चरक संहिता हिन्दी भाष्य — पृष्ठ 251–260

चरक संहिता हिन्दी भाष्य · Chaukhamba · पृष्ठ 251–260

पृष्ठ 251

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१५८ चरकसंहिता विमर्श - वेगावरोधजन्य व्याधियाँ तथा उनकी चिकित्सा का निम्न रूप में वर्णन सुविधा के लिये किया जा रहा है— वेगावरोध ( Name of Urges ) १. सूत्रवेग निग्रह ( Suppression of the urge for urination ) २. पुरीषवेगनिग्रह ( Suppression of urge for defecation ) ३. शुक्रवेगनिग्रह ( Suppression of तज्जन्य व्याधियाँ ( Diseases Produced by ) वस्तिशूल ( Pain in Bladder ), मेहनशूल ( Pain in Penis ), मूत्रकृच्छ ( dysuria ), शिरःशूल ( Headache ), विनाम ( पीड़ा के कारण झुक जाना ) वङ्क्षण प्रदेश में आनाह पक्वाशयशूल, ( Pain in Illiac fossa ), शिरःशूल, अपान वायु-तथा पुरीष का निरोध, ( Obstruction of flatus & faeces ), पिण्ड -कोद्वेष्टन ( Cramps in calf muscles ), आध्मान ( Tympanitis ) भेटू तथा वृपण में शूल ( Pain in Penis and Testicles ), urge_for_Seminal | अङ्गमर्द, हृदय में पीड़ा ( Pain in discharge ) cardiac - region ), मूत्ररोध ( Rete | ntion of urine ) ४. मलवातवेगनिग्रह ( Suppression of the urge for flatus ) अपानवायु, मूत्र तथा पुरीष का रुक जाना ( Obstruction of flatus, urine and feaces ), आध्मान, कुम ( Exhaustion ), वेदना ( Pain ), उनकी चिकित्सा ' Their Treatments ) स्वेड ( Fomentation ), अवगाह ( Tab Bath ), अभ्यङ्ग ( Massage ), घृत का अवपीडक, त्रिविध वस्त कर्म ( निरूह, अनुवासन, उत्तर ) स्वेद, अभ्यङ्ग, अवगाह, वर्ति ( Suppositories ), बस्तिकर्म ( Eneme! a ), प्रमाथि अन्न - पान ( Carminative eats and drinks ) अभ्यङ्ग, अवगाह, मंदिरा ( Alcohol ), चरणायुधा, ( मुर्गे का मांस ), शालि चावल ( Rice ), क्षीर ( Milk ), निरूहवस्ति मैथुन ( Sexual Intercourse ) स्नेह ( Oils ), स्वेद, वर्ति, वातानुलोमन भोजन पान तथा बस्ति ( Carmin. ative eats, drinks and enemas ) भोजन करके वमन, ५. छर्दि वेगनिग्रह of कण्डू ( Itching ), कोठ ( type of - Urticaria ), अरुचि धूम ( Smoking ), लङ्घन ( Starvation ), रक्तमोक्षग ( Suppression urge for Vomiting ) ( Annorexia ), व्यङ्ग, शोथ ( Oedema ), पाण्डु ( Anaemia ), | ( Blood - letting ), रूक्ष ज्वर ( Fever ), कुष्ठ ( Derma-अन्न - पान ( Dry eats and tosis ), हृल्लास ( Nausea ), वीसर्प | ( Eryseplas ), drinks ), व्यायाम ( Exercise ), विरेक ( Purgatives )

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नवेगान्धारणीयाध्यायः ७ ] वेगावरोध ( Name of Urges ) ६. क्षवथुवेगनिग्रह ( Suppression सूत्रस्थानम् तजन्य व्याधियाँ Diseases Produced by ) ; मन्यास्तम्भ ( Torticollis ), of | शिरःशूल, अदित ( Facial Para | urge for Sternuta | lysis ), अर्धावभेदक ( Hemieration ) ७. उदार वेगनिग्रह ( Suppression of urge for Eructation ) ८. जृम्भावेगनिग्रह ( Suppression of the urge for Pen diculation ) ९. क्षुधा वेगनिग्रह urge for Hunger ) nia ), इन्द्रियदौर्बल्य । हिका ( Hiccup ), कास ( Cough ), अरुचि, कम्प ( Tremor ), हृदय तथा उरस् में बाधा ( Sense of obstruction in Heart and Chest ) शरीर का झुकना ( Flexion of body ), आक्षेप ( Convulsion ), सङ्कोच ( Spasm ), सुप्ति ( Anaesthesia ), कम्प ( Tremor ), प्रवेपन । कार्य ( Emaciation ), दौर्बल्य उनकी चिकित्सा १५६ ( Their Treatment ) जत्रु के ऊपर अभ्यङ्ग, स्वेद, धूमपान, नस्य ( Nasal Medication ), वानहर अन्न का सेवन, भोजन के बाद घृत - पान | हिक्का तुल्य औषध ( Treatment on lines of Hiccup ) वातघ्न औषध ( Anti vata Remedies ) स्निग्ध, उष्ण, लघु, ( Suppression of the | ( Weakness ), वैवर्ण्य ( discolor- | भोजन ( Unctuous, hot १०. पिपासावेगनिग्रह ( Suppression of urge for Thirst ) ११. बाप वेगनिग्रह ( Suppression of urge for Lachrymation ) १२. निद्रावेगनिग्रह ( Suppression urge for sleep ) १३. श्रमनिश्वासवेगनिग्रह ( Suppressson of urge for deep Breathing after Exercise ation ), अङ्गमर्द ( Pain in body ), अचि, भ्रम ( Giddiness ) कण्ठ तथा मुख में शोष ( Dryness of throat and mouth ), वाधिर्य ( deafness ), श्रम ( Fatgue ), साद ( depression ), हृदि व्यथा ( Pain in Cardiac Region ) प्रतिश्याय ( Cold ), अक्षिरोग ( Eye disease ), हृद्रोग ( Car diac disease ), अरुचि, भ्रम ( Giddiness ) जृम्भा ( Yawning ), अङ्गमर्द, and light diets ) शीत तथा तर्पण पेय Cooling and Nutri ents drinks ) स्वप्न ( Sleep ), मद्य ( Alcohol ), प्रियकथा ( Pleasing talks ) स्वप्न ( Sleep ), संवाहन of तन्द्रा ( Sleepy - behaviour ), ( massage ) शिरोरोग, नेत्रगौरव ( Heaviness in eyes ) गुल्म, हृद्रोग, संमोह ( stupor ) विश्राम ( Rest ), वातघ्न क्रिया ( Anti - rata Remedies )

पृष्ठ 253

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१६० चरकसंहिता वेनिग्रहजारोगा य एते परिकीर्तिताः । इच्छंस्तेषामनुत्पत्ति वेगानेतान्न धारयेत् ॥ २५ ॥

अधारणीय वेग न रोकना ही उचित है - । वेगों को रोकने से थे जो उपर्युक्त रोग बनाए गए है इन रोगों की उत्पत्ति को न चाहने वाले बुद्धिमान् व्यक्तियों के लिए उचित है कि इन उपर्युक्त १३ वेगों को धारण न करें ॥ २५ ॥

इमांस्तु धारयेद्वेगान् हितार्थी प्रेत्य चेह च । साहसानामशस्तानां मनोवाक्काय कर्मणाम् ॥२६ ॥

( २ ) धारणीय वेगवर्णन ( Description of Suppressible Urges ) धारणीय वेग का सैद्धान्तिक आधार - • जीवितावस्था में और मृत्यु के पश्चात् जन्मान्तर में भी अपना हित चाहने वाले व्यक्तियों को अशस्त ( निषिद्ध ), साहस ( Rashness ) तथा मन, वचन, एवं शरीर के निन्दित कर्मों के वेगों को रोकना चाहिये ॥ २६ ॥

विमर्श - अशस्त साहस से यहाँ अभिप्राय निषिद्ध कर्म से है या सहसा ( Rashness ) कार्य करने को तरफ संकेत प्रतीत होता है- ' सहसा विदधीत न क्रियामविवेकः परमापदां पदन् । वृते हि विमृश्यकारिणं गुणलुब्धाः स्वयमेव सम्पदः ॥ ( भारवि ) लोक प्रचलित ही है | सहसा कार्य करने को विपत्ति का मूल माना गया है । अशस्त मानसिक तथा वाचिक वेग को न रोकने से Psycological dis - equilibrium होने की अधिक सम्भावना रहती है । अतः उपर्युक्त दोनों

प्रकार के वेगों को रोकना सानाजिक दृष्टि से भी श्रेयस्कर है ।

लोभशोकभयक्रोधमानवेगान् विधारयेत् । नैर्लज्ज्येयतिरागाणामभिध्यायाश्च बुद्धिमान् ॥

( १ ) बुरे मानसिक धारणीय वेग - लोभ, शोक, भय, क्रोध, अहंकार, निलजना, ईर्ष्या, अदिगन ( प्रेम ), अभिध्या ( दूसरे का धन लेने की इच्छा ) आदि मानस वेगों को रोकना चाहिए || २७ ॥ विमर्श - इन मनोवेगों को रोक लेने पर मानस रोग ( Mental Disease ) होने की सम्भावना कम रहती है । परुपस्यातिमात्रस्य सूचकस्यानृतस्य च । वाक्यस्याकालयुक्तस्य धारयेद्वेगमुत्थितम् ॥२८ ॥

( २ ) वुरे वाचिक धारणीय वेग - अत्यन्त कठोर ( रूक्ष ) वचन, चुगलखोरी, झूठ बोलना और अकालयुक्त वचन ( Untimely Talk ) इनके वेगों को धारण करना चाहिये ॥ २८ ॥

देहप्रवृत्तिर्या काचिद्विद्यते परपीडया । स्त्रीभोगस्तेयहिंसाद्या तस्या वेगान्विधारयेत् ॥२ ९ ॥ ( ३ ) अशस्त शारीरिक धारणीय वेग - दूसरे को पीड़ा देने वाले शरीर के कर्म, परस्त्री-| सम्भोग, चोरी और हिंसा से उत्पन्न वेगों को रोकना चाहिये ॥ २ ९ ॥ पुण्यशब्दो विपापत्वान्मनोवाक्कायकर्मणाम् । धर्मार्थकामान् पुरुषः सुखी भुङ्क्ते चिनोति च ॥ उपर्युक्त वेग - वारण से लाभ - इस प्रकार नियमों का पालन करने से मनुष्यों के मन, वचन और कर्म पापरहित हो जाते हैं जिससे वह पुरुष पुण्य का भागी होता है तथा सुखपूर्वक धर्म, अर्थ और काम को प्राप्त कर उसके फलों का उपभोग करता है ॥ ३० ॥

विमर्श - उपर्युक्त पाँच श्लोकों में Social Medicine के उस भाग पर जोर दिया गया है जो आजकल के मानसिक स्वास्थ्य ( Mental Health ) के लिये आवश्यक प्रतीत होता है । बताया भी गया है, यथा - ' सुखार्थाः सर्वभूतानां मताः सर्वाः प्रवृत्तयः । नुखं च न विना धर्मात् नस्माद्धर्मपरो भवेत् ॥ ' धर्म और पुण्य दोनों शब्द पर्यायवाचक हैं । १. अभिध्या परद्रव्ये स्पृहा । २. ' काचिद्वर्तते ' यो ।

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नवेगान्धारणीयाध्यायः ७ 1 सूत्रस्थानम् १६१ शरीरचेष्टा या चेष्टा ' स्थैर्यार्था बलवर्धनी । देहव्यायामसंख्याता मात्रयातां समाचरेत् ॥३१ ॥

( ३ ) व्यायाम ( Exercise ) वर्णन व्यायाम को परिभाषा - शरीर की जो चेा मन के अनुकूल, शरीर में स्थिरता लाने वाली

और बल बढ़ाने वाली हो उसे शारीरिक व्यायाम ( Physical Exeraise ) कहा जाता है ।

इसे उचित मात्रा में सेवन करना चाहिये ॥ ३१ ॥

विमर्श - मूल में पहले ' चेष्टा ' शब्द का अर्थ शारीरिक कर्न तथा दूसरे ' चेष्टा ' शब्द का ' च + इष्टा ' ऐसा पदच्छेद करके अर्थ करना चाहिये । ' दृष्टा ' का अर्थ जो शारीरिक कर्म ' अभीष्ट ' हो - ऐसा किया जाता है । व्यायाम शारीरिक एवं मानसिक भेद से दो प्रकार का होता है । अन्यत्र व्यायाम का यह लक्षण बताया गया है - ' शरीरायासजनकं कर्म व्यायामसंञ्चितम् ’ ( सु. चि. २४ ) | परन्तु यह उतना व्यापक नहीं है जितना चरक का लक्षण । आचार्य ने भी ' या च इष्टा शरीरचेष्टा ' ऐसा बताकर मनोनुकूल चेष्टा को न्व्यायाम बतलाया है सुश्रुत ने व्यायाम की मात्रा इस प्रकार बताई है - ' सर्वेष्वृतुष्वहरहः पुम्भिरात्महितैषिभिः । बलस्यार्द्धन कर्त्तव्यो व्यायामो हन्त्यतोऽन्यथा । हृदि स्थानस्थितो वायुर्यदा वक्त्रं प्रपद्यते । व्यायामं कुर्वतो जन्तोस्तद्वलार्द्धस्य लक्षणम् ॥ ' ( सु. चि. अ. २४ ) । अन्यत्र बलार्द्ध का लक्षण इस प्रकार बताया गया है - ' कक्षाल-लाटनासासु हस्तपादादिसन्धिषु । प्रस्वेदान्मुखशोपाच्च बलार्द्ध तद्धि निर्दिशेत् ॥ ' ( स्व. वृ. स. ) इसी मात्रा में व्यायाम करना चाहिए । लाघवं कर्मसामर्थ्यं स्थैर्यं दुःखसहिष्णुता । दोपक्षयोऽग्निवृद्धिश्च व्यायामादुपजायते ॥३२ ॥

व्यायाम से लाभ - व्यायाम करने से देह में हलकापन, कार्य करने की शक्ति, शरीर में स्थिरता, दुःख सहने की क्षमता, वृद्ध दोपों की क्षीणता और अग्नि की वृद्धि होती है || ३२ || विमर्श - सुश्रुत ने व्यायाम से लाभ विशेष रूप से बनाया है, यथा- ' शरीरोपचयः कान्तिर्गा-त्राणां सुविभक्तता । दीप्ताग्नित्वमनालस्यं स्थिरत्वं लाघवं मृजा ॥ श्रमकमपिपासोष्णशीतादीनां सहि-ष्णुता | आरोग्यं चापि परमं व्यायामादुपजायते । न चास्ति सदृशं तेन किञ्चित्स्थौल्यापकर्षणम् । व्यायामिनं मर्त्य मदयन्त्यस्यो भयात् । न चैनं सहसाऽऽक्रम्य जरा समधिरोहति । स्थिरी-भवति मांसं च व्यायामाभिरतस्य च ॥ व्यायामक्षुण्णगात्रस्य पद्भ्यामुद्वर्तितस्य च । व्याधयो नोपसर्पन्ति सिंह क्षुद्रमृगा इव ॥ वयोरूपगुणैर्हीनमपि कुर्यात्सुदर्शनम् । व्यायामं कुर्वनो नित्यं विरुद्धमपि भोजनम् । विदग्धमविदग्धं वा निर्दोषं परिपच्यते ॥ ' ( सु. चि. अ. २४ ) । इस प्रकार व्यायाम से लाभ बता कर व्यायाम किसे करना चाहिये यह भी बताया है, यथा-' व्यायामो हि सदा पथ्यो बलिनां स्निग्धभोजिनाम् । स च शीते वसन्ते च तेषां पथ्यतमः स्मृतः ॥ ' ( मु. चि. २४ ) । तथा अन्यत्र भी --- ' अरोगी जीर्णभक्तश्च नरो व्यायाममाचरेत् । नातिपीडाकरो देहे बलवाञ् श्लैष्मिके गदे || व्यायामोष्णशरीरत्वात् स्वेदाच्च प्रविलापिते । ष्मणि श्लैष्मिका रोगा न भवन्ति शरीरिणः । अजीणिनस्त्वामरसौ व्यायामेनाकुलीकृतः । देहे विसर्पञ्जनयेद् रक्तपित्तमयान् गदान् ॥ ' ( चरकोपस्कार् ) । इस प्रकार स्वस्थ मनुष्य को भोजन के रूप से पक जाने पर व्यायाम करना चाहिये, इससे कफजन्य रोग नहीं होते है, यह बता कर अजीर्णावस्था में व्यायाम करने से होने वाली हानि का भी दिग्दर्शन कराया है । किसे व्यायाम नहीं करना चाहिये इस पर सुश्रुत ने बताया है, यथा - ' रक्तपित्ती कृशः शोषी श्वासकासक्षतातुरः । भुक्तवान् स्त्रीषु च क्षीणो भ्रमार्त्तश्च २. ' क्लेशसहिष्णुता ' च. । १. ' स्थैर्यात्मा ' ग. । ११ च ० सं ०

पृष्ठ 255

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१६२ चरकसंहिता विवर्जयेत् ॥ ' ( चि. २४ ) । वाग्भट ने भी कहा है - ' वातपित्तामयी वालो वृद्धोऽजीर्णी न तं त्यजेत् । ' ( अ.हृ.सू. २ ) । * श्रमःकुमः क्षयस्तृष्णा रक्तपित्तं प्रतामकः । अतिव्यायामतः कासो ज्वरश्छर्दिश्च जायते ॥३३ ॥

अधिक व्यायाम से हानि - मात्रा से अधिक व्यायाम करने से थकावट, क्लम, रसादि धातुओं का क्षय, प्यास की अधिकता, रक्तपित्त रोग, प्रतमक श्वास, कास, ज्वर और वनन रोग हो जाते है | विमर्श - सुश्रुत ने अति व्यायाम से इन रोगों की उत्पत्ति मानी है, यथा - ' क्षयतृष्णाऽरुचि-च्छर्दिरक्तपित्तभ्रमकुमाः । कालशोपज्वरश्वासा अतिव्यायामसम्भवाः ॥ ( चि. अ. २४ ) तथा इनकी सामान्य चिकित्सा इस प्रकार बतलायी है -- ' येऽतिव्यायामनो रोगा मानवानां भवन्ति हि । घृत-मांसरसक्षीरबस्तिभिस्तानुपाचरेत् ॥ ' ( चरकोपस्कार ) । उपर्युक्त श्लोक में ' कुम ' शब्द आया हुआ है जिसका अर्थ है विना श्रम किए हुये थकावट होना, जैसा कि निम्नांकित परिभाषा से स्पष्ट होगा, यथा - ' योऽनायासः श्रमो देहे प्रवृद्धः श्वासवर्जितः । क्लमः स इति विज्ञेय इन्द्रियार्थ-प्रबाधकः ॥ ' ( सु. शा. अ. ४ ) । ( स्वेर्दागमः श्वासवृद्धिर्गात्राणां लाघवं तथा । हृदयाद्युपरोधश्च इति व्यायामलक्षणम् ॥१ ॥ )

( व्यायाम के लक्षण - स्वेद का निकलना, श्वास की वृद्धि, शरीर के प्रत्येक अङ्ग में लघुता, हृदयादि प्रदेश में बाधा ( हृदय गति का तीव्र होना ), ये व्यायाम के लक्षण हैं ॥ १ ॥ )

व्यायामहास्यभाव्याध्वग्राम्यधर्मप्रजागरान् । नोचितानपि सेवेत बुद्धिमान तिमात्रया ॥३४ ॥

एतानेवंविधांश्चान्यान् योऽतिमात्रं निषेवते । गजं सिंहं इवाकर्षन् सहसा स विनश्यति ॥३५ ॥

निम्नांकित का अधिक सेवन न करें - व्यायाम, हँसना, अधिक बोलना, रास्ता चलना, मैथुन, जागना आदि कर्म यदि अभ्यास करने से उचित ( सात्म्य ) हो गया हो तो भी बुद्धिमान् व्यक्ति को इनका सेवन अधिक मात्रा में नहीं करना चाहिये । इन कर्मों को तथा इनके समान अन्य कर्मों को जो व्यक्ति अधिक मात्रा में सेवन करता है वह व्यक्ति उसी प्रकार मृत्यु को प्राप्त हो जाता है जैसे हाथी को खींचने से सिंह की मृत्यु हो जाती है ॥ ३४-३५ ॥ विमर्श - हाथी तथा सिंह की उपमा इस तथ्य की तरफ संकेत करती है कि शक्तिशाली व्यक्तियों को भी अति परिश्रम नहीं करना चाहिये । सुश्रुत ने इसका विशेष रूप से वर्णन किया है, यथा - ' न स्वप्नजागरणशयनाशनचक्रमणयानवाह्नप्रधावनलङ्घनप्लवनप्रतरणहास्य भाष्यव्यवायव्या-यामादीनुचितानप्य तिसेवेत ' ( सु. चि. अ. २४ ) तथा वृद्धवाग्भट ने भी इसे स्पष्ट किया है - ' व्यायामजागराध्व स्त्रीहास्य भाष्यादिसाहसम् । गजं सिंह इवाकर्षन् भजन्नति विनश्यति ॥ ' ( अ. सं. सू. अ. ३ ) । ( अतिव्यवायभाराध्वकर्मभिश्चातिकशिताः । क्रोधशोकभयायासैः क्रान्ता ये चापि मानवाः ॥ बालवृद्धप्रवाताश्च ये चोच्चैर्बहुभाषकाः । ते वर्जयेयुर्व्यायामं क्षुधितास्तृषिताश्च ये ॥ २॥ )

( व्यायाम के अयोग्य पुरुष - जो व्यक्ति अधिक मैथुन, अधिक भारवहन, अधिक रास्ता चलने से अधिक कुश हो गये हैं तथा क्रोध, शोक, भय और परिश्रम से आक्रान्त हैं एवं बालक, वृद्ध और प्रबल वात प्रकृति वाले, उच्चस्वर से बहुत बोलने वाले, भूख, एवं पिपासा से १. योगीन्द्रनाथसेनसंमनोऽयं पाठः । २. ‘ गजः सिहमित्राकर्षन् ' ग. । ' सिंहः विल स्वल्पप्रमाणः स्ववलोद्रेकाद्गजं कर्षन् पाययन् स्वदे-हानुचित व्यायामात् पश्चादानोमेण विपद्यते, तेनायं दृष्टान्तः संगतार्थः ' इति चक्रः । ३. योगीन्द्रनाथसेन संमतोऽय पाठः ।

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नवेगान्धाररणीयाध्यायः ७ ] सूत्रस्थानम् १६३ पीड़ित हैं ऐसे व्यक्तियों को व्यायाम नहीं करना चाहिये । ये दो अधिक श्लोक योगीन्द्रनाथ सेन के अनुसार चरकसंहिता में पठित है ॥ १-२ ॥ ) * उचितादहिताद्धीमान् क्रमशो विरमेन्नरः । हितं क्रमेण सेवेत क्रमश्चात्रोपदिश्यते ॥ ३६ ॥

प्रक्षेपापचये ताभ्यां क्रमः पादांशिको भवेत् । एकान्तरं ततश्चोर्ध्वं द्व्यन्तरं त्र्यन्तरं तथा ॥३७ ॥

( ४ ) हिताहित के सेवन तथा त्याग - विधि का वर्णन ( Method of Gradual Acquirement of Wholesome and Withdrawal of Unwholesome Habits ) क्रमशः त्याग या क्षेत्रन का एवं उसकी विधि का वर्णन ( पादांशिक का वर्णन ) - • बुद्धिमान् मनुष्यों के लिए यह उचित है कि यदि अभ्यास से अहितकारी वस्तु उचित ( सात्म्य ) हो गयी हो तो भी उससे क्रमशः विरत हो जाय अर्थात् क्रमशः उसे छोड़ दे और उस अहित सात्म्य के स्थान पर हितकर वस्तुओं का क्रमशः सेवन करे । अहितकर वस्तुओं के त्याग तथा हितकर वस्तुओं के सेवन का क्रम यहीं पर उपदेश कर रहे हैं । हितकर वस्तुओं का शरीर में प्रक्षेप ( सेवन ) करने में, तथा अहितकर मात्म्य वस्तुओं के अपचय ( त्याग ) करने में पादांशिक क्रम का महारा लिया जाता है और पाढांशिक क्रम के सेवन और त्याग में एक दिन, बाद में दो दिन और किया जाता है ॥ ३६-३७ ॥ - पुनः तीन दिन का अन्तर देकर सेवन और त्याग विमर्श - यहाँ ' पादांशिक ' के सामान्यतः दो अर्थ किये जाते हैं - १. ' पाद एवं अंशः पादांशः, तस्य भावः पादांशिकः ' अथवा ( २ ) ' पादश्चतुर्थो भागस्तद्रूपोंऽशः पादांशः, तेन कृतः क्रमः पादांशिकः । ’ अहित के चौथे भाग से अपचय ( त्याग ) करें और हितकर वस्तु के चौथे भाग से सेवन प्रारम्भ करें । अर्थात् यदि किसी व्यक्ति को अपथ्य यवक ( जई ) आदि प्रति - दिन के अभ्यास से सात्म्य हो गया है तो वह उसका त्याग चौथे भाग से प्रारम्भ करे । जैसे - एक आदमी का पूर्ण आहार आधा सेर है और वह अपथ्य ही खाता है तो उसे अपथ्य का त्याग करते समय प्रथम दिन छह छटांक यवक के आटा का सेवन और दो छटाक गेहूं के आटा या रक्तशालि आदि पथ्य का सेवन करना चाहिये । इस प्रकार पथ्य के एक पाद का अभ्यास करना एकान्तर कहलाता है । दूसरे, तीसरे दिन अपथ्य - जई आदि का दो भाग तथा पथ्य गेहूं, चावल आदि का दो भाग सेवन करना चाहिए इस प्रकार पथ्य के दूसरे पाद का अभ्यास करना द्वयन्तर कहलाता है । चौथे, पाँचवें, छठे दिन अपथ्य जई आदि का एक भाग और पथ्य गेहूं, चावल आदि के तीन भाग का सेवन करना चाहिये । इस प्रकार पथ्य के तीसरे पाद का अभ्यास करना त्र्यन्तर कहलाता है । सातवें दिन से पूरे पथ्य गेहूं, चावल आदि का सेवन किया जाता है । यह बात चक्रपाणि मतानुसार निम्नलिखित कोष्ठक से भी समझिये -एकान्तर अन्तर त्र्यन्तर १ दिन २-३ दिन ४-५-६ दिन ७ दिन १ भाग पथ्य २ भाग पथ्य ३ भाग पथ्य ४ भाग पथ्य ३ भाग अपथ्य २ भाग अपथ्य १ भाग अपथ्य ( पूर्ण पथ्य ) अथवा - चक्रपाणि ने ' अन्तर ' शब्द का दूसरा अर्थ ' व्यवधान ' किया है । उन्होंने यहाँ ‘ तथा ’ शब्द से ' चतुरन्तर ' का भी ग्रहण किया है । इस प्रकार प्रथम दिन अपथ्य यवक आदि का तीन भाग

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१६४ चरकसंहिता तथा पथ्य गेहूं, चावल आदि का एक भाग लेना चाहिये । दूसरे दिन सभी भाग अपथ्य का लेना चाहिए । इस प्रकार पहले दिन का क्रम एकान्तर होता है । तीसरे चौथे दिन आप आ अपथ्य का सेवन करना चाहिए । पांचवे दिन पथ्य का एक भाग, अपथ्य का तीन भाग लेना चाहिए । इस तरह १३ तथा ४ दिन का कम प्रथन्तर होता है । छठे सातवें और आठवें दिन तीन भाग पथ्य का और एक भाग अपथ्य का लेना चाहिए और नवें दिन दो भाग अपथ्य का तथा दो भाग पथ्य का लेना चाहिये । इस प्रकार ६ ८ वें दिन का क्रम अन्तर होता है । दशवें, ग्यारहवें, बारहवें और तेरहवें दिन सभी भाग पथ्य का ही लिया जाता है, चौदहवें दिन तीन भाग पथ्य का और एक भाग अपथ्य का लिया जाता है । इस प्रकार १० १३ वें दिन का क्रम चतुरन्तर होता है । बाद में पन्द्रहवें दिन से तथा आगे सभी भाग पथ्य का ही लेना चाहिए । इस क्रम को निम्नलिखित कोचक से समझना चाहिये-एकान्तर अपथ्य ३ भाग १ दिन पथ्य १ भाग २ भाग पथ्व ९ दिन २ भाग अपथ्य २ दिन सभी अपथ्य दूयन्तर ३, ४, दिन आधे पद और आगे चतुरन्तर १० से १३ दिन सभी पथ्य अपथ्य " भाग अपथ्य १४ दिन ५ दिन पथ्य १ भाग अपथ्य ३ भाग ३ भाग पथ्य १५ दिन से सभी पथ्य त्र्यन्तर ६ से ८ दिन ३ भाग पथ्य और १ भाग अपथ्य योगीन्द्रनाथ सेन ने चरकोपस्कार टीका में प्रथम दिन अपथ्यका १ भाग, दध्य का १ भाग, दूसरे दिन सभी अपय्य, तीसरे दिन २ भाग पथ्य, २ भाग अगध्य, चौथे, पाँचवें दिन मभी अपय छठे दिन ३ भाग पथ्य, १ भाग अपथ्य, सातवें, आठवें, नवें दिन सभी अपथ्य, दशवें दिन से सभी पथ्य का सेवन करना चाहिये, यह बताया गया है, जो कोष्ठक में विशेष रूप से स्पष्ट है । १ दिन एकान्तर २ दिन ३ दिन इयन्तर ४-५ दिन ६ दिन त्र्यन्तर ७-८ - ९ दिन १० दिन १ भाग पथ्य २ भाग पथ्य १ भाग अपथ्य! सभी अपथ्य १३ भाग अपथ्य सभी अपथ्य सभी अपथ्य सभी पथ्य २ भाग अपथ्य ३ भाग पथ्य पर इनका मत युक्तियुक्त नहीं प्रतीत होता हैक्योंकि क्रम से अपध्य का त्यागना और पश्य का सेवन करना यहाँ इष्ट है । इस क्रम में अपथ्य का सेवन व्यन्तर तक बना रहता है । दसवें दिन से सहसा अपथ्य का त्याग होता है अतः यह क्रम हानिकारक हो सकता है । जल्प-कल्पतरु टीका में भी इस मत का खण्डन किया गया है ।

पृष्ठ 258

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नवेगान्धारणीयाध्यायः ७ ] सूत्रस्थानम् १६५ वाग्भट ने - ' पादेन ' से चतुर्थीश और ' पादपादेन ' से षोडशांश का त्याग करना बताया है, ' पादेनापथ्यमस्वस्तं पादपादेन वा त्यजेत् । निषेवेत हितं तद्वदेकद्वित्र्यन्तरीकृतम् ॥ ' ( वा. सू.अ. ७ ) अर्थात् चतुर्थाश विधि से त्याग करना प्रारम्भ करने पर जब रोगी के शरीर में अग्नि की मन्दता, शरीर में गुरुता, अजीर्गता अदि कष्ट होने लगे तो उस व्यक्ति को षोडशांश विधि से त्याग करना चाहिये । इसके अनुसार चरक के पादांश का अर्थ ' पादस्य चतुर्थांशस्य अंशः चतु-थांश: ' अर्थात् चतुर्थांश के चतुर्थाश ( सोलहवें हिस्से ) से त्याग या पथ्य का सेवन प्रारम्भ करना चाहिये । इस षोडशांश त्याग और सेवन क्रम से एक पाद की पूर्ति पर एक अन्तर, दो पाद की पूर्ति पर दो अन्तर और तीसरे पाद की पूर्ति पर ३ अन्तर किया जाना चाहिये । यह क्रम २१ दिन पूर्ण होता है । इसमें २२ वें दिन पूर्ण पथ्य दिया जाता है । ॐ क्रमेणापचिता दोषाः क्रमेणोपचिता गुणाः । सन्तो यान्त्यपुनर्भावमप्रकम्पया भवन्ति च ॥ पादांशिक क्रमविवि से लाभ - क्रम से दूर किए दोषों का शरीर में पुनर्भाव नहीं होता है, और क्रम से शरीर में लाये गए गुण अप्रकम्प्य ( स्थिर ) होते हैं ॥ ३८ ॥

विमर्श - तात्पर्य यह है कि अहित आहार - विहार के अभ्यास से शरीर में जो दोष दुष्ट होते हैं, यदि क्रम से अपथ्य का त्याग कर दिया जाय तो उनका नाश हो जाता है और नष्ट होने पर पुनः उस अपथ्याहार से दूषित दोष की उत्पत्ति और इस प्रकार दुष्ट दोष से रोगों की उत्पत्ति नहीं होती है । इसी प्रकार क्रमशः पथ्य - सेवन से शरीर में जो गुण उत्पन्न होते हैं वह स्थिर हो जाते हैं । समपित्तानिलकफाः केचिद्गर्भादि मानवाः । दृश्यन्ते वातलाः केचित् पित्तलाः श्लेष्मलास्तथा ॥ * तेषामनातुराः पूर्वे वातलाद्याः सदाऽऽतुराः । दोषानुशयिता ह्येषां देहप्रकृतिरुच्यते ॥४० ॥

( ५ ) शारीरिक प्रकृति का वर्णन ( Description of Constitution of Body ) कुछ मनुष्य गर्भ से अर्थात् गर्भाशय में शुक्र शोणित का जब संयोग होता है तभी से सम-पित्त - वात - कफप्रकृति के कुछ वातप्रकृति के, कुछ पित्तप्रकृति के और कुछ कफप्रकृति के होते हैं । इन चार प्रकार की प्रकृतियों में सम - वात - पित्त - कफप्रकृति वाले मनुष्य स्वस्थ और वात, पित्त, कफ से अलग - अलग प्रकृति वाले सर्वदा रोगी रहते हैं । इन अलग - अलग दोषों से बनी प्रकृतियों से दोषों का अनुशय ( जन्मकाल से शरीर में रहने से अनुकूलता ) होने से इसे देहप्रकृति कहा जाता है ॥ ३ ९ -४० ॥ विमर्श -- यहाँ अपथ्य का त्याग तथा पथ्य का सेवन करना बताया गया है । इसका फल स्वस्थ रहना है । स्वस्थ मनुष्य कितने प्रकार के होते है यह बताने के लिए प्रकृत विषय प्रारम्भ किया गया है । यहाँ अलग - अलग वातादि प्रकृतियों का वर्णन करने से द्वन्द्वज प्रकृति का भी ग्रहण किया जाता है । यहाँ केवल चार ही प्रकृतियों का वर्णन किया है किन्तु विमानस्थान के आठवें अध्याय में सात प्रकृतियाँ मानी गई हैं, यथा - ' शुक्रशोणितप्रकृति कालगर्भाशयप्रकृतिं १. ‘ द्रोपस्य दुष्टेरनुशयो गर्भात्प्रभृत्यनुवृत्तिविद्यते यस्य स दोषानुशयी, तस्य भावो दोषानु-शयिता ' गङ्गाधरः । ' दोषः नुशयिता उल्बणवातादि भाविताव्यभिचारिणीति यावत्, देहप्रकृतिर्देह-स्वास्थ्यम्, एतेनैतेषां वातलादीनां मुख्यं स्वास्थ्यं नास्ति, किंतहिं उपचारस्वस्था एते इति दर्श-यति ' चक्रः ।

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१६६ चरकसंहिता मातुराहारविहारप्रकृतिं महाभूतविकारप्रकृतिं च गर्भशरीरमपेक्षते, एना हि येन येन दोषेणाधिकेन समेन वा समनुबध्यन्ते तेन तेन दोषेण गर्भोऽनुबद्ध्यते । ततः सा सा दोषप्रकृतिरुच्यते मनुष्याणां गर्भादिप्रवृत्ता । तस्माच्छ्लेष्मलाः प्रकृत्या केचित् पित्तलाः केचित्, वातलाः केचित्, संसृष्टाः केचित्, समधातवः प्रकृत्या केचिद्भवन्ति । ' ( चरक ) । सुश्रुत ने भी दोनों के अनुसार सात ही प्रकृतियाँ मानी हैं, यथा - ' सप्त प्रकृतयो भवन्ति दोषैः पृथग् द्विशः समस्तैश्च । शुक्रशोणितसंयोगे यो भवेद्दोष उत्कटः । प्रकृतिर्जायते तेन ॥ ' ( सु. शा. अ. ४ ) । इस प्रकार सम वात - पित्त - कफ ( समधातु ) प्रकृति वाले स्वस्थ और एक दोष या दो दोषों की प्रकृति वाले स्वस्थ होते हुए भी अस्वस्थ माने जाते हैं । इसका तात्पर्य यह है किं वातप्रकृति वाले मनुष्य वातवर्द्धक आहार - विहार के सम्पर्क में आने पर शीघ्र ही वातरोग से पीड़ित हो जाते हैं । इसी प्रकार पित्तप्रकृति वाले पित्तवर्द्धक आहार - विहार तथा कफप्रकृति वाले कफवर्द्धक आहार - विहार के सम्पर्क से शीघ्र ही उस दोष के अनुसार रोग से पीड़ित हो जाते हैं । अतः इन एक दोष या दो दोष वाले प्रकृति के पुरुषों को अपने दोषप्रकृति के अनुकूल आहार - विहार से सर्वदा बचना पड़ता है । समधातु प्रकृति वाले सामान्यतः सभी प्रकार के आहार - विहारों का सेवन करते हुए भी रोगी नहीं होते हैं अतः वे स्वस्थ माने जाते हैं । स्वस्थ का लक्षण सुश्रुत ने ऐसा माना है - ' समदोषः समाग्निश्च समधातुमलक्रियः । - प्रसन्नात्मेन्द्रियमनाः स्वस्थ इत्यभिधीयते ॥ ' ( सू. अ. १५ ) । शुक्र- शोणित के संयोगकाल में जिस दोष की प्रधानता होती है उसी के अनुसार प्रकृति वातल, पित्तल तथा श्लेष्मल बनती है । तब दोषाधिक्य होने से इसे स्वस्थप्रकृति नहीं कहना चाहिये; यह एक प्रश्न उठता है । इसका समाधान आचार्य ने इस प्रकार किया है, यथा- ' विषजातो यथा कीटो विषेण न विपद्यते । तद्वत्प्रकृतिभिर्देहस्तज्जातत्वान्न बाध्यते ॥ ' ( सु. शा. अ. ४ ), अर्थात् जैसे विष में उत्पन्न कृमि विष सात्म्य हो जाने के कारण विष से नहीं मरता है वैसे ही वातादि दोष अधिक होने पर भी देह के लिए सात्म्य हो जाने से अधिक रूप में बाधा नहीं करते है, किन्तु अल्पमात्रा में वाधा करते ही हैं अतः इन्हें ' साता ' कहा गया है । * विपरीत गुणस्तेषां स्वस्थवृत्तेविधिर्हितः । समसर्वरसं सात्म्यं समधातोः प्रशस्यते ॥ ४१ ॥

प्रकृति के विरुद्ध गुण का सेवन ही स्वास्थ्यवर्धक होता है - ' सदा आतुर वातादि प्रकृति वाले मनुष्यों को, स्वस्थवृत्त - विधि के नियमानुसार अपने - अपने दोष के विपरीत गुण वाले आहार-विहार का सेवन करना चाहिये तथा समधातु प्रकृति वाले मनुष्यों को सर्वदा सभी रसों का प्रयोग करना और उन्हें सात्म्य बनाना श्रेष्ठ माना जाता है ॥ ४१ ॥

विमर्श - यहाँ ' समसर्वरस ' का उपयोग करना सम प्रकृति वाले मनुष्यों के लिए बताया गया हैं । इसका तात्पर्य यह है कि मधुरादि सभी रसें का प्रयोग करना चाहिए किन्तु जो उस परस्पर विरुद्ध हों जैसे मधुर घृत, मधुर मधु परस्पर विरुद्ध होते हैं, इस तरह के रसों का प्रयोग नहीं करना चाहिये । उसी रस का प्रयोग करना चाहिये जो प्रकृतिसमसमवेत हो । वाग्भट ने भी इसी तात्पर्य से बनाया है — ' नित्यं सर्वरसाभ्यासः स्वस्वाधिक्यनृतावृनौ ' ( सू.अ. ३ ) । यदि वातल प्रकृति का मनुष्य है तो उसे कटुतिक्त - कपाय रसों का प्रयोग विशेष रूप से वर्जिन है । यदि ऋतु और रोग आदि के अनुसार इन रसों का सेवन विहित हो तो अल्पमात्रा में ही उपहोग करना चाहिये, जैसे- ' तस्मात्तपारसमये स्निग्धाम्ललवणान् रसान् । औदकानृपमांसानां मेध्यानामुपयोजयेत् ॥ ' ( सू. अ ' ६ ) के अनुसार हेमन्त ऋतु में स्निग्ध, अम्ल, लवण रस का प्रयोग करने का विधान है तो वात प्रकुति का मनुष्य कटु, तिक्त, कषाय सर्वथा त्याग करते हुए इन रसों का प्रभूत मात्रा में प्रयोग कर सकता हैं । यदि पित्त प्रकृति हैं तो कपाय, तित, स्वादु के साथ सामान्य मात्रा में अम्ल - लवण का प्रयोग कर सकता है । यदि कफप्रकृति का है तो विशेष रूप से कटु - तिक्त - कपाय

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नवेगान्धारणीयाध्याय: ७ ] सूत्रस्थानम् १६७ रस का प्रयोग करते हुए अम्ल लवण का प्रयोग कर सकता है । समप्रकृति वाला पुरुष सभी रसों के साथ अम्ल लवण रसों का प्रधान रूप से प्रयोग कर सकता है । छ द्वे अधः सप्त शिरसि खानि स्वेदेमुखानि च । मलायनानि वाध्यन्ते दुष्टैर्मात्राधिकैर्मलैः ॥ * मलवृद्धिं गुरुतया लाघवान्मलसंक्षयम् । मलायनानां बुध्येत सङ्गोत्सर्गादतीव च ॥ ४३ ॥

( ६ ) निज रोग की उत्पत्ति न होने देने का प्रकरण ( Preventive Methods for Endogenous Diseases ) मलायन ( बाह्यस्रोतस ) तथा मलवृद्धि - क्षय के लक्षण - दो निचले भाग में- गुदा और मूत्र-मार्ग, सात शिरोभाग में दो नेत्र, दो कर्ण, दो नासिकाछिद्र, एक मुखमार्ग तथा स्वेद्रवह मार्ग ( लोमकूप ) इन्हें मलायन ( मलमार्ग ) कहा जाता है । जब दुष्ट होकर मल मात्रा से अधिक हो जाते हैं तब इन मलमार्गों में बाधा पहुँचाते हैं । मलमार्गों में भारीपन आने से तथा मलों के सङ्ग अर्थात् उनके रुक जाने से मलों की वृद्धि का, एवं मलमार्गों में हलकापन आ जाने से तथा मलों का अति उत्सर्ग होने से मलक्षय का ज्ञान करना चाहिये ॥ ४२-४३ ॥ विमर्श - शरीर में साढ़े तीन करोड़ रोमकूप और रोम होते हैं ऐसा स्कन्दपुराण में आया हुआ है - ' तिस्रः कोट्योऽर्द्धकोटिश्च सन्ति रोमाणि मानुषे । तावत्कालं वसेत्स्वर्गे भर्तारं याऽनुगच्छति ॥ ' तथा - ' सन्ति यावन्ति रोमाणि तावन्तो लोमकूपकाः । यहाँ मलवृद्धि का निश्चय ज्ञान करने के लिए मलमार्गों में गुरुता होना यह लक्षण बताया गया है और वृद्धि क्यों होती है इसका उत्तर दिया गया है कि मलों के सङ्ग ( रुकावट ) से वृद्धि होती है । यह कुछ अंशों में ठीक भी है । जैसे बहुते हुए जल को रोक दिया जाय तो, रोके हुए स्थान में जल की वृद्धि देखी जाती है । वैसे ही मल वढ़े और रोक दिए जायें तो उनकी वृद्धि हो जाती है । मलो की रुकावट तब भी सम्भव है जब मल का क्षय हो जाता है । जब मलस्थान में मल की उपस्थिति न रहेगी तब मल बाहर निकलेगा ही कहाँ से, अतः सङ्ग, क्षय का भी बोधक हो सकता है । इसी प्रकार अति उत्सर्ग होना भी वृद्धि का लक्षण है । जब तक मलों की वृद्धि नहीं होगी तब तक वे बाहर अधिक निकलेंगे ही कैसे? अतः गुरुता और अति उत्सर्ग या सङ्ग एक साथ होना वृद्धि का लक्षण है और लघुता के साथ मङ्ग या मलों का अधिक उत्सर्ग होता हो तब मलों का क्षय है - ऐसा अनुमान करना चाहिए । यही अर्थ करना युक्तिसंगत है | वृद्ध वाग्भट ने भी ऐसा ही लिखा है - ' मलानां त्वतिसङ्गोत्सर्गाभ्याञ्च वृद्धिक्षयौ । ' योगीन्द्रनाथ सेन ने अन्वय - व्यत्यास से, सङ्ग से क्षय तथा उत्सर्ग से वृद्धि का ज्ञान करना चाहिए - ऐसी व्याख्या की है पर यह व्याख्या उपरिनिर्दिष्ट युक्ति से रोचक प्रतीत नहीं होती है । अथवा सङ्ग और उत्सर्ग दोनों मलवृद्धि के सूचक है, ' चकार ' से सङ्ग और उत्सर्ग मलक्षय का भी सूचक है । दोनों के विभेदक लक्षण गुरुता और लघुता है | यहाँ केवल ' मात्राधिकैः मलैः ' इस पाठ से वृद्ध दुष्ट दोष का ही ज्ञान होता है पर क्षीण मल भी नलमार्गों में कष्टकारक और विभिन्न रोगोत्पादक होते है अतः क्षीणावा का भी ग्रहण करना चाहिए । इस प्रसंग में चरक का स्रोतो-दुष्टि सम्बन्धी निम्नांकित वचन भी विचारणीय है, यथा- ' अतिप्रवृत्तिः सङ्गो वा सिराणां ग्रन्थोप वा । त्रिमार्गगमनं वापि स्रोतसां दुष्टिलक्षणम् ॥ ' ( च. वि. ५ ) । तान् दोषलिङ्गैरादिश्य व्याधीन् साध्यानुपाचरेत् । व्याधिहेतुप्रतिद्वन्द्वैर्मात्राकालौ विचारयन् ॥ व्याविविपरीत तथा हतुविपरीत चिकित्सा -- उन मलवृद्धि और मलक्षत्र से उत्पन्न रोगों का १. ' स्वेदवहानि ' यो.