चरक संहिता हिन्दी भाष्य — पृष्ठ 441–450

चरक संहिता हिन्दी भाष्य · Chaukhamba · पृष्ठ 441–450

पृष्ठ 441

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३५२ चरकसंहिता इकट्ठा करते हैं वैसे ही मनुष्य के शरीर में रहने वाले गुण अपने कर्मों द्वारा ओज को एकत्रित करते हैं ॥ १ ॥ )

विमर्श - यह लोक क्षेपक का है पर चक्रपाणि ने इसे अपने यहाँ माना है । तात्पर्य यह है कि जिस भाँति फूल एवं फलों के सार को लेकर शहद की मक्खियाँ शहद का निर्माण करती हैं उसी भाँति मनुष्य जब आहार लेता है तो उसका पाचन होता है और जिसके परिणाम स्वरूप सार भाग रस और मल भाग किट्ट होता है । और इसके बाद जब धातुओं का पाक होता है तो उसके तीन भाग होते हैं, १ प्रसाद, २ किट्ट ३ सार, रस का प्रसाद रक्त, किट्ट कफ और सार ओज इसी प्रकार सात धातुओं का सार ओज होता है जो निम्न कोष्टक से स्पष्ट हो जाता है । अन्न के पचने पर सार भाग रस और किट्ट भाग विट् और मूत्र होता हैं । सार ओज धातु किट्ट प्रसाद रस कफ रक्त रक्त पित्त मांस 37 मांस छिद्रों का मल ( कान, आँख, नाक मेद 97 मुख, मूत्रेन्द्रिय का मल ) मेद स्वेद अस्थि " अस्थि केश, रोम, नख मज्जा मज्जा नेत्र का मल, नेत्र शुक्र " " एवं त्वचा में स्निग्धता इस प्रकार सभी धातुओं के सार से ओज का चयन शरीराग्नि द्वारा होता है । शुक्र में मल नहीं होता है न उसका प्रसाद ही होता है । अतः उसकी गणना नहीं की गई है । यही तात्पर्य सुश्रुत का भी है । यथा— ' रसादीनां शुक्रान्तानां धातूनां यत् परं तेजस्तन्खल्वोजः । ' ( सु. १५ ) कुछ लोग ओज के - ' गुरु शीतं मृदु स्निग्धं वहलं मधुरं स्थिरम् । प्रसन्नं पिच्छिलं श्लक्ष्णमोजो दशगुणं स्मृतम् ॥ ' इन दस गुणों के अनुसार आहार द्रव्यों के और इन्हीं के समान विहार का सेवन करने से ओज की वृद्धि होती है - ऐसा बतलाते हैं । पर यह कहना उचित नहीं है क्योंकि किसी भी प्रकार आहार का सेवन किया जाय तो उससे ओज का निर्माण अवश्य ही होगा, हाँ यह बात अवश्य है कि वह आहार - विहार शरीर के लिये अनकूल हो । व्यायामोऽनशनं चिन्ता रूक्षात्पप्रमिताशनम् । वातातपौ भयं शोको रूक्षपानं प्रजागरः ॥

कफशोणितशुक्राणां मलानां चाति वर्तनम् । कालो भूतोपघातश्च ज्ञातव्याः क्षयहेतवः ॥

क्षयों के सामान्य कारण -- अधिक व्यायाम, अनशन, अधिक चिन्ता, अधिक रूक्ष और अल्प भोजन, प्रमित भोजन करना, तीव्र हवा और धूप में बैठना, भय, शोक, रूक्ष, मदिरा आदि का पान, रात्रि जागरण, कफ, रक्त, शुक्र और मलों का अधिक मात्रा में निकलना, और काल ( वृद्धावस्था ), आदान काल, भूतोपघात ( प्रेत आदि की बाधा ) आदि ओजःक्षय में कारण जानना

चाहिए । ७६-७७ ॥

गुरुस्रिग्धाम्ललवणान्यतिमात्रं समश्नताम् । नवमन्नं च पानं च निद्रामास्यासुखानि च ॥ त्यक्तव्यायामचिन्तानां संशोधनमकुर्वताम् । श्लेष्मा पित्तं च मेदश्व मांसं चातिप्रवर्धते ॥ तैरावृतगतिर्वायुरोज आदाय गच्छति । यदा बस्ति तदा कृच्छ्रो मधुमेहः प्रवर्तते ॥ ८० ॥

१. ' अतिवर्तन मोक्षणम् ' ग. । २. ' लवणान्यतिमात्रं निषेविणाम् ' ग. ' लवणं भजतामतिमात्रशः ' इति पा. । ३. ' तैराहृतः प्रसादं च गृहीत्वा याति मारुतः ' यो. ।

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कियन्तः शिरसीयाध्यायः १७ ] सूत्रस्थानम् ३५३ समारुतस्य पित्तस्य ककस्य च मुहुर्मुहुः । दर्शयत्याकृतिं गत्वा क्षयमाप्याय्यते पुनः ॥८१ ॥

( ५ ) सप्त पिडका वर्णन ( Seven Inflammatory Swellings ) मधुमेह - विषयक निदान और सम्प्राप्ति - गुरु और स्निग्ध द्रव्य एवं अम्ल और लवण रस का अतिमात्रा में सेवन, नूतन अन्न और पान का सेवन, अधिक निद्रा सेवन, अधिक देर तक गद्देदार विस्तरे पर बैठना, व्यायाम न करना, किसी भी प्रकार की चिन्ता ( विचार ) न करना, यथासमय वमन और विरेचन आदि संशोधनों को न करना, इन सभी कारणों से शरीर में कफ, पित्त, मेद और मांस की वृद्धि अधिक रूप में हो जाती है । इनके बढ़ने से रुकी हुई वायु कुपित हो ओज को लेकर जब मूत्राशय में प्रविष्ट करती है, तब कष्टकारी मधुमेह की उत्पत्ति होती है । इस प्रकार वह मधुमेह वात, पित्त और कफ के लक्षणों को बार - बार शरीर में दिखाता है और बार - बार क्षय होकर बार - बार बढ़ जाया करता है ॥ ७८-८१ ॥ विमर्श - मधुमेह का प्रधान कारण वायु है । इसका प्रकोप धातुक्षय तथा अन्य दोषों के आवरण से हो सकता है । प्रमेह से शरीर की पोषक धातुओं का क्षय होता है । इस प्रकार पैत्तिक या कफज मेहों की उपेक्षा करने से धातुयें अत्यधिक क्षीण हो जाती हैं जिससे वायु प्रकु-पित होकर मधुमेह को उत्पन्न करती है । आधुनिक विद्वान् मधुमेह को प्राङ्गोदीयों ( Carbobydrates ) के समवर्त की विकृति का परिणाम मानते हैं, इसका वर्णन पीछे हो चुका है । वस्तुतः यह रोग वृद्धावस्था में जब कि सब धातुयें क्षीण होने लगती है, उत्पन्न होता है । साधारणतया सभी मेह त्रिदोषज होते हैं । यदि वायु स्वकारणों से प्रकुपित होती है तो वातिक लक्षण प्रधानरूप में मिलेंगे । यदि वह किसी दोष से आवृत है तो उस दोष के लक्षणों की अभिव्यक्ति भी होती है । यदि कफजमेह, मधुमेह में परिणत हुआ है तो कफजन्य लक्षय गौण हो जाते हैं, किन्तु कभी कभी उसके लक्षण भी व्यक्त हो जाते हैं और मधुमेह के लक्षण भी कम या अधिक होते रहते है । इस प्रकार बार बार आक्रमण होने से साध्य प्रमेह भी असाध्य हो जाते हैं । इससे यह भी स्पष्ट होता है कि आवरणदोषजनित मधुमेह आरम्भ में साध्य भी हो सकता I धातुक्षयजनित वान से उत्पन्न मधुमेह में वातिक लक्षण मात्र होते हैं और वह यदि स्वतन्त्ररूप से उत्पन्न है तो असाध्य ही होगा । अर्थात् कफज और पित्तज मेह जो क्रमशः साध्य या याप्य कहे जाते हैं उनकी उचित और समय पर चिकित्सा न करने पर वे मधुमेह में परिणत हो कर और कष्टसाध्य हो जाते हैं | किन्तु रोग के बार - बार आक्रमण होने पर वे असाध्य हो जाते हैं । तथा आवरणदोषजनित या उपेक्षित प्रमेहजन्य मधुमेह कष्टसाध्य, किन्तु स्वतन्त्र वातकोपजन्य मधुमेह असाध्य होता है । वाग्भट ने मधुमेह में मूत्र को ' मधुसम ' तथा शरीर को भी माधुर्य - गुणयुक्त बताया है । मधुसम शब्द से केवल मधुमेही के मूत्र की मधुरता, कषायता तथा रूक्षता का ही ग्रहण करना चाहिये उसकी धनता का नहीं; क्योंकि मधुमेही का मूत्र जलबहुल होता है । ' माधुर्याच्च तनोः '. वाग्भट के से तनु या शरीर के माधुर्य से रक्तगत शर्करा की वृद्धि समझनी चाहिये । इस रोग में रक्तगत शर्करा वृद्धि के साथ - साथ मूत्र द्वारा भी उसका उत्सर्ग होता है । शारीर क्रिया विज्ञान की दृष्टि से इसे मधुमेहयुक्त परम मधुमयता ( Hyperglycaemia with glycosuria ) कहते हैं । इक्षुमेह से इसका यही भेद है । मधुमेह ( Diabetes Mellitus ) में शरीर का मधुर होना या रक्तगत शर्करा का वृक्कदेहली - मर्यादा ( Renal threshold ) से अधिक होना आवश्यक हैं, जब कि इक्षुमेह में रक्तगत शर्करा की वृद्धि नहीं होती है । २३ च ० सं ०

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३५४ चरकसंहिता मधुमेह प्राथमिक ( Primary ) तथा अन्य मेहों की उपेक्षा करने पर उपद्रवस्वरूप ( Secondary ) भी हो सकता है; क्योंकि सुश्रुत ने कहा है-सर्व एव प्रमेहास्तु कालेनाप्रतिकारिणः । मधुमेहत्वमायान्ति तथाऽसाध्या भवन्ति हि ॥ मधुमेह को आजकल डायबिटीज मेलाइटस ( Diabetes mellitus ) कहते हैं । इसमें मूत्र के साथ ओज का क्षरण होता है । चरक मधुमेह को ओजोमेह भी कहते हैं । इस प्रकार जो लोग ओजोमेह में अल्ब्युमिन्यूरिया ( Albuminuria ) मानते हैं वह ठीक नहीं । इस रोग में निक-लने वाला ओज मधुर स्वभाव होता है, इसीके लोभ से रोगी के मूत्र में चीटियां लगती हैं । आजकल इसे ग्लुकोज़ ( Glucose ) कहते हैं । पाकृत अवस्था में मूत्र का सापेक्ष गुरुत्व ( Speeific gravity ) १०१५ से १०२५ तक होती है । इस अवस्था में यह १०३० से अधिक हो जाती है । स्वस्थ मनुष्य के मूत्र में शर्करा नहीं रहती है । मूत्र में शर्करा की उपस्थिति का कारण जानने से पूर्व शरीर में प्राङ्गोदीय ( Carbohydrates ) के समवर्त ( Metabolism ) का ज्ञान कर लेना अनिवार्य है । इसलिये संक्षेप में उसका विवरण नीचे की पक्तियों में किया जा रहा है 1 प्राङ्गोद्रीय ( Carbohydrates ) आन्त्रिक पाचन के द्वारा मधुशर्करा ( Glucose ) के रूप में परिणत होकर शोषित हो जाता है और रक्तवाहिनियों द्वारा यकृत् में पहुंचकर ग्लाइकोजन के रूप में संचित हो जाता है । इसका कुछ भाग पेशियों में भी संचित होता है । आवश्यकता पड़ने पर पुनः यह ग्लाकोजिनेज नामक किण्व ( Enzyme ) के द्वारा ग्लूकोज के रूप में परिवर्तित होकर शरीर के काम में आता है । पेशियों को शक्ति प्रदान करने के निमित्त रक्त में भी यह एक निश्चित परिमाण में बना रहता है । अन्ततोगत्वा यह जल और कार्बन डाइआक्साइड के रूप में परिणत हो जाता है । रक्त में साधारणतया इसकी मात्रा ०.०८ से ०.१८ प्रतिशत तक रहती है । शर्कराबहुल पदार्थों के अधिक सेवन से इसकी मात्रा बढ़ती है तथा बन्द कर देने से घटती हैं । रक्त आवश्यकता से अधिक शर्करा होने पर उसका संचय यकृत् में ग्लाइकोजन के रूप में हो जाता है । जब यकृत् भी इससे परिपूर्ण हो जाना है तो ग्लूकोज मेद के रूप में परिवर्तित होकर शरीर की विभिन्न धातुओं में मंचित हो जाता है । मूत्र में शर्करा की उपस्थिति का प्रधान कारण प्राङ्गोदीर्यो ( Carbohydrates ) के समवर्त्त की विकृति ही है । शर्करा रक्त से वृक्कों द्वारा छन कर ही मूत्र में आती है । साधारणतया जब तक रक्त में १.८ प्रतिशत से कम शर्करा रहती है तब तक वृक्क उसे नहीं छानते । इसको वृक्क देहली मर्यादा ( Renal threshold ) कहते हैं । जिस अवस्था में शर्करा की प्रतिशत मात्रा वृक्क देहली मर्यादा को अतिकान्त कर जाती है तो वृक्क के द्वारा उसका क्षरण होने लगता है । कुछ रोगियों में वृक्क देहली मर्यादा ही स्वभाव से कम होती है तब इससे कम प्रतिशत प्रमाण में रहने पर भी उसका क्षरण हुआ करता है । इसे वृक्कज शर्करा मेह ( Renel glycosuria ) कहते हैं । यह चिन्ताजनक स्थिति नहीं है । वृक्क के अतिरिक्त प्राङ्गोदीय ( Carbohydrates ) बहुल पदार्थों के अत्यधिक सेवन से वृक्क देहली मर्यादा ( Renal threshold ) का अतिक्रमण होने पर मूत्र में शर्करा की उपस्थिति मिलती है । इसे सन्तर्पणजन्य इक्षुमेह अथवा भोजनजन्य शर्करामेह ( Alimentary glycosuria ) कहते हैं । यह स्थिति भी चिन्ताजनक नहीं है; क्योंकि प्राङ्गोदीयों की मात्रा कम कर देने पर यह विकृति ठीक हो जाती है । शर्करामेह का मुख्य कारण कुछ अन्तःस्रावी ग्रन्थियों ( Ductless glands ) के स्रात्रों की विकृति है । अग्न्याशय ( Pancrease ), चुल्लिकाग्रन्थि ( Thyroid ), अधिवृक्क ( Suprarenal ) तथा पीयूष ग्रन्थि ( Pitutary body ) ये चार ग्रन्थियां प्राङ्गोदीय समवर्त ( Carbohydrate metabolism ) का नियन्त्रण करती हैं ।

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कियन्तः शिरसीयाध्यायः १७ ] सूत्रस्थानम् ३५५ अग्न्याशय — इससे दो प्रकार के स्राव निकलते हैं । अग्न्याशयरस ( Pancreatic - juice ) इसका प्रथम स्राव है जो पच्यमानाशय ( Duodenum ) के पित्त के साथ मिलकर प्रधानतया बसा तथा भोजन के अन्य भागों का भी पाचन करता है । दूसरा अन्तःस्राव है जो रक्त प्रवाह में मिलकर क्रिया करता है । इसका क्रियाकारी तत्त्व मधुनिषूदिनी ( Insulin ) है । यह पेशियों द्वारा शर्करा का उपयोग तथा यकृत् के द्वारा इसका संचय कराता है । इसका अभाव या कमी होने पर पेशियां शर्करा का उपयोग नहीं कर सकतीं और न तो यकृत में ही उसका संचय हो सकता है । परिणामस्वरूप रक्तगत शर्करा बढ़कर वृक्क देहली मर्यादा का अतिक्रमण करके मूत्र द्वारा उत्सृष्ट होने लगती है । यह चिन्ताजनक स्थिति है । इस अवस्था में वृक्क पूर्णतया स्वस्थ रहते हैं । शेष तीनों ग्रन्थियां मधुनिषूदिनी ( Insulin ) की क्रिया को रोकती हैं । इस प्रकार इन चारों ग्रन्थियों के अन्तःस्रावों की प्राकृत अवस्था शर्करा के परिवर्तनों का नियन्त्रण करती है । कभी कभी मधुनिषू-दिनी की क्रिया बढ़ जाती है या अन्य तीन ग्रन्थियों की क्रिया घट जाती है तो रक्तगत शर्करा प्रकृत से भी कम हो जाती है जिसे उपमधुमयता ( Hypoglycaemia ) कहते हैं । यह भी चिन्ताजनक स्थिति है, यदि तुरन्त शीघ्रकारी उपायों द्वारा रक्तगत शर्करा की वृद्धि न की जाय तो रोगी के प्राण संकट में पड़ जाते हैं । यह स्थिति मधुनिघूदिनी लेने के पश्चात् तुरन्त ग्लुकोज न लेने पर भी देखी जाती है । इससे यह स्पष्ट है कि मधुमेह का प्रधान कारण अन्याशय का विकृत होना है । साधारण मधुमेह में भोजन के कुछ देर बाद तक रक्तगत शर्करा की मात्रा प्राकृत से अधिक रहती है और उसका मूत्र द्वारा क्षरण होता रहता है । किन्तु मधुमेह की तीव्र अवस्था में रक्तगत शर्करा सदा प्राकृतांश से कई गुना अधिक रहती है और उसका उत्सर्ग भी मूत्र द्वारा सर्वदा होता रहता है । इस प्रकार शर्करा समवर्त ( Metabolism ) का प्रभाव वसा और प्रोटीन पर भी पढ़ता है । वसा समवर्त में विकृति होने से अम्लोत्कर्ष ( Ketosis ) होता है जिससे रक्त की क्षारीयता प्राकृत से बहुत कम हो जाती है और रोगी में संन्यास सदृश लक्षण उत्पन्न हो जाते हैं । * उपेक्षयाऽस्य जायन्ते पिडकाः सप्त दारुणाः । मांसलेश्ववकाशेषु मर्मस्वपि च संधिषु ॥ ८२ ॥

शराविका कच्छपिका जालिनी सर्षपी तथा । अलजी विनताख्या च विद्रधी चेति सप्तमी ॥

प्रमेह - पिडकाओं की उत्पत्ति - मधुमेह की उपेक्षा करने से मांसल प्रदेशों में, मर्मस्थानों में एवं सन्धियों में सात प्रकार की कष्टदायक पिडकायें उत्पन्न हो जाती हैं जिनके क्रमशः नाम ये हैं १. शराविका २ कच्छपिका, ३. जालिनी, ४. सर्षपी, ५. अलजी, ६. विनता और

७. विद्रधी ॥। ८२-८३ ॥

विमर्श - प्रमेहरोग से पीडित मेदस्वी व्यक्तियों में पिडकायें अधिक उत्पन्न होती हैं । साधारणतया सभी प्रमेहों के उपद्रवस्वरूप पिडकायें उत्पन्न हो सकती हैं किन्तु मधुमेह, ( Diabetes mellitus ), इक्षुमेह ( Renal glycosuria ), वसामेह ( Lipuria ) और मज्जा-मेह ( Chylaria ) इस रोग के प्रमुख कारण हैं । इसके अतिरिक्त दुर्बलता करनेवाले ज्वर सदृशरोग भी इसके कारण है । अतएव चरक ने कहा है - ' विना प्रमेहमप्येता जायन्ते दुष्टमेदसः ' । पूयजनक स्तबक गोलाणु ( Staphylococcus ) इस रोग की उत्पत्ति के प्रधान कारण है । आजकल इस रोग को कार्बङ्कल ( Carbuncle ) कहते है । चरक ने पुत्रिणी, विदारिका तथा मसूरिका को न मानकर केवल सात प्रकार की ही पिडकाओं का वर्णन किया है किन्तु अन्य प्रकार की पिडकाओं की सम्भावना भी मानी है । ' तथाऽन्याः पिडकाः सन्ति ' । भोज ने विनता को छोड़ दिया है और मसूरिका के स्थान पर कुलत्थिका कहा है । इस प्रकार केवल नव भेद माने हैं । इसका वर्णन तुलनात्मक रूप में निम्नलिखित रूप में दिया जा रहा है । १. ' भवन्त्युपेक्षया तस्य ' यो. ।

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३५६ चरकसंहिता प्रमेह - पिडिका वाग्भट चरक १ शराविका . सुश्रुत भोज शराविका शराविका शराविका २ कच्छ पिका कच्छपिका कच्छपिका कूमिका ३ जालिनी जालिनी जालिनी जालिनी ४ सर्पपी सर्वपी सर्पपिका सर्पनिका ५ अलजी अलजी अलजी अलजी ६ विनता विनता विनता ७ विद्रधि चिद्रविका विद्रधि विद्रधि ८ मसूरिका मसूरिका कुलत्थिका ९ पुत्रिणी पुत्रिणी पुत्रिका १० विदारिका विदारिका विदारी वस्तुतः Carbuncle एक ही व्याधि है किन्तु पिडकाओं की आकृति तथा कुछ लक्षण भिन्नता के कारण इसके भेद किये गये है । चिकित्सा की दृष्टिसे इनमें विशेष अन्तर नहीं है । मांसल स्थान गुदा ( Perineum ) आदि मर्मस्थानों में ये प्रायः होती हैं । वस्तुतः जिस स्थान पर पोषण या रक्तसंवहन कम होता है वहीं यह पिडका पायी जाती है । इस प्रकार इस अवस्था को अधस्त्वक् धातुओं ( Subcutaneous tissues ) में होनेवाला स्थानीय कोव या निर्जीबाङ्गना ( Localised gangreze ) कह सकते हैं । इसके लक्षण निम्नाकित हैं - ( १ ) मध्यम में एक बड़ी पिडका रहती है और उसके चारों ओर अनेक सच्छिद्र फुंसियां रहती हैं । इसका सादृश्य पुत्रिणी से किया जा सकता है । ( २ ) दाह, पीडा, रक्तिमा, स्पर्शनासहता ( Tenderness ) जैसे व्रणशोध के लक्षण मिलेंगे । ( ३ ) पीले चमकीले पूय का स्राव होता है स्राव में पूयजनक स्तबक गोलाणु ( Staphylococcus ) भी मिलते है । ( ४ ) आक्षेप, प्रलाप सदृश विषमयता के लक्षण भी अभिव्यक्त हो जाते हैं । अन्तोन्नता मध्यनिम्ना श्यावा क्लेदरुगन्विता । शराविका स्यात् पिडका शरावाकृतिसंस्थिता ॥ ( १ ) शराविका का लक्षण -- जिन पिडकाओं के अन्त ( किनारे ) का भाग ऊँचा हो, बीच के भाग में गड्डे के समान हो, जो वर्ण में श्याव तथा क्लेद्र और पीडा से युक्त हो तथा जो देखने में शराब के आकार की हों उन्हें शराविका कहा जाता हैं ॥। ८४ ॥ अवगाढार्तिनिस्तोदा महावास्तुपरिग्रहा । श्लक्ष्णा कच्छपपृष्ठाभा पिडका कच्छपी मता ॥ ( २ ) कच्छपिका का लक्षण I जिस पिडका में गहराई में वेदना, तोद ( सुई चुभोने सी पीडा ) हो, जिसका वास्तु ( मूल ) बहुत बड़ा हो और जिसका परिग्रह ( घेरा ) दूर तक हो, जो स्पर्श करने में चिकनी हो और देखने में कछुये की पीठ के आकार की हो उसे कच्छपिका

कहते हैं ॥। ८५ ॥

विमर्श - कच्छपिका की तुलना Carbuncle के Induration से की जा सकती है । स्तब्धा सिराजालवती स्निग्धास्रावा महाशया । रुजानिस्तोदबहुला सूक्ष्मच्छिद्रा च जालिनी ॥ ( ३ ) जालिनी का लक्षण - जिस पिडका के चारों तरफ जकड़ाहट और शिराओं का जाल फैला हो, जिससे चिकना स्राव निकलता हो, जिसमें व्रग का आशय ( स्थान ) गहराई तक - हो, वेदना और तोद अधिक हो और जिस में छोटे - छोटे अनेक छिद्र दिखाई पड़े उसे जालिनी कहा जाता है ॥ ८६ ॥

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कियन्तः शिरसीयाध्याय: १७ ] सूत्रस्थानम् ३५७ विमर्श - जालिनी की तुलना Carbuncle के Siere - like - appearance से की जा

सकती है ।

पिडका नातिमहती क्षिप्रपाका महाराजा । सर्पपी सर्षपाभाभिः पिडकाभिचिता भवेत् ॥

( ४ ) सर्पपी का लक्षण - जो पिडिका बहुत बड़ी न हो और बहुत छोटी भी न हो, शीघ्र ही पकने वाली हो, वेदना अधिक हो, एक बड़ी पिडिका हो और उसके चारों तरफ सरसों के समान कान्ति वालो और स्वरूप वाली पीली - पीली पिडकायें व्याप्त हों तो उसे सर्पपी कहते है ॥ ८७ ॥

विमर्श - सुश्रुत में निम्न रूप का वर्णन मिलता है, यथा - ' गौरसर्षपसंस्थाना तत्प्रमाणा च सर्षपी ' । दहति स्वचमुत्थाने तृष्णामोहज्वरप्रदा । विसर्पत्यनिशं दुःखोदहत्यग्निरिवालजी ॥ ८८ ॥

( ५ ) अलजी का लक्षण — में दाह उत्पन्न करती हैं, जो पिडका उत्पन्न होने के स्थान तृष्णा, मोह, ज्वर को देने वाली होती है और शीघ्र ही फैल जाती है, लगातार अग्नि से जलने के समान दख देने वाली होती है, उस पिडका का नाम अलजी है ॥ ८८ ॥

विमर्श - सुश्रुत ने इसका वर्ण रक्त और श्वेत बताया है यथा- ' रक्तासिता स्फोटवती

दारुणा तलजी भवेत् ' । इन लक्षणों से यह पित्त प्रधान पिड़का प्रतीत होती है ।

अवगाढरुजाक्केदा पृष्ठे वाऽप्युदरेऽपि वा । महती विनता नीला पिडका विनता मता ॥८ ९ ॥

( ६ ) विनता के लक्षण - • गम्भीर वेदना और केद्र युक्त, पीठ में या उदर प्रदेश में होने वाली. बडी और बीच में गढ़ने वाली नील वर्ण की पिडका का नाम विनता है ॥ ८ ९ ॥ * विद्रधिं द्विविधामाहुर्बाह्यामाभ्यन्तरीं तथा । बाह्या त्वक्स्नायुमांसोत्था कण्डराभौ महारुजा ॥ ( ७ ) विद्रधिपिका के भेद - ( क ) त्राह्यविद्रधि के लक्षण - विद्रधि नामक पिडका दो प्रकार की होती है, एक बाह्य तथा दूसरी आभ्यन्तर । बाह्य विद्रधि त्वचा, स्नायु और मांस में उत्पन्न होती है जो कण्डरा के समान और अत्यधिक वेदना वाली होती है ॥ ९ ० ॥ विमर्श - द्रिषि ( Abscess ) में जब मुख बन जाता है तो उसे व्रग ( Ulcer ) कहा जाना है । इसके लक्षण तथा सम्प्राप्ति आयुर्वेद में इस प्रकार बताई गई है - ' त्वग्रक्तमांसमेदांसि प्रदूष्या-स्थिसमाश्रिताः । दोषाः शोकं शनैर्घोरं जनयन्त्युच्छ्रिता भृशम् ॥ महामूलं रुजावन्तं वृत्तं चाप्यथ-वायनम् । तमाहुर्विद्राधे धीराः | ' ( सु. नि. ९ ) । दोष जब त्वचा, मांस, स्नायु में कुपित होते हैं तो इसे बाह्य द्रव ( External abscess ) i कोष्ठ और ( Appends, Gallbladder ) इत्यादि स्थानों में कुपित होते हैं तो उसे आभ्यन्तर विद्रधि ( Internal abcsess ) कहते हैं । प्रायः मधुमेह में जो पिडकार्ये होती हैं वह असाध्य होती हैं क्योंकि उसमें धातुयें दूषित रहती है, जैसा कि - ' कुष्ठिनां विषजुष्टानां पिडिका मधुमेहिनाम् । व्रगाः कृच्छ्रेग सिध्यन्ति येषाञ्चापि व्रगे व्रणाः ॥ ' ( सुश्रुत सू. अ. २३ ) बताया है । सुश्रुत ने वाह्य विधिको वात, पित्त, कफ, सन्निपात, आगन्तुक तथा रक्तज भेद से ६ तरह का माना है । शल्य तन्त्र ( Surgery ) का विषय होने से चरक ने इसका विस्तार नहीं किया है । बाह्य विद्रधि में शोथ ( Inflammation ) के निम्नांकित स्थानिक लक्षग ( Local symptoms ) माने जाते हैं । ( 1 ) Pain, ( 2 ) Redness, ( 3 ) Swelling, ( 4 ) Hotness, ( 5 ) Loss of function | सार्वदेहिक ( General symptom ) की दृष्टि से Fever तथा Leucocytosis ( श्वेतकायात्कर्ष ) उल्लेखनीय हैं । १. ' दुःखा दहति ' यो । २. ' कण्डराभा स्थूलनाम्वाकारा ' चक्रः ।

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३५८ चरकसंहिता शीतकान्नविदाद्युष्णरूक्षशुष्कातिभोजनात् । बिरुद्धाजीर्णसंष्टिविषमासात्म्य भोजनात्॥९ १ ॥ व्यापन्नबहुमद्यत्वाद्वेगसंधारणाच्छ्रमात् । जिह्मव्यायामशयनादतिभाराध्वमैथुनात् ॥ ९ २ ॥ अन्तःशरीरे मांसासृगाविशन्ति यदा मलाः । तदा संजायते ग्रन्थिर्गम्भीरस्थः सुदारुणः ॥ * हृदये को नि यकृति प्लीह्नि कुक्षौ च वृक्कयोः । नाभ्यां वङ्क्षणयोर्वाऽपि बस्तौ वा तीव्रवेदनः ॥ ( ख ) अन्तर्विद्रधि के कारण, सम्प्राप्ति और स्थान — बासी भोजन, विदाही अन्न, उष्ण, रूक्ष और शुष्क आहार द्रव्यों का अधिक भोजन, विरुद्ध भोजन, अजीर्ण भोजन, संक्किष्ट भोजन ( दुष्ट भोजन ), विषम भोजन और प्रकृति के विपरीत भोजन, दूषित मदिरा का अधिक सेवन, मल - मूत्र के वेगों को रोकना, अधिक परिश्रम, अनुचित आसन से व्यायाम, अनुचित आसन से शयन, अधिक भार का ढोना, अधिक रास्ता चलना, अधिक मैथुन करना, इन सव कारणों से कुपित हुये वातादि दोष शरीर के जिन - जिन भीतरी अवयवों में प्रविष्ट करते हैं उन अवयवों में कठिन और गम्भीर गाँठ उत्पन्न कर देते है । ये गाँठे हृदय, कोम, यकृत, प्लीहा, कुक्षि, वृक्क, नाभि, वंक्षण और बस्ति प्रदेशों में उत्पन्न होती हैं और उनमें तीव्र वेदना होती है | विमर्श - सुश्रुत ने भी अन्तर विद्रधि का कारण और सम्प्राप्ति इसी रूप में बताई है पर विद्रधि का स्थान कुछ भिन्न बताया है, यथा - ' आभ्यन्तरानतस्तूर्ध्व विद्रधीन् परिचक्षते । गुर्व-सात्म्यविरुद्धान्नशुष्क संसृष्टभोजनात् ॥ अतिव्यवायव्यायाम वेगाघातविदाहिभिः । पृथक् संभूय वा दोषाः कुपिता गुल्मरूपिणम् ॥ वल्मीकवत्समुन्नद्धमन्तः कुर्वन्ति विद्रधिम् । गुदे बस्तिमुखे नाभ्यां कुक्षौ वक्षणयोस्तथा ॥ वृक्कयोर्यकृति प्लीह्नि हृदये क्लोनि वा तथा । ' ( सु. नि. ९ ) दुष्टरक्तातिमात्रत्वात् स वै शीघ्रं विदह्यते । ततः शीघ्रविदाहित्वाद्विद्रधीत्यभिधीयते ॥ विद्रधि की निरुक्ति • दुष्ट रक्त की अधिकता होने से वह शीघ्र ही विदाहयुक्त होती है 1 शीघ्र ही विदाह युक्त होने से उसे विद्रधि कहा जाता है ॥ ९ ५ ॥ व्यधच्छेदभ्रमानाहशब्दस्फुरणसर्पणैः । वातिकीं, पैत्तिकीं तृष्णादाहमोहमदज्वरैः ॥ ९ ६ ॥ वातजन्य और पित्तजन्य अन्तर्विद्रधि के लक्षण - व्यधन, छेदन, भ्रम, आनाह, शब्द, फरफराहट और सर्पण ( अधिक पिडका का फैलना ) इन लक्षणों के होने पर वातज; तृष्णा, दाह, मोह, मद और ज्वर होने से पित्तज विद्रधि समझना चाहिए ॥ ९ ६ ॥ विमर्श - सुश्रुत ने इसके लक्षण निम्नलिखित रूप से बताये है- ' कृष्णोऽरुणो वा विपनो भृशम-त्यर्थवेदनः । चित्रोत्थानप्रपाकश्च विद्रधिर्वातसम्भवः ॥ पक्कोदुम्बरकाशः श्यावो वा ज्वरदाहवान् । क्षिप्रोत्थानप्रपाकश्च विद्रधिः पित्तसम्भवः ॥ ' ( सु. नि. अ. ९ ) अर्थात् जिस विद्रधि का वर्ण काला चा लाल हो और स्पर्श में परुप हो, अधिक वेदना होती और अनेक रूप से उसका उत्थान हो और पाक हो अर्थात् उसकी आकृति सुडौल न हो और पाक किसी अङ्ग में हो और किसी अंग में न हो वह वातज विद्रधि कही जाती है । और जिस विद्रधि का वर्ण पके हुए गूलर के फल के समान काला हो, ज्वर और दाह हो और शीघ्र ही विवि की उत्पत्ति हो और शीघ्र ही पक जाय उसे पित्तज विद्रधि कहते है । जृम्भोत्क्लेशारुचिस्तम्भशीतकैः श्लैष्मिकीं विदुः । सर्वासु च महच्छूलं विद्रधीषूपजायते ॥ कफज अन्तर्विद्रधि के लक्षण - जम्हाई, जी मचलाना, अरुचि, शरीर में जकड़ाहट और शरीर में ठण्डक लगने से कफज विद्रधि समझनी चाहिए । इन सभी विधियों में सर्वदा अधिक रूप में वेदना होती रहती है ॥ ९ ७ ॥ १. संक्किष्टं दोषलम् ' इति चक्रः ।

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कियन्तः शिरसीयाध्यायः १७ ] सूत्रस्थानम् ३५६ विमर्श - सुश्रुत ने - ' शरावसदृशः पाण्डुः शीतः स्निग्धोऽल्पवेदनः । चिरोत्थानप्रपाकश्च विद्रधिः कफसम्भवः ॥ ' ( सु. नि. अ. ९ ) अर्थात् कफज विद्रधि में जो पिडकायें होती हैं उनके किनारे ऊँचे, बीच में गहरे होते हैं । पाण्डु वर्ण, स्पर्श में शीतल, स्तब्ध और उसमें वेदना अल्प होती है । ये पिडिकायें देर से अपना स्वरूप ग्रहण करती है । इनका पाक भी देर से होता हैं और खुजली होती है । शस्त्रास्त्रैभिंद्यत इव चोल्मुकैरिव दह्यते । विद्रधी व्यम्लेतां याता वृश्चिकैरिव दश्यते॥९ ८ ॥ सब विधियों का ( पच्यमान ) लक्षण - पाक प्राप्त विद्रधि में शस्त्र - अस्त्र से भेदन करने की तरह पीडा होती है । उल्मुक ( लुकारी ) जलते हुये अङ्गार से जलाने के समान दाह होता है और विच्छू काटने पर जिस प्रकार वेदना होती है उस प्रकार की वेदना होती है ॥ ९ ८ ॥ विमर्श - सुश्रुत ने भी इन लक्षणों को अपने यहाँ इसी प्रकार स्पष्ट किया है, यथा - सूची-भिरिव निस्तुद्यते, दश्यत इव पिपीलिकाभिः, ताभिश्च संसर्प्यत इव, विद्यत इव शस्त्रेण, भिद्यत इव शक्तिभिः, ताब्यत इव दण्डेन, पीड्यत इव पाणिना, घट्यत इव चाङ्गुल्या, दह्यते पच्यत इव चाग्नि-क्षाराभ्याम्, ओषचोषपरीदाहाश्च भवन्ति, वृश्चिकविद्ध इव च स्थानासनशयनेषु न शान्तिमुपैति । ' ( सु. सू. अ. १७ ) । तनु रूक्षारुणं श्यावं फेनिलं वातविद्रधी । तिलमाषकुलत्थोदसंनिभं पित्तविद्रधी ॥ ९९ ॥

स्राव के अनुसार विद्रधियों में दोष की कल्पना - जिस विद्रधि से पतला, रूखा, अरुण, श्याव, फेनयुक्त स्राव होता है उसे वातज विद्रधि, जिस विद्रधि से तिल, उड़द और कुलथी के क्वाथ के समान स्राव निकलता हो उसे पित्तज विद्रधि कहा जाता है ॥ ९९ ॥

श्लैष्मिकी स्रवति श्वेतं पिच्छिलं बहलं बहु । लक्षणं सर्वमेवैतद्भजते सान्निपातिकी ॥ १०० ॥

और भी - जिस विद्रधि से श्वेत, गाढ़ा, चिपचिपा और मात्रा में अधिक स्राव निकलता हो उसे कफज विद्वा और जिस विद्रधि से इन सभी लक्षणों से युक्त स्राव होता हो उसे सन्निपातज विद्रधि कहा जाता है ॥ १०० ॥

विमर्श - सुश्रुत ने भी स्राव के अनुसार अत्यन्त संक्षेप में लक्षण बतलाया है, यथा-- ' तनुपीत-सिताश्चैषामात्रावाः क्रमशः स्मृताः । तथा त्रिदोषज विद्रधि का लक्षण - ' नानावर्णरुजाखावो घाटालो विषमो महान् । विषमं पच्यते चापि विद्रधिः सान्निपातिकः । ' ( सु. नि. ९ ) * अथासां विद्रधीनां साध्या साध्यत्वविशेषज्ञानार्थं स्थानकृतं लिङ्गविशेषमुपदेच्यामः— तत्र प्रधानमजायां विद्वध्यां हृद्वट्टनतमकप्रमोहकासश्वासाः, क्लोमजायां पिपासामुखशोष-गलग्रहाः, यकृजायां श्वासः, प्लीहजायामुच्छ्वासोपरोधः, कुक्षिजायां कुत्तिपार्श्वान्तरांसशूलं, वृक्कजायां पृष्टकटिग्रहः, नाभिजायां हिक्का, वङ्क्षणजायां सक्थिसादः, बस्तिजायां कृच्छ्रे-पूतिमूत्र वर्चस्वं चेति ॥ १०१ ॥

अन्तर्विद्रधियों का सापेक्ष निदान - विद्रवियों की साध्य एवं असाध्यावस्था जानने के लिये स्थानभेद के अनुसार उत्पन्न होने वाले विभिन्न लक्षणों का वर्णन किया जा रहा है । प्रधान मर्म हृदय में उत्पन्न होने वाली विद्रधि में हृदय में धड़कन, नमकश्वास, मोह ( मूर्च्छा ) और कास-श्वास होता है । क्लोमस्थान में विद्रधि होने से प्यास की वृद्धि, मुख का सूखना और बोली बन्द हो जाती है । यकृत में विद्रधि होने पर श्वास की वृद्धि हो जाती है । प्लीहा में विद्रधि होने पर १. ‘ चोल्ककैरिव ’ ग. । डल्मुकैरङ्गारैः । ३. ' स्त्रावम् ' इति पा. । ५. ‘ कृच्छ्रमूत्रपूतिवर्चस्त्वम् ' यो. । २. ' व्यम्लतां याता विदाहं प्राप्ता ' इति चक्रः । ४. प्रधानमर्मजायां हृदयजायाम् ।

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३६० चरकसंहिता उच्छ्वास की रुकावट होती है । उदर में विद्रधि होने पर उदर, पार्श्वों के बीच और कन्धों में शूल होता है । वृक्क में विद्रधि होने पर पार्श्व, पृष्ठ और कटि में ग्रह ( जकड़ाहट ) होती है । नाभि में विद्रधि होने पर हिचकी होती है । वंक्षण में विद्रधि होने पर पैरों में अवसाद ( थकावट ) होती है । मूत्राशय में विद्रधि होने पर कठिनना से दुर्गन्धयुक्त मूत्र और मल का त्याग होता है ॥१०१ ॥

विमर्श - यहाँ दोषों के अनुसार और घाव के अनुसार विद्रधि का लक्षण बताया गया है सुश्रुत ने आगन्तुक और रक्तज ये दो भेद और माने हैं । पर चरक ने इन्हें नहीं माना है । इसका कारण यह है कि आगन्तुक विद्रधि में बाद में दोषों का सम्बन्ध होता है और उसकी चिकित्सा दोष के अनुसार ही होती है । इससे अलग नहीं माना है । रक्तजविद्रधि को पित्त के अन्तर्गत ही मान लिया है । इसके बाद अन्तर्विद्रधि जो भिन्न - भिन्न स्थानों में होती है उसका लक्षण बनाया है । यह लक्षण या स्थान प्रायोवाद लेकर है । इन स्थानों के अतिरिक्त भी विद्रधि होती है । सुश्रुत ने अन्तर्विद्रधि के ये स्थान बताये हैं, यथा- ' गुदे वातनिरोधस्तु वस्तौ कृच्छ्राल्प-सूत्रता । नाभ्यां हिक्का तथाऽऽटोपः कुक्षौ मारुतकोपनम् || कटीपृष्ठग्रहस्तीव्र तु विद्रधौ । वृक्कयोः पार्श्वसंकोचः प्लीह्रयुच्छ्वासावरोधनम् ॥ सर्वाङ्गप्रग्रहस्तीत्रो हृदि कासश्च जायते । श्वासो यकृति हिक्का च क्लोन पेपीयते पयः ॥ ' ( सु. नि. अ. ९ ) । यहाँ गुदा में एक अलग अन्तर्विद्रधि माना है । पर चरक ने इसकानाम नहीं गिनाया है । इसके अतिरिक्त रक्तविद्धि स्त्रियों में होता है - ऐसा बताया है, यथा - ' स्त्रीणामपप्रजातानां प्रजातानां तथाऽहितैः । दाहज्वरकरो घोरो जायते रक्तविद्रधिः ॥ अपि सम्यक्प्रजातानामसृक्कायादनिःसृतम् । रक्तजं विद्रधिं कुर्यात्कुक्षौ मक्कल -संज्ञितम् ॥ ' इति ( सु. नि. अ. ९ ) । इसके अतिरिक्त सुश्रुत ने मज्जपरिपाक - विद्रधि का भी वर्णन किया है, जिसे ( Acute Osteomyelitis ) कहते हैं, यथा- ' अथ मज्जपरीपाको घोरः समुप जायते । सोऽस्थिमांसनिरोधेन द्वारं न लभते यदा । ततः स व्याधिना तेन ज्वलनेनेव दह्यते । अस्थि-मज्जोष्मणा तेन शीर्यते दह्यमानवत् ॥ विकारः शल्यभूतोऽयं क्लेशयेदातुरं चिरम् । ' ( मु. नि. अ. ९ ) । अब सुश्रुत - वर्णित अन्तर्विद्रधियों के बारे में कुछ विस्तृत विचार प्रस्तुत किया जा रहा है-( १ ) गुदविद्रधि ( Ischio rectal abscess ) – यह गुदा और कुकुन्दरास्थि ( Ischium ) के मध्य में होती है । यह कड़े मल तथा शोथयुक्त अर्श से आन्त्रक्षन होने के कारण उत्पन्न होनी है । पूय त्वचा द्वारा सीधे तथा आन्त्र द्वारा गुदा में होकर बाहर निकल सकता है । गुदा मलत्याग के कारण पीड़ा होने से वेगावरोवजनित अपानवायु का भी निरोध हो सकता है । ( २ ) वस्तिविद्रधि ( Cystic abscess ) -- यह मूत्राशय कला में होती है । इसमें मूत्रकृच्छ्र का लक्षण विशेष मिलता है । बस्तिमुख विद्रधि से पौरुषग्रन्थि विद्रधि ( Prostatic abscess ) भी ले सकते हैं । यह अधिकतर युवा व्यक्तियों नें पूयमेह अथवा राजयक्ष्मा के उपद्रव स्वरूप होती है । इसमें पौरुषग्रन्थि की वृद्धि के साथ पुनः पुनः मूत्रत्याग की इच्छा एवं विद्रधि के अन्य सामान्य लक्षण ( ज्वर, श्वेतकायाशुमवता, तरंगप्रतीति आदि ) भी पाये जाते हैं । ( ३ ) नाभि तथा कुक्षि विद्रधि ( Localised peritonitis ) - इसके कारण साधारण उद-रावरणशोथ के समान ( आन्त्र के रक्तसंवहन में बाधा पहुंचाने वाले कारण, तथा स्त्रियों में पूयनेह एवं भेदक व्रण आदि ) ही होते हैं । भेद केवल इतना है कि यह उदरावरण के किसी · भाग में ही सीमित रह जाता है, इधर - उधर नहीं फैलता । पार्श्वों में होने पर कुक्षि और मध्यम में होने पर नाभि विद्रवी कहते हैं । इनके कारण उदर में विविध वातविकार एवं हिक्का की उत्पत्ति हो सकती है ।

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कियन्तः शिरसीयाध्यायः १७ ] सूत्रस्थानम् ३६१ ( ४ ) विद्रधि ( Psoas abscess ) - यह वङ्क्षण प्रदेश की विद्रधि है जो पृष्ठवंश के क्षय के परिणामस्वरूप होती है । सर्वप्रथम विद्रधि उत्पन्न होकर कशेरुकाओं के पार्श्व में फैलती है । धीरे - धीरे यह कटिप्रदेश में कटिलम्बिनी पेशी ( Psoas muscle ) पर आ जाती है और पुनः नीचे वंक्षण प्रदेश में इसका उभार हो जाता है । अतः कटि और पृष्ठ में पीड़ा होती है । ( ५ ) दक्षिणवंक्षविद्रधि ( Appendicular abscess ) - यह वंक्षणप्रदेश से ऊपर दाहिनी ओर वंक्षणी बन्धन ( Inguinal ligament ) से ऊपर की ओर होती है । उण्डुक ( Appendix ) में शोध के बाद विद्रधि वन जाती है । इसमें स्थानीय लक्षणों के अतिरिक्त विषमयता के लक्षण तथा श्वेतकायाणुमयता ( Leucocytosis ) भी पायी जाती है । ( ६ ) वृक्कविद्रवि ( Pyelonephritis, pyonephrosis or peri nephric abscess ) — रोगी को यकायक शीतपूर्वक तीव्र ज्वर के साथ कटि पार्श्वप्रदेश में तीव्र पीड़ा प्रारम्भ हो जाती है । दमन, जिड्डा सूखी, प्रलाप तथा कभी - कभी संन्यास के लक्षण भी हो जाते हैं । प्रारम्भ मैं मूत्रत्याग कठिनाई से थोड़ा - थोड़ा और बार - बार होता है । मूत्र में शुक्ति ( अल्ब्यूमिन ), पूय, रक्त तथा अन्य विकारी जीवाणु पाये जाते है । ( ७ ) प्लीहविद्रधि ( Spleenic abscess ) – यह निम्न कारणों से उत्पन्न हो सकती है -( क ) आन्त्रिक ज्वर ( Typhoid ), ( ख ) फुफ्फुसपाक ( Pneumonia ), ( ग ) राजयक्ष्मा, ( घ ) पूयमयता ) ( Pyaemia ), ( ङ ) अनवाजन्य अतितार ( Amoebic dysentery विद्रधि के स्थानीय लक्षण वामपार्श्व में प्लीहा प्रदेश में मिलते हैं । सार्वदेहिक लक्षण पूर्ववत् ही होते हैं । इस पीड़ा के कारण प्रतिक्रियास्वरूप श्वासकार्य में भी बाधा होती है । ( ८ ) हृदयविद्रधि ( Suppurative pericarditis ) - हृदयावरण शोथ के परिणामस्वरूप इसकी उत्पत्ति होती है । ( ९ ) यकृत - विद्रधि ( Liver abscess ) - यह प्रायः अमीबा के उपसर्ग का परिणाम है । प्रायः अमीवाजन्य अतिसार के पश्चात् इसकी उत्पत्ति होती है । सर्वप्रथम इसमें निम्न लक्षण होते हैं —१. प्रथन दक्षिण आनुपाश्विक प्रदेश ( Right hypochoudric region ) में भेदनवत् पीड़ा प्रारम्भ हो जाती है । इसका प्रचलन कन्धे की ओर होता है । २. ज्वर — यह सन्तत अथवा अन्येद्युष्क प्रकार का होता है । ३. मिचली । ४. प्रचुर स्वेद । ५. मांसक्षय ( Emaciation ) । ६. श्वेतकायाणुमयना ( Leucocytosis ), इसमें उपसिप्रिय की संख्या प्रकृत से अधिक रहती है । ७. यकृत् प्रदेश में सर्शासहता तथा उभार पाया जाता है । ८. दक्षिण पार्श्व में श्वास लेने पर गति दूसरी ओर की अपेक्षा कम होती है । चक्कर विद्रधि में उपमहाप्राचीरीय विधि ( Subphrenic abscess ) का भी सुनावेश कर सकते हैं । ( १० ) क्लोम विद्रधि - क्लोम शब्द से विभिन्न विद्वान् विभिन्न अवयवों का ग्रहण करते है । इनमें प्रत्येक के अनुसार तालु में Brain abscess, चसनिका में Peri- tonsillar or retropharnygial abscess, पित्ताशय में Chole ystitis तथा अग्न्याशय में होने पर Pancreatitis कह सकते हैं । प्रत्येक का विस्तृत वर्णन किसी अर्वाचीन शल्यतन्त्र में देखें । अग्न्याशय - विकार में ही प्यास की अधिक सम्भावना प्रतीत होती है । जैसा कि लिखा है ' क्लोनि पेपीयते पयः ' । * पक्वप्रभिन्नासूर्ध्वजासु मुखात् स्रावः स्रवति, अधोजासु गुदात्, उभयतस्तु नाभि-जासु ॥ १०२ ॥

अन्तर्विद्रधियों के स्रावों का मार्ग - नाभि के ऊपरी भाग में होने वाली विद्रधियाँ जब पक-कर फूट जाती हैं तो उनका स्राव मुख आदि ऊर्ध्व भाग से निकलता है और नाभि के नीचे के