं विद्याच्छीतपित्तमथापरे । वाताधिकं शीतपित्त-दर्दस्तु कफाधिकः ॥ ' ( मा. नि. ) विदारीगन्धापृश्निपर्णीबृहतीकण्टकारिकैरण्डकाको लीचन्दनोशीरैलामधुकानीति दशे-मान्यङ्गमर्द प्रशमनानि भवन्ति ( ४४ ), ( ४४ ) अङ्गमईप्रशमन महाकपाय ( Restoratives ) - ( १ ) विदारीगन्धा ( सरिवन ), ( २ ) पिठवन, ( ३ ) बड़ी कटेरी, ( ४ ) कटेरी, ( ५ ) एरण्ड, ( ६ ) काकोली, ( ७ ) चन्दन, ( ८ ) खस, ( ९ ) छोटी इलायची, ( १० ) मुलेठी ये दश औषधियाँ अङ्गमर्द को शान्त करती हैं । विमर्श - जो द्रव्य अङ्गमर्द ( मांसपेशियों की हलकी ऐंठन - पीड़ा ) को शान्त करे वह ' अङ्गमर्द-प्रशमन ' कहलाता है यथा लघुपञ्चमूल, काकोली आदि । अङ्गमर्द वायु का लक्षण है, जो विशेषतः धातुक्षय ( शरीर - दौर्बल्य ) की अवस्था में प्रकट होता है । ये द्रव्य वायु के विपरीत गुण वाले ( मधुर - स्निग्ध आदि ) होते हैं तथा बलवर्धक हैं अतः अङ्गमर्द को शान्त करते हैं । आधुनिक दृष्टि से, ये शरीर की क्षति को पूर्ण कर अङ्गमर्द का प्रशमन करते हैं । ऐसे द्रव्यों को क्षतिपूरक ( Restoratives ) कहते हैं । पिप्पलीपिप्पलीमूलचव्यचित्रकशृङ्गवेरमरिचाजमोदाजगन्धाजाजीगण्डीराणीति दशे-मानि शूलप्रशमनानि भवन्ति ( ४५ ), इति पञ्चकः कषायवर्गः ॥ १७ ॥
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षड्विरेचनशताश्रितीयाध्यायः ४ ] सूत्रस्थानम् ६५ ( ४५ ) शूलप्रशमन महाकषाय ( Analgesics ) - ( १ ) पिप्पली, ( २ ) पिपरामूल, ( ३ ) चव्य, ( ४ ) चित्रक, ( ५ ) सोंठ, ( ६ ) मरिच, ( ७ ) अजमोदा, ( ८ ) अजगन्धा ( वन यवानी; फोकन्दी इति चक्रः, अजवायन ), ( ९ ) अजाजी ( जीरा ), ( १० ) गण्डीर, ये दश औषधियाँ शूल को शान्त करने वाली होती है । इस प्रकार यह पाँच महाकपा यवर्गों का वर्णन समाप्त हुआ || १७ || मधुमधुकरुधिरमोचरसमृत्कपाललोध्रगैरिकप्रियङ्गुशर्करालाजा इति दशेमानि शोणित-स्थापनानि भवन्ति ( ४६ ), ( ४६ ) शोणितस्थापन महाकषाय [ Haemostatics ] - ( १ ) मधु, ( २ ) मुलेठी, ( ३ ) रुधिर ( केशर, कुङ्कुमम् चक्र ० ), ( ४ ) मोचरस, ( ५ ) मृत्कपाल, ( ६ ) लोध, ( ७ ) गेरू, ( ८ ) प्रिय, ( ९ ) शर्करा, ( १० ) लाजा, ये दश औषधियाँ रक्त को शरीर में स्थापित करती हैं । विमर्श - जो द्रव्य रक्त को बढ़ावे तथा रक्तस्त्राव को रोके उसे शोगितास्थापन ' रुधिरसंस्था-पनं पुरुषस्य रुधिरवृद्धिस्थैर्यकरम् ' ( इ. ) कहते हैं । इस दृष्टि से इसके दो भाग हो जाते है: -रक्तधातु को बढ़ानेवाले द्रव्य रक्तवर्धन कहलाते हैं । रक्त पाञ्चभौतिक है- ' पाञ्चभौतिकं चापरे जीव-रक्तमाहुराचार्याः । ' ' विस्रता द्रवता रागः स्यन्दनं लघुता तथा । भूम्यादीनां गुणा ह्येते दृश्यन्ते चात्र शोणिते ॥ ' ( सु. सु. १४ ) किन्तु उसमें अग्नि और जल की विशेषता है, यथा— ' रक्तं नेजो-जलात्मकम् ' ( च. द. ), इसीलिए रक्त अनुष्णाशीत माना गया है, यथा - ' रक्तं पुनरनुष्णाशीत-मैवमाचार्या मन्यन्ते ' ( इ. ) । अतः आग्नेय और जलीय द्रव्यों से रक्त की वृद्धि होती है । इन दृष्टि से आग्नेय तत्त्व रक्तकणों को तथा जलीय तत्त्व रक्तरस को बढ़ाता है । रक्त स्वयं रक्तवर्धक होता है, यथा - ‘ लोहितं लोहितेन ' ( च. शा. ६ ) तथा इसके अभाव में तद्गुण द्रव्यों का प्रयोग किया जाता है । इसके अतिरिक्त नातिशीन, लघु और स्निग्ध द्रव्यों का प्रयोग लाभकर होता है, यथा-' नं नानिगीतैर्लवृभिः स्निग्धैः शोणितवर्धनैः । ईषदम्लैरनम्लैर्वा भोजनैः समुपाचरेत् ॥ ' ( सु.मू. १४ ), इस प्रकार आयुर्वेद में रक्त का समष्टिरूप से विचार किया गया है किन्तु आधुनिक रचनाशारीर की दृष्टि से रक्त में अनेक अवयव होते हैं जिनसे शरीर के विशिष्ट कर्म सम्पादित होते हैं । रक्त में दो प्रकार के कण होते हैं- श्वेतकण और रक्तकण, जो रक्तरस में तैरते रहते हैं । इनके अतिरिक्त लवण भी होते हैं । इन सभी अवयवों पर द्रयों के पृथक - पृथक जो कर्म होते हैं उनका स्वतन्त्र अध्ययन आवश्यक है, अतः तदनुसार कर्मों का विभाजन किया गया है: -रक्तकणवर्धक ( Hematinics ) - ( १ ) रक्तकणों के भीतर रक्तरक्षक पदार्थ ( Haemoglobin ) होता है जो प्राणवायु का वहन करता है । इसमें लौह का विशेष अंश होता है, सम्पूर्ण शरीर में सञ्चित लौह का लगभग भाग रक्तरञ्जक पदार्थ में होता है । रक्तकणों की संख्या भी रक्त में नियत होती है । एक रक्तकण का जीवन तीन सप्ताहों तक ही रहता है, अतः निरन्तर उसकी उत्पत्ति होना आवश्यक है । ऐसे द्रव्य जो रक्तकणों की संख्या बढ़ाते हैं, रक्तकणवर्धक कहलाते हैं । रक्तकण आग्नेय होते हैं अतः रक्तकणवर्धक आग्नेय स्वभाव के होते हैं यथा सोमल, लौह, ताम्र आदि । ( २ ) श्वेतकणवर्धक - ये द्रव्य रक्तगत श्वेतकणों को बढ़ाते हैं । विदाही द्रव्य प्रथम इनकी संख्या को कम करते हैं किन्तु बाद में बढ़ा देते हैं 1 । खटिक के लवण भी श्वेतकण को बढ़ाते है । वे द्रव्य अनेक प्रकार से कार्य करते हैं: - ( क ) कुछ द्रव्य प्लीहा और रसग्रन्थियों को संकुचित करते हैं जिससे अधिक श्वेतकण रक्त में आ जाते हैं -- यथा पाइलोकार्पाइन । ( ख ) अन्त्र की श्लेष्मल कला में क्षोभ करके - यथा कटु और गन्ध द्रव्य । ( ग ) रक्तनिर्मापक अङ्गों में क्षोभ उत्पन्न करके - यथा रेडियम आदि । ( घ ) रक्त में मांसतत्त्व का प्रवेश करके । ( ३ ) अम्लवर्धक — ये द्रव्य रक्त में अम्ल की मात्रा बढ़ाते हैं - यथा सोमल, स्फुरक आदि ।
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६६ चरकसंहिता क्षारवर्धक — ये द्रव्य रक्त की क्षारीयता बढ़ाते हैं यथा अपामार्ग आदि । रक्तस्राव को रोकने वाले द्रव्य रक्तस्तम्भन कहलाते हैं यथा लोध, केसर आदि । ये द्रव्य शीत एवं कपाय होते हैं I इनका प्रयोग रक्तपित्त में किया जाता है । यथा - ' कपाययोगान् पयसा पुरा वा पीत्वा तु चाद्यात् पयसैंव शालीन् । कषाययोगैरथवा विपक्कमेतैः पिबेत् सर्पिरनिस्रुते च ॥ ' ( च. चि. ४ ) । कुछ द्रव्य स्थानिक प्रयोग से रक्तस्राव को रोकते हैं । ये भी शीन और कषाय होते हैं । शीतदन्य रक्त-वाहिनियों को सङ्कुचित कर ( स्कन्दन ) तथा कषायद्रव्य रक्तवाहिनियों के पार्श्ववर्ती धातुओं में. मांसनत्त्व को जमाकर ( सन्धान ), यथा -- ' व्रणं कषायः सन्वत्ते रक्तं स्कन्दयते हिमम् ' ( सु. सू. १४ ), रक्तस्राव को वन्द करते हैं । इनके उदाहरण क्रमशः वर्फ तथा फिटकिरी आदि हैं । इनका प्रयोग क्षत आदि में तथा रक्तपित्त में बाह्य उपचार के रूप में किया जाता है । रक्तनाशन - रक्तकणों को नष्ट करने वाले तथा रक्तधातु को क्षीण करने वाले द्रव्य रक्तनाशन कहलाते है यथा सोमल, स्फुरक आदि ( विषाक्त मात्रा में ) । रक्तदूषण - रक्त को दूषित ( प्रकुपित ) करनेवाले द्रव्य रक्तद्रूपण कहलाते हैं । रक्त आग्नेय होता है और पित्त भी आग्नेय होता है अतः पित्त को अत्यधिक दूषित करने वाले, जैसे- कटु, अम्ल, लवण, विदाही, उष्ण, द्रव्यों का सेवन करने से रक्त भी दूषित हो जाता है, यथा- ' तस्योष्णं तीक्ष्णमम्लं च कटूनि लवणानि च । घर्मश्चान्नविद्राहञ्च हेतुः पूर्वं निदर्शितः ॥ तैर्हेतुभिः समुत्कृष्टं पित्तं रक्तं प्रपद्यते । तद्योनित्वात्प्रपन्नञ्च वर्धते तत्प्रदूषयत् ॥ ” ( च. चि. ४ ), ' विदाहीन्यन्नपानानि स्निग्धोष्णानि द्रवाणि च । रक्तवाहीनि दुष्यन्ति भजतां चात-पानलौ ॥ ' ( च. वि. ६ ) । रक्त में अग्नि के साथ - साथ जलांश भी है अतः केवल वित्तप्रकोपक की अपेक्षा जब विरुद्ध संयोग ( शीतोष्ण ) होता है तब रक्तदूषण की अधिक सम्भावना रहती है । इसके उदाहरण शाक, लवण आदि हैं । रक्तप्रसादन - रक्त के विकारों को दूर कर उसे शुद्ध बनाने वाले द्रव्यों को ' रक्तप्रसाइन ' या ' रक्तशोधन ' कहते हैं यथा सारिवा, मजिठा आदि । ये द्रव्य अधिकांश निक्तरस होते हैं जिसके कारण विदग्ध पित्त के त्रिदाह को दूर कर तअन्य रक्त के विदाह को भी शान्त करते हैं । पित्तप्रकोप के कारण रक्त में अनेक वर्ण - विकार भी हो जाते हैं । ये द्रव्य इन वैकृत वर्गों को दूर कर रक्त को स्वच्छ बनाते हैं । यथा – ' प्रसन्नवर्णेन्द्रियनिन्द्रियार्था-निच्छन्तमव्याहनपक्तृवेगम् । सुखान्वितं पुष्टिवलोपपन्नं विशुद्ध रक्तं पुरुषं वदन्ति ॥ ' ( च. सू. २४ ) । शालकट्फलकदम्बपद्मकतुम्बमोचरसशिरीषवञ्जुलैलवालुकाशोका इति दशेमानि वेद-स्थापनानि भवन्ति ( ४७ ), ( ४७ ) वेदनास्थापन महाकपाय [ Anodynes ] - ( १ ) शाल, ( २ ) कायफर, ( ३ ) कदम्ब, ( ४ ) पद्मक ( पद्मकाठ ), ( ५ ) तुम्ब ( तेजवल ), ( ६ ) मोचरस, ( ७ ) शिरीष, ( ८ ) वञ्जुल ( जलवेंत, वेनसः - चक्र ० ), ( ९ ) एलुआ, ( १० ) अशोक, ये दश औषधियाँ वेदना का स्थापन करती हैं । विमर्श - ' वेदना ' शब्द सामान्य अनुभूति के लिए आयुर्वेद में प्रयुक्त हुआ है । यह दो प्रकार की होती है — सुखात्मक और दुःखात्मक, यथा - ' द्विविधः सुखदुःखानां वेदनानां प्रवर्त्तकः ' ( च. शा. १ ) । इनमें दुःखात्मक वेदना को शान्त कर सुखात्मक वेदना को स्थापित करने वाले द्रव्य वेदनास्थापन कहलाते है, यथा- ' वेदनायां संभूतायां तां निहत्य शरीरं प्रकृतौ स्थापयतीति वेदनास्थापनम् ' ( च. द ), ' वेदनायाश्चिच्छक्तेः संतर्पकं वेदनास्थापनम् ' ( इ. ) । शरीर की समस्त संज्ञाओं का संवहन और चेष्टाओं का प्रवर्त्तन वायु के द्वारा होता है, यथा- ' प्रवर्त्तकश्चेष्टा-नामुच्चावचानां ‘ “ सर्वेन्द्रियार्थानामभिवोढा ' ( च. सू. १२ ) । किन्तु वायु का प्रकोप होने पर ये संज्ञार्ये अतिशयित होकर वेदना के रूप में गृहीत होती हैं । इसीलिए पीड़ा चाहे शरीर में कहीं परहो, बिना बात के नहीं हो सकती, ऐसा शास्त्रकारों का कथन है, यथा- ' नर्तेऽनिलाद्रुग् ' ( सु. ) ।
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षड्विरेचनशताश्रितीयाध्यायः ४ ] सूत्रस्थानम् ६७ इस प्रकार वेदना वानप्रकोप का प्रत्यात्म - लक्षण होने के कारण, वेदनास्थापन द्रव्य वातशामक अवश्य होते हैं इसमें कोई विकल्प नहीं रहता क्योंकि बिना बात की शान्ति हुए वेदना की शान्ति नहीं हो सकती । अतः वेदनास्थापन द्रव्य विशेषतः उष्णवीर्य होते हैं यथा गुग्गुलु, कट्फल, शाल आदि तथा अहिफेन, गाँजा, सुर्ती, वत्सनाभ आदि । इनमें कुछ द्रव्य स्निग्धगुणयुक्त तथा कुछ द्रय रूक्षगुणयुक्त होते हैं । प्रारम्भ में उष्णता के कारण वायु का प्रशमन होता है इसलिए वेदना की शान्ति होती है और स्निग्ध गुण से कफ की वृद्धि होने के कारण निद्रा में भी ये सहायक होते हैं । रूक्ष द्रव्य अतिमात्रा में देने पर उष्णता के कारण ओज क्षुब्ध होने तथा रूक्षता के कारण वात का प्रकोप होने से कभी - कभी आक्षेप उत्पन्न हो जाते हैं । यूनानी चिकित्सक वेदनास्थापन द्रव्यों को ‘ मुसक्किन अलम ' और ' मुसक्किन वजा ' कहते हैं । इन द्रयों की शारीरक्रिया अभी तक पूर्णतः ज्ञात नहीं है फिर भी ऐसा विचार प्रचलित है कि मस्तिष्ककन्द्र ( Thalamus ) से संबद्ध वेदनावाहिनी तन्त्रिका की नाडीसन्धियों पर औषध द्रव्य की क्रिया होने से वेदना की शान्ति होती है । * हिङ्गुकैर्यारिमेदावचा चोरकवयस्थागोलोमीजटिलापलङ्कषाशोकरोहिण्य इति दशे-मानि संज्ञास्थापनानि भवन्ति ( ४८ ), ( ४८ ) संज्ञास्थापन महाकषाय [ Resuscitatives ] - ( १ ) हींग, ( २ ) कैटर्स ( कट्फल, पर्वतनिम्बः [ मीठी नीम ] चक्र ० ), ( ३ ) अरिमेद, ( ४ ) वच, ( ५ ) चोरक ( चोरपुष्पी ), ( ६ ) वयस्था ( ब्राह्मी - चक्र ० ), ( ७ ) गोलोमी ( भूनकेशी चक्र ० ), ( ८ ) जटिला ( जटामांसी ), ( ९ ) पलङ्कषा ( गुग्गुलु ), ( १० ) अशोकरोहिणी ( कटुकी ) ये दश औषधियाँ संज्ञा ( ज्ञान ) का स्थापन करती हैं । विमर्श - संज्ञा ( ज्ञान ) को स्थापित करनेवाले द्रव्य संज्ञास्थापन कहलाते हैं— ' संज्ञां ज्ञानं स्थापयतीति संज्ञास्थापनम् ' ( च. द. ) | ये द्रव्य बेहोशी को दूर कर संज्ञा को प्राकृत स्थिति में लाते है । अधिकांश ऐसे द्रव्यों में तीक्ष्णगुण और उष्णवीर्य होते हैं जिससे वे मन में संचित तमोदोष ( जिससे मन और बुद्धि आवृत होने के कारण संज्ञानाश होता है ) के आवरण को नष्ट कर देते हैं अतः संज्ञा पुनः आ जाती है । यथा - ' अञ्जनान्यवपीडाश्च धूमाः प्रधमनानि च । सूची-भिस्तोदनं शस्तं दाहः पीडा नखान्तरे || लुञ्चनं केशलोम्नां च दन्तैर्दशनमेव च । आत्मगुप्तावघर्षश्च हितास्तस्यावबोधने ॥ ' ( च. सू. २४ ), ' तैरावृतानां हृत्स्रोतोमनसां संप्रबोधनम् | तीक्ष्णैरादौ भिषक् कुर्यात् कर्मभिर्वमनादिभिः ॥ ' ' आभिः क्रियाभिः सिद्धाभिः हृदयं संप्रबुध्यते । स्रोतांसि चापि शुध्यन्ति स्मृतिं संज्ञां च विन्दति ॥ ' ( च. चि. १० ) । शारीर दृष्टि से मस्तिष्क में रक्त की कमी से मूर्च्छा होती है, अतः ये द्रव्य अपनी तीक्ष्णता और उष्णता के कारण हृदय को भी उत्तेजित करते हैं जिससे मस्तिष्क में रक्त समुचित रूप में जाने लगता है और उसकी क्रिया ठीक से होने लगती है जिसके फलस्वरूप बेहोशी दूर हो जाती है । अत्युष्णता से भी मस्तिष्क के कोषाणु कर्म में असमर्थ हो जाते हैं । ऐसी स्थिति में पित्तशामक, शीतवीर्य द्रव्यों का प्रयोग किया जाता है, इसलिए आयुर्वेद ने मूर्च्छा में शारीरदोष पित्त और मानसदोष तम माना है । पित्त की प्रधानता में शीतवीर्य द्रव्यों का प्रयोग तथा तम की प्रधानता में उष्णवीर्य द्रव्यों का प्रयोग उचित है । हींग, महानिम्ब, वचा, ब्राह्मी, जटामांसी आदि संज्ञास्थापन द्रव्य हैं । * ऐन्द्रीब्राह्मीशतवीर्यासहस्रवीर्याऽमोघाऽव्यथा शिवाऽरिष्टावाव्यपुष्पी विष्वक्सेनकान्ता इति दशेमानि प्रजास्थापनानि भवन्ति ( ४ ९ ), ( ४ ९ ) प्रजास्थापन महाकषाय [ Procreants ] - ( १ ) ऐन्द्री ( दिव्य औषधि ), ( २ ) ब्राह्मी, ( ३ ) शतवीर्या ( दूर्वा ), ( ४ ) सहस्रवीर्या ( दूर्वाभेद ), ( ५ ) अमोघा ( पाटला, ७ च ० सं ०