चरक संहिता हिन्दी भाष्य — पृष्ठ 351–360

चरक संहिता हिन्दी भाष्य · Chaukhamba · पृष्ठ 351–360

पृष्ठ 351

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२५८ चरकसंहिता घृत अपने प्राकृतिक गुण स्नेह और शैत्य को नहीं छोड़ता है, तब चित्रक के रूक्ष, उष्ण गुण और गुण, घृत का शैत्य इन परस्पर विरुद्ध गुणों का एकाश्रयभाव कैसे होगा? समाधान - तथापि आश्रय - भिन्न होने से ' अर्थात् शैन्य - स्नेह का आश्रय घृत है और रूक्ष - उष्ण का आश्रय चित्रक है, विरोध नहीं होता है । और इसीलिए घृत की प्रधानता बनाई है क्योंकि घृत अपने विरुद्ध गुण को नष्ट न करते हुए अपने गुण को भी धारण करता है संस्कार करने से घृत में रहने । कहीं कहीं उष्ण द्रव्यों से घृत का जाती है और घृत उष्ण हो जाता है, शीतल द्रव्यों से तैल का संस्कार करने से वाली शीतलता नष्ट हो पर उसका चिकनापन नष्ट तेल शीतल हो जाता है । नहीं होता है । इसी तरह पर यदि रूक्ष द्रव्यों से संस्कार किया जाय तो तैल रूक्ष नहीं होता है । इस प्रकार घृत और तैल दोनों अपनी स्वाभाविक शीतलता और उष्णता का परित्याग कर उष्य और शीतल हो जाते हैं पर स्निग्धता का परित्याग दोनों नहीं करते है । इसलिए कुछ लोगों का कहना है कि संस्कार के अनुवर्तन से जङ्गम शरीर में घृत सर्वश्रेष्ठ है और स्थावर स्नेहों में तिल का तेल उत्तम होता है । यद्यपि भिन्न - भिन्न योनि के अनुसार भिन्न - भिन्न रोगों में प्रधानता बताई गई है पर सामान्य रूप से अन्य तैलों में तिल की प्रधानता है । जैसा कि ' तिलतैलं स्थावरजानानां स्नेहानाम् ' ( सू. अ. २५ ) कहा है । वाग्भट ने ' माधुर्याद विदाहित्वाज्जन्माद्येव च शीलनात् ' इन तीनों हेतुओं से घृत को श्रेष्ठ बताया है । उपर्युक्त विमर्श का अधिकांश भाग चक्रपाणि सम्मत है । घृतं पित्तानिलहरं रसशुक्रौजसां हितम् । निर्वापणं मृदुकरं स्वरवर्णप्रसादनम् ॥ १४ ॥

( ३ ) प्रश्न: चतुर्विध स्नेहों के पृथक पृथक् क्या गुण हैं? ( के च स्नेहगुणाः पृथक् ), उत्तर – ( १ ) घृत के गुण - वृत पित्त और वातजन्य विकारों को शान्त करता है । रस, शुक्र और ओज के लिए हितकारी होता है । दाह को शान्त करता है, शरीर को कोमल करता है, स्वर और वर्ण को प्रसन्न करना है ॥ १४ ॥

* मारुतघ्नं न च श्लेष्मवर्धनं बलवर्धनम् | त्वच्यमुष्णं स्थिरकरं तैलं योनिविशोधनम् ॥१५ ॥

( २ ) तैल के गुण – सामान्य रूप से तैल वात विकारों को शान्त करता है । कफ को नहीं बढ़ाता है । बल को बढ़ाने वाला, त्वचा के लिए हितकारी, उष्ण, मांस को स्थिर करने वाला करने वाला होता है ॥ १५ ॥

और योनि मार्ग का शोधन विमर्श - यह तैल के सामान्य गुण बताये गये हैं, पर यह गुण तिल के तैल का समझना चाहिए क्योंकि तैलों में वही श्रेष्ठ होता है । इसी प्रकार घृत के सामान्य गुण से गोघृत के ही गुण समझना चाहिये । वाग्भट ने अन्यान्य गुणों के साथ स्थूल मनुष्यों को कृश करना, अकृश मनुष्यों को स्थूल करना भी बताया है । तात्पर्य यह है कि मेदधातु बढ़ कर जब स्रोतों को अवरुद्ध कर लेती है तो उत्पन्न रसधातु से रक्तादि धातुओं का निर्माण नहीं हो पाता । फलतः मेदोवातु बढ़ जाने से शरीर मोटा हो जाता है । तेल के सेवन से स्रोतों का मुख खुल जाता है क्योंकि ल अपने उष्ण और सूक्ष्म गुणों के द्वारा शीघ्र ही स्रोतों में प्रविष्ट होकर स्रोतों को विकसित कर देता है इससे सम्पूर्ण धातुओं का निर्माण होने लगता है और मेदोधातु के अभाव से शरीर कृश हो जाता है । कृश व्यक्ति जब तेल का सेवन करते हैं तो उनके शरीर में सूखे हुए स्रोत जो धातुओं का बहन उचित रूप से न कर शरीर को सुखा देते वे तैल से प्राकृत होकर धातुओं का निर्माण समुचित रूप में करने लगते हैं इसीलिए तैल को उभयगुणकारी बनाया है । विद्धभग्नाहतभ्रष्टयोनिकर्णशिरोरुजि । पौरुपोपचये स्नेहे व्यायामे चेप्यते वसा ॥ १६ ॥

( ३ ) वसा के गुण - विद्व होने पर, काण्डभग्न या सन्धिभग्न होने पर, चोट लगने पर,

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स्नेहाध्यायः १३ ] सूत्रस्थानम् २५६ योनिभ्रंश, कर्णशूल और सिर में वेदना होने पर वसा लाभ करती है, पुरुषार्थ की वृद्धि के लिए, शरीर को स्निग्ध करने के लिए और जो लोग अधिक व्यायाम करते हैं उन लोगों के लिए सा हितकर होती है ॥ १६ ॥

शुक्ररसश्लेष्म मेदोमज्जविवर्धनः । मज्जा विशेषतोऽस्थनां च बलकृत् स्नेहने हितः ॥१७ ॥

( ४ ) मज्जा के गुण - मज्जा का सेवन करने से शरीर में बल, वीर्य, रस, कफ, मेदा और मज्जा की वृद्धि होती है । विशेषकर मज्जा का प्रयोग अस्थियों को बल देने और शरीर का स्नेहन करने में हितकर होता है ॥ १७ ॥

सर्पिः शरदि पातव्यं, वसा मज्जा च माधवे । तैलं प्रावृषि, नात्युष्णशीते स्नेहं पिबेन्नरः ॥ ( ४-५ ) प्रश्न: स्नेहपान का ( क ) काल तथा ( ख ) अनुपान क्या और किसके लिये ( कालानुपाने के कस्य ), प्रश्न ( ४ ) का उत्तर - स्नेहपान काल ऋतु के अनुसार त्री का सेवन शरद ऋतु में करना चाहिये । वसा और मज्जा का सेवन वैशाख में करना चाहिए, और तैल का सेवन प्रावृट् ऋतु में करना चाहिये | अत्यन्त शीत तथा अत्यन्त उष्णकाल में सर्वथा स्नेह का सेवन नहीं करना चाहिये || १८ | विमर्श - शरद ऋतु में स्वस्थ मनुष्य को घृत - पान करना चाहिए क्योंकि शरद ऋतु में स्वाभाविक रूप से पित्त का प्रकोप होता है । ' पित्तघ्नं घृतम् ' तथा - ' शरीरजानां दोषाणां क्रमेण परमौषधम् । वस्तिर्विरेको वमनं तथा तैलं घृतं मधु ॥ ' ( अ.हृ. सू. अ. १ ) के अनुमार घृत पित्त का शामक होता है । वसा और मज्जा का पान मात्रव ( वैशाख ) में करना चाहिए | क्योंकि वसा और मज्जा बलाधान के लिए प्रयुक्त होती हैं । वैशाख आदान - काल का मध्य हैं | इसमें सभी प्राणियों का बल स्वभाव से ही घटता है । उस समय इसका प्रयोग करना वल को स्थिर रखता है, जैसा कि ऊपर के दोनों लोकों से स्पष्ट है । शरद् ऋतु में सूर्य - किरणें कुछ तेज पड़ती हैं अतः शीतल घृत का प्रयोग एवं प्रावृट् ( वर्षा का प्रथम काल ) में कुछ शीतलता आ जाती है अतः उष्ण तैल का प्रयोग किया जाता है पर वसा और मज्जा न शीतल है और न उष्ण है किन्तु साधारण है और वैशाख में न उष्णता रहती है न शीतलता अतः साधारणगुणविशिष्ट वसा, मज्जा का प्रयोग साधारण वैशाख मास में किया जाता है । वसा - मज्जा साधारण- गुणविशिष्ट हैं इसीलिए इनका अनुपान न शीतल और न उष्ण द्रव्य दिया जाता है, जैसा कि - ' यथासत्त्वं तु शैत्यौष्ण्ये वसामज्योर्विनिदिशेत् ' ( अ. २७ ) । दोषों के अनुसार भी वसा - मज्जा कफ के लिए हितकर होती हैं । यद्यपि ये कफ के लिए उत्तम हितकर नहीं हैं पर घृत की अपेक्षा उत्तम होती हैं, यथा-- ' तैलवसामज्जसर्पिषां तु यथापूर्व श्रेष्ठत्वं वातश्लेष्मविकारेषु भवति यथोत्तरं पित्तविकारेषु ' ( च. वि. अ. ८ ) अर्थात् तैल वात और कफ-जन्य विकारों को दूर करने के लिए श्रेष्ठ माना गया है क्योंकि तैल का वीर्य उष्ण होता है और घृत वीर्य में शीतल होता है अतः पित्त को या पित्तजन्य विकार को दूर करने में श्रेष्ठ माना गया है । वसा - मज्जा ये वात, पित्त, कफ जन्य विकारों को दूर करने में साधारण माने गये हैं अतः इन दोनों का उल्लेख तैल और घृत के मध्य में किया गया है । स्नेहों का प्रयोग दो दृष्टि से किया जाना है ( १ ) एक तो उन स्नेहों के गुणों के अपने शरीर में आधान के लिए तथा उनके विशिष्ट गुणों की प्राप्ति के लिए, जैसा कि - ' घृतं पित्तानिलहरं रसशुक्रौजसां हितम् ' आदि चार श्लोकों से चारों का गुण बताया गया है । ऐसे प्रयोग की आवश्यकता संशमन चिकित्सा में पड़ती है ( २ ) दूसरी दृष्टि से दोषों के निर्हरण के पूर्व किया जाता है । इसमें भी स्वस्थवृत्त के नियमानुसार संचय - काल में ही दोषों का निर्हरण किया जाता है

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२६० चरकसंहिता अर्थात् प्रकोपावस्था के पूर्व ही दोषों को निकाल दिया जाता है, यथा - ' संचयेऽपहृता दोषा लभन्ते नोत्तरा गतीः ' ( सु. सू. अ. २१ ) तथा ' चय एव जयेद्दोषान् कुपितं त्वविरोधयन् ' ( अ.हृ.सू.अ. १३ ) यह एक विधि है । दूसरी विधि - कुपित हो जाने पर बढ़े हुए दोषों का निर्हरण करना चाहिए । वृद्ध दोषों को निकालने के लिए पञ्चकर्म ( संशोधन ) करते समय सर्व प्रथम स्नेह और स्वेद का प्रयोग किया जाता है, जैसा कि इसी अध्याय के अन्त में - ' स्नेहमये प्रयुञ्जीत ततः स्वेदमनन्तरम् । स्नेहस्वेदोपपन्नस्तु संशोधनमतरत् ॥ ' बनाया जायगा । प्रथम दृष्टि से प्रयुक्त स्नेहों का सेवनकाल इस श्लोक से स्पष्ट किया गया है । घृत का सेवन शरद् ऋतु में बनाया है । ऋतुओं का विभाग सूर्य की गति के अनुसार और दोषों के संचय, प्रकोप, प्रशम के अनुसार दो प्रकार से किया गया है । पहले प्रकार में शिशिर, वसन्त, ग्रीष्म, वर्षा, शरद, हेमन्त ये ६ ऋतुयें मानी गई हैं । इनमें माघ - फागुन को शिशिर, चैत- वैशाख को वसन्त. जेठ - अषाढ़ को ग्रीष्म, सावन - भादों को वर्षा, क्वार- कार्तिक को शरद् और अगहन पूष को हेमन्न माना है । दोषों के संचय आदि के अनुसार वर्षा, शन्द, हेमन्त, वसन्त, ग्रीष्म और प्रावृट् ये ऋतुयें मानी गई हैं । इनमें भादों क्वार को वर्षा, कार्तिक अगहन को शरद पूप - माव को हेमन्त. फागुन - चैन को वसन्त, वैशाख जेठ को ग्रीष्म और आषाढ़ - सावन को प्रावृट् माना है । स्वस्थवृत्त के अनुसार - ' हैमन्तिकं दोषचयं वसन्ते प्रवाहयन् ग्रीष्मजमभ्रकाले । धनात्यये वार्षिकमाशु सम्यक् प्राप्नोति रोगानृनुजान्न जातु ॥ ' ( च. सू. शा. अ. २ ) से यह स्पष्ट किया गया है कि इन नियमों से दोर्षों की संचय अवस्था में उन्हें निकाल देने से वे रोग उत्पन्न नहीं करते हैं और मनुष्य स्वस्थ रहता है, सुश्रुत ने भी कहा है, यथा - ' सञ्चयेऽपहृना दोषा लभन्ते नोत्तरा गतो: ' ( मु.सू. अ. २१ ) । संशोधन के लिये जब पंचकर्म का प्रयोग किया जाता है तो वैसी दशा में स्नेह का प्रयोग भी किया जाता है । पर सामान्यतः स्वस्थवृत्त के अनुसार दोषों का निर्हरण करने के लिये स्नेहन-स्वेदन का कोई विशेष महत्त्व नहीं होता पर यह आवश्यक है कि जब दोष का संचय अधिक मात्रा में हो तब स्नेहन - स्वेदन का प्रयोग करें । यहाँ पर आचार्य ने इन दोनों नियमों के अतिरिक्त शरीर में स्नेहों के गुणों का आधान करने के लिये ही यह समय निश्चित किया है । इस बात का ' माधव ' शब्द से संकेत किया है । माधव का अर्थ वैशाख होता है । दोषों के संचय आदि के अनुसार फागुन चैत को वसन्त माना है । हेमन्त में संचित दोष का निर्हरण वसन्त में किया जाता है यह सामान्य नियम है । पर वैशाख वसन्त नहीं है । इसलिये स्पष्ट है कि स्नेहों के गुणाधान के लिये ही यह समय बताया गया है । अष्टांगसंग्रह में भी-- ' तैलं प्रावृषि वर्षान्ते सपिरन्यौ तु माधवे । सर्व सर्वस्य च स्नेहं युन्ज्याद् भास्वति निर्मले । ' ( सू. अ. २५ ) से वैशाख में ही वसा और मज्जा का प्रयोग बताया गया है । यह वसा और मज्जा का प्रयोग बल तथा धातु की वृद्धि करने वाला होता है । इसका प्रयोग आदान काल के मध्य में जब बल और धातु का अधिक क्षय होता है उस समय करने का आदेश दिया गया है । * वातपित्ताधिको रात्रावृष्णे चापि पिबेन्नरः । श्लेष्माधिको दिवा शीते पिबेच्चामलभास्करे । स्नेहपान काल: दिन तथा रात्रि के अनुसार ---- गर्मी के दिनों में बात और पित्त की अधिकता में रात्रि के समय, शीतकाल में कफ की अधिकता में दिन के समय मनुष्य को स्नेह-पान उस दिन करना चाहिए जिसदिन सूर्य भगवान् स्वच्छ हो ( वाइलयुक्त न हों ) ॥ १ ९ ॥ विमर्श - तात्पर्य यह है कि पित्तजन्य विकारों में या पिर की अधिकता में शरद ऋतु में स्नेहपान करने का विधान है । पर यह स्पष्ट नहीं किया है कि खंड कब पीना चाहिये । इसलिये यहाँ आचार्य ने स्पष्ट किया है कि पित्तजन्य विकारों में या पित्त की अधिकता में

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1 स्नेहाध्याय: १३ ] सूत्रस्थानम् २६१ यदि शरद में संहतान करना हो तो रात्रि में करना चाहिये । इसी प्रकार प्रावृट् ऋतु में, वानजन्य विकारों में या वात की अधिकता में रात्रि में ही स्नेह का पान करना चाहिये । यहाँ ' वातपित्तादिके ' शब्द से बात की अधिकता, पित्त की अधिकता या वातपित्त की अधिकता का ज्ञान कर रात्रि में स्नह पीने का संकेत किया गया है । यह स्वाभाविक रूप से संचित हुये दोपों के निर्हरण की विधि बताई गई है । पर मिथ्या आहार - विहार के कारण कोई भी दोष किसी भी समय संचित और कुपित हो जाते हैं । यदि संयोगवश गर्मी के दिनों में पित्त संचित हो गया तो उसे उसी समय निकालना आवश्यक होता है । रात्रि स्वभावतः साधारण शीत और उष्ण गुणयुक्त होती है इसलिये रात्रि में संहपान करना चाहिये । इसी प्रकार कफ का निर्हरण करने के लिये वसन्त ऋतु में स्नेहपान दिन में कराया जाता है । यदि मिथ्या आहार - विहार के कारण कफ का संचय प्रकोप जाड़े में ही हो गया तो उसका निर्हरण करने के लिये स्नेहपान दिन में कराया जा सकता है । अष्टांगसंग्रह में भी यह बात स्पष्ट रूप से बतायी गयी है, यथा- ' ऋतौ साधारण दोषसाम्येऽनिलकफे कफे । दिवानिश्यनिले पित्ते संसर्गे पित्त-चत्यपि ॥ त्वरमाणे तु शीतेऽपि दिवा तैलं च योजयेत् । उष्णेऽपि रात्रौ सर्पिश्च दोषादीन् वीक्ष्य चान्यथा ॥ ' ( सू. अ. २५ ) । सुश्रुत ने भी इसे स्पष्ट किया है, यथा-- ' शीतकाले दिवा स्नेह-मुष्णकाले पिवेन्निशि । वातपित्ताधिको रात्रौ वातश्लेष्माथिको दिवा ॥ ' ( चि. अ. ३१ ) । अत्युष्णे वा दिवा पीतो वातपित्ताधिकेन वा । मूच्छ पिपासामुन्मादं कामलां वा समीरयेत् ॥ शीते रात्रौ पिबन् स्नेहं नरः श्लेष्माधिकोऽपि वा । आनाहमरुचिं शूलं पाण्डुतां वा समृच्छति ॥ विपरीतकाल में स्नेहपान से हानि I अत्यन्त उष्ण काल में या वातप्रधान या पित्तप्रधान या वात - पित्तप्रधान मनुष्यों द्वारा दिन में स्नेहपान किया जाता है तो मूर्च्छा, प्यास, उन्माद और कामला ( Jaundice ) रोग को उत्पन्न करता है । यदि अत्यन्त शीत काल में या कफप्रधान मनुष्यों द्वारा स्नेहपान रात्रि में किया गया तो आनाह, भोजन में अरुचि ( Annorexia ), उदर में शूल ( Pain in abdomen ) और पाण्डु ( Anaemia ) रोग को उत्पन्न करता है ॥ २०-२१ ॥ विमर्श - तात्पर्य यह है कि वातप्रधान, पित्तप्रधान और वात - पित्त प्रधान दोष वाले को दिन में स्नेहपान कभी नहीं कराना चाहिये । यदि कफप्रधान पुरुष है तो उसे अत्यन्त उष्ण काल में दिन में स्नेहपान नहीं कराना चाहिये । यदि अज्ञानतावश संहपान करा दिया गया तो मूर्च्छा आदि उपद्रव होने लगते हैं । इसी प्रकार अत्यन्त शीत काल में कफप्रधान मनुष्य को दिन में ही स्नेहपान करना चाहिये । यदि रात्रि में कफप्रधान पुरुष खेहपान करता है तथा वातप्रधान, पित्त-प्रधान, वातपित्त प्रधान, मनुष्य अत्यन्त शीत काल में यदि रात्रि में स्नेहपान करता है तो आनाह, अरुचि आदि उपद्रव होते हैं । * जलमुष्णं घृतं पेयं यूषस्तैलेऽनु शस्यते । वसामज्ज्ञोस्तु मण्डः स्यात् सर्वेषूष्णमथाम्बु वा ॥ ( ५ ) प्रश्न का उत्तर - स्नेहपान का अनुपान घृत पीने के बाद गरम जल, तेल पीने के बाद यूप, वसा और मज्जा पीने के बाद मण्ड पीना चाहिये । अभाव में सभी स्नेहों के पीने के बाद गरम जल पीना चाहिये ॥ २२ ॥

विमर्श - अनुपान के द्वारा औषध का गुण शरीर में शीघ्र ही प्रसरित होता है । अनुपान इस प्रकार का दिया जाता है जो औषध के गुणों को विशेष रूप से विकसित करे । प्रायः वह औषध गुण से विपरीत होता है । घृत शीतवीर्य होने के कारण उष्ण जल के कारण वह सारे स्रोत और अनुस्रोतों में फैल कर अपना कार्य करने में समर्थ होता है ।

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२६२ चरकसंहिता तेल का अनुपान यूष बताया है । यूष सामान्यतः वात को दूर करने वाला होता है । यद्यपि द्रव्य के अनुसार बनाया हुआ यूष वात, पित्त, कफ को अलग - अलग दूर करता है पर यूष से मूंग का ही यूष लिया जाता है और वह वातव्याधि में विशेष लाभकर होता है । यथा - ' मसूर -मुद्गगोधूमकुलत्थलवणैः कृतः । कफपित्ताविरोधी स्याद् वातव्याधौ च शस्यते ॥ ' ( सु. सू. अ. ४६ ) वसा - मज्जा का अनुपान मंड बताया गया है । मंड स्वभावतः धान के लावा से बनाया जाता है और वह पाचन, दीपन और वात का अनुलोमन करने वाला होता है, यथा- ' लाजमण्डो विशुद्धानां पथ्यः पाचनदीपनः । वातानुलोमनो हृद्यः पिप्पलीनागरायुतः ॥ ( सु. सू. अ. ४६ ) । वसा - मज्जा का प्रयोग कफजन्य विकारों में होता है । कफ के बढ़ जाने से अग्निमान्द्य, अपक्ति तथा वात की गतियों में रुकावट हो जाती है । यदि मंड का अनुपान दिया जाता है तो इन विकारों को दूर कर कफ को जीतने में वसा मज्जा सहायक होती है । यदि संयोगवश यह अनुपान न मिल सके तो सभी स्नेहों का अनुपान गरम जल लेना बनाया है । तात्पर्य यह है कि गरम जल स्वभावतः पाचन, दीपन, बात का अनुलोमक और वात - कफ को जीतने वाला होता है । इसलिये वसा, मज्जा और तैल जो कफ और वातजनित विकारों में प्रयुक्त होते हैं उनमें यह अनुपान के रूप में दिया जाता है । घृत के अनुपान गरम जल का प्रयोग प्रधान रूप से बनाया गया है । सुश्रुत ने सभी स्नेहों का अनुपान गरम जल बनाते हुये भिलावे के तैल और तुवरक तैल ( चालमुगरा ) के अनुपान में बग्न जल का निषेध किया है क्योंकि ये स्नेह स्वाभाविक रूप में अयन्त उष्ण होते है । यदि इनका अनुपान उष्ण जल दिया जाय तो शरीर में उष्ण के अतियोग से अनेक प्रकार के नवं रोग हो जाते हैं, यथा--' उष्णोदकानुपानन्तु स्नेहानामा शस्यते । ऋते भल्लाले हानीकान्तथा । ( सु.सू.अ. ४६ )

ओदनश्च विलेपी च रसो मांसं पयो दधि । यवागूः सूपशाकौ च यूपः काम्बलिकः खडः ॥

सक्तवस्तिलपिष्टं च मद्यं लेहास्तथैव च । भक्ष्यमभ्यञ्जनं वस्तिस्तथा चोत्तर वस्तयः ॥ २४ ॥

गण्डूपः कर्णतैलं च नस्तःकर्माक्षितर्पणम् । चतुर्विंशतिरित्येताः स्नेहस्य प्रविचारणाः || २५ || स्नेह की २४ प्रविचारणायें ( Twenty four Preparations Employed for Oleation Therapy ) ( ६ ) प्रश्न: स्नेह - विचारणायें कितनी है और क्या है? ( कनि का विचारणाः ), उत्तर - २४ स्नेह की प्रविचारणायें - १ ओदन, २ दिलेपी, ३ रस, ४ मांस, ५ दूध, ६ दही, ७ यवागू, ८ सूप, ९ शाक, १० यूप, ११ काम्बलिक, १२ खड, १३ सत्तू, १४ तिल का कल्क, १५ मद्य, १६ लेड, १७ भक्ष्य, १८ अभ्यञ्जन, १ ९ वस्ति, २० उत्तरवस्ति २१ गण्डूप, २२ कर्णेल, २३ नस्य, २४ अक्षितर्पण ये हों की २४ प्रविचारणायें होती है ॥ २३-२५ ॥ विमर्श -- तात्पर्य यह है कि स्नेहों का प्रयोग अन्य द्रव्यों के साथ मिला कर और केवल स्नेह का भी होता है । जो ह ओदन आदि भोज्य द्रव्यों के साथ प्रयुक्त होता है उसे ' प्रविचारणा ' कहते हैं और जो केवल स्नेह प्रयुक्त होता है उसे ' अच्छपान ' कहते है । चक्रणगिने प्रविचारणा का अर्थ — स्नेह का किसी अनुकल्प ( भोज्यपदार्थ ) के साथ प्रयोग करना – बताया है, यथा-१. ' प्रविचारणा प्रकर्षेण विशेषाच्चर्यते भक्षणपानलेहाभ्यञ्जनादिरूपेण उपसेव्यते यत्तत् प्रविचा-रणा ' गङ्गाधरः । ' प्रविचार्यतेऽवचार्यतेऽनुकल्पेनोपयुज्यतेऽनयेति प्रविचारणा ओदनादय:, ओदना-दयश्च स्नेहप्रविचारणायां स्नेहयुक्ता एव बोद्धव्याः, अभ्यञ्जनादयस्तु यद्यपि शुद्ध स्नेहसंपाद्यास्तथाऽपि जठराग्निसंबन्धेन व्याप्रियन्त इति विचारणाशब्देनोच्यन्ते ' चक्रः ।

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स्नेहाध्याय: १३ ] सूत्रस्थानम् २६३ ' प्रविचार्यते अवचार्यतेऽनुकल्पेनोपयुज्यतेऽनयेति प्रविचारणा ओदनादयः ' । तथा गंगाधर ने कहा है - ' प्रविचारणा प्रकर्षेण विशेषात् चर्यते भक्षणपानलेहाभ्यञ्जनादिरूपेण उपसेव्यते यत् तत् प्रविचारणा । ' अर्थात् अधिक रूप में भोज्य पदार्थों के रूप में जिस स्नेह का सेवन किया जाता है उसे ' प्रविचारणा ' कहते हैं । स्नेह का प्रयोग अन्तः और बाह्य दो प्रकार से होता है । प्रविचारणा के रूप में स्नेह का अन्तःप्रयोग होता है पर २४ विचारणाओं में अभ्यञ्जन ( मालिश ) करना भी बताया गया है । इसका तात्पर्य यह है कि जब तैल का मर्दन किया जाता है तो भ्राजक पित्त के द्वारा उसका पाचन होकर शरीर के अन्तः भाग में उसका गुण होता है । पाचन होने के कारण इसकी भी गणना प्रविचारणा में कर ली गई है । यह अभ्यञ्जनप्रयुक्त स्नेह अन्य द्रव्यों से संस्कारित ही होता है, यदि केवल स्नेह की मालिश की जाय तो उसे ' प्रविचारणा ' न कह कर ' अच्छा ' ही कहा जाता है । इसी प्रकार बस्ति, उत्तरबस्ति, गण्डूष, कर्णतैल, नस्य, अक्षितर्पण आदि क्रियाओं में प्रयुक्त स्नेह विभिन्न द्रव्यों से संस्कारित ही लिया जाता है । यदि इन क्रियाओं में भी केवल स्नेह का प्रयोग किया जाय तो वह भी ' अच्छ ' ही कहा जाता हैं । यहाँ २४ विचारणाओं का उल्लेख किया गया है यथा ( १ ) ओदन ( भात ) – यह ' अन्नं पञ्चगुणे साध्यम् ' इस परिभाषा के अनुसार १ चगुने जल में पकाया जाता है । सिद्ध होने पर जलीयांश निकाल दिया जाता है । ( २ ) विलेपी - यह दले हुए चावल आदि अन्न द्रव्य को चौगुने जल में ऐसे पकाया जाता है । जिसमें चावल गल जाय और जल का भाग आधा शेष रहे, जैसे कि बताया है - ' विलेपी तु चतु-गुंणे ' तथा ' विलेधी विरलद्रा । ( ३ ) रस - रस शब्द से मांसरस लिया जाता है, मांस से जो भाग तैयार किया जाना है उसे रस कहते है । ( ४ ) मांस - ताजे मांस को विधिपूर्वक पका कर तैयार किया जाता है । ( ५ ) प ( दूध ) - गरम दूध के साथ स्नेह का प्रयोग किया जाता है । ( ६ ) दावे - हो के साथ मिला कर संह का प्रयोग होता है । ( ७ ) यवागू - दले हुए चावल आदि अन्न द्रव्यों को ६ गुने जल में पकाने पर जिसमें अन्न का अंश अधिक होता है और जल का अंश कम होता है, उसे यवागू कहते है, जैसा कि चकदत्त बनाया है - ' यवागूः पङ्गुणेऽम्भसि ' तथा ' यवागूर्व दुसिक्था स्यात् ' । ( ८ ) सूप ( दाल ) – यह शिम्बी धान्य को दल कर चौदहगुने या अठारहगुने जल में पकाने पर जब चौथाई शेष रहता है तव कार्य में लाया जाना है । ( ९ ) शाक-यह फल, पुष्प, पत्र आदि छ प्रकार के वानस्पतिक द्रव्यों से सिद्ध किया जाता है । ( १० ) यूष-यह शिम्बी धान्य को दल कर चौदहगुने या अठारहगुने जल में पकाने पर जब जल आधा शेष रहता है तब कार्य में लाया जाता है । ( ११ ) काम्बलिक - यह तिल और उरद के कल्क में दही, खटाई, नमक और तेल मिला कर तैयार किया जाता है, यथा- ' काम्वलिको मनः । दध्यम्ल-लवणस्नेहनिलमापान्वितः श्रुतः । ( चरकोपस्कार ) | ( १२ ) खड - फलों के साथ मट्ठा, चांगेरी ( चौपतिया ), मरिच, जीरा, चित्रक आदि द्रव्यों को पका कर तैयार किया जाता है, यथा — ' तक्रे कपित्थचाङ्गेरी मरिचाजाजिचित्रकैः । सुपक्कः खड्यूपोऽयम् ॥ ' ( चरकोपस्कार ) । ( १३ ) सक्तु - इससे जौ का सतुआ लिया जाता है । ( १४ ) तिलपिष्ट-- इससे निल की खली ली जाती है । ( १५ ) मद्य - इससे आसव, अरिष्ट, शराव आदि लिये जाते है । ( १६ ) लेह - इससे चीनी आदि द्रव्यों के संयोग से बनाये हुए अन्न जैसे हलुआ, लप्सी आदि का ग्रहण होता है । ( १७ ) भक्ष्य - इनसे घृत से बने हुए मालपुआ आदि का ग्रहण होता है । ( १८ ) अभ्यञ्जन - इससे शरीर में विभिन्न द्रव्यों से सिद्ध किये हुए तेल आदि स्नेहों का मर्दन लिया जाता है । ( १ ९ ) वस्ति - इससे विधिपूर्वक अनुवासन लिया जाता है क्योंकि यह स्नेहन का प्रकरण है, शरीर को स्निग्ध करने के लिये ही यह किया जाता है । निरूहबस्ति से शरीर में रूक्षता उत्पन्न होती है । ( २० ) उत्तरवस्ति - योनिमार्ग या मूत्रमार्ग

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२६४ चरकसंहिता के द्वारा स्नेह का प्रयोग करना उत्तरवन्ति कहा जाता है । ( २१ ) गण्डूप - लेहों को मात्रापूर्वक मुख में इस प्रकार धारण किया जाता है जिसमें मुख चलाया न जा सके । ( २२ ) कर्णतैल—– विभिन्न द्रव्यों से सिद्ध किये हुए तैल को कान में छोड़ा जाता है । ( २३ ) नस्य - मर्श, प्रतिमर्श आदि नस्य कर्म में प्रयोग करने को कहते है । ( २४ ) कर्म- अक्षितर्पण - आँख को तृप्त करने के लिये घी का प्रयोग किया जाता है । गंगाधर ने ' कर्म अक्षितर्पणम् ' ऐसा पाठ माना है मेरे विचार से यही पाठ ठीक है क्योंकि कणे तेल का पाठ पहले आ चुका है । कान को तृप्त करने के लिये या कर्ण के रोगों को दूर करने के लिये तैल या घृत का प्रयोग करना कर्ण - तैल ही कहा जाएगा, यह बात अवश्य है कि यदि कान को तृप्त करने के लिये घृत का प्रयोग किया जाय तो वह कर्णतेल के नाम से व्यवहृत नहीं होगा, सम्भवतः इसी दृष्टि से चक्रपाणि ने ' कर्णाक्षि-तर्पणम् ' ऐसा पाठ माना है । पर कान में घी छोड़ने का विधान नहीं के बराबर ग्रन्थों में पाया जाता है । कर्ण - अक्षितर्पण - कान और आँख को तृप्त करने के लिये उनमें तेल या घी का प्रयोग किया जाता है । प्रविचारणायें किसके लिये आवश्यक होती हैं, यह आगे बताया जायेगा । * अच्छपेयस्तु यः स्नेहो न तामाहुर्विचारणाम् । स्नेहस्य स भिषग्दृष्टः कल्पः प्राथमकल्पिकः ॥ अच्छ ( स्वच्छ ) नेह का प्रविचारणा की गणना में निषेध - जो केवल स्नेह का पान किया जाता है उसे ' विचारणा ' नहीं कहा जाता है । वैद्यों ने इस स्नेहपान को ' मुख्यकल्पना ' बनाई है || विमर्श - अर्थात् किसी अन्न द्रव्यों के साथ न मिलाया हुआ स्नेह का प्रयोग विचारणा नहीं कहा जाता | विचारणा में स्नेह की मात्रा अल्प होती है इसीलिये वह देर से कार्य करती है । अभ्यङ्ग में प्रयुक्त स्नेह भी अल्पमात्रा में ही होता है इसीलिये इसे भी ' विचारणा ' ही कहा जाता है । केवल स्नेह पीने में स्नेह की मात्रा अधिक होती है अतः यह शीघ्र ही कार्य करता है! केवल स्नेह पीना वैद्यों ने प्रधान माना है । * रसैश्चोपहितः स्नेहः समासव्यासयोगिभिः । षड़भिस्त्रिषष्टिधा संख्यां प्राप्नोत्येकश्च केवलः ॥ एवमेताश्चतुःषष्टिः स्नेहानां प्रधिचारणाः । ओकर्तुव्याधिपुरुषान् प्रयोज्या जानता भवेत् ॥२८ ॥

चौंसठ ( ६४ ) प्रकार की प्रविचारणायें - • सम्पूर्ण या अलग - अलग छ रसों के योग से युक्त स्नेह ( ओदन आदि विचारणायुक्त ) ६३ प्रकार के हो जाते है और द्रव्यान्तर - संयोग से रहित केवल स्नेहपान एक प्रकार का होता है । इस प्रकार से रसों के संयोग से ६३ और एक ' अच्छपान ' कुल मिला कर स्नेहों की प्रविचारणायें ६४ होती हैं । इन प्रविचारणाओं का प्रयोग ज्ञानी वैद्य को शरीर - सात्म्य, ऋतु - सात्म्य, रोग और पुरुष प्रकृति आदि का विचार कर करना चाहिये || २७ २८ ॥ विमर्श - साधारण रूप से २४ प्रविचारणार्थे अन्न आदि के संयोग से युक्त बनाई गई हैं और विशेष रूप से रसों के अनुसार कल्पना करने पर ' अच्छपान ' लेकर ६४ प्रकार की बताई गई हैं । इन भेदों का प्रयोग मनुष्यों की प्रकृति, ऋतु, रोग आदि का ज्ञान कर जो प्रविचारणा जिन पुरुष के लिये उचित हो उसी रूप में प्रयोग करना चाहिये । इसका संकेत ' जानता ' इस शब्द से किया है । तात्पर्य यह है कि अपन वैद्य २४ विचारणाओं तथा अच्छरान के नियम से लेह का प्रयोग कर सकता है, उसमें कोई आपत्ति नहीं होती है । विशेष ज्ञानी वैद्य ३३ रस - विकल से विकल्पितभेदों के अनुसार और केवल अलग हों का प्रयोग कर सकता है । यह भेद विकल्प केवल विशेष ज्ञानी वैद्यों के लिये ही बताया गया है । & अहोरात्रमहः कृत्स्नमर्धाहं च प्रतीक्षते । प्रधाना मध्यमा ह्रस्वा स्नेहमात्रा जरां प्रति ॥२ ९ ॥ इति तस्रः समुद्दिष्टा मात्राः स्नेहस्य मानतः । ( ७–८ ) प्रश्न: स्नेह की मात्रा तथा मान - प्रमाण ( कनि मात्राः कथंमानाः ), उत्तर - प्रधान, मध्य,

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स्नेहाध्यायः १३ ] स्नेह की त्रिविध मात्रायें लाभकर होती है । पिबेयुरुत्तमां मात्राम् -२६५ सूत्रस्थानम् घंटे में पच जाती है वह युक्त पुरुषों के लिये हितकर होती है । वह मात्रा ग्लानि, मूर्च्छा और मद से ( १ ) स्नेह की प्रधान मात्रा सेवन करणे योग्य रोगी और रोग - जो पुरुष प्रतिदिन अधिक मात्रा में स्नेह - सेवन का अभ्यासी हो, जो भूख और प्यास के वेग को सहन करने का अभ्यासी हो, जिस पुरुष की जठराग्नि का बल उत्तम हो, जिस मनुष्य का शारीरिक बल उत्तम हो वे पुरुष और गुल्म से पीडित रोगी, जिसे साँप ने काटा हो, जो वीसर्प, उन्माद तथा मूत्रकृच्छ्र जो स्नेह की मात्रा दिन - रात में पच जाय वह प्रधान मात्रा, जो दिन भर में पच जाय वह मध्यम मात्रा, जो आधे दिन में पच जाय वह स्नेह की छोटी मात्रा कही जानी है । इस प्रकार स्नेह के पचने के अनुसार यह प्रधान ( उत्तम ) मध्यम और हस्व ( छोटी ) तोन मात्रायें बताई गई हैं ॥ २ ९ ॥ विमर्श -- यहाँ स्नेह की तौल के अनुसार मात्रा नहीं बताई है, केवल पचने के अनुसार मात्राओं का निर्देश किया गया है । इसका कारण यह है कि अभ्यास के अनुसार मनुष्य स्नेहों को पचाने में समर्थ होता है । यदि एक नियमित स्नेह की मात्रा मान ली जाय तो जो मनुष्य घी - दूध का सेवन अधिक मात्रा में करता है उसके लिए नियमित मात्रा लाभकर नहीं होगी । यदि स्नेह का सेवन कोई बिल्कुल नहीं करता है तो नियमित मात्रा उसको अतियोग कर देगी | इसी विचार से आचार्य ने तौल की मात्रा न बताकर पचने के अनुसार मात्राओं का उपदेश किया है । सुश्रुत ने स्नेह की मात्रा ५ प्रकार की बताई है, जैसे- ' या मात्रा परिजीर्येत चतुर्भाग-गतेऽहनि । सा मात्रा दीपयत्यग्निमल्पदोपे च पूजिता ॥ या मात्रा परिजीर्येत तथाऽर्धदिवसे गते । सा वृष्या बृंहणीया च मध्यदोषे च पूजिता ॥ या मात्रा परिजीर्येत चतुर्भागावशेषिते । स्नेहनीया चसा मात्रा बहुदोषे च पूजिता ॥ या मात्रा परिजीर्येत्तु तथा परिणतेऽहनि । ग्लानिमूर्च्छामदान् हित्वा सा मात्रा पूजिता भवेत् ॥ अहोरात्रादसंदुष्टा या मात्रा परिजीर्यति । सा तु कुष्ठविषोन्माद-ग्रहापस्मारनाशिनी ॥ ' ( सु. चि. अ ० ३१ ) | ( १ ) जो मात्रा दिन का चतुर्थांश बीत जाने पर अर्थात् तीन घंटे में पच जाती है वह स्नेह की मात्रा अग्नि को तीव्र करती है और अल्प दोष वाले पुरुषों के लिये हितकारिणी होती है । ( २ ) जो स्नेह की मात्रा आधे दिन अर्थात् ६ घंटे में पच जाती है वह मात्रा वृष्य और वृंहण होती है तथा मध्य दोष वाले पुरुषों के लिये हितकारिणी होती है ( ३ ) जो मात्रा दिन के चतुर्थांश शेष रहने पर अर्थात् ९ शरीर को स्निग्ध करने वाली होती है और अधिक दोषों से ( ४ ) जो मात्रा दिन भर में अर्थात् १२ घंटे में पचती है पीड़ित रोगियों को छोड़कर सामान्यतः सभी रोगों में लाभकर होती है । ( ५ ) जो मात्रा दिन-रात अर्थात् २४ घंटे में किसी भी प्रकार के उपद्रवों को न कर, पच जाती है वह मात्रा कुष्ठ, विष, उन्माद, ग्रह ( भूतोन्माद ) और अपस्मार रोगों से पीड़ित व्यक्तियों के लिये विशेष तासां प्रयोगान् वच्यामि पुरुषं पुरुषं प्रति ॥ ३० ॥

( ९ ) प्रश्न: स्नेह की कौन मात्रा किसके लिये उपयोगी ( का च केषूपदिश्यते ), उत्तर इन तीनों स्न की मात्राओं का प्रयोग भिन्न - भिन्न प्रकृति तथा बल के अनुसार अलग - अलग पुरुषों के प्रति कहा जायगा ॥ ३० ॥

प्रभूतस्नेह नित्या ये खुत्पिपासासहा नराः । पावकश्चोत्तमबलो येषां ये चोत्तमा वले ॥ ३१ ॥

गुल्मिनः सर्पदष्टाश्च विसर्पोपहताश्च ये । उन्मत्ताः कृच्छ्रमूत्राश्च गाढवर्चस एव च ॥ ३२ ॥

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२६६ चरकसंहिता रोग से पीड़ित हों तथा जिस मनुष्य का मल सूखा निकलना हो वे मनुष्य उत्तम मात्रा में स्नेहपान कर सकते हैं ॥ ३१-३२ ॥

- तस्याः पाने गुणाञ्छृणु । विकाराञ्छमयत्येषा शीघ्रं सम्यक् प्रयोजिता ॥ ३३ ॥

दोषानुकर्षिणी मात्रा सर्वमार्गानुसारिणी । बल्या पुनर्नवकरी शरीरेन्द्रियचेतसाम् ॥ ३४ ॥

स्नेह की प्रधान मात्रा सेवन से लाभ - उत्तम मात्रा में सेवन किए हुए स्नेह के गुणों को सुनो । यह उत्तम मात्रा में विधिपूर्वक सेवन किया हुआ स्नेह शीघ्र ही रोगों को शान्त करता है, सभी ( ऊर्ध्व, अधः, तिर्यक् या शाखा, कोष्ठ, मर्मास्थिसन्धियाँ ) रोगों के मार्गों में अनुसरण करने वाला होता है । यह उत्तम मात्रा दोषों का अनुकर्षण करने वाली है, शरीर में बल को बढ़ाती है तथा शरोर, इन्द्रिय और मनोगत रोगों को दूर कर इन्हें नूतन बनाती है । ३३-३४ ॥ अरुष्कस्फोटपिडिका कण्डूपामाभिरर्दिताः । कुष्ठितश्च प्रमीढोश्च वातशोणितिकाश्च ये ॥ ३५ ॥

नातिवाशिनचैव मृदुकोष्ठास्तथैव च । पिबेयुर्मध्यमां मात्रां मध्यमाश्चापि ये बले ॥ ३६ ॥

( २ ) स्नेह की मध्यम मात्रा के सेवन योग्य रोग और रोगी -- अरुष्क ( छोटी - छोटी फुन्सियाँ ), स्फोट ( बड़े - बड़े फफोले ), पिडका ( व्रण ), कण्डू ( सूखी खुजली ), पामा ( Scabies ) इन रोगों से पीड़ित मनुष्य तथा कोढ़ी, प्रमेही, एवं वातरक्त ( Gout ) से पीड़ित मनुष्य और जो अधिक नहीं खाने वाले है, जिनका कोष्ठ मृदु है, जिनका वल मध्यम हैं, ऐसे मनुष्यों को स्नेह की मध्यम मात्रा पीनी चाहिये ॥ ३५-३६ ॥

नापा मन्दविभ्रंशा न चातिबलहारिणी । सुखेन च स्नेहयति शोधनार्थे च युज्यते ॥३७ ॥

स्नेड् की मध्यम मात्रा के गुण - इस मध्यम मात्रा में स्नेह का सेवन करने से अधिक उपद्रव होने की संभावना नहीं रहती है । इसलिये इस मात्रा का नाम ' मन्दविभ्रंशा ' है । यह मात्रा बल को अधिक रूप में काम नहीं करती है । मुख से शरीर का स्नेहन करती है और शोधन के लिये इसका प्रयोग होता है ॥ ३७ ॥

विमर्श - उत्तम और मध्यम यह स्नेहों की दो मात्राएँ बनाई गई है । यह झोन के अतिरिक्त चिकित्सा में भी प्रयुक्त होती हैं । चिकित्सा शमन और संशोधन दो प्रकार की होती है । शमन चिकित्सा में स्नेह की उत्तम मात्रा का प्रयोग होता है । यह बात ' विकारं शमयन्येषा ' इस शब्द से संकेत की गई है । संशोधन चिकित्सा में मध्यम मात्रा का प्रयोग किया जाता है, यह बात ' शोधनार्थं च युज्यते ' से स्पष्ट कही गई है । ये तु वृद्धाश्च वालाश्व सुकुमाराः सुखोचिताः । रिक्तकोष्टत्वमहितं येषां मन्दाग्नयश्च ये || ३८ || ज्वरातीसारका साश्च येषां चिरसमुत्थिताः । स्नेहमात्रां पिबेयुस्ते हस्वा ये चावरावले || ३ ९ || ( ३ ) स्नेह की हस्त्र मात्रा सेवन करने योग्य रोग तथा रोगी - जो वृद्ध, बालक, सुकुमार और सदा सुखी रहने वाले हैं, जिन व्यक्तियों को कोठ खाली हो जाने पर अधिक कष्ट होता है जो मन्दाग्नि वाले पुरुष हैं, जो लोग बहुत दिनों से ज्वर, अनिसार और कास से पीड़ित हैं और जो अल्प वल वाले पुरुष है, उन्हें स्नेह की हस्व मात्रा पीनी चाहिये || ३८-३९ ॥ परिहारे सुखा चैषा मात्रा स्नेहनबृंहणी । वृष्या वल्या निराबाधा चिरं चाप्यनुवर्तते ॥४० ॥

ह्रस्व मात्रा में सेवन किये गये स्नेह का गुण - यह स्नेह की हस्त्र मात्रा परिहार में सुगम है । शरीर का स्नेहन और बृंहण करती है, शुक्रोत्पादक है, बल बढ़ानी है और सेवन करने पर किसी प्रकार का उपद्रव न करती हुई स्नेह से उत्पन्न गुणों को शरीर में बहुत दिनों तक बनाये रहनी है ॥ ४० ॥

१. ' प्रमीढाः प्रमेहवन्तः ।

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स्नेहाध्यायः १३ ] सूत्रस्थानम् २६७ विमर्श - तात्पर्य यह है कि उत्तम और मध्यम मात्रा में सेवन किया हुआ स्नेह दोषों का संशमन और संशोधन करने के बाद शीघ्र ही अपने स्नेहन गुण के कारण शरीर से बाहर हो जाता है क्योंकि उसकी मात्रा अधिक होती है पर अल्प मात्रा में सेवन किया गया स्नेह शीघ्र न निकल कर शरीर के विभिन्न स्रोतों में रुक जाता है इसलिए अपने गुणों को शरीर में स्थिर रखना 1 वातपित्तप्रकृतयो वातपित्तविकारिणः । चक्षुःकामाः क्षताः ' क्षीणा वृद्धा बालास्तथाऽबलाः ॥ आयुःप्रकर्षकामाश्च बलवर्णस्वरार्थिनः । पुष्टिकामाः प्रजाकामाः सौकुमार्यार्थिनश्च ये ॥४२ ॥

दीपयोजः स्मृति मेधानिबुद्धीन्द्रियबलार्थिनः । पिबेयुः सर्पिरार्ताश्च दाहशस्त्रविषाग्निभिः ॥४३ ॥

( १० ) प्रश्न: चतुर्विध स्नेह में कौन किसके लिये हितकारी ( कश्च केभ्यो हितः स्नेहः ), उत्तर — ( १ ) घृत सेवन के योग्य रोग और रोगी - जो मनुष्य वातपित्त प्रकृति के हों अथवा वान-प्रकृति या पित्तप्रकृति के हों । वातजन्य, पित्तजन्य या वातपित्तजन्य विकार से पीड़ित हों, नेत्र को स्वस्थ रखना चाहते हों, उरःक्षत से पीड़ित हों, जिनका शरीर क्षीण हो गया हो, वृद्ध हों या अत्यन्त दुर्बल हों, जो दीर्घायु की इच्छा रखते हों, जो बल, वर्ण और स्वर को उत्तम बनाना चाहते हों, शरीर में पुष्टि तथा सन्तान की इच्छा रखने हों, शरीर में सुकुमारना, कान्ति, ओज, स्मरणशक्ति, मेवा ( धारणाशक्ति ), अग्नि की दीप्ति, इन्द्रियों में शक्ति और इन्द्रियों को बलवान् बन्नाना चाहते हैं तथा दाह, शस्त्र, विप और अभि से पीड़ित हों उन लोगों को घी का सेवन वरना चाहिये ॥ ४१-४३ ॥

मँवृइश्लेप्ममेदस्काश्वलस्थूलगोदराः । वात -याधिभिराविष्टा वातप्रकृतयश्च ये ॥ ४४ ॥

वलं त्वं लघुतां तां स्थिरगत्रताम् । स्निग्धलचणतत्वतां ये च काङ्क्षन्ति देहिनः ॥

कृमिक्रोष्टाः क्रूरकोष्ठास्तथा नाडीभिरदिताः । पित्रेयुः शीतले काले तैलं तैलोचिताथ ये ॥ ( २ ) तेल सेवन के योग्य रोग रोगी - जिन व्यक्तियों के शरीर में कफ और मैदा अधिक बढ़ गया हो, जिनके गले और उदर में इतना मांस बढ़ गया हो कि चलते समय हिलना हो, जीवातव्याधि से पीड़ित हों, जो पित्त प्रकृति के मनुष्य हो, जो शरीर में बल, पतलापन, हलकापन, दृढ़ना और शरीर को स्थिर बनाना चाहते हों, और जो मनुष्य अपनी त्वचा को स्निग्ध, श्लक्ष्ण और पतली बनाना चाहते हों, जिनके उदर में कृमि हो, जिनका कोष्ठ क्रूर हो, जो नाडीव्रण से पीडित हों और जिन लोगों को तेल खाने का अभ्यास हो, वे लोग ठण्डे समय में तेल का पान

कर सकते है । ४४-४६ ॥

विमर्श - नैल का सेवन ठण्डे समय में करने के लिये बताया है । इसका तात्पर्य यह है - सभी स्नेह स्वाभाविक रूप से गुण में उष्ण होते है । यदि उष्ण काल में इसका सेवन किया जाय तो उपद्रव होने का भय रहता है इसलिये शीतकाल में तेल का सेवन बताया है । नेल एक साथ ही शरीर मैं आवश्यकतानुसार बल, स्थूलता, लघुता एवं कृशता उत्पन्न करता है, यह बात अष्टांगहृदय में स्पष्ट रूप से बनाई गई है, यथा- ' कृशानां वृंणायालं स्थूलानां कर्शनाय च । बद्धविट्कं कृमिघ्नं च संस्कारा सर्वेदोपजित् ॥ ' ( अ.हृ.सू. अ. ५ ) । तात्पर्य यह है कि जब शरीर में मेदा की अधिकता हो जाती है तो मेदा से सारे स्रोत आवृत हो जाते हैं जिससे केवल मेदो धातु की ही अतिपुष्टि होती है और मनुष्य अतिस्थूल हो जाता है । तैल - सेवन से सारे स्रोत खुल जाते हैं क्योंकि तैल स्वभावतः व्यवायी होता है और अपने उष्ण गुण के कारण मैदा को कम करने लगता है । स्रोतों के खुल जाने से अग्रिम धातुयें बनने लगती हैं । इसलिये मोटे आदमी पतले हो जाते हैं । यही बात १. ' क्षतक्षणा' ग. । २. ' प्रवृद्धमेदः श्लेष्माणः ' यो ।