चरक संहिता हिन्दी भाष्य — पृष्ठ 291–300

चरक संहिता हिन्दी भाष्य · Chaukhamba · पृष्ठ 291–300

पृष्ठ 291

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१६८ चरकसंहिता विमर्श - तात्पर्य यह है कि आयुर्वेद के त्रिसूत्र ' हेतुलिङ्गौषधज्ञानम् ' का पूर्ण ज्ञाता ही राजा के योग्य वैद्य होता है । यद्यपि रोगों के ज्ञान के लिये पूर्वरूप, उपशय, संप्राप्ति इन तीनों का ज्ञान भी आवश्यक है पर व्युत्पत्ति से यहाँ लिङ्ग में ही ( लिङ्गयन्ते ज्ञायन्ते व्याधयोऽनेनेति लिङ्गम् ) पूर्वरूप, उपशय और संप्राप्ति का अन्तर्भाव कर लिया गया है । चौथा ज्ञान यह भी आवश्यक होता है कि रोग की उत्पत्ति ही न होने दे, यथा- ' दोषाः कदाचित् कुप्यन्ति जिता लङ्घनपाचनैः । ये तु संशोधनैः शुद्धा न तेषां पुनरुद्भवः ॥ ' ( च. सू. अ १६ ) | आयुर्वेद के प्रयोजन भी दो बतलाए गए हैं -- ' स्वस्थानां स्वास्थ्यरक्षणं, व्याधितानां व्याधिपरिमोक्षः ' रोग हो जाने पर उसको चिकित्सा के लिए हेतु, लिङ्ग, औषध की अपेक्षा होती है और यदि मनुष्य स्वस्थ है तो उसे रोग न होने पावे ऐसी युक्ति और नियमों को जानना भी आवश्यक होता है । इस प्रकार का ज्ञान रखने वाला वैद्य ही राजा का चिकित्सक हो सकता है । * शस्त्रं शास्त्राणि सलिलं गुणदोषप्रवृत्तये । पात्रापेक्षीण्यतः प्रज्ञां चिकित्सार्थं विशोधयेत् ॥ शस्त्रादि के सम्बन्ध में पात्र की महत्ता - शस्त्र, शास्त्र और जल, इनमें पात्र के अनुसार गुण और दोषों की उत्पत्ति हो जाती है । आयुर्वेद भी शास्त्र है अतः इसके अध्ययन के पूर्व पढ़ने वाले शिक्षार्थी को अपनी बुद्धि की शुद्धि कर लेनी चाहिए ॥ २० ॥

विमर्श - बुद्धि के ठीक न होने पर अध्ययन किया हुआ आयुर्वेद या कोई भी शास्त्र हानि-कारक ही होता है । जैसे किसी हिंसक व्यक्ति के हाथ में पिस्तौल दे दी जाय तो वह अनेक निरीह व्यक्तियों का वध कर देगा, किन्तु वही पिस्तौल यदि किसी अच्छे व्यक्ति के हाथ में दी जाय तो वह चोर, डाकुओं और हिंसक जन्तुओं से अपनी या अन्य जनों की रक्षा करने के काम आयेगी । * विद्या वितर्कों विज्ञानं स्मृतिस्तत्परता क्रिया । यस्यैते षड्गुणास्तस्य न साध्यमतिवर्तते ॥ उत्तम वैद्य के ६ गुण -- ( १ ) विद्या, ( २ ) वितर्क ( तर्क करना ), ( ३ ) विज्ञान ( ' विज्ञानं शिल्पशास्त्रयोः ' अमर. ), ( ४ ) स्मृति, ( ५ ) तत्परता ( चिकित्सा में तत्पर रहना ) और ( ६ ) क्रिया ( चिकित्सा करना ) ये ६ गुण जिस वैद्य में रहते है उस वैद्य से कोई भी साध्य रोग अच्छा न हो ऐसा नहीं होता अर्थात् साध्य रोग अच्छे हो ही जाते हैं ॥ २१ ॥

* विद्या मतिः कर्मदृष्टिरभ्यासः सिद्धिराश्रयः । वैद्यशब्दाभिनिष्पत्तावलमेकैकमप्यतः ॥२२ ॥

और भी - ( १ ) विद्या - आयुर्वेदशास्त्र का पूर्ण ज्ञान, ( २ ) मति - निर्मल बुद्धि, ( ३ ) कर्मदृष्टि - चिकित्साकर्म को बार - बार देखना, ( ४ ) कर्मों का अभ्यास, ( ५ ) सिद्धि – चिकित्सा कार्य में सफलता के लिए सिद्धि का होना और ( ६ ) आश्रय - श्रेष्ठ गुरुजनों के अधीन रहना, इन ६ गुणों में से एक गुण का रहना भी ' वैद्य ' नाम ग्रहण कराने के लिए पर्याप्त है ॥२२ ॥

यस्य वे गुणाः सर्वे सन्ति विद्यादयः शुभाः । स वैद्यशब्दं सद्भूतमेर्हन् प्राणिसुखप्रदः ॥२३ ॥

और भी - • विद्या आदि सभी शुभ गुणों से युक्त वैद्य यथार्थ में वैद्य शब्द को चरितार्थ करते हुए प्राणिमात्र को सुख देने वाला होता है ॥ २३ ॥

* शास्त्रं ज्योतिः प्रकाशार्थं दर्शनं बुद्धिरात्मनः ।

ताभ्यां भिषक् सुयुक्ताभ्यां चिकित्सन्नापराध्यति ॥ २४ ॥

शास्त्र और बुद्धि का सम्बन्ध G वस्तुओं को प्रकाशित करने के लिए शास्त्र ज्योति ( दीप के समान ) है और शुद्ध बुद्धि दर्शन ( नेत्र के समान ) है । इन निर्मल शुद्ध बुद्धि और शास्त्ररूपी दीप से युक्त होकर जो चिकित्सा करता है उससे अपराध नहीं होता ॥ २४ ॥

विमर्श - तात्पर्य यह है कि जैसे नेत्र के रहते हुए भी दीप ( प्रकाश ) न रहने पर तथा प्रकाश १. सद्भूतमर्हेत् ' यो । २. ' दर्शनमिव दर्शनं चक्षुरिवेत्यर्थः ' इति चक्रः ।

पृष्ठ 292

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खुड्डाकचतुष्पादाध्यायः ९ ] सूत्रस्थानम् १६६ के रहते, नेत्र न होने पर भी विषयों का ज्ञान नहीं होता है, दोनों के रहने पर ही लौकिक वस्तुओं का ज्ञान होता है, उसी प्रकार रोग और चिकित्सा इन दोनों को प्रकाशित करने वाला, आयुर्वेद शास्त्र दीप के समान है और निर्मल बुद्धि नेत्र के समान है । शास्त्र पढ़ने पर भी बुद्धि ठीक न हो, या बुद्धि ठीक रहते हुए भी किसी ने आयुर्वेद शास्त्र न पढ़ा हो तो वह रोग और चिकित्सा का ज्ञान ठीक - ठीक नहीं कर पायेगा । फलतः आरोग्य - दान देने में वह वैद्य सफल न हो सकेगा । शास्त्र का अध्ययन और निर्मल बुद्धि दोनों के सहारे चिकित्सा करते हुए असफल होने की कम सम्भावना रहती है । ॐ चिकित्सिते त्रयः पादा यस्माद्वैद्यन्यपाश्रयाः । तस्मात् प्रयत्नमातिष्ठेद्भिषक् स्वगुणसंपदि ॥ चिकित्सक को सदा गुण बढ़ाना चाहिये - क्योंकि चिकित्सा कार्य करने में आतुर आदि तीन पाद वैद्य के ही अधीन रहते हैं । अतः वैद्य को वैद्यत्व ( विद्या, वितर्क तथा विद्यामति आदि गुणों की सम्पन्नता ) प्राप्त करने के लिये पूरा प्रयत्न करना चाहिये ॥ २५ ॥

I मैत्री कारुण्यमार्तेषु शक्ये प्रीतिरुपेक्षणम् । प्रकृतिस्थेषु भूतेषु वैद्यवृत्तिश्चतुर्विधा ॥ २६ ॥

वैद्य की चार वृत्तियाँ - ( १ ) मैत्री - प्राणिमात्र के साथ मित्रता का व्यवहार, ( २ ) आर्तेषु कारुण्यम् — रोगी व्यक्तियों पर दया का भाव, ( ३ ) शक्ये प्रीतिः - साध्य रोगों में प्रेमपूर्वक चिकित्सा करना और ( ४ ) प्रकृतिस्थेषु भूतेषु उपेक्षणम् - असाध्य रोगी या रोग में उपेक्षा का भाव रखना, वैद्यों में ये चार प्रकार की वृत्तियाँ होनी चाहिए ॥ २६ ॥

विमर्श - चक्रपाणि ने प्रकृतिस्थ का अर्थ किया है - मरण के समीप गया हुआ । रघुवंश में भी कालिदास ने कहा है- ' मरणं प्रकृतिः शरीरिणां विकृतिजीवनमुच्यते बुधैः ' ( सर्ग ६ ) । तीसवें अध्याय में भी बताया जायगा - ' तत्र स्वभावः प्रवृत्तेरुपरमो मरणमनित्यता निरोध इत्येको ऽर्थ: ' । वृद्ध वाग्भट ने भी कहा है - ' सर्वत्र मैत्री करुणाऽऽतुरेषु निरामदेहेषु नृषु प्रमोदः । मनस्युपेक्षा प्रकृर्ति व्रजत्सु वैद्यस्य सद्वृत्तमलं करोति ॥ ' ( अं ० सं ० उ ० अ ० ५० ) । योगदर्शन में योगियों के लिए भी यही उपदेश है - ' मैत्री करुणामुदितोपेक्षाणां सुखदुःखपुण्यापुण्यविषयाणां भावनातश्चि-त्तप्रसादनम् ' । ( समाविपाद सूत्र ३३ ) । तत्र श्लोकौ — भिषग्जितं चतुष्पादं पादः पादश्चतुर्गुणः । भिषक् प्रधानं पादेभ्यो यस्माद्वैद्यस्तु यद्गुणः ॥२७ ॥

ज्ञानानि बुद्धिर्ब्राह्मी च भिषजां या चतुर्विधा । सर्वमेतञ्चतुष्पादे खुड्डाके संप्रकाशितम् ॥२८ ॥

इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते सूत्रस्थाने निर्देशचतुष्के खुडाकचतुष्पादो नाम नवमोऽध्यायः ॥ ९ ॥

अध्यायगत विषयों का उपसंहार - इस ' खुड्डाकचतुष्पाद ' अध्याय में निम्नलिखित विषयों का वर्णन किया गया है - रोग निवारण में चिकित्सा के चार पादों की प्रधानता, चारों पादों के चार - चार गुण, चारों पादों में वैद्य की प्रधानता, वैद्यों में होने वाले गुण और उनसे होने वाले लाभ, वैद्यों का ज्ञान और वैद्यों की चार प्रकार की व्यावहारिक बुद्धि ॥ २७-२८ ॥ चरक के द्वारा प्रतिसंस्कृत अग्निवेशकृततन्त्र ( चरकसंहिता ) के सूत्रस्थान में निर्देशचतुष्कविषयक खुड्डाकचतुष्पाद नामक नवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ ९ ॥

१. शक्ये साधयितुं शक्ये व्याधौ प्रीतिश्चिकित्सितुं ग्रहणं प्रकृतिशब्देनेह मरणमुच्यते, प्रकृ तिस्था आसनमृत्यनः । उपेक्षणं चिकित्सार्थमग्रहणम् ।

पृष्ठ 293

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२०० चरकसंहिता अथ दशमोऽध्यायः अथातो महाचतुष्पादमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥

इति ह स्माह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥

अब ( खड्डाकचतुष्पाद अध्याय के बाद ) महाचतुष्पाद अध्याय की व्याख्या की जायगी || १ || जैसा कि भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥ २ ॥

.. विमर्श - पहले अध्याय में षोडशगुणयुक्त चिकित्सा के चार पादों का उपदेश किया गया है जो रोग - शान्ति में आवश्यक है, किन्तु यह भी देखा जाता है कि चतुष्पाद के रहने भी रोगी मर जाते हैं, तथा बिना चतुष्पाद के भी रोग को शान्ति हो जाती है । इस प्रकार दिखलाई पड़ने वाली अनेक विप्रतिपत्तियों का समाधान इस ' महाचतुष्पाद ' अध्याय में किया जायगा । चतुष्पादं षोडशकलं भेषजमिति, भिषजो भाषन्ते यदुक्तं पूर्वाध्याये षोडशगुणमिति, तद्भेषजं युक्तियुक्तमलमारोग्यायेति भगवान् पुनर्वसुरात्रेयः ॥ ३ ॥

( १ ) चतुष्पाद की सार्थकता से सम्बन्धित विवाद ( Doubts about the Utility of Four Limbs of Treatment ) चतुष्पाद की सार्थकता - षोडशकलाओं ( गुणों ) से युक्त चतुष्पाद भेषज ( चिकित्सा ) होता है, ऐसा वैद्य - समुदाय कहता है । जो पहले के अध्याय में ' षोडश ' शब्द से कहा गया है, वह षोडशगुणयुक्त चतुष्पाद भेषज युक्तियुक्त प्रयुक्त होने पर ही वैद्य आरोग्यदान में समर्थं होता है, ऐसा भगवान् पुनर्वसु आत्रेय ने कहा है ॥ ३ ॥

नेति मैत्रेयः, किं कारणं? दृश्यन्ते ह्यातुराः केचिदुपकरणवन्तश्च परिचारकसंपन्ना-श्वात्मवन्तश्च कुशलैश्च भिषग्भिरनुष्ठिताः समुत्तिष्ठमानाः, तथायुक्ताश्चापरे त्रियमाणाः, तस्माद्भेषजमकिंचित्करं भवति; तद्यथा - व सरसि वा प्रसिक्तमल्पमुदकं, नद्यां वा स्यन्द-मानायां पांसुधाने वा पांसुमुष्टिः प्रकीर्ण इति; तथाऽपरे दृश्यन्तेऽनुपकरणाश्चापरिचार-काश्चानात्मवन्तश्चाकुशलैश्च भिषग्भिरनुष्ठिताः समुत्तिष्टमानाः, तथायुक्ता त्रियमाणाश्चा-परे । यतश्च प्रतिकुर्वन् सिध्यति, प्रतिकुर्वन् म्रियते; अप्रतिकुर्वन् सिध्यति, अप्रतिकुर्वन् म्रियते; ततश्चिन्त्यते भेषजमभेषजेनाविशिष्टमिति ॥ ४ ॥

( क ) मैत्रेय का चतुष्पाद - विषयक विचार ( पूर्वपक्ष ) ( Views of Maitreya ) मैत्रेय की शंका --- भगवान् पुनर्वसु आत्रेय के इन वचनों को सुनकर मैत्रेय ने कहा- नहीं, जैसा आप कह रहे हैं वह ठीक नहीं है । क्योंकि प्रत्यक्ष देखा जाता है कि चिकित्सा के सभी उपकरणों और सेवक ( नौकर ) से युक्त कुछ रोगी जितेन्द्रिय रहते हुए कुशल वैद्य से चिकित्सा कराकर रोग-निर्मुक्त हो जाते हैं किन्तु चिकित्सा के सभी उपकरण एवं गुणवान् चतुष्पाद के रहते हुए भी कुछ रोगी भर जाते हैं । अतः आरोग्य के प्रति औषध कारण नहीं है । जैसे एक बड़े गहरे गढ़े या तालाब में थोड़ा जल अथवा बहती हुई नदी या धूल के ढेर में एक मुठ्ठी धूल छोड़ देने से कोई लाभ नहीं होता । और दूसरे कुछ रोगी चिकित्सा के साधन तथा परिचारक के न रहते हुए, स्वयं १. ' षोडशकलं षोडशगुणम् ' इति चक्रः । ३. श्वभ्रं गर्ते । २. ' भिषग्भिरुपक्रान्ताः इति पा ० । ४. ' उपक्रान्ताः ' इति प्रा ०५ इति मैत्रेयः यो ।:

पृष्ठ 294

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महाचतुष्पादाध्यायः १० ] सूत्रस्थानम् २०१ असंयमी रहते हुए मूर्ख वैद्य द्वारा चिकित्सा कराकर आरोग्य लाभ कर लेते हैं । कुछ रोगी साधन और परिचारक के अभाव में, असंयमी रहते हुए मूर्ख वैद्य से चिकित्सा कराने से मर भी जाते है, क्योंकि चिकित्सा करने पर आरोग्य लाभ होता है और चिकित्सा करने पर मृत्यु भी होती है: प्रतीत होता है कि औषध करना और न करना इन दोनों में कुछ विभिन्नता नहीं है ॥ ४ ॥

विमर्श - मैत्रेय के मत में चिकित्सा करना या चिकित्सा न करना ये दोनों बराबर हैं । इसके लिए उन्होंने यहाँ दो उदाहरण दिये हैं- ( १ ) बड़े गढ़े या तालाब में थोड़ा जल डालना, अर्थात् जो रोगी मरणोन्मुख है उसमें थोड़ा औषध देना व्यर्थ है । ( २ ) बहती हुई नदी में एक - मुट्ठी भर धूलि छोड़ देना अथवा धूलि के ढेर में एक मुट्ठी धूलि छोड़ना अर्थात् उत्कट दोष युक्त रोगी में अल्प औषध का प्रयोग करना व्यर्थ है । उपर्युक्त दोनों उदाहरणों के दो तात्पर्य हैं - ( १ ) चिकित्सा - - संशोधन और संशमन दो तरह की होती है । जल का उदाहरण देकर संशोधन चिकित्सा को और धूलि का उदाहरण देकर संशमन चिकित्सा को व्यर्थ सिद्ध किया गया है । अथवा ( २ ) अपतर्पण और संतर्पण दो चिकित्सायें होती हैं । धूलिका दृष्टान्त अपतर्पण तथा जल का दृष्टान्त संपतर्पण चिकित्सा को व्यर्थ सिद्ध करने के लिये दिया गया है । ये उदाहरण देते हुए मैत्रेय ने यह शंका उपस्थित की है कि जब अपने भाग्य से ही रोगी जीते और मरते हैं तो चिकित्सा की सिद्धि में षोडशगुणयुक्त चतुष्पाद कारण है यह जो पहले अध्याय में बताया गया है वह व्यर्थ है । जो कोई भी रोगी अच्छा होता या मरता है । उसमें केवल उसका भाग्य ही कारण होता है । उपर्युक्त शंका आज भी उतनी ही सत्य है जितनी सहस्राब्दियों पूर्व सत्य थी । मैत्रेय! मिथ्या चिन्त्यत इत्यात्रेयः, किं कारणं, ये ह्यातुराः षोडशगुणसमुदितेनानेन भेषजेनोपपद्यमाना त्रियन्त इत्युक्तं तदनुपपन्नं, न हि भेषजसाध्यानां व्याधीनां भेषजम-कारणं भवति; ये पुनरातुराः केवलाद्वेषजाहते समुत्तिष्ठन्ते, न तेषां संपूर्णभेषजोपपादनाय समुत्थानविशेषो नास्ति, यथा हि पतितं पुरुषं समर्थमुत्थानायोत्थापयन् पुरुषो बलमस्यो-पादध्यात् स क्षिप्रतरमपरिक्लिष्ट एवोत्तिष्ठेत्, तद्वत् संपूर्णभेषजोपलम्भादातुराः, ये चातुराः केवलाद्भेषजादपि त्रियन्ते, न च सर्व एव ते भेषजोपपन्नाः समुत्तिष्ठेरन्, नहि सर्वे व्याधयो भवन्त्युपायसाध्याः, न चोपायसाध्यानां व्याधीनामनुपायेन सिद्धिरस्ति, न चासाध्यानां व्याधीनां भेषजसमुदायोऽयमस्ति न ह्यलं ज्ञानवान् भिषङ्मुमूर्षुमातुरमुत्थापयितुं, परी-t यकारिणो हि कुशला भवन्ति, यथा हि योगज्ञोऽभ्यासनित्य इष्वासो धनुरादायेषुमस्य-नातिविप्रकृष्टे महति काये नापराधवान् भवति, संपादयति चेष्टकार्यं, तथा भिषक् स्वगुण-संपन्न उपकरणवान् वीर्य कर्मारभमाणः साध्यरोगमनपराधः संपादयत्येवातुरमारोग्येण; तस्मान्न भेषजमभेषजेनाविशिष्टं भवति ॥ ५ ॥

( ख ) आत्रेय का चतुष्पाद विषयक सार्थकता - समर्थन ( उत्तरपक्ष ) ( Views of Atreya ) आत्रेय का समाधान - आचार्य पुनर्वसु आत्रेय ने कहा कि हे मैत्रेय! आप गलत सोच रहे हैं । षोडशगुण से युक्त चिकित्सा से चिकित्सित होने पर भी रोगी मर जाते हैं, यह ठीक १. ' मिथ्या विचिन्त्यत इत्यात्रेयः ' यो: २. ' केवलात् संपूर्णात् ' इति चक्रः । ३. ' न नास्तीत्युभयनकारकरणादस्ति समुत्थानविशेष इत्यर्थः ' इति चक्रः । समुत्थानविशेषः कारणविशेषः । ' समुत्थानविशेषोऽस्ति ' ग. यो. । ४. ' इष्वासो धानुष्कः ' इति चक्रः ।. ५... ' परीक्ष्य ': यो ।

पृष्ठ 295

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२०२ चरकसंहिता नहीं है- क्योंकि औषध प्रयोग से साध्य होने वाली व्याधियों में औषध का प्रयोग व्यर्थ नहीं होता है, और षोडशकल चिकित्सा के विना ही रोगोन्मुक्त हो जाने वाले रोगी की चिकित्मा में षोडशगुणयुक्त चिकित्सा की कोई विशेष आवश्यकता नहीं है । यह बात नहीं है क्योंकि जैसे कोई मनुष्य फिसल कर गिर पड़ा हो और स्वयं उठ खड़े होने में समर्थ भी हो, पर यदि दूसरा व्यक्ति अपना बल लगा कर, हाथ पकड़ कर उठा दे तो वह गिरा हुआ व्यक्ति शीघ्र ही उठ खड़ा होता है इसी तरह जो रोगी स्वयं साध्य है उस पर यदि सम्पूर्ण चिकित्सा का प्रयोग किया जाता है तो वह अतिशीघ्र आरोग्य लाभ करता है । आपका यह कथन भी ठीक नहीं कि कुछ रोगी सम्पूर्ण षोडशकल चिकित्सा के प्रयोग होने पर भी मर जाते हैं, क्योंकि यह कोई आवश्यक नहीं है कि जितने रोगियों की षोडशकल चिकित्सा की जाती है वे सभी अच्छे ही हो जायँ, क्योंकि सभी व्याधियाँ चिकित्सा से साध्य नहीं होतीं । जो रोग उपाय ( चिकित्सा ) से साध्य हैं वे विना उपाय ( चिकित्सा ) के अच्छे भी नहीं होते । असाध्य व्याधियों के लिए इस षोडशकल भेषज ( चिकित्सा ) का विधान भी नहीं है क्योंकि विद्वान् और ज्ञानसम्पन्न वैद्य भी मरणोन्मुख रोगियों को अच्छा करने में समर्थ नहीं होते । चिकित्सा करते समय परीक्षा करने के बाद जो कार्य करते हैं वे ही कुशल ( सफल ) होते है । जैसे योगज्ञ ( धनुष पर बाण रखने की विधि जानने वाला ) और बाण चलाने में अभ्यस्त व्यक्ति का लक्ष्य बहुत दूर न हो, और उस लक्ष्य का स्वरूप बड़ा हो तो वह लक्ष्य बेधने में अपराधी ( विफल ) नहीं होता, किन्तु पूर्ण सफल रहता है । इसी प्रकार अपने गुणों से युक्त वैद्य चिकित्सा की सभी सामग्री से युक्त हो कर रोगियों के साध्यासाध्य रोगों की परीक्षा कर चिकित्सा का प्रयोग करता है तो साध्य रोगों में विफल नहीं होता है अपितु रोगियों को आरोग्यलाभ से युक्त कर देता है । इसलिए यह कहना ठीक नहीं है कि भेषज ( चिकित्सा ) और अभेषज ( अचिकित्सा ), इन दोनों में भिन्नता नहीं है ॥ ५ ॥

विमर्श - तात्पर्य यह है कि असाध्य रोगों में औषध प्रयोग करना व्यर्थ है । आगे बताया भी गया है कि असाध्य रोगियों की चिकित्सा करने से क्या होता है, यथा – ' अर्थविद्याय शोहानि-मुपक्रोशमसंग्रहम् । प्राप्नुयान्नियतं वैद्यो योऽसाध्यं समुपाचरेत् ॥ ' ( श्लोक ८ ) । अतः साध्य रोगों में चिकित्सा करने से शीघ्र और सुखसाध्य रोगों में चिकित्सा करने से अतिशीघ्र लाभ होता है । यदि साध्य रोगों में चिकित्सा न की जाये तो क्रमशः साध्य व्याधियाँ कृच्छ्रसाध्य या याप्य होकर असाध्य हो जाती हैं । अतः चिकित्सा का प्रयोग अवश्य करना चाहिए । इस प्रसङ्ग को संक्षेप में सुन्दर ढंग से भेल ने भी उपस्थित किया है, यथा- ' सिध्यति प्रतिकुर्वाण इत्यात्रेयस्य शासनम् । अपि चाप्रतिकुर्वाण इत्याह भद्रशौनकः ॥ गुणवानातुरो द्रव्यभिषक्परिचरान्वितः । दृश्यते विफलो यस्मात्सफलस्तु विपर्य्यये ॥ तस्मान्नैकान्तिकी सिद्धिश्चतुष्पादचिकित्सिते । न त्वेतां बुद्धिमात्रेयः शौनकस्यानुमन्यते ॥ प्रतिकुर्वति सिद्धिर्हि वर्णोत्साहबलान्विता । न च स्याद्धयाधि-बहुला न त्वेवाप्रतिकुर्वति || दुर्वर्णो दुर्बलश्च स्याद्वयाधिभिश्चाप्युपद्रुतः । विकलो वा भवत्यज्ञैरुप-क्रान्त इहातुरः ॥ न सा सिद्धिरसिद्धिः सा यां दृष्ट्वा ना विपद्यते । तस्माज्ज्ञानवतां सिद्धिं विन्देत मतिमान् भिषक् ॥ ' ( भेल. सं. सू. अ. ९ ) । अष्टाङ्गहृदय में भी संक्षेप से इस विषय को प्रस्तुत किया गया है, यथा — ' दृश्यन्ते भगवन् केचिदात्मवन्तोऽपि रोगिणः । द्रव्योपस्थातृसम्पन्ना बृद्ध-वैद्यमतानुगाः ॥ क्षीयमाणामयप्राणा विपरीतास्तथाऽपरे । हिताहितविभागस्य फलं तस्मादनिश्चितम् ॥ ’ इस प्रकार पूर्वपक्ष का उत्थान कर यह उत्तर दिया गया है – ' नमुपायमपेक्षन्ते सर्वे रोगा न चान्यथा । उपायसाध्याः सिद्ध्यन्ति नाहेतुर्हेतुमान् यतः ॥ ' ( अ.हृ. उ. अ. ४० ) ।

पृष्ठ 296

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महाचतुष्पादाध्यायः १० ] सूत्रस्थानम् २०३ * इदं च नः प्रत्यक्षं- यदनातुरेण ' भेषजेनातुरं चिकित्सामः, क्षाममक्षामेण, कृशं च दुर्बलमाप्याययामः, स्थूलं मेदस्विनमपतर्पयामः, शीतेनोष्णाभिभूतमुपचरामः, शीताभि-भूतमुष्णेन, न्यूनान् धातून् पूरयामः, व्यतिरिक्तान् ह्रासयामः, व्याधीन् मूलविपर्ययेणा-पचरन्तः सम्यक् प्रकृतौ स्थापयामः; तेषां नस्तथा कुर्वतामयं भेषजसमुदायः कान्त-तमो भवति ॥ ६ ॥

उपर्युक्त के बारे में प्रत्यक्ष प्रमाण - यह प्रत्यक्ष है कि हम दोषयुक्त रोगियों की चिकित्सा दोषरहित औषयों से, क्षीण रोगियों को चिकित्सा अक्षीण ( बृंहण ) औषधियों से, कृश और दुर्बल रोगियों की चिकित्सा पूरण ( तर्पण ) से, स्थूल और मेदस्वी रोगियों की चिकित्सा अपतर्पण से, गर्मी से पीड़ित रोगियों की शीतल औषधियों से तथा शीत से पीड़ित रोगियों की चिकित्सा उष्ण औषधियों से करते हैं । चिकित्सा करते समय हम न्यून धातुओं की पूर्ति करते हैं, और बढ़े धातुओं को घटाते हैं । इस प्रकार व्याधि के मूल ( हेतु ) के विपरीत चिकित्सा करते हुए रोगी को प्राकृतिक अवस्था में लाते हैं । इस प्रकार चिकित्सा करते और लाभ देखते हुए हम आयुर्वेदशास्त्र का औषघसमूह निश्चित रूप से लाभ करने वाला होता है - इस निश्चय पर पहुंचते है ॥ ६ ॥

भवन्ति चात्र-साध्यासाध्यविभागज्ञो ज्ञानपूर्वं चिकित्सकः । काले चारभते कर्म यत्तत् साधयतिध्रुवम् अर्थविद्यायशोहानिमुपक्रोशमसंग्रहम् । प्राप्नुयान्नियतं वैद्यो योऽसाध्यं समुपाचरेत् ॥ ८ ॥

( २ ) साध्यासाध्यता सम्बन्धी विस्तृत विचार ( Prognosis ) साध्यासाध्यता- विचार से लाभ - हानि - साध्य और असाध्य रोगों के भेदों को समझने वाला वैद्य यदि ज्ञानपूर्वक समय से चिकित्सा प्रारम्भ करता है तो निश्चित रूप से अपना कार्य सम्पन्न कर लेता है । जो वैद्य असाध्य रोगों की चिकित्सा करता है वह निश्चित रूप से ( १ ) अर्थ ( धन ) की हानि, ( २ ) विद्या की अप्रतिष्ठा, ( ३ ) यश की हानि प्राप्त करता है, ( ४ ) निन्दा का पात्र होता है ( ५ ) एवं रोगियों का संग्रह नहीं कर पाता ॥ ७-८ ॥ विमर्श - इससे सूचित किया गया है कि साध्य रोगों में भी चिकित्सा उचित काल पर करने से ही फलवती होती है, जैसा बताया गया है कि- ' अप्राप्ते वा क्रियाकाले प्राप्ते वा न कृता क्रिया । क्रियाहीनाऽतिरिक्ता वा साध्येष्वपि न सिद्ध्यति ॥ ' ( सु. सू. अ. ३५ ) । असाध्य रोगों की तो चिकित्सा नहीं ही करनी चाहिए । वृद्ध वाग्भट ने भी ऐसा ही बताया है, यथा- ' व्याधिं पुरा परीक्ष्यैवमारभेत ततः क्रियाः । स्वार्थविद्याय शोहानिमन्यथा ध्रुवमाप्नुयात् ॥ ' ( अ. सं. सू. अ. २ ) सुखसाध्यं मतं साध्यं कृच्छ्रसाध्यमथापि च । द्विविधं चाप्यसाध्यं स्याद्याप्यं यच्चानुपक्रमम् ॥ साध्यानां त्रिविधश्चाल्पमध्यमोत्कृष्टतां प्रति । विकल्पो न त्वसाध्यानां नियतानां विकल्पना ॥ साध्यासाध्यता के प्रकार - साध्य रोगों के दो भेद होते हैं - ( १ ) सुखसाध्य और ( २ ) कृच्छ्रसाध्य । असाध्य रोगों के भी दो भेद होते हैं - ( १ ) याप्य और ( २ ) अनुपक्रम | पुनः साध्य रोगों के तीन भेद होते हैं - ( १ ) अल्प - उपाय- साध्य, ( २ ) मध्य - उपाय साध्य और ( ३ ) उत्कृष्ट उपाय- साध्य । जो रोग निश्चित रूप से असाध्य होते हैं उनका कोई भेद नहीं होता ॥ ९ -१० ॥ १. ' भेषजेनातुरमुपचरामः ' इति पा ० । २. ' स्वार्थविद्या ० ' ग. यो. ।

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२०४ चरकसंहिता विमर्श -- वृद्धवाग्भट ने भी इन्हीं नेटों को माना है यथा --- ' साध्योऽसाध्य इति व्याधिर्द्विधा तौ तु पुनर्द्विधा । सुसाध्यः कृच्छ्रसाध्यश्च याप्यो यश्चानुपक्रमः ॥ ' ( सू.अ. २ ) । रोगों का साध्यासाध्यता " की दृष्टि से उपर्युक्त विभाजन चिकित्सा की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है अतएव उसे निम्नांकित रूप में सुविधा के लिये संग्रह किया जा रहा है । व्याधि ( Disease ) साध्य ( Curable ) असाध्य ( Incurable ) सुखसाध्य कृच्छ्रसाध्य ( Easily cured ) ( Cured with difficulty ) याप्य ( Palliable ) अनुपक्रम ( प्रत्याख्येय ) ( Irremediable ) अल्प- चिकित्सा - साध्य मध्य - चिकित्सा - साध्य ( Needs mild treatment ) ( Needs moderate treatment ) उत्कृष्ट - चिकित्सा - साध्य ( Needs strong treatment ) विकल्पो न त्वसाध्यानां ( No further classification ) ( असाध्य का कोई भेद नहीं ) * हेतवः पूर्वरूपाणि रूपाण्यल्पानि यस्य च । न च तुल्यगुणो दृप्यो न दोषः प्रकृतिर्भवेत् ॥

गुणैस्तुल्यो ' देशो दुरुपक्रमः । गतिरेका नवत्वं च रोगस्योपद्रवो न च ॥ १२ ॥

दोषः समुत्पत्त देहः सर्वोषधत्तमः । चतुष्पादोपपत्तिश्च सुखसाध्यस्य लक्षणम् ॥ १३ ॥

( १ ) सुखसाध्य रोगों का स्वरूप — • रोग के हेतु, पूर्वरूप और रूप अल्पमात्रा के हों, द्रोध और दृष्य समान गुण वाले न हों, रोगोत्पादक दोष रोगी की प्रकृति के अनुसार नहीं, मूल दोष के स्वाभाविक रूप से बिगड़ने का समय न हो, देश ( रोगी के शरीर का स्थान या भूमि ) चिकित्सा करने में कठिनाई उत्पन्न करने वाला न हो, रोग एक ( ऊर्ध्व वा अधः ) गति वाला हो, नवीन और उपद्रवों से रहित हो, रोग की उत्पत्ति के समय दोष एक हो, रोगी का शरीर सभी प्रकार ' की औषधियों का सेवन करने में समर्थ हो और गुणवान चिकित्सा के चारों पादों की उपस्थिति हो तो रोग सुखसाध्य होता है ॥ ११-१३ ॥ विमर्श - जब दोष दृष्य के तुल्यगुण न हो तथा प्रकृति के तुल्यगुण न हो तब रोग सुख-साध्य होता है । ( १ ) दोष तथा दृष्य का आपस में तुल्यगुण न होना- जैसे, कफ दोष से दूषित रक्त सुखसाध्य होता है- क्योंकि कफदोष प्रकृति से श्रीतल होता है और रक्त प्रकृति से उष्ण होता है । ऐसी स्थिति में रोग सुखसाध्य होगा । ( २ ) दोष तथा प्रकृति का आपस में तुल्यगुणान १. देशो भूमिरातुर ।

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महाचतुष्पादाध्यायः १० ] सूत्रस्थानम् २०५ होना – जैसे, वातिक प्रकृति वाले पुरुष को कफज या पित्तज रोग, पित्त प्रकृति वाले को कफज या वातज रोग, कफ प्रकृति वाले को पित्तज या वातज रोग हो तो ये सब सुखसाध्य होंगे । ( ३ ) दोष तथा काल के गुणों का तुल्य न होना, जैसे- शरद में कफज और वातज, हेमन्त में वातज या पित्तज रोग हो तो यह सब सुखसाध्य होगा । ( ४ ) दुरुपक्रम देश, जैसे - वातकफप्रधान आनूप देश में पित्तज रोग, वानपित्तप्रधान जाङ्गल देश में कफज रोग सुखसाध्य होते हैं । शारीरिक देश, जैसे - मर्मस्थान के रोग न हों । ( ५ ) सर्वोषविक्षम देह - रोगी तीक्ष्ण, मृदु, मध्य द्रव्यों और तीक्ष्ण, मृदु, मध्य, संशोधन, संशमन या अपतर्पण, संतर्पण आदि के प्रयोगों से विचलित न होने वाला हो । उपर्युक्त वचनों में कुछ अपवाद भी मिलता है । यथा - ' ज्वरे तुल्य दोषत्वं प्रमेहे तुल्यदोषता । रक्तगुल्मे पुराणत्वं सुखसाध्यस्य लक्षणम् ॥ ' ( मधुकोष ) । ' वर्षाशरवसन्तेषु वाताद्यैः प्राकृतः क्रमात् । प्राकृतः मुखसाध्यस्तु वसन्तशरदुद्भवः । ' ( च. चि. अ. ३ ) । ' साध्याः कफोत्था दश, पित्तजाः षड् याच्या, न साध्याः पवनाच्चतुष्कः । समक्रियत्वाद्विपमक्रियत्वाद् महात्यय-त्वाच्च यथाक्रमं ते ॥ ' ( च. चि. अ. ६ ) | ' मासे व्यतीते दशमे चिकित्स्यः । ( च. चि. अ ५ ) । ' देशप्रकृतिसात्म्यर्तुविपरीतोऽचिरोत्थितः । संपत्तौ भिषगादीनां बलसत्त्वायुषां तथा ॥ केवलं समदेहाग्नेः सुखसाध्यतमो गदः ॥ ' ( मु. सू. अ. ३५ ) । ' सर्वोषधक्षमे देहे यूनः पुंसो जितात्मनः । अमर्मगोड-ल्पहेत्वग्ररूपरूपोऽनुपद्रवः । अतुल्यदूष्यदेशर्तुप्रकृतिः पादसंपदि । ग्रहेष्वनुगुणेष्वेकदोषमार्गो नवः सुखः । सुखन्ताध्यः सुखोपायः कालेनाल्पेन साध्यते ॥ ' ( अ. सं. सू. अ. १ ) । निमित्त पूर्वरूपाणां रूपाणां मध्यमे बले । कालप्रकृतिदूपऱ्याणां सामान्येऽन्यतमस्य च ॥१४ ॥

गर्भिणीबृद्धबालानां नात्युपद्रवपीडितम् । शस्त्रक्षाराग्नि कृत्यानामनवं कृच्छ्रदेशजम् ॥१५ ॥

विद्यादेकपथं रोगं नातिपूर्णचतुष्पदम् । द्विपथं नातिकालं वा कृच्छ्रसाध्यं द्विदोषजम् || १६ || ( २ ) कृच्छसाध्यरोगों का स्वरूप — जिस रोग में हेतु, पूर्वरूप और रूप ( लक्षण ) का मध्यम बल हो, समय, प्रकृति और दूष्य इनमें किसी एक की समानता रोगोत्पादक दोष से मिलती हो, रोग गर्भिणी, वृद्ध, बालक का हो, उपद्रव तो हों पर अत्यधिक उपद्रव न हों, ऐसा रोग हुआ हो जो शस्त्र, क्षार, अग्निक्रिया के द्वारा चिकित्स्य हो. रोग पुराना हो, कठिन देश में जैसे मर्मस्थान या जङ्गली देश में, वात - पित्त का रोग या अधः शाखा, कोष्ठ या मर्मास्थि संविगत एक ही मार्ग का रोग हो पर चतुष्पाद की प्राप्ति न हो, दो मार्गों में रोग हो किन्तु अधिक पुराना रोग न हो और जो रोग ढो दोपों से उत्पन्न हो, ऐसे सब रोग कृच्छ्रसाध्य होते है ॥ १४-१६ ॥ विमर्श - अन्यत्र भी कृच्छ्रसाध्य रोगों का निरूपण किया गया है, यथा - ‘ साध्यते कृच्छ्र-साध्यम्तु यत्नेन महता चिगत् । ( नि. अ. ८ ) । तथा - ' कृच्चैरुपायैः कृच्छ्रस्तु महद्भिश्च चिरेण च । असाध्यलिङ्गसंकीर्णस्तथा शस्त्रादिसाधनः ॥ ' ( अ. सं. सू. अ. २ ) । शेषत्वादायुषो याप्यमसाध्यं पथ्यसेवया । लब्धाल्पसुखमल्पेन हेतुनाऽऽशुप्रवर्तकम् ॥१७ ॥

गम्भीरं बहुधातुस्थं मर्मसन्धिसमाश्रितम् । नित्यानुशायिनं रोगं दीर्घकालमवस्थितम् ॥१८ ॥

विद्याद् द्विदोषजम् -( ३ ) याध्य रोगों का स्वरूप – आयु के शेष रहने के कारण पथ्य आहार - विहार के सेवन से थोड़ा अच्छा होकर पुनः थोड़े ही कारण से जो रोग भयानक रूप में बढ़ जाय, जिस रोग में गम्भीर धातुओं में दोष चले गए हों, अनेक रस रक्तादि धातुओं में दोष प्रविष्ट हो गए हों, मर्मसन्धियों में दोषों का आश्रय हो गया हो, जो रोग बार - बार दौरे के रूप में आता हो, या बहुत दिनों से चला आता हो तथा जो दो दोषो से उत्पन्न हो ऐसे सब असाध्य रोग ' याप्य ' कहे जाते हैं ॥। १७-१८ । विमर्श - -- असाध्य रोग का ही एक भेद याप्य है, दोनों में भेद यह है कि असाध्य रोग में

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• २०६ चरकसंहिता आयु समाप्त हो गयी रहती है किन्तु याप्य में आयु शेष रहती है । शेष सभी लक्षण असाध्य के इसमें भी होते हैं वृद्ध वाग्भट ने इसे कर्मज रोग माना है । कर्म के क्षय होने पर ही कर्मज रोग अच्छे होते हैं और कर्म का क्षय भोग से होता है, यथा- ' नाभुक्तं क्षीयते कर्म कल्पकोटिशतैरपि । अतः कर्म के प्रबल होने से रोग अच्छा नहीं होता और आयु के शेष होने से रोगी की मृत्यु भी नहीं होती है । चिकित्सा करने से लाभ होता है पर चिकित्सा छोड़ देने पर पुनः रोग पूर्ववत् हो जाता है । वृद्धवाग्भट ने बनाया है- ' शेषत्वादायुषः पथ्यैर्याप्यः प्रायो विपर्यये । दारूपं मुखमल्पेन हेतुना स प्रतन्यते ॥ याति नाशेषतां रोगः कर्मजो नियतायुषः । प्रपतन्निव विष्कम्भेर्वार्यतेऽत्रातुरो हितैः ॥ ' ( अ. सं. सू. अ. २ ) । - तद्वत् प्रत्याख्येयं त्रिदोषजम् । क्रियापथमतिक्रान्तं सर्वमार्गानुसारिणम् ॥ १ ९ ॥ औत्सुक्यारतिसंमोहकर मिन्द्रियनाशनम् । दुर्बलस्य सुसंवृद्धं व्याधिं सारिष्टमेव च ॥२० ॥

( ४ ) प्रत्याख्येय ( अनुपक्रम ) रोगों का स्वरूप - इसी प्रकार जो रोग गम्भीर ( मैदा, मज्जा आदि में आश्रित ) हो, अनेक रस, रक्तादि धातुओं में आश्रित हो, त्रिदोषज हो, जिसकी युक्तियुक्त चिकित्सा करने पर भी लाभ न होता हो, जिस रोग में दोष अपने सभी नाग ( ऊर्ध्व, अधः, तिर्यक्, शाखा, कोष्ठ, मर्म, अस्थि सन्धि ) में आश्रित हो गए हों, बार - बार उत्सुकता, अरति ( बेचैनी ), मोह और इन्द्रियों की शक्ति का नाश हो जाता हो, पुरुष दुर्बल हो और व्याधि की शक्ति प्रबल हो और अरिष्ट के लक्षण उपस्थित हों वह रोग असाध्य होता है, इसे प्रत्याख्येय ( चिकित्सा

न करने योग्य ) कहा जाना है । १ ९ -२० ॥

B भिषजा प्राक परीच्यैवं विकाराणां स्वलक्षणम् ।

पश्चात् कर्मसमारम्भः कार्यः साध्येषु धीमता ॥ २१ ॥

रोगपरीक्षा के बाद चिकित्सा - बुद्धिमान् वैद्य को चाहिए कि वह रोगों नें उनके साध्य, अमाध्य, याप्य आदि लक्षणों की परीक्षा कर माध्य रोगों में चिकित्सा कर्म का प्रारम्भ करे ॥ २१ ॥

साध्यासाध्यविभागज्ञो यः सम्यक्प्रतिपत्तिमान् । न स मैत्रेयतुल्यानां मिथ्याबुद्धिं प्रकल्पयेत् ॥ साध्यासाध्यता से लाभ - जो प्रतिपत्तिमान् ( शास्त्रज्ञान कुशल ) वैद्य साध्य, असाध्य रोगों के भेदों को ठीक - ठीक जानता है वह मैत्रेय के समान अर्थात् कर्मवादियों की भाँति मिथ्या बुद्धि की कल्पना नहीं करता है ॥ २२ ॥

तत्र श्लोकौ -इहौषधं पादगुणाः प्रभावो भेषजाश्रयः । आत्रेय मैत्रेयमती मतिद्वैविध्यनिश्चयः ॥ २३ ॥

चतुर्विधविकल्पाश्च व्याधयः स्वस्वलक्षणाः । उक्ता महाचतुष्पादे येष्वायत्तं भिषग्जितम् || इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते सूत्रस्थाने निर्देशचतुष्के महाचतुष्पादो नाम दशमोऽध्यायः ॥ १० ॥

अध्यायगत विषयों का उपसंहार - इस महाचतुष्पाद अध्याय में औषध, चतुष्पाद के गुण और औषधसम्बन्धी प्रभाव, मैत्रेय और आत्रेय का विचार - विनिमय, इन दोनों के विचारों में निश्चित सिद्धान्त, रोगों के साध्य, सुखसाध्य आदि चार भेद और व्याधियों के साध्यासाध्य लक्षण आदि बताये गये हैं जिनके अधीन चिकित्सा होती है ॥ २३-२४ ॥ चरक के द्वारा प्रतिसंस्कृत अग्निवेशकृत तन्त्र ( चरकसंहिता ) के सूत्रस्थान में निर्देशचतुष्क-विषयक ' महाचतुष्पाद ' नामक दसवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ १० ॥

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तिस्त्रैषणीयाध्यायः ११ ] सूत्रस्थानम् २०७ अथैकादशोऽध्यायः अथातस्तिस्रैषणीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥

इति ह स्माह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥

अव ( महाचतुष्पाद अध्याय के बाद ) यहाँ तीन एषणा सम्बन्धी ' तित्रैषणीय ' अध्याय

की व्याख्या की जायगी । जैसा कि भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥ १-२ ॥

विमर्श - पूर्वोक्त निर्देश- चतुष्क के दो अध्यायों में रोग - शान्ति तथा आरोग्य लाभ के लिए चतुष्पादों का वर्णन किया गया है । पहले अध्याय में आयुर्वेद को लोकद्वय हितकारी बताया गया है, जैसे- ' तस्यायुषः पुण्यतमो वेदो वेदविदां मतः । वक्ष्यते यन्मनुष्याणां लोकयोरुभयोर्हितम् ॥ ' ( सू. अ. १ ) । उभय लोक की सिद्धि आरोग्य लाभ पर ही निर्भर है । इह लोक में प्राण पणा, धन - पणा प्रधान होती है, उसके बाद परलोक- एषणा होती है, यही समझाने के लिए इस अध्याय का वर्णन अभीष्ट हुआ है । ' इष्यन्ते अन्विष्यन्ते इति एषणाः = इच्छा: " जिसकी खोज की जाये उसे एपणा कहते हैं । इह खलु पुरुषेणानुपहतसत्त्वबुद्धिपौरुषपराक्रमेण हितमिह चामुष्मिच लोके समनु-पश्यता तिस्र एषणाः पर्येष्टव्या भवन्ति । तद्यथा - प्राणैषणा, धनैषणा, परलोकैषणेति ॥३ ॥

( १ ) तीन एषणायें ( Three Pursuits ) तीन एषणायें • मन, बुद्धि, पौरुषशक्ति और पराक्रम जिन लोगों का अनुपहत ( नष्ट न हुआ अर्थात ठीक ) है ऐसे पुरुष जो इस लोक में और परलोक में अपना कल्याण चाहते हैं उन्हें तीन पायें ( इच्छायें ) होती है - ( १ ) प्रागएषणा, ( २ ) धन- एषणा, ( ३ ) परलोक - एषणा ॥ ३ ॥

विमर्श -- प्राचीन महर्षियों ने मनुष्यों की सभी इच्छाओं को तीन भागों में विभक्त किया है । उपनिषदों में भी ( १ ) वित्तेषणा ( २ ) पुत्रैषणा और ( ३ ) लोकैषणा ये तीन विभाग किए गए हैं । पिणा - आत्मरक्षासम्बन्धी, पुत्रैषणा - सन्तान सम्बन्धी तथा लोकैषणा - समाजसम्बन्धी या स्वर्ग एवं मोक्ष - सम्बन्धी इच्छाओं की द्योतक हैं । आयुर्वेदशास्त्र में प्रतिपादित धनेषणा में पुत्रषणा और वित्तैषणा का अन्तर्भाव कर लिया गया है और एक तीसरी प्राणेषणा का निर्देश किया गया है । भेलसंहिता में तीसरी धर्मेषणा का निर्देश किया गया है, यथा- ' प्राणपणा स्यात्प्रथमा द्वितीया धनैषणा । धर्मैषणा तृतीया तु पुरुषस्य भवत्यथ || ' ( सू. अ. १५ ) | इस धर्मेषणा को परलोकैषणा में अन्तर्भाव कर लिया जाता है क्योंकि धर्म मनुष्य को परलोक देने वाला है और वही मनुष्य का चरम लक्ष्य है । कहा भी है- ' यतोऽभ्युदयनिःश्रेयससिद्धिः स धर्मः ' ( वैशेषिक १1१1२ ) । यह सभी एषणायें स्वभावतः जन्म से ही प्रत्येक मनुष्य में होती हैं । आधुनिक मनोवैज्ञानिकों की खोज के अनुसार प्रत्येक जीवधारी प्राणी का जीवन दो प्रकार के व्यवहारों से सञ्चालित होता है - ( १ ) जन्मजात ( Inherited ) और ( २ ) उपार्जित ( Acquired ) । जन्मजात व्यवहारों के दो भेद किए जाते हैं - ( १ ) सहज क्रियायें ( Reflexes ) और मूल प्रवृत्ति ( Instincts ) । उपार्जित के भी दो भेद होते हैं ( १ ) आदत ( Habits ) और ( २ ) व्यवसायात्मक कार्य ( Voluntary actions ) । मूल प्रवृत्तियों को भी पुनः तीन भागों में विभाजित किया गया है । इनका स्पष्टीकरण निम्नलिखित चक्र से हो जायगा । १. ' इष्यतेऽन्विष्यते साध्य तेऽनयेत्येषणा; प्राणो जीवितं, तत्साध्यते दीर्घत्वेन रोगानुपहतत्वेन चानयेनि प्राणैषणा । एवं धनैषणा । परलोकोपकारस्य धर्मस्यैषणा परलोकैषणा ' चक्रः ।