चरक संहिता हिन्दी भाष्य — पृष्ठ 361–370
चरक संहिता हिन्दी भाष्य · Chaukhamba · पृष्ठ 361–370
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२६८ चरकसंहिता आचार्य ने ' तनुत्वन् ' और ' लघुतान् ' से सूचित किया है । तेल के सेवन से पतले आदमी दृढ़, बलवान और मोट होते हैं । नात्पर्य यह है कि बात के अधिक वढ़ जाने से सभी स्रोत सूख जाते हैं जिससे धातुओं में गति बन्द हो जाती है, धातुओं की पुष्टि नहीं होती और मनुष्य कृश एवं दुर्बल हो जाता है । तेल सेवन से वायु का नाश होता है, स्रोतों में स्निग्धता होने से उनके मुख खुल जाते हैं और धातुयें बढ़ने लगती है, यही बात ' बलम् दृढताम् ' और ' स्थिरगात्रनाम् ' शब्द से आचार्य ने सूचित की है । यहाँ शीतकाल में स्नेह का सेवन करना बताया है । इसका तात्पर्य यह भी हो सकता है कि अत्यधिक आवश्यकता पड़ने पर शीतकाल में भी इसका प्रयोग करना चाहिये क्योंकि स्नेह का सेवन साधारण ऋतु में ही करने का निर्देश किया गया है अतः उपर्युक्त अर्थ करना न्यायसंगत मालूम होता है और यही बात अष्टाङ्गसंग्रह में भी बतायी है, यथा-" दिवा निश्यनिले पित्ते संसर्गे पित्तवत्यपि । त्वरमाणे तु शीतेऽपि दिवा तैलं च योजयेत् ॥ '
( अ. सं. सू. अ. २५ ) ।
वातातपसहा ये च रूक्षा भाराध्वकशिताः । संशुष्करेतोरुधिरा निप्पीतकफमेदसः ॥ ४७ ॥
अस्थिसन्धिसिरास्नायु मर्मकोष्टमहारुजः । बलवान्मारुतो येषां खानि चावृत्य तिष्ठति ॥४८ ॥
महच्चाग्निवलं येषां वसासात्म्याश्च ये नराः । तेषां स्नेहयितव्यानां वसापानं विधीयते ॥४ ९ ॥ ( ३ ) वसा सेवन के योग्य रोग और रोगी जो मनुष्य वायु और धूप को अधिक सहन कर सकते हैं, जिनका शरीर रूक्ष है, जो भार ढोने और रास्ता चलने से कृश हो गये हैं, जिनके शरीर में शुक्र और रक्त सूख गये हैं, जिनके कफ और मेदा क्षीण हो गये हैं, जिनके अस्थि, सन्धि-शिरा, स्नायु, मर्म और कोष्ठ में अधिक वेदना होती है, जिनके शरीर में वायु ने अधिक कुपित होकर स्रोतों को आवृत कर दिया है, जिनकी अग्नि अत्यधिक तीव्र है और जो मनुष्य वसा खाने के अभ्यासी है ऐसे व्यक्तियों को यदि स्नेहन करना हो तो वसा का सेवन कराना चाहिये || ४७-४९ || दीप्ताग्नयः क्लेशसहा वस्मराः स्नेहसेविनः । वातार्ताः क्रूरकोष्टाच स्नेह्या मज्जानमाप्नुयुः ॥ ( ४ ) मज्जा सेवन के योग्य रोगी और रोग - जिन व्यक्तियों की अग्नि तीव्र हो, जो कुशों को सहन करने हों, अधिक भोजन करते हों, स्नेहों का सेवन सदा करते हों और वात रोग से पीड़ित हों, जिनका कोष्ठ क्रूर हो, ऐसे व्यक्तियों को यदि स्नेहन करना हो तो उन्हें मज्जा का पान करना चाहिये ॥ ५० ॥
येभ्यो येभ्यो हितो यो यः स्नेहः स परिकीर्तितः । जिन - जिन व्यक्तियों के लिये जो - जो स्नेह हितकर होता है वह सभी दान यहाँ बता दी गई है । विमर्श - भिन्न - भिन्न प्रकृति के व्यक्तियों के लिये तथा भिन्न - भिन्न रोगों में विशेष रूप में लाभ करने वाले स्नहों का यहाँ वर्णन किया गया है । पर सामान्यतः स्नेहन के लिये सभी प्रकार के व्यक्तियों और रोगों में घृत का प्रयोग किया जाता है क्योंकि स्नेहों में सर्वश्रेष्ठ घृत को ही बनाया हैं । जैसा कि इसी अध्याय में पहले बताया है, यथा- ' एभ्यश्चैवोत्तमं सर्पिः संस्कारस्यानुवर्तनात् ' । स्नेहनस्य प्रकर्षौ तु सप्तरात्रत्रिरात्रकौ ॥ ५१ ॥
च कः ), उत्तर – ( ११ ) प्रश्न: स्नेह का प्रकर्षकाल ( प्रकर्षः स्नेहने स्नेह का अधिक से अधिक दिन तक प्रयोग, सात दिन या तीन दिन, यह दो स्नेहन करने का प्रकर्ष है ॥ ५१ ॥
विमर्श - तीन से सात दिन तक ही स्नेह का प्रयोग करना चाहिये । इससे कम दिन सेवन करने पर शरीर स्निग्ध नहीं होता, सान दिन से अधिक सेवन करने पर खेद प्रकृति के अनुकूल बन जाता है अतः उससे कोई लाभ नहीं होना, यह वान आचार्य ने सिद्धि - स्थान में स्पष्ट ह
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स्नेहाध्यायः १३ ] सूत्रस्थानम् २६६ है, यथा- ' व्हावरं सप्तदिनं परं तु स्निग्धो नरः स्वेदयितत्र्य इष्टः । नातः परं स्नेहनमादिशन्ति, सात्म्यीभवेत् सप्तदिनात् परं हि ॥ ' ( च. सि. अ. १ ) । यह तीन और सान का क्रम कोष्ठ के आधार पर किया गया है । मृदुकोष्ठ तीन दिन में और क्रूरकोष्ठ ' सात दिन में स्निग्ध हो जाते है, यथा - ' नृदुकोष्ठस्त्रिरात्रेण स्त्रियञ्चच्छोपसेवया । स्निप्रति क्रूरकोष्ठस्तु सप्तरात्रेण मानवः ॥ ” ( इसी अध्याय का श्लोक ६५ ) । कोष्ठ मृदु, मध्य और क्रूर भेद से तीन तरह का होता है । मध्य कोष्ठ के लिये यहाँ समय निश्चित नहीं किया गया है पर अधिक से अधिक सान दिन तक स्नेह का सेवन करने का विधान है । मध्य कोष्ठ में चार दिन या पाँच दिन तक स्नेह का सेवन करने से शरीर स्निग्ध हो जाता है । यह बात सुश्रुत ने स्पष्ट की है, यथा- ' पिवेत् व्यहं चतुरहं पञ्चाहं हं तथा । सप्तरात्रात् परं स्नेहः सान्यीभवति सेवितः ॥ ( सु. चि. अ. ३१ ) । इनका तात्पर्य यह है - नीन दिन में मृदुकोष्ठ, चार ते छ दिन तक मध्यकोष्ठ, सात दिन तक क्रूरकोष्ठ का स्नेहन हो जाता है । भोज ने यह दिन का क्रम दोप के अनुसार बनाया है, यथा - ' त्र्यहेग श्लैष्मिकः स्त्रियान् पञ्चराग पैत्तिकः । वातिकः सप्तरात्रेण सात्म्यतां यात्यतः परम् ॥ " ( चरकोपस्कार ) । इनका भी नाप तीन प्रकार के कोष्ठ से ही है, क्योंकि कफ की अधिकता से मध्यकोष्ठ, पित्त की अधिकता से मृडुकोष्ठ, बान की अधिकता से क्रूरकोष्ठ होता है । यह मन न्यायसंगत नहीं प्रतीत होता क्योंकि मृदु की अपेक्षा मध्यकोष्ठ में अधिक समय का लगना साभाविक होता है । यह स्नेइन - क्रम अच्छ स्नेहपान का है, विचारणायुक्त स्नेहपान का नहीं, क्योंकि उसमें स्नेह की मात्रा अल्प होती है | विचारणायुक्त स्नेहपान की कोई निश्चित अवधि नहीं होती है । जब तक शरीर स्निग्ध न हो जाय तब तक विचारणायुक्त स्नेहपान कराया जाता है । यहाँ प्रकर्ष से तात्पर्य यह है कि जितना स्नेह प्रथम दिन पान कराया जाता है उनसे अधिक मात्रा में दूसरे दिन स्नेड्पान कराना चाहिये |
* स्वेद्याः शोधतिव्याश्च रूक्षा वातविकारिणः ।
व्यायाममद्यस्त्रीनित्याः स्नेह्याः स्युर्ये च चिन्तकाः ॥ ५२ ॥
( १२ ) प्रश्न: स्नेहन के योग्य पुरुष कौन? ( स्नेह्या: के ), उत्तर – जिन व्यक्तियों को स्वेदन अथवा शोधन कराना चाहिये, जिनका शरीर रूक्ष हो गया है, जो वातव्याधि से पीड़ित हों, जो नित्य व्यायाम करने वाले हों, जो नित्य मदिरा पीते हों, जो नित्य स्त्री का सेवन करते हों, जो नित्य चिन्ता करने वाले हों ऐसे व्यक्ति को स्नेहन कराना चाहिये ॥ ५२ ॥
विमर्श - ' स्वेद्याः ' का तात्पर्य यह है कि जिन व्यक्तियों का स्वतन्त्र रूप से स्वेदन किया जाता है उनका ही यहाँ ग्रहण किया जाता है । कुछ ऐसे रोग होते है जिनमें स्वेदन करना आवश्यक होता है जैसे- ' वातश्लेष्मणि वाते वा कफे वा स्वेद इष्यते । ' ( च. सू. अ. १४ ) । और शोधन में जो स्नेहन और स्वेदन का प्रयोग होता है उसका ग्रहण ' शोधयितव्याः ' से किया गया है क्योंकि शोवन पञ्चकर्मों के द्वारा किया जाता है और पञ्चकर्म का अंग स्नेहन - स्वेदन है इसलिये यहाँ ' स्वेद्याः ' से स्वतन्त्र शोधन करने योग्य व्यक्तियों का ग्रहण किया जाता है । * संशोधनादृते येषां रूक्षणं संप्रवच्यते । न तेषां स्नेहनं शस्तमुत्सन्नकफमेदसाम् ॥ ५३ ॥
अभिप्यण्णाननगुदा नित्यमन्दाग्नयश्च ये । तृष्णामूर्च्छापरीताश्च गर्भिण्यस्तालुशोषिणः ॥ अन्नद्विपश्छर्दयन्तो जठरामगरादिताः । दुर्बलाश्च प्रतान्ताश्च स्नेहग्लाना मदातुराः ॥ ५५ ॥
न स्नेह्या वर्तमानेषु न नस्तोबस्तिकर्मसु । स्नेहपानात् प्रजायन्ते तेषां रोगाः सुदारुणाः ॥ ( स्नेह्याः के न च ), उत्तर — • जिन लोगों के ( १३ ) प्रश्न: स्नेह के अयोग्य पुरुष कौन? १. प्रतान्ता ग्लानिमन्नः ।
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२७० चरकसंहिता शरीर में कफ और मैदा बढ़ा हुआ हो तथा जिन लोगों के लिए रुक्षण क्रिया कही जायगी उन्हें यदि संशोधन न करना हो तो लेन क्रिया नहीं की जानी है । जिनके मुख और गुदा से इतना अधिक स्राव होता हो कि मुख और गुड़ा कफ से भरा हुआ हो, जो नित्य मन्दाग्नि से पीड़ित हों, जो तृष्णा तथा मूर्च्छा से युक्त हों, गभिंगी हों, नालु - शोष से पीड़ित हों, अन्न में अरुचि ( Annorexia ) हो, वमन रोग, उदर रोग, आमदोष या कृत्रिम विष से पीड़ित हों, दुर्बल हों, जो शनयुक्त हो, पीने से जिनमें ग्लानि होती हो, जो मद से पीड़ित है, जिन्हें नस्य और बस्ति कर्म किया जा रहा हो ऐसे व्यक्तियों को लेइन कर्म नहीं किया जाता है यदि असावधानीवश स्नेहपान करा दिया जाता है तो स्नेहपान से भयङ्कर रोग हो जाते हैं ॥ ५३-५६ ॥ विमर्श - जिन व्यक्तियों को रूक्ष क्रिया करना बनाया है उन्हें यदि संशोधन करना होता है तो सामान्यतः स्नेहन करने के बाद संशोधन किया जाता है किन्तु यदि संशोधन न करना हो तो उन्हें खेन नहीं किया जाता है इसलिये रक्षण करने वाले व्यक्ति स्नेह के अयोग्य होते हैं । ' अभिष्यण्गाननगुदा का तात्पर्य यह है कि कफ के अधिक बढ़ जाने से जिन लोगों का मुख और गुदा करु से अधिक व्याप्त हो गया है उन्हें इन नहीं कराना चाहिये क्योंकि खेड़ से कफ की वृद्धि होती है और उससे अधिक हानि को संभावना होती है । नित्य मन्दाग्नि वाले व्यक्ति में लड़का यथासमय पाचन न होने से व्यापत् होने की संभावना बनी रहती है । तृष्णा रोग में कफ और आमदीप द्वारा स्रोतों का अवरोध हो जाना है इस वायु और पित्त अधिक मात्रा में वह कर नूगा ना होम का शोषण पर तृष्णा को उत्पन्न करने हैं, जैसा कि रसवादिनी मनीविहागः संशोध्य नृणां देहे कुतस्त तौ तु ॥ ' ( च.चि. अ. २२ ) । अतः स्नेह का सेवन करने से पुनः आन और कफ की वृद्धि हो जाने से कृष्णा का वेग अधिक वह जाता है इसलिये तृष्णा में खंड का सेवन करना मना किया गया है । मूर्च्छा या संन्यास ( Coms ) जो मधुमेह ( Diabetes Mellitus ) का है उसमें ( Pats ) देना हानिकर होता है । गर्भिणी श्री के रक्त में Cholosterol बड़ा रहना है । नया यकृत दोष के कारण का प्रयोग कम करना चाहिये । गर्भ के परिपक हो जाने पर नवें मास में उत्तर वस्ति के द्वारा स्नेह का प्रयोग बताया गया है । तालुझोषी, अन्न में अरुचि रखने वाला, वमन करने वाले, उदर रोग, आम रोग और गर से पीड़ित व्यक्तियों में कफ की ही अधिकता होती है इसीलिये उन्हें स्नेहन नहीं करना चाहिये । यद्यपि उदर रोग में खेह का विधान बनाया गया है और यहाँ उसका निषेध किया जाता है इसका तात्पर्य यह है कि सामान्यतः उदर रोग में स्नेह का प्रयोग करना चाहिये अथवा उदर रोग के प्रारम्भावस्था में स्नेहपान करना चाहिये पर उदर रोग के उत्पन्न हो जाने पर या छिद्रोदर और जलोदर हो जाने पर स्नेह का सर्ववा परित्याग करना चाहिये यहाँ उदर रोग से इन्हीं दो रोगों का प्रण करना चाहिये । दुर्द व्यक्ति को पान कराने से उसका पाचन नहीं होता और कान्न व्यक्तियों में कफ की प्रधानता होने के कारण खेह का पाचन नहीं होता है । इसलिये इन्हें खेहपान नहीं कराना चाहिये और जिन लोगों को संह को देख कर ही ग्लानि उत्पन्न हो जाती है उनके लिये मनोविरुद्ध होने से उसका प्रयोग नहीं करना चाहिये । ' मदातुराः ' जो रोगी अनुचित रूप से मद्य का सेवन करता हो और मदात्यय रोग से पीड़ित हो तो उसे स्नेह का पान नहीं कराना चाहिये क्योंकि अविवपूर्वक मदिरा सेवन करने से आमाशविक कला में क्षोभ और शोध हो जाता है जिससे पाचन का कार्य उचित रूप से नहीं होता है तथा यकृत का कार्य विष नष्ट करना है, अविधि से मह पीने से यकृत् में विकृति आ जाती है । स्नेहन से कफ के
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स्नेहाध्याय: १३ ] सूत्रस्थानम् २७१ 1 बढ़ जाने से पाचन क्रिया और यकृत् की क्रिया में वाधा उपस्थित होती है जिससे मद्य का उपद्रव अधिक बढ़ जाता है | अतएव महात्यय में खंड का निषेध है पर विधिपूर्वक प्रतिदिन मदिरा पीने चाले व्यक्ति के लिये स्नेह का निषेध नहीं है । नस्य, वस्तिकर्म के पूर्व में स्नेह का प्रयोग किया जाता है पर प्रयोग काल में उसका सेवन नहीं किया जाता । इन लोगों को यदि अज्ञानतावश स्नेहन - क्रिया कर दी जाय तो ये ही रोग भयंकर रूप हो जाते हैं । सुश्रुत ने भी कहा है, यथा— ' स्नेहपानाद्भवन्त्येषां नृगां नानाविधा गदाः । गदा वा कृच्छ्रतां यान्ति न सिद्धयन्त्यथवा पुनः ॥ ' ( सु. चि. अ. ३ ) * पुरीषं ग्रथितं रूक्षं वायुरप्रगुणो मृदुः । पक्ता खरत्वं रौच्यं च गात्रस्यास्त्रिग्धलक्षणम् ॥५७ ॥
( १५ ) श्न: अस्निग्ध व्यक्ति के लक्षण ( अस्निग्धलक्षणम् ), उत्तर - मल का गांठदार और रूक्ष निकलना, वायु का अनुलोम न होना. जठराग्नि का मन्द होना, शरीर में खरता और रूक्षता उत्पन्न हो जाना, अस्निग्ध पुरुष का लक्षण है ॥। ५७ ॥ विमर्श - सुश्रुत ने भी इन्हीं लक्षणों को बताया है पर कुछ लक्षण वे अधिक बताये है, यथा-' पुरीषं ग्रथितं रूक्षं कृच्छ्रादन्नं विपच्यते । उरो विदहते वायुः कोष्ठादुपरि धावति || दुर्वर्णो दुर्बलचैव रुक्षो भवति मानवः । ' ( सु. चि. अ. ३१ ) । वातानुलोम्यं दीप्तोऽग्निर्वर्चः स्निग्धमसंहतम् । मार्दवं स्निग्धता चाङ्गे स्निग्धानामुपजायते ॥ ( १४ ) प्रश्न: सम्यक् स्निग्ध व्यक्ति के लक्षण ( स्निग्ध लक्षगम् ), उत्तर - स्नेहन क्रिया के बाद यदि वायु का अनुलोमन हो, जठराग्नि तीव्र हो, मल चिकना और गांठदार न हो, शरीर में कोमलता और चिकनापन हो तो इस व्यक्ति का स्नेहन क्रिया उचित रूप से हुई है, यह समझना चाहिये ॥ विमर्श - तुश्रुत ने सम्यक् स्निग्ध का लक्षण - ' सुस्निग्धा त्वग्विट्शैथिल्यं दीप्तोऽग्निर्मृदुगात्रता । ग्लानिर्लाघवमङ्गानामधस्तात् स्नेहदर्शनम् || सम्यक्स्निग्धस्य लिङ्गानि स्नेहोद्वे गस्तथैव च । ' ( स. चि. अ. ३१ ) * पाण्डुता गौरवं जाड्यं पुरीषस्याविपक्कता । तन्द्रीररुचिरुत्क्लेशः स्यादतिस्निग्धलक्षणम् ॥५ ९ ॥ ( १६ ) प्रश्न: अतिस्निग्ध व्यक्ति के लक्षण ( अतिस्निग्धलक्षणम् ), उत्तर -- • स्नेह पीने के बाद जिस व्यक्ति के शरीर में पीलापन, भारीपन और जड़ता उत्पन्न हो, मल पच कर न निकले, तन्द्रा, अरुचि और उत्क्लेश ये लक्षण उत्पन्न हों तो उस व्यक्ति को स्नेहन क्रिया अधिक रूप में हो गयी है ऐसा जानना चाहिये ॥ ५ ९ ॥ विमर्श - मल का पक के न निकलना -- इसका तात्पर्य प्रवाहिका और अतिसार का होना नथा गुदा में दाह, मुख से कफ का स्राव और भक्तद्वेष होना ये लक्षण बताये हैं । उश से मुखस्राव और अरुचि से भक्तद्वेष ये लक्षण समता रखते हैं पर गुदा में दाह होना यह लक्षण सुश्रुतका अधिक है जैसा कि - ' भक्तद्वेषो मुखस्रावो गुददाहः प्रवाहिका । पुरीषातिप्रवृत्तिश्च भृश-स्निग्धस्य लक्षणम् ॥ ' ( सु. चि. अ. ३१ ) । * द्रवोष्णमनभिष्यन्दि भोज्यमन्नं प्रमाणतः । नातिस्निग्धमसंकीर्ण श्वः स्नेहं पातुमिच्छता ॥ ६० ॥
( १७ ) प्रश्न: स्नेहपान से पहले क्या हिताहित है? ( किं पानात्प्रथमं हिताहितम् ), उत्तर — यदि कल स्नेह पीने की इच्छा हो तो आज रात में, स्नेह पीने से एक दिन पूर्व द्रव, गर्म और जो अभिष्यन्दी न हो और अतिस्निग्ध न हो एवं अंसकीर्ण हो अर्थात् अपथ्य से मिश्रित न हो, ऐसे अन्न का मात्रापूर्वक भोजन करना चाहिये ॥ ६० ॥।
विमर्श - अभिष्यन्दी वह पदार्थ होता है जो कफवर्द्धक तथा गुरु होने से रसवाही स्रोतों के मुख को बन्द कर कोष्ठ आदि में गुरुता उत्पन्न करता है । इन वचनों से यह स्पष्ट है कि स्नेह
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२७२ चरकसंहिता पीने के एक दिन पूर्व ठोस, शीतल, अभिष्यन्दी, अतिस्निग्ध और अपथ्य से मिश्रित अन्न का परित्याग करना चाहिये क्यों कि ये अपथ्य होते हैं । * पिबेत् संशमनं स्नेहमन्नकाले प्रकांक्षितः । शुद्धयर्थं पुनराहारे, नैशे जीर्णे पिवेन्नरः ॥ ६१ ॥
स्नेहपान का समय — मनुष्य भोजन करने के समय भूख लगने पर संशमन स्नेह का पान करें । यदि संशोधन स्नेह पीना हो तो रात्रि के खाये हुये अन्न का उचित रूप से पाचन हो जाय तो स्नेह का पान करें ॥ ६१ ॥
विमर्श - तात्पर्य यह है कि अन्नकाल दोपहर को माना गया है इस काल में यदि भूख लगी हो तो, संशमन स्नेह का पान करना चाहिये ऐसी अवस्था में पीया हुआ संशमन स्नेह शरीर में जहाँ - तहाँ कुपित हुये दोषों को शान्त करता है क्यों कि उस समय भूख लगी रहती है, जठरानि तीव्र रहती है अतः अग्नि द्वारा स्नेह का सात्मीकरण होने पर सारे शरीर में व्यान वायु के द्वारा प्रक्षिप्त कर दिया जाता है 1 संशोधन स्नेह रात्रि का भोजन पच जाने पर ही लिया जाता है । इसका तात्पर्य यह है कि अजीर्ण अवस्था में नहीं लिया जाता पर इसमें भूख लगने की भी प्रतीक्षा नहीं की जाती है । यदि भूख लगने के बाद संशोधन स्नेह का पान किया जाय तो जठराग्नि के दोप्त होने से उसका पाचन शीघ्र ही हो जाता है और संशोधन करने में वह समर्थ नहीं होता है । और यदि बिना भूख लगे हुये रात्रि के अन्न पच जाने पर ही संशमन स्नेह का प्रयोग किया जाय तो उस समय स्रोत कफ से युक्त रहता है जिससे स्नेह और स्नेह का गुण सम्पूर्ण शरीर में फैल नहीं पाता अतः सर्व-शरीरगत दोषों को शान्त करने में असमर्थ हो जाता है । इस प्रकार यह सामन्यतः संशमन, संशोधन स्नेह के पीने का समय बताया गया है पर विशेष अवस्था में इन समयों का बाध भी होता है जैसा कि - ' वातपित्ताधिको रात्रावृष्णे चापि पिवेन्नरः । इलेष्माधिको दिवा शीते पिबेच्चा-मलभास्करे || ' पीछे इसी अध्याय में यह बताया गया है । इस विमर्श की मूल भावना चक्रपाणि-सम्मत है । * उष्णोदकोपचारी स्याद्ब्रह्मचारी क्षपाशयः । शकृन्मूत्रानिलोद्वारानुदीर्णांश्च न धारयेत् ॥६२ ॥
व्यायाममुच्चैर्वचनं क्रोधशोकौ हिमातपौ । वर्जयेदप्रवातं च सेवेत शयनासनम् ॥ ६३ ॥
स्नेहं पीत्वा नरः स्नेहं प्रतिभुञ्जान एव च । स्नेहमिथ्योपचाराद्धि जायन्ते दारुगा गदाः ॥ ( १८-१९ ) प्रश्न: स्नेहपान के बाद तथा उसके जीर्ण ( पाचन ) होने पर क्या करना चाहिये? ( पीते जीर्णे किं च हिताहितम् ), उत्तर - मनुष्य उष्ण जल का पान करते हुये ब्रह्मचारी रह कर रात्रि में शयन करे । मल, मूत्र, वायु, ढकार के आये हुये वेगों को नहीं रोके । व्यायाम, उच्चभाषण, क्रोध, शोक, शीतल वस्तुओं का सेवन, धूप में बैठना इनका परित्याग करे, शयन और बैठने का स्थान अप्रवात होना चाहिये, स्नेह पीकर अथवा स्नेह के जीर्ण हो जाने पर पुनः स्नेह प्रयोग के अनुकूल वीर्य - विपाकादि गुण संपन्न स्नेह पीने वाले व्यक्तियों को इन नियमों का पालन करना चाहिये । यदि स्नेह पीने के बाद इन नियमों का उचित पालन न किया जाय तो भयंकर रोग उत्पन्न हो जाते हैं ॥ ६२-६४ ॥ विमर्श - स्नेह पीने के बाद या स्नेह के पच जाने पर इन नियमों का पालन किया जाना है । उत्तम मात्रा में पीया हुआ स्नेह या क्रूरकोष्ठ के लिये सात दिन तक स्नेह का पान कराने पर इन नियमों का पालन चौदह दिन तक, मध्यकोष्ठ के लिये ४, ५, ६ दिन तक स्नेहपान कराने पर ८, १०, १२ दिन तक, मृदुकोष्ठ के लिये तीन दिन तक स्नेहपान कराने पर ६ दिन तक इन नियमों का पालन कराना चाहिये । यह बात स्पष्ट रूप से अष्टांगहृदय में बतायी गई
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स्नेहाध्यायः १३ ] सूत्रस्थानम् २७३ है, यथा- ' यान्यहानि पिबेत्तानि तावन्त्यन्यान्यपि त्यजेत् । सर्वकर्मस्वयं प्रायो व्याधिक्षीणेष्वयं क्रमः ॥ ' ( अ. हृ. सू अ. १६ ) । यहाँ पर स्नेहपान करते समय और पान कर लेने के बाद पालन करने योग्य नियमों का प्रतिपादन कुछ अधिक रूप में किया है, जैसे- ' भोज्योऽन्नं मात्रया पास्यन् श्वः पिवन् पीतवानपि । द्रवोष्णमनभिष्यन्दि नानिस्निग्धमसङ्करम् ॥ उष्णोदकोपचारी स्याद् ब्रह्मचारी क्षपाशयः । व्यायाम वेगसंरोधशोकवर्षहिमातपान् ॥ प्रवानयानयानाध्वभाष्यात्यशनसंस्थितः । नीचात्युच्चोपधानाहःस्त्रमधूमरजांसि च ॥ ' ( अ.हृ. अ. सु. १६ ) | स्नेह पीने के बाद यदि नियमों का उचित रूप में पालन नहीं किया गया तो भयंकर रोग उत्पन्न होते हैं । इसका वर्णन और चिकित्सा निम्न रूप से बनाई गई है, यथा - इलेष्मणा स्नेहमिश्रण रुध्यते पथि मारुतः । तेनाङ्गहृच्छूलं परिकर्त्तव जायते ॥ स पानादुष्णतोयस्य प्रागुण्यं स्नेहनादपि । यात्य-भिष्यन्त्रिते स्नेहे कफे च प्रविलायिते ॥ श्लेष्मवातानुलोम्यार्थं तृष्णाघ्नं स्नेहपाचनम् । स्नेहे तस्मादजीर्णेऽपि तोयनुष्णं न दुष्यति ॥ स्वल्पस्नेहं विलेध्यां तु जीर्णे स्नेहे च भोजनम् । मृल्पस्नेहसिद्धेन रूक्षाशीतरसेन वा ॥ उद्गारसंप्रवृत्त्यर्थं स्वल्पमुष्णाम्बु पाययेत् । शोपस्तात्वोष्ठ-जिह्नानां क्ष्वेडनं कर्णयोरपि ॥ दीनस्वरत्वं तृष्णा च प्रसेको वनस्य च । जंबोरूद्वेष्टनं सादो ग्लानि-हैल्लास एव च । जीर्णे स्यालक्षगं स्नेहे परीक्षेयं तथापरः । ( चरकोपस्कार ) । कुछ पुस्तकों में मूल लोक के बाद निम्नलिखित लोक अधिक पढ़े गये हैं, जैसे- ' प्रकांक्षा लघुताऽङ्गानां वर्चोमूत्रानुलोमता । न कुमौ न च निष्यन्दो न ग्लानिर्न च गौरवम् ॥ न स्नेहगन्धमुहारं स्नेहिनस्योपजायते । जार्णे स्यालक्षणं स्नेहे तत्परीक्षार्थमुद्यना ॥ उद्गारसंप्रवृत्त्यर्थमत्यमुष्णाम्बु पाययेत् । शुद्धोद्वारविशुद्धिश्च नोद्वारो जायते पुनः । एतदेव शरीरस्य स्नेहभिन्नस्य लक्षणम् । ' ( चरकोपस्कार ) । ये लोक योगीन्द्र-नाथसेन कृत संस्करण से उद्धृत किये गये हैं । * मृदुकोष्ठखिरात्रेण त्रिह्यत्यच्छोपसेवया । स्निह्यति क्रूरकोष्टस्तु सप्तरात्रेण मानवः ॥ ६५ ॥
( २० - २१ ) प्रश्न: मदु और क्रूर कोष्ठ कौन? ( के मृदुक्रूरकोष्ठाः ), उत्तर — केवल अच्छस्नेह पान करने से मृदुकोष्ठ व्यक्ति तीन दिन में और क्रूरकोष्ठ व्यक्ति सात दिन में स्निग्ध हो जाता है ॥ ६५ ॥
विमर्श - संशमन के लिये जो केवल विचारणा - रहित स्नेह का पान कराया जाता है वही स्नेह जिस प्रधान, मध्यम और हस्व मात्रा में मृदुकोष्ठ व्यक्ति को तीन दिन में स्निग्ध करता है । वही प्रधान, मध्यम, हस्व स्नेह की मात्रा क्रूरकोष्ठ को सात दिन में स्निग्ध करती है । यहाँ मध्यकोष्ठ का वर्णन नहीं किया गया है किन्तु पीछे के विमर्श के अनुसार यह स्पष्ट है कि इन्हीं मात्राओं के अनुसार चार, पाँच या छ दिन में मध्यकोष्ठ व्यक्ति स्निग्ध हो जाता है । * गुडमिक्षुरसं मस्तु क्षीरमुल्लोडितं दधि । पायसं कृशरां सर्पिः काश्मर्यत्रिफलारसम् ॥६६ ॥
द्राक्षारसं पीलुरसं जलमुष्णमथापि वा । मद्यं वा तरुणं पीत्वा मृदुकोष्ठो विरिच्यते ॥६७ ॥
मृदुकोष्ठ का लक्षण गुड़, ईस का रस, दही का पानी, दूध, मधा हुआ दही, खीर, खिचड़ी, घृत, गम्भार, त्रिफला, मुनक्का और पीलु का रस या क्वाथ अथवा गरम जल या नूतन मदिरा पी लेने से ही मृदुकोष्ठ व्यक्ति को विरेचन होने लगता है ॥ ६६-६७ ॥ विमर्श - सुश्रुत ने ' तत्र वहुपितो मृदुः स दुग्धेनापि विरिच्यते ' यह मृदुकोष्ठ का लक्षण बताया हैं । आचार्य चरक या सुश्रुत का यह लक्षण अनुमान - ग्राह्य इन द्रव्यों के सेवन से यदि विरेचन हो जाता है तो उसे मृदुकोष्ठ व्यक्ति जानना चाहिए । * विरेचयन्ति नैतानि क्रूरकोष्ठं कदाचन । भवति क्रूरकोष्ठ स्य ग्रहण्यत्युल्बणानिला ॥ ६८ ॥
क्रूरकोष्ठ का लक्षण - ये ऊपर बताये हुये गुड़, गन्ने का रस आदि द्रव्य क्रूरकोष्ठ वाले १८ च ० सं ०
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२७४ चरकसंहिता व्यक्तियों को कभी भी विरेचन नहीं कराते हैं क्योंकि क्रूरकोष्ठ वाले पुरुष की ग्रहणी में वायु की अत्यन्त प्रधानता रहती है ॥ ६८ ॥
विमर्श - कोष्ठ का विषय स्नातकोत्तर संस्था ( Post Graduate Institute ) में अनुसन्धान का विषय बन सकता है । इस तथ्य का वैज्ञानिक ज्ञान होने पर आधुनिक चिकित्सा- शास्त्र की साहित्य - वृद्धि होगी । उदीर्णपित्ताऽल्पकफा ग्रहणी मन्दमारुता । मृदुकोष्टस्य तस्मात् स सुविरेच्यो नरः स्मृतः ॥ मृदुकोष्ठ में दोष की प्रधानता - नृदुकोष्ठ व्यक्ति की ग्रहणी में पित्त की प्रधानता होती है, कफ और वायु बहुत अल्प होते हैं इसीलिये वह व्यक्ति सुखपूर्वक विरेचन कराने के योग्य होता है || ६ ९ ॥ विमर्श - तात्पर्य यह है कि पित्त स्वभावतः सर, द्रव और उष्ण होता है । इन गुणों के कारण मल भी द्रव रहता है, इसीलिये सामान्य विरेचन गुण वाले द्रव्यों के सेवन से विरेचन हो जाता है । उदीर्णपित्ता ग्रहणी यस्य चाग्निबलं महत् । भस्मीभवति तस्याशु स्नेहः पीतोऽग्नितेजसा ॥ स जग्ध्वा स्नेहमात्रां तामोजः प्रचारयन् बली । स्नेहाग्निरुत्तमां तृष्णां सोपसर्गामुदीरयेत् ॥
नालं स्नेहसमृद्धस्य शमायान्नं सुगुर्वपि । स चेत् सुशीतं सलिलं नासादयति दह्यते ।
यथैदाशीविषः कक्षमध्यगः स्वविषाग्निना ॥ ७२ ॥
( २२ ) प्रश्न: अविविपूर्वक स्नेह सेवन से उपद्रव ( का व्यापठ: ), उत्तर -- जिस व्यक्ति की ग्रहणी में पित्त की प्रबलता होती है, जिसकी अग्नि का बल अधिक रहता है यदि वह स्नेह का पान करे तो अनि अपने तेज से पान किये गये उस स्नेह को शीघ्र ही भस्म कर देती है । फिर उस स्नेह से नीत्र अग्नि बलवान् होकर स्नेह की मात्रा को पचा कर ओज धातु को निकालती हुई तीव्र रूप से तृष्णा को उत्पन्न करती है । स्नेह से अग्नि के दीप्त हो जाने पर यदि गुरु अन्न का सेवन किया जाय तो भी वह अत्यन्त गुरु अन्न अग्नि को शान्त करने में समर्थ नहीं होता है । यदि प्यास लगने पर उस व्यक्ति को शीतल जल नहीं मिलता है तो उसके शरीर में भयंकर ढाह उत्पन्न होता है । जिस प्रकार मूखे तृण के ढेर में रहने वाले विषैले साँप को जब क्रोव हो जाता है तो उसके विषरूपी अग्नि से वह तृण जल जाता है और साँप भी उसी में मर जाता है, वैसे ही तीव्र अग्नि भी मृत्युकारक हो जाती है ॥ ७०-७२ ॥ विमर्श - उदाहरण का तात्पर्य यह है कि सूखे तृण में बैठा हुआ साँप जिस प्रकार अपने ही विषरूपी अग्नि के प्रभाव से नष्ट हो जाता है । उसी प्रकार स्नेह से बढ़ी हुई अग्नि शरीर के अन्दर रस - रक्तादि धातुओं का पाचन कर मार डालती है । अजीर्णे यदि तु स्नेहे तृष्णा स्याच्छर्दयेद्भिषक् । शीतोदकं पुनः पीत्वा भुक्त्वा रूक्षान्नमुल्लिखेत् ॥ स्नेह के अजीर्ण तथा तृष्णा की चिकित्सा - स्नेह के अजीर्ण होने पर यदि प्यास की अधिकता हो जाय तो वैद्य रोगी को वमन करावे । यदि इस पर भी तृष्णा शान्त न हो तो शीतल जल पिला कर और रूक्ष अन्न खिला कर पुनः वमन करावे ॥ ७३ ॥
विमर्श - वमन कराने का तात्पर्य यह है कि स्नेह जो कि पचा नहीं होता है, वह वमन के द्वारा बाहर निकल जाता है । यदि वात कफ की प्रधानता रहती है और वमन करा देने पर भी तृष्णा की शान्ति नहीं होती तो ज्वार, बाजरा आदि रूक्ष अन्न और शीतल जल पिला कर वमन कराने से वात और कफ की शान्ति हो जाती है । सुश्रुत ने स्नेह के अजीर्ण होने पर गरम जल का पान करा कर वमन कराने का आदेश दिया है, यथा- ' एवं चानुपशाम्यन्त्यां स्नेहमुष्णाम्बुना वमेत् । ' ( सु. चि. अ. ३१ ) । इसका तात्पर्य यह है कि यदि स्नेह के अजीर्ण होने पर समदोष पुरुष है तो गरम जल पिला कर वमन कराना चाहिये और चरक कातात्पर्य वात-
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स्नेहाध्यायः १३ ] सूत्रस्थानम् २७५ ककप्रधानता में शीतल जल और रूक्ष अन्न खिला कर वमन कराने का है । अष्टांगसंग्रह में यह बात स्पष्ट रूप से बताई गई है, यथा- ' अजीर्णे बलवत्यां तु शीतैदिह्याच्छिरोमुखम् । छर्दयेत् तदशान्तौ च पीत्वा शीतोदकं पुनः ॥ रूक्षान्न मुल्लिखे भुक्त्वा नादृश्यां तु कफानिले । समदोपस्य निःशेषं स्नेह-मुष्णान्वुनोद्धरेत् । तनो दोषातिवलनः पूर्वोक्तं च विधिं श्रयेत् ॥ ' ( अ. सं. सू. अ. २५ ) । शीतल जल, रूक्ष अन्न इन दोनों के सेवन से एक साथ कफ और वात की वृद्धि होती है । वमन कराने के पूर्व दोष - वृद्धि ही की जाती है, यथा – ' गुणेन वर्धितः श्लेष्मा सुखं वृद्धया निपात्यते । ' जब इन क्रियाओं के द्वारा वात - कफ की प्रधानता हो जाती है तो वमन के द्वारा उसका निकालना सुगम होता है । कुछ लोग ' उदीर्णपित्ता ' का प्रमंग लेकर पित्त प्रधान में ठंडे जल को पीकर वमन करना चाहिये - ऐसा कहते हैं, पर उनका कथन उचित प्रतीत नहीं होता है क्योंकि पित्त प्रधान होने पर यदि शीतल जल पिलाया जायगा तो उष्ण गुण वाला पित्त शान्त हो जायगा और वमन के द्वारा उसका निकलना कठिन होगा । इसलिये पित्त और समदोष में गर्म जल पिला कर वमन कराना चाहिये । वात - कफप्रधान पुरुष यदि शीतकाल में स्नेह का पान करे और अजीर्ण हो जाय तो उसे भी गर्म जल पीने का विधान है, थया - ' शीते वातकफार्त्तस्य गौरवानचिशूलकृत् । स्नेहपीतस्य चेष्णा पिबेदुष्णोदकं नरः ॥ ' ( स. चि. अ. ३१ ) । न सर्पिः केवलं पित्ते पेयं सामे विशेषतः । सर्वं ह्येनुरजेद्देहं हत्वा संज्ञां च मारयेत् ॥७४ ॥
सामपित्त में अच्छ - सर्पि का निषेध - पित्तविकार में विशेषकर पित्त के साम होने पर केवल घृत का पान नहीं कराना चाहिये क्योंकि वह सम्पूर्ण शरीर को रँग देता है और ज्ञानवह स्रोतों में जाकर मंज्ञा नष्ट कर मार डालता है ॥ ७४ ॥
विमर्श - - साम पित्त- आमदोष के साथ मिले हुए पित्त को साम कहा जाता है । जठराग्नि की दुर्बलता से यदि रस धातु का ठीक रूप में पाचन नहीं होता है और दूषित हुआ वह रस आमाशय में चला जाय तो उसे ' आम ' कहते हैं । यह आम जब पित्त से सम्बन्ध करता है तो उसे साम पित्त कहते हैं, इसका लक्षण -- ' दुर्गन्धहरितं श्यावं पित्तमम्लं स्थिरं गुरु । अम्लिकाकण्ठ-हृद्दाहकरं सामं विनिर्दिशेत् ॥ ' ( मधुकोष ) । सामदोष में पाचन का प्रयोग किया जाता है । घृत पित्त का शमन करने वाला है । यदि निरामपित्त में केवल घृत का प्रयोग किया जायगा तो वह पित्त को शान्त करने की चेष्टा करेगा किन्तु सामावस्था में यदि पित्त को शान्त करने की चेष्टा की जाती है तो वह भयंकर उपद्रव करने वाला हो जाता है । इसी आशय से कहा गया है ' भैषज्यमामदोषस्य भूयो ज्वलयति ज्वरम् । ' ( माधवनिदान ज्वर ० ) तथा ' स्वेद्यमामज्वरं प्राज्ञः कोऽम्भसा परिषिञ्चति । प्रसुप्तं कृष्णसर्पं हि यः कराग्रेण संस्पृशेत् ॥ ' ( भावप्रकाश ज्वर ० ) । तात्पर्य यह है कि सामदोष में उस दोष को दूर करने की औषधि नहीं दी जाती है किन्तु पाचन की औषधि दी जाती है । इसीलिये साम वायु से होने वाले ऊरुस्तम्भ में वातनाशक तैल का प्रयोग नहीं किया जाता, यदि अज्ञानतावश तैल का प्रयोग किया गया तो वायु की वृद्धि हो जाती है और फलस्वरूप वेदना की भी वृद्धि हो जाती | इसलिये केवल घृत का सामपित्त में निषेध किया है पर निराम-पित्त में केवल घृत का पान किया जाता है । सामपित्त में यदि घृत का प्रयोग करना हो तो साम-पित्तघ्न द्रव्यों से संस्कार कर उसे दिया जा सकता है क्योंकि संस्कार के अनुसार घृत में अन्य गुणो का आधान हो जाता है, यथा - ' एभ्यश्चैवोत्तमं सर्पिः संस्कारस्यानुवर्तनात् ' ( च. सू. अ. १३ ) । उपर्युक्त श्लोक में शरीर के रंजन का अभिप्राय Jaundice माना जा सकता है । क्योंकि स्नेह-१. केवलमसंस्कृतम् । केवले ' ग. २. ‘ ह्यनुचरेद्देहम् ’ ग. । ‘ अनुरुजेत् ' यो. ।
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२७६ चरकसंहिता पाचन तथा यकृत् का सम्बन्ध घनिष्ठ है तथा यकृद्दोष होने पर कामला ( Jaundice ) होना सम्भव है ।
ॐ तन्द्रा सोकेश आनाहो ज्वरः स्तम्भो विसंज्ञता ।
कुष्टानि कण्डूः पाण्डुत्वं शोफाशस्यरुचिस्तृषा ॥ ७५ ॥
जठरं ग्रहणीदोषः स्तैमित्यं वाक्यनिग्रहः । शूलमामप्रदोषाश्च जायन्ते स्नेहविभ्रमात् ॥७६ ॥
स्नेह - व्यापद ( उपद्रव ) की गणना [ Complications in Oleation Therapy ] --नन्द्रा, जी मचलाना ( Nausea ), उदर में आनाह, ज्वर ( Fever ), अंगों में जकड़ाहट, ज्ञान-शून्यता, कुष्ठ, खुजली ( Itching ), पाण्डु रोग ( Anaemia ), शोथ ( Oedema ), अर्श ( Piles ), अरुचि ( Annorexia ), तृष्णा, उदररोग, ग्रहणीदोष ( ग्रहणी, संग्रहणी, घटीयंत्ररोग ), स्तैमित्य, बोली का बन्द हो जाना, उदरशूल, आम दोष ( अलसक, विलम्बिका, विसूचिका, आदि होना ) ये रोग स्नेह के अविधिसेवन से होते है ॥ ७५-७६ ॥ ॐ तत्राप्युल्लेखनं शस्तं स्वेदः कालप्रतीक्षणम् । प्रति प्रति व्याधिवलं बुवा स्रंसनमेव च ॥७७ ॥
तकारिष्टप्रयोगश्च रूक्षपानान्नसेवनम् । मूत्राणां त्रिफलायाश्च स्नेहव्यापत्तिभेषजम् ॥ ७८ ॥
( २३ ) प्रश्न: अविधि - स्नेह - सेवन से उत्पन्न उपद्रवों ( व्यापद ) की चिकित्सा ( सिद्धयश्च काः ), उत्तर - - स्नेहजन्य सभी प्रकार के उपद्रवों में वमन कराना, स्वेद कराना, समय की प्रतीक्षा कराना और प्रत्येक पुरुष के बल और व्याधि के बल को देखकर विरेचन का प्रयोग कराना, तकारिष्ट का प्रयोग कराना, रूक्ष अन्न और पेय पदार्थों का सेवन कराना, मूत्रों का प्रयोग और त्रिफला का सेवन कराना, इससे अविधि स्नेह से उत्पन्न उपद्रवों को शान्ति हो जाती है ॥ ७७-७८ ॥ काले चाहितश्चैव मात्रया न च योजितः । स्नेहो मिथ्योपचाराच्च व्यापद्येताति सेवितः ॥७ ९ ॥ स्नेह सेवन से उपद्रव होने में हेतु - अकाल में स्नेह पीने से, जिस मनुष्य के लिये या जिस रोग में जो स्नेह लाभकारी नहीं है उसका सेवन करने से, मात्रापूर्वक स्नेह का सेवन न करने से और स्नेह सेवन में बनाये हुये नियमों का पालन न करने से तथा बताये हुये समय से अधिक समय तक स्नेह सेवन करने से उपद्रव हो जाते है ॥ ७ ९ ॥ @ स्नेहात् प्रस्कैन्दनं जन्तुस्त्रिरात्रोपरतः पिबेत् । स्नेह्वद्भवमुष्णं च त्र्यहं भुक्त्वा रसौदनम् ॥ ( २४ ) प्रश्न: संशोधन के लिये स्नेह पीने में आचार ( अच्छे संशोधने चैव स्नेहे का वृत्ति-रिष्यते ), उत्तर - स्नेह पी लेने के बाद तीन दिन तक पुरुष विश्राम करे और इस तीन दिन में स्नेह से मिश्रित द्रव, उष्ण मांसरस और भात का सेवन कर विरेचन औषध का मेवन करे ॥ ८० ॥
विमर्श - विरेचन के पहले स्नेहन करना आवश्यक होता है । जिस दिन सम्यक् स्निग्ध का लक्षण शरीर में उत्पन्न हो जाय उसी दिन स्नेह सेवन का त्याग कर तीन दिन तक स्नेह मिले हुये द्रव उष्ण मांसरस के साथ भान खिलाने के बाद विरेचन का प्रयोग कराना चाहिये । यह समय की प्रतीक्षा और भोजन, कफ के उत्क्लेश की शान्ति लिये किया जाता है । कफ के उत्क्लेश हो जाने से विरेचन विधिवत् नहीं होता है, यथा- ' विरिच्यते मन्दकफस्तु सम्यक् ' तथा ' रसैस्तथा जांगलजैः सयूपैः स्निग्धः कफावृद्धिकरै विरेच्यः ' ( सि. स्था. अ. १ ) । १. ' तन्द्रीरुत्श ' इति ग. । २. ' शूलमामप्रदोषश्च जायते ' ग. । ३. प्रस्कन्दनं विरेचनम् । ' प्रस्कन्दनः ' ग. । ४. स्नेहं च द्रवमुष्णं च ' ग. । क. ' स्यात्त संशोधनार्थाय ' न. ।
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नेहाध्याय: १३ ] सूत्रस्थानम् एकाहोपरतस्तद्वद्भुक्त्वा प्रच्छर्दनं पिबेत् । २७७ वमन के लिये स्नेह प्रयोग करने पर आचार - स्नेह पीने के एक दिन बाद द्रव, उष्ण मांस रस और भात खिला कर वमन कराना चाहिये । विमर्श - तात्पर्य यह है कि सम्यक् स्निग्ध हो जाने पर द्रव, स्निग्ध, मांसरम और भान एक दिन तक खिलाकर दूसरे दिन वमन कराना चाहिये, ऐसा करने से कफ का उत्क्लेश हो जाता है और कफ का उत्क्लेश होने से वमन सुगमता से हो जाता है, कहा भी है कि - ' कफोत्तर छर्दयनि ह्यदुःखम् ' ( सि. स्था. अध्याय १ ) | अष्टाङ्गसंग्रह में स्नेहन के बाद वमन और विरेचन करने के लिये एक दिन और तीन दिन का ही व्यवधान माना है, यथा - ' स्निग्धद्रवोष्णधन्वोत्थर सभुक् स्वेदमाचरेत् । स्निग्धस्त्र्यहं स्थितः कुर्याद्विरेकं वमनं पुनः || एकाहं दिनमन्यच्च कफमुत्क्लेश्य तत्करैः । निलमापदधिक्षीरगुडमत्स्यरसादिभिः ॥ ' ( अ. सं. सू. अ. २५ ) । स्यात्वसंशोधनार्थीये वृत्तिः स्नेहे विरिक्तवत् -संशमन स्नेह पीने में आचार- - संशमन करने के लिये सेवन किये हुये स्नेह में विरेचन किये हुये पुरुष के समान ही आचार विधि है ॥ ८१ ॥
विमर्श - संशमन के लिये जो स्नेह प्रयुक्त होता है उसमें सम्यक् विरेचन किये हुये पुरुष के समान ही आहार - विहार का पालन किया जाता है । यद्यपि वनन और विरेचन के ठीक प्रयोग होने पर समान रूप से ही आहार - विहार का विधान है पर विशेषता यह है कि वमन कराने पर धूमपान के द्वारा बचे हुये कफ का निर्हरण किया जाता है । पर विरेचन कराने के बाद धूमपान नहीं कराया जाता । स्नेहपान करने पर भी धूमपान नहीं करना चाहिये किन्तु वमन - विरेचन मैं सामान्यतः जो पेया - विलेपी आदि का प्रयोग होता है वह किया जाता है । धूमपान विधि में ' न मद्यदुग्धे पीत्वा च न स्नेहम् ' अर्थात् मदिरा, दूध और स्नेह पीने के बाद धूम्रपान नहीं करना चाहिये, इस नियम के अनुसार भी स्नेहपान में धूम का परित्याग किया जाता है । * स्नेहद्विषः स्नेहनित्या मृदुकोष्टाश्च ये नराः । क्लेशासहा मद्यनित्यास्तेषामिष्टा विचारणा ॥ ( २५ ) प्रश्न: विचारणा के योग्य पुरुष ( विचारणाः केषु योज्या विधिना केन तत् प्रभो ), उत्तर - जो व्यक्ति स्नेह से द्वेष रखता हो, जो सदा स्नेह का सेवन करते हों, जिस पुरुष का कोउ मृडु हो, जो व्यक्ति क्लेश को सहने में असमर्थ हो, जो व्यक्ति प्रतिदिन मदिरा पीने वाला हो उनके लिये विचारणा का प्रयोग उत्तम है ॥ ८२ ॥
विमर्श -- सुश्रुत में भी विचारणा का प्रयोग इन्हीं लोगों के लिये किया है और विशेष कर सुकुमार, कृश, वृद्ध, बालक, प्यास से पीड़ित मनुष्यों के लिये तथा सामान्यतः सभी व्यक्तियों के - लिये गर्मी के दिनों में अन्न के साथ स्नेह का सेवन करने का उपदेश है । सुश्रुत ने ' भक्त ' शब्द का प्रयोग किया है भक्त का अर्थ भोजन होता है अर्थात् किसी भी खाद्य पदार्थ में मिला कर स्नेह का प्रयोग किया जा सकता है । लावतैत्तिरमायूरहांसवाराहकौक्कुटाः । गव्याजौर भ्रमात्स्याश्च रसाः स्युः स्नेहने हिताः ॥८३ ॥
विचारणा की विधि - लाव पक्षी, तीतर, मोर, हंस, सूअर, मुर्गा, गौ, बकरी, भेड़ और मछली इनके मांसों का रस स्नेहन कराने में हितकर होता है ॥ ८३ ॥
यत्रकोलकुलत्थाश्च स्नेहाः सगुडशर्कराः । दाडिमं दधि सव्योपं रससंयोगसंग्रहः ॥ ८४ ॥
स्नेहनार्थ रसों में मिलाने योग्य द्रव्य - जौ, बेर, कुलथी, स्नेह ( घी - तैल, वसा, मज्जा ), १. ' स्यात्तु संशोधनार्थाय ' ग. ।