चरक संहिता हिन्दी भाष्य — पृष्ठ 281–290
चरक संहिता हिन्दी भाष्य · Chaukhamba · पृष्ठ 281–290
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" चरकसंहिता र, संध्या ( गोधूलि ) के समय भोजन, अध्ययन, मैथुन और शयन न करे, बालक, , मूर्ख, दुःखपूर्वक जीवन विताने वाले तथा नपुंसकों के साथ मित्रता न करे, मदिरा पीने, उलने और वेश्यागमन में इच्छा न रखे, अपनी या दूसरे की गुप्त बातों को प्रकाशित न करे, सी का भी तिरस्कार न करे, अभिमानी न बने, कार्य कुशलता प्राप्त करे ( अदक्ष, अकुशल न होवे ), दूसरे की निन्दा न करे, ब्राह्मणों का तिरस्कार न करे, गौओं पर दण्ड न उठावे, वृद्ध, गुरु, गण ( पंचायत, संस्था ) और राजा पर आक्षेप न करे, अधिक न बोले, भाई, प्रेम करने वाले, आपत्तिकाल में सहायता करने वाले तथा अपनी गुप्त बातें जानने वाले व्यक्ति को अपने घर या संस्था या सम्पर्क से अलग न करे ॥ २५ ॥
* नाधीरो नात्युच्छ्रितसत्त्वः स्यात्, नाभृतभृत्यः, नाविश्रब्धस्वजनः, नैकः सुखी, न दुःखशीलाचारोपचारः, न सर्वविश्रम्भी, न सर्वाभिशङ्की, ने सर्वकालविचारी ॥ २६ ॥
( ९ ) और भी सद्वृत्तवर्णेन ( मानसिक व्यवहार में निषेध ) - धीरता न छोड़े, उदण्ड मन वाला न बने, नौकरों को दिए जाने वाले पारिश्रमिक ( वेतन ) को न रोके, निजी व्यक्तियों पर अविश्वास न करें, अकेले मुजी होने की चेष्टा न करे, दुःखदायी आचार - विचार वाला न बने, सर्वसाधारण पर विश्वास या संदेह न करे और सर्वदा शोच - विचार में भी न रहें ॥ २६ ॥
8 न कार्यकालमतिपातयेत्, नापरीक्षितमभिनिविशेत्, नेन्द्रियवशगः स्यात्, न चञ्चलं मनोऽनुभ्रामयेत्, न बुद्धीन्द्रियाणामतिभारमादुध्यात्, न चातिदीर्घसूत्री स्यात्, न क्रोधहर्षावनुविदध्यात् न शोकमनुवसेत्, न सिद्धावुत्सेकं यच्छेन्नासिद्धो दैन्यं, प्रकृतिमभीच्णं स्मरेत्, हेतुप्रभावविनिश्चितः स्याद्धेत्वारम्भनित्यश्व न कृतमित्याश्वसेत्, न वीर्य जह्यात्, नापवादमनुस्मरेत् ॥ २७ ॥
( १० ) और भी सद्वृत्तवर्णन ( कार्यसम्बन्धी निषेध ). I कार्य करने का समय निरर्थक न वितावे, किसी भी कार्य को बिना परीक्षा किए हुए सहसा न करें, इन्द्रियों के वशीभूत न रहे, चञ्चल मन को स्वच्छन्दतापूर्वक विषयों में न लगावे, अपनी बुद्धीन्द्रियों पर अधिक भार न दे, दीर्घसूत्री न वने, क्रोध या हर्ष के वश में होकर कोई भी कार्य न करे, शोक के वशीभूत न हो, कार्य की सिद्धि हो जाने पर अत्यन्त प्रसन्नता तथा कार्य की सिद्धि होने पर अधिक दुःख व्यक्त न करे, प्रकृति का स्मरण सदा किया करे ( प्रकृति के नियमों का सदा ध्यान रखे ), हेतु ( कारण ) का प्रभाव नियत रूप से होता है ( शुभ हेतु से शुभ फल, अशुभ हेतु से अशुभ फल होता है ) इसका ज्ञाता होवे, हेतुओं के अनुसार कार्य आरम्भ करें । ' मेरे किए हुए कार्य का फल अवश्य मेरे मनोनुकूल होगा ' ऐसा विश्वास कभी न करे, वीर्य का नाश व्यर्थं न करे तथा किसी के द्वारा किए गए अपने अपमान को बार - बार स्मरण न करे ॥ २७ ॥
नाशुचिरुत्तमाज्या इततिलकुश सर्पपैरग्निं जुहुयादात्मानमाशीभिराशासानः, अग्निर्म नापगच्छेच्छरीराद्वायु प्राणानादधातु विष्णुमें बलमादधातु इन्द्रो मे वीर्यं शिवा मां प्रविशन्त्वाप आयोहिटेत्यपः स्पृशेत्, द्विः परिमृज्यौष्टौ पादौ चाभ्युच्य मूर्धनि खानि चोप-स्पृशेदद्धिरात्मानं हृदयं शिरश्च ॥ २८ ॥
१. ' न सर्वदा कालविचारी ' यो! २. ' और मुक्यं ' ग. । ३. जुहुयात् । आत्मानमाशीमिंगप्रशासानः ' अग्निर्ने मा गाच्छरीरात् ' यो । ४. ' आशीभिराशासान इति च्छे चक्रः । ' आत्मातमित्यादिः अपः स्पृशेदित्यन्तो विच्छेदः ' गङ्गाधरः । ५. ' मूर्धनि खानि पट - द्वे नासारन्ध्रे, द्वे चक्षुषी, द्वे च श्रोत्रे ' गङ्गाधरः ।
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इन्द्रियोपक्रमणीयाध्यायः = ] सूत्रस्थानम् १६३ ( ११ ) और भी सद्वृत्तवर्णन ( हवन कर्म की विधि: - शरीर के अपवित्र रहने पर उत्तम गो सक्के अक्षत, तिल, कुश और सरसों आदि औषधियों से अग्नि में होम - कर्म न करे तथा आगे कहे जा वाले आशीर्वादात्मक मंत्रों के द्वारा प्रतिदिन अपनी शुभ कामना करे, वे मंत्र ये है - ( १ ) अ. मेरे शरीर से अलग न हो, ( २ ) वायु देवता मेरे प्राणों को स्थिर रूप से धारण करे, ( ३ ) विष्णु देवता मुझ में वल का आधान करें, ( ४ ) इन्द्र देवता मुझ में पराक्रम का आधान करें, ( ५ ) कल्याग-कारी जल देवता मुझमें प्रवेश करें, ऐसा कह कर ' आपोहिष्ठा: ' इत्यादि इस मंत्र से जल का स्पर्श ( मार्जन ) करें । बाद में दो बार दोनों ओठों को जल से पोंछ कर आचमन करे तथा पैरों को जल से धो कर, मस्तक प्रदेश में स्थित छिद्रों ( दो नेत्र, दो नासिका, दो कान और एक मुख ) तथा अपने हृदय एवं शिर का क्रमशः जल से प्रोक्षण करे अर्थात् हाथ में जल लेकर इनका स्पर्श करे ॥ २८ ॥
विमर्श - इस प्रकार ' अग्निर्मे शरीरात् न अपगच्छेत् ' मंत्रों द्वारा अपने शरीर की शुभकामना करने से आयु की वृद्धि होती है, जैसा कि मेलसंहिता से स्पष्ट है - ' ओषधीच मणींश्चैव माङ्गल्यान् धारये सदा । मन्त्रमावर्तयेच्चापि ब्रह्मप्रोक्तं सनातनम् ॥ नापेयान्मेऽनलो देहाद्वायुः प्राणाञ्च मे सदा । इन्द्रो मे बलमादध्याच्छिवं चापो दिशन्तु नः ॥ इत्येवं मन्त्रमार्ष वै भुक्त्वा गत्वाऽथवा स्त्रियम् । संजपन् वै स्पृशन् वारि तथास्यायुन हीयते ॥ ' ( भेल. सू. अ. ७ ) । इस प्रकार भोजन एवं मैथुन के बाद इन मन्त्रों का जपना और ' आपोहिष्ठा ' इत्यादि मंत्र से जल का स्पर्श करना आयु का वर्द्धक होता है, ऐसा बताया गया है । इसके बाद आचमन करने की विधि का वर्णन किया गया है । आचमन करने की विधि का वर्णन अन्यत्र भी यही बताया गया है, यथा- ' त्रिराचमेत्, द्विः प्रमृजीन, पादाभ्युक्ष्य शिरोऽभ्युक्षयेत्, इन्द्रियाण्यद्भिः स्पृशेत्, अक्षिनासिके कर्णौ च । ' ( गोभिल ) । तथा - ' त्रिः प्राश्यापो द्विरुन्मृज्य मुखमेतान्युपस्पृशेत् । आस्यनासाक्षिकर्णाश्च नाभि-वक्षः शिरोंऽसकान् ॥ ' ( छान्दोग्य परिशिष्ट ) । ब्रह्मचर्यज्ञानदानमैत्री कारुण्यहर्षोपेक्षाप्रशमपरश्च स्यादिति ॥ २ ९ ॥ ( १२ ) सद्वृत्त - वर्णन का उपसंहार ब्रह्मचर्य, ज्ञान, दान, मित्रता, दया, हर्ष, उपेक्षा और शान्ति इन क्रियायों में तत्पर रहे ॥ २ ९ ॥ विमर्श - ब्रह्मचर्य ( इन्द्रिय - दमन ), धर्मशास्त्रादि का ज्ञान, सत्पात्रों में दान, सम्पन्न व्यक्तियों से मित्रता, दुखी व्यक्तियों पर दया, पुण्यवान् व्यक्तियों को देख कर प्रसन्नता तथा पापी व्यक्तियों से उपेक्षा का व्यवहार करते हुए सदा सर्वत्र शान्तिप्रधान रहे । पानञ्जलयोगसूत्र में भी यह बात बतायी गयी है, यथा- ' मैत्री करुणामुदिनोपेक्षाणां सुखदुःखपुण्यापुण्यविषयागां भावनातश्चित्तप्र-सादनन् । ' ( पा. यो. समा. ३३ सू. ) । अथवा आयुर्वेद की दृष्टि से - मैत्री सभी प्राणियों में, दया रोगी व्यक्तियों में, हर्ष रोगरहित व्यक्तियों में तथा उपेक्षा असाध्य रोगियों के विषय में करनी चाहिए, जैसा कि निम्नलिखितरूप में आगे बतलाया जायगा -- ' मैत्री कारुण्यमार्तेषु शक्ये प्रीतिरुपेक्षणम् । प्रकृतिस्थेषु भूतेषु वैद्यवृत्तिचतुविधा ॥ ' ( सू. अ. ९ ) । यहाँ मैत्री प्राणिमात्र पर करने का उपदेश है । पर आयुर्वेद में जो दिग्ध, विद्ध, स्वयंमृत मांस का परित्याग तथा सद्योहन मांस का सेवन बताया गया है. इससे यह नहीं समझना चाहिए कि यहाँ मैत्री का व्यवहार करना सिद्ध नहीं होता, क्योंकि आयुर्वेद रोगानुसार मांस के हितकारित्व और अहितकारित्व का उपदेश करता है, न कि हिंसा का विधान करता है । दूसरी बात यह है कि स्वतन्त्रतापूर्वक हिंसा करना ही हिंसा है, फलविशेष से हिंसा करना हिंसा नहीं कहा जाता, जैसा कि – ' याज्ञिकी हिंसा हिंसा न भवति ' इस श्रुति से स्पष्ट है । आयुर्वेद में रोगोन्मूलन के लिए उपदिष्ट मांसभक्षण से हिंसा प्राप्त
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' चरकसंहिता होती है क्योंकि आयुर्वेद का प्रयोजन चिकित्सा है और वह विशेषकर मनुष्यों के लिए त है, जैसा कि - ' नत्र पुरुषः प्रधानं तस्योपकरणमन्यत् ' इस सुश्रुत वाक्य से स्पष्ट है । दोंके - ' सर्वत्रात्मानं गोपायीत ' तथा लोक के - ' आत्मानं सततं रक्षेत् ' इस वाक्य द्वारा शरीर की रक्षा करना ही मुख्य उद्देश्य है । जब उपायान्तरों से शरीर का स्वास्थ्य सम्भव न हो तब मांसभक्षण करना हिंसा नहीं माना जाना, यथा- ' मांसमेवाश्नतो नित्यं माध्वीकं पिवतोऽनु च । अविधारितवेगस्य यक्ष्मा न लभतेऽन्तरम् ॥ ' ( च. चि. अ. ८ ) इस प्रकार निरर्थक हिंसा करना ही हिंसा है | अतः विशेष प्रयोजन न होने पर सभी प्राणियों में मित्रता का व्यवहार करना चाहिए यह आयुर्वेद का सिद्धान्त उचित है । तत्र श्लोकाः-पञ्चपञ्चकमुद्दिष्टं मनो हेतुचतुष्टयम् । इन्द्रियोपक्रमेऽध्याये सद्वृत्तमखिलेन च ॥ ३० ॥
स्वस्थवृत्तं यथोद्दिष्टं यः सम्यगनुतिष्ठति । स समाः शतमव्याधिरायुषा न वियुज्यते ॥३१ ॥
नृलोकमापूरयते यशसा साधुसंमतः । धर्मार्थायेति भूतानां बन्धुतामुपगच्छति ॥ ३२ ॥
परान् सुकृतिनो लोकान् पुण्यकर्मा प्रपद्यते । तस्माद्वृत्तमनुष्ठेयमिदं सर्वेण सर्वदा ॥ ३३ ॥
अध्यायगत विषय का उपसंहार - इस ' इन्द्रियोपक्रमणीय ' अध्याय में पञ्चपञ्चक, मन का विचार, स्वस्थ और रोगी होने के समयोग, अनियोग आदि ४ हेतु तथा सम्पूर्ण सद्वृत्तों का उपदेश किया गया है । जो व्यक्ति यहाँ बताये हुए स्वस्थवृत्त का विधिपूर्वक पालन करता है, वह सौ वर्ष की रोगरहित आयु से पृथक् नहीं होता, तथा सज्जन एवं साधु पुरुषों द्वारा प्रशंसित होकर इस लोक में अपना यश फैलाकर, धर्म - अर्थ को प्राप्त कर, प्राणिमात्र का हित करने के कारण सब का बन्धु बन जाता है । इस प्रकार मृत्यु के बाद वह पुण्य कार्य करने वाला पुरुष उत्तम पुण्य करने वाले मनुष्यों द्वारा प्राप्त किये जाने वाले स्वर्गादि लोकों को प्राप्त करता है । इसलिये सभी मनुष्यों को सर्वदा सदवृत्त का पालन करना चाहिये जिससे उन्हें भी पुण्यलोकों की प्राप्ति हो सके ॥३०-३३ ॥ * यच्चान्यदपि किञ्चित्स्यादनुक्तमिह पूजितम् । वृत्तं तदपि चात्रेयः सदैवाभ्यनुमन्यते ॥३४ ॥
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते सूत्रस्थाने स्वस्थवृत्तचतुष्के इन्द्रियोपक्रमणीयो नामाष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥
इति स्वस्थवृत्तचतुष्कः ॥ २ ॥
न कहे गये सद्वृत्त - पालन में सामान्य सिद्धान्त - इस आयुर्वेद शास्त्र में जिन सद्वृत्तों का वर्णन नहीं है किन्तु जो अन्यत्र वर्णित हों या जिन विषयों का पालन करने से अपनी मलाई तथा संसार में प्रतिष्ठा प्राप्त होती हो उन सद्वृत्तों का पालन करना भी आत्रेय मुनि द्वारा सम्मत है ॥ ३४ ॥
विमर्श - उपर्युक्त लोक के अनुसार युगानुरूप ( In Conformity with the time ) सद्वृत्त के रूप में परिवर्तन किया जा सकता है । अर्थात् साधु पुरुषों द्वारा आचरित आचरण से यदि आरोग्य तथा ख्याति की प्राप्ति होती हो तो उसका भी पालन करना चाहिये । इस प्रकार यहाँ सद्वृत्त का वर्णन किया गया है । इसके पालन से यद्यपि स्वास्थ्य लाभ का साक्षात् नहीं किन्तु परम्परया सम्बन्ध अवश्य है । इन सद्वृत्तों के पालन से इन्द्रियों पर अधिकार प्राप्त होता है । इससे अतियोग अयोग, मिथ्यायोग से मनुष्य सदा बचता है अतः रोग होने का भय नहीं रहता है । इस प्रकार सद्वृत्त का पालन करना स्वास्थ्य के लिये उपकारी होता है ।
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खुड्डाकचतुष्पादाध्यायः ९ ] सूत्रस्थानम् १६३ सद्वृत्त ( Right conducts ) का चिकित्सा शास्त्र में इतना विशद वर्णन इस ओर सङ्के करता है कि चिकित्सा शास्त्र का समाज के प्रायः प्रत्येक भाग पर नियन्त्रण था । प्राचीन काल की इस मूल भावना की आजकल के Social Medicine से तुलना की जा सकती है । चरक के द्वारा प्रतिसंस्कृत अग्निवेशकृत तन्त्र ( चरकसंहिता ) के मूत्रस्थान में स्वस्थचतुष्क-विषयक ' इन्द्रयोपक्रमणीय ' नामक अष्टम अध्याय समाप्त हुआ । इस प्रकार यह स्वस्थवृत्तचतुष्क समाप्त हुआ ॥ ८ ॥
- * -अथ नवमोऽध्यायः अथातः खुड्डोकचतुष्पादमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह माह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
अब ( स्वस्थ - चतुष्क के वर्णन के बाद ) खुड्डाक चतुष्पाद अध्याय की व्याख्या की जायगी । जैसा कि भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥ १-२ ॥ विमर्श - - पहले के चार अध्यायों में मानव के स्वास्थ्य को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए स्वस्थचतुष्क का वर्णन किया गया है । अव स्वस्थ तथा आतुर मानवों के हित के लिए निर्देश-चतुष्क का वर्णन किया जा रहा है । चक्रपाणि ' खुड्डाक ' शब्द का अर्थ ' अल्पवचन ' ( संक्षिप्त ) मानते हैं अर्थात् यहाँ संक्षिप्त रूप में चतुष्पाद का वर्णन किया जा रहा है । आगे दशवें अध्याय में ' महाचतुष्पाद ' का वर्णन किया जायगा । उस अध्याय की अपेक्षा यह अध्याय संक्षिप्त है अतः इस अध्याय का नाम खुड्डाक ( संक्षिप्त ) चतुष्पाद रखा गया है । ठीक इसी तरह चरकसंहिता के शारीरस्थान में भी ' खुड्डिका गर्भावक्रान्ति ' तथा ' महती गर्मावक्रान्ति ' नामक अध्यायों का वर्णन मिलता है । ( १ ) चिकित्सा के चतुष्पाद ( Four Limbs ( Basic factors ) of Treatment ) भिषग्द्रव्याण्युपस्थाता रोगी पादचतुष्टयम् । गुणवत् कारणं ज्ञेयं विकारव्युपशान्तये ॥३ ॥
चिकित्सा के चारपाद - ( १ ) गुणवान् वैद्य ( Physician ), ( २ ) गुणवान् द्रव्य ( Drug ), ( ३ ) गुणवान् उपस्थाता ( Nursing staff ) और ( ४ ) गुणवान् रोगी ( Patient ) चिकित्सा के ये चार पाद सम्पूर्ण रोगों की शान्ति में कारण होते हैं ॥ ३ ॥
विमर्श -यहाँ चिकित्सा के चार पादों का वर्णन किया गया है । इनमें सबसे प्रधान वैद्य है, उसके बाद औषध, परिचारक और रोगी आते हैं, अतः इसी क्रम से ये यहाँ लिखे गये हैं | आगे बारहवें श्लोक में बताया गया है कि – ' प्रधानं कारणं भिषक् ' वैद्य, औषधि द्वारा कर्म - सम्पादन करता है, औषधि के अभाव में वैद्य का इतिवृत्त ही नहीं रहता है । अतः वैद्य के बाद औषधि प्रवान है । औषधि, कल्क, क्काथ, अनुपान तथा रोगी की सेवा आदि को कल्पना परिचारक के अधीन है अतः तीसरा प्रधान परिचारक है । यदि रोगी नहीं होगा तो चिकित्सा किसकी होगी अतः चौथा प्रधान रोगी होता है । कुछ लोग पथ्य की ही प्रधानता देते हैं, यथा - ' पथ्ये सति गदार्त्तस्य किमौषधनिषेवणैः । पथ्येऽसति गदार्त्तस्य किमौषधनिषेवणैः ॥ ' ( वैद्यजीवन ) । अर्थात् तीनों पादों के युक्तिपूर्वक कर्म करने पर भी अपथ्यसेवी रोगी के विषय में चिकित्सा तथा तीनों पादों का कर्म १. ' खुड्डाकशब्दोऽल्पवचनः, अल्पत्वं चास्य वक्ष्यमाणमहाचतुष्पादमपेक्ष्य ' चक्रः ।
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१६२ चरकसंहिता व्यर्थ हो जाता है । वस्तुतः चारों पादों का अपनी - अपनी जगह पर महत्त्व है, कोई प्रधान या गौण नहीं है । सुश्रुत ने भी इन चारों को चिकित्सा के साधन में हेतु बनाया है, यथा-- ' वैद्यो व्याध्युपसृष्टश्च भेषजं परिचारकः । एते पादाश्चिकित्सायाः कर्मसाधनहेतवः ॥ ' विकारो धातुवैषम्यं साम्यं प्रकृतिरुच्यते । सुखसंज्ञकमारोग्यं विकारो दुःखमेव च ॥ ४ ॥
अस्वस्थ ( विकृति ) तथा स्वस्थ ( प्रकृति ) के लक्षण - धातुओं की विषमता को रोग कहा जाता है, धातुओं की समता का नाम प्रकृति ( स्वस्थावस्था ) है, आरोग्यावस्था का नाम सुख है और विकार ( रोगावस्था ) का नाम दुःख हैं ॥ ४ ॥
विमर्श - यहाँ धातु - वैषम्य का नाम रोग बनाया गया है । पर इसी स्थान के प्रथम अध्याय में – ' रोगस्तु दोषत्रेषम्यम् ' से दोष की विषमता को रोग माना गया है । यद्यपि यह दोनों वाक्य परस्पर विरुद्ध प्रतीत होते हैं पर परमार्थतः दोनों वाक्य एक ही अर्थ का प्रतिपादन करते हैं । धातु की निरुक्ति यह बनाई गई है- ' धारणाद् धातवः स्मृताः ' अर्थात् जो शरीर को धारण करता है, उसे ' धातु ' कहा जाता है । इस अर्थ में प्राकृत वानादि दोषों को, समस्थित रम्नादि धातुओं को और स्वमानस्थित तथा स्वसमक्रिय स्वेद, मल, मूत्र को भी धातु कहा जाता है । अतः धातु-वैषम्य कहने से वातादि तीन दोष, रसादि सप्त धातु तथा मल - मूत्र स्वेदादि की विषमता का ग्रहण किया जाता है । सुश्रुत ने वातादि को स्पष्ट रूप से धातु माना है, यथा- ' नर्ते देहः कफा -दस्ति न पित्तान्न च मान्तात् । शोणितादपि वा नित्यं देह एतैस्तु धार्यते ॥ ' ( सु. अ. २१ ) । धातुओं के ( १ ) प्रमादधातु और ( २ ) मलधातु ये दो विभाग माने गए हैं- ' ते सर्व एव धातवो मलाख्याः प्रसादाख्याश्चेति ' ( च. सू. अ. २८ ) इस वचन से मल और रसादि धातुओं को धातु माना गया है । ' शरीरदूषणात् दोपाः ' अर्थात् जो शरीर को दूषित करे उसे ' द्रोप ' कहते हैं, इस अर्थ में विकृत वातादि, विकृत रस - रक्तादि तथा विकृत मल - मूत्र - स्वेद को भी दोष कहा जाता है । अतः दोष - वैषम्य अर्थात् वात, पित्त, कफ, रस - रक्तादि मान धातुयें और मलादि का विषम होना रोग माना गया है । वस्तुतः वातादि को ही दोष माना जाता है । रसादि में उपचार से दोप शब्द का प्रयोग होता है जैसे गरम ' घृत से जलने पर घृत से जल गया है ' ऐसा प्रयोग होता है । परमार्थतः ब्राह्क्रिया अग्नि का कर्म है, पर अग्नि का गुण घृत में चला जाता है अतः गरम घृत को भी उपचार से अनि मान का ' घृत मे जल गया ' ऐसा प्रयोग होता है । मथुन में रोग की परिभाषा निम्मलिखित दी गई है - ' अस्मि शास्त्रे पञ्चमहाभूतशरीरिसमवायः पुरुष इत्युच्यते तद्दुःखमंयोग व्यावय इत्युच्यन्ते ' ( सू. अ. १ ) । इसके अनुसार किसी भी प्रकार से दुःख से संयोग होने को ही रोग माना गया है । यह दुःख शारीरिक और मानसिक भेद से दो प्रकार के होते हैं । यद्यपि तिलकालक, स्वच्छ, व्यङ्ग आदि रोग में प्रत्यक्षतः कोई दुःख नहीं होता है पर त्वचा में निमन्त्रना आ जाने से मानसिक कष्ट होता ही है । दुःख का लक्षण पातञ्जल योगदर्शन में ' प्रतिकूल वेदनीयं दुःखम् ' तथा सुख का लक्षण - ' अनुकूलवेदनीयं सुखम् ' यह बताया गया है । शरीर में तिल आदि का होना भी प्रतिकूलवेदनीय होता है इसलिए इसे भी विकार माना जाता है । चतुर्णां भिषगादीनां शस्तानां धातुवैकृते । प्रवृत्तिर्धानुसाम्यार्था चिकित्सेत्यभिधीयते ॥५ ॥
चिकित्सा की परिभाषा धातु के विकृत होने पर उन धातुओं में समता लाने के लिए उत्तम वैद्य आदि चिकित्सा के चार पादों की जो प्रवृत्ति होती है उसे ही चिकित्सा कहा जाता है || ५ || विमर्श - आगे इसी स्थान के सोलहवें अध्याय में इसी बात की पुष्टि की गई है, यथा-' याभिः क्रियाभिर्जायन्ते शरीरे धातवः समाः । मा चिकित्सा विकाराणां कर्म तद्भिषजां मतम् ॥ '
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खुड्डाकचतुष्पादाध्यायः ९ ] सूत्रस्थानम् १६३ किन्तु भेद यह है कि यहाँ रोग दूर करने की प्रवृत्ति का नाम चिकित्सा माना गया है, अर्थात् दोष, धातु, मल ये सम हों अथवा न हों, पर सम करने के उद्देश्य से जब वैद्य आदि लग जायेंगे तो उसे ' चिकित्सा ' कहा जायगा और कहा जाता है । धातुओं को सम करने का नाम चिकित्सा है यह बात ‘ याभिः क्रियाभिः ’ से बतायी गई है । धातुओं के सम होने पर रोग दूर हो जाता है, अर्थात् रोग दूर करना चिकित्सा है । इस प्रकार रोग को दूर करने की इच्छा से औषध आदि का देना चिकित्सा है और रोग दूर करना भी चिकित्सा है, यह दोनों अर्थं चिकित्सा शब्द से अभीष्ट हैं अत: दो स्थलों पर दो वचनों से लक्षण बताया गया है । यह चिकित्सा शुद्ध और अशुद्ध भेद से दो प्रकार की होती है, जैसा कि वाग्भट ने बताया है, यथा - ' प्रयोगः शमयेद्वयाधिं योऽन्यव्याधिमुदीरयेत् । नासौ विशुद्धः शुद्धस्तु शमयेद्यो न कोपयेत् ॥ ' अर्थात् वह चिकित्सा ' अशुद्ध ' है जो मूल व्याधि को अच्छा करते हुए अन्य व्याधि को उत्पन्न करे और जो व्याधि को शान्त कर दे पर दूसरे रोग उत्पन्न न करे वह चिकित्सा ' शुद्ध ' मानी जाती है । चिकित्सा शब्द ' कित रोगापनयने ' धातु से बना हुआ है जिसका अर्थ है रोग को दूर करना । अमरकोष में भी ‘ चिकित्सा रुक्प्रतिक्रिया ' से रोग को दूर करना ही चिकित्सा का अर्थं बताया गया है । $ श्रुते पर्यवदतत्वं बहुशो दृष्टकर्मता । दाक्ष्यं शौचमिति ज्ञेयं वैद्ये गुणचतुष्टयम् ॥ ६ ॥
( १ ) वैद्य के गुग [ Qualities of Physicians ] ( १ ) शास्त्र का अच्छी प्रकार ज्ञान रखना, ( २ ) अनेक वार रोगी, औषध निर्माण तथा औषय प्रयोग का प्रत्यक्ष - द्रष्टा होना, ( ३ ) दक्ष होना अर्थात् समय के अनुसार युक्ति की कल्पना करने में परमचतुर होना तथा ( ४ ) पवित्रता रखना, यह चारों, वैद्य के उत्तम गुण माने जाते हैं ॥ ६ ॥
विमर्श - यहाँ केवल चार गुणों का ही वर्णन किया गया है पर विमानस्थान के आठवें अध्याय में वैद्य के कुछ अधिक गुण बताये गए है, यथा- ' तत्रेमे भिषग्गुणा यैरुपपन्नो भिषग्धातु-साम्याभिनिर्वर्तने समर्थो भवति तद्यथा - पर्यवदातश्रुतता, परिदृष्टकर्मता, दाक्ष्यं, शौचं जितह-स्तता, उपकरणवत्ता, सर्वेन्द्रियोपपन्नता, प्रकृतिशता, प्रतिपत्तिज्ञता चेति ॥ सुश्रुत ने भी वैद्य में चार से अधिक गुण माने हैं, यथा- ' तत्त्वाधिगतशास्त्रार्थो दृष्टकर्मा स्वयंकृती । लघुहस्तः शुचिः शूरः सज्जोपस्करभेषजः ॥ प्रत्युत्पन्नमतिर्धीमान् व्यवसायी विशारदः । सत्यधर्मपरो यश्च स भिषक् पाद उच्यते ॥ ' वैद्यजीवन में भी वैद्य के लक्षणों का चित्रण बहुत सुन्दर ढंग से किया गया है, यथा — ‘ गुरोरवीताऽखिलवैद्यविद्यः पीयूषपाणिः कुशलः क्रियासु । गतस्पृहो धैर्यधरः कृपालुः शुद्धोऽधि-कारी भिषगीदृशः स्यात् ॥ ' * बहुता तत्र योग्यत्वमनेकविधकल्पना | संपच्चेति चतुष्कोऽयं द्रव्याणां गुण उच्यते ॥७ ॥
( २ ) उत्तम औषधि के गुण [ Qualities of Drugs ] ( १ ) औषधियों का अधिक रूप में प्राप्त होना, ( २ ) औषधियों का व्याधिनाश में समर्थ होना, ( ३ ) एक ही औषधि में अनेकविध ( स्वरस, कल्क, चूर्ण, वटी, अवलेह आदि ) कल्पना को योग्यता होना, तथा ( ४ ) औषधियों का अपने रस, गुण, वीर्य, विपाकादि गुणों से युक्त होना, ये चारों औषधि के उत्तम गुण माने जाते हैं ॥ ७ ॥
विमर्श -- ' बहुता ' का अर्थ किया जाता है औषधियों का अधिक मिलना, क्योंकि अल्प परिमाण में औषधियों का मिलना भी एक दोष है । प्रचुर मात्रा में सभी जगह पाई जाने वाली औषधियाँ उत्तम होती हैं, यह आचार्य का मत हैं । वाग्भट ने ' बहुता ' का अर्थ ' बहुत गुण वाला ' किया है - ' बहुकल्पं बहुगुणं सम्पन्नं योग्यमौषधम् । ' अथवा बहुत रोगों को दूर करने में जो समर्थ १. ' पर्यवदात्वं विशुद्धज्ञानवत्त्वम् ' चक्रः । १३ च ० सं ०
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१६४ चरकसंहिता है उसे ‘ बहुता ' कहते हैं । ' योग्यत्व ' का तात्पर्य यह है कि किसी रोग में दोष, दूष्य, काल, देश, मात्रा, वय आदि का विचार कर दी गई औषधि यदि उस रोग को समूल नष्ट करने में योग्य हो तो वह अच्छी मानी जाती है । " अनेकविधकल्पना ' का तात्पर्य यह है कि प्रत्येक रोगी एक प्रकृति और एक ही रुचि का नहीं होता । रोगी की प्रकृति और मंत्रि के अनुसार स्वरस, कल्क, काथ, चूर्ण, वटी आदि कल्पना के अनुकूल फल देने की शक्ति औषधि में न हो तो वह अयोग्य मानी जाती है । सम्पत् का तात्पर्य यह है कि औषधि लेने की विधि ( अर्थात् ऊपर, रास्ता, देवालय आदि स्थानों में उत्पन्न न हो, सड़ी - गली न हो, अपरिणतवीर्य न हो आदि ) के अनुकूल प्राप्त होने वाली औषधि उत्तम मानी जाती है । सुश्रुत ने इसे विशेष स्पष्ट किया है, यथा- ' प्रशस्तदेश-संभूतं प्रशस्तेऽहनि चोद्धृतन् । युक्तमात्रं मनस्कान्तं गन्धवर्णरसान्वितम् || दोषन्नमग्लानिकरम-विकारि विपर्यये । समीक्ष्य दत्तं काले च भेषजं पाद उच्यते ॥ ' ( सू. अ. ३४ ) । * उपचारज्ञता दाच्यमनुरागश्च भर्त्तरि । शौचं चेति चतुष्कोऽयं गुणः परिचरे जने ॥ ८ ॥
( ३ ) उपचारक ( परिचारक ) के गुण [ Qualities of Nursing Staffs ] ~ ( १ ) सेवा-कार्य का पूर्ण ज्ञान, ( २ ) चतुरता, ( ३ ) अपने मालिक ( रोगी ) के प्रति अधिक प्रेम और ( ४ ) पवित्रता इन चार गुणों का परिचारक में होना उत्तम माना जाता है ॥ ८ ॥
विमर्श -- रोगी की सेवा करना प्रत्येक व्यक्ति के लिए सरल नहीं है । प्राकृतिक रूप से किसी-किसी में ही सेवाकार्य के ये गुण पाये जाते हैं । नीतिशास्त्र में इसीलिये बनाया गया है— ' सेवा-धर्मः परमगहनो योगिनामप्यगम्यः ' तथा ' सुवर्णपुष्पां पृथिवीं विचिन्वन्ति नरास्त्रयः । शूरञ्च कृत-विद्यश्च यश्च जानाति सेवितम् ॥ ' इसलिए जो स्वाभाविक रूप से सेवा करना जानना हो उसे ही रोगी की सेवा करने के लिए नियुक्त करना चाहिये । आजकल इसकी शिक्षा देकर Nursing Staff तैयार किया जाता है जिससे आतुरालय के कार्य में सुविधा होती है । सुश्रुत ने परिचारक के लक्षण इस प्रकार बतलाए हैं - ' स्निग्धोऽजुगुप्सुर्बलवान् युक्तो व्याधितरक्षणे । वैद्यवा-क्यकृद्रश्रान्तः पादः परिचरः स्मृतः ॥ ' ( सू. अ. ३५ ) । * स्मृतिर्निर्देशकारित्वमभीरुत्वमथापि च । ज्ञापकत्वं च रोगाणामातुरस्य गुणाः स्मृताः ॥९ ॥
( ४ ) रोगी के गुण [ Qualities of Patients ] - ( १ ) स्मरण शक्ति, ( २ ) वैद्य की आज्ञाओं के पालन की प्रवृत्ति, ( ३ ) निर्भयता और ( ४ ) रोग तथा उपद्रवों को अच्छी प्रकार बना सकना, ये चार रोगी के उत्तम गुण माने गए है ॥ ९ ॥
विमर्श - स्मरण शक्ति होने का तात्पर्य यह भी हो सकता है कि कष्टों के कारणों का स्मरण रहने से रोगी उनका त्याग कर सकता है, यथा - स्मृत्वा स्वभावं भावानां स्मरन् दुःखात् प्रमुच्यते ' ( शा. अ. २ ) । तथा अन्य कार्यों के लिये भी स्मृति की आवश्यकता है । भीरुता के विषय में सुश्रुत ने कहा है-- ' विषादो रोगवर्धनानाम् ' ( सू. अ. २५ ) । अतः उत्तम गुण वाले रोगी को भयरहित होना चाहिए । चक्रपाणि के अनुसार ' अथापि च ' इस ' अपि ' शब्द से कहीं - कहीं भय और अस्मृति को भी गुण माना गया है, जैसे उन्माद - चिकित्सा में, यथा- ' सर्पेणोद्धृतदंष्ट्रेण दान्तैः सिंहैर्गजैश्च तम् | त्रासयेच्छस्त्रहस्तैर्वा तस्करैः शत्रुभिस्तथा ॥ ' ' देहदुःखभयेभ्यो हि परं प्राणभयं स्मृतम् । तेन याति शमं तस्य सर्वतो विप्लुतं मनः ॥ ' ' विस्मयो विस्मृतेर्हेतोर्नयन्ति प्रकृति मनः ॥ ' ज्वरप्रकरण में भी अस्मरण को गुण माना गया है - ' ज्वर वेगं च कालं च चिन्तयज्वर्यते तु यः । तस्येष्टैश्व विचित्रैश्च प्रयोगैर्नाशयेत्स्मृतिम् ॥ ' ( च. अ. ३ ) । इस प्रकार निडर होना, स्मरण-शक्ति सम्पन्न होना कहीं गुण और कहीं दोष माना जाता है । इन्हीं विकल्पों को समझ कर सुश्रुत ने अभीरुता तथा स्मृति इन दोनों को रोगी के गुणों में सन्निविष्ट नहीं किया है, यथा- ' आयुष्मान्
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खुड्डाकचतुष्पादाध्यायः ९ ] सूत्रस्थानम् १६५ सत्त्ववान् साध्यो द्रव्यवानात्मवानपि । आस्तिको वैद्यवाक्यस्थो व्याधितः पाद उच्यते ॥ ' ( सू.अ. ३४ ) निम्नलिखित रूप में चिकित्सा - चतुष्पाद के षोडश गुणों का संग्रह किया जा रहा है । भिषग् ( Physician ) द्रव्य ( Drug ) उपस्थाता ( Nursing staff ) रोगी ( Patient ) १. श्रुतपर्यवदात्व १. बहुता ( अधिकता ) १. उपचारज्ञता ( सेवा-( शास्त्रज्ञान की ( Abundance ) विधि का ज्ञान ) १. स्मृति ( स्मृति-सम्पन्नता ) गंभीरता ) ( Clear Vision in Theory ) ( Training in Nursing Profession ) २. बहुदृष्टकर्मत्व २. योग्यत्व ( व्याधि-( अनेक कार्यों को प्रत्यक्ष देखने की नाशकता ) ( Applicability ); २. दाक्ष्य ( दक्षता ) ( Skill ) ( Memory ) २. निर्देशकारित्व ( वैद्यवशवर्तिता ) ( Obedience to Instruction. ) योग्यता ) ( Extensive Praetical Experience ) ३. दाक्ष्य ( प्रत्युत्पन्न-मनिना ) ( Skill ) 3. अनेकविधकल्पना | ३. भर्नु अनुराग ( चर्ण - वटी आदि अनेक रूपों में प्रयुक्त हो मकनेकी योग्यता ) ( Utility in Vari-( रोगी में अनुरागिता ) ३. अभीरुत्व ( निर्भयता ) ( Courage in fa-( Affection for cing the disease ) Master ) ous forms ) ४. शौच ( पवित्रता ) ४. सम्पत् ( पूर्ण | ४. शौच ( शुचिता ) ४. ज्ञापकत्व ( वेदना ( Purity ) रसादियुक्तता ) ( Cleanliness ) बता सकने की क्षमता ) ( Wholesome ) ( Ability in describing the disease ) ( २ ) चिकित्सक के बारे में विशेष विचार ( Emphasis on Physician ) कारणं षोडशगुणं सिद्धौ पादचतुष्टयम् । विज्ञाता शासिता योक्ता प्रधानं भिषगत्र तु ॥ १० ॥
चिकित्सक की प्रधानता --- मोलह गुणों से युक्त ये चिकित्सा के चार पाद चिकित्सा की सिद्धि में कारण हैं । इन चारों में औषधों का जानने वाला, परिचारक पर शासन करने वाला और रोगी में रोगानुसार औषध योगों का योग करने वाला केवल वैद्य होता है अतः वैद्य हो प्रधान माना गया है ॥ १० ॥
पतौ हि कारणं पक्तर्यथा पात्रेन्धनानलाः । विजेतुर्विजये भूमिचमूः प्रहरणानि च ॥ ११ ॥
आतुराद्यास्तथा सिद्धौ पादाः कारणसंज्ञिताः । वैद्यस्यातश्चिकित्सायां प्रधानं कारणं भिषक् । चिकित्सक की प्रधानता में उदाहरण - भण्डारी की पाकक्रिया में जिस प्रकार पात्र, इन्धन और अग्नि कारण होते हैं; युद्ध में विजय प्राप्ति की इच्छा से प्रवृत्त सेनापति की विजय में जिस
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१६६ चरकसंहिता प्रकार भूमि, सेना और अस्त्र - शस्त्र कारण होते हैं उसी प्रकार जब वैद्य रोग दूर करने में प्रवृत्त होता है तो धातुओं को समता ( चिकित्सा की सिद्धि ) में रोगी, औषध और परिचारक कारण होते हैं । इसीलिए चिकित्सा में प्रधान कारण वैद्य माना जाता है ॥ ११-१२ ॥ विमर्श -- पत्ता और विजेता से वैद्य की, पात्र और भूमि से रोगी की, इन्धन और चम् ( सेना ) से परिचारक की तथा अनल और प्रहरण ( शस्त्र ) से औषध की उपमा दे कर दो दृष्टान्तों से वैद्य की प्रधानता स्पष्ट की गई है । यह विमर्श चक्रपाणि - सम्मत है । मृद्दण्डचक्रसूत्राद्याः कुम्भकाराहते यथा । नावहन्ति गुणं वैद्याहते पादत्रयं तथा ॥ १३ ॥
और भी — जिस प्रकार मिट्टी, दण्ड, चक्र और सूत्र इन चारों के रहते हुए भी विना कुम्हार के घड़े की उत्पत्ति नहीं हो सकती । उसी प्रकार पादत्रय के होने पर भी वैद्य के अभाव में आरोग्य की प्राप्ति नहीं होती है ॥ १३ ॥
विमर्श - एक - ' पक्तौ हि कारणम् ' तथा दूसरा ' विजेतुर्विजये भूमिः ' इन दो उदाहरणों से वैद्य को प्रधान कारण बताया गया है । पहला अन्वय का उदाहरण है । दूसरा ' मृद्दण्डचक्र ' व्यतिरेक का उदाहरण है । इन दोनों अन्वय और व्यतिरेक दृष्टान्त से वैद्य को चिकित्सा की सिद्धि में प्रधान माना गया है । सुश्रुत ने भी स्पष्ट रूप से यही कहा है- ' वैद्यो व्याध्युपसृष्टश्च भेषजं परिचारकः । एते पादाश्चिकित्सायाः कर्मसावनहेतवः || गुणवद्भिस्त्रिभिः पादैश्चतुर्थो गुणवान् भिषक् । व्याधिमल्पेन कालेन महान्तमपि साधयेत् ॥ वैद्यहीनास्त्रयः पादा गुणवन्तोऽप्यपार्थकाः । उद्गानुहोतृब्रह्माणी यथाऽध्वर्यु विनाऽध्वरे || वैद्यस्तु गुणवानेकस्तारयेदातुरं सदा । लवं प्रतितरैहनं कर्णधार इवाम्भसि ॥ ” ( सू.अ. ३४ ) गन्धर्वपुरवन्नाशं यद्विकाराः सुदारुणाः । यान्ति यच्चेतरे वृद्धिमाशूपायप्रतीक्षिणः ॥ १४ ॥
सति पादत्रये ज्ञाज्ञौ भिषजावत्र कारणम् । और भी - रोगी, परिचारक और औषधि इन तीनों पादों के रहते हुए जो भयंकर रोग, गन्धर्व नगर के समान शीघ्र ही नष्ट हो जाते है तथा दूसरे रोग जो शीघ्र ही अपने उपाय की प्रतीक्षा करते हैं, वे रोग तीनों पादों के रहते हुए शीघ्र बढ़ जाते है । इन दोनों अवस्थाओं में क्रमशः ज्ञानी तथा अज्ञानी वैद्य ही कारण होता है ॥ १४ ॥
विमर्श - जादूगर अपने जादू के बल पर जो एक नगर का निर्माण करके दिखा देता है तथा अकस्मात् मेघों के एकत्र होने पर आकाश में नगर के समान या घर के समान जो दृश्य दृष्टिगत होता है उसे ' गन्धर्वपुर ' कहते हैं । इस प्रकार का दृश्य माया से होता है । नारद मोह के समय भगवान् ने माया से ही नगर का निर्माण और स्वयंवर - रचना की थी । फिर माया खींच लेने पर शीघ्र ही नगर विलुप्त हो गया था । इसी प्रकार गुणवान् तीनों पादों के साथ गुणवान् या बुद्धिमान् वैद्य भी उपस्थित है तो शीघ्र ही रोग दूर हो जाते हैं । अर्थात् जहाँ जहाँ ज्ञानी वैद्य रहेगा वहाँ - वहाँ रोग का नाश अवश्य होगा । यह अन्वय का उदाहरण है । गुणवान् तीनों पादों के रहते शीघ्र चिकित्सा की अपेक्षा रखने वाले रोग जो बढ़ जाते हैं, उसमें मूर्ख वैद्य ही कारण होता है । अर्थात् गुणवान् वैद्य के अभाव में आरोग्याभाव हो जाता है । यह व्यतिरेक का उदाहरण है । इस प्रकार गुणवान् तीनों पादों के रहते हुए गुणवान् वैद्य के होने पर आरोग्य लाभ और गुणवान् वैद्य के
अभाव में आरोग्याभाव हो जाता है ।
वरमात्मा हुतोऽज्ञेन न चिकित्सा प्रवर्तिता ॥ १५ ॥
पाणिचाराद्यथाऽचक्षुरज्ञानाद्भीतभीतवत् । नौर्मारुतवशेवाज्ञो भिषक् चरति कर्मसु ॥ १६ ॥
१. ' हतोऽशेन ' इति पा ० ।
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खुड्डाकचतुष्पादाध्यायः ९ ] सूत्रस्थानम् १६७ अयोग्य व्यक्ति से चिकित्सा कराने का निषेध - अपनी आत्मा को अग्नि में हवन कर देना अच्छा है किन्तु अज्ञानी वैद्य से चिकित्सा कराना अच्छा नहीं है । जिस प्रकार अन्धा व्यक्ति अपनी अज्ञानता ( न देखने ) के कारण भयभीत होकर डरपोक व्यक्ति के समान हाथ से या डण्डे से टटोल - टटोल कर चलता है तथा वायु के वशीभूत नौका जल में जिस प्रकार चंचल परिस्थिति में रहती है वही स्थिति मूर्ख वैद्य की चिकित्सा कर्म में होती है ॥ १५-१६ ॥ विमर्श - तात्पर्य यह है कि जैसे आँधी में पड़ कर कोई बिरली ही नौका भाग्यवश वच पाती है, उसी प्रकार मूर्ख वैद्य की चिकित्सा से कोई भाग्यवान व्यक्ति ही बच पाता है । मूर्ख वैद्य भी चिकित्सा - कार्य में घबड़ाया हुआ ही रहता है । यदृच्छया समापन्नमुत्तार्यं नियतायुषम् । भिषङ्मानी निहन्त्याशु शतान्यनियतायुषाम् ॥ औरभी - नियत आयु वाले, शरण में आए हुए रोगियों को यदृच्छा ( भाग्यवश ) से अच्छा कर लेने पर वैद्याभिमानी मूर्ख वैद्य अनियत आयु वाले सैकड़ों रोगियों को शीघ्र ही मार डालता है ॥ १७ ॥
विमर्श - मनुष्यों की आयु नियत और अनियत दो तरह की होती है । नियत आयु वाले मनुष्य भी वैद्य के अपराध, औषधियों के अनुचित प्रयोग तथा मिथ्याहार - विहारादि से अकाल में ही मर जाते हैं । अर्थात् अनियत आयु वालों की मृत्यु तो मूर्ख वैद्य के द्वारा हो ही जाती है इसीलिए कहा गया है— ' देवे पुरुषकारे च स्थितं ह्यस्य बलाबलम् । दैवमात्मकृतं विद्यात् कर्म यत् पौर्वदेहिकम् ॥ स्मृतः पुरुषकारस्तु क्रियते यदिहापरम् । बलाबलविशेषोऽस्ति तयोरपि च कर्मणोः ॥ दैवं पुरुषकारेण दुर्बलं ह्युपहन्यते । दैवेन चेतरत् कर्म विशिष्टेनोपहन्यते ॥ दृष्ट्वा यदेके मन्यन्ते नियतं मानमायुषः । कर्म किंचित् कचित्काले विपाके नियतं महत् । किञ्चित्त्वकालनियतं प्रत्ययैः प्रतिबोध्यते ॥ ' ( च.वि. अ. ३ ) । इस प्रकार नियत और अनियत आयु की कल्पना कर आयु का पूर्णरूप से भोग करने के लिये युक्ति की अपेक्षा मानी गयी है । अतः यदि उत्तम गुणयुक्त चतुष्पाद का चिकित्सा में प्रयोग किया जाता है तो नियत एवं अनियत आयु वालों के लिये लाभ होता है । तीनों पादों के गुणवान् रहते हुए भी वैद्य यदि मूर्ख रहता है तो कदाचित् नियत आयु वाले की प्राणरक्षा ' घुणाक्षरन्याय ' से हो भी जाय पर अनियत आयु वालों की मृत्यु तो निश्चित रूप से ही हो जाती है । अतः मूर्ख वैद्य से चिकित्सा कभी नहीं करानी चाहिए । इसी बात को वृद्ध वाग्भट ने भी स्पष्ट किया है, यथा - ' ते घुणाक्षरवत् कञ्चिदुत्तार्थं नियतायुषम् । घ्नन्ति वैद्याभिमानेन शतान्यनियतायुषाम् ॥ ' ( अ. सं. उत्तर अ. ५० ) । * तस्माच्छास्त्रेऽर्थविज्ञाने प्रवृत्तौ कर्मदर्शने । भिषक् चतुष्टये युक्तः प्राणाभिसर उच्यते ॥१८ ॥
प्राणाभिसर वैद्य के लक्षण - इसलिए शास्त्र के अध्ययन में तत्पर रहना, शास्त्र के अर्थ को समझने में उचित परिश्रम करना, स्वयं करना और अन्यत्र हुए या होने वाले कर्मों को बार - बार देखना, इस प्रकार इन चार कर्मों में सदा तत्पर रहने वाले वैद्य को प्राणाभिसर कहा जाता है ॥ १८ ॥
विमर्श - प्राणाभिसर शब्द की व्युत्पत्ति इस प्रकार है- ' प्राणान् गच्छतो व्यावर्तयतीति प्राणाभिसरः ' अर्थात् जाते हुए प्राणों को जो लौटा लाता है उसे प्राणाभिसर कहते हैं । * हेतौ लिङ्गे प्रशमने रोगाणामपुनर्भवे । ज्ञानं चतुर्विधं यस्य स राजार्हो भिषक्तमः ॥१ ९ ॥ राजा के योग्य वैद्य के लक्षण - ( १ ) हेतु, ( निदान ), ( २ ) लिङ्ग ( रोगों के लक्षण ), ( ३ ) प्रशमन ( रोगों की शान्ति के उपाय ) और ( ४ ) रोगों के पुनः उत्पन्न न होने के यत्न, इन चार विषयों का ज्ञान रखने वाला कुंशल वैद्य राजा का चिकित्सक होने योग्य होता है || १ ९ ||