चरक संहिता हिन्दी भाष्य — पृष्ठ 191–200

चरक संहिता हिन्दी भाष्य · Chaukhamba · पृष्ठ 191–200

पृष्ठ 191

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चरकसंहिता आमलकी, लक्ष्मणा वा चक्र ० ), ( ६ ) अव्यथा ( कदली, गुडूची, हरीतकी वा चक्र ० ), ( ७ ) शिवा ( हरें ), ( ८ ) अरिष्टा ( कटुरोहिणी- कुटकी चक्र - ० ), ( ९ ) वाट्यपुष्पी ( कंवी ), ( १० ) विष्वक्सेनकान्ता ( प्रियङ्गु, चक्र ० ) ये दश औषधियाँ प्रजास्थापन है । विमर्श - जो द्रश्य गर्भाशयगत दोषों को दूर कर गर्भधारण करावे उसे प्रजास्थापन कहते हैं, यथा - ' प्रजोपघातकं दोषं हत्वा प्रजां स्थापयतीति प्रजास्थापनम् ' ( च. द. ), ' प्रजां गर्भ स्थापयति दोषं निरस्येति प्रजास्थापनम् ' ( यो. ), जैसे- ब्राह्मी, लक्ष्मणा आदि । ये द्रव्य कषाय- मधुर, स्निग्ध, शीत और बल्य होते हैं । गर्भवारण के पूर्व इनका प्रयोग करने से गर्भाशय को बल मिलता है तथा श्लेष्मलकला की शिथिलता दूर होती है जिससे गर्भ अच्छी तरह और दृढना से वहाँ अपना स्थान बनाता है और उसके च्युत होने का भय नहीं रहता । गर्भावस्था में इनका प्रयोग करने से गर्भ का पोषण होता है और गर्भाशय को भी बल मिलता है जिससे असमय - प्रत्तव ( Premature labour ) का उपद्रव नहीं होने पाता । ये द्रव्य स्त्री के सामान्य बल को भी बढ़ाते हैं जिससे गर्भ को समुचित रूप से पोषण मिलता है क्योंकि माता के रस- रक्त से ही गर्भ का पोषण होता है । अमृताऽभयाधात्रीमुक्ताश्वेनाजीवन्त्यतिर सामण्डूकपर्णीस्थिरापुनर्नवा इति दशेमानि वयःस्थापनानि भवन्ति ( ५० ), इति पञ्चकः कषायवर्गः ॥ १८ ॥

( ५० ) वयःस्थापन महाकपाय [ Rejuvenators ] - ( १ ) गिलोय, ( २ ) हर्रे, ( ३ ) आँवला, ( ४ ) मुक्ता ( राखा चक्र ० ), ( ५ ) श्वेता ( अपराजिता ), ( ६ ) जीवन्ती, ( ७ ) अतिरसा ( शतावरी ), ( ८ ) मण्डूकपर्णी, ( ९ ) स्थिरा ( सरिवन ), ( १० ) पुनर्नवा ये दश औषधियाँ वय ( आयु ) को स्थिर रखती है । इस प्रकार इन पाँच महाकषायवर्गों का वर्णन समाप्त हुआ ॥ १८ ॥

विमर्श - - वयःस्थापन का तात्पर्य यह है कि अकाल में वृद्धावस्था नहीं आती है । यदि इनका लगातार सेवन किया जाय तो वृद्धावस्था में भी युवावस्था के समान शक्ति बनी रहती है । इस प्रकार की औषधियों को रसायन कहा गया है । इति पञ्चकषायशतान्यभिसमस्य पञ्चाशन्महाकषाया महतां च कषायाणां लक्षणो-दाहरणार्थं व्याख्याता भवन्ति ॥ १ ९ ॥ पचास महाकषायों का उपसंहार - इस प्रकार पाँच सौ कषायों का संक्षेप करके पचास महाकषायों का यहाँ वर्णन, महाकषायों के लक्षण और उदाहरण के लिये कर दिया गया है ॥ १ ९ ॥ विमर्श - चक्रपाणि ने ' लक्षणोदाहरणार्थम् ' शब्द पर टीका करते हुये उसके दो अर्थ किये हैं-१. ' लक्षणस्योदाहरणम् ' अर्थात् लक्षण का उदाहरण | इसको स्पष्ट करते हुये उन्होंने बताया है कि जीवनयादि महाकषाय ' लक्षण ' है तथा उसमें जीवक, ऋषभक इत्यादि उसके उदाहरण हैं । २. ' लक्षणार्थमुदाहरणार्थं च ' अर्थात् लक्षग तथा उदाहरण दोनों के लिये । मन्दबुद्धि व्यक्तियों के लिये पचास महाकषायों या पाँच सौ कषायों का वर्णन लक्षण के रूप में किया गया है । लेकिन बुद्धिमान व्यक्तियों के लिये उपर्युक्त कषायों का वर्णन केवल दृष्टान्त या उदाहरण की दृष्टि से किया गया है । इस टीका का महत्त्व यह है कि ५०० कपायों के वर्णन से ही इतिश्री नहीं हो जाती अपितु समय तथा आवश्यकता के अनुसार इसमें वृद्धि तथा संक्षेप किया जा सकता है । अतएव इन कषायों के आधार पर द्रव्यों के गुण - कर्म का विचार कर बुद्धिमान वैद्य हजारों कपायों की कल्पना

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1 षड्विरेचनशताश्रितीयाध्याय: ४ ] सूत्रस्थानम् ६६ स्वयं कर सकते हैं । कषायों की कल्पना करते समय दोष, रोग, प्रकृति, बल, सत्त्व, सात्म्य इत्यादि का भली प्रकार विचार किया जाता है । सबका विचार कर एक किसी ग्रन्थ में सब कुछ लिखना संभव नहीं हो सकता अतः यथासंभव द्रव्यों का वर्णन किया गया है । * नहि विस्तरस्य प्रमाणमस्ति न चाप्यतिसंक्षेपोऽल्पबुद्धीनां सामर्थ्यायोपकल्पते, तस्मादनतिसंक्षेपेणानतिविस्तरेण चोपदिष्टाः । एतावन्तो ह्यलमल्पबुद्धीनां व्यवहाराय बुद्धिमतां च स्वालक्षण्यानुमानयुक्ति कुशलानामनुक्तार्थज्ञानायेति ॥ २० ॥

अतिसंक्षेप या अतिविस्तार से वर्णन का प्रयोजन - • विस्तार का कोई अन्त नहीं है और अतिसंक्षेप में किसी वस्तु को कहने से अल्प बुद्धि वाले वैद्यों को ज्ञान नहीं हो पाता है । इसलिये अधिक संक्षेप से और न अधिक विस्तार से इन कषायों का यहाँ उपदेश किया गया है । इतना किया गया उपदेश, अल्प बुद्धि वाले वैद्यों को चिकित्सा में व्यवहार के लिए पर्याप्त है । ५० महाकषायों में वर्णित जीवक, ऋषभक इत्यादि औषधियों के उनके लक्षण से अनुमान करने वाले तथा उनकी युक्ति ( प्रयोग ) में कुशल बुद्धिमान व्यक्तियों के लिए भी, न बताई हुई औषधियों की जानकारी के लिये उपर्युक्त वर्णन पर्याप्त है ॥ २० ॥

विमर्श - ' स्वालक्षण्यानुमानयुक्ति कुशलानाम् ' शब्द की व्याख्या चक्रपाणि के मतानुसार इस प्रकार की जा सकती है - महाकपायों के लक्षण का अनुमान तथा युक्ति से प्रयोग करना चाहिये । जैसे जीवनीय गण में वर्णित जीवकादि द्रव्य स्निग्ध, शीत, मधुर, वृष्य इत्यादि गुण वाले होने से जीवनीय होते हैं । अतः इसी प्रकार के गुण वाले अन्य द्रव्य जैसे द्राक्षा, विदारीकन्द्र इत्यादि भी जीवनीय हो सकते हैं तथा इनका प्रयोग किया जा सकता है । यहाँ पचास महाकषायों के एक वर्ग में दश दश औषधियाँ बनायी गयी हैं । एक- एक औषध स्वतन्त्र रूप से प्रयुक्त होने पर भी अपना गुण और कर्म करती है । अतः पाँच सौ कषायों की पूर्ति हो जाती है । यह अतिविस्तार से है और न अतिसंक्षेप से है । इतना ज्ञान यदि सामान्य वैद्य को रहेगा तो वह प्रत्येक रोग की चिकित्सा कर सकता है । बुद्धिमान वैद्य तो अपनी आवश्यकतानुसार गुण, कर्म ( स्वालक्षण्य ) के आधार पर पाँच सौ से भी अधिक कल्पनायें और उनका प्रयोग कर सकता है । * एवंवादिनं भगवन्तमात्रेयमग्निवेश उवाच -- नैतानि भगवन्! पञ्चकषायशतानि पूर्यन्ते तानि तानि वाङ्गान्युपप्लवन्ते तेषु तेषु महाकषायेष्विति ॥ २१ ॥

( ३ ) कषायसंख्या - पूर्तिविषयक प्रश्न ( Question About Total Number of Decoctives ) पाँच सौ कषायों की संख्या- पूर्ति के बारे में शङ्का - इस प्रकार कहते हुए भगवान् आत्रेय से अग्निवेश ने कहा कि हे भगवान्, इस प्रकार कहने से पाँच सौ कषायों की पूर्ति नहीं होती है । क्योंकि उन भिन्न - भिन्न महाकषायों में, वही वही, द्रव्य बार - बार आते हैं । अतएव पाँच सौ द्रव्यों की संख्या - पूर्ति नहीं होगी? ॥ २१ ॥

विमर्श - तात्पर्य यह है कि एक ही द्रव्य कई महाकषायों में आया है । उदाहरण के लिए काकोली, क्षीरकाकोली नाम के द्रव्य - ( १ ) जीवनीय, ( २ ) बृंहणीय, ( ३ ) शुक्रजननीय और ( ४ ) स्नेोपग इन चार महाकषायों में वर्णित हैं । अतएव पाँच सौ द्रयों की संख्या - पूर्ति सम्भव नहीं है । यह अग्निवेश की शंका है । * तमुवाच भगवानात्रेयः -- नैतदेवं बुद्धिमता द्रष्टव्यमग्निवेश । एकोऽपि ह्यनेकां संज्ञां लभते कार्यान्तराणि कुर्वन्, तद्यथा - पुरुषो बहूनां कर्मणां करणे समर्थो भवति, स

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१०० चरकसंहिता यद्यत्कर्म करोति तस्य तस्य कर्मणैः कर्तृकरणकार्य संप्रयुक्तं तत्तद् गौणं नामविशेषं प्राप्नोति, तद्वदौषधद्द्रव्यमपि द्रष्टव्यम् । यदि चैकमेव किंचिद्द्रव्यमासादयामस्तथागुणयुक्तं यत्सर्व-कर्मणां करणे समर्थं स्यात्, कस्ततोऽन्यदिच्छेदुपधारयितुमुपदेष्टुं वा शिष्येभ्य इति ॥ २२ ॥

शंका का समाधान — भगवान् आत्रेय ने अग्निवेश से कहा कि हे अग्निवेश! बुद्धिमान् व्यक्तियों को इस प्रकार विचार नहीं करना चाहिये । क्योंकि एक ही पदार्थ भिन्न - भिन्न कार्यों को करते हुये अनेक नामों को ग्रहण करता है । जैसे बहुत से कर्मों को करने में समर्थ मनुष्य जो - जो कर्म करता है उन उन कर्मों के कर्ता, करण और कार्य के अनुसार अन्य - अन्य गुण वाले ( गौण ) नामों को ग्रहण करता है । उसी प्रकार औषध द्रव्य कर्ता, करण और कार्य के अनुसार भिन्न - भिन्न नामों को प्राप्त करते हैं । सभी कार्यों को करने में समर्थ, सर्वगुणसम्पन्न एक हो द्रव्य यदि प्राप्त हो जाय तो कौन ऐसा गुरु होगा जो शिष्यों को सर्वगुण सम्पन्न द्रव्य को छोड़ कर अन्य अल्प - गुणयुक्त द्रव्य को धारण करने के लिए कहेगा या उपदेश करेगा ॥ २२ ॥

विमर्श - चक्रपाणि ने गौण शब्द पर टीका करते हुये ' गुणयोगप्रवृत्तं गौणम् ' अर्थ किया | उसी के अनुसार मूल में अर्थ किया गया है । व्यवहार में देखा जाता है कि एक ही पुरुष अनेक कार्यों को करने में समर्थ होना है । उसका नाम एक होते हुए भी कार्य के अनुसार भिन्न - भिन्न नान हो जाते हैं । यह नाम ( १ ) कर्त्ता, ( २ ) करण और ( ३ ) कार्य के आधार पर होते हैं । जैसे यज्ञदत्त युद्ध करता है तो वह युद्ध क्रिया का कर्ता है अतः उसका ' योद्धा ' नाम, युद्ध - क्रिया में साधन ( करण ) होने से उस व्यक्ति का ' धनुर्धर ' नाम तथा युद्ध में शत्रु का नाशरूपी कार्य करने से ' शत्रुसूदन ' नाम पड़ता है । संक्षेप में एक ही यज्ञदत्त के गुण तथा कर्तृ, करण और कार्य के अनुसार क्रमश: ( १ ) योद्धा ( २ ) धनुर्धर तथा ( ३ ) शत्रुसूदन नाम पड़ जाते हैं । इसी प्रकार औषध द्रव्यों के भी कर्तृ, करण और कार्य के अनुसार नाम पड़ते है । अतएव एक ही काकोली, क्षीरकाकोली इत्यादि औषधियाँ जीवन - शक्ति को बढ़ाने से जीवनीय, रसादि धातुओं को बढ़ाने से बृंहणीय, शुक्र उत्पन्न करने से शुक्रजनन, और शरीर को स्निग्ध करने में सहायक होने से स्नेहोपग वर्ग में कही गयी हैं । इस प्रसंग में दूसरी शङ्का यह उठती है कि क्या ऐसी अन्य औषधियों का अभाव है जो एक ही औपवि को अनेक वर्गों में पढ़ा गया है । एक ही द्रव्य को बार - बार पढ़ने का तात्पर्य यह हो सकता है कि अल्प औषधियों के द्वारा ही यथासम्भव चिकित्सा की जानी चाहिये । प्रत्येक वर्ग में दश दश औषधियों को बताने का तात्पर्य यह है कि सभी औषधियाँ सर्वत्र सुलभ नहीं हो सकतीं । जहाँ जो सुलभ हो वहाँ उसका प्रयोग करना चाहिये । इस प्रकार अनतिसंक्षेप अनति-विस्तार से यहाँ उपदेश किया गया है । उपर्युक्त विमर्श की मूल भावना चक्रपाणि सम्मत है । तत्र श्लोकाः— यतो यावन्ति यैर्द्रव्यैर्विरेचनशतानि षट् । उक्तानि संग्रहेणेह तथैवैषां षडाश्रयाः ॥२३ ॥

अध्याय में वर्णित विषय - संग्रह - इस अध्याय में ६०० विरेचनों का वर्णन है । इन ६०० विरेचनों की पूर्ति जिस प्रकार जिन द्रव्यों से जितनी कल्पनाओं के द्वारा होती है ( जैसे मदन-फल आदि द्रव्यों से बताया गया है ) उनका भी संग्रह किया गया है । तथा इन ६०० विरेचनों के ६ आश्रय का भी वर्णन किया गया है ॥ २३ ॥

रसा लवणवर्ज्याश्च कषाया इति संज्ञिताः । तस्मात् पञ्चविधा योनिः कषायाणामुदाहृता ॥

और भी - लवण रस को छोड़कर शेष रसों का नाम कषाय है । अतः कषायों की योनि ( जानियाँ या उत्पत्ति स्थान ) पाँच प्रकार की इस अध्याय में कही गयी है ॥ २४ ॥

१. ' कर्मणः संपादनात् ' इति यो. । २. ' तेषाम् इति यो. ।

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षड्विरेचनशताश्रितीयाध्यायः ४ ] सूत्रस्थानम् १०१ तथा कल्पनमप्येषामुक्तं पञ्चविधं पुनः । महतां च कषायाणां पञ्चाशत् परिकीर्तिता ॥२५ ॥

पञ्च चापि कषायाणां शतान्युक्तानि भागशः । लक्षणार्थं, प्रमाणं हि विस्तरस्य न विद्यते || २६ || न चालमतिसंक्षेपः सामर्थ्यायोपकल्पते । अल्पबुद्धेरयं तस्मान्नाति संक्षेपविस्तरः || २७ || * मन्दानां व्यवहाराय बुधानां बुद्धिवृद्धये । पञ्चाशत्को ह्ययं वर्गः कषायाणामुदाहृतः ॥ २८ ॥

और भी - और इन कषायों की पाँच प्रकार की कल्पना भी बतायी गयी है । महाकषायों के पचास वर्गों का वर्णन किया गया है तथा अलग - अलग इन कषायों के उदाहरणस्वरूप पाँच सौ कषायों का वर्णन किया गया है, क्योंकि विस्तार का कोई अन्त नहीं | अतिसंक्षेप रूप में वर्णन करने से अल्प बुद्धि वाले को ज्ञान ही न होगा । इसलिए अल्प बुद्धि वाले वैद्यों को चिकित्सा के व्यवहार के लिए तथा बुद्धिमान व्यक्तियों की बुद्धि वृद्धि के लिए यह पचास कषायों का वर्ग उदाहरणस्वरूप कहा गया है ॥ २५-२८ ॥ तेषां कर्मसु बाह्येषु योगमाभ्यन्तरेषु च । संयोगं च प्रयोगं च यो वेद स भिषग्वरः || २ ९ || इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते सूत्रस्थाने भेषजचतुष्के षडविरेचनशताश्रितीयो नाम चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥

इति भेषजचतुष्कः ॥ १ ॥

इन पाँच सौ कषायों के वाह्य तथा आभ्यन्तर ( भीतरी ) प्रयोगों में जो व्यक्ति योग, संयोग और प्रयोग जानता है वह उत्तम वैद्य कहा जाता है ॥ २ ९ ॥ विमर्श - चक्रपाणि ने बाह्य प्रयोग के उदाहरण में प्रलेपादि तथा आभ्यन्तर प्रयोग के उदाहरण में वमन, पाचन इत्यादि का उल्लेख किया है । संयोग का अर्थ द्रव्यों का उचित प्रकार से सम्मिश्रण करना तथा काल, प्रकृति इत्यादि की अपेक्षा से औषध की योजना करना हो चक्रपाणि का मत है । चरक के द्वारा प्रतिसंस्कृत अग्निवेशकृत तन्त्र ( चरकसंहिता ) के सूत्रस्थान में भेषज-चतुष्क - विषयक ' षविरेचनशताश्रितीय ' नामक चौथा अध्याय समाप्त हुआ | इस प्रकार यह भेषज - चतुष्क समाप्त हुआ ।

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१०२ चरकसंहिता अथ पञ्चमोऽध्यायः अथातो मात्राशितीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥

इति ह माह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥

अब ( भेषज - चतुष्क प्रकरण के बाद ) मात्राशितीय अध्याय की व्याख्या की जायगी ॥ १ ॥

जैसा कि भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥ २ ॥

विमर्श - आयुर्वेद का प्रयोजन ' स्वस्थस्य स्वास्थ्यरक्षगमातुरस्य विकारप्रशमनं च ' है । दूसरे प्रयोजन की पूर्ति के लिए प्रथम चार अध्यायों में आतुरविकार प्रशमन सम्बन्धी भेषज - सूत्रों का संकेत करने के बाद, प्रथम प्रयोजन स्वास्थ्यरक्षण की पूर्ति के लिए, ' स्वस्थचतुष्क ' का प्रारम्भ किया जा रहा है । इसमें ‘ प्राणिनां पुनर्मूलमाहारो बलवणजसां च ' - के आधार पर सर्वप्रथम आहार की मात्रा का निर्धारण करने के लिए, मात्राशितीय नामक अध्याय का वर्णन किया गया है

क्योंकि आहार की उपादेयता मात्रा पर ही निर्भर है ।

* मात्राशी स्यात् । आहारमात्रा पुनरग्निबलापेक्षिणी ॥ ३ ॥

( क ) आहारविषयक विचार ( Diet ) आहार की मात्रा तथा अग्निवल का सम्बन्ध - मनुष्य को मात्रा पूर्वक भोजन करना चाहिये । आहार की मात्रा अग्नि के बल की अपेक्षा करने वाली होती है ॥ ३ । विमर्श - भोजन शब्द से यहाँ अशिन, पीत, लीड, खादित इत्यादि पदार्थों का ग्रहण किया गया है क्योंकि आहार का अर्थ है - ' आहियते अन्ननलिकया यत्तदाहारः । इन सभी प्रकार के आहार द्रव्यों को मात्रापूर्वक सेवन करना चाहिये । प्रत्येक व्यक्ति की आहार की मात्रा, उसके अग्निवल ( Digestive Capacity ) पर निर्भर करती है । डा ० घोष ने Standard Indian Diets के बारे में निम्नाकित विचार प्रकट किया है— A diet, therefore, that will suit the average Indian and at the same time maintain the high standard of protein metabolism would be a compromise between the European and the orthodox Hindu diet. The following is a good diet for Indians provided the rice is not polished and whole meal atta is used. Rice Atta Dal Oil 6 8 oz Fish 4 oz " Vegetables and fruits Milk or curd ( dahi ) 6 12 27 4 3 " " Those who do not take fish should supplement the above diet with an abditional four ounces of milk, skimmed milk, curd or dahi. In every case the diet should contain sufficient green leafy vegetables which should be eaten raw or cooked after proper washing. In addition to the above, sugar or gur should be taken. गवर्नमेण्ट आफ इण्डिया के हेल्थ बुलेटिन नं ० २३ के अनुसार भारतीयों को निम्नांकित मात्रा में Calorie की आवश्यकता है-

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मात्राशितीयाध्यायः ५ ] work in India. Adult male female 27 ... Child 12 & 13 years 10 & 11 12 95 8 & 9 " 27 6 & 7 24 22 4 & 5 " सूत्रस्थानम् Co - etficient. 1.0 0.8 0.8 0.7 0.6 0.5 0.4 १०३ Calories required. 2,600 2,100 2,100 1,800 1,600 1,300 1,000 संक्षेप में कहा जाता है कि- “ In India 2,500-2,600 calories are considered to be about enough for the ordinary easy going agricultural work, while up to 2,800-3,000 calories per day are recommended for those doing heavy ' manual labour. " ( ibid ) यावद्ध्यस्याशन मशितमनुपहत्य प्रकृतिं यथाकालं जरां गच्छति तावदस्य मात्रा -प्रमाणं वेदितव्यं भवति ॥ ४ ॥

आहारमात्रा -की निश्वयात्मक विधि आहार की जो मात्रा भोजन करने वाले की प्रकृति में बाधा न पहुँचाते हुए यथासमय पच जाय वही मात्रा उस व्यक्ति के लिये प्रमाण मानना चाहिये । विमर्श - तात्पर्य यह है कि जितना भोजन शरीर में कोई भी कष्ट न पहुँचाते हुए उचित समय पर पच जाय, उतना ही आहार की ठीक मात्रा है । आधुनिक दृष्टि से शरीर में नित्य होने वाली क्षतियों ( Wear & Tear Phenomena ) की पूर्ति के लिए आहार द्रव्यों की आवश्यकता होती है । भोजन शारीरिक धातुओं के अनुसार होना चाहिये जिससे उन उन शारीर धातुओं की क्षति की पूर्ति अनुकूल भोज्य पदार्थों से होती रहे । शारीर - धातु के निर्माण के लिये वसा तत्त्व ( Fat ) तथा लवण मांस तत्त्व ( Protien ), शाक तत्त्व ( Carbohydrate ), ( Salts ) और जल आदि भोज्यांशों की आवश्यकता होती है । ये भोज्यांश शरीर के भीतर जाकर दो भागों में विभक्त होकर अपना कार्य करते हैं । प्रथम भाग से धातुओं का निर्माण तथा दूसरे भाग से शक्ति का निर्माण होता है । धातु एवं शक्ति का निर्माण होने के लिए शरीर में विभिन्न पाक एवं परिवर्तन होता है । पोषक धातु निर्मित होकर रस से रक्त, रक्त से मांस आदि क्रम से परिवर्तित होता रहता है । जिस अंश से शक्ति का निर्माण होता है उसका एक प्रकार से नाश हो जाता है, जो कुछ अंश बच जाता है वह मल एवं मूत्र के रूप में बाहर निकल जाता है | अतः देहानि जिस परिमाण में आहाररूपी इन्धन माँगती हो उसी परिमाण में उसे देना चाहिये जिससे किसी प्रकार का विकार न हो । इसी आशय से मात्रापूर्वक ही भोजन करने का विधान बताया गया है । ' मात्रां खादेद् बुभुक्षितः ' तथा ' नाप्राप्तातीतकालं वा हीना-धिकमथापि वा ' ( सुश्रुत ), ' बुभुक्षितोऽन्नमश्नीयान्मात्रावद्विदितागमः । हीनमात्रमसन्तोषं करोति च बलक्षयम् । आलस्यगौरवाटोपसादांश्च कुरुतेऽधिकम् ॥ ' ( सु. सू. अ. ४६ ) । मात्रायुक्त आहार के लक्षण इस प्रकार हैं- ' कुक्षेरप्रपीडनमाहारेण हृदयस्यानवरोधः पार्श्वयोरविपाटनं नातिगौरव-The Health Bulletin No. 23 suggests the following scale of co - efficients and calorie requirements as being sufficiently accurate for practical nutrition

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१०४ चरकसंहिता मुदरस्य प्रीणनमिन्द्रियाणां क्षुत्पिपासौपरमः स्थानासन शयनगमनप्रश्वासोच्छ्वासहास्यसंकथासु सुखा-नुवृत्तिः सायं प्रातश्च सुखेन परिणमनं बलवर्णोपचयकरत्वं चेति मात्रावतो लक्षगमाहारस्य भवति । ' ( च. वि. अ. २ ) तत्र शालिषष्टिकमुद्गलावक पिञ्जलैणशशशर भशम्वरादीन्याहारद्रव्याणि प्रकृतिलघून्यपि मात्रापेक्षीणि भवन्ति; तथा पिष्टेत्तुक्षीरविकृतितिलमाषानूपौदक पिशितादीन्याहारद्रव्याणि प्रकृतिगुरुण्यपि मात्रामेवापेक्षन्ते ॥ ५ ॥

स्वभावतः लघु तथा गुरु द्रव्यों का मात्रासापेक्षत्व - आहार द्रव्यों में शालि चावल, साठी का चावल, मूँग की दाल, लावा पक्षी का मांस, कपिञ्जल ( गौरतित्तिरिः - चक्र ०, गौरैया पक्षी का मांस ), एण ( कृष्णसार: - चक्र ०, काला हरिण का मांस ), शश ( खरहे का मांस ), शरभ ( महाशृङ्गी हरिणः - चक्र ०, वारहसिंघे का मांस ), शम्बर ( सांभर मृग का मांस ), ये आहार द्रव्य स्वभाव से लघु होने पर भी मात्रा की अपेक्षा करते है तथा पीठी, इस तथा दुग्ध के विकार ( गुड़, राब तथा दही, मलाई, खड़ी इत्यादि ), तिल, उड़द, आनूप मांस, औदक मांस इत्यादि आहार द्रव्य जो स्वभाव से गुरु हैं वे भी मात्रा की ही अपेक्षा करते हैं ॥ ५ ॥

न चैवमुक्ते द्रव्ये गुरुलाघवमकारणं मन्येत; लघूनि हि द्रव्याणि वाय्वग्निगुणबहुलानि भवन्ति, पृथ्वीसो मगुणबहुलानीतराणि; तस्मात् स्वगुणादपि लघून्यग्निसन्धुक्षणस्वभा-वान्यल्पदोषाणि चोच्यन्तेऽपि सौहित्योपयुक्तानि, गुरूणि पुनर्नाग्निसन्धुक्षणस्वभावान्य-सामान्यात्, अतश्चातिमात्रं दोषवन्ति सौहित्योपयुक्तान्यन्यत्र व्यायामाग्निबलात्; सैषा भवत्यग्निबलापेक्षिणी मात्रा ॥ ६ ॥

लघु तथा गुरु आहार द्रव्यों का वैज्ञानिक आधार [ Scientific Explanation ] - इस प्रकार जब लघु और गुरु आहार द्रव्य दोनों ही मात्रा की अपेक्षा करते हैं, तो द्रव्य लघु या गुरु है यह कहने की कोई आवश्यकता प्रतीत नहीं होती है । परन्तु विना कारण हो गुरु और लघु आहार द्रव्यों का विचार है ऐसा नहीं समझना चाहिये । क्योंकि जो आहार द्रव्य प्रकृति से लघु होते हैं उसमें वायु और अग्नि गुण की प्रधानता होती है । जो द्रव्य गुरु होते हैं उसनें पृथ्वी और सोम ( जल ) गुण की प्रधानता होती है । अतः अपने स्वाभाविक गुणों के कारण लघु द्रव्य अनि को संधुक्षण ( Stimulate ) करने वाले होते हैं अतः अधिक मात्रा में भोजन करने पर भी अल्प दोष करते हैं और गुरु आहार द्रव्य अपने स्वाभाविक गुणों के कारण अग्नि को संधुक्षण करने वाले नहीं होते क्योंकि अनि के गुणों से विपरीत गुण वले होते हैं । अतः अधिक मात्रा में भोजन करने से अधिक दोष उत्पन्न करने वाले होते हैं । किन्तु व्यायाम ( Exercise ) करने वाले तथा जिन लोगों की अग्नि ( Digestive Capacity ) बलवान् है, उन लोगों के लिए गुरु अन्न भी कुछ अधिक मात्रा में खाने से अल दोष करने वाले होते हैं । यही अग्नि - बल के अनुसार आहार की मात्रा का अभिप्राय है ॥ ६ ॥

विमर्श - द्रयों के लघु और गुरु कहने का तात्पर्य यही प्रतीत होता है कि संयोगवश यदि कुछ अधिक मात्रा में लघु द्रव्य का भोजन कर लिया जाय तो भी अधिक उपद्रव नहीं होता है । क्योंकि अग्नि स्वभाव से लघु एवं रूक्ष होती है । लघु द्रव्य भी अग्नि तथा वायुगुण की प्रधानता से होने से लघु और रुक्ष होते हैं । अतः गुण- सामान्य होने से ' सर्वदा सर्वभावानां सामान्यं वृद्धिकारणम् ' के अनुसार अग्नि को दीप्त करने वाले ही होते हैं । गुरु द्रव्य पृथ्वी और जल की प्रधानता से होते हैं जो दोनों गुरु होते हैं किंतु अनि लघु होती है अतः ' हासहेतुविशेषश्च ' के अनुसार अग्नि- गुण के विपरीत गुणवाले होने से अग्नि को मन्द करने वाले होते हैं इसीलिये अधिक

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मात्राशितीयाध्यायः ५ ] सूत्रस्थानम् १०५ मात्रा में लेने से गुरु द्रव्य भयंकर उपद्रव करने वाले होते हैं । परन्तु व्यायाम करने वाले और तीक्ष्ण अनि वाले व्यक्ति इसके अपवाद हैं --- - ' दीप्ताग्नयः खराहाराः कर्मनित्या महोदराः । ये नराः प्रति तांञ्चिन्त्यं नावश्यं गुरुलाघवम् ॥ ' ( सू. अ. २७ ) तथा ' सात्म्यतोऽल्पतया वाघि दीप्ताग्नेस्तरुणस्य च । स्नेहव्यायामबलिनो विरुद्धं वितथं भवेत् ॥ ' ( सू. अ. २६ ) । न च नापेक्षते द्रव्यं द्रव्यापेक्षया च त्रिभागसौहित्यमर्धसौहित्यं वा गुरूणामुपदिश्यते, लघूनामपि च नातिसौहित्यमग्नेर्युक्त्यर्थम् ॥ ७ ॥

आहार - मात्रा - ज्ञान की आवश्यकता तथा उससे लाभ - सामान्यतः गुरु और लघु आहारों वा द्रव्यों की मात्रा का ज्ञान अग्नि के बल पर हो ही जायगा, तब द्रव्यों के ज्ञान की आवश्यकता क्या है । इस आशंका पर आचार्य ने बताया है कि आहार द्रव्य मात्रा की अपेक्षा नहीं करता है यह बात नही समझना चाहिये किन्तु अपेक्षा करता ही है । द्रव्य के अनुसार गुरु द्रयों का आहार कुक्षि के भाग में या ई भाग में ही लेना चाहिए । लघु आहार द्रयों से कुक्षि को पूर्ण रूप से नहीं भरना चाहिये । इस प्रकार भोजन करने से अग्नि युक्तियुक्त अर्थात् अपनी उचित मात्रा में बनी रहती है ॥ ७ ॥

विमर्श - पहले के गद्य में अग्निबल के अनुसार भोजन की मात्रा का उपदेश किया गया 1 इस गद्य में द्रव्य के अनुसार मात्रा का उपदेश किया गया है । यहाँ सौहित्य का अर्थ है तृप्ति ' सौहित्यं तर्पणं तृप्तिः ' ( अमरकोष ) । कुक्षि के डे या ३ भाग को गुरु द्रव्य से पूर्ण करना चाहिये इसका तात्पर्य यह लिया जा सकता है कि गुरु द्रव्य से ३ भाग और गुरुतर आहार-द्रव्य से डे भाग पूर्ण करना चाहिये । चरकसंहिता के विमानस्थान के दूसरे अध्याय ( त्रिविधकुक्षीय ) में यह वर्णन विस्तृत रूप में देखने योग्य है । अन्यत्र भी द्रव्यापेक्षी मात्रा इस रूप में बतायी गई है – ' गुरूणामसौहित्यं लघूनां नातितृप्तता । मात्राप्रमाणं निर्दिष्टं सुखं यावद्विजीर्यति ॥ ' तथा - ' अन्नेन कुक्षेर्द्वावंशौ पानेनैकं प्रपूरयेत् । आश्रयं पवनादीनां चतुर्थमवशेषयेत् ॥ ' ( वा. सू. अ. ८ ) । ‘ गुरूगामर्थसौहित्यं लघूनां तृप्तिरिष्यते ' ( सु ० सू. अ. ४६ ) । भेल - संहिता में भी इसी प्रकार वर्णन मिलता है, यथा - ' तथाविधमिहाहारं गुरुमैव ब्रवीम्यहम् । तस्मात्रिभागसौहित्यमर्ध-सौहित्यमैव वा ॥ आहारं लघुमन्विच्छेद् गुरुणा सेवितं यदा । लघु नाम समासाद्य द्रव्यं यो ह्यत्ति सेवने ॥ तल्लघ्वप्यतिसंयुक्तं कोष्ठे संपद्यते गुरु । गुरुलाघवविद् वैद्यो नराणां वर्द्धयत्यसून् ॥ तस्मादेवं विजानीयाद् द्रव्याणां गुरुलाघवम् । ' ( सू. ) । इस प्रकार मात्रा से अन्न सेवन करने पर अग्नि उचित रूप में कार्य करती है और अग्नि के युक्त रहने पर स्वास्थ्य उत्तम रहता है ' शान्तेऽग्नौ म्रियते युक्ते चिरं जीवत्यनामयः । रोगी स्याद्विकृतेर्मूलमग्निस्तस्मान्निरुच्यते ॥ ( चि. १५ ) । यद्यपि लघु द्रव्य अग्निसंधुक्षगस्वभाव वाले होते हैं पर उनका भी अतिमात्रा में सेवन किया जाय तो मन्दानि आदि दोष उत्पन्न करते ही है । इसीलिए आचार्य ने यहाँ नातिसौहित्य शब्द का प्रयोग किया है तथा इसी स्थान के २७ वें अध्याय में लघु आहार द्रव्यों का तृप्ति पर्यन्त खाने का आदेश दिया है, यथा-- ' गुरूणामल्पमादेयं लघूनां तृप्तिरिष्यते ' । मात्रावद्धयशनमशितमनुपहत्य प्रकृतिं बलवर्णसुखायुषा योजयत्युपयोक्तारमव-श्यमिति ॥ ८ ॥

मात्रापूर्वक भोजन से लाभ - इस प्रकार मात्रा युक्त भोजन, खाने वाले व्यक्ति की प्रकृति में बाधा न पहुँचाते हुए उसे निश्चय ही बल, वर्ण, सुख और पूर्ण आयु से युक्त करता है । अर्थात् भोक्ता पुरुष बल, वर्ण, सुख और पूर्ण आयु से सम्पन्न होता है ॥ ८ ॥

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१०६ भवन्ति चात्र-चरकसंहिता गुरु पिष्टमयं तस्मात्तण्डुलान् पृथुकानपि । न जातु भुक्तवान् खादेन्मात्रां खादेद् बुभुक्षितः ॥१ ॥

गुरु आहार द्रव्यों के प्रयोग का विधान - ~ इसलिए पिष्टमय ( पिट्ठी निमित ) गुरु आहार पदार्थ, चावल और पृथुक ( चीउरा, चिप्पियाः चक्र ० ) को भोजन करने के बाद कभी भी नहीं खाना चाहिये । भूख लगने पर योग्य मात्रा में खाना चाहिए ॥ ९ ॥

विमर्श -ये गुरु द्रव्य है, भोजन के बाद खाने से अपने प्राकृतिक गुरु गुण के कारण अग्नि को शीघ्र मन्द कर देते है । तात्पर्य यह है कि भोजन करने के बाद यदि आवश्यकता पड़े तो हलके द्रव्य का प्रयोग कथंचित् किया भी जा सकता है पर गुरु द्रव्य सर्वथा वर्जित है, यथा -' कुकूलभृटपृथुकान् सुपिष्टकृततण्डुलान् । न जातु भुक्तवानद्यान्मात्रामद्यात् सुकांक्षितः ॥ ' ( अ. सं. सू. १० ) तथा ' मात्रागुरु परिहरेद्राहारं द्रव्यतश्च यः । पिष्टान्नं नैव भुञ्जीत मात्रया वा बुभुक्षितः ॥ ' ( सु ० सू. अ. ४६ ) । वल्लूरं शुष्कशाकानि शालूकानि बिसानि च । नाभ्यसेगौरवान्मांसं कृशं नैवोपयोजयेत् ॥१० ॥

अभ्यास करने योग्य आहार द्रव्य - वल्लूर ( सुग्वा मांस शुष्क मांसं चक्र ० ), सूखे हुए शाक, शालूक ( कमलकन्द ) और विस ( कमल का डण्ठल ), गुरु होने के कारण इनका अभ्यास नहीं करना चाहिये । दुबले - पतले पशु - पक्षियों के मांस का प्रयोग सर्वथा नहीं करना चाहिए ॥ १० ॥

विमर्श - इन आहार द्रव्यों का प्रयोग यदा - कदा किया जा सकता है पर इनके खाने का निरन्तर अभ्यास नहीं करना चाहिये । तथा भोजन के बाद भी इनका सेवन नहीं करना चाहिये, यथा — ‘ मुणालविमशाऌककन्देक्षुप्रभृतीनि च । पूर्वं योज्यानि भिषजा न तु भुक्ते कदाचन ॥ ' ( नु. सू. अ. ४६ ) । कृशमांस का तात्पर्य यह है कि रोग आदि से कृश पशुओं का मांस ग्राह्य नहीं होता । कूचिकांश्च किलाटांश्च शौकरं गव्यमाहिषे । मत्स्यान् दधिच माषांश्च यवकांश्च न शीलयेत् ॥ और भी -- कृचिका ( जमा हुआ दुग्ध ), किलाट ( छेना ), सुअर का मांस, गो का मांस, भैंस का मांस, मछली, दही, उड़द और यवक ( जई ) का शीलन अर्थात् लगातार सेवन नहीं करना चाहिये ॥ ११ ॥

विमर्श - इनका भी यदा - कदा ही प्रयोग करना चाहिए । कूचिका और किलाट की परिभाषा - ' पक्कं दघ्ना समं क्षीरं विज्ञेया दधिचिका | तक्रेण तक्रकूर्च्छा स्यात्तयोः पिण्डः किलाटकः ॥ ’ तथा — ' नष्टदुग्धस्य पक्वस्य पिण्डः प्रोक्तः किलाटक: ' ( भा. प्र. ) । वाग्भट में कुछ अधिक द्रव्यों का अभ्यास करना वर्जित किया गया है - ' किलादधिकूर्चीका क्षारशुक्ताममूलकम् । कृशशुष्कवराहा-विगोमत्स्यमहिषामिषम् ॥ माषनिष्पात्रशालूकविसपिष्टविरूढकम् । शुष्कशाकानि यवकान् फाणितं न शीलयेत् ॥ ( सू. अ. ८ ) । यवक को चरक ( सू. अ. २५ ) में सर्वश्रेष्ठ अपथ्यकर बताया है यथा- ' यवकः शूकधान्यानामपथ्यतमत्वे प्रकृष्टतमो भवति ' । षष्टिकान्छालिमुद्गांश्च सैन्धवामलके यवान् । आन्तरीक्षं पयः सर्पिर्जाङ्गलं मधु चाभ्यसेत् ॥ लगातार प्रयोग किये जाने वाले आहार द्रव्य - सांठी का चावल, शालि धान का चावल, मूंग की दाल, सेंधानमक, आँवला, जौ का आटा, आकाश का जल, दुग्ध, जाङ्गल मांस और मधु का अभ्यास करना चाहिए ॥ १२ ॥

विमर्श - वाग्भट ने कुछ अधिक द्रव्यों का अभ्यास करने को बताया है - ' शीलयेच्छालिगो--धूमयत्रपष्टिकजाङ्गलम् | पथ्यामलकमृद्वीकापटोलीमुद्दशर्कराः ॥ घृतदिव्योदकक्षीरक्षौद्रदाडिमसैन्ध-वम् । त्रिफलां मधुसर्पिर्भ्यां निशि नेत्रवलाय च ॥ ' ( सू. अ. ८ ) । १. ' गव्यमामिषम् ' यो.

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मात्राशितीयाध्यायः ५ ] सूत्रस्थानम् १०७ तञ्च नित्यं प्रयुञ्जीत स्वास्थ्यं येन नुवर्तते । अजातानां विकाराणामनुत्पत्तिकरं च यत् ॥ आहार द्रव्यों के प्रयोग का व्यापक सिद्धान्त - ऐसे आहार द्रव्यों का नित्य सेवन करना चाहिये जिससे स्वास्थ्य का अनुवर्तन होता रहे अर्थात् स्वास्थ्य उत्तम बना रहे और जो रोग उत्पन्न नहीं हुये है उनकी उत्पत्ति भी न हो सके ॥ १३ ॥

विमर्श - उपर्युक्त श्लोक में स्वस्थवृत्त के व्यापक सिद्धान्त की नींव डाली गयी । उसी आहार का सेवन करना चाहिये जो स्वास्थ्य को बनाये ( maintain ) रख सके तथा भविष्य में होने वाली व्याधियों को रोक सके अर्थात् Prophylactic की तरह कार्य करे । इस तरह इसमें सन्तुलित आहार ( Balanced diet ) की तरफ सिद्धान्त रूप से संकेत किया गया है । इस सम्बन्ध में आधुनिक दृष्टि से आहार सम्बन्धी विचार अप्रासङ्गिक न होगा । आहार उस द्रव्य को कहते है जो पाचन नलिका के द्वारा शरीर में शोषित होकर निम्नलिखित कार्यों के साधन में समर्थ हो -- ( क ) शरीर की क्षति की पूर्ति करना एवं उसके विकास में सहायता प्रदान करना । ( ख ) ताप या शक्ति का उत्पादन | ( ग ) उपर्युक्त दोनों क्रियाओं का नियन्त्रण | प्रथम कार्य मुख्यतः मांसत्त्व, खनिज लवण तथा जल के द्वारा सिद्ध होता है । द्वितीय कार्य वसा और शाकतत्त्व के द्वारा पूर्ण होता है, यद्यपि कुछ शक्ति मांसतत्त्व के द्वारा भी प्राप्त होती है । तृतीय कार्य जीवनीय द्रव्य और खनिज लवण सम्पादित करते हैं । शरीर की पेशियाँ सर्वदा चेष्टात्रान् रहती है जिनसे सर्वदा शक्ति का क्षय होता रहता है । अतः इम क्षति की पूर्ति के लिये नित्य नूतन आहार द्रव्यों की आवश्यकता होती है । शरीर के विकास काल में भी विकास के लिये आवश्यक उत्पादन एवं शक्ति आहार के द्वारा ही प्राप्त होती है, अतः उपयुक्त आहार वही है जो - ( १ ) शक्ति का आवश्यक परिमाण उत्पन्न करें । ( २ ) क्षतिपूर्ति एवं विकास के लिये आवश्यक उपादानों की पूर्ति करे । ( ३ ) शरीर की आवश्यक रासायनिक क्रियाओं का नियन्त्रण करे । यह देखा गया है कि कुछ अंशों में खनिज लवण सामान्य पेशी के संकोचन के लिये आवश्यक है । साथ ही वह अस्थि और दन्न के निर्माण के लिये भी आवश्यक है । इसके बाद वह जीवनीय द्रव्य के साथ मिलकर शरीर की क्रियाओं एवं विकास के लिये भी महत्त्वपूर्ण है । इस प्रकार आहार के विविध पोषक तत्त्वों की क्रियायें संक्षेप में निम्नांकित रूप में निर्दिष्ट की जा सकती है— ( क ) धातुनिर्मापक -- मांसतत्त्व, खनिज लवण और जल । धातु - निर्मापक आहार दो प्रकार का होता है - ( १ ) शरीर के ठोस अवयवों यथा अस्थि, पेशी आदि के लिये सामग्री प्रस्तुत करने वाले । ( २ ) विकास एवं अन्य शारीर क्रियाओं का नियन्त्रण करने वाले । प्रथम प्रकार में मांसतत्त्व, वसा और शाकतत्त्व आते हैं और द्वितीय प्रकार में जीवनीय द्रव्य और खनिज लवण आते हैं जिनकी कमी होने से अनेक रोग उत्पन्न हो जाते है । इस प्रकार मांसतत्त्व, खनिज लवण, जल और जीवनीय द्रव्य धातु - निर्मापक आहार द्रव्य हैं । ( ख ) ताप और शक्ति के उत्पादक-मांसतत्त्व, वसा और शाकतत्त्व | इस प्रकार के आहार द्रव्यों में कार्बन होता है जिनका श्वास द्वारा गृहीत औक्सिजन से ओपजनीकरण होता है और इसी क्रम में ताप और शक्ति का प्रादुर्भाव होता है । शाकतत्त्व की अपेक्षा वसा में दूनी शक्ति होती है । ( ग ) शरीर - क्रियाओं के नियामक --- खनिजलवण और जीवनीय द्रव्य! अधिकांश आहार - द्रयों में ये सभी उपादान होते हैं, किन्तु प्रायः किसी एक की अधिकता होती है यथा - वी, मक्खन आदि में वसा, मांस में मांसतत्त्व, शाकाहार में शाकतत्त्व । आहारतत्त्वों का तापमूल्य ( Heat value ) - एक किलोग्राम जल का तापक्रम एक डिग्री सेन्टीग्रेड बढ़ाने के लिये जितना ताप आवश्यक होता है उसे एक ' कैलोरी ' कहते है । इस प्रकार --