चरक संहिता हिन्दी भाष्य — पृष्ठ 271–280

चरक संहिता हिन्दी भाष्य · Chaukhamba · पृष्ठ 271–280

पृष्ठ 271

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१७८ चरकसंहिता विषय ग्रहण किया गया है यह ज्ञान किया जाता है । बाद में इन्द्रिय से गृहीत विषय गुणयुक्त है या दोपयुक्त है । यह गुणयुक्त ही है, या यह दोषयुक्त ही है, यह वात बुद्धि से निश्चय की जाती है जैसा कि आचार्य ने बताया है - ' इन्द्रियेणेन्द्रियार्थो हि समनस्केन गृह्यते । कल्प्यते मनसा तूर्ध्वं गुणतो दोषतोऽथवा ॥ जायते विषये तत्र या बुद्धिर्निश्चयात्मिका । व्यवस्यति तथा वक्तुं कर्त्तुं वा बुद्धिपूर्वकम् ॥ ' ( शा. अ. १ ) । इस वाक्य से अनुमान, स्मृति, भ्रम, संशय आदि का निराकरण किया गया है । यहाँ केवल पाँच बुद्धियों का वर्णन किया गया है पर भिन्न - भिन्न वस्तुओं के संयोग और ज्ञान से ये बुद्धियाँ अनन्त होती है, अर्थात् जितने प्रकार के विषय होंगे उतने ही प्रकार की बुद्धि होगी, जैसे -- चक्षुर्बुद्धि, घटबुद्धि, पटबुद्धि, पुस्तकबुद्धि आदि । इसी प्रकार सभी इन्द्रियों की बुद्धि ( ज्ञान ) के अनुसार उसके अनन्त भेद हो जाते हैं । संक्षेप में पाँच ही बुद्धियाँ होती हैं अर्थात् जो ज्ञान जिस बुद्धीन्द्रिय से सम्पादित होता है उसी नाम से कहा जाता है, जैसा कि आचार्य ने स्वयं कहा है, यथा - ' या यदिन्द्रियमाश्रित्य जन्तोर्बुद्धिः प्रवर्तते । यानि सा तेन निर्देशं मनसा च मनोभवा ॥ ' इन्द्रियसम्बन्धी पञ्चपञ्चक को निम्नांकित कोष्ठक में सुविधा के लिये संग्रह किया गया है: -पञ्च इन्द्रिय इन्द्रिय पञ्चपञ्चक ( Five Pentads of Senses ) पञ्च इन्द्रियद्रव्य पञ्च इन्द्रिय अधि - पञ्च इन्द्रिय- । ( Five Senses ) ( Five Sense-टान ( Five Sense अर्थ ( Five Se. पञ्च इन्द्रियबुद्धि ( Five Sense. Perceptions ) Material s ) १ श्रोत्र ( Hearing ) २ स्पर्शन ख ( आकाश ) Organs ) कर्ण ( दोकान ) nse Objects ) शब्द श्रोत्रबुद्धि ( Hearing वायु ( Ears ) त्वचा ( Skin ) ( Sound ) Centre in Brain ) स्पर्श स्पर्शनबुद्धि ( Touch ( Touching ) ( Touch ) | Centre in Brain ) ३ चक्षु ( Seeing ) ज्योति ( अग्नि ) ४ रसन अप ( जल ) अक्षि ( दो नेत्र ) ( Eyes ) जिह्वा रूप चक्षुर्बुद्धि ( Visual ( Shape ) Centre in Brain ) रस ( Taste ) | सनबुद्धि ( Taste ( Tasting ) ( Tongue ) Centre in Brain ) ५ प्राण भू ( पृथिवी ) ( Smelling ) * नासा ( Nose ) गंध ( Smell ) ) प्राणबुद्धि ( Smell Centre in Brain ) मनो मनोबुद्धिरात्मा चेत्यध्यात्मद्रव्य गुणसंग्रहः शुभाशुभप्रवृत्तिनिवृत्तिहेतुश्च, द्रव्याश्रितं च कर्म, यदुच्यते क्रियेति ॥ १३ ॥

अध्याम द्रव्यगुण - संग्रह ( वर्णन ) - • मन, मन का अर्थ ( विषय ), बुद्धि ( चक्षुबुद्धि, श्रोत्रः बुद्धि, प्राणबुद्धि, रसनावुद्धि, स्पर्शबुद्धि ) और आत्मा, यह अध्यात्म द्रव्य एवं गुणों का संग्रह है । ये अध्यात्म द्रव्य शुभ और अशुभ विषयों की प्रवृत्ति और निवृत्ति में हेतु है । इसी प्रकार द्रव्य ( आत्मा ) के आश्रित कर्म भी शुभ और अशुभ कर्मों में प्रवृत्ति एवं निवृत्ति में कारण हैं । यहाँ कर्म से क्रिया का ग्रहण किया जाता है ॥ १३ ॥

*. अंग्रेजी के तत्सम शब्द का अभाव हैं । Ether ( आकाश ), Air ( वायु ) ete आयुर्वेदिक वैज्ञानिकों को अमान्य हैं । १. ' तत्र द्रव्याश्रितं कर्म ' ग. ' द्रव्याश्रितं कर्म यदुच्यते सा क्रियेति ' यो ।

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इन्द्रियोपक्रमणीयाध्यायः ८ ] सूत्रस्थानम् १७६ विमर्श - मन और आत्मा यह दो अध्यात्म द्रव्य हैं और मन का विषय, चक्षुबुद्धि आदि पाँच अध्यात्म गुण हैं । ये ही शुभ - अशुभ कर्मों में मनुष्य को प्रवृत्त कराते है । अर्थात् जब ये रज और तम गुणभूयिष्ठ होते हैं तो अशुभ कर्मों में और सत्त्वगुणप्रधान होते हैं तो शुभ कर्मों प्रवृत्ति और अशुभ कर्मों से निवृत्ति कराते हैं । यहाँ पर कर्म शब्द से पञ्चकर्म या धर्माधर्म का ग्रहण किया जाता है । जिस प्रकार अध्यात्म द्रव्य और गुण शुभाशुभ की प्रवृत्ति और निवृत्ति में कारण होते हैं, उसी तरह अध्यात्म कर्म भी कारण होते है । जो द्रव्य ( अध्यात्म द्रव्य ) आत्मा और मन के आश्रित है वह भी शुभाशुभ की प्रवृत्ति और निवृत्ति में कारण है । यद्यपि विमान-स्थान के आठवें अध्याय में क्रिया से निष्पन्न वस्तु को कर्म माना है पर यहाँ पर कर्म से क्रिया का ग्रहण किया जाता है । इसका संकेत ' कर्त्तव्यस्य क्रिया कर्म के द्वारा इसी स्थान के पहले अध्याय में कर दिया गया है । तात्पर्य यह है कि आगे जो सद्वृत्त - निरूपण किया जायगा, उसका पालन करना मनुष्यमात्र का कर्त्तव्य होता है । उसकी अनुष्ठानरूपी क्रिया को अध्यात्म कर्म कहा जाता है । * तत्रानुमानगम्यानां पञ्चमहाभूतविकार समुदायात्मकानामपि सतामिन्द्रियाणां तेजश्चक्षुषि, खं श्रोत्रे, घाणे क्षितिः, आपो रसने, स्पर्शनेऽनिलो विशेषेणोपपद्यते; तत्र यद्य-दात्मकमिन्द्रियं विशेषात्तत्तदात्मकमेवार्थमनुगृह्णाति तत्स्वभावाद्विभुत्वाच्च ॥ १४ ॥

इन्द्रिय - भेद से उनमें महाभूतों का आधिक्य तथा उनके अपने ही विषय ग्रहण में हेतु -अनुमान के द्वारा ज्ञात करने योग्य सम्पूर्ण इन्द्रियार्थं यद्यपि पञ्चमहाभूतों के परिणाम के ही समुदायरूप है फिर भी विशेषरूप से चक्षु में तेज, श्रोत्र में आकाश, घाण में पृथ्वी, रसन में जल और स्पर्शन में वायु रहता है । एक - एक महाभूत एक - एक इन्द्रिय में प्रधान होता है और वह इन्द्रिय जिस - जिस महाभूत से बनी होती है उसी उसी महाभूत के अर्थ ( विषय ) की ओर दौड़ती है अर्थात् उन उन महाभूतों के विषयों को ग्रहण करती है, क्योंकि उन उन इन्द्रियों का यह स्वभाव होता है और विभु होने के कारण भी इन्द्रियाँ अपने विषयों को ग्रहण करती हैं ॥ १४ ॥

विमर्श - यहाँ विभु का अर्थ शक्तिसम्पन्न है अर्थात् इन्द्रियों में यह शक्ति है कि वह अपने-अपने विषयों को ग्रहण करें । इन्द्रिय स्वयं अप्रत्यक्ष होती है क्योंकि उसे अतीन्द्रिय माना गया है, है कि इन्द्रिय कोई वस्तु है । अतः केवल उसके कार्य - कलाप को देख कर ही अनुमान किया जाता इसे आचार्य ने शारीरस्थान के पहले अध्याय में इसी प्रकार बताया है - ' एकैकाधिकयुक्तानि खादीनामिन्द्रियाणि तु । पञ्चकर्मानुमेयानि येभ्यो बुद्धिः प्रवर्तते ॥ ' अनुमान का स्वरूप - ' चक्षु-र्बुद्वयादयः करणसाध्याः क्रियात्वात् छिदिक्रियावत् । स चायं तस्मात्तथा ॥ ' अर्थात् चक्षुर्बुद्धि, श्रोत्रबुद्धि, प्रागवुद्धि, स्पर्शनवुद्धि, रसनबुद्धि ( ज्ञान ) करणसाध्य है ( प्रतिज्ञा ), क्योंकि क्रिया है ( हेतु ), छेदन - क्रिया की तरह, जहाँ जहाँ क्रिया होती है वहाँ वहाँ करणसाध्य ही होता है जैसे लकड़ी का कटना, काटना यह क्रिया किसी आरा, गड़ाँसा आदि करण ( सामग्री ) से ही निष्पन्न होती हैं ( उदाहरण ), यहाँ भी ज्ञान क्रिया वैसे ही है ( उपनय ), इसलिए चक्षु आदि इन्द्रियाँ है ( निगमन ) । इस प्रकार पञ्चावयव वाक्य द्वारा अनुमान किया जाता हैं । इन्द्रियाँ सूक्ष्म, अतीन्द्रिय और आवरणयुक्त हैं अतः उनका प्रत्यक्ष ज्ञान सम्भव नहीं है । उनकी जगत् में कोई उपमा नहीं है अतः उपमान प्रमाण द्वारा भी उनका ज्ञान सम्भव नहीं है । अतः इन्द्रिय- ज्ञान को आचार्य ने अनुमान -गम्य ही माना है । पञ्चमहाभूत - समुदायात्मक होती हुई भी इन्द्रियाँ एक - एक महाभूत से विशेष सम्बन्धित होती हैं अतः उन महाभूतों के गुणों को ग्रहण करती हैं । इसे अन्यत्र भी स्पष्ट किया गया यथा — ‘ खं श्रोत्रे स्पर्शने वायुर्दर्शने तेज उत्कटम् । सलिलं रसने भूमिर्घाणे

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१८० चरकसंहिता तज्ज्ञैर्निरूपितम् ॥ ' इस प्रकार आप्तोपदेश द्वारा इन्द्रियों में एक - एक महाभूत की विशिष्टता दिखायी गयी है । ' कारणगुणाः कार्यगुणानारभन्ते ' इस नियम के अनुसार जो गुण कारण में होता है वह गुण कार्य में भी पाया जाता है अतः तेज से चक्षु की उत्पत्ति है और तेज से ही रूप का प्रकाश होता है । चक्षु से भी रूप के प्रकाश ( ज्ञान ) का ग्रहण होता है । इसे अनुमान द्वारा भी सिद्ध किया जा सकता है, जैसे — ' रूपोपलब्धिसाधनमिन्द्रियं चक्षुः तच्च तैजसम् रूपादिषु पञ्चसु विषयेषु मध्ये रूपस्यैवाभिव्यञ्जकत्वात् प्रदीपवत् । ' रूप की उपलब्धि ( ज्ञान ) का साधन ( उपाय ) नेत्र है । वह तेज से उत्पन्न है, क्योंकि रूपादि पाँचों महाभूतों में से वह केवल रूप का ग्रहण करता है, जैसे तेज से दीप का निर्माण होता है और वह रूप का प्रकाशक होता है, उसी तरह । इसी प्रकार शेष चार इन्द्रियों के विषय में भी अनुमान किया जा सकता है । चैतदर्थातियोगायोग मिथ्यायोगात् समनस्कमिन्द्रियं विकृतिमापद्यमानं यथास्वं बुद्ध्यु-पघाताय संपद्यते, समंयोगात् पुनः प्रकृतिमापद्यमानं यथास्वं बुद्धिमाप्याययति ॥ १५ ॥

इन्द्रियों के विषयों से अतियोगादि या समयोग का परिणाम - वे इन्द्रियाँ अपने - अपने अर्थों ( विषयों ) को अनियोग, अयोग और मिथ्यायोग से मन के साथ विकृत होकर अपनी - अपनी बुद्धि ( ज्ञान ) का उपघात करने वाली होती हैं और जब वे ही इन्द्रियाँ अपने - अपने अर्थों के साथ समयोगयुक्त होती हैं तो प्राकृतावस्था में होकर अपनी - अपनी बुद्धि ( विषय - ज्ञानशक्ति ) को बढ़ाने वाली होती हैं ॥ १५ ॥

विमर्श - अध्यात्म द्रव्य और गुण शुभ और अशुभ की उत्पत्ति में कारण हैं, यह १३ वें गद्य से बताया गया है । उसी का यहाँ यह विवरण प्रस्तुत किया गया है कि जब ये इन्द्रियाँ अपने विषयों के साथ अतियोग, अयोग और मिथ्यायोग - युक्त होती हैं तो अपनी शक्ति को विकृत कर देती हैं, जिससे मन के साथ इन्द्रियाँ अर्थात् सारा शरीर रोगग्रस्त हो जाता है और जब ये टीक-ठीक समयोगयुक्त होती हैं तब शरीर मन के साथ स्वस्थ रहता है । रोगग्रस्त होना अशुभ तथा स्वस्थ रहना शुभ कहा जाता है । मनसस्तु चिन्त्यमर्थः । तत्र मनसो मनोबुद्धेश्व त एव समानातिहीन मिथ्यायोगाः प्रकृतिविकृतिहेतवो भवन्ति ॥ १६ ॥

मन का भी अतियोगारि - मन का अर्थ ( विपय ) चिन्त्य है । इनमें मन और मन की बुद्धि ( अर्थ ) इन दोनों का समान योग प्रकृति ( स्वस्यावस्था ) का कारण है । इन दोनों का अनियोग, अयोग और मिथ्यायोग विकृति ( रोगोत्पत्ति ) का कारण होता है ॥ १६ ॥

विमर्श - मन का विषय चिन्त्य है । चिन्त्य की परिभाषा यह है - ' इन्द्रियनिरपेक्षं मनो यद् गृह्णाति तच्चिन्त्यन् ' नथवा ' इन्द्रियगृहीतमेवार्थे या पुनरिन्द्रियनिरपेक्षं मनो गृह्णाति तच्चिन्त्यम् ' ( चक्रपाणि: ) । अर्थात् नेत्र आदि इन्द्रियों की सहायता के विना अथवा एक बार नेत्र आदि की सहायता के द्वारा जो विषय गृहीत हो चुका हो, पुनः उसे चक्षु आदि इन्द्रिय की सहायता के विना मन द्वारा ग्रहण करना चिन्य कहा जाता है । शारीर प्रथम अध्याय में विचार्य, का आदि को भी मन का अर्थ बताया गया है, यथा- ' चिन्त्यं विचार्य्यमूह्यं च ध्येयं संकल्प्यमेव च । यत्कि -ञ्चिन्मनसो ज्ञेयं तत्सर्वं ह्यर्थसंज्ञकम् ॥ ' ( च ० ) । यहाँ चिन्त्य को मन का अर्थ माना गया है । इसका तात्पर्य यह है कि चिन्त्य मन का प्रधान विषय है । इसीलिए चिन्त्य, विचार्य आदि मन के विषयों में चिन्त्य को ही प्रथम पढ़ा गया है । यहाँ उसी को प्रधान मान कर, विचार्य आदि का चिन्त्य में अन्तर्भाव कर केवल चिन्त्य को ही मन का विषय माना गया है तथा चिन्त्य विषय का मन के १. ' सामर्थ्ययोगात् ' च.।

पृष्ठ 274

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इन्द्रियोपक्रमणीयाध्यायः = ] सूत्रस्थानम् १८१ साथ समयोग स्वास्थ्य का कारण और चिन्त्य का मन के साथ अतियोग, अयोग एवं मिथ्यायोग का होना मानसिक रोगों का कारण बताया गया है । तत्रेन्द्रियाणां समनस्कानामनुपतप्तानामनुपतापाय प्रकृतिभावे प्रयतितव्यमेभिर्हेतुभिः; तद्यथा - सात्म्येन्द्रियार्थसंयोगेन बुद्धया सम्यगवेच्यावेच्य कर्मणां सम्यक् प्रतिपादनेन देशकालात्मगुणविपरीतोपासनेन चेति । इन्द्रियों ( मन के साथ ) के स्वस्थ रखने में हेतु: - मन के साथ सभी इन्द्रियाँ स्वाभाविक रूप में वर्तमान रहें तथा उनमें कोई विकृति न हो, इसका प्रयास इन हेतुओं से करना चाहिए-जैसे सात्म्य इन्द्रियार्थों के संयोग द्वारा बुद्धि से ठीक - ठीक विचार कर कार्यों को उचित रूप में करना और देश, काल, आत्मा ( प्रकृति ) के विपरीत गुणों का सेवन करना । विमर्श - मन और इन्द्रियों में विकृति न हो तथा वे अपने स्वाभाविक रूप में रहें इसके लिये बुद्धिमान व्यक्तियों को सदा सात्म्येन्द्रियार्थं संयोग का पालन करते हुए अतियोग, अयोग, मिथ्यायोग का त्याग तथा देश ( जैसे जांगल, आनूप, साधारण ), काल ( जैसे जाड़ा, गर्मी, बरसात ) व आत्मा ( प्रकृति ) के विपरीत वस्तुओं का सेवन करना चाहिये । जैसे वातरोगी को जांगल देश से हटा कर साधारण या आनूप देश में ले जाना चाहिये । इसी तरह जाड़े में उत्पन्न होने व बढ़ने वाले रोगों में उनके विपरीत काल की कलना कर, जैसे जाड़े के समय कमरे को कृत्रिम उपाय ( Air condition ) से गर्म कर उसमें रहना चाहिये । प्रकृति से यहाँ दोपप्रकृति ली गयी हैं । यदि वातप्रकृति का मनुष्य है, तो उसे वातल आहार - विहारों से सदा बचना चाहिये | इस प्रकार स्वस्थवृत्त में बतायी हुयी दिनचर्या, ऋतुचर्या, रात्रिचर्या तथा अपने लिये हितकर या अहितकर द्रव्य का विचार कर अतिकर का त्याग तथा हितकर का सेवन करते हुए अपने मन व इन्द्रियों को स्वस्थावस्था में रखना चाहिये । यहाँ सात्म्येन्द्रियार्थ संयोग का सेवन और असात्मेन्द्रियार्थ के अतियोग, अयोग, मिथ्यायोग का त्याग करना बताया गया है । किन्तु रोग के कारणभूत प्रज्ञापराध का भी त्याग करना चाहिये । इसी स्थान के सातवें अध्याय में - ' तेषाम् देशकालादीनां गुणैर्विपरीतं विपरीतगुणं विपरीतार्थकारि वा ', तथा छठे अध्याय में - देशा- ' नानामयानां च विपरीतगुणं गुणैः । सात्म्यमिच्छन्ति सात्म्यज्ञाश्चेष्टितं चाद्यमेव च ॥ ' से इस बात की ओर संकेत किया है । यहाँ असात्म्येन्द्रियार्थ संयोग से इन्द्रियों को स्वाभाविक रूप में रखने और देश - काल के विपरीत वस्तुओं के सेवन से उत्पन्न रोगों की शान्ति करने को ओर संकेत किया गया है । कर्मों का उचित रूप से सेवन करने का आदेश दिया गया है । उस कर्म का स्वरूप तथा उसका सद्वृत्त रूप में पालन करने का उपदेश आगे किया जाना है । तस्मादात्महितं चिकीर्षता सर्वेण सर्वं सर्वदा स्मृतिमास्थाय सद्वृत्तमनुष्ठेयम् ॥१७ ॥

( २ ) सदवृत्त - वर्णन ( Description of Right Conducts - Partly Medical Ethics ) सद्वृत्तपालन से लाभ - इसलिये अपना कल्याण चाहने वाले सभी मनुष्यों को सर्वदा अपनी स्मरणशक्ति को जागरूक रखते हुए सभी सद्वृत्तों का पालन करना चाहिये ॥ १७ ॥

तद्ध्यनुतिष्ठन् युगपत्संपादयत्यर्थद्वयमारोग्यमिन्द्रियविजयं चेति ॥ इसका पालन करने से एक ही साथ आरोग्य और इन्द्रियों पर विजय इस अर्थद्वय को मनुष्य प्राप्त कर सकता है । १. ' तद्ध्यनुष्ठानं ' ग. ।

पृष्ठ 275

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चरकसंहिता तत्सद्वृत्तमखिलेनोपदेच्यामोऽग्निवेश! तद्यथा-- देवगोब्राह्मण गुरुवृद्ध सिद्धाचार्यानर्च-येत्, अग्निमुपचरेत्, ओषधीः प्रशस्ता धारयेत्, द्वौ कालावुपस्पृशेत्, मलायनेष्वभीक्ष्णं पादयोश्च वैमल्यमादध्यात् त्रिः पक्षस्य केशश्मश्रुलोमनखान् संहारयेत्, नित्यमनुपहत-वासाः सुमनाः सुगन्धिः स्यात् साधुवेशः, प्रसिद्धकेशः, मूर्धश्रोत्रप्राणपाद तैलनित्यः, धूमपः, पूर्वाभिभाषी, सुमुखः, दुर्गेष्वभ्युपपत्ता, होता, यष्टा, दाता, चतुष्पथानां नमस्कर्ता, बलीनामुपहर्ता, अतिथीनां पूजकः, पितृभ्यः पिण्डदः, काले हितमितमधुरार्थवादी, घश्यात्मा, धर्मात्मा, हेतावीयुः, फले नेयुः, निश्चिन्तः, निर्भीकः, हीमान्, धीमान्, महोत्साहः, दक्षः, क्षमावान्, धार्मिकः, आस्तिकः, विनयबुद्धिविद्याभिजनवयोवृद्ध सिद्धा चार्याणामुपासिता; छत्री दण्डी मौली सोपानत्को युगमात्रदृग्विचरेत्; मङ्गलाचारशीलः, कुचेलास्थिकण्टकामेध्यकेशतुषोत्करभस्मकपालस्नानबलिभूमीनां परिहर्ता, प्राक् श्रमाद् व्यायामवर्जी च स्यात्; सर्वप्राणिषु बन्धुभूतः स्यात्, क्रुद्धानामनुनेता, भीतानामाश्वास-यिता, दीनानामभ्युपपत्ता, सत्यसंधः, सामप्रधानः, परपरुषवचनसहिष्णुः, अमर्षघ्नः, प्रशमगुणदर्शी, रागद्वेषहेतूनां हन्ता च ॥ १८ ॥

( १ ) सद्वृत्तवर्णन ( क्या - क्या करना चाहिये ) - हे अग्निवेश! उस सद्वृत्त का उपदेश सम्पूर्णरूप में कर रहा हूँ । देवता, गौ, ब्राह्मण, गुरु, वृद्ध, सिद्ध पुरुष तथा आचार्य की पूजा, अग्नि की उपासना ( विधिपूर्वक हवन ), उत्तम औषधियों का धारण, प्रातः सायं स्नान व संध्या, गुदा आदि मलमार्गों तथा पैरों की सदा सफाई, पक्ष में तीन बार ( ५-५ दिनों पर ) केश, दाढ़ी, रोम और नखों को कटवाना, प्रतिदिन स्वच्छ एवं न फटे हुए वस्त्रों को धारण करना, सदा प्रसन्नमन रहना और सुगंधित इत्र आदि को धारण करना, अपनी वेशभूषा सुन्दर रखना, वालों को कंघी से प्रतिदिन सँवारना, मस्तक, कान, नाक, पैर में प्रतिदिन तेल लगाना और ऋतुचर्या में बताये हुये प्रायोगिक धूम का पान करना चाहिये । यदि अपने पास कोई मिलने के लिये आवे तो उससे पहले ही बोलना चाहिये । प्रसन्नमुख रहना, दूसरे पर आपत्ति आने पर दया करना तथा हवन और यज्ञ करना, सामर्थ्य के अनुसार दान देना, चौरास्ते को नमस्कार करना, कौआ, कुत्ता आदि को बलि देना, अतिथियों की पूजा करना, पिंतरों को पिण्ड देना, समय पर हितकर, थोड़े और मधुर अर्थ वाले वचनों को बोलना तथा जितेन्द्रिय और धर्मात्मा होना चाहिये । दूसरे की उन्नति के कारणों में ईर्ष्या करनी चाहिये किंतु उसके फल में ईर्ष्या नहीं करनी चाहिये । निश्चिन्त, निडर, लज्जायुक्त, बुद्धिमान्, उत्साही, चतुर, क्षमायुक्त, धार्मिक और आस्तिक होना चाहिये तथा विनय, वुद्धि, विद्या, अभिजन ( कुल ) और अवस्था • वृद्ध व्यक्ति, सिद्ध एवं आचार्य की सेवा करने वाला होना चाहिये । छत्र और दंड धारण कर, सिर पर पगड़ी या मुरैठा बाँधकर, जूना पहिन कर, चार हाथ आगे देखते हुए रास्ते में चलना चाहिये । मांगलिक कार्यों में तत्पर, गंदे कपड़े, हड्डी, काँटा, अपवित्र केश, तुष, उत्कर ( कूडा-करकट ) भस्म, कपाल, तथा स्नान करने योग्य और वलि चढ़ाने योग्य स्थानों का त्याग करने वाला होना चहिये । सभी प्राणियों के साथ भाई के समान व्यवहार करने वाला, क्रोधी मनुष्यों को विनय द्वारा प्रसन्न करने वाला, भय से युक्त व्यक्तियों को आश्वासन देने वाला । दीन - दुखी व्यक्तियों का उपकार करने वाला, सत्यप्रतिज्ञ, शान्तिप्रधान, दूसरे के कठोर वचनों को सहने १. ' मूर्धस्रोतोऽभ्यङ्गपाद तैलनियो ' ग. । ३. ' नक्तं युगमात्रदृक् ' यो । २. ' मौनी’ग. । ४. ' शमप्रधानः ' इति पा. ।

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इन्द्रियोपक्रमणीयाध्यायः ८ ] सूत्रस्थानम् १८३ वाला, अमर्ष ( असहिष्णुता - कोथ ) का नाशक, शान्ति के गुण को देखने वाला और राग - द्वेष उत्पन्न करने वाले कारणों का त्याग करने वाला होना चाहिये ॥ १८ ॥

नानृतं ब्रूयात्, नान्यस्वमाददीत, नान्यस्त्रियमभिलषेन्नान्यश्रियं, न वैरं रोचयेत्, न कुर्यात् पापं न पापे s पि पापी स्यात्; नान्यदोषान् ब्रूयात्, नान्यरहस्यमागमयेत्, ना-धार्मिकैर्न नरेन्द्रद्विष्टैः सहासीत, नोन्मत्तैर्न पतितैर्न भ्रूणहन्तृभिर्न क्षुदैर्न दुष्टैः, न दुष्टया-नान्यारोहेत्, नाजैौनुसमं कठिनमासनमध्यासीत, नानास्तीर्णमनुपहितमविशालमसमं वा शयनं प्रपद्येत, न गिरिविपममस्तकेष्वनुचरेत्, न द्रुममारोहेत्, न जलोग्रवेगमवगाहेत, नकुलच्छायामुपासीत, नाग्न्युत्पातमभितश्चरेत् नांचेहसेत्, न शब्दवन्तं मारुतं मुञ्चेत्, नानावृतमुखो जृम्भां क्षवथुं हास्यं वा प्रवर्तयेत्, न नासिकां कुष्णीयात्, न दन्तान् विघट्टयेत्, न नखानू वादयेत्, नास्थीन्यभिहन्यात्, न भूमिं विलिखेत्, न च्छिन्द्यात्तृणं, न लोष्टं मृद्नोयात्, न विगुणमङ्गैश्चेष्टेत, ज्योतींष्यनिष्टममेध्यमशस्तं च नाभिवीक्षेत, न कुछ, न चैत्यध्वज गुरुपूज्याशस्तच्छायामाक्रामेत्, न क्षपास्वमरसदनचैत्यचत्वर-चतुष्पथोपवनश्मशाना घातनान्यासेवेत, नैकः शून्यगृहं न चाटवीमनुप्रविशेत्, न पाप-वृत्तान् स्त्री मित्रभृत्यान् भजेत, नोत्तमैर्विरुध्येत, नावरानुपासीत, न जिल्ह्यं रोचयेत्, नानार्थमाश्रयेत् न भयमुत्पादयेत् न साहसातिस्वप्नप्रजागरस्त्रानपानाशनान्यासेवेत, नोर्ध्वजानुचिरं तिष्ठेत् न व्यालानुपसपैन्न दंष्ट्रिणो न विपाणिनः, पुरोवातातपावश्याया-तिप्रवाताजह्यात्, कलिं नारभेत, नासुनिभृतोऽग्निमुपासीत नोच्छिष्टो नाधः कृत्वा प्रताप-येत्, नाविगतक्कुसो नानाप्लुतवदनो न नम्र उपस्पृशेत्, न स्नानशाट्या स्पृशेदुत्तमाङ्ग, न केशाग्राण्यभिहन्यात्, नोपस्पृश्य ते एव वाससी बिनुयात्, नास्पृष्ट्वा रत्नाज्यपूज्यमङ्गलसुः मनसोऽभिनिष्क्रामेत्, न पूज्य मङ्गलान्यपसव्यं गच्छेन्नेतराण्यनुदक्षिणम् ॥ १ ९ ॥ ( २ ) और भी सद्वृत्तवणन ( क्या - क्या नहीं करना चाहिये ) 1- झूठ न बोल, दूसरे के अधिकार या धन को न ले, दूसरे की स्त्री से संभोग और दूसरे की लक्ष्मी को प्राप्त करने की इच्छा नं करे, शत्रुता में रुचि न ले, पाप न करे, पापी व्यक्ति के साथ भी पाप का व्यवहार न करे, दूसरे के दोषों को न कहे, दूसरे की गुप्त बातों को जानने की चेष्टा न करे, अधार्मिक मनुष्य, राजा के शत्रु, पागल, पतित, भ्रूणहत्यारे और क्षुद्र तथा दुष्ट व्यक्तियों के साथ न बैठे, टूटी फूटी या मतवाले घोड़े, बैल आदि जुनी हुई सवारी पर न बैठे । जानु के समान ऊँचे कठिन आसन पर न बैठे, जिस शय्या पर विस्तरा न विद्या हो, तकिया न लगा हो या अधिक छोटी - बड़ी तकिया लगी हो उस पर न सोवे, पर्वत की ऊँची - नीची चोटियों पर भ्रमण न करे, पेड़ पर न चढ़े, भयंकर वेग वाले जल में घुस कर स्नान न करे, कुलीन पुरुषों की छाया पर पैर न पड़ने दे ( पाठान्तर - नदी के कगार वाले वृक्ष की छाया में न बैठे ), आग लगे स्थान के चारों ओर भ्रमण न करे । बहुत जोर से न हँसे, शब्दयुक्त अपान वायु का त्याग न करे, मुख को विना ढके जमाई, छींक और हँसी न निकाले, अँगुली से नासिका न कुरेदे, दाँत न किटकिटावे, नखों को न बजावे, हड्डियों को परस्पर न रगड़े, भूमि को नख से न कुरेदे, तृण को दाँत से न कांट, मट्टी के ढेले को न फोड़े, अपने अंगों से विकृत चेष्टाएं न करे, अधिक चमकने वाले तेजस्वी १. यदासनं जानुप्रमाणोत्सेधं न भवति तदजानुसमम् । २. ‘ कुलच्छायां सत्कुलोत्पन्नानां स्ववंशोत्पन्नानां वा छायां नोपासीत ' पद्भ्याम् ' इति शेषः, इति गङ्गाधरः; ' कूलच्छाया ' यो । ३. ' न हूंकुर्याच्छिवम् ' यो. । ४. ' असुनिभृतसमाहितः ' चकः । ' नानिभृतः ' ग. ।

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१८४ चरकसंहिता सूर्य, अनि आदि को तथा अप्रिय, अपवित्र और अप्रशस्त वस्तुओं को न देखे, मुर्दा को देख कर ' हुँ! ' ऐसा शब्द न करे, चैत्य, झडा, गुरु तथा अन्य पूज्य एवं अप्रशस्त वस्तुओं की छाया को न लाँघे, रात्रि में देवमन्दिर, चैत्य वृक्ष, चत्वर ( यज्ञभूमि ), चौराहे, उपवन ( छोटा बगीचा ), श्मशान और वधस्थान में निवास न करें, अकेले शून्य गृह और जंगलों में न जावे, पाप करने वाले स्त्री, मित्र और नौकरों को न रखें, उत्तम पुरुषों से विरोध न करे, नीच पुरुषों रहे, कुटिल कार्यो में प्रेम न रखे, दुष्ट प्रकृति के मनुष्यों के आश्रय में न रहे, दूसरे व्यक्तियों के साथ न भयभीत न करे, अधिक साहस, अधिक शयन, अधिक जागरण, अधिक को मदिरा का पान और अधिक भोजन न करें, अपने घुटनों को ऊपर कर स्नान बहुत, देर अधिक पानी या हिंसक जन्तुओं के पास न जावे, दाँत से प्रहार करने वाले साँप, कुत्ता आदि तक न बैठे, करने वाले गौ, भैंस आदि पशुओं के पास न जावे, पूर्वी हवा या सामने से आती और सींग से प्रहार हुई हवा, धूप, ओस, आँधी इनका सेवन न करे, कलह का आरम्भ न करे, विना एकाग्र मन हुये अग्नि कीउपासना न करे, अग्नि को जूठे मुंह, नीचे रख कर तथा ऊपर से न तापे, विना शरीर की थकावट दूर किए, विना मुख धोने एवं नन्न हो कर स्नान न करे, जिस कपड़े को पहन कर स्नान किया गया हो उसी कपड़े से शिर का स्पर्श न करें, कैश के अग्रभाग को हाथ से न फटकारे, स्नान के बाद खोले हुये धोती - गमछे को पुनः न पहने, रेल, घृा, पूज्य, मांगलिक द्रव्य एवं फूल आदि का बिना स्पर्श किये हुये घर से बाहर न निकले और पूज्य, देवता, गुरु आदि एवं मांगलिक पदार्थों तथा पूज्य और अमंगलकारी वस्तुओं के दक्षिण भाग में होकर न चले ॥ १ ९ ॥ * नारदपाणिर्नास्नातो दोपहतवासा नाजपित्वा नाहुत्वा देवताभ्यो नानिरूप्य पितृभ्यो नादत्त्वा गुरुभ्यो नातिथिभ्यो नोपाश्रितेभ्यो नापुण्यगन्धो नामाली नामक्षालितपाणि-पादवदनो नाशुद्धसुखो नोदङ्मुखो न विमना नाभक्ताशिष्टाशुचिक्षुधित परिचरो न पात्रीव-मेध्यासु नादेश नाकाले नाकीणं नादत्त्वाऽग्रमग्नये नाप्रोक्षितं प्रोक्षणोदकैर्न मन्त्रैरनभि-मन्त्रितं न कुत्सयन्न कुत्सितं न प्रतिकूलोपहितमन्नमाददीत, न पर्युषितमन्यत्र मांसहरि -तकशुष्कशाकफलभचदभ्यः, नाशेपभुक् स्यादन्यत्र दधिमधुलदणसक्तुसपिर्थ्यः, न नक्तं दधि भुञ्जीत, न सक्तूने कानश्नीयान्न निशि न भुक्त्वा न बहून्न द्विनोदकान्तरितान्न च्छित्त्वा द्विजैर्भर्त्तयेत् ॥ २० ॥

( ३ ) और भी सद्वृणेन ( किस प्रकार भोजन करना चाहिये ) - हाथ में बिना रल धारण किए, विना स्नान किये, फटे वस्त्र धारण किये हुए, विना गायत्री आदि मन्त्रों का जप किए, बिना होम किए, बिना देवताओं को अर्पण किए, विना माता - पिता को भोजन कराये, गुरु अतिथि यदि उपस्थित हों तो उन्हें और अपने आश्रित नौकर - परिवार आदि को बिना भोजन कराए, बिना सुगन्धित इत्र, चन्द्रन आदि एवं माला धारण किए, हाथ, पैर, मुख, बिना धोए, अशुद्ध ( जूठे ) मुख स, बिना उत्तरको मुख किए विना मन के या उदास मन से भोजन नहीं करना चाहिए । अपने गं प्रभ न रखने वाले शत्रु, दुष्ट, अपवित्र और भूख से पीड़ित नौकर आदि से लाइ हुई भोजन सानत्रा को एवं अपवित्र पात्रों में, अनुचित स्थानों में असमय में, संकीर्ण स्थानों में, बिना अग्नि में हवन किए, प्रोक्षण करने योग्य जल से विना भोजन का प्रोक्षण किए, विना मन्त्र से अभिमन्त्रित किए तथा भोजन की निन्दा करते हुए भोजन नहीं करना चाहिए । निन्दित और प्रतिकूल रखने वालों से लाये हुये अन्न का भोजन नहीं करना चाहिए । मांस, १. द्विजः दन्तः ।

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इन्द्रियोपक्रमणीयाध्यायः ८ ] सूत्रस्थानम् १८५ हरितक ( अदरक आदि ), सूखे शाक, फल भक्ष्य आदि को छोड़ कर वासी पदार्थों का भक्षण नहीं करना चाहिए । दही, मधु, नमक, सत्तू और घृत को छोड़ कर भोजन - पात्र में परोसे हुए आहार पदार्थ का भक्षण सम्पूर्ण रूप में नहीं करना चाहिए ( अर्थात् पात्र में कुछ अवश्य छोड़ देना चाहिए ) । रात्रि में दही न खाय, केवल सत्तू का भक्षग न करे, रात में और भोजन करने के बाद सत्तू का भक्षण न करे, अधिक मात्रा में, दो बार, बीच बीच में, जल पीते हुए तथा दाँत से काट कर भी सत्ता का सेवन न करे ॥ २० ॥

विमर्श - - रत्न धारण करने का तात्पर्य यह है कि सुवर्ण की अंगूठी या अंगूठी में पन्ना, नीलम आदि का नग लगा कर उसे धारण कर भोजन करना चाहिए । अपवित्र – जूठे गन्दे पात्र में भोजन के निषेध का तात्पर्य यह है कि भिन्न भिन्न आहार द्रव्यों के लिए भिन्न - भिन्न पात्र पवित्र बताए गए हैं, उन्हें उन्हीं पात्रों रख कर भोजन करना चाहिए, यथा- ' घृतं कार्ष्णायसे देयं पेया देया तु राजसे । फलानि सर्वभक्ष्यांश्च प्रदद्याद्वै दलेषु च ॥ परिशुष्कप्रदिग्धानि सौवर्णेषु प्रकल्प -येत् । प्रद्रवाणि रसांचैव राजतेषूपहारयेत् ॥ कट्वराणि खडांचैव सर्वान्लेपु दापयेत् । दद्यात्ताम्र-मये पात्रे सुशीतं सुशृतं पयः ॥ पानीयं यावकं नद्यं मृन्मयेषु प्रदापयेत् । काचस्फटिकपात्रेषु शीतलेषु शुभेषु वा ॥ दद्यादै दुर्गपात्रेषु रागपाडवसट्टकान् ॥ ' ( मु. सू. अ. ४६ ) । अन्न प्रोक्षण और मन्त्रों से उसे अभिमन्त्रित करने का तात्पर्य यह है कि यदि भोजन में विप हो तो इससे उसका नाश हो जाय, जैसा कि बताया गया है - ' विपरगदैः स्पृष्टं प्रोक्षितं व्यजनोदकैः । सिद्धैर्मन्त्रैर्दतविषं सिद्धमन्नं निवेदयेत् ॥ ' ( सु. सू. अ. ४६ ) । धर्मशास्त्रों में भी इन्हीं नियमों का वर्णन किया गया है, यथा-‘ स्नात्वा यथावत् कृत्वा च देवर्षिपितृतर्पणम् । प्रशस्तरलपाणिस्तु भुञ्जीत प्रयतो गृही ॥ कृते जपे हुते वह्नौ शुभवस्त्रधरो नृप । दत्त्वाऽतिथिभ्यो विप्रेभ्यो गुरुभ्यः संश्रिताय च ॥ पुण्यगन्धधरः शस्तमा-लाघारी नरेश्वर । नैकवस्त्रधरोऽनाई पाणिवादी नरेश्वर । विद्युवदनः प्रीतो भुञ्जीत न विदिङ्मुखः । प्राङ्मुखोदङ्मुखो वापि न चैवान्यमना नरः ॥ अन्नं प्रशस्तं पथ्यं च प्रोक्षितं प्रोक्षणोदकः । न कुत्सिताहृतं चैव जुगुप्सावदसंस्कृतम् ॥ दत्त्वा तु भक्तं शिष्येभ्यः क्षुवितेभ्यस्तथा गृही । प्रशस्त-शुद्धपात्रेषु भुञ्जनाकुषितो नृप । नासन्दीसंस्थिने पात्रे नादेशे च नरेश्वर । नाकाले नातिसंकीर्णे दत्त्वाग्रं च नरोऽग्नये ॥ मन्त्राभिमन्त्रितं शस्तं न च पर्युषितं नृप । अन्यत्र फलमांसेभ्यः सक्तु-शाकादिकान्तथा ॥ तद्वद्धरितकेभ्यश्च गुडाकेभ्य एव च । भुञ्जीतोद्धृतसाराणि न कदाचिन्नरेश्वर ॥ नाशेषं पुरुषोः श्रीयादन्यत्र जगतीपते । मध्वम्बुदधिसपिः सक्तुभ्यश्च विवेकवान् ॥ ' ( चरकोपस्कार ) इन वर्णनों को देखने से आयुर्वेद और धर्मशास्त्रों की एकवाक्यता सुन्दर रूप से परिलक्षित होती है । रात्रि में दही न खाने का कारण वाग्भट ने बताया है - ' अलक्ष्मीदोपयुक्तत्वादूरात्रौ च दधि गर्हितम् । ' धर्मशास्त्रों में भी इस तरह का वर्णन पाया जाता है - दिवा ' कपित्थे वसति रात्र दध्नि च सक्तुषु । अलक्ष्मीः कलहाधारा कोविदारे कृताश्रया ॥ ' अतः दही और सत्तू का रात्रि में सेवन सर्वथा वर्जित है । ॐ नानृजुः सुयान्नाद्यान्न शयीत, न वेगितोऽन्यकार्यः स्यात्, न वाय्वग्निसलिलसोमार्क-द्विगुरुप्रतिमुखं निष्ठीविका ( वात ) वर्चोमूत्राण्युत्सृजेत्, न पन्थानमत्रमूत्रयेन्न जनवति नानकाले, न जपहोमाध्ययन वलिमङ्गलक्रियासु श्लेष्मसिङ्घाणकं मुञ्चेत् ॥ २१ ॥

( ४ ) और भी सद्वृत्तवर्णेन ( मलत्याग कहाँ नहीं करना चाहिये ) - शरीर को टेढ़ा करके छींक, भोजन और शयन न करे, मल - मूत्रादि के वेगों के उपस्थित होने पर अन्य कोई भी कार्य न करे, वायु, अग्नि, जल, चन्द्रमा, सूर्य, ब्राह्मण, गुरु आदि पूज्यों के सामने की ओर थूक, मल और मूत्र का त्याग न करें, रास्ते के बीच में मूत्रत्याग न करे, जहाँ जनसमूह एकत्र हो, भोजन

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१८६ चरकसंहिता का समय उपस्थित हो, जप, होम, अध्ययन, बलि और अन्य माङ्गलिक कार्यों की योजना हो वहाँ उस समय मुख या नाक से कफ का त्याग न करे ॥ २१ ॥

विमर्श - टेढ़े शरीर से छींकने आदि से वायु तथा अन्न का विमार्ग - गमन हो जाने का भय रहता है । वेगों को रोकने से होने वाली हानियों का वर्णन ' न वेगान्धारणीय ' अध्याय में किया जा चुका है । वायु आदि के सन्मुख मल - मूत्र त्याग करने से आयु की हानि होती है, जैसा कि महाभारत में बताया गया है - ' प्रत्यादित्यं प्रतिजलं प्रतिमां च प्रतिद्विजम् । मेहन्ति ये च पथिषु ते भवन्ति गतायुषः ॥ ' मनुस्मृति में इसका विशेष वर्णन किया गया यथा --- ' न मूत्रं पथि कुर्वीत न भस्मनि न गोत्रजे । न फालकृष्ट न जले न चित्यां न च पर्वते । न जीर्णदेवायतने न वल्मीके कदाचन । न ससत्त्वेषु गर्त्तेपु न गच्छन्नापि संस्थितः ॥ न नदीतीरमामाद्य न च पर्वतमस्तके | वाय्वग्निविप्रानादित्यमपः पश्यंस्तथैव गाः ॥ न कदाचन कुर्वीत विण्मूत्रस्य विसर्जनम् ॥ ' न स्त्रियमवजानीत, नातिविश्रम्भयेत्, न गुह्यमनुश्रावयेत्, नाधिकुर्यात् । न रजस्वलां नातुरं नामेध्यां नाशस्तां नानिष्टरूपाचारोपचारां नादां नादक्षिणां नाकामां नान्य कामां नान्यस्त्रियं नान्ययोनिं नायोनौ न चैत्यचत्वरचतुष्पथोपवनश्मशानाघात नसलिलौषधि-द्विजगुरुसुरालयेषु न सन्ध्ययोर्नातिथिषु नाशुचिनर्जिग्धभेषजो नाप्रणीतसङ्कल्पो नानु-पस्थित प्रहर्षो नाभुक्तवान्नात्यशितो न विपमस्थो न मूत्रोच्चारपीडितो न श्रमव्यायामोप-वासकुमाभिहतो नारहसि व्यवायं गच्छेत् ॥ २२ ॥

( ५ ) और भी सद्वृत्तवर्णेन ( मथुन - नवा म निषेत्र ) - स्त्रियों का अपमान न करे, उनका अधिक विश्वास भी न करे, स्त्रियों को अपनी गुप्त बातें न सुनावे, वर का पूर्ण अधिकार भी स्त्रियों को न दे, रजस्वला, रोगिणी, अपवित्र, बुरे आचरण वाली, अप्रिय स्वरूप और आचरण वाली, अदक्ष ( मैथुनकर्म में चतुरतारहित ), अदक्षिण ( प्रतिकूल ), कामकलाशून्य या मैथुन की इच्छा न रखने वाली, दूसरे पुरुष की इच्छा करने वाली, परकीया ( दूसरे की ) स्त्रियों से तथा अन्य योनि ( जैसे कुतिया, बकरी आदि ) में, अयोनि ( जैसे गुदा ) में तथा चैत्य, चत्वर, चतुष्पथ, उपवन, श्मशान, वधस्थान और जल के मध्य में तथा उत्तम औषधियों, ब्राह्मण, गुरु एवं देवताओं के स्थान में, प्रातः एवं सायंकाल में, वर्जिन तिथियों ( प्रतिपद्, एकादशी, अमावस्या, पूर्णिमा आदि ) में मैथुन वर्जित है । मैथुनकर्ता को अपवित्र रहने पर, विना वाजीकरण औषधियाँ खाए, बिना मैथुन का पूर्व में संकल्प किए, विना लिङ्गेन्द्रिय के उठे हुए, बिना भोजन किए, अधिक भोजन करने के बाद, टेढ़े अङ्ग से या टेढ़ी शय्या पर, मूत्र और मलोवेग से पीड़ित होने पर, श्रम, व्यायाम, उपवास तथा कुम से पीड़ित होने पर तथा विना एकान्त स्थान प्राप्त हुए मैथुन नहीं करना चाहिए ॥ २२ ॥

विमर्श - इन नियमों के साथ मैथुन करना सद्वृत्त माना जाता है, इनसे मनुष्य स्वस्थ रहता है । इन नियमों का पालन न करने से जो हानियाँ होनी है उनका वर्णन सुश्रुत में स्पष्ट रूप से किया है, यथा- ' रजस्वला प्राप्तवतो नरस्यानियतात्मनः । दृष्टचायुस्तेजसां हानिरधर्मश्च ततो भवेत् ॥ लिङ्गिनी गुरुपलीं च सगोत्रामय पर्वसु । वृद्धां च सन्ध्ययोश्चापि गच्छतो जीवितक्षयः ॥ गर्भिण्यां गर्भपीडा स्याद्वयाधितायां बलक्षयः । हीनाङ्गीं मलिनां द्वेष्यां कामं वन्ध्याम-संवृते || देशऽशुद्धे च शुक्रस्य मनसश्च क्षयी भवेत् । क्षुक्तिः क्षुब्वचित्तश्च मध्याह्ने तृपितोऽबलः ॥ स्थितस्य हा शुक्रस्य वायोः कोपं च विन्दति । अतिप्रसङ्गाद् भवति शोषः शुक्रक्षयावहः ॥ व्याक्तिस्य रुजा प्लीहा मृत्युर्मूर्च्छा च जायते । प्रत्यूपस्यर्द्धकाले च वातपित्तं प्रकुप्यतः ॥ १. ' नाति न निषिद्धतिथिषु ' ग. । २. ' अजयमेषजी नुपयुक्तवृष्यभेषजः ' इति चक्रः ।

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इन्द्रियोपक्रमणीयाध्यायः ८ ] सूत्रस्थानम् १६३ उत्तम गो सङ्के गे कहे ज तिर्यग्योनावयोनौ च दुष्टयोनौ तथैव च । उपदंशस्तथा वायोः कोपः शुक्रस्य च क्षयः मूत्रिते च रेतसश्च विधारणे । उत्ताने च भवेच्छीघ्रं शुक्राश्मर्यास्तु संभवः । सर्व परि द्वयहिते रतः ॥ ' १ ) अ. नसतो न गुरून् परिवदेत्, नाशुचिरभिचार कर्मचैत्यपूज्यपूजाध्ययनमा विष्णु निर्वर्तयेत् ॥ २३ ॥

( ६ ) और भी सद्वृत्तवर्णन ( पूज्य लोगों का तिरस्कार नहीं करना चाहिये ) - सज्जन पुरुषों और गुरुओं की निन्दा नहीं करनी चाहिए और अपवित्र होकर अभिचार कर्म ( मारण, मोहन, उच्चाटन आदि कर्म ), चैत्य वृक्ष एवं पूज्य देवी - देवताओं की पूजा तथा अध्ययन नहीं करना चाहिए ॥ २३ ॥

8 न विद्युत्स्वनार्तवीषु नाभ्युदितासु दिनु नामिसंप्लवे न भूमिकम्पे न महोत्सवे नोल्कापाते न महाग्रहोपगमने न नष्टचन्द्रायां तिथौ न सन्ध्ययोर्नामुखाद्गुरोर्ना पतितं नातिमात्रं न तान्तं न विस्वरं नानवस्थितपदं नातिद्रुतं न विलम्बितं नातिक्कीचं नात्युच्चै -र्नातिनीचैः स्वरैरध्ययनमभ्यस्येत् ॥ २४ ॥

( ७ ) और भां सद्वृत्तार्णन ( पठनपाठन में निषेध ) 1- अकाल में बिजली चमकने, दिशाओं के प्रज्वलित होने अर्थात् विभिन्न दिशाओं में उत्पात दिखाई पड़ने, सुन लेने, समीप में कहीं आग लग जाने, भूकम्प होने, बहुत बड़े उत्सवों के होने, उल्कापात होने तथा चन्द्र या सूर्यग्रहण लगने पर, अमावस्या के दिन और सन्ध्या ( गोधूलि ) के समय, अध्ययन नहीं करना चाहिए । गुरुमुख से न निकली हुई विद्या का तथा हीनवर्ण से विद्या का अध्ययन नहीं करना चाहिए | विकृत स्वर से, अनवस्थित ( अनियमित ), अतिशीघ्र या अतिविलम्ब से उच्चारण करते हुए, अतिक्की ( अत्यन्त मन्द ), अधिक ऊँचे तथा अधिक नीचे स्वर से अध्ययन नहीं करना चाहिए ॥ २४ ॥

विमर्श - सज्जन पुरुषों द्वारा अनुमोदित अध्ययन के नियमों का उल्लेख यहाँ किया गया है । सुश्रुत ने अध्ययन के नियम इस प्रकार बनलाये है - ' कृष्णेऽष्टमी तन्निधनेऽहनी द्वे कृष्णेतरेऽप्येव-महद्विसन्ध्यम् | अकालविद्युत्स्तनयित्नुघोपे स्वतन्त्र राष्ट्रक्षितिपत्र्यासु ॥ ' ( सू. अ. ८ ) तथा — ' अद्भुतमविलम्बितमविशङ्कितमननुनासिकं व्यक्ताक्षरमपीडितवर्णमक्षिभ्रुवौष्ठ हस्तैरनभिनीतं सुसंस्कृतं नात्युच्चैर्नातिनीचैः स्त्ररैः पठेत् ' ( सू. अ. ३ ) । नातिसमयं जह्यात्, न नियमं भिन्द्यात्, न नक्तं नादेशे चरेत्, न सन्ध्यास्वभ्यवहा-राध्ययनस्त्रीस्वप्नसेवी स्यात्, न बालवृद्धलुब्धमूर्ख क्लिष्टक्लीवैः सह सख्यं कुर्यात्, न मद्यद्यूत-वेश्याप्रसङ्गरुचिः स्यात्, न गुह्यं विवृणुयात्, न कञ्चिदवजानीयात्, नाहंमानी स्यान्नादतो नादक्षिणो नासूयकः, न ब्राह्मणान् परिवदेत्, न गवां दण्डमुद्यच्छेत्, न वृद्धान्न गुरून्न गणान्न नृपान् वाऽधिक्षिपेत् न चातिब्रूयात्, न बान्धवानुरक्तकृच्छ्रद्वितीयगुह्यज्ञान् बहिष्कुर्यात् ॥ २५ ॥

( ८ ) और भी सद्वृत्तवर्णन ( सामाजिक व्यवहार में निषेध ) - अधिक समय व्यर्थ नष्ट न करे, शास्त्र के, स्वयं के या किसी संस्था के नियमों को भङ्ग न करे, रात्रि में और अनुचित स्थान में १. ' महाग्रहोपगमनं चन्द्रसूर्यग्रहणम् ' चक्रः । २. ' अवपतितं हीनवर्णम् ' चक्रः । ३. ' तान्तं रूक्षस्वरम् ' चक्रः । ४. ' अतिसमयो मिलित्वा बहुभिः कृतो नियमः ' चक्रः । ५. ' दक्षिणान् ' ग. । ६. ' कृच्छ्रद्वितीय आपदि सहायः ' चक्रः । ७. ' बहिः कुर्यादवजानीयात् ' चक्रः ।