चरक संहिता हिन्दी भाष्य — पृष्ठ 51–60
चरक संहिता हिन्दी भाष्य · Chaukhamba · पृष्ठ 51–60
पृष्ठ 51
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
मूत्रों के पृथक् - पृथक् गुण ( २ ) ४५ | ( १ ) शूलनाशक यवागू 22 ४६ आठ प्रकार के दुग्ध दुग्धों के समान्य गुण पृथक् - पृथक् दुग्धों के गुण ४७ शोधनार्थं तीन अन्य वृक्ष शोधनार्थं पुनः तीन वृक्ष उपर्युक्त तीनों का आमयिक प्रयोग द्रव्यसम्बन्धी गणना का उपसंहार ( ५ ) औषधि और चिकित्सक ( Drug & Physician ) " वनवासियों का औषधि - परिचय में महत्त्व " औषधि - नाम - ज्ञान ही सम्पूर्ण नहीं तत्त्वविद कौन? श्रेष्ठ चिकित्सक का लक्षण अविज्ञान तथा विज्ञान औषधि के प्रयोग का परिणाम औषध के सम्यक प्रयोग का महत्त्व सम्यक् प्रयोग का महत्त्व मूर्ख वैद्य की निन्दा " 33 " " 19 ४८ 17 " " 23 ४१ मूर्ख वैद्य द्वारा रोगी से धन लेने की निन्द्रा, " चिकित्सक सदा प्रयत्नशील रहे श्रेष्ठ औषध तथा चिकित्सक चिकित्सा - साफल्य की कसौटी है अध्यायगत विषयों की सूची अपामार्गतण्डुलीयाध्याय २ ( १ ) पञ्चकर्मार्थ द्रव्य - संग्रह ( Drugs 19 ५० ( २-३ ) पाचनी तथा ग्राही पेया ( ४ ) पित्तश्लैष्मिक अतिसार रोगघ्नी पेया ( ५ ) रक्तातिसारनी पेया ( ६-७ ) आमातिसार तथा मूत्रकृच्छ्रघ्नी पेया ( ८ ) क्रिमिनी यवागू ५५ " 39 ५६ " ( ९ -१० ) पिपासा तथा विष में प्रयोगार्थ यवागू, " ( ११-१२ ) कार्श्य तथा मेदोरोग में प्रयोगार्थ यवागू, ” ( १३-१४ ) स्नेहन तथा रूक्षणार्थ पेया 39 ( १५-१६ ) श्वास- कासनी और पक्काशयगत वात ( शूल ) में प्रयोगार्थ पेया ५७ ( १७-१८ ) सारक ( रेचक ) तथा ग्राही यवागू " ( १ ९ -२० ) भेदिनी ( रेचक ) तथा वातानु-लोमनी यवागू ( २१-२२ ) घृत तथा तैल - व्यापद् में प्रयोगार्थं यवागू 27 ( २३-२४ ) विषमज्वर नी तथा कण्ठरोगघ्नी यवागू, ” ( २५-२६ ) शुक्रवहस्रोतस में शूल - शमनार्थं तथा वृष्यप्रयोगार्थं यवागू ५८ ( २७-२८ ) मद रोग तथा क्षुधा रोग ( भस्मक ) में प्रयोगार्थ यवागू यवागू तथा पञ्चकर्म - द्रव्य - विषयक उपसंहार पञ्चकर्मार्थ अन्य द्रव्य ( मूलिनीफलादि ) " अध्याय का उपसंहार आरग्वधीयाध्याय ३ used in Panchakarma Therapy ५१ | बत्तीस सिद्धतम चूर्ण प्रदेह ( Thirty - Two ( १ ) शीर्षविरेचन द्रव्य तथा उनके प्रयोग " ( २ ) वमन - द्रव्य तथा उनके प्रयोग ५२ ( ३ ) विरेचनद्रव्य तथा उनके प्रयोग ( ४ ) आस्थापन बस्ति ( निरूह ) के द्रव्य तथा उनके प्रयोग ( ५ ) अनुवासन बस्ति के द्रव्य तथा उनके प्रयोग पूर्व कर्म युक्ति का महत्व ( २ ) अट्ठाईस यवागू - वर्णन ( TwentyEight Medicated Gruels ) यवागू- -वर्णन 33 Effective Powders & Unguents ) ५ ९ ( १-६ ) बाह्य प्रयोगार्थ ६ प्रकार के चूर्ण तथा लेप,, ५३ ( ७ ) कुष्ठादिलेप ( ८ ) कुष्ठादि चूर्ण 23 ( ९ -१० ) मनःशिलादि तथा तुत्थादि लेप ( ११-१२ ) रसाञ्जनादि तथा करआदि लेप 22 ( १३ ) हरिद्रादि लेप ६० 19 " ६१ " " ६२ ५४ ( १४ ) पाकयुक्त मनःशिलादि लेप " ( १५ ) आरग्वधादिलेप " ( १७-१८ ) वातव्याधिहर लेप " " ( १ ९ -२० ) उदरशूलघ्न तथा वातव्याधिहर लेप 33 ( १६ ) कोलादि लेप
पृष्ठ 52
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
( २१ ) वातरक्तहर लेप ( २२ ) वातरक्त में वेदनाशामक लेप ( २३-२४ ) गोधूमादिलेप तथा शिरःशूल-नाशक लेप ( २५ ) प्रपौण्डरीकादि शिरःशूलनाशक लेप ( द्वितीय ) ( २६ ) पार्श्वशूलनाशक लेप ( २७ ) दाहशामक लेप ( २८ ) दाहशामक लेप ( द्वितीय ) ( २ ९ ) शीतनाशक लेप ( ३० ) विषघ्न लेप ( ३१-३२ ) शिरीषादि स्वेदहर तथा पत्रादि दुर्गन्धहर प्रदेह अध्याय का उपसंहार षड्विरेचनशताश्रितीयाध्याय ४ अध्यायगत विषय वर्णन की भूमिका ६५ ( १ ) छ सौ, वमन विरेचन योग Six Hundred Emetic & purgative preparations. ६६ विभिन्न वामक तथा रेचक द्रव्यों के ६०० योग " विरेचन द्रव्यों के आश्रय 19 ( २ ) पञ्चकषाययोनियाँ तथा पञ्च-कषाय कल्पना [ Five Sources of Decoctives & their Five Varieties of Pharmaceutical Preparation ] 39 पञ्चकषाययोनियाँ पञ्चविध कषाय- कल्पना ( १ ) स्वरस [ Expresse1 Juice ] का लक्षण ( २ ) कल्क का [ Paste ] लक्षण ( ३ ) ६३ पचास महाकषाय ७० 39 ( १ ) जीवनीय [ Nutrients ] महाकषाय ७१ ( २ ) बृंहणीय महाकषाय [ Weight. Promoting - Drugs or Roborants ] ७२ ( ३ ) लेखनीय महाकषाय [ Weight -Reducing - Drugs or Revulsives ],, " ( ४ ) भेदनीय कषाय [ Purgatives ] ६४ ( ५ ) सन्धानीय महाकषाय [ Union-" Promoters ] , ( ६ ) दीपनीय महाकषाय [ Stomachics ६४ and Digestives ] " " ६७ 29 ६८ ( ३ ) काथ [ Decoction ] का लक्षण 29 -( ४ ) शीत [ Cold Infusion ] का लक्षण ६ ९ ( ५ ) फाण्ट [ Hot Infusion ] का लक्षण " पञ्चविध कषाय- कल्पना के गुणों में तारतम्य,, ( ३ ) पचास महाकषाय तथा पांच सौ कषाय [ Fifty Classes of Decoctive & Five Hundred Decoctives ] ७० ( ७ ) बल्य महाकषाय [ Tonics ] " ( ८ ) वर्ण्य महाकषाय [ ComplexionPromoters ] ( ९ ) कण्ट्य महाकषाय [ VoicePromoters ] ( १० ) हृद्य महाकषाय [ Cardiac Tonics ] ७३ ७५ ७७ ७८ " " ( ११ ) तृप्तिघ्न महाकषाय [ Appetisers ] ८० ( १२ ) अर्शोघ्न महाकषाय [ Anti Haemorrhoidals | ( १३ ) कुष्ठन्न महाकषाय [ Curative of Dermatosis ] ( १४ ) कण्डून महाकषाय [ AntiPruritics ] ( १५ ) कृमिघ्न महाकपाय [ Anthelmintics ] ८१ 99 ८२ 99 * ( १६ ) विषघ्न महाकषाय [ Anti - dotes ] ८३ ( १७ ) स्तन्यजनन महाकषाय [ Galactogogues ] ( १८ ) स्तन्यशोधन महाकषाय [ GalactoPurifiers ] ( १ ९ ) शुक्रजनन महाकषाय [ Semeno or Spermo - Poietic ] ( २० ) शुक्रशोधन महाकषाय [ Semeno or Spermo - Purifiers ] ( २१ ) स्नेहोपग महाकषाय [ Adjuvantsin Oleation Therapy ] ( २२ ) स्वेदोपग महाकषाय [ Adjuvantsin Sudation Therapy ] " " ८४ " " ८५
पृष्ठ 53
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
( २३ ) वमनोपग महाकषाय [ Adjuvants. ( ४ ) in Emetic Therapy ] ८५ ( २४ ) विरेचनोपग महाकषाय [ Adjuvante -in Purgative Therapy ] " " ( २५ ) आस्थापनोपग महाकषाय [ Adju: -ants in Non - oily Enemata ] ८६ ( २६ ) अनुवासनोपग महाकषाय [ Adjuvants in Oily - Enemata ] ( २७ ) शिरोविरेचनोपग महाकषाय [ Adjuvats in Errhines ] ( २८ ) छर्दि - निग्रहण महाकषाय [ AntiEmetics ] ( २ ९ ) तृष्णानिग्रहण महाकषाय [ AntiThirst drugs ] ( ३० ) हिक्का - निग्रहण महाकषाय [ AntiHicough drugs ] ( ३१ ) पुरीपसंग्रहणीय महाकषाय [ Intestinal Astringents ] " ( ३२ ) पुरीषविरजनीय महाकषाय [ Corre -ctives of Fecal - Pigments ] ( ३३ ) मूत्रसंग्रहणीय [ Urinary Astringents ] ( ३४ ) मूत्रविरजनीय महाकषाय [ Correc-" 3 " ८७ 19 ८८ ८ ९ tive of Urinary Pigments ] " ( ३५ ) मूत्रविरेचनीय महाकषाय [ Diuretics ],, ( ३६ ) कासहर महाकषाय [ Bronchial Sedatives ] ( ३७ ) श्वासहर महाकषाय [ Bronchial Anti - Spasmodics ] ( ३८ ) शोथहर महाकषाय [ Anti - Drposy drgs ] ९ ० ९ १ 19 ( ३ ९ ) ज्वरहर महाकषाय [ Anti - Pyretics ] ९ २ ( ४० ) श्रमहर महाकपाय [ Anti - Fatigue drugs or Acopics ] ( ४१ ) दाहप्रशमन महाकषाय [ Anti - Buruing Syndrome drugs or Refrigerants ] " ( ४२ ) शीतप्रशमन महाकषाय [ Calefac-९ ३ ( ४३ ) उदर्द प्रशमन महाकपाय [ AntiUrticarials ] ( ४४ ) अङ्गमप्रशमन महाकषाय [ Resto -ratives ] ( ४५ ) शूलनशमन महाकपाय [ Analge sics ] ( ४६ ) शोणितस्थापन महाकपाय [ Haemostatics ] ( ४७ ) वेदनास्थापन महाकपाय [ Anod. ynes ] ( ४८ ) संज्ञानापन महाकषाय [ Resuscitatives ] ( ४ ९ ) प्रजास्थापन महाकषाय [ Procreants ] 1 ) ( ५० ) वयःस्थापन महाकषाय [ Rejuvenators ] पचास महाकषायों का उपसंहार अतिसंक्षेप या अतिवस्तार से वर्णन का प्रयोजन ( ४ ) कषाय संख्या - पूर्तिविषयक प्रश्न [ Question About Total Number of Decoctives ] " पाँच सौ कषायों की संख्या- पूर्ति के बारे में शङ्का शंका का समाधान अध्याय में वर्णित विषय - संग्रह मात्राशितीयाध्याय ५ ९ ४ " 9 ९ ५ " " ९ ६ ९ ७ 29 ९ ८ " ९९ 27 १०० 39 ( क ) आहारविषयक विचार [ Diet ] १०२ आहार की मात्रा तथा अग्निबल का सम्बन्ध, आहारमात्रा की निश्चयात्मक विधि १०३ स्वभावतः लघु तथा गुरु द्रव्यों का मात्रा -सापेक्षत्व लघु तथा गुरु आहार द्रव्यों का वैज्ञानिक १०४ आधार [ Scientific Explanation ],, आहार मात्रा ज्ञान की आवश्यकता तथा उससे लाभ मात्रापूर्वक भोजन से लाभ १०५ " ients ] ९ ४गुरु आहार द्रव्यों के प्रयोग का विधान १०६
पृष्ठ 54
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अभ्यास करने योग्य आहार द्रव्य ( ५ ) १०६ । धूमपान के अतियोग का लक्षण [ Sympt-लगातार प्रयोग किये जाने वाले आहार द्रव्य, आहार द्रव्यों के प्रयोग का व्यापक सिद्धान्त १०७ ( ख ) स्वस्थत्त वर्णन [ Personal Hygiene ] ११३ स्ववृत्त के विषय का प्रारम्भ ( १ ) अञ्जन [ Eye Salves ] सौवीरानन तथा रसाञ्जन का प्रयोग नेत्ररोग में कफदोष के प्राधान्य में हेतु दिन में अञ्जन का प्रयोग न करने में हेतु अञ्जन से लाभ के बारे में उपमा " " ११४ " " " ( २ ) धूमपान [ Smoking ] _ ११६ हरेणुकादि प्रयोगिक धूमवर्ति का निर्माण तथा प्रयोगविधि वसादिनैहिकी धूम्रवर्ति अपराजितादि शिरोवैरेचनिक धूम धूमपान से लाभ [ Advantages ] प्रायोगिकधूमपान के आठ कालों का वैज्ञा-निक आधार तथा वर्णन कौन धूम कितनी बार पीना चाहिये सम्यक् धूमपान के लक्षण [ Signs Proper Smoking ] ११७ " " ११८ 22 ११ ९ of अकाल में धूमपान तथा अति धूमपान के उपद्रव [ Complications ] " अकालपीत और अतिपीत धूमजन्य उपद्रवों की शान्ति के उपाय [ Managemen nt of Complications ] १२० धूमपान के अयोग्य रोगी [ Contra - Ind ications ] नासिका से धूम निकालने में हानि नाक से धूमपान करने की विधि घूमनेत्र का परिमाण [ Size of Cigarette Holder ] घूमनेत्र से पान में लाभ उचित धूमपान के लक्षण [ Symptoms 29 " " १२१ oms of Over Indulgence of Smoking ] १२३ ( ३ ) नस्य से लाभ | अणुतैल की निर्माण - विधि ( ४ ) दन्तपवन ( दातौन ) का वर्णन दातौन करने से लाभ उत्तम दातौन " " " १२५ " 59 ( ५ ) जिल्हा - निर्लेखन का वर्णन तथा उससे लाभ १२६ ( ६ ) मुख में सुगन्धित द्रव्यों का धारण " ( ७ ) स्नेहगण्डूष से लाभ १२७ ( ८ ) सदा शिर पर तैल धारण करने से लाभ, ( ९ ) सदा कान में तैल डालने से लाभ १२८ ( १० ) शरीर में तैलमर्दन की प्रशंसा अभ्यङ्ग के कार्य का वैज्ञानिक आधार [ Scientific Basis ] तैल - अभ्यङ्ग से लाभ पैरों में तैलमर्दन से लाभ ( ११ ) शरीरमार्जन [ Sponging ] से लाभ स्नान [ Bath ] से लाभ ( १२ ) स्वच्छ वस्त्रों के धारण से लाभ ( १३ ) सुगन्ध द्रव्यों के लेप और माला धारण से लाभ ( १४ ) रत्न और आभूषण धारण करने से लाभ १२ ९ " १३० " " ( १५ ) पैर एवं मलमार्गों की शुद्धि से लाभ १३१ ( १६ ) क्षौरकर्म से लाभ " ( १७ ) जूते या खड़ाऊँ ( पादत्र ) धारण करने से लाभ ( १८ ) छाता धारण करने से लाभ ( १ ९ ) दण्डधारण करने से लाभ शारीरिक क्रियाओं के नित्य परिपालन में " " सर्तकता निमित्त उपमा स्वस्थवृत्त प्रकरण का उपसंहार १२२ " " of Proper Smoking ] धूमपान के अयोग के लक्षण [ Symptoms of Low Indulgence of Smoking ],, अध्यायगत विषय का उपसंहार तस्याशितीयाध्याय ६ " " १३२ 99 " " १३३ ( क ) पऋतु ( आदानकाल तथा विस-काल ) में प्राकृतिक तथा शारी-fr fafa [ Condition of Nature & Body in Six Seasons ] १३४
पृष्ठ 55
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अध्याय की भूमिका स्वस्थवृत्त - पालन के लिये ऋतु - विभाग ( ६ ) १३४ | ( ६ ) शरद् ऋतुचर्या 39 [ Regimen of Beginning of Autu-विसर्गकाल का वर्णन १३५ mn Season ] १४५ आदानकाल का वर्णन १३६ शरदऋतु में पित्त का प्रकोप आदानकाल में प्राकृतिक तथा शारीरिक शरदऋतु में सेवनीय आहार - विहार " स्थिति १३७ विसर्गकाल में प्राकृतिक तथा शारीरिक शरदूऋतु में त्याज्य आहार - विहार हंसोदक का विवरण स्थिति 39 आदान तथा विसर्गकाल में शारीरिक बल की स्थिति १३८ ( ख ) षड्ऋतुचर्या [ Regimen of Six Seasons ] १३ ९ ( १ ) हेमन्तऋतुचर्या [ Regimen of Winter Season ] शीत ( हेमन्त ) ऋतु में जठराग्नि के बलवान् होने में हेतु 39 शीत ( हेमन्त ) ऋतु में वायु का प्रकोप हेमन्त ऋतु में आहार हेमन्त ऋतु में विहार हेमन्त ऋतु में वर्जनीय आहार - विहार ( २ ) शिशिरऋतुचर्या [ Regimen of Dewy Season ] १४१ शिशिरऋतुचर्या का आधार 99 " १४० शरदऋतु में अनुकूल विहार ( ग ) सात्म्य - वर्णन [ Homologation ] ओकसात्म्य का वर्णन सात्म्य - वर्णन ( उपसंहार ) अध्यायगत विषयों का उपसंहार नवेगान्धारणीयाध्याय ७ ( १ ) अधारणीय वेगवर्णन [ Description of Non - Suppre ssible Urges ] तेरह अधारणीय वेग अधारणीय वेगों के धारण से रोगोत्पत्ति " ( १ ) मूत्रवेग रोकने से होने वाले रोग मूत्रवेगावरोधजन्य रोगों की चिकित्सा ( २ ) पुरीष वेगावरोधजन्य रोग " " पुरीषवेगावरोधजन्य रोगों की चिकित्सा १४६ 39 १४ ९ 23 " " 29 १५० 23 " " १५१ 23 " " १५२ " ( ३ ) शुक्रवेगावरोधजन्य रोग १५३ 39 ( ४ ) अपानवायु का वेग रोकने से होने 29 शुक्रवेगावरोधजन्य रोगों की चिकित्सा शिशिर ऋतु में वर्ज्य आहार ( ३ ) वसन्त ऋतुचर्या [ Regimen of Spring Season ] वसन्तऋतुमें त्याज्य आहार - विहार वसन्त ऋतु में सेवनीय आहार - विहार ( ४ ) ग्रीष्मऋतुचर्या [ Regimen of Summer Season ] ग्रीष्मऋतुचर्या का सैद्धान्तिक आधार ग्रीष्म ऋतु में वर्ज्य आहार - विहार ग्रीष्म ऋतु में विहार ( ५ ) वर्षाऋतुचर्या [ Regimen of Rainy Season ] १४३ वर्षा ऋतुचर्या का सैद्धान्तिक आधार वर्षाऋतु में वर्ज्य आहार - विहार वर्षाऋतु में सेवनीय आहार - विहार " " वाले रोग अपानवायु का वेग रोकने से उत्पन्न रोगों की चिकित्सा १४२ | ( ५ ) वमन का वेग रोकने से होने वाले रोग 22 27 99 " " १४४ वमन का वेग रोकने से उत्पन्न रोगों की चिकित्सा ( ६ ) क्षवथु ( छींक ) का वेग रोकने से होने वाले रोग क्षवथु ( छींक ) का वेग रोकने से होने वाले रोगों की चिकित्सा ( ७ ) उद्गार ( डकार ) वेग के धारण करने से होने वाले रोग तथा उनकी चिकित्सा १५४ " १५५ " 3
पृष्ठ 56
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
( ७ ) ( ८ ) जृम्भा ( जम्भाई ) वेग के धारण करने से होने वाले रोग तथा उनकी चिकित्सा १५५ ( ९ ) क्षुधा वेग के धारण करने से होने वाले रोग तथा उनकी चिकित्सा १५६ ( १० ) पिपासा ( प्यास ) वेग के धारण करने से होने वाले रोग तथा उनकी चिकित्सा ( ११ ) बाष्प ( आँसू ) वेग के धारण करने " से होने वाले रोग तथा उनकी चिकित्सा, ( १२ ) निद्रा वेग के धारण करने से होने वाले रोग तथा उनकी चिकित्सा १५७ ( १३ ) श्रमजन्य निःश्वासवेग के धारण करने से होने वाले रोग तथा उनकी चिकित्सा 22 अधारणीय वेग न रोकना ही उचित है १६० ) धारणीय वेगवर्णन [ Descrip tion of Suppressible Urges ] धारणीय वेग का सैद्धान्तिक आधार 23 ( १ ) बुरे मानसिक धारणीय वेग ( २ ) बुरे वाचिक धारणीय वेग ( ३ ) अशस्त शारीरिक धारणीय वेग उपर्युक्त वेग - धारण से लाभ 27 " " 99 " " ~ ( ३ ) व्यायाम [ Exercise ] वर्णन १६१ व्यायाम की परिभाषा व्यायाम से लाभ अधिक व्यायाम से हानि व्यायाम के लक्षण 29 निम्नांकित का अधिक सेवन न करें व्यायाम के अयोग्य पुरुष 23 " | प्रकृति के विरुद्ध गुण का सेवन ही स्वास्थ्य-वर्द्धक होता है १६६ ( ६ ) निज रोग की उत्पत्ति न होने देने का प्रकरण [ Preventive Methods for Endogenous Diseases ] १६७ मलायन ( बाह्यस्रोतस् ) तथा मलवृद्धि - क्षय के लक्षण व्याधिविपरीत तथा हेतुविपरीत चिकित्सा स्वस्थवृत्त का पालन करना चाहिए दोषों का निर्हरण - काल 33 १६८ " पञ्चकर्म तथा रसायन वाजीकरण का प्रयोग १६ ९ पञ्चकर्म तथा रसायन - वाजीकरण से लाभ " " निज रोगों की अनुत्पत्ति से सम्बन्धित उपसंहार ( ७ ) आगन्तुज तथा मानसिक रोगों के हेतु तथा चिकित्सा [ Aetiology & Treatment of Endogenous & Mental Diseases ] १७० आगन्तुक तथा मानसिक रोगों का कारण प्रज्ञापराध आगन्तुक रोगों की अनुत्पत्ति का उपाय आप्तोपदेश- पालन से लाभ " " 2 " साथ न करने योग्य पुरुष १६२ साथ करने योग्य पुरुष सदा हित सेवन करना चाहिये उदाहरणार्थ दधि का प्रकरण 37 दधिसम्बन्धी उपसंहार ( ४ ) हिताहित के सेवन तथा त्याग-विधि का वर्णन [ Method of Gradual Acquirement of Wholesome and Withdrawal of Unwholesome Habits ] १६३ क्रमशः त्याग या सेवन का एवं उसकी विधि का वर्णन ( पादांशिक का वर्णन ),, पादांशिक क्रमविधि से लाभ ( ५ ) शारीरिक प्रकृति का वर्णन अध्याय गतविषय का उपसंहार इन्द्रियोपक्रमणीयाध्याय ८ " " १७१ 99 " " " १७२ ( १ ) पञ्चपञ्चक [ Eive Pentads ] १७२ पचपञ्चक का वर्णन " मनसम्बन्धी विषय प्रारम्भ १७३ मन एक है अनेक नहीं १७४ १६५ बाहुल्य ( अधिकता ) के अनुसार सात्त्वि -कादि वर्गीकरण १७५ इन्द्रियों के विषय ग्रहण की प्रक्रिया १७६ " " [ Description of Constitution of Body ] ( १ ) पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ
पृष्ठ 57
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
( २ ) पाँच ज्ञानेन्द्रियों के पाँच द्रव्य ( ३ ) पाँच ज्ञानेन्द्रियों के पाँच अविष्ठान ( स्थान ) ( ४ ) पाँच ज्ञानेन्द्रियों के पाँच अर्थ ( कार्य-विषय ) ( ५ ) पाँच ज्ञानेन्द्रियों की पाँच इन्द्रिय-बुद्धियाँ 39 अध्यात्म - द्रव्यगुण - संग्रह ( वर्णन ) इन्द्रिय - भेद से उनमें महाभूतों का आधिक्य तथा उनके अपने ही विषय ग्रहण करने में हेतु १७ ९ इन्द्रियों के विषयों से अनियोगादि या समयोग का परिणाम मन के भी अतियोगादि इन्द्रियों ( मन के साथ ) के स्वस्थ रखने तु ( २ ) सदवृत्त - वर्णन ( a ) १७६ | ( ११ ) और भी - सद्वृत्तवर्णन ( हवन कर्म की विधि ) १७७ ( १२ ) सद्वृत्त - वर्णन का उपसंहार अध्यायगत विषय का उपसंहार १७८ १८० १८१ [ Description of Right Conducts— Partly Medical Ethics ] सवृत्तपालन से लाभ " ( १ ) सद्वृत्तवर्णन ( क्या - क्या करना चाहिये ) १८२ ( २ ) और भी - सद्वृत्तवर्णन ( क्या - क्या नहीं करना चाहिये ( ३ ) और भी - सद्वृत्तवर्णन ( किस प्रकार १८३ न कहे गये सद्वृत्त पालन में सामान्य सिद्धान्त खुड्डाकचतुष्पादाध्याय ६ ( १ ) चिकित्सा के चतुष्पाद [ Four Limbs ( Basic factors ) of Treatment ] चिकित्सा के चार पाठ अस्वस्थ ( विकृति ) तथा स्वस्थ ( प्रकृति ) के लक्षण चिकित्सा की परिभाषा | ( १ ) वैद्य के गुण [ Qualities of Physicians ] ( २ ) उत्तम औषधि के गुण [ Qualities of Drugs ] ( ३ ) उपचारक ( परिचारक ) के गुण १८ ९ " १ ९ ० १ ९ १ १ ९ २ १ ९ ३ 35 [ Qualities of Nursing Staffs ] १ ९ ४ ( ४ ) रोगी के गुण [ Qualities of [ Patients ] चिकित्सक की प्रधानता चिकित्सक की प्रधानता में उदाहरण [ " १ ९ ५ अयोग्य व्यक्ति से चिकित्सा कराने का निषेध १ ९ ७ भोजन करना चाहिये ) १८४ ( ४ ) और भी - सद्वृत्तवर्णन ( मलत्याग कहाँ नहीं करना चाहिये ) प्राणाभिसर वैद्य के लक्षण " " १८५ राजा के योग्य वैद्य के लक्षण " शस्त्रादि के सम्बन्ध में पात्र की महत्ता १ ९ ८ १८६ 19 । ( ५ ) और भी - सद्वृत्तवर्णन ( मैथुन - विधि में निषेध ) ( ६ ) और भी - सद्वृत्तवर्णन ( पूज्य लोगों का तिरस्कार नहीं करना चाहिये ) १८७ ( ७ ) और भी - सद्वृत्तवर्णन ( पठन - पाठन निषेव ) ( ८ ) और भी - सद्वृत्तवर्णन ( सामाजिक व्यवहार में निषेध ) ( ९ ) और भी - सद्वृत्तवर्णन ( मानसिक व्यवहार में निषेध ) 39 १८८ । ( १० ) और भी - सद्वृत्तवर्णन ( कार्यसम्बन्धी निषेध ) 39 उत्तम वैद्य के ६ गुण शास्त्र और बुद्धि का सम्बन्ध चिकित्सक को सदा गुण बढ़ाना चाहिये १ ९९ वैद्य की चार वृत्तियाँ अध्यायगत विषयों का उपसंहार महाचतुष्पादाध्याय १० ( १ ) चतुष्पाद की सार्थकता से सम्ब-न्धित विवाद [ Doubts about the Utility of Four Limbs of Treatment ] २००
पृष्ठ 58
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
( ६ ) चतुष्पाद की सार्थकता ( क ) मैत्रेय का चतुष्पाद विषयक विचार ( पूर्वपक्ष ) [ Views of Maitreya ] मैत्रेय की शंका ( ख ) आत्रेय का चतुष्पादविषयक सार्थकता समर्थन ( उत्तरपक्ष ) [ Views of Atreya ] आत्रेय का समाधान उपर्युक्त के बारे में प्रत्यक्ष प्रमाण ( २ ) साध्यासाध्यता - सम्बधी विस्तृत विचार | Prognosis ] 27 साध्यासाध्यता- विचार से लाभ हानि 29 साध्यासाध्यता के प्रकार 99 २०० | ( ४ ) पर निर्माण को जन्म में कारण मानने " " " वाले पक्ष की शङ्का का समाधान ( ५ ) यदृच्छा को जन्म में कारण मानने वाले पक्ष की शङ्का का समाधान बुद्धि- प्रदीप से परीक्षा ( २ ) चतुर्विध परीक्षा ( चार प्रकार के प्रमाण ) [ Four Fold Methods of Investigation ] चार प्रकार के प्रमाण २०१ २०३ ( १ ) आप्त तथा आप्तोपदेश का लक्षण [ Signs of Authorities ] ( २ ) प्रत्यक्ष की परिभाषा [ Definition of Direct Observation ] २१४ 99 २१५ " २१६ २१७ ( ३ ) अनुमान की परिभाषा [ Definition ( १ ) सुखसाध्य रोगों का स्वरूप २०४ of Inference ] २१ ९ ( २. ) कृच्छ्रसाध्यरोगों का स्वरूप २०५ २२१ ( ३ ) याप्य रोगों का स्वरूप ( ४ ) प्रत्यारुदेव ( अनुपक्रम ) रोगों का रोग - परीक्षा के बाद चिकित्सा स्वरूप साध्यासाध्यता से लाभ अध्यायगत विषयों का उपसंहार तित्रैषणीयाध्याय ११ ( १ ) तीन एषणायें [ Three Parsa. its ] तीन एषणायें ( १ ) प्राणैषणा [ Porsuit of Life ] " ( २ ) धनेषण [ Pursuit of Wealth ] २० ९ ( ३ ) परलोकैषणा [ Pursuit of further World ] 33 ( १ ) पुनर्भव को अप्रत्यक्ष ( परोक्ष ) के कारण न मानने वाले पक्ष की शंका का समाधान प्रत्यक्ष ज्ञान में बाधक हेतु [ Exceptions of Direct observation ] ( २ ) माता - पिता को जन्म में कारण मानने वाले पक्ष की शङ्का का समाधान ( ३ ) स्वभाव को जन्म में कारण मानने वाले पक्ष की शङ्का का समाधान " " २०७ ( ४ ) युक्ति प्रमाण का उदाहरण युक्ति की परिभाषा [ Definition of Reason or Experiment ] " चतुर्विध परीक्षा ( प्रमाण ) का उपसंहार " 3 " ( ३ ) चतुर्विधप्रमाण से पुनर्भव ( पुन-जन्म ) की सिद्धि [ Establishme " nt of Re - birth Theory by Four Fold Methods of Inves. tigation ] २२२ ( १ ) आप्तोदेश प्रमाण से पुनर्जन्म की सिद्धि अन्य प्रमाण इसी विषय में अन्य ऋषि का मत 27 " " 99 ( २ ) प्रत्यक्ष प्रमाण से पुनर्जन्म की सिद्धि २२३ ( ३ ) अनुमान प्रमाण से पुनर्जन्म की सिद्धि २२५ ( ४ ) युक्ति प्रमाण से पुनर्जन्म की सिद्धि 25 परलोकैषणा का उपसंहार २२६ ( ४ ) तीन - तीन ( त्रिविध ) प्रकार के अन्य सात विषय [ Seven Other Triads ] २२७ २११ २१२ ( १ ) तीन उपस्तम्भ 39 ( २ ) त्रिविल २२८ 33 ( ३ ) त्रिविधरोग - आयतन ( कारण ) २२ ९ ( क ) इन्द्रियार्थी का अतियोगादि २१३ स्पर्शनेन्द्रिय का व्यापकत्व " २३०
पृष्ठ 59
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
( १० ) ( ख ) कर्म का मिथ्यायोगादि २३१ और भी - कर्म का मिथ्यायोग २३२ प्रज्ञापराध ( ग ) काल का अतियोगादि रोग आरोग्य के कारण युक्ति ही सर्वोपरि ( ४ ) त्रिविध रोग मानस - रोग की चिकित्सा मानस रोग चिकित्सा का उपसंहार ( ५ ) त्रिविध रोगमार्ग ( क ) शाखा में होने वाले ( बाह्य रोगमार्गज ) रोगों की संख्या ( ख ) मर्म अस्थि- सन्धि में होने वाले ( मध्यम रोगमार्गज ) रोगों की संख्या ( ग ) कोष्ठ में होने वाले ( आभ्यन्तर रोग-मार्गज ) रोगों की संख्या ( ६ ) त्रिविध वैद्य ( क ) छद्मचर वैद्य के लक्षण ( ख ) सिद्धसाधित वैद्य के लक्षण ( ग ) वैद्य - गुणयुक्त वैद्य के लक्षण ( ७ ) त्रिविध औषध ( क ) अन्तःपरिमार्जन की परिभाषा ( ख ) वहि: परिमार्जन की परिभाषा ( ग ) शस्त्रप्रणिधान की परिभाषा ( ५ ) रोग की प्रारम्भिक अवस्था में ही चिकित्सा का औचित्य [ Nece ssity of Treatment in Early Stage of the Disease ] २४० उपसंहार अध्यायगत विषयों का उपसंहार वातकलाकलीयाध्याय १२ ( १ ) वात - सम्बन्धी तद्विद्य - सम्भाषा-परिषद् [ Symposium on Vata Dosha ] वातसम्बन्धी विचारार्थ प्रश्नावली १ प्रश्न: बात के गुण क्या हैं? ( किंगुणो वायुः ), उत्तर २४४ २ प्रश्न: वात प्रकोप के कारण कौन हैं? ( किमस्य प्रकोपणम् ), उत्तर २३३ २३४ 22 २३५ 93 " २३७ " " 27 " " २३८ 29 २३ ९ " " " २४१ " २४३ 22 29 ३ प्रश्न: वातशमन के कारण क्या हैं? ( उपशमनानि वाऽस्य कानि ), उत्तर २४५ ४ प्रश्न: असङ्घात ( अमूर्त ) वात के प्रकोप तथा प्रशमन की प्रक्रिया क्या है? ( कथं चैनमसङ्घातवन्तमनवस्थित-मनासाद्य प्रकोपण प्रशमनानि प्रकोप-यन्ति प्रशमयन्ति वा ), उत्तर ५ प्रश्न: प्राकृत ( अकुपित ) शारीर- वायु के कर्म क्या हैं? ( कानि चास्य अकु-पितस्य शरीरचरस्य शरीरेषु चरतः कर्माणि ), उत्तर २४६ ६ प्रश्न: विकृत ( कुपित ) शारीर- वायु के कर्म क्या हैं? ( कानि चास्य कुपि तस्य शरीरचरस्य शरीरेषु चरतः कर्माणि ), उत्तर २४८ ७ प्रश्न: प्राकृत ( अकुपित ) लोक- वायु के कर्म क्या हैं? ( कानि चास्य अकु पितस्य अशरीरचरस्य बहिःशरीरेषु चरतः कर्माणि ), उत्तर २४ ९ ८ प्रश्न: विकृत ( प्रकुपित ) लोक वायु कर्म क्या हैं? ( कानि चास्य कुपि -तस्य अशरीरचरस्य बहिःशरीरेषु चरतः कर्माणि ), उत्तर २५० वायु के चिकित्सेतर कर्म का वर्णन मरीचिका, उपर्युक्त वर्णन की सार्थकता के बारे में प्रश्न मरीचि के उपर्युक्त प्रश्नसम्बन्धी वायविद का उत्तर ( २ ) पित्तसम्बन्धी तद्विद्य सम्भाषा परिषद् [ Symposium on Pitta Dosha ] " प्राकृत तथा विकृत पित्त के कर्म ( ३ ) कफसम्बन्धी तद्विद्यसम्भाषा-परिषद् [ Symposium on Kapha Dosha प्राकृत तथा विकृत कफ के कर्म ( ४ ) त्रिदोषसम्बन्धी तद्विद्य सम्भाषा में पुनर्वसु आत्रेय का निर्णय [ Decisions of Punarvasu Atreya on Tri - Dosha ] " " " २५१ 22 २५२ " "
पृष्ठ 60
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
भगवान् पुनर्वसु आत्रेय का त्रिदोष ( वात, पित्त, कफ ) के विषय में मत २५२ ( ११ ) आत्रेय मत का समर्थन तथा उपसंहार २५३ अध्यायगत विषयों का उपसंहार स्नेहाध्याय १३ विषयप्रवेश २५५ स्नेहकर्म के बारे में प्रश्नावली [ Questi ons Regarding Sneha - Karma ],, ( १ ) प्रश्न: स्नेह की क्या योनियाँ हैं? ( किं योनयः ), उत्तर २५६ ( क ) स्थावर स्नेहन की योनि [ Source of Sneha ( Fats ) of Vegetable Origin ] " " ( ख ) जङ्गम स्नेह की योनि ] Source of Sneha ( Fats ) of Animal Or. igin ] 22 तिलतैल तथा एरण्डतैल की श्रेष्ठता ( २ ) प्रश्नः स्नेह के कितने भेद ( प्रकार )? ( कति स्नेहाः ), उत्तर २५७ ( ३ ) प्रश्न: चतुर्विध स्नेहों के पृथक् पृथक् क्या गुण हैं? ( के च स्नेहगुणाः पृथक् ), उत्तर ( १ ) घृत के गुण ( २ ) तैल के गुण ( ३ ) वसा के गुण ( ४ ) मज्जा के गुण ( ४-५ ) प्रश्न: स्नेहपान का ( क ) काल तथा ( ख ) अनुपान क्या और किसके लिये ( कालानुपाने के कस्य ), प्रश्न ( ४ ) का उत्तर स्नेहपान - काल: दिन तथा रात्रि के अनुसार विपरीतकाल में स्नेहपान से हानि ( ५ ) प्रश्न: का उत्तर- स्नेह न अनुपान 99 २५८ 29 २५ ९ २६० २६१ का स्नेह की २४ प्रविचारणायें ( Twenty four Preparations Employed for Oleaiton Therapy २६२ | ( ६ ) प्रश्न: स्नेह - विचारणायें कितनी हैं और क्या हैं? ( कति काश्च विचारणाः ), उत्तर अच्छ ( स्वच्छ ) स्नेह का प्रविचारणा की गणना में निषेध चौंसठ ( ६४ ) प्रकार को प्रविचारणायें ( ७-८ ) प्रश्न: स्नेह की मात्रा तथा मान-२६२ २६४ " प्रमाण ( कति मात्राः कथंमानाः, उत्तर " स्व स्नेह की त्रिविध मात्रायें २६५ ( ९ ) प्रश्न: स्नेह की कौन मात्रा किसके लिये उपयोगी ( का च केषूपदिश्यते ), उत्तर, " ( १ ) स्नेह की प्रधान मात्रा सेवन करने योग्य रोगी और रोग स्नेह की प्रधान मात्रा सेवन से लाभ ( २ ) स्नेह की मध्यम मात्रा के सेवन योग्य रोग और रोगी स्नेह की मध्यम मात्रा के गुण ( ३ ) स्नेह की हस्व - मात्रा सेवन करने योग्य रोग तथा रोगी ह्रस्व मात्रा में सेवन किये गये स्नेह के गुण ( १० ) प्रश्न: चतुर्विध स्नेह में कौन किसके लिये हिनकारी ( कश्च केभ्यो हितः स्नेहः ), उत्तर ( १ ) घृत सेवन के योग्य रोग और रोगी 33 २६६ " 2 27 " " " " २६७ " ( २ ) तेल सेवन के योग्य रोग और रोगी 29 ( ३ ) वसा सेवन के योग्य रोग और रोगी २६८ ( ४ ) मज्जा सेवन के योग्य रोग और रोगी " ( ११ ) प्रश्न: स्नेह का प्रकर्षकाल ( प्रकर्षः स्नेहने च कः ), उत्तर 97 ( १२ ) प्रश्न: स्नेहन के योग्य पुरुष कौन? ( स्नेह्या: के ), उत्तर २६ ९ ( १३ ) प्रश्न: स्नेह के अयोग्य पुरुष कौन? स्नेह्याः केन च ), उत्तर ( १४ ) प्रश्न: सम्यक् स्निग्ध व्यक्ति के लक्षण ( स्निग्धलक्षणम् ), उत्तर ( १५ ) प्रश्न: अस्निग्ध व्यक्ति के लक्षण ( अस्निग्धलक्षणम् ), उत्तर ( १६ ) प्रश्न: अतिस्निग्ध व्यक्ति के लक्षण ( अतिस्निग्धलक्षणम् ), उत्तर २७१ 29 27