चरक संहिता हिन्दी भाष्य — पृष्ठ 261–270

चरक संहिता हिन्दी भाष्य · Chaukhamba · पृष्ठ 261–270

पृष्ठ 261

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१६८ चरकसंहिता दोषों की वृद्धि और क्षय के लक्षणों से ज्ञान कर साध्य रोगों की चिकित्सा मात्रा, काल का विचार कर व्याधि- प्रतिद्वन्द्व ( व्याधिविपरीत ) तथा हेतुप्रतिद्वन्द्व ( हेतुविपरीत और हेतुविपरीतार्थकारी ) औषध तथा आहार - विहार के द्वारा करनी चाहिए ॥ ४४ ॥

विमर्श -- यद्यपि उभयप्रतिद्वन्द्व का नाम यहाँ नहीं लिया गया तथापि अन्यत्र उभयप्रतिद्वन्द्व का भी चिकित्सा में प्रयोग किया गया है अतः व्याविहेतुप्रतिद्वन्द्व ( विपरीत और विपरीतार्थ-कारी ) का भी ग्रहण करना चाहिये । विषमस्वस्थवृत्तानामेते रोगास्तथाऽपरे । जायन्तेनातुरस्तस्मात् स्वस्थवृत्तपरो भवेत् ॥ ४५ ॥

स्वस्थवृत्त का पालन करना चाहिए: - जो व्यक्ति विषमस्वस्थवृत्त है अर्थात् स्वस्थवृत्त के पूर्ण नियमों का पालन नहीं करते हैं उन्हें ये क्षय एवं वृद्धिजन्य रोग और अन्य रोग होते है -इसलिए अनार ( स्वस्थ ) मनुष्य मात्र को स्वस्थवृत्त के नियमों का पालन करना चाहिये ॥ ४५ ॥

विमर्श -- यहाँ ' एते रोगाः ' से मलों ( दोषों ) की वृद्धि - क्षयजन्य रोग लिए जाते हैं । ' अपरे रोगाः ' से मलों ( दोषों ) के संचयजन्य रोग होते हैं, ऐसा समझना चाहिए । स्वस्थवृत्त का पालन करने से यहाँ मलों के वृद्ध होने पर यथासमय संशोधन लेना चाहिए । वृद्ध मलों को संशोधन द्वारा न निकालने से अनेक रोग हो जाते हैं, जैसा कि वृद्ध वाग्भट ने बताया है - ' उनिष्ठेत यथा-कालं मलानां शोधनं प्रति । चयकाष्ठामुपारुह्य कुर्वते ते ह्युपेक्षिताः ॥ प्रायशः सुचिरेणापि भेषजद्वे-षिणो गदान् । अतिस्थौल्याग्निसदनकुष्ठमेहहृतौजसः । स्रोतोरोधाक्षविभ्रंशश्वासश्वयथुपाण्डुताः ॥ '

इत्यादि । ( अष्टा. सं. सू. अ. ५ ) ।

* माधवप्रथमे मासि नभस्यप्रथमे पुनः । सहस्यप्रथमे चैव हारयेद्दोषसञ्चयम् ॥ ४६ ॥

दोषों का निर्हरण - काल: - माधव ( वैशाख ) के प्रथम मास चैत्र में संचित ( कफ का ), नभस्य ( भाद्रपद ) के प्रथम मास श्रावण में ( वात का ), सहस्य ( पौष ) के प्रथम मास अगहन में संचित ( पित्त ) दोषों का निर्हरण करना चाहिये ॥ ४६ ॥

विमर्श - यहाँ क्रम से चैत्र, श्रावण और अगहन में कफ, वात और पित्त का निर्हरण दमन, afer और विरेचन द्वारा करने का संकेत किया गया है जैसा कि कपिलवल का भी विचार है -' मौ सहसि नभसि मासि दोषान् प्रवाहयेत् । वमनैश्च विरेकैश्च निरूहैः सानुवासनैः ॥ ' इसका तात्पर्य यह है कि दोषों के निर्हरण के अनुसार- ' प्रावृट शुचिनभौ यौ शरदूर्जसह पुनः । तपस्यश्च मधुश्चैव वसन्तः शोधनं प्रति ॥ ' ( च. सि. ६ ) । आषाढ़ श्रावण को प्रावृ, कार्तिक अगहन को शर और फाल्गुन चैत्र को वसन्त माना गया है । दो - दो मासों की एक - एक ऋतु होती है । सामान्यतः दोषों के शोधन का नियम - ' हैमन्तिकं दोषचयं वसन्ते, प्रवाहयन् ग्रीष्मजमभ्रकाले । धनात्यये वार्षिक माशु सम्यक प्राप्नोति रोगानृनुजान्न जातु ॥ ' ( च. शा. २ ) । हेमन्त में संचित दोष को वसन्त में, ग्रीष्म में संचित दोष को वर्षा में, वर्षा में संचित दोष को शरद ऋतु में निकालने से ऋतुजन्य रोग नहीं होते हैं । किन्तु हेमन्त में संचित दोष को यदि वसन्त के प्रथम मास फागुन में निकाल दिया जाय तो पुनः चैत्र में कुपित होने का भय रहता है अतः चैत्र में निकालने का विधान है । ग्रीष्म में संचित दोष का निर्हरण प्रावृ ( वर्षा ) के प्रथम मास आषाढ़ में किया जाय तो पुनः श्रावण में कुपित होने का भय रहता है अतः श्रावण में निकालने का विधान है । वर्षा में संचित १. ' माधवो वैशाखस्तस्य प्रथमश्चैत्रः, एवं नभस्यस्य भाद्रस्य प्रथमः श्रावणः, तथा सहस्यस्य पौषस्य प्रथमो मार्गशीर्षः । वसन्नादीनामन्तमासेषु वमनाद्यभिवानं संपूर्णप्रकोपे भूने निर्हरणोपदे-शार्थं, प्रथमेषु हि मासेषु फाल्गुनाषाढकार्तिकेषु प्रकोप: प्रकर्षप्राप्तो न भवति, चितस्य ह्यसम्यक्-प्रकुपितस्याविलीनस्य सम्यनिर्हरणं न भवति ' इति चक्रः ।

पृष्ठ 262

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नवेगान्धारणीयाध्यायः७ ] सूत्रस्थानम् १६६ दोष का निर्हरण शरद के प्रथम मास कार्तिक में किया जाय तो पुनः अगहन में कुपित होने का भय रहता है अत: अगहन में निकालने का आदेश आचार्य ने दिया है । हरिश्चन्द्र ने यहाँ ' सह ' शब्द ' अकारान्त ' माना है और ' सह ' शब्द के षष्ठी के एकत्रचन में सहस्य बनाया है । ' सह ' शब्द का अर्थ अगहन और उसके प्रथम कानिक में पित्त का निर्हरण करना बताया है । उसी के अनुसार वाग्भट ने भी दोष - निर्हरण - काल बताया है - ' श्रावणे कातिके चैत्रे मासि साधारण क्रमात् । ग्रीष्मवर्षाहिमचितान् बाय्यादीनाशु निर्हरेत् । " वृद्ध वाग्भट ने भी यही क्रम बताया है - ' शीतोष्णवर्षानिचि चैत्रश्रावणकार्तिके । क्रमात् साधारणे श्लेष्मवातपित्तं हरेद्-द्रुतम् ॥ ' पर ऊपर की सकारण व्याख्या से यह युक्तिसंगत नहीं प्रतीत होता है, तथा तीन - तीन मास पर दोपों का निर्हरण करना चाहिये - यह आदेश वाग्भट और वृद्ध वाग्भट दोनों ने दिया है, यथा— कार्तिके श्रावणे चैत्रे मासि साधारणे क्रमात् । वर्षादिसंचितान् दोषांस्त्रिमासान्तरितान् हरेत् ॥ ' तथा -- ' प्रावृट्शरद्वसन्तानां मासे वेनेषु वा हरेत् । साधारणेषु विधिना त्रिमासान्तरितान्मलान् ॥ ' इस प्रकार श्रावण में बात का निर्हरण करने पर कार्तिक दो ही मास पड़ता है, कार्तिक में पित्त का निर्हरण करने पर चैत्र चार मास पड़ता है । तब तो स्वयं अपने नियम से उनका ' वदतो व्याघात ' हो जाता है अतः कार्तिक में शोधन करना युक्तिसंगत नहीं है । चैत्र, श्रवण, अगहन में शोधन करने पर तीन - तीन मास उस मास को छोड़ कर अन्तर पड़ जाता है अतः चरक का क्रम ही अधिक उचित प्रतीत होता है ।1 • स्नेहन, स्वेदन से जिन व्यक्तियों का शरीर * स्निग्धस्विन्नशरीराणामूर्ध्वं चाधश्च नित्यशः । बस्तिकर्म ततः कुर्यान्नस्यकर्म च बुद्धिमान् ॥ यथाक्रमं यथोयोगमत ऊर्ध्वं प्रयोजयेत् । रसायनानि सिद्धानि वृष्ययोगांश्च कालवित् ॥४८ ॥

पञ्चकर्म तथा रसायन - वाजीकरण का प्रयोग -परिष्कृत है उन लोगों के लिए बुद्धिमान् वैद्य वमन, विरेचन और वस्तिकर्म का प्रयोग करें । इन तीनों क्रियायों के बाद नस्यकर्म का प्रयोग करें । इसके बाद कालवित वैद्य यथाक्रम यथायोग्य सिद्ध रसायन और वृष्य ( वाजीकर ) योगों का प्रयोग करें ॥ ४७-४८ ॥ विमर्श - सामान्यतः वमन के बाद विरेचन, विरेचन के बाद वस्तिद्वय, और वस्ति के बाद नस्यकर्म किया जाता है, यह ' यथाक्रम ' का तात्पर्य है । इन पंचकर्मों को सम्पन्न करने वाले अनेक योग है जिनका प्रयोग दोषानुसार, रोगानुसार और देह, सत्त्व, बल, अवस्था आदि का विचार कर किया जाता है । इसके अनुसार जिसके लिए जो औषध योग्य हो उसका प्रयोग करना चाहिए । यह ' यथायोग्य ' का अर्थ है । * रोगास्तथा न जायन्ते प्रकृतिस्थेषु धातुषु । धातवश्चाभिवर्धन्ते जरा मान्द्यमुपैति च ॥४ ९ ॥ पञ्चकर्म तथा रसायन - वाजीकरण से लाभ - ऊपर बताये हुए नियमों का पालन करने से वात, पित्त, कफ, एवं रसादि धातुयें साम्यावस्था में रहती हैं । इस प्रकार धातुओं के प्रकृतिस्थ रहने पर धातु - वैपम्यजन्य रोग नहीं होते । रस - रक्तादि धातुएं उचित शोषण प्राप्त होने से बढ़ती हैं । धातुओं के बढ़ जाने से वृद्धावस्था मन्द हो जाती है अर्थात् अकाल में बुढ़ाई नहीं आती || ४ ९ ||

विधिरेष विकाराणामनुत्पत्तौ निदर्शितः । निजानामितरेषां तु पृथगेवोपदेच्यते ॥ ५० ॥

निज रोगों की अनुत्पत्ति से सम्बन्धित उपसंहार - यह उपर्युक्त विधियाँ इसलिए बतायी गई है कि निज व्याधियों की उत्पत्ति न हो । इतर- आगन्तुक मानसिक आदि रोगों की उत्पत्ति न होने पावे इसकी विधि का अलग ( आगे ) उपदेश करेंगे ॥ ५० ॥

१. ' नस्तकर्म ' यो । २. ' यथायोग्यमत ' च । ३. ‘ चान्तमुपैति ' ग. ।

पृष्ठ 263

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१७० चरकसंहिता ये भूतविषवाय्वग्नि संप्रहारादिसंभवाः । नृणामागन्तवो रोगाः प्रज्ञा तेष्वपराध्यति ॥ ५१ ॥

ईशोकभयक्रोधमानद्वेषादयश्च ये । मनोविकारास्तेऽप्युक्ताः सर्वे प्रज्ञापराधजाः ॥ ५२ ॥

( ७ ) आगन्तुज तथा मानसिक रोगों के हेतु तथा चिकित्सा ( Aetiology & Treatment of Endogenous & Mental Diseases ) आगन्तुज तथा मानसिक रोगों का कारण प्रज्ञापराध - भूत लगने से, विष - भक्षण से, झन्झावात से, अग्नि में जल जाने से तथा आघात लगने से होने वाले आगन्तुक रोग और ईर्ष्या, शोक, भय, क्रोध, अहंकार और द्वेष आदि मन के विकार ( मानसिक रोग ), ये सभी प्रज्ञापराध से ही उत्पन्न माने जाते हैं ॥ ५१-५२ ॥ विमर्श - ' समं बुद्धिहिं पश्यति ' अर्थात् जो वस्तु जैसी है उसे ठीक उसी रूप में समझना बुद्धि का कार्य है । यदि वस्तु की जानकारी ठीक रूप में न हो तो बुद्धि का दोष माना जाता है । संक्षेप में बुद्धि, धैर्य, स्मरणशक्ति के नष्ट या विकृत हो जाने से मनुष्य जो अनुचित कार्य करते हैं वे सभी प्रज्ञापराधजन्य माने जाते हैं, यथा- ' धीधृतिस्मृतिविभ्रष्टः कर्म यत्कुरुतेऽशुभम् । प्रज्ञापराधं तं विद्यात्सर्वदोषप्रकोपकम् ॥ ' ( च. शा. अ. १ ) । तात्पर्य यह है कि आगन्तुक तथा मानसिक रोग प्रज्ञापराध से ही होते हैं । * त्यागः प्रज्ञापराधानामिन्द्रियोपशमः स्मृतिः । देशकालात्मविज्ञानं सद्वृत्तस्यानुवर्तनम् ॥ आगन्तूनामनुत्पत्तावेष मार्गों निदर्शितः । प्राज्ञः प्रागेव तत् कुर्याद्धितं विद्याद्यदात्मनः ॥५४ ॥

आगन्तुक रोगों को अनुत्पत्ति का उपाय - प्रज्ञापराधों का त्याग करना, इन्द्रियों में शान्ति-भाव रखना, अर्थात् इन्द्रियों को अपने वश में रखना, स्मरणशक्ति ठीक रखना, देश, काल और अध्यात्म - ज्ञान का चिन्तन करना और सद्वृत्त का पालन करना, ये सभी आगन्तुक रोगों के उत्पन्न न होने देने का मार्ग है । वुद्धिमान् व्यक्ति को रोगोत्पत्ति होने से पहले ही ऐसे कार्य करने चाहिये जिनसे अपना हिन हो सके ॥ ५३-५४ ॥ * आप्तोपदेशप्रज्ञानं प्रतिपत्तिश्व कारणम् । विकाराणामनुत्पत्तावुत्पन्नानां च शान्तये ॥५५ ॥

आप्तोपदेश - पालन से लाभ आप्त पुरुषों के उपदेशों का प्रज्ञान ( विशेष रूप से ज्ञान करना ) और ज्ञान कर उसके अनुसार प्रतिपत्ति करना ( ठीक प्रकार से उसका पालन करना ), ये दो कारण मनुष्यों को रोगों को उत्पत्ति से बचाते हैं और उत्पन्न रोगों को शीघ्र ही शान्त करते है ॥ ५५ ॥

ॐ पापवृत्तवचःसत्त्वाः सूचकाः कलहप्रियाः । मर्मोपहासिनो लुब्धाः परवृद्धिद्विषः शठाः ॥५६ ॥

परापवादयश्चपला रिपुसेविनः । निर्घृणास्त्यक्तधर्माणः परिवर्ज्या नराधमाः ॥ ५७ ॥

साथ न करने योग्य पुरुष - वृत्त ( कार्य, आचरण ), वचन और मन से पापमय, चुगलखोर, कलहप्रिय ( झगड़ाल ), मर्मवेधी उपहास करने वाले, लोभी, दूसरे की उन्नति देख कर सहन न कर सकने वाले शट ( धूर्त ), दूसरे की निन्दा करने में ही तत्पर, चञ्चल, अपने शत्रु की सेवा में संलग्न, दयारहित तथा अपने धर्म को छोड़ देने वाले अथम मनुष्यों का साथ नहीं करना चाहिए ॥ ५६-५७ ॥ १. ‘ आप्तोपदेशः प्रज्ञानन् ' इति पा | ' आप्तानामुपदेशस्य प्रकर्षेण ज्ञानं प्रतिपत्तिरुपदिष्टार्थस्य सम्यगववोथः ’, चक्रः । ‘ आप्तोपदेशः प्रज्ञानां प्रतिपत्तिश्च ' ग. । ' प्रज्ञानां प्रमाणमिडानां बुद्धीनां कर्त्रीणां प्रतिपत्तिः प्रनीतिः प्रमदा बुद्धया यत् प्रतिपद्यते सा गङ्गावरः । २. ' परनारीप्रवेशिनः ' यो ।

पृष्ठ 264

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नवेगान्धारणीयाध्यायः ७ ] सूत्रस्थानम् १७१ बुद्धिविद्यावयःशीलधैर्य स्मृतिसमाधिभिः । वृद्धोपसेदिनो वृद्धाः स्वभावज्ञा गतव्यथाः ॥ सुमुखाः सर्वभूतानां प्रशान्ताः शंसितव्रताः । सेव्याः सन्मार्गवक्तारः पुण्यश्रवणदर्शनाः ॥५ ९ ॥ साथ करने योग्य पुरुष जो पुरुष बुद्धि, विद्या, अवस्था, शील, धीरता, स्मरणशक्ति और समाधि में वृद्ध ( अर्थात् श्रेष्ठ ), वृद्धजनों की सेवा करने वाले, दूसरे के स्वभाव को जानने वाले, शारीरिक एवं मानसिक दुःखों से रहित या शंकारहित, सुमुख तथा शान्त हों, जो कहते हों उसका सर्वथा पालन करते हों, प्राणिमात्र को अच्छे मार्गों का उपदेश करते हों और जिनकी गाथा सुनने से तथा जिनका दर्शन करने से पुण्य होता हो ऐसे महापुरुषों का साथ करना चाहिए ॥ & आहाराचारचेष्टासु सुखार्थी प्रेत्य चेह च । परं प्रयत्नमातिष्ठेद् बुद्धिमान् हितसेवने ॥६० ॥

सदा हित सेवन करना चाहिये - इस संसार में और मरने के बाद सुख की इच्छा रखने वाले बुद्धिमान् पुरुष को चाहिए कि वह आहार, आचार और सभी प्रकार की चेष्टाओं में हित-कारक वस्तु के सेवन में अधिक प्रयत्न करे ॥ ६० ॥

* न नक्तं दधि भुञ्जीत न चाप्यष्टतशर्करम् । नामुद्गयूषं नाक्षौद्रं नोष्णं नामलकैविनी ॥ ६१ ॥

उदाहरणार्थं दधि का प्रकरण - रात्रि में दधि नहीं खाना चाहिए, बिना घी, बिना चीनी, बिना मूँग की दाल, बिना मधु, गरम करके, और बिना आँवला मिलाए हुए दही नहीं खाना चाहिए ॥ ६१ ॥

विमर्श - कुछ लोग केवल दधि का सेवन रात्रि में मना करते हैं पर रात्रि में भी घृत, चीनी, मूँग की दाल, मधु, आँवला, इनमें किसी एक का मिश्रण कर खा सकते है, ऐसा कुछ लोग कहते हैं किन्तु यह अर्थ युक्तिसंगत नहीं है क्योंकि - ' अलक्ष्मीदोषयुक्तत्वान्नक्तं तु दधि वर्जितम् । श्लेष्मलं स्यात् ससर्पिष्कं दधि मारुतसूदनम् ॥ ' ( चरके क्वचिदधिकः पाठः ) यहाँ पर अलक्ष्मी दोषयुक्त होने से रात्रि में दधि खाना सर्वथा निषिद्ध है । यदि केवल दधि का सेवन किया जाय तो वह कफकारक होता है इसीलिए केवल दधि का खाना निषिद्ध है । केवल दधि खाना पित्त को अर्थात् अग्नि को तीव्र नहीं करता, इससे आहार का पाचन नहीं होता । जतुकर्ण ने भी - ' नाश्नीयाद्दधि नक्तमुष्णं वा ' ऐसा अलग पाठ कर - ' न घृतमधुशर्करामुद्गामल कैर्विना ', ( चक्र ० ) से दिन में केवल दधि खाना और रात्रि में तो सर्वधा मना किया है । सुश्रुत में दधि का सेवन ऋतु के अनुसार भी मना किया गया है यथा - ' शरद् ग्रीष्मवसन्तेषु प्रायशो दविगर्हितम् । हेमन्ते शिशिरे चैव, वर्षातु दधि शस्यते ॥ ' ( नु. सू. अ. ४५ ) । इसका प्रधान कारण यह माना जाता है कि दवि स्वभाव से अभिष्यन्दि होता है जिससे कफ को अधिक मात्रा में बढ़ाता है, रात्रि भी स्वभाव से कफवर्धक होती है, दोनों का संयोग होने पर कफ की मात्रा इतनी अधिक बढ़ जाती है कि अनेक प्रकार के रोग हो जाते है, जिनका विवरण आगे के श्लोक से स्पष्ट होता है । चक्रपाणि ने केवल रात्रि में गरम दधेि का सेवन निषिद्ध किया है और घृत इत्यादि के साथ रात्रि में भी दविसेवन का विधान बताया है । इसी स्थान के आठवें अध्याय में सद्वृत्त का वर्णन करते हुए आचार्य ने ' न नक्तं दधि भुजीन ' से रात्रि में दधि खाने का सर्वथा निषेध किया है । ज्वरासृक्पित्तवीसर्पकुष्ठपाण्ड्वामयभ्रमान् । प्राप्नुयात् कामलां चोग्रां विधिं हित्वा दधिप्रियः ॥ दधिसम्बन्धी उपसंहार I दधि खाने के जो नियम बताये गये है उन नियमों को छोड़कर १. अस्याग्रे – ' अलक्ष्मीदोपयुक्तत्वान्नक्तं तु दधिवर्जितम् । श्लेष्मलं स्यात् ससर्पिष्कं दविमारत-सूदनम् ॥ न च संधुक्षयेत् पित्तमाहारं च विपाचयेत् । शर्करा संयुतं दद्यात्तृष्णादाहनिवारणम् ॥ मुद्ग-सूपेन संयुक्तं दद्याद्रक्तानिलापहम् । सुरसं चाल्पदोपं च क्षौद्रयुक्तं भवेद्दथि ॥ उष्णपित्तास्रकृद्दोषान्__ धात्रीयुक्तं तु निर्हरेत् ॥ ' इति कचिदधिकः पाठो लभ्यते ।

पृष्ठ 265

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१७२ चरकसंहिता मनमाने ढंग से दधि खाने वाले मनुष्यों को ज्वर, रक्तपित्त, वीसर्प, कुष्ठ, पाण्डु, श्रम और कामला रोग उत्पन्न हो जाते हैं ॥ ६२ ॥

तत्र श्लोकाः-वेग वेगसमुत्थाश्व रोगास्तेषां च भेषजम् । येषां वेगा विधार्याश्च यदर्थं यद्विता हितम् ॥६३ ॥

उचिते चाहिते वर्ज्ये सेव्ये चानुचिते क्रमः । यथाप्रकृति चाहारो मलायनगदौषधम् ॥६४ ॥

भविष्यतामनुत्पत्तौ रोगाणामौषधं च यत् । वर्ज्याः सेव्याश्च पुरुषा धीमताऽऽत्मसुखार्थिना ॥ विधिना दधि सेव्यं च येन यस्मात्तदत्रिजः । नवेगान्धारणेऽध्याये सर्वमेवावदन्मुनिः ॥६६ ॥

इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते सूत्रस्थाने स्वस्थवृत्तचतुष्के नवेगान्धारणीयो नाम सप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥

अध्यायगतविषय का उपसंहार - आत्रेय मुनि ने इस ' नवेगान्धारणीय ' अध्याय में वेग, वेगों को रोकने से उत्पन्न होने वाले रोग और उनकी चिकित्सा, धारणीय वेग, व्यक्तिभेद से हितकर और अहितकर वस्तुओं का वर्णन, चिर अभ्यस्त अहित वस्तुओं के त्याग और अनभ्यस्त हितकर वस्तुओं के सेवन का क्रम, प्रकृति के अनुसार आहार का सेवन, मलमार्ग तथा उनमें होने वाले रोगों की चिकित्सा रोग उत्पन्न न हो सकें इसके लिए विभिन्न विधियों का वर्णन, उत्पन्न हुए रोगों की सामान्य औषधि, सुख चाहने वाले बुद्धिमान पुरुषों के लिये असंगति और संगति के योग्य पुरुषों का परिगणन तथा सकारण दधिसेवन की विधियों का उल्लेख किया है ॥ ६३-६६ ॥ चरक के द्वारा प्रतिसंस्कृत अग्निवेशकृत तन्त्र ( चरकसंहिता ) के सूत्रस्थान में स्वस्थचतुष्क-विषयक ' नवेगान्धारणीय ' नामक सातवाँ अध्याय समाप्त हुआ । अथाष्टमोऽध्यायः अथात इन्द्रियोपक्रमणीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥

इति ह स्माह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥

अब इसके बाद ' इन्द्रियोपक्रमणीय ' नामक अध्याय की व्याख्या की जायगी जैसा कि भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥ १-२ ॥ विमर्श - स्वस्थवृत्तचतुष्क का उपसंहार करने से पहले अस्वास्थ्य के मूल कारण असात्म्येन्द्रि-यार्थ - संयोग की व्याख्या आवश्यक है जिसमें इन्द्रिय तथा इन्द्रियार्थं क्या वस्तु है यह बताने के लिए पहले यह जानना आवश्यक है कि आहार, आचार तथा चेष्टायें इन्द्रियों के ही अधीन हैं अतः सर्वप्रथम इन्द्रिय - सम्बन्धि - ज्ञान करना अत्यन्त आवश्यक है । यह अध्याय ' स्वस्थवृत्तचतुष्क ' का उपसंहारात्मक अध्याय है क्योंकि आहार - विहार तथा चेष्टाएँ ही स्वस्थवृत्त के मुख्य विषय है और ये विषय इन्द्रियाधीन होते हैं । * इह खलु पञ्चेन्द्रियाणि पञ्चेन्द्रियद्रव्याणि पञ्चेन्द्रियाधिष्ठानानि पञ्चेन्द्रियार्थाः, पञ्चेन्द्रियो भवन्ति इत्युक्तमिन्द्रियाधिकारे ॥ ३ ॥

( १ ) पञ्चपञ्चक ( Five Pentads ) पञ्चपञ्चक का वर्णन – इस ' इन्द्रियोपक्रमणीय ' अध्याय में १. पाँच ( ज्ञान ) इन्द्रियाँ १. ' धीमता ये सुखार्थिना ' यो ।

पृष्ठ 266

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इन्द्रियोपक्रमणीयाध्यायः ८ ] सूत्रस्थानम् १७३ ( श्रोत्र, स्पर्शन चक्षु, रसन घ्राण, तथा इन्द्रियाँ ), २. पाँच इन्द्रियों के द्रव्य ( आकाश, वायु, तेज, जल, पृथिवी ), ३. पाँच इन्द्रियों के अधिष्ठान ( स्थान, जैसे - कान, त्वचा, नेत्र, जिह्वा, नासिका ), ४. पाँच इन्द्रियों के अर्थ ( विषय, जैसे- शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध ) और ५. पाँच इन्द्रियों की बुद्धि ( ज्ञान, जैसे – शब्दज्ञान, स्पर्शज्ञान, रूपज्ञान, रसज्ञान और गन्धज्ञान ) इन पाँच पञ्चकों का वर्णन किया गया है । इस प्रकार यह इन्द्रियाधिकार में कहा गया 112 11 विमर्श - ' इह खलु से यह संकेत किया गया है कि आयुर्वेदशास्त्र में इन्द्रियों के विचार-प्रस्ताव में पञ्चपञ्चक का हो वर्णन किया गया है । यद्यपि मन भी छठी इन्द्रिय है पर उसका वर्णन इस प्रस्ताव में नहीं किया गया है । आचार्य ने स्वयं अन्यत्र मन को छठी इन्द्रिय माना है, जैसे - ' मधुरो रसः पडिन्द्रियप्रसादनः ' ( सु. अ. २६ ) । अतः यहाँ केवल प्रत्यक्ष ग्राहक पाँच इन्द्रियों का ही वर्णन किया गया है । मन अतीन्द्रिय है अतः इसका यहाँ परिगणन नहीं किया गया है । यद्यपि पाँचों ज्ञानेन्द्रियाँ भी अतीन्द्रिय है जैसा कि कहा गया है कि जिन इन्द्रियों से प्रत्यक्ष ज्ञान होता है वे इन्द्रियाँ अप्रत्यक्ष है अर्थात् भौतिक इन्द्रियाधिष्ठान प्रत्यक्ष है, उसी से लोक में इन्द्रियों का भी प्रत्यक्ष जाना जाता है । इन्द्रिय शब्द का अर्थ --- ' इन्द्रियमिन्द्रलिङ्ग -मिन्द्रदृष्टमिन्द्रसृष्टभिन्द्रजुष्टमिन्द्रदत्तमिति वा ' ( पाणि. अष्टा. ५-२ - ९ ३ ) । ' इन्द्रस्यात्मनो लिङ्गमनु-मापकम्, इन्द्रेणात्मना दृष्टं, मन चक्षुर्मम श्रोत्रमित्यादिक्रमेण ज्ञानम् । इन्द्रेण ईश्वरेण सृष्टम् । इन्द्रेण जुष्टं वा, इत्याद्यर्थेषु इन्द्राब्दा निपातनात् घः ज्ञानकर्मसाधनम् इनि ' ( शब्दकल्पद्रुमः ) । इस व्युत्पत्ति को जैन, बौद्ध आदि ने भी स्वीकार किया है परन्तु माठरवृत्ति जैसे प्राचीन वैदिक दर्शन-ग्रन्थ में इन्द्रिय शब्द की निरुक्ति इससे भिन्न है, यथा - ' इन् इति विषयाणां नाम, तान् इनः विषयान् प्रति ब्रुवन्तीति इन्द्रियाणि ' ( माठर. का. २६ ) । मूल इन्द्र शब्द का अर्थ ऐश्वर्यवान् होता है । सामान्य रूप से इस व्युत्पत्ति में उसका अर्थ आत्मा लिया जाता है । * अतीन्द्रियं पुनर्मनः सत्त्वसंज्ञकं चेत इत्याहुरेके, तदर्थात्मसंपत्तदायत्तचेष्टं चेष्टाप्रत्यय-भूतमिन्द्रियाणाम् ॥ ४ ॥

मनसम्बन्धी विषय प्रारम्भ - और सत्वसंज्ञक मन अतीन्द्रिय है, इसे कुछ लोग ' चेतः ' कहते हैं । इस मन का व्यापार अपने सुख - दुःखादि विषय और आत्मा की सम्पत् ( श्रेष्ठता ) के अधीन है तथा यह सभी इन्द्रियों की चेष्टाओं का प्रधान कारण है ॥ ४ ॥

विमर्श - मन को अतीन्द्रिय कहा गया है । ' अतीन्द्रिय ' शब्द के दो अर्थ होते हैं, जैसे— ' इन्द्रियातिक्रान्तमिन्द्रियातिरिक्तं वा " अर्थात् १ इन्द्रियों का अतिक्रमण करके अथवा, २. इन्द्रियों से अतिरिक्त | आयुर्वेद शास्त्र में इन्द्रियों को भौतिक कहा गया है, जैसे- ' भौतिकान्यस्मिन् शास्त्रे इन्द्रियाणि । परन्तु ' मन ' को भौतिक नहीं कहा गया । इस प्रकार इन्द्रियातिक्रान्तत्व स्पष्ट है । ' प्रतिनियतविषयकाणीन्द्रियाणि ' अर्थात् प्रत्येक इन्द्रिय का विषय नियत है, जैसे- श्रवण का शब्द, त्वचा का स्पर्श, चक्षु का रूप, रसना का रस, प्राणका गन्ध, परन्तु मन का विषय नियत नहीं है । अर्थात् मन अपने चिन्त्यादि विषयों के साथ - साथ इन्द्रियों के विषय को भी ग्रहण करता है । इसके अतिरिक्त इन्द्रियाँ मन के विना किसी प्रकार अपने विषय के ग्रहण में समर्थ नहीं होतीं । इस १. ' तदिति मनः, तस्यार्थो मनोथेः, स च सुखादिभिश्चिन्त्यविचार्यादिश्वः आत्मा चेतनप्रति-सन्धाता; अनयोः संवत्तदर्थात् एतदायत्ता चेष्टा व्यापारो यस्य तत्तथा । तत्रार्थसंपत् सुखादीनां सन्निकर्षश्चिन्त्यादीनामाभिमुख्यं च, आत्मसंपदर्थंग्रहणे प्रयत्नशालित्वं; मनश्चेष्टा च सुखादिज्ञानं तथा चिन्त्यचिन्तनादि तथा चक्षुरादीन्द्रियप्रेरणं च इन्द्रियाणां चक्षुरादीनां या चेष्टा स्वविषयरूपादिज्ञान-लक्षणा, तत्र प्रत्ययभूतं कारणभूतं मन इति योज्यं ' चक्रः ।

पृष्ठ 267

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१७४ चरकसंहिता प्रकार मन का इन्द्रियातिक्रान्तत्व स्पष्ट है । वृद्ध वाग्भट ने निम्नलिखित सूत्र द्वारा इसे और स्पष्ट कर दिया है- ' अतीन्द्रियं तु मनः सर्वार्थैरन्वयात् तद्योगेन पञ्चेन्द्रियाणामर्थंप्रवृत्तेः बुद्धिकर्मेन्द्रियो-भयकत्वाच्च इति ' । इन्दु ने भी यही कहा है- ' अतीन्द्रियमित्यतिक्रान्तेन्द्रियस्वरूपम् ' अर्थात् इन्द्रिय-स्वरूप को अतिक्रान्त कर जाने के कारण ' मन ' अतीन्द्रिय है । अतिरिक्त इन्द्रियत्व इसमें इस प्रकार है कि यह केवल बुद्धीन्द्रिय ही नहीं किन्तु कर्मेन्द्रिय भी है, क्योंकि यह उभयेन्द्रिय - प्रयोजक है, अतः यह ज्ञानेन्द्रिय तथा कर्मेन्द्रिय दोनों से अतिरिक्त दोनों का प्रयोजक है । ' सत्त्व ' और ' चेतः ' ये दो पर्याय मन के हैं । विभिन्न शब्दों के होते हुए भी एक ही अर्थ का प्रतिपादकत्व जिसमें होता है उसे ' पर्याय शब्द ' कहते हैं, यथा- ' भिन्नानुपूर्वीकत्वे सति एकार्थप्रति-पादकत्वं पर्यायत्वम् । ' मन के व्यापार को उसके अर्थसम्पत् और आत्मसम्पत् के अधीन कहा गया है । इसका तात्पर्य यह है कि मन का व्यापार मन के विषय - रूपादि तथा चिन्त्यादि एवं उसके आत्मसम्पत् प्रयत्न आदि की उपस्थिति में ही संभव है । अर्थात् जब तक रूपादि विषय न हों तथा प्रयत्नादि चेतना के लक्षण नहीं हों तब तक मन का व्यापार संभव नहीं । इसके अतिरिक्त मन को सभी इन्द्रियों की चेष्टा ( व्यापार ) का मूल कहा गया है । इसका अभिप्राय यह है कि रूपादि विषयों की उपस्थिति में चेतना शरीरस्थ मन- इन्द्रियों द्वारा अपने आत्मसम्पत् प्रयत्न आदि व्यापार में समर्थ होता है और इन्द्रियाँ भी जब मनः समधिष्ठित होती हैं तब अपने अर्थ के ग्रहण में समर्थ होती हैं । इसी से मन को इन्द्रियों के व्यापार का मूल ( प्रत्ययभूत ) कहा गया है । महाभारत शान्तिपर्व में कहा गया है कि - ' चक्षुः पश्यति रूपाणि मनसा न च चक्षुषा । ननसि व्याकुले चक्षुः पश्यन्नपि न पश्यति ॥ यथेन्द्रियाणि सर्वाणि पश्यन्तीत्यभिचक्षते । न चेन्द्रियाणि पश्यन्ति मन एवात्र पश्यति ॥ ' * स्वार्थेन्द्रियार्थसङ्कल्पव्यभिचरणाच्चानेकमेकस्मिन् पुरुषे सत्त्वं रजस्तमः सत्त्वगुणयो-गाच्च; न चानेकत्वं, नेह्येकं ह्येककालमनेकेषु प्रवर्तते; तस्मान्नैककाला सर्वेन्द्रियप्रवृत्तिः ॥५ ॥

मन एक है अनेक नहीं - एक पुरुष में सत्त्व ( मन ) यद्यपि अपने चिन्त्य, ऊ आदि भिन्न-भिन्न विषयों से, चक्षु आदि इन्द्रियों के नाना रूपादि विषयों से, संकल्पों से तथा सत्व, रज और तम इन गुणों से अनेक सा दिखाई देता है तथापि वह तात्त्विक दृष्टि से एक ही है और अणु भी है, क्योंकि अणु और एक होने से ही वह एक समय में अनेक विषयों को एक साथ नहीं ग्रहण करता, इसी कारण चक्षु आदि इन्द्रियाँ एक समय में अपने - अपने विषयों को एक साथ नहीं ग्रहण कर पाती हैं ॥ ५ ॥

विमर्श - चिन्त्य, विचार्य, ऊह्य, ध्येय, सङ्कल्प आदि मन के विषय है । इस प्रकार मन तथा इन्द्रियों का विषय एक नहीं अनेक हैं । इन्द्रियाँ मन के अपने अर्थ को कदापि ग्रहण नहीं कर सकतीं । मन एक और अणु परिमाण वाला है । परन्तु व्यभिचार में विषयों के अनेक होने से अनेक प्रतीत होने लगता है । अर्थात् जब मन धर्म की चिन्ता करता है तब धार्मिक मन, जब काम की चिन्ता करता है तब कामा मन, इसी प्रकार रूप ग्रहण के समय रूपग्राहक, गन्धग्रहण के समय गन्धग्राहक आदि परस्पर भिन्न प्रतीत होता है । इसी प्रकार सङ्कल्प में भी समझना चाहिए । साविक मन, राजस मन, तामस मन की भिन्नता भी इसी प्रकार प्रतीत होती है । जैसे— एक ही देवदत्त विभिन्न कार्य करता हुआ विभिन्न नामों से पुकारा जाता है वैसे ही मन भी एक होता हुआ विभिन्न प्रतीत होता है । अतः मन अनेक एवं महत् परिमान वाला नहीं है किन्तु एक और अणु परिमाण वाला है जैसा कि बताया गया है - ' अणुत्वमथ चैकवं गुणौ मनसः स्तुती ' १. ' नाण्वेकं ग. ' न चानेकं ह्येककालं प्रवर्तते ' यो ।

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इन्द्रियोपक्रमणीयाध्यायः ८ ] सूत्रस्थानम् १७५ ( च.शा. १ ) । यदि मन को महत् और अनेक माना जाय तो महत ( व्यापक ) होने तथा अनेक होने से अनेक इन्द्रियों से एक साथ सम्पर्क होने पर एक समय में ही अनेक ज्ञान होना चाहिए पर ऐसा होता नहीं है । अतः मन को अणु परिमाणत्राला तथा एक माना जाता है । महर्षि गौतम ने भी एक समय में एक ही ज्ञान होने के कारण मन को एक ही माना है, यथा - ' ज्ञान्गयौगपद्यादेकं मनः ' ( न्या. द. ३, २, ६ ) । इसी बात का समर्थन महर्षि कणाद ने भी किया है, यथा- ' प्रयत्ना-यौगपद्याज्ज्ञानायौगपद्याच्चैकमिति ' ( वें. द. ३, २, ३ ) । अर्थात् एक समय में एक ही प्रयत्न तथा एक ही ज्ञान होने के कारण मन एक है । श्री विश्वनाथ भट्टाचार्य ने भी अपनी कारिकावली में ज्ञानों के एककालिक न होने से मन को एक और अणु माना है । यद्यपि कक्षा में अध्ययन करता हुआ छात्र एक साथ अध्यापक का अध्यापन सुनता, समझता और लिखता भी है इससे एक काल में अनेक इन्द्रियों की प्रवृत्ति देखी जाती है । पर यह ज्ञान सामान्यतः होता है । जब तल्लीनता के साथ उन उन इन्द्रियों को अपने - अपने विषय में प्रवृत्त कराया जाता है तो ऐसा नहीं होता है, अथवा इन अनेक इन्द्रियों की प्रवृत्ति क्रम से होती है यह प्रवृत्ति इतनी शीघ्र होती है कि एक क्रिया से दूसरी क्रिया का व्यवधान ज्ञान नहीं होता है । चक्रपाणि के अनुसार जैसे कि एक सूआ से १०० कमल के पत्रों को छेदा जाय तो एक पत्र के बाद ही दूसरा पत्र छेदा जाता है पर ज्ञात होता है कि एक साथ सहसा सभी पत्रों को छेदा गया है । तात्पर्य यह है कि जैसे कोनल कमल - पत्रों के छेदन का व्यवधान काल अति सूक्ष्म होता है अतः ज्ञात नहीं होता है उसी प्रकार अध्ययन - काल में छात्र प्रथम सुनता है, तब ज्ञान करता है, तब लिखता है, तब उसे देखता है, इसीलिए लिखते हुए, शब्द सुनने पर भी यदि उसे ठीक ज्ञान नहीं होता है तो लिखना बन्द करना पड़ता है और पुनः अध्यापक से पूछना पड़ता है । इसीलिए ऊपर के सूत्र में बताया गया है कि सभी इन्द्रियों की प्रवृत्ति एक साथ नहीं होती है । इसी आधार पर मन का लक्षण भी आचार्यों ने किया है - ' युगपज्ज्ञानानुत्पत्तिर्मनसो लिङ्गम् ' अर्थात् एक साथ सभी ज्ञानों अर्थात् इन्द्रियों की प्रवृत्ति का न होना ही मन का लक्षण है । यही बात योगवासिष्ठ में भी कही गई है, यथा - ' यथा गच्छति शैलूषो रूपाण्येकस्तथैव हि । मनो नामान्यनेकानि धत्तं कर्मान्तरं व्रजन् ॥ ' अर्थात् जैसे एक ही नट ( बहुरूपिया ) अनेक रूप धारण कर अनेक नामों को प्राप्त करता है पर रहता है वह एक ही, इसी प्रकार भिन्न - भिन्न इन्द्रियों में भिन्न - भिन्न विषयों के संयोग से मन के भी नाम अनेक होते हैं, जैसे -- सात्त्विक मन, राजस मन, तामस मन आदि, पर रहता है वह एक ही । इसी बात को आगे के गद्य से स्पष्ट किया गया है । चयद्गुणं चाभीचगं पुरुषमनुवर्तते सत्वं तत्सत्त्वमेवोपदिशन्ति मुनयो बाहुल्यानुशयत् ॥ बाहुल्य ( अधिकता ) के अनुसार सात्त्विकादि - वर्गीकरण - जिस गुण वाला सत्त्व ( मन ) बार - बार पुरुष पर अनुवर्तन करता है, उस पुरुष के मन को मुनि लोग उसी गुण से युक्त बताते हैं ॥ विमर्श - ' व्यपदेशस्तु भूयसा ' तथा ' उत्कर्षेण व्यपदेश: ' के अनुसार ही नन के सात्त्विक, राजस और तामस नामकरण किये गये हैं । यद्यपि मन त्रिगुणात्मक है पर मनुष्य में जिस गुण विशेष से मन का सान्निध्य होता है उसी के अनुसार उसका नाम पड़ जाता है । यह नामकरण ऋपियों ने ' भूयसा व्यपदेश: ' के आधार पर किया है । १. ' वेन गुणेन सत्त्वादिना युक्तं यद्गुणम्, अभीक्ष्णं पुनःपुनः सत्त्वं मनः, अनुवर्तते अनु-वध्नाति तत्सत्त्वं सात्त्विकं गजसं तामसं वा उपदिशन्ति बाहुल्यानुशयात् भूरिसंवन्धादित्यर्थः । एतदुक्तं भवति - मत्यवि गुणान्तरान्वये सत्त्वबाहुल्याच सत्त्वकार्याणि सत्यच्चचादीनि यस्य भवन्ति स सात्त्विक इति व्यपदिश्यते एवमपरमपि व्याख्येयम् । ' इति चक्रः ।

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१७६ चरकसंहिता * मनःपुरःसराणीन्द्रियाण्यर्थग्रहण समर्थानि भवन्ति ॥ ७ ॥

इन्द्रियों के विषय ग्रहण की प्रक्रिया - • मनःपुरस्सर ( मन के अधीन, मन की प्रेरणा से, मन के साथ -- आगे कर ) इन्द्रियाँ अपने - अपने विषयों को ग्रहण करने में समर्थ होती हैं ॥ ७ ॥

विमर्श - नन का लक्षण शारीरस्थान में यह बताया गया है कि विना मन के आत्मा, इन्द्रिय और विषय के रहते हुए भी ज्ञान नहीं होता है, यथा - लक्षणं मनसो ज्ञानस्याभावो भाव एव च । सति ह्या मेन्द्रियार्थानां सन्निकर्षे न वर्तते । वैवृत्त्यान्मनसो ज्ञानं सान्निध्यात्तच्च वर्तते ॥ ' इससे यह स्पष्ट है कि मन को आगे कर अर्थात् मन के साथ ही इन्द्रियाँ कार्य करने में प्रवृत्त होती है । इसी बात को ' वृहदारण्यकोपनिषद् ' में भी बताया गया है - ' अन्यत्रमना अभूवं नादर्शम्, अन्यत्रमना अभूवं नाश्रौषम्, मनसा ह्येष पयति मनसा शृणोति ॥ ' अर्थात् मेरा मन अन्यत्र था इसलिए मैंने नहीं देखा, मेरा मन अन्यत्र था अतः मैंने नहीं सुना, मन से ही यह आत्मा देखना और सुनता है । तात्पर्य यह है कि नेत्र से रूप का तथा कान से शब्द का सम्पर्क होने के समय, नेत्र और कान से मन सम्बद्ध नहीं था अतः न नेत्र द्वारा रूप देखा गया और न कान द्वारा शब्द सुना गया । * तत्र चतुः श्रोत्रं घ्राणं रसनं स्पर्शनमिति पञ्चेन्द्रियाणि ॥ ८ ॥

( १ ) पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ बताई गई हैं ॥ ८ ॥

- इस प्रकरण में चक्षु, श्रोत्र, त्राण, रसन, स्पर्शन ये पाँच इन्द्रियाँ विमर्श - विषयों के ग्रहण करने के साधनभूत द्वार का नाम इन्द्रिय है । यह बात ' शब्द-स्तोम ' में बनायी गयी है, यथा- ' इन्द्रस्य प्रत्यगात्मनो लिङ्गमनुमापकं तेन दृष्टं मम चक्षुर्मम श्रोत्र-मित्येवमभिमतम्, इन्द्रेम ईश्वरेण सृष्टं प्रणीतं वा इत्यर्थे इन्द्र + वः । ' आत्मनो विपयोपलब्धिकरण-मीश्वन्सृष्टेषु ज्ञानकर्मसाधनेषु चक्षुरादिषु । ' इस प्रकार ' चष्ट रूपं प्रकाशयति बुध्यतेऽनेनेति वा चक्षुः ' रूप का प्रकाश या ग्रहण करने वाली चक्षु इन्द्रिय, ' शृगोत्यनेन श्रोवन ' शब्द को सुनने वाली श्रोत्र इन्द्रिय, ' जिव्रत्यनेन प्राणम् ' गन्ध का ग्रहण करने वाली प्राण इन्द्रिय, स्वनेऽनेनेति रसनम्? रस का ग्रहण करने वाली रसन इन्द्रिय, ' स्पृशत्यनेनेति स्पर्शनम् ' स्पर्श का ग्रहण करने वाली स्पर्शन इन्द्रिय, वे पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ है । कर्मेन्द्रियाँ भी पाँच होती है पर उनका यहाँ ग्रहण नहीं किया गया है क्योंकि प्रधान ये ही पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ है । इन ज्ञानेन्द्रियों में भी सर्वप्रधान चक्षु हैं, यथा — ' चक्षुः प्रधानं सर्वेषामिन्द्रियाणां विदुर्बुधाः । वननीहारयुक्तानां ज्योतिषामिव भास्करः ॥ चक्षुरक्षायां सर्वकालं ननुष्यैर्यलः कर्त्तभ्यो जीविते यावदिच्छा | व्यर्थो लोकोऽयं तुल्यरात्रिन्दिवानां, पुंसामन्धानां विद्यमानेऽपि वित्ते ॥ अतः इन पाँचों में सर्वप्रथम चक्षु का ही ग्रहण किया गया है ।

स्पर्श इन्द्रिय सभी इन्द्रियों में व्यापक है अतः सबके अन्त में पढ़ी गयी है ।

ॐ पञ्चेन्द्रियद्रव्याणि – खं वायुज्र्ज्योतिरापो भूरिति ॥ ९ ॥

( २ ) पाँच ज्ञानेन्द्रियों के पाँच द्रव्य ( मुख्यतः निर्माणवस्तु ) - ख ( आकाश ), वायु, ज्योति ( अग्नि ), अप ( जल ), भू ( पृथिवी ), ये पाँचों इन्द्रियों के क्रमशः पाँच द्रव्य है ॥ ९ ॥

विमर्श - इन्द्रियाँ अहङ्कारिक और भौतिक यह दो प्रकार की मानी जाती है । आकारिक इन्द्रियाँ, जैसे- ' तस्माद्रव्यक्तान्महानुत्पद्यते तलिङ्ग एव तलिङ्गाच महतस्तलिङ्ग एवाहङ्कार उत्पद्यते । स च त्रिविधो वैकारिकस्तैजमो भृतादिरिति तत्र वैकारिकादहङ्कारात् तैजससहायात् नलक्षणान्ये-वैकादशेन्द्रियाण्युत्पद्यन्ते । ' ( नु. शा. अ. १ ) । भौतिक इन्द्रियाँ, जैसे- ' भौतिकानि चेन्द्रियाण्यायुर्वेदे वर्ण्यन्ते तथेन्द्रियाः ' ( सु. शा. अ. १ ) । इन दोनों प्रकार की व्यवस्थाओं को देख कर यहाँ आयुर्वेददृष्ट्या इन्द्रियाँ भौतिक ही मानी गयी है । अतः इन इन्द्रियों की रचना में जिन द्रव्यों का विशेष उपयोग हुआ है उन्हें इन्द्रिय द्रव्य माना जाता है, जैसे शब्द विषय को ग्रहण करने वाली

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इन्द्रियोपक्रमणीयाध्यायः ८ ] सूत्रस्थानम् १७७ श्रवणेन्द्रिय की रचना में शब्दगुणात्मक आकाश द्रव्य का, स्पर्शेन्द्रिय के निर्माण में स्पर्शात्मक वायु का, रूपग्रहणशील चक्षु इन्द्रिय की रचना में रूपात्मक तेज का, रसनेन्द्रिय की रचना में रसात्मक जल द्रव्य का तथा गन्धग्राहक प्राण - इन्द्रिय की उत्पत्ति में गन्धात्मक पृथ्वी का विशेष उपयोग हुआ है । अपने - अपने विषयों को ही इन्द्रियाँ क्यों ग्रहण करती हैं इसका उत्तर सुश्रुत ने सुन्दर ढंग से दिया है, यथा- ' इन्द्रियेगेन्द्रियार्थे हि स्वं स्वं गृह्णाति मानवः । नियतं तुल्ययोनित्वान्नान्येनान्यमिति स्थितिः ॥ ' ( शा. अ. १ ) तथा आगे चल कर सुश्रुत ने शब्दतः पञ्चमहाभूतों से पाँच इन्द्रियों की उत्पत्ति मानी है, यथा - ( १ ) ' आन्तरीक्षास्तु --- शब्दः शब्देन्द्रियं सर्वच्छिद्रसमूहो विविक्तता च । ( २ ) वायव्यास्तु - स्पर्शः स्पर्शेन्द्रियं सर्वचेष्टासमूहः सर्वशरीरस्पन्दनं लघुता च । ( ३ ) तैजसास्तु --- रूपं रूपेन्द्रियं वर्णः सन्तापो भ्राजिष्णुता पक्तिरमर्पस्तैक्ष्ण्यं शौर्य्यं च । ( ४ ) आध्यास्तु - रसो रसनेन्द्रियं सर्वद्रवसमूहो गुरुता शैयं स्लेडचे रेतश्च । ( ५ ) पार्थिवास्तु — गन्धो गन्धेन्द्रियं सर्वमूर्त्तसमूहो गुरुता । ' ( सु.शा. अ. १ ) । इन्द्रियों के भौतिकत्व को स्पष्ट करने के लिए यहाँ पाँच द्रव्यों का उत्पत्ति - क्रम से नाम गिनाया गया है --अर्थात् सृष्टि के आदिकाल में— ' आकाशद्वायुवयोरभिरग्नेरापः अद्भयः पृथिवी । ' इसी क्रम से पञ्चमहाभूत की उत्पत्ति हुई थी

और उसी क्रम से यहाँ भी परिगणन किया गया है ।

* पञ्चेन्द्रियाधिष्ठानानि - अक्षिणी कर्णौ नासिके जिह्वा त्वक चेति ॥ १० ॥

( ३ ) पाँच ज्ञानेन्द्रियों के पाँच अधिष्ठान ( स्थान ) - ( 2 ) दोनों नेत्र, ( २ ) दोनों कान, ( ३ ) दोनों नाक, ( ४ ) जिड़ा, और ( ५ ) त्वचा, ये पञ्चन्द्रियों के पाँच अधिष्ठान ( वास-स्थान ) हैं ॥ १० ॥

विमर्श - - ऊपर बताए हुए अवयव इन्द्रियों के रहने के स्थान हैं । ये अवयव इन्द्रियाँ नहीं हैं किन्तु इन्द्रियों के वासस्थान हैं । ये इन्द्रियाँ अपने इन स्थानों में रहकर विषयों को ग्रहण करती हैं । इन्हें ही इन्द्रिय माना जाय तो वहरे, अन्धे, दुष्ट प्रतिश्याय के रोगी और सुनहरी के रोगी आदि को इन्द्रियों के रहते भी ज्ञान क्यों नहीं होता यह एक विकट प्रश्न हो जायगा । यदि इनको केवल अधिष्ठान माना जाता है तो अधिष्ठान के रहते इन्द्रियों के नष्ट होने पर यों का ज्ञान नहीं होता । इसी आशय से आचार्य ने बताया है - ' रेन वादिन्द्रियैः प्रदक्षमुपलभ्यते । तान्येन सन्ति चाप्रत्यक्षाणि ' ( सू. अ. ११ ) । अतः इन्द्रियाँ अधिष्ठानों से अतिरिक्त है जो सयं

अतीन्द्रिय और अप्रत्यक्ष है ।

* पञ्चेन्द्रियार्थाः - शब्दस्पर्शरूपरसगन्धाः ॥ ११ ॥

( ४ ) पाँच ज्ञानेद्रियों के पाँच अर्थ ( कार्य - विपय ) - ( है २ ) ॥ शब्ड ११, ॥ ( २ ) स्पर्श, ( ३ ) रूप, ( ४ ) रस, ( ' • ) गन्ध ये पाँच इन्द्रियों के पाँच अर्थ ( विषय ) * पञ्चेन्द्रियबुद्ध्य – चतुर्बुद्ध्यादिकाः; ताः पुनरिन्द्रियेन्द्रियार्थसत्वात्मसन्निकर्षजाः,

क्षणिकाः, निश्चयात्मिकाश्च । इत्येतत् पञ्चपञ्चकम् ॥ १२ ॥

इन्द्रिय वुद्धियाँ - चक्षु वृद्धि पाँच मन्द्रियाँ है । ये ( ५ ) पाँच ज्ञानेन्द्रियों की पाँच होती है । बुद्धियाँ इन्द्रिय और इन्द्रियों के अर्थ, मन और आत्मा के सन्निकर्ष ( संयोग ) से उत्पन्न पञ्चपञ्चक ये बुद्धियाँ ( ज्ञान ) क्षणिक और निश्चयात्मिका भेद से दो प्रकार की होती है । इस प्रकार का निर्देश कर दिया गया है ॥ १२ ॥

विमर्श – यहाँ ' बुद्धि ' शब्द ' ज्ञान ' के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है । इन्द्रिय- वुद्धि का अर्थ इन्द्रिय मन - ज्ञान द्वारा है । मन के साथ इन्द्रियाँ अपने - अपने विषयों को ग्रहण करती हैं और अर्थात् यह इस विषय इन्द्रिय से यह विचारित होता है । इस प्रकार मन द्वारा विचार काल में इन्द्रिय - बुद्धि १२ च ० सं ०