चरक संहिता हिन्दी भाष्य — पृष्ठ 371–380
चरक संहिता हिन्दी भाष्य · Chaukhamba · पृष्ठ 371–380
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२७८ चरकसंहिता गुड़, चीनी, खट्टे अनार का रस, दही, सोंठ, मरिच, पिप्पली, संक्षेप में इन द्रव्यों का संयोग रसों के साथ किया जाता है ॥ ८४ ॥
स्नेहयन्ति तिलाः पूर्वं जग्धाः सस्नेहफाणिताः । कृशराश्च बहुस्नेहास्तिलकाम्बलिकास्तथा ॥ स्नेहन विधि -- भोजन के पहले स्नेह ( घृत, तेल, वसा, मज्जा ) के साथ राब खाकर तिल, अधिक स्नेह मिलाकर खिचड़ी, तिल - काम्बलिक खाने से शीघ्र ही स्नेहन होता है ॥ ८५ ॥
फाणितं शृङ्गवेरं च तैलं च सुरया सह । पिबेद्वृक्षो भृतैर्मासैर्जीर्णेऽश्नीयाच्च भोजनम् ॥ ८६ ॥
रूक्ष पुरुषों का स्नेहन - • मदिरा के साथ राब, सोंठ, तिल तेल मिलाकर सेवन करे । जब स्नेह पच जाय तो भुने हुये मांस के साथ भोजन करने से रूक्ष मनुष्यों का स्नेहन हो जाता है ॥ ८६ ॥
तैलं सुराया मण्डेन वसां मज्जानमेव वा । पिबन् सफाणितं चीरं नरः स्निह्यति वातिकः ॥
वातप्रधान पुरुषों का स्नेहन - मदिरा के मंड के साथ तैल, वसा, मज्जा का सेवन अथवा दूध में रात्र मिला कर पीने से वातप्रधान पुरुषों का स्नेहन हो जाता है ॥ ८७ ॥
धारोष्णं स्नेहसंयुक्तं पीत्वा सशर्करं पयः । नरः स्निह्यति पीत्वा वा सरं दध्नः सफाणितम् ॥ और भी: धारोष्ण दूध में स्नेह ( घृत, तैल, वसा, मज्जा ) और चीनी मिला कर पीने से या दही की मलाई में राब मिलाकर पीने से मनुष्य का स्नेहन हो जाता है ॥ ८८ ॥
पाञ्चप्रसृतिकी पेया पायसो माषमिश्रकः । क्षीरसिद्धो वहुस्नेहः स्नेहवेदचिरान्नरम् || ८ ९ || सद्यः ( शीघ्र ) स्नेहन विधि - पाञ्चप्रसृतिकी नाम की पेया और दूव में सिद्ध की हुइ चावल की खीर जिसमें उड़द मिलाया गया हो, जिसमें अधिक मात्रा में घृत मिलाया गया हो, इसका सेवन करने से शीघ्र ही मनुष्य का स्नेहन होता है ॥ ८ ९ ॥ विमर्श - पाञ्चप्रसूतिकी नाम की पेयाका निर्माण अग्रिमश्लोक से स्पष्ट है । यहाँ ' अचिरात् ' का अर्थ सद्यःस्नेहन से है । अच्छपान से स्नेहन विधि में कम से कम तीन दिन में स्नेहन हो जाता है - ऐसा कहा गया है । - विचारणा में स्नेहन होने का कोई निश्चित दिन नहीं बताया है फिर भी यहाँ सद्यः स्नेहन का जो उल्लेख किया गया है, उससे यह समझना चाहिये कि तीन दिन में स्नेहन हो जाता है । * सर्पिस्तैलवसामज्जातण्डुलप्रसृतैः शृता । पाञ्चप्रसृतिको पेया पेया स्नेहनमिच्छता ॥९ ० ॥ पाञ्च प्रसृतिकी पेया - घृत, तेल, वसा, मज्जा और चावल एक - एक प्रसूत लेकर बनाई हुई पेया का नाम ' पाचप्रसूतिकी पेया ' है । इसे शरीर का स्नेहन चाहने वाले पुरुषो को पीना चाहिये ॥ ९ ० ॥ ( शौकरो वा रसः स्निग्धः सपिलेवणसंयुतः । पीतो द्विर्वासरे यात् स्नेहयेदचिरान्नरम् || १ || ) ( प्रभूत घृत से बनाये हुए सूअर के मांसरस में घृत और नमक मिलाकर दिन में दो बार पीने से मनुष्यों का शीघ्र ही स्नेहन होता है ॥ १ ॥ )
विमर्श - यह लोक चग्कोपस्कार में प्रक्षेप के रूप में पढ़ा गया है । ग्राम्यानूपौदकं मांसं गुडं दधि पयस्तिलान् । कुष्टी शोधी प्रमेही च स्नेहने न प्रयोजयेत् ॥ स्नेहनार्थं कुछ द्रव्यों का विशिष्ट रोगों में निषेध -कुछ शोध तथा प्रमेह से पीडित रोगियों को ग्राम्य, आनूप और जलीय जीवों का मांस, गुड़, दही, दूध और तिल का प्रयोग स्नेहन करने के लिये नहीं करना चाहिये ॥ ९९ ॥
* स्नेहर्यथार्हं तान् सिद्धैः स्नेहयेदविकारिभिः । पिप्पलीभिर्हरीतक्या सिद्वैखिफलयाऽपि वा ॥ कुष्ठादि रोगों में स्नेहन विधि - • उपर्युक्त कुष्ठ, शोव तथा प्रमेह रोग में तत्तद्रोगोचिन घृत १. ' कृना ' ग. ।
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स्नेहाध्यायः १३ ] सूत्रस्थानम् २७६ आदि स्नेहों एवं तत्तद् रोगों में विकार न पैदा करने वाली लाभप्रद औषधियों से सिद्ध स्नेहों से स्नेहन करना चाहिये । अथवा पिप्पली, हर्रे या त्रिफला से पकाये हुये स्नेह से स्नेहन करना चाहिए ॥ ९ २ ॥ विमर्श - पिपली, हरें तथा त्रिफला के कल्क और क्वाथ से सिद्ध किये हुये स्नेह का प्रयोग के कुष्ठ, शोथ और प्रमेह में करने को बताया है । श्री चक्रपाणि ने ' केचित् ' का मत दे कर पिप्पली कल्क और क्वाथ से सिद्ध घृत कुष्ठ रोग में, हर्रे के काथ और कल्क से सिद्ध स्नेह शोथ रोग में, त्रिफला के कल्क और क्वाथ से सिद्ध स्नेह प्रमेह रोग में स्नेहन करने के लिये बताया है । श्रीगङ्गाधर नेपिप्पली, हरें तथा त्रिफला के क्वाथ कल्क से सिद्ध स्नेह ये तीन योग बताये है पर इनका क्रमिक
प्रयोग न बता कर सामान्यतः तीनों का प्रयोग तीनों रोगों में किया है ।
नरः ॥
द्राक्षामलकयूषाभ्यां दना चाम्लेन साधयेत् । व्योषगर्भ भिषक स्नेहं पीत्वा स्त्रिह्मति तं के विचारणा - विधि- सौंठ, पिप्पली और मरिच के कल्क और मुनक्का, आँवला इन दोनों वैद्य करायें । उस स्नेह को पीकर मनुष्य यूष ( क्वाथ ) और खट्टी दही के द्वारा स्नेह का पाक शीघ्र ही स्निग्ध हो जाता है ॥ ९ ३ ॥ यवकोलकुलत्थानां रसाः क्षारः सुरा दधि । क्षीरं सर्पिश्च तत्सिद्धं स्नेहनीयं वृतोत्तमम् ॥ विचारणा विधि - यव, बेर और कुल्थी के क्वाथ, मदिरा, दही और दूध एवं क्षार ( यवक्षार ) द्वारा सिद्ध किया गया घृत स्नेहन करने में उत्तम माना गया है ॥ ९ ४ ॥ विमर्श - वृद्ध वाग्भट ने भी इस घृत को इसी रूप में पढ़ा है, यथा- ' यव कोलकुलत्थाम्बुचार-सुश्रुत ने क्षीरसुरादवि । घृतं च सिद्धं तुल्यांशं सद्यः स्नेहनमुच्यते ॥ ' ( अ. सं. सू. अ क्कायो. २५ भागत्रयान्वितः ) और । इस घृत को विशेष रूप से स्पष्ट किया है, यथा- ' यवकीलकुलत्थानां वा पयोदविसुराक्षारघृतभागैः समन्वितः ॥ सिद्धमेतैर्वृतं पीतं सद्यः स्नेहनमुच्यते । राचे राजसमेभ्यो देयमेतद् घृतोत्तमम् ॥ ' ( सु. वि. अ. ३१ ) । तैलमज्जवसासर्पिर्ब्रदरत्रिफलारसैः । योनिशुक्रप्रदोषेषु साधयित्वा प्रयोजयेत् ॥ ९ ५ ॥ को बेर और त्रिफला के विचारणा विध - • तेल, मज्जा, वसा और घृत इन चारो स्नेहां ॥ ९ ५ ॥ काथ से सिद्धकर योनि व्यापन और शुक्रदोष में प्रयोग करना चाहिए स्ववति चाधिकः ॥९ ६ ॥ गृह्णात्यम्बु यथा वस्त्रं प्रस्रवत्यधिकं यथा । यथानि जीर्यति स्नेहस्तथा स्नेहस्तथा त्वरित सेवितः ॥९ ७ ॥ यथा चाद्य मृत्पिण्डमासिक्कं त्वरया जलम् । स्रवति स्रंसते अतिमात्रा में शात्र स्नेहन तथा अतिस्नेहन के दोष के बारे में उपमा - यदि शीघ्रतापूर्वक जाय तो जितने जल से स्नेह का सेवन किया जाय तो जिन प्रकार सूखे वस्त्र को जल से भिगोया जल उससे चू कर बाहर कपड़ा भीग जाता है उतना जल कपड़ा ग्रहण कर लेता है और अधिक स्नेह का पाचन निकल जाता है । उसी प्रकार अधिक मात्रा में स्नेह का सेवन करने पर जितने को बिना पचाए करने में जराग्नि समर्थ होती है उतने स्नेह को पचा देती है और अधिक स्नेह से जल छोड़ा गुदामार्ग से वायु द्वारा बाहर कर देती है । अथवा एक मिट्टी के ढेले के ऊपर शीघ्रता गिर जाता है । जाय तो वह जल ढेले को पूर्ण रूप से गीला न कर शीघ्र उस पर से बाहर कर बाहर उसी प्रकार शीघ्रता से सेवन किया गया स्नेह शरीर को पूर्ण रूप से स्निग्ध न निकल जाता है ॥ ९ ६ - ९ ७ ॥ १. व्योपगर्भ त्रिकटुकल्कयुक्तम् । ३. ' क्षारः सपिश्च ' इति पा ० । ५. ' वाक्लेद्य ' ग. | २. ' क्षीरम् ' इति पा ० । ४. ' तथाऽग्निजीति स्नेहं तथा स्रवति चाधिकम् ग. ।
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२८० चरकसंहिता विमर्श - नान्पर्य यह है कि अग्नि के अनुसार स्नेह की मात्रा ली गई तो उसे जठराग्नि पकाकर स्नेहों के गुणों का आधान शरीर में कर देती है । किन्तु जठराग्नि के बल से अधिक मात्रा में स्नेह का सेवन किया गया हो तो बिना पचे बाहर आ जाता है तथा शरीर का स्नेहन शीघ्र हो जाय अतः शीघ्रतावश एक ही दिन में अधिक मात्रा से स्नेह का सेवन किया जाय तो मिट्टी के ढेले के समान विना स्नेहन किये स्नेह बाहर निकल जाता है । * लवणोपहिताः स्नेहाः स्नेहयन्त्यचिरान्नरम् । तद्ध्यभिष्यन्द्यरूक्षं च सूक्ष्ममुष्णं व्यवायि च ॥ सलवण स्नेह का गुण - नमक अभिष्यन्दि, अरूक्ष ( स्निग्ध ), सूक्ष्म, उष्ण और व्यवायी होता है अतः नमक के साथ स्नेहों का प्रयोग करने पर मनुष्य को यह स्नेह शीघ्र ही स्नेहन करता है ॥ ९ ८ ॥ विमर्श -- नमक अभिष्यन्दी है अर्थात् स्रोतों में स्राव उत्पन्न करता है तथा वह रूक्ष नहीं है ( दर्योकि जो वस्तु रूक्ष होगी वह स्नेहनार्थं प्रयुक्त नहीं हो सकती है ), सूक्ष्म होने के कारण स्नेह के साथ युक्त होकर शरीर के सूक्ष्मातिसूक्ष्म प्रदेश में भी प्रवेश कर जाता है । उष्ण होने से स्नेहों का पाचन करने में समर्थ होता है । व्यवाची होने से पहले सम्पूर्ण शरीर नें स्नेहों को फैलाकर बाद में उसको पाचन क्रिया शरीर में कराता है । इन कारणों से नमक के साथ सेवन किया गया स्नेह शीघ्र ही मनुष्य का स्नेहन करता है । * स्नेहमग्रे प्रयुञ्जीत ततः स्वेदमनन्तरम् । स्नेहस्वेदोपपन्नस्य संशोधनमथेर्तरत् ॥ ९९ ॥
पूर्व कर्म ( स्नेहन - स्वेदन ) तथा संशोधन क्रिया करना कर्म का आपसी क्रम - - संशोधन आवश्यक हो तो सर्वप्रथम स्नेह का प्रयोग करना चाहिए, जब स्नेहन क्रिया उचित रूप में हो जाय तब स्वेद का प्रयोग करना चाहिए, स्नेहन और स्वेदन क्रिया के ठीक - ठीक रूप में हो जाने पर संशोधन क्रिया अथवा शमन क्रिया का प्रयोग करना चाहिए ॥ ९९ ॥
तत्र श्लोकः-स्नेहाः स्नेहविधिः कृत्स्नव्यापत्सिद्विः सभेषजा ।
याप्रश्नं भगवता व्याहृतं चान्द्रभागिना ॥ १०० ॥
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते सूत्रस्थाने कल्पनाचतुष्के स्नेहाध्यायो नाम त्रयोदशोऽध्यायः ॥ १३ ॥
तषियों का उपसंहार - इस स्नेहाध्याय में, स्नेह, स्नेहों के लेखन करने की सम्पूर्ण विधि, स्नेहों के जवि से सेवन करने में व्यापत्ति ( उपन ) और औषधों के साथ उसको सिद्धि जैसा प्रश्न अग्निवेश ने किया था उसके अनुसार भगवान् चान्द्रभाग पुनर्वसु ने उत्तर दिया है ॥ १०० || विमर्श - पुनर्वसु की माता का नाम चन्द्रभागा था अतः चन्द्रभागा से उत्पन्न पुनर्वसु को चान्द्रानि कहा जाता है । अग्निवेश ने इस अध्याय में स्नेहकर्मविषयक २५ प्रश्न किये है । चरक के द्वारा प्रतिसंस्कृत अग्निवेशकृन तन्त्र ( चरकसंहिता ) के सूत्रस्थान में कल्पनाचतुष्याविषयक ' स्नेह ' नामक तेरहवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ १३ ॥
१. ' संशोधनमनन्तरम् ' यो.
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स्वेदाध्यायः १४ ] सूत्रस्थानम् अथ चतुर्दशोऽध्यायः अथातः स्वेदाध्यायं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्माह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
१५२ अब इसके बाद स्वेद नामक अध्याय की व्याख्या की जायगी जैसा कि भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥ १-२ ॥ विमर्श - स्नेहन के बाद स्वेदन करना चाहिए यह बात पूर्व के अध्याय में बता चुके हैं, यथा - ' स्नेहमग्रे प्रयुञ्जीत ततः स्वेदमनन्तरम् ' । अतः स्नेहन के बाद स्वेदन की विधियों का निर्देश करने के लिए यह स्वेदाध्याय का प्रारम्भ किया गया है । अतः स्वेदाः प्रवच्यन्ते यैर्यथावत्प्रयोजितैः । स्वेदसाध्याः प्रशाम्यन्ति गदा वातकफात्मकाः ॥ ( १ ) स्वेदन ( Sudation ) सम्बन्धी सामान्य चर्चा स्वेदन से लाभ - अब स्नेहन के बाद स्वेदन क्रिया का वर्णन करेंगे जिनके विधिवत् प्रयोग से स्वेद क्रिया से शान्त होने वाले वात - कफ के रोग शान्त हो जाते हैं ॥ ३ ॥
विमर्श - यहाँ ' वातकफात्मका: ' इस शब्द की व्याख्या व्यस्त और समस्त दोनों पक्ष से की जाती है । व्यस्त पक्ष में वात रोगों में और कफ रोगों में, समस्त पक्ष में-- वात - कफजन्य रोगों में स्वेदन करना चाहिए । इसी अध्याय के आठवें श्लोक में बताया जायगा -- ' वातश्लेष्मणि वाते वा कफे वा स्वेद इष्यते । ' वात शीतल होता है और स्वेद उष्ण होता है अतः स्वेद वात को दूर करता है । कफ सौम्य होता है । स्वेद आग्नेय होता है अतः आग्नेय स्वेद सौम्य कफ का नाश करता है, अतः बात, कफ या वातकफज रोगों में स्वेद का प्रयोग किया जाता है । सुश्रुत प्रवल वात - कफ के साथ अल्पमात्रा में यदि पित्त का सम्बन्ध होता है तब द्रव स्वेद करने का आदेश देते हैं । उनका कहना है कि द्रव को अधिक गरम करके स्वेद में जो प्रयोग किया जाता है वह गरम होने से वात और कफ तथा द्रव होने से पित्त को शान्त करता है । * स्नेहपूर्वं प्रयुक्तेन स्वेदेनाव जितेऽनिले । पुरीषमूत्ररेतांसि न सज्जन्ति कथंचन ॥ ४ ॥
स्नेहन क्रिया के बाद स्वेदन करने से लाभ - स्नेहन क्रिया करने के बाद स्वेदन क्रिया से वातदोष दूर कर लेने पर मल, मूत्र, शुक्र ये शरीर में किसी प्रकार रुकते नहीं है ॥ ४ ॥
* शुष्काण्यपि हि काष्टानि स्नेहस्वेदोपपादनैः । नमयन्ति यथान्यायं किं पुनर्जीवतो नरान् ॥ स्वेदन की प्रशंसा में उपमा - जब सूखे हुए काष्ठ को भी विधिपूर्वक स्नेहन और स्वेदन करने के बाद अपनी इच्छानुसार जिवर चाहे उधर घुमाया जा सकता है तो क्या जीवधारी पुरुष का स्नेहन और स्वेदन करने के बाद अपनी इच्छानुसार यथास्थान नहीं घुमाया जा सकता है? अर्थात् अवश्य ही घुमाया जा सकता है ॥ ५ ॥
विमर्श - तात्पर्य यह है कि विना स्नेहन - स्वेदन किये यदि संशोधन किया जाय तो दोष निकल नहीं पाते है फलतः वे अपने आश्रय को नष्ट - भ्रष्ट कर देते हैं । स्नेहन और स्वेदन से डोप निकल कर या कोमल होकर अन्य स्थान से अपने स्थान पर चले आते हैं और संशोधन के द्वारा सुगमतापूर्वक बाहर निकल जाते हैं । उदाहरण के लिए यहाँ सूखी लकड़ी को लिया गया है । यदि बाँसका डण्डा टेढ़ा होता है तो तेल लगा कर आग पर सेक कर उसे सीधा कर दिया जाता हैं या सीधे बाँस के इण्डे को टेढ़ा करना होता है तो तैल लगा कर, सेंक कर टेढ़ा कर लिया जाता है क्योंकि इस क्रिया से वह कोमल हो जाता है । उसी प्रकार शरीर का स्नेहन - स्वेदन करने से
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२८२ चरकसंहिता उसमें और दोपों में कोमलता आ जाती है । सुश्रुत ने - ' स्नेहस्वेदावनभ्यस्य यस्तु संशोधनं पिबेत् । दाशुष्कमिवानामे देहस्तस्य विशीर्यते ॥ स्नेहस्वेदप्रचलिता रसैः स्निग्धैरुदीरिताः । दोषाः कोष्ठ-गना जन्तोः सुखा हर्तुं विशोधनैः । ' ( सु. चि. अ. ३३ ) । अर्थात् बिना स्नेहन - स्वेदन किये जो व्यक्ति संशोधन की औपथि पीता है उसका शरीर जैसे सूखी लकड़ी को टेढ़ा किया जाता है और वह टूट जाती हैं वैसे टूट जाता है और स्निग्ध रसों के द्वारा प्रेरित, स्नेह - स्वेद के द्वारारा प्रचलित दोष जब कोष्ठ में आ जाते हैं तो सुखपूर्वक संशोधन औषधों के द्वारा सुगमता से निकाले जाते हैं । रोगव्याधितापेक्षो नात्युष्णोऽतिमृदुर्न च । द्रव्यवान् कल्पितो देशे स्वेदः कार्यकरो मतः ॥ सफल स्वेदन के आवार - • रोग, ऋतु और रोगी के बल और अबल का विचार कर, न अधिक गरम और न अधिक मृदु स्वेद, दोष के अनुसार उचित द्रव्यों से कल्पना बना कर जिस शरीर प्रदेश में, जिस प्रकार, जितना स्वेद करना उचित हो उतनी ही मात्रा में स्वेद करने से लाभ होता है ॥ ६ ॥
विमर्श - तात्पर्य यह है कि बिना नियम स्वेद करने से लाभ नहीं होता है किन्तु विधि-पूर्वक दोषानुसार द्रव्यों से रोग, ऋतु और रोगी के वल के अनुसार न गरम, न अधिक मृदु स्वेद करना लाभकारी होता है । देश का तात्पर्य यह हैं कि शरीर प्रदेश के भिन्न भिन्न स्थानों में भिन्न भिन्न प्रकार से स्वेद किया जाता है; जैसा कि आगे १० वें श्लोक में बताया गया है । ε व्याधौ शीते शरीरे च महान् स्वेदो महाबले । दुर्बले दुर्बलः स्वेदो मध्यमे मध्यमो हितः ॥ स्वेद के तीन भेद ( महान्, मध्यम तथा दुर्बल ) - रोग के बलवान होने पर, शीतकाल होने पर, और शरीर के बलवान होने पर महास्वेद किया जाता है और दुर्बल व्यक्ति में, दुर्बल रोग होने पर और अल्प शीत पड़ने पर दुर्बल ( मृदु ) स्वेद करना चाहिए । रोग के मध्यम होने पर, मध्य वल होने पर और साधारण शीन रहने पर मध्यम स्वेद करना चाहिए ॥ ७ ॥
विमर्श - यहाँ रोग, ऋतु और शारीरिक वल के अनुसार तीन प्रकार का स्वेद बताया गया है । स्वेद देश - भेद से और दोष के अनुसार भी तीन तरह का होता है जिसका उल्लेख आगे किया जायगा । * वातश्लेप्मणि वाते वा कफे वा स्वेद इप्यते । स्त्रिग्धरूतस्तथा स्निग्धो रूक्षश्चाप्युपकल्पितः ॥ स्वेद के दो भेद स्निग्ध ( तथा रूक्ष ) - वात - कफजन्य रोगों में स्निग्ध और रूक्ष, वातजन्य विकार में स्निग्ध और कफजन्य विकार में रूक्ष द्रव्यों से बनाया हुआ स्वेद करना चाहिए ॥ ८ ॥
विमर्श - यहाँ दोष के अनुसार स्निग्ध - रूक्ष, स्निग्ध और रूक्ष द्रव्यों द्वारा कल्पित ये तीन स्वेद बताये गये है । ऋ आमाशयगते वाते कफे पक्वाशयाश्रिते । रूक्षपूत्रों हितः स्वेदः स्नेहपूर्वस्तथैव च ॥ ९ ॥
आमाशय तथा पक्वाशयगत दोषों में स्वेद विवि - आमाशय में यदि वायु कुपित हो तो रूक्ष द्रव्यों के द्वारा स्वेद करा कर बाद में स्निग्ध द्रव्यों द्वारा स्वेदन कराना चाहिए । यदि पक्कादाय में कफ कुपित हो तो पहले स्निग्ध द्रव्यों द्वारा स्वेद कराने के बाद रूक्ष द्रव्यों से स्वेदन कराना चाहिए ॥ ९ ॥
विमर्श -- यहाँ शरीर प्रदेश के अनुसार दो प्रकार का स्वेद बताया गया है । आमाशय कफ का स्थान है, आमाशय में विकृत कफ को शान्त करने के लिए पहले रूक्ष वेद कराया जाता है । जब स्थानीय दोष शान्त हो जाता है तो आगन्तुक वात को नष्ट करने के लिए स्निग्ध स्वेदन किया जाता है । इसी प्रकार पक्वाशय वात का स्थान है । पहले उसे दूर करने के लिए स्निग्ध
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स्वेदाध्याः १४ ] सूत्रस्थानम् २८३ स्वेदन किया जाता है स्थानीय दोष के शान्त होने पर आगन्तुक दोष कफ को दूर करने के लिए रूश्च स्वेद कराया जाता है । बताया भी है- ' आगन्तुं समये दोपं स्थानिनं प्रतिकृत्य च । ' ( अ. हृ.सू. १३ ) । वृद्धदाग्भट में भी स्थान के अनुसार इसी प्रकार का स्वेद बताया है- ' आमाशय-गते वाच कफे पक्वाशयाश्रिते । रूक्षपूर्वं तथा स्नेहपूर्वं स्थानानुरोधतः ॥ ' ( अ. सं. सू. अ. २६ ) । * वृषणौ हृदयं दृष्टी स्वेदयेन्मृदु नैवं वा । मध्यमं वङ्खणौ शेषमङ्गावयवमिष्टतः ॥ १० ॥
वृषणादि स्थान पर स्वेद मात्रा - वृषण ( अंडकोष ), हृदय, नेत्र इनका स्वेदन नहीं करना चाहिए या मृदुस्बेद करना चाहिए और वंक्षण सन्धि में मध्यम स्वेद करना चाहिए । इनसे अतिरिक्त अंगों में रोगानुसार तथा आवश्यकतानुसार स्वेद करना चाहिये ॥ १० ॥
विमर्श - यह स्थान के अनुसार नीन प्रकार के स्वेद का वर्णन है— अंडकोप ( Scrotum ), हृदय ( Heart ) और दृष्टि ( Eyes ) इनमें हुए रोगों में यदि उपायान्तर से रोग की शान्ति हो जाय तो सर्वथा स्वेद का प्रयोग नहीं करना चाहिए पर ऐसा कोई रोग हो जाय जो विना स्वेद के अच्छा ही न हो सके तो ऐसी दशा में इन प्रदेशों में भी हल्का स्वेदन करना चाहिए । यही वात वंक्षण संधि के विषय में भी समझनी चाहिए । शरीर के अन्य प्रदेश में स्वेदन करने के लिए ७ श्लोक में बनाये हुए आदेशों का पालन करना चाहिए । * सुशुद्धैर्नकैः पिण्ड्या गोधूमानामथापि वा । पद्मोत्पलपलाशैर्वा स्वेद्यः संवृत्य चक्षुषी ॥११ ॥
नेत्र की स्वेदन विधि - नेत्र का स्वेदन करते हुए कमल की या नील कमल का पत्ता से नेत्र ढँककर स्वच्छ कपड़े की गद्दी बनाकर अथवा गेहूं के आटे का पिण्ड बना कर नेत्र का मृदुस्वेदन करना चाहिए ॥ ११ ॥
* मुक्तावलीभिः शीताभिः शीतलैर्भाजनैरपि । जलाई र्जलजैर्हस्तैः स्विद्यतो हृदयं स्पृशेत् ॥१२ ॥
हृदय को स्वेदन विधि - हृदय का स्वेदन करते हुए शीतल मुक्तावला ( मोतिया का माला ) से, शीतल कांसा आदि के पात्रों से, जल से गीले कमलों से अथवा जल से गीले हाथों से बार - बार हृदय का स्पर्श करे ॥ १२ ॥
विमर्श - यह नेत्र और हृदय की स्वेदन शिवे है अथवा सम्पूर्ण शरीर का स्वेदन करते हुए इन दोनों प्रदेशों को अधिक रूप में बचाना चाहिए इसलिए इन स्थानों पर शीतल वस्तुओं का उपयोग बताया है, अथवा यदि इन स्थानों में स्वेदन करना आवश्यक हो तो इन वस्तुओं को उस स्थान पर रख कर स्वेदन करना चाहिए । सुश्रुत में भी सामान्यतः सारे शरीर का स्वेदन करने समय इन्हीं वस्तुओं का उपयोग लिखा है । पर किसी द्रव्य का नामोल्लेख नहीं किया है | यथा— ' स्नेहाभ्यक्तशरीरस्य शीतैराच्छाद्य चक्षुषी । विद्यमानस्य च मुहुर्हृदयं शीतलैः स्पृशेत् ॥ ' ( सु. चि. अ. ३२ ) शीत शूलव्युपरमे स्तम्भगौरवनिग्रहे । संजाते मार्दवे स्वंदे स्वेदनाद्विरतिर्मता ॥ १३ ॥
सम्यक् स्वेदन का लक्षण - जब उचित रूप में स्वेदन हो जाता है तो रोगी व्यक्ति के शरीर मे शीन और शूल की शान्ति हो जाती है, शरीर की जकड़ाहट और गुरुता नष्ट हो जाती है, शरीर के अवयव कोमल हो जाते हैं, और पसीना आने लगता है । इन लक्षणों को देखकर यह समझना चाहिए कि स्वेन क्रिया उचित रूप में हो गई है और नव स्वेदन कार्य से विरत हो जाना चाहिए ॥ १३ ॥ '
पित्तप्रकोपो मृर्च्छा च शरीरसदनं तृषा । दाहः स्वेदाङ्गदौर्बल्यमतिस्विन्नस्य लक्षणम् ॥१४ ॥
१. ' वा न वा ' ग २. ' स्वेदातिप्रवृत्त्याऽङ्गदौवेल्यम् ' इति गङ्गाधरः ।
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२८४ चरकसंहिता स्वेदन के अतियोग का लक्षण - यदि स्वेदन का प्रयोग अधिक मात्रा में हो जाता है तो पित्त का प्रकोप हो जाता है, मूर्च्छा होती है, शरीर में अवसाद वढ़ जाता है, प्यान अधिक लगती है, शरीर में दाह होता है, पसीना अधिक आने लगता है और स्वर तथा अंगों ने दुर्बलता हो जाती है । इन लक्षणों को देखकर अनिम्वेद हो गया ऐसा जानना चाहिए ॥ १४ । विमर्श - इन लक्षणों के अतिरिक्त वृद्ध वाग्भट ने कुछ अधिक लक्षणों का उल्लेख किया है— ' पित्तास्रकोपनृण्मूर्च्छास्वराङ्गसदनश्रमाः । सन्धिपीडा ज्वरः श्यावरक्तमण्डलदर्शनम् || स्वेदातियोगा-च्छर्दिश्च ' ( अ. सं. सू. अ. २६ ), तथा सुश्रुत में - ' स्विन्नेऽत्यर्थ सन्धिपीडा विवाहः, मोत्पत्तिः पित्तरक्तप्रकोपः । मूर्च्छा भ्रान्तिर्दाहतृष्णे कृमश्च । ( सु. चि. अ. ३२ ), अर्थात् स्वेद के अत्यन्त हो जाने पर पित्त और रक्त का कोन, प्यास की अधिकता, नूर्च्छा, स्वर और अङ्गों में अवसाद, भ्रम, सन्धियों में पीड़ा, ज्वर, शरीर में श्याम और रक्त वर्ण के चकत्तों का दिखाई पड़ना और वमन होता है । सुश्रुत के मन में सन्धियों में पीडा, विवाह, फफोलों का उठना, पित्तरक्त का प्रकोप, नूर्च्छा, भ्रम, दाह, प्यास की अधिकता और बिना परिश्रम किये हुए थकावट होती है ।
उक्तस्तस्याशितीये यो ग्रैष्मिकः सर्वशो विधिः ।
सोऽतिविन्नस्य कर्तव्यो मधुरः स्निग्धशीतलः ॥ १५ ॥
स्वेद के अनियोग में चिकित्सा - ' तम्याशितीय ' नामक सूत्रस्थान के छठे अध्याय में ग्रीष्म ऋतु की जो चर्या बनाई गई है उसमें जो मधुर, स्निग्ध और शीतल आहार - विहार का वर्णन है । उसे पूर्णरूप से विधिपूर्वक स्वेद के अनियोग होने पर करना चाहिये ॥ १५ ॥
विमर्श - ग्रीष्म ऋतु में सूर्य के नाम से संतप्त मनुष्य की जिस प्रकार से रक्षा हो सके वैसा आहार - विहार ग्रीष्मऋतु में किया जाता है । इसी भाँति स्वेद के अतियोग होने पर ताप से शरीर अधिक सन्तप्त हो जाता है इसलिये नाप से रक्षा करने के लिये ग्रीष्मऋतु की बनाई हुई सारी विधियों का इसमें भी पालन किया जाता है । मधुर स्निग्ध - - शीतल इसका पुनः उल्लेख कर देने से ग्रीष्मऋतु में अल्प या अधिक जल मिला कर मदिरा पीने का भी विधान है । उसका स्वेद के अनियोग में सेवन नहीं किया जाता है । वाग्भव ने स्वेद के अतियोग होने पर स्तम्भन करना बनाया है । वहाँ पर स्वेदन और स्तम्भन इन दोनों में अन्तर बताते हुए लिखा है कि- ' तम्भितः स्याद्वले लब्धे ययोकामय सङ्घयात् । स्वम्भत्वक्खा युसंकोचकम्पदाग्यनुग्रहैः । पादष्ठत्वकरैः व्यावैरतिस्तम्भितमादिशेत् ॥ ' ( अ. ह. न्. अ. १७ ) । इसमें स्तम्मित और अतिस्तन्नित इन दोनों लक्षणों को समझाया है । आगे इसी स्थान के २२ वें अध्याय में स्तम्भन किसे करना चाहिये इन प्रश्न का उत्तर देते हुए बताया है- ' वित्तान्निदग्धा वस्तीसारपीडिताः । विपवेदाति-योगार्ताः स्तम्भनीया निशिताः । ' अर्थात् जिन्हें स्वेदन का अतियोग हो गया है उन्हें स्तम्भन करना चाहिये । स्नम्भन किन द्रव्यों से होना चाहिये इसका वर्णन वाग्भव ने इस रूप में किया है — ` ` ` ` स्तम्भनं श्लक्ष्णं, रुक्षसूक्ष्ममरद्रवम् । प्रायरिनक्तं कषायं च मधुरं च समासतः ॥ ( अ.हृ. सू. अ. १७ ) । इन सत्र वचनों को मिलाने से मधुर, स्निग्ध, शीतल के अतिरिक्त नित, पाय रस, रूक्ष, सर, द्रव और लक्ष्ण गुण विशिष्ट द्रव्यों का भी सेवन अनिस्वेदन होने पर किया जाता है । & कपायमद्यनित्यानां गर्भिण्या रक्तवित्तिनाम् । पित्तिनां सातिसाराणां रूक्षाणां मधुमेहिनाम् ॥ विदग्धभ्रष्टवनानां विपमद्यविकारिणाम् । श्रान्तानां नष्टसंज्ञानां स्थूलानां पित्तमेहिनाम् ॥ १. ' ब्रध्नं गुर्द, विदग्धं पक्कं भ्रष्टं बहिर्निर्गतं वा येषां तेषां पक्कगुदवलीनां गुदभ्रंशवनां च ' इति गङ्गाधरः ।
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स्वेदाध्यायः १४ ] सूत्रस्थानम् २८५ तृष्यतां चुधितानां च क्रुद्वानां शोचतामपि । कामल्युदरिणां चैत्र क्षत्तानामान्यरोगिणम् ॥ दुर्बलातिविशुष्कोणामुपक्षीणौजसां तथा । भिषक् तैमिरिकाणां च न स्वेदमवतारयेत् ॥१ ९ ॥ स्वेद के अयोग्य रोगी तथा रोग - प्रतिदिन कपाय द्रव्य का सेवन और मदिरापान करने वाले, गर्मी, रक्तपित्त के रोगी, पित्त के रोगी या पित्तप्रकृति वाले, अतिसार ( Diarrhoea ) से पीड़ित, मुक्ष्म शरीर वाले और मधुमेह ( Diabetes Mellitus ) से पीड़ित है और क्षार या अभि से जिनकी गुदा विद हो गई हैं या पक्क गुदा वाले या गुदभ्रंश रोग से पीड़ित है, विप और मदिरा के अविवि - सेवन से जिन्हें विकार उत्पन्न हो गया है, जो थके हुए है, जिनका ज्ञान नष्ट हो गया है, जो अधिक मोटे हो गये हैं, जिन्हें पित्तजन्य प्रमेह रोग हुआ है, जिन्हें अधिक प्यास लगी है, जो भूख से पीड़ित हों, जो क्रोधो हों, जो शोक से पीड़ित हों, जो कामला ( Jaundice ) या उदर रोग से पीड़ित हों, जिन्हें उरःक्षत हो गया है, जो वातरक्त ( Gout ) से पीड़ित है, जो अत्यन्त दुर्बल हैं, जिनका शरीर अधिक सूख गया है, जिनका ओज अत्यन्त क्षीण हो गया है, जिन्हें मोतियाविन्द ( Cataract ) का रोग हो गया है, ऐसे व्यक्तियों के लिये वैद्य स्वेद न करावे ॥ १६-१९ ॥ विमर्श - - वाग्भट ने जिन लोगों का स्वेदन नहीं करना चाहिये यदि उन लोगों को स्वेद्रन करना आवश्यक हो हलका स्वेद करने का आदेश दिया है, यथा - ' न स्वेदयेदतिस्थूलरूक्षदुर्बल-मूच्छितान् । स्तम्भनीयक्षतक्षीणक्षाममद्यविकारिणः ॥ तिमिरोदरवीसर्प कुष्ठ शोपाट्यरोगिणः । पीत-दुग्धदविस्नेहमधून् कृतविरेचनान् ॥ भ्रष्टदग्धगुदग्लानिक्रोधशोकभयार्दितान् । क्षुत्तृष्णाकामला-पाण्डुमेहिनः पित्तपीडितान् । गर्भिणीं पुष्पितां सूनां मृदु चात्ययिके गदे ॥ ' ( अ.हृ.सू. अ. १७ ) । यहाँ कषाय सेवन करने वाले को स्वेदन नहीं करना चाहिये यह कहा गया है किन्तु यह कहना उचित नहीं मालूम होता क्योंकि प्रतिदिन कषाय सेवन करने से वात की वृद्धि होती है और वात रोग में स्वेदन करना उचित बताया गया है । इसलिये चक्रपाणि ने- ' कषायद्रव्यकृतं मद्य-मिति कषायमद्यम् ' ऐसा विग्रह करके कषाय द्रव्यों से बनी हुई मदिरा का नित्य सेवन करने वाले व्यक्तियों के लिये स्वेद का निषेध किया है अथवा कषाय शब्द का ' अमधुर ' अर्थ किया है अर्थात् मधुर द्रव्यों से बनी हुई मदिरा का जो प्रतिदिन सेवन करता है उस व्यक्ति का स्वेदन नहीं करना चाहिये - ऐसा अर्थ किया है । रक्त और पित्त के विकार में स्वेदन का निषेध स्वतः प्राप्त हैं क्योंकि रक्त और पित्त यह दोनों आग्नेय होते हैं और स्वेद अग्निगुण- प्रधान होता है फिर भी रक्तपित्त रोग का यहाँ नाम लिया गया है इससे यह कल्पना की जाती है कि रक्तपित्त रोग यदि वातकफजन्य हो तो भी इसमें स्वेद नहीं कराना चाहिये । यदि रक्तपित्त में वमन और विरेचन कराना हो तो उसके अंगभूत जो स्नेहन - स्वेदन हैं उसमें स्वेदन का प्रयोग नहीं करना चाहिये । यहाँ ' मधुमेह ' शब्द से सामान्यतः सभी प्रमेहों का ग्रहण करना चाहिये यह बात आगे १७ अध्याय में बताई जायगी । अतः सामान्यतः किसी भी प्रमेह में स्वेद का प्रयोग नहीं करना चाहिये पर आवश्यकता पड़ने पर मृदु स्वेद किया जा सकता है । किन्तु मधुमेह और पित्त-प्रमेह में किसी भी प्रकार और किसी भी अवस्था में स्वेद का प्रयोग नहीं किया जाता है क्योंकि इन दोनों रोगों का यहाँ नामकरण किया गया है । सुश्रुत ने भी स्वेद का निषेध करने हुए केवल प्रनेह का ही नाम लिया है जैसे- ' पाण्डुर्मेही रक्तपित्ती क्षयार्त्तः क्षामोऽजीर्णी चोदरान गरार्त्तः । वृद्धर्द्यानों गर्भिणी पीतमद्यो नैते स्वेद्या यश्च मर्त्योऽतिसारी ॥ ' ( सु. चि. अ. ३२ ) । इस वचन से सामान्यतः प्रमेह में स्वेद का निषेध किया गया है । पुनः सुश्रुत चिकित्सा १२ वें १. ' आयरोगिणां वातरक्तवतां ' गङ्गाधरः । २. “ विशुद्धाना " ग. ।
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२८६ चरकसंहिता अध्याय में ' सर्व एव प्रमेहा मूत्रादिमाधुर्य्यं मधुगन्धसामान्यात् पारिभाषिक मधुमेहनां लभन्ते । न चैनान् कथञ्चिदपि स्वेदयेत्, मेदो बहुत्वादेतेषां विशीय्यते देहः स्वेदेन । ' इससे भी यह स्पष्ट है कि सामान्य प्रमेह में कथञ्चित् मृदु स्वेद का प्रयोग हो भी सकता है पर मधुमेह में किसी भी अवस्था में स्वेद नहीं किया जा सकता है । ब्रध्न का अर्थ चक्रपाणि ने गुदा किया है और ' विदग्ध ' तथा ' भ्रष्ट ' ये दोनों गुदा के विशेषण बताए हैं अर्थात् किसी कारण क्षार या अग्नि से गुदा दग्ध हो और गुदध्वंस हो गया हो तो स्वेद नहीं करना चाहिये । ज्ञान नष्ट होने पर स्वेद का निषेध किया गया है पर संन्यास रोग में मृदु स्वेद का विधान है । इसलिये उसमें हलका स्वेद करना सूचीभिस्तोदनं शतं दाहः पीडान-चाहिये । यथा — ' अञ्जनान्यवपीडाञ्च धूमाः प्रथमनानि च । खान्नरे ॥ ' ( भा. प्र. चि. ) । प्रतिश्याये चकासे च हिक्काश्वासेवलाघवे । कर्णमन्याशिरः शूले स्वरभेदे गलग्रहे ॥२० ॥
अदितैकाङ्गसर्वाङ्गपक्षाघाते विनामके । कोष्टानाहविवन्धेषु मूत्राघाते विजृम्भके ॥ २१ ॥
पार्श्वष्टष्टकटीकुक्षिसंग्रहे गृध्रसीषु च । मूत्रकृच्छ्रे महत्त्वे च मुस्कयोरङ्गमर्दके ॥ २२ ॥
पादोरुजानुजङ्घातिसंग्रहे श्वयथावपि । खल्लीप्वामेषु शीते च वेपथौ वातकण्टके ॥ २३ ॥
संकोचायामशूलेषु स्तम्भगौरवसुप्तिषु । सर्वाङ्गेषु विकारेषु स्वेदनं हितमुच्यते ॥ २४ ॥
स्वेद के योग्य रोग तथा रोगी - स्वेद के योग्य जो व्यक्ति प्रतिश्याय, कास, हिचकी, श्वास रोग से पीड़ित हैं, कफ के द्वारा स्रोतों के भर जाने से जिनका शरीर गुरु हो गया है, कर्णशूल, मन्याशूल, शिरःशूल ( Headache ), म्वरनेद्र, गलग्रह, अदित ( Facial - paralysis ), एकाङ्गवात, सर्वाङ्गवात ( Hemiplegia ), पक्षाघात, विनामक - धनुः स्तम्भ - ( Tetanus ) आदि, कोष्ठ में आनाह, विबन्ध, मूत्राघात ( पा ० शुक्राघात ), विशेष जंभाई होना, पार्श्वग्रह, पृष्ठग्रह, कटीग्रह, कुक्षिग्रह, गृध्रसी ( Sciatica ) रोग, मूत्रकृच्छ, अण्डकोषवृद्धि, अंगमर्द, पाद, जानु, ऊरु, जंघा इन अंगों में शूल तथा जकड़ाहट, शोध ( Oedema ) रोग, खल्ली रोग, आमदोष, शीत जन्य रोग, कम्पवान, वानकण्टक, अंगों का संकोच, आयामवात, सर्वाङ्गशूल, अंगों में स्तम्भ ( जकड़ाहट ), गुरुता और शून्यता हो जाने पर स्वेदन किया जाता है ॥ २०-२४ ॥ विमर्श - सामान्यतः सभी प्रकार के वात रोगों में स्वेदन का विधान है | स्वेदन करने से अङ्गों में स्निग्धता आ जाती है जिससे अङ्गों में मृदुता और दोषों में शिथिलता हो जाती है । जैसा कि गुल्म चिकित्सा में बताया गया हैं - ' स्रोतसां मार्दवं कृत्वा जित्वा मारुतमुल्बणम् । भित्त्वा विबन्धं स्निग्धस्य स्वेदो गुल्ममपोहति ॥ ' ( च. चि. अ. ५ ) । वाग्भट में भी स्वेदन करने योग्य रोगियों का वर्णन इस प्रकार है - ' श्वास - कास प्रतिश्याय - हिध्मा - ध्मानविबन्धिषु | स्वरभेदा-निलब्याधिश्लेष्मामस्तम्भगौरवे || अङ्गमर्द कटीपार्श्वपृष्ठकुक्षिनुग्रहे । महत्त्वे मुष्कयोः खल्ल्यामायामे वातकण्टके ॥ मूत्रकृच्छ्रार्बुदग्रन्थि- शुक्राघाताढ्य मारुते । स्वेदं यथायथं कुर्यात्तदौषधविभागतः ॥ ' ( अ.हृ.सू. अ. १७ ) । तिलमाषकुलत्थाम्लघृततैलाभिषौदनैः । पायसैः कृशरैर्मासैः पिण्डस्वेदं प्रयोजयेत् ॥ २५ ॥
गोखरोष्ट्रवराहाश्वशकृद्भिः सतुषैर्यवैः । सिकतापांशुपाषाणकरीषायसपटकैः ॥ २६ ॥
श्लैष्मिकान् स्वेदयेत् पूर्वैर्वातिकान् समुपाचरेत् । पिण्ड स्वेद के द्रव्य - • तिल, उड़द, कुलथी, अम्ल द्रव्य, घृत, तेल, मांस - भात, खीर, खिचड़ी, मांस इन द्रर्यों से पिण्ड स्वेद करना चाहिए । गौ, गदहा, ऊँट, सूअर, घोड़ा इनकी विष्ठा, भूसी १. ' शुक्राघाते ' इति पा. । ३. ' पूर्वैस्तिलादिभिः ' चक्रः । २. ‘ सर्वेष्वेषु ’ यो. । ‘ सर्वाङ्गेषु विकारेषु ज्वरादिषु ' गङ्गाधरः ।
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स्वेदाध्यायः १४ ] सूत्रस्थानम् २ = ७ के साथ जौ, बालू मिट्टी, पत्थर, करीष ( सूखे गोवर का चूरा ), लोहे का चूरा इन द्रव्यों से पिण्ड बनाकर या पिण्डाकार पोटली बनाकर कफ के विकारों में स्वेदन करना चाहिए । पहले बताये हुए तिल, उड़द आदि द्रव्यों का पिण्ड बना कर वातजन्य रोगों में स्वेदन करना चाहिए || विमर्श - पिण्डस्वेद से तात्पर्य यह हैं कि स्वेद करने वाले द्रव्यों का एक पिण्ड बनाकर स्वेद करना, स्वेदन द्रव्यों का निर्माण करते समय तिल, उड़द, कुल्थी, भात आदि द्रव्यों को मास रस और कांजी में पकाकर आवश्यकतानुसार घृत और तैल मिला अथवा खीर, खिचड़ी, मास कापिण्ड बनाकर गर्म कर वातजन्य रोगों में इससे स्वेदन किया जाता है । यह द्रव्य स्निग्ध होता है । स्नेह से वायु का नाश होता है । गौ, गदहा आदि की विष्ठा सूखी होती है । इनकी पिण्डाकार पोटली बना कर कफजन्य रोगों में स्वेदन किया जाता है क्योंकि रूक्ष से कफ का नाश होता है । स्वेदन विधि: - जिस कर्म के द्वारा शरीर तप्त हो जाय या पसीना निकलने लगे उसे ' स्वेदन कर्म ' कहते हैं । यद्यपि यहाँ पिण्ड स्वेद का वर्णन है पर अन्यत्र सुश्रुत, वाग्भट में इस नाम का स्वेद नहीं बनाया गया है । उन ग्रन्थों में ( १ ) तापस्वेद, ( २ ) ऊम्म स्वेद, ( ३ ) उपनाह स्वेद ( ४ ) द्रव स्वेद, ये चार ही मुख्य स्वेद बताये गये हैं । पर आगे ३ ९ वें और ४० वें श्लोक में यहाँ १३ अग्नि स्वेदों का वर्णन किया गया है जो इन चार के अन्दर ही समाविष्ट हो जाते है, इसका वर्णन वहीं किया जायगा । ( १ ) नाप स्वेद – अग्नि से तपाई हुई वस्तु, रूई, धातुओं की पट्टी, ईंट, पत्थर या बालू और नमक की पोटली तथा निर्धूम अनि के ताप से शरीर सेकने को ' ताप स्वेद ' कहा जाता है, यथा — ' तापोऽग्नितप्तवसनफालहस्ततलादिभिः ' ( अ. हृ. सू. १७ ) । इसको सामान्य भाषा में तपाना या सेकना कहते है | ( २ ) ऊष्म स्वेद - यह भाप द्वारा सेक को कहा जाता है । यह स्वेद तीन प्रकार से किया जाता है । ( १ ) ठीकड़ा, पत्थर के गोले, पत्थर की चट्टान, भूमि, ईंट, लोहे के गोले आदि खूब तपा कर उन पर जल या वातहर द्रव्यों का क्वाथ छोड़कर निकले हुए भाप से शरीर प्रदेश का सेक करना, ( २ ) एक चौड़े मुह के बड़े पात्र में द्र वस्तु जैसे जल, दुग्ध, क्वाथ आदि द्रव्यों को रख कर आग पर उबालना और उससे जो भाप निकले, उसके द्वारा शरीर - प्रदेश का सेक करना छिद्र, ( ३ ) एक छोटे मुँह के बड़े घड़े में गरम क्वाथ आदि द्रव को बन्द कर घड़े । के बगल से एक बना, नली फिट कर उसी नली के द्वारा शरीर प्रदेश में भाप से सेक करना ( ३ ) उपनाह स्वेद – इसे सामान्य भाषा में पोटली बाँधना कहते हैं । यह तीसी, जौ,, तेल गहू, आदि के चूर्ण में जल, दूध, गोमूत्र आदि द्रव पदार्थ को दोषानुसार दशाङ्ग लेप आदि बाँधा, जाता घृत है । एक में पका कर जब गाढ़ा हो जाय तो एक कपड़े पर रख कर व्रण - शोथ आदि पर ( ४ ) द्रव स्वेद - जल आदि द्रव पदार्थों को गर्म कर या गर्म काथ मैं अवगाह रोगी को , परिषेक बैठा कर ये या शरीर - प्रदेश पर ऊपर से धार छोड़ते हुए सेक किया जाता है । इसके ऊपर से बार दो भेद होते हैं । गरम क्वाथ आदि में बैठ कर सेक करने को अवगाह स्वेद और गिराने को परिपेक स्वेद कहते हैं । पिण्डस्वेद का तापस्वेद या उपनाहस्वेद या ऊष्म स्वेद में अन्तर्भाव किया जाता है निकलने । क्योंकि उन द्रव्यों की पोटली बना कर सेकने से शरीर में ताप पहुँचाया जाता है अथवा उससे तो वाले भाप से स्वेद होता है यदि उन्हीं द्रव्यों को पिण्डाकार बनाकर पोल्टिश रखा जाय
उसे उपनाह - स्वेद कहा जा सकता है ।
द्रव्याण्येतानि शस्यन्ते यथास्वं प्रस्तरेष्वपि ॥ २७ ॥