चरक संहिता हिन्दी भाष्य — पृष्ठ 431–440

चरक संहिता हिन्दी भाष्य · Chaukhamba · पृष्ठ 431–440

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३४२ चरकसंहिता • वृद्धि त्रिदोष में युगपत् वृद्धि तथा क्षय से १२ मैद -दोषों के जो विकल्प होते हैं उनका भी वर्णन कर रहा हूं । सनता एवं एक दोष का क्षय इस प्रकार ६ विकल्प और दो भाँति ३ विकल्प और एक दोष की वृद्धि और दो दोषों का १२ होते हैं ॥ ४३-४४ ॥ विमर्श - इस विकल्प में १२ भेद है । जैसे— और क्षय के अतिरिक्त अन्य दूसरे एक दोप की वृद्धि और एक दोष की दोषों की वृद्धि, एक दोष का क्षय इस क्षय इस प्रकार तीन, कुल विकल्प वृद्ध सम क्षीण वृद्ध सम क्षाण १ वात पित्त कक ४ पित्त वात कफ २ वात कफ पित्त ५ कफ पित्त वात ३ पित्त कफ वात ६ कफ वात पित्त द्वितीयः, पित्तश्लेष्मभ्यां वृद्धाभ्यां तृतीयः, इति संसर्गेण नव । पृथग् व्यस्तैर्वृद्वैस्रयः; तद्यथा - वातो वृद्धः, पित्तं वृद्धं, श्लेष्मा वृद्ध:, एवं वृद्धैः पञ्चविंशतिः । वृद्धा पञ्चविंशतिमुक्त्वा क्षयेऽपि पञ्चविंशतिं दर्शयति - यथेत्यादि । यथा वृद्वैर्दोषैः पञ्चविंशति-स्तन क्षीणैरपि पञ्चविंशतिर्विकाराः स्युः । संनिपाते त्रयोदश, संसर्गे नव, पृथक् त्रयश्चेति । तद्यथा-वानः क्षीणः पित्तश्लेष्माणावतिक्षीणौ १, पित्तं क्षीणं वातश्लेष्माणावतिक्षीणौ २, श्लेष्मा क्षीणः वातपित्ते अतिक्षीणे ३ इति क्षीणानां संनिपतितानां मध्ये द्वयोरतिशये त्रयः । वातपित्ते क्षीणे ष्मा अतिक्षीणः १, पित्तश्लेष्माणौ क्षीणौ वातोऽतिक्षीणः २, वातश्लेष्माणौ क्षीणौ पित्तमतिक्षीणम् ३, इति एकस्यातिशये त्रयः । श्लेष्मा क्षीणः पित्तं क्षीणतरं वातः क्षीणतमः १, वातः क्षीणः श्लेष्मा क्षीरः पित्तं क्षीणतमम् २, पित्तं क्षीणं श्लेष्मा क्षीणतरो वातः क्षीणतमः ३, श्लेष्मा क्षीणो वातः क्षीणतरः पित्तं क्षीणतमम् ४, वातः क्षीणः पित्तं क्षीणतरं श्लेष्मा क्षीणतमः ५, पित्तं क्षीणं वातः क्षीणतरः श्लेष्मा क्षीणतमः ६, इति हीनमध्याधिकैः षट् । क्षीणा वातपित्तश्लेष्माण इति समैः क्षीणैरेकः । एते त्रयोदश संनिपाताः । संसर्गेण नव । तत्र क्षीणयोरेकस्यातिशये षट् तद्यथा - वातः क्षीणः पित्तं क्षीणतरम् १, पित्तं क्षीणं वातः क्षीणतरः २, वातः क्षीणः श्लेष्मा क्षीणतरः ३, इलेष्मा क्षीणः वातः क्षीणतरः ४, श्लेष्मा क्षीणः पित्तं क्षीणतरम् ५, पित्तं क्षीणं श्लेष्मा क्षीणतरः ६ । तुल्य-क्षीणाभ्यां त्रयः; तद्यथा - क्षीणे वातपित्ते १, क्षीणौ पित्तश्लेष्माणौ २, क्षीणौ वाइमाण ३, इति संसर्गेण नव | पृथक् त्रयः - वातः क्षीणः १, पित्तं क्षीणम् २, श्लेष्मा क्षीणः ३, एवं क्षीणैः पञ्चविंशतिः । संनिपतितानां दोषाणां युगपदवृद्धिक्षयकृतोऽन्यो विकल्पो भेद उपदिश्यते । तमेव विकल्पं दर्शयति- वृद्धिरिति । एकस्य वृद्धि:, एकस्य समता, एकस्य च संक्षयः । वातो वृद्धः पितं समं श्लेष्मा क्षीणः १, वानो वृद्धः श्लेष्मा समः पित्तं क्षीणम् २, पित्तं वृद्धं वातः समः इलेष्मा क्षीणः ३, पित्तं वृद्धं श्लेष्मा समः वातः क्षीण: ४, श्लेष्मा वृद्धः वातः समः पित्तं क्षीणम् ५, श्लेष्मा वृद्धः पित्तं समं वातः क्षीणः ६ । द्वन्द्ववृद्धिः द्वयोर्वृद्धिः एकस्य च क्षयः, एकस्य वृद्धिर्द्वयोश्च क्षयः, अत्रापि पट्; तद्यथा- इलेष्मपित्ते बृद्धे वातः क्षीणः १, इलेष्मवातौ वृद्धौ पित्तं क्षीणम् २, वातपित्तं वृद्धे श्लेष्मा क्षीणः ३, इति द्वन्द्ववृद्धया एकस्य क्षयेण त्रयः । श्लेष्मा वृद्धः वातपित्ते क्षीणे १, पित्तं वृद्धं श्लेष्मवातौ क्षीणौ २, वायुर्वृद्धः पित्तश्लेष्माणौ क्षीणौ ३, इति एकवृद्धया द्वयोः क्षयेण त्रयः । वृद्वैः पञ्चविंशतिः क्षीणैः पञ्चविंशतिरिति पञ्चाशत् वृद्धिक्षयसमताकृताः षट् वृद्धिक्षयकृताश्च पट्, एवं द्विषष्ठिः । ' इति चरकोपस्कारे योगीन्द्रनाथसेनः ।

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कियन्तः शिरसीयाव्याय: १७ ] सूत्रस्थानम् और-वृद्ध क्षीण वृद्ध क्षीण १. वात कफ पित्त ४ वान पित्त - कफ २ पित्त - कफ वात ५ पित्त वात - कफ ३ वान पित्त कफ ६ कफ वात - पित्त ३४३ इस प्रकार ये कुल १२ विकल्प हुये । अन्त में वृद्ध दोष २५ भेद + क्षीण दोष २५ भेद + अन्यभेद १२ = कुल ६२ प्रकार को दोष के मान के विकल्प के अनुसार व्याधियाँ होती है । प्रकृतिस्थं यदा पित्तं मारुतः श्लेष्मणः क्षये । स्थानादादाय गात्रेषु यत्र यत्र विसर्पति ॥ ४५ ॥

तदा भेदश्च दाहश्च तत्र तत्रानवस्थितः । गात्रदेशे भवत्यस्य श्रमो दौर्बल्यमेव च ॥ ४६ ॥

( १ ) एक साथ दोषों के सम, क्षीण और वृद्ध होने वाले विकल्पों के लक्षण - ( १ ) जब शरीर में पित्त सम, कफ क्षीण और वात वृद्ध हो तो कुपित वायु पित्त को उसके स्थान से खींच कर जहाँ - जहाँ ले जाती है, वहाँ वहाँ ( उस उस शरीर- प्रदेश में ) अनवस्थिन ( अस्थायी ) रूप से भेद ( फाड़ने की तरह पीड़ा ), दाह ( जलन ) होता है तथा उन उन शरीर के अङ्गों में श्रम और दुर्बलता का अनुभव होता है ॥ ४५-४६ ॥ विमर्श - इस प्रकार की विकृति को आशयापकर्ष माना जाता है । अर्थात् प्रकृतिस्थ दोष जब अपने स्थान से हट कर दूसरे स्थान में चले जाते है और उससे जो विकार उत्पन्न होता है उसे आशयापकर्षजन्य कहा जाता है । यहाँ यह एक शंका होती है कि अपने स्वाभाविक रूप में रहने वाला पित्त, दाह कैसे उत्पन्न करता है । उसका उत्तर यह होगा कि वायु जब पित्त से मिलती है तो दाह करती हैं, और जब कफ से मिलती है तो शीतलता उत्पन्न करती है । यहाँ वायु पित्त से मिली रहती है अतः दाह होना स्वाभाविक है । मधुकोषकार ने इसका समाधान इस प्रकार किया है कि आशयापकर्ष से विशेष रूप से रंजक या भ्राजक पित्त अलग त्वचा आदि पर आ जाता है । और त्वचा में भ्राजक पित्त वर्तमान रहता है तो आये हुए पित्त से मिल कर भ्राजक पित्त अधिक मात्रा में रहता है अर्थात् पित्त द्विगुण मात्रा में हो जाता है तो दाह उत्पन्न करना बढ़े हुए पित्त का ही धर्म है । इस प्रकार आशयापकर्ष बतलाने का तात्पर्य यह होता है कि ऐसी अवस्था में कुपित वायु को चिकित्सा के द्वारा अपने स्थान में लाया जाता है । यदि चिकित्सा करने वाला वैद्य इस आशयापकर्ष को नहीं समझेगा तो दाह को दूर करने के लिये बढ़े हुए पित्त का अनुमान कर पित्तनाशक औषधि और विरेचन का प्रयोग कर पित्त को शान्त करने का प्रयास करेगा । लेकिन उपर्युक्त अवस्था में वस्तुतः पित्त की वृद्धि न होने से पित्तशामक प्रयोग लाभदायक नहीं होंगे । अत एव कुपित वायु को अपने स्थान में ले जाना ही चिकित्सा है । छुपे हुए दोष जब दूसरे स्थानों में जाकर विकार उत्पन्न करते हैं तो जिस दोष का वह स्थान रहता है उसी दोष की चिकित्सा की जाती है । यथा -- ' तत्रान्यस्थानसंस्थेषु तदीयामवलेषु तु । कुर्याच्चिकित्सां स्वामेव बलेनान्याभिभा-विषु || आगन्तुं शमयेद्दोषं स्थानिनं प्रतिकृत्य वा । ' ( अ.हृ.सू. २३ ) तथापि यहाँ अन्य स्थान में प्रकृतिभूत दोष कुपित वायु द्वारा ले जाया गया है इसलिये यहाँ नियम लागू नहीं होता है । प्रकृतिस्थं कफं वायुः क्षीणे पित्ते यदा बली । कषेत् कुर्यात्तदा शूलं सशैत्यस्तम्भगौरवम् ॥ ( २ ) जब कफ सम, पित्त क्षीण और वायु अधिक बलवान रहती है - तो कफ को उसके स्थान से खींच कर अन्य स्थानों में ले जाती हैं । तब उस स्थान में वेदना, शीतलता, जकडाहट और भारीपन का अनुभव होता है ॥ ४७ ॥

१. ' भवेत्तस्य ' ग. । २. ' साम्ये स्थितम् ' इति पा ० । ३. ‘ शैत्यस्तम्भनगौरवम् ' ग. ।

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३४४ चरकसंहिता विमर्श - यह भी आशयापकर्ष का दूसरा उदाहरण है । यहाँ बढ़ी हुई वायु शूल उत्पन्न करती है और साम्यावस्था में कफ जत्र दूषित स्थान में जाता है तो शीतलता, भारीपन और जकडाहट उत्पन्न करता है । उसकी भी चिकित्सा विकृत वायु को अपने स्थान में ले जाना ही है । यदोऽनिलं प्रकृतिगं पित्तं कफपरिक्षये । संरुणद्धि तदा दाहः शूलं चास्योपजायते ॥ ४८ ॥

( ३ ) जब क्षीण कफ और सम वायु और पित्त अधिक होता है - तो बढ़ा हुआ पित्त स्रोतों को बन्द कर वायु को रोक देता है । तब जिस स्थान पर वायु रुकती है उस स्थान में दाह, शूल उत्पन्न करती है ॥ ४८ ॥

विमर्श - वायु चंचल और दोषों में गति लाने वाली होती है । इस विकल्प में वायु सम है, पित्त बढ़ा हुआ है, कफ भी अपनी मात्रा से न्यून है । बढ़ा हुआ पित्त वायु के मार्गों को रोक देता है जिससे वायु उस स्थान में वेदना उत्पन्न करती है और पित्त अधिक मात्रा में है इसलिये दाह उत्पन्न करता है । इसे आशयापकर्ष न कह कर आवरणावस्था कही जाती है अर्थात् यहाँ चिकित्सा द्वारा बढ़े हुए पित्त को शान्त करना चाहिए । श्लेष्माणं हि समं पित्तं यदा वातपरिक्षये । संनिरुन्ध्यात्तदा कुर्यात् सतन्द्रागौरवं ज्वरम् ॥ ( ४ ) कफसम, वातक्षीण और पित्त अधिक रहता है तो बढ़ा हुआ पित्त, कफ के मार्गों को बन्द कर देता है, तब तन्द्रा, भारीपन और ज्वर उत्पन्न करता है ॥ ४ ९ ॥ विमर्श - इस विकल्प में कफ सम, वात क्षीण और पित्त बली है । गौरव, तन्द्रा यह कफ के लक्षण हैं और ज्वर पित्त का लक्षण है । इसे पित्त द्वारा कफ का आवरण होना कहा जायगा । इसमें पित्त की ही चिकित्सा की जाती है । प्रवृद्धो हि यदा श्लेष्मा पित्ते क्षीणे समीरणम् । रुन्ध्यात्तदा प्रकुर्वीत शी गौरवं रुजम् ॥ ( ५ ) पित्त क्षीण, वायु सम और कफ बढ़ा हुआ मार्ग को कफ रहता है तो - वायु के रोक देता है । जिस स्थान में वायु रुकती है वहाँ पर शीतलता, गुरुता और वेदना होती है ॥ ५० ॥

विमर्श - इस विकल्प में पित्त क्षीण, वायु सम और कफ बढ़ा हुआ रहता है । कफ सम, पित्त क्षीण, और वायु अधिक रहने पर जो लक्षण होते हैं प्रायः वही लक्षण इसमें होते हैं । किन्तु सम वायु को जब कफ अवरुद्ध करना है तो जड़ना नहीं होती और बली वायु जब कफ के मार्ग को अवरुद्ध करती हैं तो जड़ना होती है । क्योंकि वायु के द्वारा इसमें कफ मुखा दिया जाता है इसलिये अङ्गों में जकड़ाहट हो जाती है । और जब बढ़ा हुआ कफ प्रकृतिस्व वायु के मार्गों को रोकना है तो कफ द्रव रूप में रहना है इसलिये जकड़ाहट नहीं रहती है । इसमें चिकित्सा कफ की की जाती है । इसे कफ से आवृत वायु की अवस्था मानी जाती है । समीरणे परिक्षीणे कफः पित्तं समत्वंगम् । कुर्वीत संनिन्धानो मृद्वनित्वं शिरोग्रहम् ॥५१ ॥

निद्रां तन्द्रां प्रलापं च हृद्रोगं गात्रगौरवम् । नखादीनां च पीतत्वं ष्टीवनं कफपित्तयोः ॥ ( ६ ) वायु क्षीण, पित्तसम और कफ अधिक रहता है - तो कफ के द्वारा पित्त का मार्ग रोक दिया जाता है जिससे मन्दाग्नि, शिरःशूल, निद्रा, तन्द्रा, प्रलाप, हृदय रोग, शरीर में भारीपन, ३. ' निपीडयेत् ' इति पा. ' । ५. ' संनिरुध्यात्तदा कुर्यात् ' ग. । १. ' प्रकृतिस्थं यदा बातम् ' ग. । २. ' प्रकृतिस्थं कफम् ' ग. । ४. ' प्रकृतिस्थं यदा वातं श्लेष्मा पित्तपरिक्षये ' ग. । ६. ' ज्दरम् ' ग. । ७. ' प्रकृतिस्थं यदा पित्तं श्लेष्मा मारुतसंक्षये ' ग. । ८. ' संनिरुध्यात्तदा कुर्यात् ' ग. ।

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कियन्तः शिरसीयाध्यायः १७ ] - थूका करता है ॥ ५१-५२ ॥ १. ' सदाहं ' ग. पित्तस्य ' इति पा. । सूत्रस्थानम् ३४५ २. ' पाण्डुतां दूयनं तथा ' यो । ४. ' स्फोटनमुत्तमम् ' इति पा. । ५. ' हृदये ' ग.। - नख, नेत्र, मल, मूत्र आदि में पीलापन होता है और रोगी पित्त मिले हुये कफ को बार - बार विमर्श - इस तरह एक दोष की वृद्धि, एक दोष का क्षय और एक दोष की समता से होने

वाले ६ विकल्पों का वर्णन और उनमें होने वाले विकारों का निर्देश किया गया है ।

हीनवातस्य तु श्लेष्मा पित्तेन सहितश्चरन् । करोत्यरोचकापाको संदनं गौरवं तथा ॥५३ ॥

हृल्लासमास्यस्रवणं पाण्डुतां दूयनं मदम् । विरेकस्य च वैषम्यं वैषम्यमनलस्य च ॥ ५४ ॥

( १ ) पित्त और कफ बढ़े हुए हों और वायु क्षीण हो - तो क्षीण वात वाले पुरुष के शरीर में पित्त के साथ चलता हुआ कफ, अरुचि, अपचन, शरीर में अवसाद, भारीपन, जी मचलाना, लाला-स्राव, पाण्डु रोग, मुखादि में दाह, मद, मलत्याग में विषमता और अग्नि की विषमता कर देता है । विमर्श - यहाँ से दो दोषों की वृद्धि और एक दोष की क्षीणताविषयक विकल्प का वर्णन प्रारम्भ करते हैं । इसमें बढ़े हुए कफ से अरुचि, अपचन, अवसाद, गौरव, जी मचलाना और लालास्राव होता है और बढ़े हुए पित्त से पाण्डुता, दाह, मद, विरेचन की विषमता और अग्नि में विषमता हो जाती है । हीनपिर्त्तस्य तु श्लेष्मा मारुतेनोपसंहितः । स्तम्भं शैत्यं च तोदं च जनयत्यनवस्थितम् ॥ गौरवं मृदुताग्नेर्भक्ताश्रद्धां प्रवेपनम् । नखादीनां च शुक्लत्वं गात्रपारुष्यमेव च ॥ ५६ ॥

( २ ) कफ और वायु वृद्ध होते हैं और पित्त क्षीण होता है - तो बढ़ी हुई वायु और कफ शरीर में संचार करते हुए शरीर में जडता, शीतलता, सूई चुभने जैसी पीड़ा अनवस्थित रूप में करता है । शरीर में गुरुता, मन्दाग्नि, भोजन में अरुचि, शरीर में कम्पन, नख, नेत्र, त्वचा, मल-मूत्र में शुक्लता और शरीर में रूखापन हो जाता है ॥ ५५-५६ ॥ मारुतस्तु कफे हीने पित्तं च कुपितं द्वयम् । करोति यानि लिङ्गानि शृणु तानि समासतः ॥

भ्रममुद्वेष्टनं तोदं दाहं स्फुटनवेपने । अङ्गमर्द परीशोषं दूयैनं धूपनं तथा ॥ ५८ ॥

( ३ ) जब बात और पित्त ये दोनों वृद्ध रहते हैं और कफ क्षीण होता है - • तो ऐसी अवस्था में वित्त और वात शरीर में संचार करते हुये जिन लक्षणों को उत्पन्न करते हैं उन लक्षणों को सुनो । भ्रम, उद्वेष्टन, तोद, दाह, स्फुटन ( हड्डियों में वेदना ), शरीर में कम्प, अंगमर्द, मुख, कण्ट, गला आदि का सूखना, मुखादि में दाह और गले से धूम निकल रहा है ऐसा अनुभव होना है ॥ ५७-५८ ॥ विमर्श - इस प्रकार इन तीन विकल्पों में दो दोनों की वृद्धि और एक दोष की क्षमता रहती है । वातपित्तक्षये श्लेप्मा स्रोतांस्यपिदधद्भृशम् । चेष्टाप्रणाशं मूच्छांच वाक्सङ्गंच करोति हि ॥ ( १ ) जब बात और पित्त क्षांग रहते है और कफ बढ़ा हुआ होता है - तो बढ़ा हुआ कफ सभी स्रोतों को अधिक रूप में बन्द करते हुये चेष्टा का नाश, मूर्च्छा और बोली का बन्द हो जाना ये सब लक्षण उत्पन्न करता है ॥ ५ ९ ॥ विमर्श - यहाँ से दो दोषों के क्षय और एक दोष की वृद्धिविषयक विकल्प का वर्णन प्रारम्भ करते हैं । वातश्लेष्मक्षये पित्तं देहौजः संसयच्चरेत् । ग्लानिमिन्द्रियदौर्बल्यं तृष्णां मूच्छा क्रियाक्षयम् ॥

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३४६ चरकसंहिता - तो ऐसी ( २ ) जब वात और कफ का क्षय होता है और पित्त बढ़ा हुआ होता है. हालत में पित्त शरीर में संचार करते हुये शरीर के ओज का नाश करता है और साथ ही ग्लानि, इन्द्रियों में दुर्बलता, प्यास की अधिकता, मूर्च्छा और शारीरिक क्रियाओं का नाश करता है || पित्तश्लेष्मक्षये वायुर्मर्माण्यति निपीडयन् । प्रणाशयति संज्ञां च वेपर्यत्यथवा नरम् ॥ ६१ ॥

( ३ ) पित्त और कफ के क्षय होने पर और वायु के बढ़ जाने पर बढ़ी हुई वायु जब शरीर मे चलती है - - तो मर्म स्थानों को पीडित करती हुई ज्ञान को नष्ट कर मूच्छित कर देती हैं और उस व्यक्ति का शरीर काँपने लगता है ॥ ६१ ॥

विमर्श - यह तीन विकल्प दो दोषों के क्षय और एक दोष की वृद्धि विषयक बतलाया गया है । इस प्रकार एकसाथ क्षय, वृद्धि, समता, दो दोषों की वृद्धि और एक दोष का क्षय और दो दोषों की क्षीणता और एक दोष को वृद्धि से कुल बारह विकल्प बतलाये गये हैं । * दोषाः प्रवृद्धाः स्वं लिङ्गं दर्शयन्ति यथाबलम् । क्षीणा जहति लिङ्गं स्वं, समाः स्वं कर्म कुर्वते ॥ दोषों के वृद्धि - क्षय ज्ञापक सूत्र - बढ़े हुए दोष अपने बल के अनुसार अपने - अपने लक्षणों को दिखाते हैं, क्षीण हुए दोष अपने लक्षणों को शरीर में कम करते हैं, सम दोष अपने प्राकृत रूप में रहते हुए अपना - अपना कार्य करते हैं ॥ ६२ ॥

विमर्श -- यहाँ यथाबल दोषों के बढ़ने पर शरीर में लक्षण का होना उसके अनुसार ही बतलाया गया है । दोष एक अंश या दो अंश या तीन अंश या सभी अंशों में बढ़ते हैं । जैसे कलाय कषाय रस होता है वह सभी अंश में वायु को बढ़ाने वाला होता है । चौराई का साग रौक्ष्य, शैत्य और लाघव गुणों के कारण तीन अंशों से वायु की वृद्धि करता है । ईख, रौक्ष्य और शैव्य वायु को बढ़ाता है । सीधु अपने रौक्ष्य गुण के कारण वायु को एक अथवा मद्य पित्त को सभी अंश में बढ़ाते हैं । गुणों के कारण दो अंश में अंश में बढ़ाता है । कटु रस हींग कटु, तीक्ष्ण, उष्ण गुणों के कारण ३ अंश में पित्त की वृद्धि करती है । अजवायन तीक्ष्ण उष्ण गुणों के कारण दो अंश में पित्त को बढ़ाती है । तिल उष्ण गुणों के कारण पित्त को एक ही अंश में बढ़ाता है । मधुर रस या भैंस का दुग्ध सभी अंशों में कफ को बढ़ाता है । राजादन का फल ( खिरनी ) स्नेह, गुरुना और माधुर्य गुणों के कारण तीन अंशों में कफ की वृद्धि करने वाला होता है । कशेरू शैल्य और गौरव गुणों के कारण दो अंशों में कफ को बढ़ाता है । मृणाल शैत्यगुणों के कारण एक अंश में कफ को बढ़ाने वाला होता है । इस बात को सुश्रुत ने भी स्पष्ट किया है, यथा-‘ सर्वैर्भावैस्त्रिभिर्वाऽपि द्वाभ्यामेकेन वा पुनः । संसमें कुपितः कुद्धं दोषं दोषोऽनुधावति ॥ ' इति । ( सु. सू. अ. २१ ) शंका - सन्निपान तीनों दोषों के किसी न किसी रूप में एकत्र होने को कहा जाता है । पर यहाँ यह शंका होती है कि तीनों दोष परस्पर में विरुद्ध गुण वाले हैं तो तीनों का एक साथ इकट्ठा रहना कैसे सम्भव है? जैसे कि विरुद्ध गुण वाली अग्नि और जल का संयोग एक साथ नहीं सम्भव होता है । इस शंका का निराकरण चक्रणणि मतानुसार निम्नलिखित रूप में दिया जा रहा है । समाधान - किन्हीं विरुद्ध भावों के संयोग की कल्पना नहीं होगी यह बात देख कर नहीं कही जा सकती है पर उन दोनों के कार्यों से इसका ज्ञान किया जाता है । जैसे जल और अग्नि अलग-अलग भिन्न हैं और दोनों का संयोग सम्भव नहीं है फिर भी पंचमहाभूत से जब सृष्टि की उत्पत्ति होती है तो उस वक्त विरुद्ध होते हुये भी एक साथ रहते हैं तथा अग्नि और जल प्रधान होकर अम्ल रस की उत्पत्ति करते है । यह प्रत्यक्ष गोचर है अतः कल्पनामात्र से विरोध की कल्पना न कर १. ‘ वेपयत्यथ मानवम् ' यो ।

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कियन्तः शिरसीयाध्यायः १७ ] सूत्रस्थानम् ३४७ उनके संयोग से कार्यों की उत्पत्ति देख कर एक साथ रहना निश्चित किया जाता है । यदि यह मान लिया जाय कि विरुद्ध गुण वाले दोषों का भी आपस में कोई विरोध नहीं होता है और वे एक साथ रह सकते हैं तो - ' विरुद्धगुणसन्निपाते हि भूयसाऽल्पमवजीयते ' ( वि. अ. १ ) तथा -' हास हेनुविशेपश्च ' ( सू.अ. १ ) इत्यादि ये वचन निरर्थक हो जायगें । क्योंकि विरुद्ध भी अनुकूल है तो वह अल्प को कैसे जीतेना और विशेष ( विरुद्ध ) से हानि भी नहीं हो सकती है । इसका समाधान यह है कि कहीं - कहीं दोष अपने प्रभाव से वृद्ध होने पर भी मेल खा जाते है और एक साथ रहने हैं पर सभी जगह नहीं । यह ' विरुद्धगुणसन्निपाते ' और ' ह्रासहेतुविशेषश्च ' यह दोनों वचन स्वभाव से अधिक सामान्य स्थल के लिये हैं । जहाँ औषवि या दोष, प्रभाव से काम करते हैं वहाँ इन वचनों का विरोध होता है । जैसे-त्रिदोष को कुपित करने वाले बड़हर में गुण सम दोष को बढ़ाते है किन्तु वृद्ध होने से दोष को निकालते नहीं क्योंकि उसका प्रभाव है कि वह त्रिदोष को बढावे । तथा आँवला, अम्ल होने से बात को दूर करता है और मधुर, शीन होने से पित्त को दूर करता है, कटुतिक्त होने से कफ को दूर करता है । परन्तु बड़हर में अम्ल रस कषाय और शैत्य से दबा रहता है इसलिये वात को दूर नहीं करता और बड़हर का माधुर्य और शैत्य गुण अम्ल रस से ' दबा रहता है, इसलिये पित्त की शान्ति नहीं करता । इस तरह यह देखा गया है कि दोष और द्रव्यों की प्रभाव से कारणता होती है अतः वातादि दोष परस्पर वृद्ध होते हुये भी प्रभाव से एकत्र होकर, मनुष्यों के अदृष्ट वश एक साथ अविरोधी रूप से रहते हैं । इसीलिये कहा है- ' विरुद्धैरपि न त्वेते गुणैघ्नन्ति परस्परम् । दोषाः सहजसात्म्यत्वाद्धोरं विषमहीनिव ॥ ' ( चि. अ. २६ ) । तथा - ' दैवाद्दोषस्वभा-वादा दोषाणां मान्निपातिके । विरुद्वैश्च गुणैः कश्चिन्नोपघातः परस्परम् ॥ ' इससे यह भी शंका दूर हो जाती है, जो कि यह कहते हैं कि जिस प्रकार जन्म से ही वातादि दोष एक साथ रहते हैं अतः उनका विरोध नहीं होता है इसी प्रकार जन्म से ही वातादि दोष और रस - रक्तादि धातुयें एक साथ रहती हैं तो वातादि दोषों से इनका नाश या वृद्धि रूप विगुणता नहीं होनी चाहिये, क्योंकि अपने विशेष प्रभाव से विरुद्ध होते हुये वातादि दोष एक साथ रहते हैं । पर दोष रसरक्तादि धातुओं को दूषित करते हैं और उनके विरुद्ध होते हैं । उपर्युक्त विमर्श का अधिकांश

भाग चक्रपाणि - सम्मत है ।

वातादीनां रसादीनां मलानामोजसस्तथा । क्षयास्तत्रानिलादीनामुक्तं संतीणलक्षणम् ॥

( ४ ) अठारह प्रकार के क्षय ( Eighteen Type of Kshaya ) १८ प्रकार के क्षय — बात, पित्त, कफ ३ दोषों का क्षय, रसादि ७ धातुओं का क्षय, रसादि सात धातुओं के ७ मलों का क्षय और १ ओज का क्षय, ये १८ प्रकार के क्षय होते हैं । इनमें वात, पित्त, कफ ३ दोषों के क्षय के लक्षण पहले ही बतला दिये गये है ॥ ६३ ॥

* घट्टते सहते शब्दं नोच्चैर्द्रवति शूल्येते । हृदयं ताम्यति स्वल्पचेष्टस्यापि रसक्षये ॥६४ ॥

( ४ ) रसक्षय के लक्षण - रस के क्षीण होने पर थोड़ी चेष्टा करने पर भी मनुष्य को ऐसा अनुभव होता है कि हमारे हृदय को कोई हिला रहा है । वह व्यक्ति ऊंचे शब्दों को सह नहीं सकता है ( जहाँ शोर गुल होता है वहाँ रहना या जाने में उसे कष्ट का अनुभव होता है ), १. ' दूयते ' इति पा. ।

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३४ = चरकसंहिता उसके हृदय में घबड़ाहट अर्थात् धक् धक् ( Palpitation ) होने लगता है और हृदय में खिचावट की तरह वेदना होती है और थकावट का अनुभव होता है ॥ ६४ ॥

विमर्श - सुश्रुत ने रस धातुओं के क्षय होने पर ' रसक्षवे हृत्पीडा कम्पशोपौ शून्यना तृष्णा च ' ( सु. सू. अ. १५ ) कहा है । परुपा स्फुटिता म्लाना त्वग्रक्षा रक्तसंचये । ( ५ ) रक्तक्षय के लक्षण --- रक्त के क्षय हो जाने पर त्वचा कठोर, फटी हुई, मुर्झाई और

रूक्ष हो जाती है ।

मांसतये विशेषेण स्फिग्ग्रीवोदरशुष्कता ॥ ६५ ॥

( ६ ) मांसक्षय के लक्षण से शुष्कता आ जाती है ॥ ६५ ॥

मांस के क्षय होने पर चूतड़, गर्दन और उदर में त्रिशेष रूप विमर्श - सुश्रुत ने मांसक्षय होने पर नितम्व, गण्डस्थल, ओष्ठ, मूत्रेन्द्रिय, ऊरु, वक्षस्थल, कक्षा, पिण्डिका, उदर, ग्रीवा में शुष्कता तथा शरीर में रूक्षता, सूई चुभोने सी पीड़ा, गात्र में अवसाद और धमनी में शिथिलता आ जाती है ऐसा बनाया है । यथा- ' मांसक्षये स्फिग्गण्डोष्ठोपस्थो वक्ष-कक्षा पिण्डको दरग्रीवाशुष्कता रौक्ष्यतोदौ गात्रागां सदनं धमनीशैथिल्यं च । ' ( सु. सू. अ. १५ ) और वाग्भट ने इन्द्रियों में ग्लानि, सन्धियों में वेदना यह अधिक लक्षण बताया है यथा- ' मांसे 5-श्चग्लानिगण्डस्फिक्शुष्कन सन्धिवेदनाः ( अ.हृ.अ. ११ ) ।

- संधीनां स्फुटनं ग्लानिरचणोरायास एव च । लक्षणं मेदसि क्षीणे तनुत्वं चोदरस्य च ॥

( ७ ) नेदःक्षय के लक्षण - सन्धियों में स्फुटन अर्थात् नेत्रों में ग्लानि, शरीर में थकावट और उदर का पतला होना यह लक्षण मेद के क्षय में होते हैं ॥ ६६ ॥

विमर्श - सुश्रुत ने मेद के क्षय होने पर प्लीहा का बढ़ना, सन्धियों में शुन्यता, शरीर में रूक्षता और अधिक मैदा वाले पशुओं के मांस खाने की इच्छा होती है - यह बनाया है जैसे— ' मेदःक्षये प्लीहाभिवृद्धिः सन्धिशून्यता, रौक्ष्यं, मेदुरमांसप्रार्थना च । ' ( सू. अ. १५ ) । वाग्भट ने मेद के क्षय होने पर कवि में शून्यता, प्लीहा की वृद्धि और अंगों में कृशता का होना बनाया है यथा - " मेदसि स्वपनं कट्याः प्लोहो वृद्धिः कृशाङ्गना । ' ( अ. ह्. अ. ११ ) | वृद्ध वाग्भट ने - प्लीहा का बढ़ना, कटि में शून्यता, सन्धियों में शून्यता, अंगों में रूक्षता, कृशता, श्रम, शोष और मैदा वाले पशुओं के मांस खाने की इच्छा होती है - यह बनाया है । यथा - ' प्लीहाभिवृद्धिकटित्वापसन्धिशून्य-ताङ्गरौक्ष्यका श्रमशोषमे दुरमांसाभिलाषै म सक्षयोक्तैश्च मंदः । ' ( अ. सं. सू. अ. १ ९ ) । * केशलोमनखश्मश्रुद्विजप्रपतनं श्रमः । ज्ञेयमस्थितये लिङ्गं संधिशैथिल्यमेव च ॥ ६७ ॥

( ८ ) अस्थिक्षय के लक्षण - अस्थ के क्षय होने पर केश, लोम, नख, डाहो डांत गिर जाते हैं, शरीर में थकावट सन्धिवों में शिथिलता का होना ये लक्षण अस्थिक्षय में होते हैं ॥ ६७ ॥

विमर्श - वाग्भट ने अस्रि में तोत्र होना यह अधिक लक्षण बनाया है यथा- ' दन्तनखरोम-केशशाननरौक्ष्य पारुष्यसन्धिशैथिल्यास्थितोदास्थिवद्धमांसाभिलापैरस्थि । ' ( अ. सु. अ. १ ९ ) । 4 शीर्यन्त इव चास्थीनि दुर्बलानि लघूनि च । प्रततं वातरोगीणि क्षीणे मजनि देहिनाम् ॥ ( ९ ) मज्जा क्षय के लक्षण - मज्जा के क्षय होने पर अस्थियाँ कट कर गिर रहीं हैं ऐसा अनुभव होता है और अस्थियाँ दुर्बल और हलकी हो जाती हैं । और वह मनुष्य वात रोग से सर्वदा पीडित रहता है ॥ ६८ ॥

विमर्श - दाग्भट ने मज्जा के क्षीण होने पर अस्थियों में छिद्र, भ्रम और आँख के सामने सदा अंधकार बना रहता है ऐसा बताया है यथा- ' अस्थनां मज्जनि सौषिर्यं भ्रमस्तिमिरदर्शनम् ।

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कियन्तः शिरसीयाध्यायः १७ ] सूत्रस्थानम् ३४६ ( अ.हृ.सू. अ. ११ ) । सुश्रुत ने मज्जा के क्षय होने पर शुक्र की कमी, गांठों में वेदना, अस्थि में में तोद और अस्थियों में शून्यता होती है - यह बताया है । यथा - ' मज्जक्षयेऽल्पशुक्रता पर्वभेदोऽ-स्थिनिस्तोदोऽस्थिशून्यता च । ' ( सु. सू. अ. १५ ) । * दौर्वल्यं मुखशोषश्च पाण्डुत्वं सदनं श्रमः । क्लैब्यं शुक्राविसर्गश्च क्षीणशुक्रस्य लक्षणम् ॥ ( १० ) शुक्रक्षय के लक्षण शुक्र के क्षय होने पर व्यक्ति में दुर्बलता, मुख का सूखना, शरीर में पीलापन, शरीर में अवसाद, थकावट, नपुंसकता और मैथुन के समय शुक्र नहीं निकलना अथवा थोड़ा निकलना, ये लक्षण होते हैं ॥ ६ ९ ॥ विमर्श - वाग्भट ने शुक्र का देर से निकलना और शुक्र में रक्त मिला हुआ निकलना, अण्डकोष में और गुप्तेन्द्रिय में सूई चुभोने सी पीड़ा का होना तथा मूत्र इन्द्रिय से धूम निकल रहा है ऐसा अनुभव होना ये लक्षण बताये है । यथा - ' शुक्रे चिरात् प्रसिच्येत शुक्रं शोणितमेव वा । दोऽत्यर्थं वृषयोर्मेद्र धूमायतीव च ॥ ' ( अ.हृ. सू. ११ ) । सुश्रुत ने शुक्र के क्षय होने पर अण्डकोष तथा मूत्रेन्द्रिय में वेदना, मैथुन में असमर्थता अथवा अधिक देर से शुक्र का निकलना और जब शुक्र निकले तो उसमें कुछ रक्त का भी अंश निकलना - यह लक्षण बताया है यथा- ' शुक्रक्षये-मेढ़वृषगवेदना अशक्तिर्मैथुने चिराद्रा प्रसेकः प्रसेके चाल्परक्तशुकदर्शनम् । ( सु. सु. अ. १५ ) । ॐ क्षीणे शकृति चान्त्राणि पीडयन्निव मारुतः । रूक्षस्योन्नमयन् कुक्षिं तिर्यगूर्ध्वं च गच्छति ॥ ( ११ ) पुरीपक्ष के लक्षण - पुरीष के क्षय हो जाने पर शरीर में रूक्षता हो जाती है । 1 उस रूक्ष पुरुष की अंतड़ियों को पीड़ित करती हुई वायु उदर को टेढ़ा कर देती या ऊपर को उठा देती है और उदर में तिरछे और ऊपर को चलती रहती है ॥ ७० ॥

विमर्श -- तात्पर्य यह है कि मल के क्षय हो जाने पर आंतों में ऐंठन और उदर में आध्यमान और बार - बार उदर भीतर से बाहर की ओर उठता रहता है और वायु इधर - उधर घूमी करती है वाग्भट ने, शब्द के साथ वायु अतड़ियों में ऐंठन करती है और उदर में ऊपर चलती हुई हृदय और पार्श्व में अधिक वेदना करती है, ऐसा बताया है, यथा - ' पुरीषे वायुरस्त्राणि सशब्दो वेष्टयन्निव । कुक्षौ भ्रमति यात्यूर्ध्वं हृत्पार्श्वे पीडयन् भृशम् ॥ ' ( अ.हृ.सू. अ. ११ ) सुश्रुत ने भी इन्हीं लक्षणों को अपने यहाँ लिखा हैं, यथा - ' पुरीषये हृदयपार्श्वपीडा सुशब्दस्य च वायोरूर्ध्वगमनं कुक्षि-सञ्चारणम् । ' ( सु. सू. अ. १५ ) * मूत्रत्क्षये मूत्रकृच्छ्रं मूत्रचैवर्ण्यमेव च । पिपासा बाधते चास्य मुखं च परिशुष्यति ॥७१ ॥

( १२ ) मूत्रक्षय के लक्षण मूत्र के क्षय होने पर मूत्र कष्ट से आता है, मूत्र का रंग बदल जाता है । रोगी अधिक प्यासा रहता है तथा उसका मुख सूखा रहता है ॥ ७१ ॥

विमर्श - वाग्भट ने दो लक्षण अधिक बताये हैं प्रथम तो यह है कि मूत्र का कम होना तथा दूसरा मूत्र में रक्त का आना । यथा - ' मूत्रेऽल्पं मूत्रयेत्कृच्छ्राद्विवर्ण सास्रमेव वा । ' ( अ. हृ. सू. अ. ११ ) सुश्रुत ने बताया है कि - मूत्रक्षय होने पर वस्ति में वेदना तथा मूत्र कम होता है, यथा-- ' मूत्रक्षये वस्तितोदोऽलमूत्रना च । ' ( स. सु. अ. १५ ) मलायनानि चान्यानि शून्यानि च लघूनि च । विशुष्काणिच लक्ष्यन्ते यथास्वं मलसंक्षये ॥ ( १३, १४, १५, १६, १७ ) नाक, कान, नेत्र, मुख तथा लोका के ( पञ्चेन्द्रियाधिष्ठान मल ) मलों की क्षीणता के लक्षण - भिन्न - भिन्न स्थानों के क्षय होने पर जितने मल के स्थान है वे सत्र १. ' भ्रमः ' ग. ।

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३५० चरकसंहिता अपने - अपने मल के क्षय होने पर शून्य, लघु और शुष्क हो जाते हैं । इसी तरह मूत्र और मल के क्षय होने पर मलाशय और मूत्राशय में शून्यता, लघुता और शुष्कता हो जाती है ॥ ७२ ॥

विमर्श - यहाँ मलायन से मूत्रमार्ग तथा मलमार्ग इन दोनों को छोड़ कर अन्य मल का मार्ग लिया गया है क्योंकि इसके पूर्व मूत्रक्षय और मलक्षय का लक्षण बतलाया गया है । वाग्भट ने मलों के क्षय में स्वेद - क्षय का भी लक्षण बतलाया है, जैसे- स्वेदे रोमच्युतिः स्तब्धगेमता-स्फुटनं त्वचः । ' ( अ. हृ. सू. अ. ११ ) और इसके उपरान्त सामान्यतः प्रत्येक मलों के क्षय होने पर होने वाले लक्षणों तथा चिकित्सा पर प्रकाश डाला है, यथा-- ' मलानामतिसुक्ष्माणां दुर्लक्ष्यं लक्षयेत् क्षयम् । स्वमलायनसंशोष - नोदशून्यत्वलाघवैः ॥ दोषादीनां यथास्वं च विद्याद्-वृद्धिक्षयौ भिषक् । क्षयेण विपरीतानां गुणानां वर्धनेन च ॥ वृद्धिं मलानां सङ्गाच्च क्षयं चाति विसर्गतः । पलोचितत्वाद्देहस्य यो वृद्धेस्तु पीडनः ॥ तत्रास्थनि स्थितो वायुः, पित्तं तु स्वेदरक्तयोः । श्लेष्मा शेषेषु तेनैषामाश्रयाश्रयिणां मिथः ॥ यदेकस्य तदन्यस्य वर्धनक्षपणौषधम् । अस्थिमारुतयो -नैवं, प्रायो वृद्धिहिं तर्पणात् ॥ इलेष्मणाऽनुगता तस्मात् सङ्ख्यस्तद्विपर्ययात् । वायुनाऽनुगतोऽस्माच्च वृद्धिक्षयसमुद्भवान् ॥ विकारान् साधयेच्छी क्रमालङ्घनबृंहणैः । वायोरन्यत्र, तज्जांस्तु तैरेवो-त्क्रमयोजितः । विशेषाद्रक्तवृद्धयुत्थान् रक्तस्रुतिविरेचनैः । मांसवृद्धिभवान् रोगान् शस्त्रक्षाराग्नि-कर्मभिः ॥ स्थौल्यकाश्र्योपचारेग मेदोजानस्थिसङ्क्षयात् । जातान् क्षीरघृतैस्तिक्तसंयुनैर्वस्तिभिस्तथा ॥ ( मज्जशुक्रोद्भवान् रोगान् भोजनैः स्वादुतिक्तकैः । वृद्धं शुक्रं व्यवायाद्यैर्यच्चान्यच्छुक्रशोपिकम् ॥ प्रत्यनीकौषवं मज्जशुक्रवृद्धिक्षये हितम् । ) विड्वृद्धिजानतीसार क्रियया, विक्षयोद्भवान् । मेषाज-मद्यकुल्माप - यवमाषद्वयादिभिः । मूत्रवृद्धिक्षयोत्थां मेहकृच्छ्रचिकित्सया व्यायामाभ्यञ्जनस्वेद-मद्यैः स्वेदयोद्भवान् ॥ स्वस्थानस्थस्य कायाग्रंशा धातुपु संश्रिताः । तेषां सादानिदीप्तिभ्यां धातुवृद्धिक्षयोद्भवः ॥ पूर्वी धातुः परं कुर्याद्वृद्धः क्षीणश्च तद्विधम् । दोषा दुष्टा रसैर्धांतून् दूषयन्यु-नये मलान् ॥ ' मलायन किसे कहते हैं - इसे स्पष्ट रूप से निर्देश किया है, यथा- ' अधोद्वे, सप्त शिरसि, खानि स्वेद्रवहानि च । मला मलायनानि स्युर्यथास्वं तेष्वतो गदाः ॥ ' ( अ.हृ.सू. अ. ११ ) * बिभेति दुर्बलोऽभीचणं ध्यायति व्यथितेन्द्रियः । दुश्छायो दुर्मना रूक्षः क्षामश्चैवौजसः क्षये ॥ ( १८ ) ओजः क्षय के लक्षण - ओज के क्षय हो जाने पर मनुष्य भयभीत रहता है, बार - बार चिन्ता करता है, उसकी इन्द्रियाँ पीड़ित रहती हैं, उसके शरीर का वर्ग बदल जाता है, उसका मन दुर्बल हो जाता है, वह रूक्ष और कृश हो जाता है ॥ ७३ ॥

विमर्श - यहाँ ओज के क्षय होने पर जो लक्षण होते हैं उसका सामन्यतः प्रतिपादन किया गया है, सुन में लक्षणों के आधार पर इसके तीन भेद किये हैं- ( १ ) विस्रंस, ( २ ) व्यापद्, ( ३ ) क्षय । विस्रंस में सन्धियों में शिथिलता, शरीर में अवसाद, दोषों का अपने स्थान से च्युत होना, किसी भी कार्य करने में असमर्थता ये लक्षण होते हैं । व्यापद् में - शरीर में जकड़ाहट, भारीपन, वातजन्य शोथ, शरीर के वर्ण ( रूप ) में परिवर्तन, ग्लानि और तन्द्रा होती है । क्षय में-मूर्च्छा, मांस का क्षय अर्थात् कृशता, मोह, प्रलाप और मृत्यु हो जाती है, यथा — ' तस्य विस्रंसो व्यापत् क्षय इति लिङ्गानि व्यापन्नस्य भवन्ति । संधिविश्लेषो गात्राणां सदनं दोषच्यवनं क्रियासन्नि-रोधश्च विस्रंसें, स्तब्धगुरुगात्रता वातशोफो वर्णभेदो ग्लानिस्तन्द्रा निद्रा च व्यापन्ने, मूर्च्छा मांसक्षयो मोहः प्रलापो मरणामेति च क्षये ॥ ( सु. सू. अ. १५ ) । ये लक्षण क्रमशः क्षीण होने पर होते हैं । ओज शरीर में दो प्रकार का होता है एक पर, दूसरा अपर पर ओज आठ विन्दु होता है और उसका स्थान हृदय होता है, अपर ओज अंजलि मात्र होता है और वह सारे शरीर में होता है । यह लक्षण अपर ओज के क्षय होने पर ही होता है । पर ओज के क्षय होने पर तो

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कियन्तः शिरसीयाध्यायः १७ ] सूत्रस्थानम् ३५१ शीघ्र ही मृत्यु हो जाती है । यथा - ' येनौजसा वर्तयन्ति प्रीणिताः सर्वजन्तवः । यदृते सर्वभूतानां जीवितं नावतिष्ठते ॥ यत् सारमादौ गर्भस्य यत्तदर्भरसाद्रसः । संवर्तमानं हृदयं समाविशति यत् पुरा ॥ यस्य नाशात्तु नाशोऽस्ति धारि यद्धृदयाश्रितम् । यच्छरीररसस्नेहः प्राणा यत्र प्रनिष्ठिताः ॥ ' ( च. सू. अ. ३० ) । सुश्रुत ने ओज का ही वर्णन इस प्रकार किया है – ' देहः सावयवस्तेन व्याप्तो भवति देहिनः । तदभावाच्च शीर्यन्ते शरीराणि शरीरिणाम् ॥ ' ( सु. सू. अ. १५ ) सुश्रुत ने यह वर्णन अपर ओज का किया है । उन्होंने साफ लिखा है कि इस ओज से अवयव के साथ सारा शरीर व्याप्त रहता है और इसी का मान वाग्भट ने - ' पृथक् च प्रसृतं प्रोक्तमोजो-मस्तिष्करेतसाम् । ' ( अ. हृ.शा. अ. ३ ) । अतः सुश्रुत का तीन लक्षण और सामान्यतः चरक का एक लक्षण, अपर ओज के क्षय का ही समझना चाहिये और इसका विशेष वर्णन तीसवें अध्याय के ओज सम्बन्धी विमर्श में किया गया है । इसको वहीं देखें । हृदि तिष्ठति यच्छुद्धं रक्तमीषत्सपीतकम् । ओजः शरीरे संख्यातं तन्नाशान्ना विनश्यति ॥

ओज का लक्षण - कुछ रक्त और कुछ पीला जो शुद्ध ( श्वेतवर्ण का ) हृदय में रहता है ।

वह शरीर में ओज कहा जाता है उसके नाश से मनुष्य का नाश हो जाता है ॥ ७४ ॥

विमर्श - वाग्भट ने ओज का लक्षण - ' ओजस्तु तेजो धातूनां शुक्रान्तानां परं स्मृतम् । हृदय-स्थमपि व्यापि देहस्थितिनिबन्धनम् ॥ स्निग्धं सोमात्मकं शुद्धमीषलोहितपीतकम् । यन्नाशे नियतं नाशो यस्मिंस्तिष्ठति तिष्ठति ॥ निष्पद्यन्ते यतो भावा विविधा देहसंश्रयाः । ' ( अ. ह. सू. अ. ११ ) बनाया है । सुश्रुत ने भी ' रसादिशुक्रान्तानां धातुनां परं तेजः तत्खल्वोजः तदेव वलमित्युच्यते । तथा — ‘ ओजः सोमात्मकं स्निग्धं शुक्लं शीतं स्थिरं परम् । विविक्तं मृदु मृत्स्नं च प्राणायतनमुत्तमम् ॥ ' ( सु. सू. अ. १५ ) । आचार्य ने चिकित्सा स्थान २४ वें अध्याय में ओज का विशेष लक्षण दशगुण का होना बताया है जैसा कि - ' गुरु शीतं मृदु स्निग्धं बहुलं मधुरं स्थिरम् । प्रसन्नं पिच्छिलं ऋक्षण-मोजो दशगुणं स्मृतम् ॥ ' आजकल लोग ओज को शरीर के Natural Resistance से सम्बद्ध करने लगे हैं । प्रथमं जायते ह्योजः शरीरेऽस्मिञ्छरीरिणाम् । सर्पिर्वर्ण मधुरसं लाजगन्धि प्रजायते ॥७५ ॥

ओज की उत्पत्ति शरीर में कैसे होती है? - इस पर आचार्य ने बताया है कि मनुष्यों के शरीर में प्रथम ओज की उत्पत्ति होती है और उसका वर्ण घृत के सदृश, रस मधु के समान और गन्ध धान के लावा के सदृश होता है । ७५ ॥ विमर्श - यहाँ प्रथम शरीर का तात्पर्य गर्भ से होता है अर्थात् गर्भ में ही ओज की उत्पत्ति होती है और बाद में रसादि शुक्रान्त सात धातुओं के सार से इसकी उत्पत्ति होती है । तात्पर्य यह है कि ओज के न रहने पर शरीर की स्थिति भी नहीं होती है । गर्भावस्था में भी यदि ओज नहीं रहेगा तो गर्भ की स्थिति नहीं होगी पर जन्मोत्तर शारीरिक ओज का स्वरूप गर्भावस्था कालिक ओज से भिन्न होता है क्योंकि ' ईषद् रक्तं सपीतकम् ' यह ओज का लक्षण बतलाया है और गर्भावस्थाकालिक ' सर्पिर्वर्ण मधुरसं लाजगन्धि ' से दोनों का भेद स्पष्ट किया है । ( भ्रमरैः फलपुष्पेभ्यो यथा संम्रियते मधु । तद्वदोजः स्वकर्मभ्यो गुणैः संश्रियते नृणाम् ॥१ ) ओजोत्पत्ति में उदाहरण ( जिस तरह भौरे फल और फूलों से रसों को एकत्र कर मधु -१. ' यच्छुभ्रं ' यो । २. गङ्गाधर संमतोऽयं पाठः । ३. योगीन्द्रनाथ से न संमतोऽयं पाठः ।