चरक संहिता हिन्दी भाष्य — पृष्ठ 41–50

चरक संहिता हिन्दी भाष्य · Chaukhamba · पृष्ठ 41–50

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[ १४ ] दृढबल - वर्तमानकाल में उपलब्ध चरकसंहिता में स्पष्ट रूप से वर्णित है कि इस संहिता के चिकित्सा स्थान के १७ अध्याय और १२-१२ अध्याय के कल्प और सिद्धि स्थान नहीं मिलते थे जिन्हें कपिलबल के पुत्र दृढबल ने विभिन्न संहिताओं से सारसंग्रह कर पूरा किया | ये शैव थे और पञ्चनदपुर के रहनेवाले थे ( देखिए च. चि. ३० और सिद्धि १२ ) । पञ्चनदपुर का अर्थ स्व ० कविराज गंगाधर जी ने काशीपुरी किया है । किन्तु पञ्चनद शब्द पञ्जाब के लिए प्रसिद्ध है, उसके किसी महत्त्व के नगर का ही संकेत पञ्चनदपुर से होता है । श्रीहालदार महोदय इसे वर्तमान लाहौर मानते हैं । राजतरंगिणी में भी पञ्चनदपुर का उल्लेख है । उसके अनुसार वितस्ता और सिंधु नदियों के सङ्गमस्थल के पास ' पंजपनोर ' नामक स्थान को ही कुछ विद्वान् पञ्चनदपुर मानते हैं और इस प्रकार हदबल को काश्मीरी भी स्वीकार करते हैं । काथ ( Keith ) तथा उनके ही अनुसार अन्य कुछ लोग इनका समय ८ वीं या ९वीं ई ० शताब्दी मानते हैं किन्तु वाग्भट ने चरकसंहिता के उस भाग से भी कुछ वचनों का संग्रह किया है जिसकी पूर्ति दृढबल ने की है । इससे ये वाग्भट के पूर्ववर्ती प्रतीत होते हैं । वाग्भट का काल तीसरी ईसवीय शताब्दी का अन्त या चतुर्थ का आरम्भ प्रमाणित है । अतः दृढबल का समय वाग्भट से लगभग २०० वर्ष पूर्व का मानना युक्तिसङ्गत है । चरकसंहिता के जितने अंश की पूर्ति इन्होंने की है वह चिरकाल तक चरकोत्तरतन्त्र के नाम से प्रसिद्ध था । १३ वीं शताब्दी तक के टीकाकारों ने इसका उल्लेख किया है । इससे यह भी सम्भावना होती है कि लोगों ने इन्हें भी चरक नाम या उपाधि से विभूषित किया हो और समयसाम्य की दृष्टि से यह भी असम्भव नहीं कि कनिष्ककालीन जिस चरक का उल्लेख हुआ है वे यही रहे हों । इनके पिता का नाम कपिलवल था यह स्वयं इन्होंने लिखा है--अस्मिन्सप्तदशाध्यायाः कल्पाः सिद्धय एव च ।

नासाद्यन्तेऽग्निवेशस्य तन्त्रे चरकसंस्कृते ।

तानेतान् कापिलबलो शेषान् दृढबलोऽकरोत् ॥

इस प्रकार अग्निवेशकृत तन्त्र चरक द्वारा प्रतिसंस्कृत और कालवशात् खण्डित अंश की पूर्ति दृढबल द्वारा होकर वर्तमान चरकसंहिता रूप में उपलब्ध है । दृढबल

ने स्वयं कहा है-विस्तारयति शोक्तं संक्षिपत्यतिविस्तरम् ।

संस्कर्ता कुरुते तन्त्रं पुराणं च पुनर्नवम् ॥

इससे यह सिद्ध है कि मूलतन्त्र में प्रतिसंस्करणों के कारण परिवर्तन होने से उपलब्ध संहिता मूल अग्निवेश - तन्त्र से प्रायः भिन्न हो गयी है । प्राचीन टीकाओं

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[ १५ ] अग्निवेश के नाम से उद्धृत बहुत से वचन इस संहिता में नहीं मिलते हैं । प्रस्तुत संहिता में ४ प्रकार के सूत्र मिलते हैं - १. गुरुसूत्र, यथा - एकोऽपि udai संज्ञां लभते कार्यान्तराणि कुर्वन् ( च. सू. अ. ४ ) । २. शिष्यसूत्र, यथा-नैतानि भगवन् पञ्चकषायशतानि पूर्यन्ते तानि तानि ह्येवाङ्गानि सम्प्लवन्ते तेषु तेषु कषायेष्विति ( च. सू. अ. ४ ) । ३. प्रतिसंस्कर्तृसूत्र, यथा - तमुवाच भगवानात्रेयः । ४. एकीयसूत्र, यथा-- ' आत्मजः पुरुषो रोगाश्रात्मजा कारणं हि सः, इत्यादि ( च. सू. अ. २५ ) । टीकाकार - इस ग्रन्थ की विशेषता आरम्भ में ही बता दी विशेषता का ही प्रभाव है कि इसके पूर्व की, साथ की और बाद की गई है । इसकी संहिताएँ काल-कवलित हो गईं । उनमें से कुछ का नाम भी मिट गया है और कुछ टीकाकारों की कृपा से नामशेष मात्र रह गयी हैं, किन्तु यह संहिता नव - नव रूप में आज भी उपस्थित है और अपने विषय की सर्वमान्य संहिता है । इसका प्रचार सम्पूर्ण भारत ही नहीं विदेशों में भी हुआ । संस्कृत के अतिरिक्त विभिन्न भाषाओं में इसके अनुवाद भी हुए । इसकी अनेक टीकाएँ लिखी गयीं और आज भी लिखी जा रही हैं । यह विचारकों को free नयी - नयी विचार - सामग्री उपलब्ध करा रही है । इस संहिता की अनेक टीकायें उपलब्ध टीकाओं अथवा संग्रहग्रन्थों में उल्लिखित हैं । किन्तु उनमें से केवल कुछ टीकाएँ ही आज उपलब्ध हैं । अब तक जिन टीकाओं का कोई भी निर्देश प्राप्त हो सका है उनका उल्लेख किया जा रहा है । १. पातञ्जल वार्तिक - तृतीय या द्वितीय ईसापूर्व शताब्दी में इसे महाभाष्यकार पतञ्जलि ने लिखा था | आषाढवर्मा के ' परिहारनार्तिक ' तथा रामचन्द्र दीक्षित-रचित पतञ्जलिचरित में इसका उल्लेख है - ' वैद्यकशास्त्रे वार्तिकानि च ततः ' । पतञ्जलि-रचित ' वातस्कन्ध - पैत्तस्कन्धोपेत - सिद्धान्तसारावली ' नामक ग्रन्थ लन्दन के इण्डिया आफिस पुस्तकालय में उपलब्ध है ( See Trien Cat. of Mss 1916–19, Vol. III Part I Sanskrit B. R. No. 2371, P. 3271 ) । पतञ्जलि ने रसशास्त्र पर भी एक ग्रन्थ लिखा है ऐसा लोग मानते हैं । किन्तु रसतन्त्र का प्रचार छठी शताब्दी के पूर्व न होने से यह पतञ्जलि और भाष्यकार एक ही थे, इसमें सन्देह है | २. भट्टार हरिचन्द्र ( छठी या सातवीं शताब्दी ई ० ) - यह गौड़ाधिपति शशाङ्क देव ( नरेन्द्रदेव ) के राजवैद्य थे । इनके पिता का नाम आर्द्रदेव था । इनकी टीका की बाद के टीकाकारों ने भी बड़ी प्रशंसा की है । यथा-व्याख्यातरि हरिचन्द्रे श्रीजेजटनाम्नि सति सुधीरे । अन्यस्यायुर्वेदे व्याख्या धाष्टर्थ समावहति ॥ ( चन्द्ररः )

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[ १६ ] ३. आषाढवर्मा ( नवम शताब्दी ई ० ) कृत ' परिहार वार्तिक ' का निर्देश सत्रहवीं शताब्दी तक के विद्वानों ने किया है । ४. हिमदत्त ( नवम ई ० श ० ) कृत टीका का उल्लेख जेज्जट ने किया है । ५. जेजट ( जैयट ९ -१० ई ० ० ) ने ' निरन्तर पदव्याख्या ' नामक उत्तम टीका लिखी है । यह ' काव्यप्रकाश ' कार कैंट के पिता थे । भाष्य - प्रदीप में लिखा है ' कैटो जैयदात्मजः ' । कहीं - कहीं इनका नाम ' उब्वट ' भी आया है । कुछ लोगों ने इन्हें वाग्भट का शिष्य माना है । ६. कार्तिककुण्ड ( ९ या १० शताब्दी ई ० ) - सम्भवतः यह सिद्धयोग या वृन्दमाधवकार वृन्दकुण्ड भाई थे । ७. सुधीश्वर ( सुधीर १०-११ श ० ई ० ) - इन्होंने भी चरकसंहिता तथा ' माधवनिदान ' पर उत्तम टीका लिखी थी । चन्द्रट ने हरिचन्द्र और जेज्जट की कोटि में इनकी गणना की है । ८. अमृतप्रभ ( १०-११ ई ० श ० ) - चन्द्रट ने इनकी ' चरकन्यास ' नामक टीका का उल्लेख किया है । ९. नरदत्त ( १०-११ ई ० श ० ) - इन्होंने ' बृहत्तंत्रप्रदीप ' नाम की टीका लिखी थी, ये चक्रपाणिदत्त के गुरु थे । १०. गयदास ( १० ई ० श ० ) - इन्होंने चरक पर भी टीका लिखी थी जो उपलब्ध नहीं है । किन्तु सुश्रुतसंहिता पर इनकी लिखी पञ्जिका या न्यायचन्द्रिका या चन्द्रिका नाम से प्रसिद्ध उत्तम टीका आंशिक रूप से आज भी उपलब्ध है । ११. चन्द्रट ( ११ ई ० श ० ) - इन्होंने चरक और सुश्रुतसंहिताओं के काल-वशाद् दुष्ट पाठों का सुधार मात्र किया है । इन्होंने कई वैद्यक ग्रन्थों की रचना की है जिनमें अनेक प्राचीन आचार्यों, ग्रन्थों, टीकाओं और टीकाकारों का उल्लेख है । १२. चक्रपाणि दत्त ( ११ वीं शताब्दी ई ० ) — इन्होंने ' आयुर्वेददीपिका ' नाम की अतिसुन्दर टीका चरकसंहिता पर की है जो आज भी उपलब्ध है । इनकी योग्यता से प्रभावित होकर तात्कालिक विद्वद् - वैद्यसमाज ने इन्हें ' चरक चतुरानन ' उपाधि से भूषित किया । ' वीरभूम ' बंगाल के मयूरग्राम निवासी लोध्रवंशी नारायणदत्त इनके पिता थे । चक्रपाणिदत्त बाद में गौड़ाधिपति नयपाल के प्रधान मन्त्री हुए । इन्होंने सुश्रुतसंहिता पर भी ' भानुमती ' टीका की । यह भी आंशिक रूप में प्रकाशित है । इसके लिए इन्हें ' सुश्रुतसहस्रनयन ' उपाधि प्राप्त हुई थी । इन्होंने चक्रदत्तसंग्रह, शुभङ्कर, सर्वसारसंग्रह, द्रव्यगुणसंग्रह, वैद्यकोष आदि ग्रंथों का प्रणयन किया था । इनकी टीका और ' चक्रदत्त संग्रह ' ग्रन्थ में अनेक प्राचीन और समकालीन आचार्यों, ग्रन्थों और टीकाओं का उल्लेख है । इन्होंने भी चरकोत्तर तन्त्र ( दृढबल - प्रणीत ) का उल्लेख किया है । चक्रदत्त पर

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[ १७ ] तेरहवीं शताब्दी में निश्चयकर नामक वैद्य ने ' रत्नप्रभा ' नाम की टीका लिखी थी जिसमें से प्राचीन आचार्यों और ग्रंथों की एक बहुत बड़ी सूची श्रीगुरुपद हालदार महोदय ने संग्रह कर ' वृद्धत्रयी ' नामक ग्रंथ में प्रकाशित की है । यह सूची इतिहासकारों के लिए बड़े महत्त्व की वस्तु सिद्ध होगी । १३. श्रीकृष्ण वैद्य ( ११ वीं ई ० श ० ) ने भी चरकभाष्य लिखा था । सम्भवतः ये विहार प्रदेश के निवासी थे और ' विश्वप्रकाशकार ' महेश्वर वैद्य के पिता या पितामह थे । १४. श्रीब्रह्मदेव ( ११ वीं ई ० श ० ) ने चरक और सुश्रुतसंहिता पर टीका लिखी थी । डल्हणाचार्यं ने भी इनका उल्लेख किया है । १५. गदाधर ( ११ वीं ई ० श ० ) ने भी एक टीका लिखी थी । यह वंगसेन के पिता थे । १६. वाप्यचन्द्र ( ११-१२वीं ई ० श ० ) ने चरक की टीका और ' वाप्यचन्द्र तन्त्र ' का प्रणयन किया था । १७. ईशानदेव ( त्रिपुराधिपति - ११-१२वीं ई ० श ० ) की टीका से बहुत उद्धरण माधवनिदान की मधुकोष व्याख्या में मिलते हैं १८. बकुल ( ११ वीं ई ० श ० ) - इनकी टीका का भी उल्लेख मधुकोष में है । १ ९. ईश्वरसेन — कुछ लोग बकुलेश्वरसेन यह पूरा नाम मानते हैं तो कुछ लोग ईश्वरसेन को पृथक् मानते हैं । वैद्य - कुल - पञ्जिका से यह सिद्धेश्वरसेन के पुत्र प्रतीत होते हैं । २०. जिनदासगणिमहत्तर ( ११-१२वीं ई ० श ० ) की भी एक टीका का उल्लेख चक्रदत्त की ' रत्नप्रभा ' टीका में है । २१. सुदान्तसेन ( १२ वीं ई ० श ० ) का निर्देश विजयरक्षित और शिवदास सेन ने किया है । २२. गुणाकर ने भी १३ वीं ई ० श ० में चरकवृत्ति लिखी थी ऐसा डा ० कार्डियर ने लिखा है । २३. शिवदास सेन ( १६ वीं ई ० श ० ) ने ' चरकतत्वप्रदीपिका ' के अतिरिक्त अष्टाङ्गहृदय, चक्रदत्त, योगरत्नाकर और द्रव्यगुणसंग्रह पर भी टीकाएँ लिखी थीं । इनके पिता अनन्तसेन बाबकशाह के राजवैद्य थे । २४. गङ्गाधर कविराज ( १ ९वीं शताब्दी ई ० ) -- आपका जन्म १७ ९ ८ ई ० में जैसोर जिले के भागुरा ग्राम में हुआ था । आपके पिता का नाम भवानीदास राय था । अपने नाना से व्याकरण - दर्शन आदि का अध्ययन कर १८ वर्ष की आयु में राजशाही के कविराज रमाकान्त सेन से आयुर्वेद का अध्ययन कर आपने प्रथम कलकत्ता और बाद में मुर्शिदाबाद में चिकित्सा कार्य किया । आप अत्यन्त यशस्वी और सिद्धहस्त वैद्य थे । आपकी प्रतिभा सर्वतोमुखी थी । आपने चरकसंहिता पर

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[ १८ ] ' जल्प - कल्प - तरु ' नामक अत्यन्त विस्तृत टीका का निर्माण किया । इस टीका को पढ़ने और समझने के लिए बड़ी योग्यता की आवश्यकता होती है । इस टीका मात्र से ही आपका अगाध पाण्डित्य प्रकट होता है । आपने उपनिषद्, दर्शन, स्मृति, कर्मकाण्ड, व्याकरण, ज्योतिष, साहित्य, आयुर्वेद आदि विषयों पर लगभग १०० ग्रन्थों अथवा टीकाओं का निर्माण किया है | आपका तैत्तिरीयोपनिषद् भाष्य भी अत्यन्त महत्त्व का है । आपका विद्यावंश राजस्थान से बंगाल पर्यन्त सम्पूर्ण उत्तर भारत में व्याप्त है । इस युग के मूर्तिमान आयुर्वेदस्वरूप श्रद्धेय गुरुवर कविराज श्री सत्यनारायण जी शास्त्री इन्हीं की शिष्य - परम्परा में हैं । आपके गुरु ऋषिकल्प चरकाचार्य स्व ० धर्म-दास कविराज जी स्वनामधन्य कविराज गङ्गाधर जी के शिष्य श्री परेशनाथ सेन के शिष्य थे । १८५५ में आप स्वर्गवासी हुए । २५. योगीन्द्रनाथ सेन ( १८७१ से १ ९ १८ ई ० ) - आप कविराज गङ्गाधर जी के शिष्य महामहोपाध्याय श्री द्वारकानाथ सेन के पुत्र थे । आपने ' चरकोपस्कार ' नामक सारगर्भित किन्तु सरल संस्कृत में एक अत्यन्त उपयोगी टीका की रचना की है । चिकित्सास्थान के चौदहवें अध्याय तक को इनकी टीका प्रकाशित है । शेष की पूर्ति के लिए ऋषिकुल आयुर्वेद महाविद्यालय हरद्वार के अध्यक्ष स्व ० ज्ञानेन्द्रनाथ सेन से अनुरोध कर आप स्वर्गवासी हुए । कविराज ज्ञानेन्द्रनाथ जी ने उसे पूरा तो किया पर वह प्रकाशित नहीं हो पायी ऐसी सूचना है । २६. यादव जी त्रिकम जी आचार्य ( १८८१ से १ ९ ६१ ) - आपका जन्म पोर-चन्दर में हुआ था और कार्यक्षेत्र बम्बई में रहा । आपने अनेक आयुर्वेदिक ग्रन्थों का संशोधन, सम्पादन और प्रणयन किया । चरकसंहिता मूल एवं चक्रपाणिकृत आयुर्वेद. दीपिका टीका का विभिन्न लिखित पुस्तकों से मिलान कर शुद्ध संस्करण सर्वप्रथम आपके ही सम्पादकत्व में प्रकाशित हुआ । २७. कविराज ज्योतिश्चन्द्र सरस्वती ने भी संस्कृत भाषा में एक टीका का निर्माण करना आरम्भ किया था । सन् १ ९ ४० के लगभग नमूने के तौर पर शारीरस्थान के प्रथम अध्याय मात्र की टीका छपी हुई देखने को मिली थी । पर वह पूर्णरूप से सामने नहीं आयी । पता नहीं, वह पूरी हुई या नहीं । २८. अविनाशचन्द्र - आपने १ ९वीं ई ० शताब्दी के अन्त में सर्वप्रथम चरक-संहिता का अंग्रेजी में अनुवाद प्रकाशित किया था । २ ९. डा ० प्राणजीवन मेहता की अध्यक्षता में गठित सम्पादक मण्डल के प्रयास से श्रीमती गुलाबकुअर बा आयुर्वेद ट्रस्ट जामनगर द्वारा अंग्रेजी, हिन्दी और गुजराती भाषा में अनुवाद के साथ विविध विवेचन और विवरण युक्त ग्रंथ ६ खण्डों में सन् १ ९ ४७ में प्रकाशित हुआ है ।

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[ १६ ] ३०. अरबी और फारसी भाषाओं में भी इसके अनुवादों का निर्देश प्रोफेसर विल्सन ने किया है । अरबी में ८ वीं ई ० श ० में तथा फारसी में उसके भी पूर्व ये अनुवाद हुए थे । ३१. हिन्दी भाषा में अनुवाद सर्वप्रथम लाहौर से पं ० ज्वालाप्रसाद जी ने और सम्भवतः पटियाला के वैद्यरत्न पं ० रामप्रसाद जी ने भी प्रकाशित किया था । बाद कुछ औरों ने भी प्रयास किया । जैसा कि इस वक्तव्य के आरम्भ में ही कहा गया है आज के युग कि अधिकांश जनों के समझने के लिए; अन्य चिकित्सा पद्धतियों के अध्यापकों, चिकित्सकों और विद्यार्थियों को भी आकृष्ट करने के लिए; न केवल हिन्दी या अंग्रेजी भाषा में इसका उत्तम अनुवाद हो वरन् विषयों के स्पष्टीकरण एवं लोगों की भ्रान्त धारणाओं के निवारणार्थ अर्वाचीन चिकित्सा विज्ञान के साथ तुलनात्मक विवेचन के साथ एक प्रामाणिक टीका प्रकाशित की जाय । यह कार्य न तो सरल था न एक व्यक्ति के वश का था । अतः प्रकाशक महोदय ने प्राच्य और पाश्चात्य उभयविध चिकित्सा पद्धतियों से परिचित विद्वानों का एक सम्पादक मण्डल संगठित किया । भूतभावन भगवान् विश्वनाथ की असीम अनुकम्पा से आज यह ग्रन्थ सुसम्पन्न होकर विद्वज्जनों के समक्ष उपस्थित है । इसकी सुरूप सम्पन्नता में सर्वोपरि महत्त्व सर्वतन्त्र स्वतन्त्र राष्ट्रवैद्य पद्मभूषण आयुर्वेदावतार श्रद्धेय गुरुवर कविराज श्री पं ० सत्यनारायणजी शास्त्री के उदार आशीर्वाद एवं सत्परामर्श का है । जनकल्याण और शिष्यवत्सलता से ही प्रेरित होकर अपनी अतिव्यस्त दिनचर्या से कुछ समय निकालकर अग्निवेशादि के प्रति आत्रेय के सूत्र के समान अल्पपदों में किन्तु सारगर्भित शुभाशंसात्मक भूमिका लिखकर आपने हम सबको अनुगृहीत किया है । कविराज रामरक्षजी पाठक, संचालक केन्द्रीय आयुर्वेदान्वेषण - संस्था, जामनगर को जितना भी साधुवाद दिया जाय, कम है; क्योंकि इस संस्करण के कृत्य -सदुपन्यास में विशेष श्रेय उन्हीं का है 1 इस निबन्ध की पूर्ति के लिये अनेक पुरातत्त्वविदों की रचनाओं का आश्रय लेना पड़ा है जिनमें स्वर्गीय म ० म ० कविराज गणनाथ सेन कृत प्रत्यक्ष शारीरम् का उपोद्घात, नेपाल - राजगुरु स्वर्गीय पं ० हेमराजशर्मा कृत काश्यपसंहिता का उपोद्घात एवं श्री गुरुपद हालदार लिखित ' वृद्धत्रयी ' मुख्य हैं । इन विद्वानों के हम हृदय से आभारी हैं । अमर भारती एवं आयुर्वेद के परम भक्त बाबू जयकृष्णदास जी गुप्त, संस्थापक चौखम्बा संस्कृत सीरीज तथा चौखम्बा विद्याभवन, वाराणसी की अनुपम उदारता और तत्परता अत्यन्त श्लाघनीय है जिसके कारण ही यह महत्त्वपूर्ण संस्करण प्रकाशित हो सका है ।

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[ २० ] हम आशा करते हैं कि प्रस्तुत टीका अपने ढंग की अनोखी और अत्युपयोगी विशेषतः विभिन्न चिकित्सा पद्धतियों की चौड़ी खाई को पाटने में सहायक सिद्ध होगी । यह तो नहीं कह सकते कि यह सर्वाङ्गपूर्ण और त्रुटिरहित है किन्तु हृदय विद्वानों का उचित सहयोग और सत्परामर्श प्राप्त रहा तो अगले संस्करण में इसे और भी विकसित और त्रुटिरहित बनाने का प्रयास किया जायगा । यथेमां वाचं कल्याणीमावदानि जनेभ्यः ब्रह्मराजन्यास्यां शूद्राय चार्याय च स्वाय चारणाय च । प्रियो देवानां दक्षिणायै दातुरिह भूयासमयं मे कामः समृद्ध्यतामुपमादो नमतु । ( यजुर्वेद ) इस ग्रन्थ के द्वारा समाज का प्रत्येक वर्ग और व्यक्ति आयुर्वेद का यथावत् ज्ञान लाभ कर विश्व के मानव मात्र के कल्याण, दीर्घायु, सुखायु और हितायु साधन में समर्थ हो, विरोधियों के भी भ्रम दूर हों और वह भी इसका समादर करें एवं विश्व में आयुर्वेद का प्रचार हो यही कामना है ।

पृष्ठ 48

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: प्रकाशकीय वक्तव्य हमारे पौर्वात्य प्रकाशनों ने सदैव अग्रणी रहकर देश - विदेश में भारतीय संस्कृति के प्रसार में अपना योगदान किया है । उसी परम्परा में प्रकाशित चरकसंहिता का यह सर्वांगपूर्ण संस्करण पाठकों के समक्ष प्रस्तुत करते हुए अपार हर्षानुभव हो रहा है । सर्वविदित है कि अत्यन्त प्राचीन यह संहिता ग्रन्थ भारतीय चिकित्साविज्ञान के सभी अंगों से समन्वित होने के कारण चिकित्सा - शास्त्रियों के लिये परम उपादेय है | किसी एक व्यक्ति द्वारा इसका लेखन या सुसम्पादन संभव न था, अतः देश के चिकित्साशास्त्र - मर्मज्ञ शीर्षस्थ अनुभवी विद्वानों द्वारा इसका सम्पादन कराने की योजना बनाकर विद्वानों से सम्पर्क स्थापित किया गया और निम्नलिखित चिकित्सा-मर्मज्ञ विद्वानों की समिति बनायी गयी । शुभाशंसक: आयुर्वेदावतार कविराज श्री सत्यनारायण जी शास्त्री, पद्मभूषण टीकाकार: ( १ ) श्री काशीनाथ पाण्डेय ( २ ) श्री गोरखनाथ चतुर्वेदी सम्पादक - मण्डल: ( १ ) श्री राजेश्वरदत्त शास्त्री ( ३ ) श्री गंगासहाय पाण्डेय ( २ ) श्री यदुनन्दन उपाध्याय ( ४ ) श्री बनारसीदास गुप्त ( ५ ) श्री ब्रह्मशंकर मिश्र परमाराध्य कविराज श्री सत्यनारायण जी शास्त्री पद्मभूषण के आशीर्वाद तो इस संस्थाको सदा से ही प्राप्त है । आप की कृपा का ही फल है कि यह संस्था आयुर्वेदीय ग्रन्थों के प्रकाशन में उत्तरोत्तर आगे बढ़ती जा रही है । प्रस्तुत कार्य में भी आपके आशीर्वाद प्राप्त होते रहे और आपने शुभाशंसात्मक भूमिका लिखकर भी इस संस्करण को सनाथ किया है । इसके लिये चौखम्बा - परिवार सदा आपका भारी रहेगा । हमारे विद्वान् टीकाकारों एवं सम्पादकों ने जिस लगन और उत्साह के साथ इस कार्य को पूरा किया है उसकी जितनी भी प्रशंसा की जाय, थोड़ी ही है । आयुर्वेद के इन यशस्वी विद्वानों के प्रति साभार कृतज्ञता प्रकट करते हुए जगत्पिता से हमारा विनय है कि ऐसे विद्वानों के श्रमजल से अभिसिञ्चित यह ग्रन्थ पादप सवको अभीष्ट फल देने में सदा समर्थ बना रहे । विनीत--प्रकाशक

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' न हि ज्ञानावयवेन कृत्स्ने ज्ञेये ज्ञानमुत्पद्यते । ' ( च. वि. ४, ५ ) ( The understanding of the total nature of a thing does not arise from a fragmentary knowledge of it. ) ' कृत्स्नो हि लोको बुद्धिमतामाचार्यः शत्रुञ्चाबुद्धिमताम् । ' ( च.वि. ८, १४ ) ( The entire world is the teacher to the intelligent and the foe to the unintelligent. )

पृष्ठ 50

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चरकसंहिता - विषयसूची दीर्घञ्जीवितीयाध्याय १ विषय - प्रवेश ( १ ) आयुर्वेदावतरण ( इतिहास ) भरद्वाज का इन्द्र के यहाँ गमन आयुर्वेद के पठन - पाठन की परम्परा महर्षियों के एकत्र होने में कारण महर्षियों की गणना रोग का धर्मादिप्राप्ति में बाधकत्व भरद्वाज की नियुक्ति तथा इन्द्र से वार्ता त्रिसूत्र आयुर्वेद का स्वरूप सूत्रस्थान ( ३ ) धातु साम्य तथा त्रिदोष विज्ञान २८ १ आयुर्वेद तन्त्र का प्रयोजन 27 शारीरिक और मानसिक दोष २ ९ ३१ " ३२ रोगों के विविध कारण ५ रोग का आश्रय " आत्मा रोग का आश्रय नहीं 19 ६ शारीर एवं मानस रोगों की चिकित्सा ३५ ७ बात का लक्षण और चिकित्सा - सूत्र ३६ ८ पित्त का लक्षण एवं चिकित्सासूत्र 19 कफ का लक्षण एवं चिकित्सा - सूत्र 99 भरद्वाज द्वारा ऋषियों को आयुर्वेद का उपदेश १० ( २ ) षट् - पदार्थ विज्ञान त्रिसूत्र आयुर्वेद का तत्कालीन व्यावहारिक स्त्ररूप पुनर्वसु आत्रेय का अग्निवेशादि छः शिष्यों को आयुर्वेद का उपदेश अग्निवेशादि के तन्त्रों का निर्माण आयुर्वेदतन्त्रों का समस्त मुनियों द्वारा अनुमोदन " " आयुर्वेद की परिभाषा 19 साध्य रोगों का चिकित्सा सूत्र और असाध्य रोगों में चिकित्साभाव रस के लक्षण 99 रस के भेद रसों के कार्य ११ दोषों को प्रकुपित करने वाले रस १२ | ( ४ ) द्रव्य वर्गीकरण ( Classification of Drugs ) प्रभाव भेद से द्रव्यों के भेद ३७ ३८ " ३ ९ ४० " उत्पत्ति भेद से द्रव्य के प्रकार ४१ जाङ्गम द्रव्य 29 आयुर्वेदीय तन्त्रों का सर्वत्र स्वागत १३ आयु के लक्षण तथा पर्याय 97 पार्थिव द्रव्य उभयलोकहित साधन में आयुर्वेद १४ औद्भिद द्रव्य 99 ४२ सामान्य तथा विशेष की परिभाषा १५ लोक ( जीवात्मा ) का आधार आयुर्वेद का अधिकरण द्रव्य गणना औद्भिद द्रव्य के ग्राह्य अङ्ग १८ मूलिनी आदि द्रव्यों की गणना मूलिनी द्रव्यों के प्रयोग - स्थल 27 गुण गणना " 99 सोलह मूलिनी द्रव्य ४३ १ ९ " " २० उन्नीस फलिनी द्रव्यों का निर्देश " २२ 27 कर्म का लक्षण समवाय का लक्षण द्रव्य का लक्षण गुण का लक्षण कर्म का लक्षण ( क ) फलिनी द्रव्यों के प्रयोग - स्थल २३ | चतुर्विध महास्नेह २४ पाँच नमक २६ | मूत्रों के नाम और संख्या २७ सामान्यतः मूत्रों के गुण 27 ४४ " " "