चरक संहिता हिन्दी भाष्य — पृष्ठ 31–40

चरक संहिता हिन्दी भाष्य · Chaukhamba · पृष्ठ 31–40

पृष्ठ 31

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[ ४ ] है । इसके एक - एक सूत्र का विवेचन कर अनेक ग्रंथों का निर्माण किया जा सकता है | महर्षिकल्प स्वनामधन्य स्व ० कविराज गङ्गाधरजी सेन ने इस ग्रंथ की ‘ जल्पकल्पतरु ' नामक टीका के आरम्भ में इसे अखिलशास्त्रविद्या कल्पद्रुम कहा है-एकमेकमुनिर्यदीयं मतं समाश्रित्य चकार शास्त्रम् । जयत्यसौ सोऽखिलशास्त्रविद्या कल्पद्रुमः सर्वफलोदयत्वात् ॥ रचयिता - इस ग्रंथ के प्रत्येक अध्याय के अन्त में पुष्पिका दी गयी है-' इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते ' तथा ग्रन्थ के प्रथम अध्याय में मृत्यु-लोक में आयुर्वेद के अवतरण क्रम के साथ ग्रन्थ के निर्माता अग्निवेश का नामोल्लेख है । यथा-ब्रह्मणा हि यथा प्रोक्तमायुर्वेदं प्रजापतिः । जग्राह निखिलेनादावश्विनौ तु पुनस्ततः ॥ अश्विभ्यां भगवान्छक्रः प्रतिपेदे ह केवलम् । ऋषिप्रोक्तो भरद्वाजस्तस्माच्छुक्रमुपागमत् ॥

सोऽनन्तपारं त्रिस्कन्धमायुर्वेदं महामतिः ।

यथावदचिरात् सर्वं बुबुधे तन्मना मुनिः ॥

तेनायुरमितं लेभे भरद्वाजः सुखान्वितम् ॥

ऋषिभ्योऽनधिकं तञ्च शशंसाऽनवशेषयन् ।

ऋषयश्व भरद्वाजाज्जगृहस्तं प्रजाहितम् ॥

अथ

पुण्यमायुर्वेदं पुनर्वसुः ।

शिष्येभ्यो दत्तवान् षड्भ्यः सर्वभूतानुकम्पया ॥

अग्निवेशश्व भेलश्च जतूकर्णः पराशरः । बुद्धेर्विशेषस्तत्रासीनोपदेशान्तरं हारीतः क्षारपाणिश्व जगृहुस्तन्मुनेर्वचः ॥ मुनेः । तन्त्रप्रणेता प्रथममग्निवेशो यतोऽभवत् ॥ ( च. सू. अ. १ ) अर्थात् ब्रह्मा से प्रजापति ने, प्रजापति से अश्विनीकुमारों ने उनसे इन्द्र ने और इन्द्र से भरद्वाज ने आयुर्वेद का अध्ययन किया । फिर भरद्वाज ने आयुर्वेद के प्रभाव से दीर्घ, सुखी और आरोग्य जीवन प्राप्त कर अन्य ऋषियों में उसका प्रचार किया । तदनन्तर पुनर्वसु आत्रेय ने अग्निवेश, भेड, जतूकर्ण, पराशर, हारीत और चारपाणि नामक छः शिष्यों को आयुर्वेद का उपदेश किया । इन छः शिष्यों में सबमें अधिक बुद्धिमान् अग्निवेश ने सर्वप्रथम एक संहिता का निर्माण किया ।

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[ 2 ] चरकसंहिता के प्रत्येक अध्याय के अन्त में दी गयी पूर्वोक्तं पुष्पिका से स्पष्ट है fo इसी अग्निवेशतन्त्र का प्रतिसंस्कार बाद में चरक ने किया और उसका नाम चरकसंहिता पड़ा । उपलब्ध चरकसंहिता में स्पष्ट उल्लेख है कि चिकित्सास्थान के १७ अध्याय तथा १२ - १२ अध्याय के कल्पस्थान और सिद्धिस्थान नहीं मिलते थे

जिनकी पूर्ति दृढबल ने की । यथा-अस्मिन् सप्तदशाध्यायाः कल्पाः सिद्धय एव च ।

नासाद्यन्तेऽग्निवेशस्य तन्त्रे चरकसंस्कृते ॥

तानेतान् कापिलबलिः शेषान् दृढबलोऽकरोत् । तन्त्रस्यास्य महार्थस्य पूरणार्थं यथातथम् ॥ ( च. चि. ३० ) इस प्रकार इस संहिता से सम्बद्ध भरद्वाज, आत्रेय, अग्निवेश, चरक और दृढबल इन पांच आचार्यों के नामोल्लेख के अतिरिक्त और कुछ परिचय तथा इनके समय के सम्बन्ध में कोई स्पष्ट उल्लेख न होने से ग्रन्थोक्त अवान्तर विषयों के परीक्षण से ही कुछ निर्णय किया जा सकता है । भरद्वाज - इन्द्र से आयुर्वेद का अध्ययन कर मनुष्य - लोक में उसका प्रचार करनेवाले सर्वप्रथम व्यक्ति यही । इसी प्रकार व्याकरण शास्त्र के प्रथम ज्ञाता और प्रचारक के रूप में भी इनका वर्णन शाकटायन ने किया है ' यथाचार्या ऊचुः ब्रह्मा बृहस्पतये प्रोवाच बृहस्पतिरिन्द्रायेन्द्रो भरद्वाजाय, भरद्वाजो ऋषिभ्यः, ऋषयो ब्राह्मणेभ्यस्तं खल्विममक्षरसमाम्नायम् । ' ब्रह्मा के अयोनिज पुत्र देवर्षि अंगिरा के उतथ्य और बृहस्पति दो पुत्र हुए । उतथ्य की पत्नी ममता के साथ बृहस्पति के संयोग से भरद्वाज की उत्पत्ति कृतयुग के अन्त अथवा त्रेतायुग के आदि में हुई थी । इसका वर्णन मत्स्य, अग्नि, ब्रह्म और हरिवंश पुराणों में एवं श्रीमद्भागवत में विस्तार से मिलता है । उतथ्य के क्षेत्र में, बृहस्पति के बीज से उत्पन्न होने के कारण यह ' द्वाज ' हुए और दोनों माता को ही भरण ( पोषण ) का ' मूढे भर द्वाजमिमम् ' आदेश देकर इन्हें त्याग कर चले गए अतः इन्हें ' भरद्वाज ' कहा गया । ज्वरादि रोगों की उत्पत्ति त्रेतायुग के मध्य में हुई ऐसा वर्णन चरक-संहिता के जनपदोद्ध्वंसनीय विमान में है, और रोगों की उत्पत्ति होने के बाद ही ऋषियों की सभा हुई जिसमें भरद्वाज को इन्द्र के पास आयुर्वेद का अध्ययन करने के लिए भेजा गया ( च. चि. १ तथा सू. १ ) । इनका आश्रम प्रयाग में था ( मर्यादापुरुषोत्तम भगवान् राम भी यहाँ पधारे थे और यह आश्रम अब भी प्रयाग में भक्त यात्रियों का प्रिय स्थल है ) । तपोबल और रसायन विशेषतः आचार- रसायन और दिव्यौषधियों के प्रभाव से ऋषिगण दीर्घजीवी होते थे ।

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[ ६ ] ' ऋषयो दीर्घसन्ध्यत्वाद्दीर्घमायुरवाप्नुयुः । ”

' एतद्रसायनं पूर्व वसिष्ठः कश्यपोऽङ्गिराः ।

जमदग्निर्भरद्वाजो भृगुर्वात्स्यश्च तद्विषाः ॥

प्रयुज्य प्रयता मुक्ता श्रमन्याधिजराभयात् । यावदच्छंस्तपस्तेपुस्तत्प्रभावान्महाबलाः ॥ ' ( च. चि. १ ) इनमें भी भरद्वाज सबसे अधिक दीर्घायु हुए । इसका उल्लेख ऐतरेय आरण्यक में भी आया है - ' भरद्वाजो ह वा ऋषीणामनूचानतमो दीर्घजीवितमस्तपस्वितम आस । " यह पाञ्चाल देश के राजा पृषत् के मित्र और कौरव - पाण्डवों के गुरु दोणाचार्य के पिता थे । पृषत् की मृत्यु के बाद उनके पुत्र द्रुपद के राजा होने पर भरद्वाज भी दिवङ्गत हुए ।

ततो व्यतीते पृषते स राजा द्रुपदोऽभवत् ।

पाञ्चालेषु महाबाहुरुसरेषु नरेश्वरः ॥

भरद्वाजोऽपि भगवानारुरोह दिवं तदा । ( महाभारत, आदिपर्वअ. १३ ) द्रोणाचार्य द्रुपद के मित्र थे । बाद में मनोमालिन्य हो गया था । द्रुपद की पुत्री द्रौपदी पांडवों की पक्षी थी । महाभारत युद्ध में द्रुपद और द्रोण दोनों की मृत्यु हुई । यह सब प्रसङ्ग महाभारत में वर्णित है । इस प्रकार कृतयुग से द्वापर के अन्त के कुछ पूर्व तक भरद्वाज का होना प्रमाणित है । इन्द्र से आयुर्वेद का अध्ययन कर मनुष्य - लोक में आयुर्वेद का उपदेश करनेवाले सर्वप्रथम व्यक्ति भरद्वाज थे । अभिवेश के गुरु महर्षि आत्रेय ने भी आयुर्वेद अध्ययन इन्हीं से किया । ये गोत्र - प्रवर्तक ऋषि हुए । इनके अनेक वंशज भी आयुर्वेद के ज्ञाता हुए । चरकसंहिता के सूत्रस्थान अ. १२ में कुमारशिरा भरद्वाज तथा २५ वें और शारीर स्थान के तीसरे अध्याय में एक भरद्वाज का भी उल्लेख आया है । आत्रेय ने इनके मतों का खण्डन और शंकाओं का समाधान किया है । अतः यह भरद्वाज आत्रेय के गुरु भरद्वाज से सर्वथा भिन्न थे, इसमें सन्देह नहीं । १६५६ ई ० में प्रस्तुत कवीन्द्र- सूची में एक भरद्वाजसंहिता का उल्लेख है किन्तु वह उपलब्ध नहीं है । अतः यह कहना कठिन है कि यह ग्रन्थ प्रथम भरद्वाज का था या किसी अन्य की रचना था । आत्रेय - य - यह ब्रह्मा के अयोनिज ( मानस ) पुत्र देवर्षि अत्रि के पुत्र थे । आत्रेय शब्द से अत्रि - पुत्र, अत्रि- वंशज एवं अत्रि- शिष्य परम्परा का भी बोध होता है । किन्तु यहाँ आत्रेय शब्द पुत्रवाचक ही है । चरकसंहिता में विभिन्न स्थलों पर इनके लिए ' अत्रिज ' ' अत्रिसूनु ' ' अभ्यात्मज ' ' अत्रिसुत ' ' अत्रिनन्दन ' आदि का स्पष्ट उल्लेख है । अत्रि ऋषि स्वयं भी आयुर्वेद के आचार्य थे, जैसा कि काश्यपसंहिता के इस वाक्य से स्पष्ट है-- ' इन्द्र ऋषिभ्यश्चतुर्भ्यः कश्यपवशिष्टात्रिभृगुभ्यस्ते पुत्रेभ्यः शिष्येभ्यश्च प्रददुः 1

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[ ७ ] महाकवि अश्वघोष ने भी लिखा है - ' चिकित्सितं यच्च चकार नात्रिः पश्चात्तदात्रेय ऋषिर्जगाद । " चरकसंहिता के मूल ग्रन्थ ' अग्निवेशतन्त्र ' के रचयिता अग्निवेश एवं उनके सहपाठी भेड आदि के यह गुरु थे । इनका विशिष्ट नाम पुनर्वसु ( सम्भवतः पुनर्वसु नक्षत्र में जन्म होने से ) एवं चन्द्रभाग या चन्द्रभागी भी था । कुछ लोग इनकी माता का नाम चन्द्रभागा और इनका चान्द्रभाग या चान्द्रभागी मानते हैं तो कुछ लोग हिमालय के चन्द्रभाग शिखर अथवा चन्द्रभागा नदी के समीप इनका जन्म होने से यह नाम मानते हैं । चरकसंहिता में भिक्षु आत्रेय और कृष्णात्रेय नाम भी आए हैं । एक ही प्रसंग में आत्रेय और भिक्षु आत्रेय नामों के होने से यह दोनों निश्चय ही भिन्न व्यक्ति हैं । परन्तु कृष्णात्रेय के साथ ही आत्रेय नाम किसी स्थल पर न होने से यह दोनों एक ही थे ऐसा सन्देह होता है । इस सम्बन्ध में श्री गुरुपद हालदार महोदय का मत है कि श्रीमद्भागवत के चतुर्थ स्कन्ध में लिखा है—

अत्रेः पत्न्यनसूया त्रीञ्जज्ञे सुयशसः सुतान् ।

दत्तं दुर्वाससं सोममात्मेश ब्रह्मसम्भवान् ॥

इससे सोम से चन्द्र या चन्द्रभाग या पुनर्वसु आत्रेय तथा कृष्णात्रेय से दुर्वासा का ग्रहण करना चाहिए । इस मत के अनुसार दत्तात्रेय से भिक्षु आत्रेय का भी ग्रहण कर सकते हैं । किन्तु चरकसंहिता सूत्रस्थान के ' त्रित्वेनाष्टौ समुद्दिष्टाः कृष्णात्रेयेण धीमता ' इस लेख से प्रतीत होता है कि वस्तुतः कृष्णयजुर्वेदी होने से पुनर्वसु को कृष्णात्रेय भी कहा जाता था । ये तीनों आयुर्वेद के भी आचार्य थे । अपने पिता अत्रि ऋषि तथा महर्षि भरद्वाज से भी आयुर्वेद का ज्ञान प्राप्त कर तथा उसमें प्रौढ प्राप्त कर पुनर्वसु आत्रेय अपने समय के सर्वश्रेष्ठ वैद्य हुए । इन्द्र के पास भरद्वाज के जाने से पूर्व रोगों के निवारणार्थ विचार के लिए जो ऋषि सम्मेलन हुआ था उसमें भी यह एक विशिष्ट व्यक्ति थे अतः इन्हें भरद्वाज का समसामयिक अथवा कुछ अवरज मानने में आपत्ति नहीं है । कुछ विचारक एक तिब्बतीय उपकथा में जीवक का तक्षशिला में आत्रेय के पास आयुर्वेदाध्ययन का उल्लेख देखकर आत्रेय को बौद्धकालीन मानते हैं पर यह मत निम्नलिखित कारणों से माननीय नहीं है— १. तिब्बतीय कथा के अतिरिक्त सिंहल, ब्रह्मदेश आदि की उपकथाओं में भी जीवक के तक्षशिला में अध्ययन का उल्लेख है पर उनमें उनके गुरु का नाम न देकर एक दिशाप्रमुख आचार्य से शिक्षा प्राप्त करने मात्र का उल्लेख है । एक सिंहलीय उपकथा में तो जीवक के गुरु का कपिलचय ( कपिलात ) तथा क्यांगूर विनय में व्यु - शेक - भु ( नित्यप्रज्ञ ) नाम भी मिलता है । २. अग्निवेश के गुरु आत्रेय कायचिकित्सा के पण्डित थे । शल्यतन्त्रसम्बन्धी विषयों को उन्होंने पराधिकार की वस्तु माना है । किन्तु जीवक को प्रसिद्धि ३ च ० भू ०

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[ = ] शल्यतन्त्र में है और शल्यतन्त्र के ही विशेष अध्ययन के लिए तक्षशिला जाने का उल्लेख भी है । ३. तक्षशिला का उल्लेख पाणिनि ने भी किया है इससे प्रतीत होता है कि पाणिनि के पूर्व ही तक्षशिला विद्या का एक केन्द्र प्रसिद्ध हो चुका था । किन्तु चरक-संहिता में चैत्ररथ वन, कैलास, हिमवत्पार्श्व आदि के अतिरिक्त विशेष रूप से ' जनपदमण्डले पञ्चाल क्षेत्रे द्विजातिवराध्युषिते काम्पिल्यराजधान्याम् ' ( च. वि. ३ ) में पञ्चाल और काम्पिल्य का उल्लेख है किन्तु तक्षशिला का नहीं । पञ्चाल और काम्पिल्य का उल्लेख वेदों में भी है । अतः स्पष्ट है कि तक्षशिला को महत्त्व प्राप्त होने के पूर्व ही आत्रेय का काल मानना उचित है । ४. आत्रेय के वचनों में सर्वत्र ही वैदिकता की छाप है, बौद्धमत की छाया भी नहीं है 1 ५. आत्रेय के समकालीन आचार्यों का महाभारत के पूर्ववर्ती होना अन्य प्रमाणों द्वारा प्रमाणित होने से इनका भी काल वही होना चाहिए । ६. यदि जीवक के गुरु और तक्षशिला के आचार्य रूप में आत्रेय की सत्ता मानी भी जाय तो यह आवश्यक नहीं कि अग्निवेश और जीवक दोनों के गुरु आत्रेय एक ही थे । ७. • पुनर्वसु आत्रेय यायावर ऋषि थे अर्थात् इनका कोई नियत आश्रम नहीं था । ये पर्यटन करते हुए आयुर्वेद का उपदेश करते थे । विद्वानों की विभिन्न गोष्ठियों में विविध शंकाओं का समाधान करते थे । इनकी उक्तियाँ युक्तियुक्त और सर्वमान्य होती थीं । इनका तक्षशिला और जीवक से कोई भी सम्बन्ध चरक में उल्लिखित नहीं है । आजकल प्रकाशित ' हारीतसंहिता ' में आत्रेयनिर्मित क्रमशः २४ हजार, १२ हजार, ६ हजार, ३ हजार और १५ सौ श्लोकों में लिखी ५ संहिताओं का उल्लेख मिलता है और उनकी प्रशंसा में निम्नलिखित श्लोक है: -यथा सिंहो मृगेन्द्राणां यथाऽनन्तो भुजङ्गमे । वेदानाञ्च यथा शम्भुस्तथात्रेयोऽस्ति वैद्यके ॥ अग्निवेश -- इन्होंने महर्षि आत्रेय से आयुर्वेद का अध्ययन कर ' अग्निवेश - तन्त्र ' नामक ग्रन्थ का निर्माण किया जिसका प्रतिसंस्कार चरक ने किया । शालिहोत्र और पालकाव्य संहिताओं में भी इनका उल्लेख है । पाणिनि के गर्गादिगण में जतूकर्ण, पराशर आदि सतीर्थ्यो के साथ अग्निवेश का भी नाम है अतः यह पाणिनि से पूर्ववर्ती थे । शतपथब्राह्मण में इनके वंशजों का उल्लेख होने से यह उसके भी पूर्ववर्ती थे, यह प्रमाणित होता है । महाभारत के लेखानुसार यह वेद - वेदाङ्ग में भरद्वाज के शिष्य और शस्त्रविद्या में द्रोणाचार्य के गुरु थे । इस प्रकार महाभारत युद्ध के बहुत पहिले इनकी सत्ता प्रमाणित होती है । अग्निवेश - प्रणीत ' अंजननिदान ' नामक

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[ ] एक संक्षिप्त निदान ग्रन्थ भी मिलता है । पर यह अग्निवेश तन्त्रकार की ही रचना है इसमें सन्देह है । चरक — कुछ लोग अग्निवेश और चरक को एक ही मानते हैं पर चरकसंहिता के प्रत्येक अध्याय के अन्त में ' अग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते ' इस पुष्पिका से ही स्पष्ट है कि अग्निवेश और चरक भिन्न व्यक्ति थे । किन्तु ये चरक कौन थे, इनका का क्या था और ये किस प्रदेश के थे यह स्पष्ट नहीं है । इस सम्बन्ध में विचार करते हुए विभिन्न पुरातत्त्वविदों ने अनेक मत उपस्थित किए हैं, जिनमें निम्नलिखित पाँच विशेष महत्व रखते हैं । १. चरक कुषाणवंशीय राजा कनिष्क के राजवैद्य थे । २. पातञ्जल योगसूत्र और पाणिनीय महाभाष्यकार पतञ्जलि और चरक एक ही थे । ३. भावप्रकाश में वर्णित क्रम के अनुसार यह ' विशुद्ध ' नामक एक ऋषि के और भगवान् अनन्त के अवतार थे । पुत्र ४. इनका नाम कपिल चरक था । इनका निवासस्थान पञ्चनद ( पंजाब ) प्रदेश में इरावती और चन्द्रभागा नदियों के बीच स्थित कपिस्थल नामक ग्राम में था । यह गोत्रप्रवर्तक ऋषि थे । ५. कृष्ण यजुर्वेद के टीका ( चरक शाखा ) कार वैशम्पायन - शिष्य चरक ह अग्निवेशतन्त्र के प्रतिसंस्कर्ता थे । १. बौद्ध त्रिपिटक ग्रन्थ ( चीनी भाषा में हुए अनुवाद ) में चरक को कुषाण-वंशीय राजा कनिष्क का राजवैद्य लिखा देखकर पाश्चात्य विचारक ' सियाँ लेवि ’ तथा उन्हीं के अनुसार अन्य अनेक विचारकों ने भी चरक का काल प्रथम अथवा द्वितीय ईशवीय शताब्दी माना है । एक महाशय ने --जो कि ब्राह्मणनिन्दा और प्रत्येक सत्कार्य का श्रेय अब्राह्मणों और बौद्धों को ही देने का ठीका - सा लिए हैं - इसी आधार पर महर्षि चरक और कवि अश्वघोष में अभेद सिद्ध करने का उपहासास्पद खरनाद किया है । किन्तु यह मत नितान्त अनादरणीय है क्योंकि पूर्वोक्त त्रिपिटक ग्रन्थ के अतिरिक्त अन्यत्र कहीं भी इसका उल्लेख नहीं है । कनिष्क का राजवैद्य होने पर तत्कालीन शिलालेखों में कहीं न कहीं चरक का उल्लेख होता । कनिष्क के समकालीन आर्य नागार्जुन ने अपने उपायहृदय नामक ग्रन्थ में सुश्रुत का स्मरण किया है किन्तु अपने समसामयिक, अत्यन्त प्रतिष्ठित राजवैद्य चरक को वे भूल जायँ यह अस्वाभाविक है । राजतरङ्गिणीकार ने भी कनिष्क वृत्तवर्णन में अवश्य चरक का उल्लेख किया होता । कनिष्क बौद्ध था, उसके सभासद भी प्रायः बौद्ध थे, पर चरक के ग्रन्थ में कहीं बौद्धत्व की छाया भी नहीं है । चरक और पतञ्जलि एक ही थे ऐसी जनश्रुति है और पतञ्जलि का काल ईसापूर्व दूसरी या तीसरी शताब्दी

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[ १० ] निर्धारित है । इस प्रकार कनिष्ककालीन चरक और पुष्यमित्रकालीन पतञ्जलि में कम से कम ३०० वर्षं का अन्तर आता है । वस्तुतः पतञ्जलि और चरक भिन्न थे और चरक पतञ्जलि की अपेक्षा भी अत्यन्त प्राचीन थे । इसका विवेचन आगे किया जायगा । संभव है कि कनिष्क के किसी अन्य नामवाले राजवैद्य को उसकी निपुणता और विद्वत्ता के कारण ' चरक ' यह उपाधि प्राप्त रही हो और उसने चरक-संहिता का कुछ प्रतिसंस्कार भी किया हो, पर उसे संहिताकार चरक मानना भ्रामक है । २. कैयट, विज्ञानभिन्नु, स्वामिकुमार, षड्गुरुशिष्य आदि की उक्तियों के आधार पर कुछ लोगों ने पातञ्जल योगसूत्र और व्याकरण महाभाष्यकार पतञ्जलि और चरकसंहिताकार चरक को एक ही व्यक्ति माना है । किन्तु निम्नांकित तथ्यों का विचार करने पर सिद्ध हो जायगा कि यह विचार भी भ्रममूलक है । महाभाष्य में ‘ अरुणद्यवनः साकेतम् ' वाक्य आया है जो साकेत ( अयोध्या ) पर हुए मिलिन्द ( Menander King of Bactria ) के आक्रमण का द्योतक है । इससे मिलिन्द के आक्रमण के बाद ही महाभाष्य की रचना हुई प्रतीत होती है । ' पुष्यमित्रं याजयामः ' इस वर्तमानकालिक क्रियारूप के निर्देश से पुष्यमित्र के समय पतञ्जलि की उपस्थिति प्रमाणित है । इस प्रकार ईसा के पूर्व द्वितीय और तृतीय शताब्दी में पतञ्जलि का होना निर्विवाद है । यदि पूर्वोक्त मतानुसार कनिष्क के राजवैद्य रूप में चरक को माना जाय तो पतञ्जलि के ३-४ सौ वर्ष बाद का काल चरक का होता है । अतः यह दोनों एक व्यक्ति नहीं हो सकते । आगे यह प्रमाणित किया जायगा कि चरक पतञ्जलि से भी प्राचीन थे । पतञ्जलि का कहीं उल्लेख नहीं है । इतने नामोल्लेख हो तथा अपना ही परिचय नाम का उल्लेख न हो यह आश्चर्यजनक महाभाष्य में चरक का और चरक में बड़े ग्रन्थों में जहाँ अन्य अनेक आचार्यों का विभिन्न रूपों में हो, अपने दूसरे महत्व के ही है । भाष्यकार के लिए ' गोनदीय ' पर्याय का प्रयोग हुआ है । यह देशपरक संज्ञा है अर्थात् भाष्यकार गोनर्द देश के थे । ' एङः प्राचां देशे ' इस सूत्र के वार्तिक के उदाहरण रूप में काशिका में ' गोनर्दीय ' का पूर्वीय प्रदेश सिद्ध होता है । गोनर्द शब्द का प्रयोग होने से यह निश्चय ही कोई ही अपभ्रंश ' गोण्डा ' ( उत्तरप्रदेश के विचारकों का मत है । कुछ लोग पूर्वोत्तर भाग का एक जिला ) है ऐसा कतिपय कश्मीर के किसी राजा गोनर्द के नाम पर कश्मीर को ही गोनर्द प्रदेश मानते हैं । पर राजतरंगिणी आदि ग्रंथों में या कहीं भी कश्मीर जैसे प्रसिद्ध और बहुवार स्मृत स्थान का नाम गोनर्द नहीं आया है । चरकसंहिता के अध्ययन से प्रतीत होता है कि चरक का निवासस्थान कहीं भारत के पश्चिमोत्तर भाग में ही था । भाष्य में पाटलिपुत्र का बार - बार उल्लेख है पर चरकसंहिता में उसका नाम कहीं भी नहीं आया है बल्कि काम्पिल्य राजधानी और पश्चिमोत्तर प्रदेश के अनेक स्थलों .

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[ ११ ] का उल्लेख है । अतः सिद्ध होता है कि चरक पश्चिमोत्तर प्रदेश के और पतञ्जलि पूर्वीय प्रदेश के थे और दोनों एक नहीं थे । चरकसंहिता की भाषा प्रसादगुणयुक्त है तो भाग्य की भाषा बड़ी क्लिष्ट है । महाभाष्य में कतिपय स्थलों पर आयुर्वेदसम्बन्धी विषयों का उल्लेख होने से भाग्य-कार का आयुर्वेदज्ञ होना तो प्रमाणित होता है पर भाष्य में उल्लिखित उत्कन्दन आदि रोगों की चर्चा भी चरकसंहिता में नहीं है । ' दधित्रपुषं ज्वरम् ' आदि निदान -सम्बन्धी मर्तो का चरक ने उल्लेख नहीं किया है । महाभाष्य में अग्निवेश, जतूकर्ण आदि का उल्लेख प्रसङ्ग आने पर भी कहीं नहीं किया है । उक्थादिगण के उदाहरण-प्रसंग में अन्य अनेक विद्याओं का उल्लेख करते हुए भी आयुर्विद्या का उल्लेख नहीं किया है । योगसूत्र और महाभाष्य में पातञ्जल शब्द जोड़ते हुए भी अग्निवेशतन्त्र के प्रतिसंस्कृत ग्रन्थ में पातञ्जल के स्थान पर चरक नाम होना भी चरक और पतञ्जलि के अनैक्य का ही समर्थन करता है । चरकसंहिता के शारीरस्थान के प्रथम और पंचम अध्यायों में योग और मोक्ष का जो विवेचन किया गया है उसका पातञ्जल योगसूत्र के साथ तुलनात्मक विवेचन करने पर दोनों में पूर्ण समानता है ऐसा नहीं कह सकते हैं । ' व्याकरण - मञ्जूषा में ' आप्तो नामानुभवेन वस्तुतत्वस्य कात्स्म्र्त्स्न्येन निश्चयवान् रागादिवशादपि नान्यथावादी यः स इति चरके पतञ्जलिः ' तथा चरक चतुरानन चक्रपाणि - कृत चरकसंहिता की टीका के प्रारम्भ में -पातञ्जलमहाभाष्यचरकप्रतिसंस्कृतैः 1 मनोवाक्कायदोषाणां हर्त्रेऽहिपतये नमः ॥ इन दोनों उद्धरणों के आधार पर चरक और पतञ्जलि में अभेद सिद्ध करने का प्रयास भी भ्रममूलक है । श्री नागेशभट्ट द्वारा उद्धृत वचन इसी रूप में चरकसंहिता में कहीं नहीं मिलता किन्तु यह चरकोक्त आप्त लक्षणों का अनुवाद या व्याख्या ही है । वस्तुतः नागेश की उक्ति का आधार भिन्न है 1 । यहाँ ' चरके पतञ्जलिः ' का अर्थ ' चरकोपरि पतञ्जलिः ' है अर्थात् चरक की व्याख्या में पतञ्जलि ने कहा है । आर्यप्रदीप ग्रन्थ में पतञ्जलि द्वारा चरक की एक व्याख्या का उल्लेख भी है | आषाढवर्मा ने परिहारवार्तिक नामक चरकव्याख्या में पातञ्जल वार्तिक पर आक्षेप किया था यह भी उल्लेख मिलता है । इस प्रकार चरक पर पातञ्जल वार्तिक या व्याख्या या पतञ्जलि द्वारा उसका प्रतिसंस्कार होना लक्षित है । यह भी ध्यान में रखना चाहिए कि नागेश भट्ट १७ वीं या १८ वीं ईशवीय शताब्दी में हुए और इनके ऊपर भी इनके पूर्ववर्ती भोज आदि के मत का प्रभाव होना असम्भव १. अधिक विस्तृत विवेचन के लिए नेपालराजगुरु स्व ० पं ० हेमराज जी लिखित तथा चौखम्बा संस्कृत सीरीज, वाराणसी से प्रकाशित ' काश्यपसंहिता ' का उपोद्घात देखिए ।

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[ १२ ] नहीं है | अतः इनके आधार पर चरक और पतञ्जलि में अभेद प्रमाणित करना उचित नहीं प्रतीत होता विशेषतः जब कि इस अभेद के विरुद्ध पुष्ट प्रमाण उपलब्ध हैं । सम्भवतः इसी आधार पर बाद में उक्त पातञ्जल वार्तिक या व्याख्या की अनुपलब्धि से प्रतिसंस्कर्ता रूप में चरक और पतञ्जलि में अभेद माना जाने लगा । वाग्भट, नावनीतककार तथा दृढबल आदि प्राचीनों ने सर्वत्र चरक का ही स्मरण किया है । इन्होंने कहीं भी पतञ्जलि का उल्लेख नहीं किया है । श्री चक्रपाणि दत्त जी के ' चरकप्रतिसंस्कृतैः ' इस वाक्य से भी यही होता है कि पतञ्जलि ने चरक संहिता का प्रतिसंस्कार किया था न कि उसका निर्माण; अन्यथा अग्निवेश तन्त्र का प्रतिसंस्कृत रूप चरक संहिता होने से चरक की अपेक्षा अग्निवेश का नामोल्लेख किया गया होता । पाणिनि सूत्रों में चरक का उल्लेख आया है - ' कठचरकाल्लुक् ' ( ४ | ३ | १०७ ) तथा ' माणवचरकाभ्यां खञ् ' ( ५ । १ । ११ ) । कुछ लोगों का कहना है कि इन सूत्रों में चरक शब्द यजुर्वेद की शाखा का निर्देशक है । किन्तु इसे व्यक्तिवाची मानना ही उचित है । हरिनामामृत व्याकरण के ' चरकोऽपि मुनिस्तेन प्रोक्तं चरकं वैद्यकशास्त्रमधीयते विदन्ति वा चरका: ' इस लेख से सिद्ध है कि चरक पाणिनि से भी पूर्ववर्ती थे । पाणिनि को ऐतिहासिकों ने पतञ्जलि से ५०० वर्ष से भी पूर्व का माना है । चरक भी पाणिनि से कम से कम ५०० वर्ष पूर्व के होंगे । इसलिए पतञ्जलि और चरक को एक मानना उचित नहीं प्रतीत होता । शतपथब्राह्मण में भी चरक का उल्लेख है । याज्ञवल्क्य और चरक दोनों वैशम्पा-यन के शिष्य थे यह तो विभिन्न प्राचीन ग्रन्थों से प्रमाणित है ही । शतपथब्राह्मण और याज्ञवल्क्यस्मृति तथा चरकसंहिता में शारीरविषयक बहुत से विवेचन एक समान मिलते हैं, जैसे चरक और याज्ञवल्क्य दोनों ने अस्थि-संख्या ३६० बताई है । दैत्र और पुरुषकार के सम्बन्ध में दोनों में शब्दशः मतैक्य है । चरक और याज्ञवल्क्य दोनों वैशम्पायन के शिष्य और सतीर्थ्य थे । चरक ने चरकसंहिता और याज्ञवल्क्य ने याज्ञवल्क्यस्मृति का निर्माण किया । दोनों समकालीन थे । योगसूत्र और महाभाष्यकार पतञ्जलि को भी एक मानना उचित नहीं है, क्योंकि महाभाष्य में योगशास्त्र के सिद्धान्तों का उल्लेख नहीं है । योगसूत्र का भाष्य स्वयं व्यासदेव ने किया जो बादरायण भाष्य के नाम से प्रसिद्ध है । इससे सिद्ध है कि योगसूत्रकार पतञ्जलि व्यास से भी पूर्ववर्ती थे । भगवान् व्यास कौरवों और पाण्डवों के पूर्वज और चरक तथा याज्ञवल्क्य के गुरु वैशम्पायन के भी गुरु थे । अतः यह ईसा से तीन हजार वर्ष से भी अधिक समय पूर्व के हुए । महर्षि पतञ्जलि भी इनसे कम से कम ५०० वर्ष पूर्व के तो रहे ही होंगे । महाभाष्यकार पतञ्जलि का समय ईसा

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चरक संहिता हिन्दी भाष्य, पृष्ठ 40 का मूल पृष्ठ
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[ १३ ] से लगभग २०० वर्ष पूर्व का बताया जा चुका है । इस प्रकार भाव्यकार और योगसूत्र-कार पतञ्जलि के समय का अन्तर लगभग तीन हजार वर्ष से भी अधिक होता है । अतः यह दोनों एक नहीं प्रतीत होते । योगसूत्रकार, चरकसंहिता के वार्तिककार और महाभाष्यकार पतञ्जलि तीनों में अभेद मानना केवल नाम की एकता और जनश्रुति पर ही आधारित है, जैसे कि निम्नलिखित श्लोक में शबरस्वामी के ६ पुत्रों का वर्णन किया गया है-ब्राह्मण्यामभवद्वराहमिहिरो ज्योतिर्विदामग्रणी -राजा भर्तृहरिश्च विक्रमनृपः क्षत्रात्मजायामभूत् । वैश्यायां हरिचन्द्रवैद्यतिलको जातश्च शंकुः कृती शूद्रायाममरः षडेव शबरस्वामिद्विजस्यात्मजाः ॥ मीमांसाभाष्यकार शबरस्वामी ईसा से लगभग १५० वर्ष पूर्व हुए । वराह-मिहिर आदित्यसेन के पुत्र थे । इनका जन्म ५०५ ई ० और निधन ५८७ ई ० में गन्धर्वसेन के पुत्र भर्तृहरि और यशोधर्म - विक्रमादित्य छठी शताब्दी हुआ । मालवा में हुए । हरिचन्द्र आईदेव के पुत्र थे तथा इनका समय छठी और सातवीं शताब्दी का संगम प्रमाणित है 1 । शंकु कवि का समय नवम तथा अमरसिंह की स्थिति पांचवीं या छठी शताब्दी में मानी जाती है । पूर्वोक्त श्लोक में इन सबको ईसा से १५० वर्ष पूर्व के शबरस्वामी का पुत्र बताया गया है । भावप्रकाश में वर्णित चरक का शेषावतारादि कथन भी लोकप्रसिद्धि पर ही आधारित प्रतीत होता है । कपिष्ठल- चरक ने चरकसंहिता का निर्माण किया यह मत भी प्रमाणहीन है, क्योंकि यजुर्वेद के ८६ भेदों में ' ' चरका नाम द्वादश भेदाः यथा कपिष्ठलाः चरकाः ' आदि, यहाँ चरक शाखा में १२ भेद बताए गए हैं । उनमें ' कपिष्ठलाः " एक स्वतन्त्र उपभेद है । यद्यपि कपिष्ठल एक गोत्रप्रवर्तक ऋषि थे, प्रवरमाला में इनका नामोल्लेख भी है पर चरकसंहिता के साथ या आयुर्वेद के साथ इनका कोई सम्बन्ध होने का कहीं भी उल्लेख नहीं है । उपर्युक्त विवरणों को देखते हुए यही मानना उचित प्रतीत होता है कि अग्नि-वेशतन्त्र के प्रतिसंस्कर्ता चरक याज्ञवल्क्य के सतीर्थ्य और वैशम्पायन के शिष्य थे और यह ईसा से ३००० वर्ष के लगभग पूर्ववर्ती थे । पाश्चात्य चिकित्सापद्धति के आचार्य हिपोक्रिटीस ( ई ० पू ० ६०० ) ने भी इनके सिद्धान्तों का भाव लिया है ऐसा कुछ विद्वानों का मत है । इनके चरकसंहिता ग्रन्थ में भारत के पश्चिमोत्तर प्रदेश का ही अधिक और विशद वर्णन होने से यह भी उसी प्रदेश के प्रतीत होते हैं । सम्भवतः नागवंश में इनका जन्म हुआ था । इसी आधार पर भावप्रकाश आदि में इन्हें शेषावतार माना गया है 1