चरक संहिता हिन्दी भाष्य — पृष्ठ 451–460
चरक संहिता हिन्दी भाष्य · Chaukhamba · पृष्ठ 451–460
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३६२ चरकसंहिता भाग में होने वाली विद्रधियाँ जब पक कर फूटती हैं तो पूय का स्राव मलद्वार से होता है । नाभि के बीच में जो विद्रधियाँ होती है और जब वे पक कर फूटती है, तो उनका स्राव मुख और गुदा दोनों मार्गों से होता है ॥ १०२ ॥
आसां हृन्नाभिवस्तिजाः परिपक्काः सान्निपातिकी च मरणाय, शेषाः पुनः कुशलमाशु-प्रतिकारिणं चिकित्सकमासाद्योपशाम्यन्ति । तस्मादचिरोत्थितां विद्रधीं शस्त्रसर्पविद्युदग्नि-तुल्यां स्नेहविरेचनैराश्वेवोपक्रमेत् सर्वशो गुल्मवच्चेति ॥ १०३ ॥
विद्रधियों में मृत्यु का कारण इन विद्रधियों में हृदय, नाभि और वस्ति स्थान में उत्पन्न विद्रधि यदि पक जाती है तो और सन्निपातज विद्रधि, मृत्यु के लिये होती हैं । इससे भिन्न स्थान में या एक दोष से उत्पन्न विद्रधि शीघ्र हो चिकित्सा करने वाले कुशल वैद्य के द्वारा चिकित्सा करने पर शान्त हो जाती है । इसलिये शीघ्र ही उत्पन्न विद्रधि की शस्त्र, सर्प, बिजली और अनि के समान भयंकर समझ कर स्नेहन, स्वेदन, विरेचन के द्वारा गुल्म की तरह सारी चिकित्सा शीघ्र ही करनी चाहिए ॥ १०३ ॥
विमर्श - सुन में भी बताया है - ' हृन्नाभिवस्तिजः पक्वो वज्र्यो यश्च त्रिदोषजः ' ( सु. नि. अ. ९ ) । भोज ने भी विद्रधि के असाध्यत्व के विषय में बताया है - ' असाध्यो मर्म्मजो शेयः vaatsa श्च विद्रधिः । संनिपातोत्थितोऽप्येवं पक्क एव तु नाभिजः । त्वग्जो नाभेरधो यश्च साध्यो मर्म्मसमीपगः । अपक्वश्चैव पक्कश्च साध्यो नोपरिनाभिजः ॥ ' अर्थात् मर्म स्थान में उत्पन्न विद्रधि पक्क हो अथवा अपक्क और सन्निपात से उत्पन्न विद्रधि जो पक्क अथवा अपक्क हो वह असाध्य होती है । नाभि में उत्पन्न विद्रधि पकने पर असाध्य होती है । नाभि के नीचे केवल त्वचा से सम्बन्ध रखने वाली यदि मर्मस्थ संस्थान के समीप हो तो वह साध्य होती है । नाभि के ऊपरी भाग में उत्पन्न हुई विद्रधि चाहे पक्क हो या अपक्क हो, असाध्य होती है । इसलिये विद्रधियों की चिकित्सक शीघ्र ही करनी चाहिये - ' नोपगच्छेद् यथा पार्क प्रयतेत तथा भिषक् । पर्यागते तु विद्रधौ सिद्धि--नैकान्तिकी स्मृता ॥ ' ( स्. चि. अ. १६ ) । मूल श्लोक में शस्त्र का दृष्टान्त देकर यह बताया गया है कि यह शीघ्र ही मर्मस्थान को काटने वाली होती है । साँप की तरह शीघ्र ही ज्ञानों को नष्ट करने वाली है । बिजली और अग्नि की तरह शीघ्र ही मृत्युदायक होती है । भवन्ति चात्र-* विना प्रमेहमध्येता जायन्ते दुष्टमेदसः । तावच्चैता न लक्ष्यन्ते यावद्वास्तुपरिग्रहः ॥ १०४ ॥
प्रमेहेतर पिडकायें । - ये पिडिकायें जिन मनुष्यों की मेद वातु अत्यन्त दुष्ट हो जाती है उन्हें विना प्रमेह के हो जाती हैं । लेकिन इन पिडकाओं का परिज्ञान तब तक नहीं होता है, जब तक कि ये अपने स्थान को पूरे रूप से नहीं पकड़ लेती है ॥ १०४ ॥ १
शराधिका कच्छपिका जालिनी चेति दुःसहाः । जायन्ते ता ह्यतिवलाः प्रभूतश्ले ममेदसः ॥
पिडका की साध्यासाध्यता कफ और नेद जिन व्यक्तियों के शरीर में ज्यादा होती है उन व्यक्तियों में अधिक कष्ट देने वाली और बलवती शराविका, कच्छपिका, जालिनी ये तीन निकायें होती हैं ॥ १०५ ॥
सर्पपी चालजी चैव विनता विद्रधी च याः । साध्याः पित्तल्वास्तास्तु संभवन्त्यल्पमेदसः ॥ और भी - सर्वपी, अलजी, विनता और विद्रधि, ये चार पिडकायें साध्य होती हैं क्योंकि ये पिडकायें पित्तप्रधान होती है और जिन व्यक्तियों के शरीर में अय मेद है उन्हीं को होनी हैं ॥ १०६ ॥
१. ' प्रभूतश्ले ममेद साम् ' इति पा. । २. ' संभवन्त्यल्प मेदसाम् ' इति पा ० ।
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कियन्तः शिरसीयाध्याय: १७ ] सूत्रस्थानम् ३६३ मर्मस्वंसे गुदे पौण्योः स्तने संधिषु पादयोः । जायन्ते यस्य पिडकाः स प्रमेही न जीवति ॥ स्थान के अनुसार पिडकाओं की असाध्यता - यदि पिकायें मर्मस्थान, ( हृदय, शिर, वस्ति ), अंस ( कंधा ), गुदा, हाथ, स्तन, संधि - स्थान और पैर में हो जाँय तो, प्रमेह से पीड़ित व्यक्ति जीवित नहीं रहता है ॥ १०७ ॥
विमर्श - सुश्रुत में पीठ में होने वाली दिडका को भी असाध्य माना है । पर साथ ही यदि रोगी को अनि दुर्बलता हो और पिडकाओं का उपद्रव हो तो असाध्य माना है, यथा-- ' गुदे हृदि शिरस्यं पृष्ठे मर्म्मसु चोत्थिताः । सोपद्रवा दुर्बलाग्नेः पिडकाः परिवर्जयेत् ॥ ' ( सु. नि. अ. ६ ) । वृद्ध वाग्भट ने भी इसे यों स्पष्ट किया है - ' पिडका महत्पृष्ठस्तनांसगुदमूगा । सर्वपाद-करस्था वा ॥ ' तथाऽन्याः पिडकाः सन्ति रक्तपीतासितारुणाः । पाण्डुराः पाण्डुवर्णाश्च भस्माभा मेचकप्रभाः ॥ मृद्व्यश्च कठिनाश्चान्याः स्थूलाः सूक्ष्मास्तथाऽपराः । मन्दवेगा महावेगाः स्वल्पशूला महारुजः ॥ * ता बुद्ध्या मारुतादीनां यथास्वैर्हेतुलक्षणैः । ब्रूयादुपचरेच्चाशु प्रागुपद्रवदर्शनात् ॥११० ॥
अन्य पिडकायें - इन पिडकाओं से अतिरिक्त कुछ पिडकार्ये रक्त वर्ण की, पीले वर्ण की, काले वर्ण की और अरुण वर्ण की, पाण्डु वर्ण की, धूसर वर्ण की, राख के समान वर्ण की चमकने वाली, रंग - विरंग की होती हैं और ये पिडकायें कुछ मृदु, कुछ कठिन, कुछ स्थूल, कुछ सूक्ष्म होती है । इनमें कुछ पिडकायें मन्दवेग से बढ़ती है और कुछ महावेग से शीघ्र ही बढ़ जाती हैं । कुछ fus काओं में वेदना कम होती है और कुछ में अधिक वेदना होती है । इस प्रकार होने वाली पिडकाओं में कारण और लक्षणों के आधार पर यह कहना चाहिये कि बात की है या पित्त की हैं या कफ की है और जब तक ये पिडकायें अपने उपद्रव को व्यक्त न करें उसके पहले ही दोषानुसार चिकित्मा करनी चाहिये ॥ १०८-११० ॥ तृश्वास मांससंकोर्थमोहहिक्कामदज्वराः । वीसर्पमर्मसंरोधाः पिडकानामुपद्रवाः ॥ १११ ॥
पिकाओं के उपद्रव [ Complications ] - • प्यास, श्वास, मांस का सड़ना, मोह ( मूर्च्छा ), हिचकी, मंद ज्वर, विसर्प और मर्म ( हृदय ) की रुकावट का होना ये पिडकाओं के उपद्रव होते हैं ॥ १११ ॥
* क्षयः स्थानं च वृद्धिश्च दोषाणां त्रिविधा गतिः । ऊर्ध्वं चाधश्च तिर्यक च विज्ञेया त्रिविधाऽपरा ॥ त्रिविधा चापरा कोष्ठशाखामर्मास्थिसंधिषु । इत्युक्ता विधिभेदेन दोषाणां त्रिविधा गतिः ॥ ( ६ ) दोषों की त्रिविध गति ( Three Pathways of Doshas ) दोषों की गतियाँ - दोपों की क्षय, स्थान और वृद्धि ये तीन गतियाँ होती है । और तीन तरह की एक और गति होती है जिसे ऊर्ध्वगति, अधः गति और निर्थक गति कही जाती है । इसके अतिरिक्त कोष्ठ, शाखा, मर्म, अस्थि और संधि यह विविध मेद से दोपों की तीन गतियाँ अलग बनाई गई है ॥ ११२-११३ ॥ विमर्श - - यहाँ गति का ' गमनं गतिः ' तथा ' गमनम् अवस्थाप्राप्तिच ' से गति और अवस्था दो अर्थ किया जा सकता है | स्थान का तात्पर्य है दोषों का साम्यावस्था में रहना । वृद्धि दो प्रकार की होती है, ( २ ) दोष अपने स्थान पर बढ़ते हुए दूसरे को दूषित न करे जिसे चय १. ' पाष्यस्तले ' ग. । २. ' यथास्वं हेतुलक्षणैः ' यो । ३. ' मांससंकोच ' ग. । ४. ' स्थानं स्वमानावस्थानं ' इति चक्रः । ५. पतिः प्रकारोऽवस्था वा ' इति चक्रः ।
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३६४ चरकसंहिता कहा जाता है और ( २ ) दोष अपने स्थान से निकल कर बाहर जायें और अन्य दोष धातुओं को दूषित करें, यथा- ' चयो वृद्धिः स्त्रधान्येव कोपस्तून्मार्गगामिता । ' ( अ. हृ. नू. १२ ) । दूसरी गति ऊर्ध्व, अधः और तिर्यक् दोषों की होती है । रक्तपित्त में या छर्दि में जब दोषों की ऊर्ध्व गति होती है तो ऊर्ध्वग रक्तपित्त तथा छर्दि में वमन मुख द्वारा होता है । जब दोषों की गति अध: होती है तो अतिसार, प्रवाहिका, ग्रहणी, अधोग अम्लपित्त एवं अधोग रक्तपित्त इत्यादि रोग होते हैं तथा तिर्यग्गति होने पर ज्वर, मन्दाग्नि इत्यादि व्याधियाँ उत्पन्न होती हैं । दोषों की तीसरी गति कोष्ठ, शाखा, मर्मास्थि - संधि है । कोष्ठ में पन्द्रह अङ्ग माने जाते हैं - ' पञ्चदश कोष्ठाङ्गानि तद्यथा-नाभिश्च, हृदयं च, क्लोम च, यकृच्च, प्लीहा च, वृक्कौ च, वस्तिश्च पुरीषाधारच, आमाशयश्व, पक्का-शयश्च, उत्तरगुदं च, क्षुद्रान्त्रं च, स्थूलान्त्रं च वपावहनं चेति । ( च. शा. अ. ७ ) इन स्थानों में जब दोष गमन करते हैं तो उनका यह आभ्यन्तर मार्ग कहा जाता है । शाखा शाखा शब्द से – ‘ रक्तादयो धातवत्स्वक् च ' के अनुसार रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा, शुक्र और त्वचा का ग्रहण होता है । शाखा में रस का ग्रहण नहीं किया जाता है । चक्रपाणि ने त्वचा से त्वचा के आश्रयभूत रस का भी ग्रहण किया है । सुख स्मरणार्थ दोषों की विभिन्न गतियों को निम्नलिखित रूप में दिया जा रहा है । दोषों ( Doshas ) की गतियाँ ( Pathways ) १ प्राकृती वैकृती १ स्थान २ क्षय ३ वृद्धि ( Normal ) ( Hypo ) ( Hyper ) १ कोठ २ शाखा ३ मर्मास्थि सन्धि ( Trunk ) ( Periphery ) ( Bones & Joints ) १ उर्ध्व ( Upward ) २ अधः Downward ) ३ निक ( Transverse or Radial ) * चयप्रकोपप्रशमाः पित्तादीनां यथाक्रमम् । भवन्त्येकैकशः षट्सु कालेष्वभ्रागमादिषु ॥ ११४ ॥
ऋतु के अनुसार दोपों की गति - पित्त, कफ और वायु इन तीनों दोषों का क्रम से संचय, प्रकोप, प्रशम, वर्षा, शरद, हेमन्त शिशिर, वसन्त और ग्रीष्म में एक - एक का होता रहता है || विमर्श - अर्थात् पित्त का संचय वर्षा में, प्रकोप शरद् में, शमन हेमन्त में होना है । कफ का संचय हेमन्त में, प्रकोप वसन्त में और शमन ग्रीष्म में होता है । वायु का संचय ग्रीष्म में, प्रकोप प्रावृट में और शमन शरद् ऋतु में होता है । दोषों के संचय, प्रकोप, शमन स्वाभाविक रूप से होने रहते हैं, जैसा कि सुश्रुत के निम्नलिखित वचन से शान होता है- ' तत्र, वर्षास्वोषवयस्नरुण्योऽल्पवीर्या आपश्चाप्रशान्ताः श्चितिमलप्रायाः, ना उपयुज्यमाना नभसि मेघावतते जलप्रक्किन्नायां भूमौ किन्न --देहानां प्राणिनां शीतवातविष्टम्भिताग्नीनां विदह्यन्ते, विदाहात् पित्तसंचयमापादयन्ति ॥ ' ( सु. सू. अ. ६ ) पित्त - अर्थात् वर्षा ऋतु में जल बरसने लगता है तो नई - नई औषधियाँ उत्पन्न होती हैं । वे नई होने से तरुण रहती हैं, उसमें शक्ति कम रहती है, वर्षा ऋतु में जल भी गन्दा रहता है,
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कियन्तः शिरसीयाध्यायः १७ ] सूत्रस्थानम् ३६५ पृथ्वी भी गन्दी रहती है, इस परिस्थिति में यदि उन औषधियों का प्रयोग किया जाय तो आकाश में मेघ के विस्तृत रहने पर, जल से पृथ्वी के गीले रहने पर और मनुष्यों का शरीर भी गीला ही रहने पर शीत - वात से मनुष्य की अग्नि मन्द वेग वाली रहती है । उस समय खाई गई औषधियों में विदा हो जाता हैं और विवाह से पित्त का संचय होता है । वाग्भट में भी पित्त के संचय का कारण अतिसंक्षेप में बताया है - ' अद्भिरम्लविपाकाभिरोषधीभिञ्च तादृशम् । पित्तं याति चयन् " " ॥ ' ( अ. हृ.सू. अ. १२ ) । इस समय पित्त केवल एकत्र होता है, उसका कोप नहीं होता है क्योंकि वातावरण शीतल रहता है और शीत से पित्त का विरोध है । जब शरद् काल आता है । तो उस समय आकाश में मेघ नहीं रहते है, पृथ्वी का गीलापन भी सूख जाता है, सूर्य की किरणें तीव्र रहती है तो सूर्य की किरण से पित्त द्रवित होकर या और अधिक वृद्ध होकर उन्मार्ग गमन करने लगता है जिससे कि पैत्तिक व्याधियाँ उत्पन्न होती है । यथा - ' स सञ्चयः शरदि प्रविरलमेवे वियत्युपशुष्यति पङ्कर्ककिरणप्रदिलायितः पैत्तिकान् व्याधीञ्जनयति ॥ ' ( सु. सू. अ. ६ ) । हेमन्त ऋतु आने पर प्रयोग करने के लिये जो औषधियाँ मिलती हैं उनका वीर्य पका हुआ होता है, जल स्वच्छ मिलता है, पृथ्वी स्वच्छ रहती है, बाहरी वातावरण शीतल रहता है इसलिये शरीर की ऊष्मा बाहर न निकल कर भीतर ही रहती है जिससे अग्नितोत्र रहती है, जो कुछ खाया जाता है उसका पाक मधुर होता है, इसलिये पित्त की शान्ति होती है । कफ – कफ का संचय हेमन्त ऋतु में होता है क्योंकि जो ओषधियां वर्षा में उत्पन्न होती हैं वह परिणत वीर्य हो जाती हैं और उनमें शक्ति भी पूर्ण आ जाती है और जल स्वच्छ, स्निग्ध, गुरु होता है । उस समय सूर्य की किरण मन्द होती है, तुषार से मिली हुई वायु से गर्मी रुकी रहती है । उस समय इन औषवियों या जल का प्रयोग करने से इसका पाचन ठीक होता है और स्नेह, शैत्य, गौरव आदि गुणों के कारण आहार लेने से कफ का संचय होता है । पुनः वसन्त ऋतु के आने पर सूर्य की किरणों से क्लिन्न होकर कफ कफज रोगों को उत्पन्न करता है, यथा- ' ता एवौष-ययः कालापरिणामात् परिणतवीर्या बलवत्यो हेमन्ते भवन्त्यापश्च प्रशान्ताः स्निग्धा अत्यर्थं गुर्व्यश्च, ता उपयुज्यमाना मन्दकिरणत्वाद्भानोः सतुपारपवनोपस्तम्भितदेहानां देहिनामविदग्धाः स्नेहाच्छै -त्यागौरवादुपलेपाच्च श्लेष्मसंचयमापादयन्तिः स संचयो वसन्तेऽर्करश्मिप्रविलायित ईषत्स्तब्धदेहानां देहिनां श्लैष्मिकान् व्याधीञ्जनयति । ( सु. सू. अ. ६ ) । जब ग्रीष्म ऋतु आती है तो सूर्य की किरणें अत्यन्त तीव्र हो जाती हैं । पृथ्वी के और पृथ्वी पर रहने वाली सभी औषधियों के स्नेहांश का शोधन हो जाता है, रूक्षता बढ़ जाती है, इसलिये कफ के विपरीत सभी गुणों की वृद्धि हो जाती है जिससे कफ का स्वाभाविक रूप से शमन हो जाता है । वायु - वायु का संचय ग्रीष्म ऋतु में होता है, सूर्य अपनी तीक्ष्ण किरणों द्वारा स्नेहांश का शोषण कर रूक्ष, लघु सभी वस्तुओं को निस्सार कर देता है, जल भी हल्का रहता है, सूर्य की किरणों से मनुष्यों का शरीर भी शुष्क रहता है । उस समय ओषधियों का सेवन करने से वे अपने रूक्ष, लघु और विशद गुण के कारण वायु का संचय करती हैं । उस समय वातावरण अधिक गर्म रहता है जिसके कारण संचित वायु का कोन नहीं होने पाता है । पर जब वर्षा ऋतु प्रारम्भ होती है तो वातावरण शीतल हो जाता है और शरीर और भूमि ये दोनों किन्न हो जाती हैं, जो वायु के अनुकूल होते हैं इसलिये वायु उन्मार्ग गमन कर वातजन्य व्याधि उत्पन्न करती है । यथा— ‘ ता एवौषधयो निदाघे निःमारा रूक्षा अतिमात्रं लभ्यो भवन्त्यापश्च, ता उपयुज्यमानाः सूर्यप्रतापोप-शोषितदेहानां देहिनां रौक्ष्यालघुत्वाच्च वायोः संचयमापादयन्तिः स संचयः प्रावृषि चात्यर्थं जलोप-क्लिन्नायां भूमौ किन्नदेहानां देहिनां शीनवातवर्षेरितो वातिकान् व्यावीञ्जनयति । ' ( सु. सू. अ. ६ )
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३६६ संचय पित्त ऋतु वर्षा शरद् हेमन्न कफ वसन्त ग्रीष्म बान प्रावृड् चरकसंहिता प्रकोप या निर्हरण - काल शमन पित्त वात पित्त काक कफ बात गतिः कालकृता चैषा चयाद्या पुनरुच्यते । गतिश्व द्विविधा दृष्टा प्राकृती वैकृती च या ॥ दोषों की दो अन्य गतियों ( प्राकृती तथा वैकृती ) 1- इन ऊपर बनाये हुये, संचय प्रकोप और प्रशम को कालकृत गति कहते हैं और दूसरी दोषों की गति प्राकृती और वैकृती यह दो तरह की होती है ॥ ११५ । विमर्श - स्वाभाविक रूप से ऋतु के अनुसार जो दोषों का संचय, प्रकोप और प्रशम होता है । उसे ही कालकृत गति मानी गयी है । जो आहार विहार के कारण संचय, प्रकोप, प्रशम दोषों का होता है उसे कालकृत गति न मानकर दोषों की अवस्था मानी जाती है । इस तरह दोपों की स्वस्थ पुरुष में जो गति होती है उसे प्राकृती और दोषों की गति जो रोगी के शरीर में होती है उसे वैकृती गति मानी जाती है । * पित्तदेवोष्मणः पतिर्नराणामुपजायते । तच्चै पित्तं प्रकुपितं विकारान् कुरुते बहून् || ११६ || पित्त की प्राकृती और वकृती गतियों का वर्णन - • पित्त जब प्राकृतिक रूप में शरीर में गमन करता है तो मनुष्यों के आहार का पाचन, अनि स्वरूप पित्त से ही होता है । जब पित्त वैकृती गति में चलता है तो उसके प्रकोप से पित्तजन्य अनेक रोग हो जाते हैं ॥ ११६ ॥
प्राकृतस्तु बैलं श्लेष्मा विकृतो मल उच्यते । स चैवौजः स्मृतः काये स च पाप्मोपदिश्यते ॥। कफ की प्राकृती और वैकृती गतियों का वर्णन -- • प्राकृतिक कफ को बल कहा जाता है और विकृत कफ को मल कहा जाता है । प्राकृतिक कफ को ही शरीर में ओज, और विकृत को पाप कहा जाता है ॥ ११७ ॥
विमर्श - ओज और बल ये दोनों ही पर्यायवाची शब्द हैं, यथा - ' रसादिशुक्रान्तानां धातूनां यत् खलु परं तेजः तत् खल्वोजः तदेव बलमित्युच्यते ' ( सु. सू. अ. १५ ) और जब यह विकृत होता है तो इसे मल या पाप कहते हैं क्योंकि शरीर को मलिन करने वाला होता है । सर्वा हि चेष्टा वातेन स प्राणः प्राणिनां स्मृतः । तेनैव रोगा जायन्ते तेन चैवोपरुध्यते ॥ १. ' पित्तादृष्मोष्मणः ' इति पा. । २. ' पित्तं चैव ' ग. । ३. ' बलमिति बलहेतुत्वेन, मल इति शरीरमलिनीकरणनू ओज इति सारभूतं, यदि वा द्विती-यश्लैष्मिकौजो हेतुत्वे नौजः, वक्ष्यति शारीरे ' तावच्चैव श्लैष्मिकस्यैौजसः प्रमाणम् ' इति चक्रः । ४. ' उपरुध्यते त्रियते ' चक्रः । जब शरद ऋतु आनी है तो विसर्ग काल का मध्य होने से और सूर्य की किरणों में तीक्ष्णता न होने से शरीर एवं जगत् में स्निग्धता बढ़ जाती है इसलिये वायु का शमन हो जाता है । यह स्वाभाविक रूप से होने वाले संचय, प्रकोप और शमन का वर्णन किया गया है । यद्यपि ये दोषों की विशेष अवस्थायें हैं फिर भी इसे कालकृत गति माना गया है । सुश्रुत के अनुसार दोषों के संचय, प्रकोप तथा प्रशम का विवरण नीचे दिया जा रहा है-
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त्रिशोथीयाध्यायः १८ ] सूत्रस्थानम् ३६७ वात की प्राकृती और वैकृती गतियाँ - प्राकृत अवस्था में गमन करने वाली वायु प्राणियों का प्राण कहा जाता है, और शरीर की सारी चेष्टायें वात से ही होती हैं । वैकृत अवस्था में जब शरीर में गमन करती है तो उसी वैकृत वायु से रोग होते हैं और उसी से मृत्यु भी हो जाती हैं || नित्यं संनिहितामित्रं समीक्ष्यात्मानमात्मवान् । नित्यं युक्तः परिचरेदिच्छन्नायुरनित्वरम् ॥ उपसंहार- स्थायी आयु की इच्छा रखने वाले जितेन्द्रिय पुरुष के लिए उचित है कि वह अपने आत्मा को रोगस्वरूप अमित्र ( शत्रु ) से घिरा हुआ समझ कर सर्वदा युक्त ( हितकर आहार - विहार से ) अपनी परिचर्या करे ॥ ११ ९ ॥
शिरोरोगाः सहृद्रोगा रोगा मानविकल्पजा । क्षयाः सपिडकाश्वोक्ता दोषाणां गतिरेव च ॥
कियन्तःशिरसीयेऽस्मिन्नध्याये तत्त्वदर्शिना । ज्ञानार्थं भिषजां चैत्र प्रजानां च हितैषिणा । इत्यनिवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते सूत्रस्थाने रोगचतुष्के कियन्तः शिरसीयो नाम सप्तदशोऽध्यायः ॥ १७ ॥
अध्यायगत विषयों का उपसंहार - प्रजा के हित चाहने वाले तत्त्वदर्शी महर्षि आत्रेय ने वैद्यों के ज्ञान के लिए इस कियन्तः शिरसीव नामक अध्याय में शिरोरोग, हृदयरोग, दोषों के मानविकल्प से उत्पन्न होने वाले रोग, क्षय, पिडकायें और दोषों की गतियों का वर्णन किया है | चरक के द्वारा प्रतिसंस्कृत अग्निवेशकृन तन्त्र ( चरक संहिता ) के सूत्रस्थान में रोगचतुष्क-विषयक कियन्तः शिरसीय नामक सतरहवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ १७ ॥
अथाष्टादशोऽध्यायः अथात स्त्रिशोथीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्माह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
अब ( कियन्तः शिरसीय अध्याय के बाद ) त्रिशोथीय अध्याय की व्याख्या की जायगी ।
जैसा कि भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥ १-२ ॥
विमर्श -- पिछले अध्याय ' कियन्तः शिरसीय ' में पिडका का वर्णन है जिसमें शोथ एक लक्षग होता है । अतएव शो का प्रकरण प्राप्त होने से शोथ का वर्णन अब किया जा रहा है ऐसा चक्रपाणि का मत है । * त्रयः शोथा भवन्ति वातपित्तश्लेष्मनिमित्ताः; ते पुनर्द्विविधा निजागन्तुभेदेन ॥ ३ ॥
( १ ) निज - आगन्तुज शोथ ( Endogenous & Exogenous Oedemas )
शोथ के भेद - ( १ ) वातजन्य, ( २ ) पित्तजन्य, ( ३ ) कफजन्य ये तीन शोथ होते हैं ।
फिर ये ही शोथ निज और आगन्तु भेद से दो प्रकार के होते है ॥ ३ ॥
विमर्श - यद्यपि सभी शोथ त्रिदोषज ही होता है, यथा - ' बाह्याः सिराः प्राप्य यदा कका-सृपित्तानि संदूषयतीह वायुः । तै रुद्धमार्गः स तदा विसर्पन्नुत्सेधलिङ्गं श्वयथुं करोति ॥ ' ( चि.अ. १२ )
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३६८ चरकसंहिता तथा ' सर्वस्त्रिदोषोऽधिकदोषलिङ्गैस्तत्संज्ञमभ्येति भिषग्जितं च ' ( चि. अ. १२ ) । किन्तु प्रत्येक दोष की अधिकता ( डल्हण ) के अनुसार, तीन भेद माना है । तदनन्तर रोगोत्पत्ति में कारण भेद से निज, आगन्तु दो भेद माने हैं । तत्रागन्तवश्छेदनभेदनक्षण नभञ्जनपिच्छ नोत्पगप्रहारवधबन्धनवेष्टनव्यधन पीडनादि-भिर्वा, भल्लातकपुष्पफलरसात्मगुप्ताशूक क्रिमिशूका हित पत्रलतागुल्म संस्पर्शनैर्वा, स्वेदन-परिसर्पणावमूत्रणैर्वा विषिणां सविषप्राणिदंष्ट्रादन्त विषाणनखनिपातैर्वा, सागरविषवात-हिमदहनसंस्पर्शनैर्वा, शोथाः समुपजायन्ते ॥ ४ ॥
आगन्तुक शोध के कारण [ Aetiology of Exogenous oedemas ] — आगन्तुक शोध किसी शस्त्र से छेदन, भेदन, ( क्षणन हड्डियों का चूर - चूर हो जाना ), भंजन ( जर्जरीकरण ), पिच्छन ( अत्यन्त कुचल जाना ), उत्पेषण ( पिस जाना ), प्रहार ( चोट लगना ), वथ ( आघात लगना ), बन्धन ( रस्सी या सर्प आदि से बँध जाना ), वेष्टन ( अंगों का ऐंठ जाना ), व्यधन ( सूजा आदि का धस जाना ), पीडन ( किसी वस्तु से दब जाना ) आदि इस प्रकार के चोट लगने से तथा भिलावे का फूल और फल का रस लग जाने से, केवाच के रोओं के लग जाने से, क्रिमियों का शुक लग जाने से, विषैले पत्र, लता, गुल्म, का स्पर्श हो जाने से अथवा विषैले कृमियों का पसीना लग जाने से या उनके शरीर पर चलने से, या शरीर पर मूत्र त्याग करने से, और विषैले प्राणियों की दंष्ट्रा ( दाढ़ ), दांत, शींग, नख के लग जाने से अथवा समुद्री हवा, विषैली हवा, बर्फ और अग्नि के स्पर्श से शोथ रोग उत्पन्न हो जाना है ॥ ४ ॥
विमर्श - उपर्युक्त शोथ में आघात ( Traumatic eauses ) तथा विषैली वनस्पतियाँ और जन्तुओं को मुख्य कारण माना है । ते पुनर्यथास्वं हेतुव्यञ्जनैरादावुपलभ्यन्ते निजव्यञ्जनैकदेशविपरीतैः, बन्धमन्त्रागद-प्रलेपप्रतापनिर्वापणादिभिश्चोपक्रमैरुपक्रम्यमाणाः प्रशान्तिमापद्यन्ते ॥ ५ ॥
आगन्तुक शोथ की सम्प्राप्ति और उपशय - आगन्तुक शोथ कारण के अनुसार पहले लक्षणों से युक्त होते हैं और बाद में वातादि दोष से उत्पन्न शोथ के लक्षणों से एकदेश - विपरीत होते हैं अर्थात् स्थानिक रूप में भिन्न होते है । ये आगन्तुक शोथ बन्धन, मंत्र - प्रयोग, अगर ( विषनाशक ओषधियाँ ) का प्रलेप, प्रताप ( अग्नि से सेंक ), निर्वापण ( शीतल जल या काथ आदि से परिषेक ) आदि उपचारों से चिकित्सा करने पर शान्त हो जाते हैं ॥ ५ ॥
विमर्श - आगन्तुक शोध में लक्षण उत्पन्न होने के बाद दोष कुपित होते हैं और अपने लक्षणों को प्रगट करते है, यथा- ' आगन्तुहि व्यथापूर्व समुत्पन्नो जघन्यं वातपित्तश्लेष्मणां वैषम्य-मापादयति, निजे तु वातपित्तश्लेष्माणः पूर्व वैषम्यमापद्यन्ते जघन्यं व्यथामभिनिर्वर्त्तयन्ति ' ( च. सू. अ. श्लोक ७ ) । वातादि दोष से एकदेश विपरीत होने का तात्पर्य यह भी हो सकता है कि आगन्तुक व्यथापूर्वक उत्पन्न होता है और वातादि दोष से उत्पन्न होने वाले शोध में पहले वातादि दोष के लक्षण प्रकट होते हैं फिर बाद में व्यथा होती है अथवा आगन्तुक में कारण - भेद से शोथ में भिन्न लक्षण पाये जाते है, यथा- ' अभिघातेन शस्त्रादि च्छेदभेदक्षतादिभिः । हिमानि -लोदध्यनिलैर्भल्लातकपिकच्छुजैः ॥ रसैः शूकैश्च संस्पर्शाच्छ्वयथुः स्याद्विसर्पवान् । भृशोष्मा लोहिताभासः प्रायशः पित्तलक्षणः ॥ ' ( वा. नि. अ. १३ ), उपर्युक्त कारणों से होने वाले शोथ फैलने वाला, लोहिताभास और अधिक गर्मी से युक्त होता है और आगन्तुक शोथ यदि अग्राकित कारणों से हो तो वह शोध मृदु, चल, अवलम्बी और शीघ्र ही दाह और वेदना करने वाला होता है,.
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त्रिशोथीयाध्यायः १८ ] सूत्रस्थानम् ३६६ यथा - ' विपजः सविषप्राणिपरिसर्पणमूत्रणात् । दंष्ट्रादन्तनखाघातादविषप्राणिनामपि ॥ विण्मूत्रशुक्रो-पहतमलवद्वस्त्रसङ्करात् । विषवृक्षानिलस्पर्शाद्गरयोगावचूर्णनात् ॥ मृदुश्चलोऽवलम्बी च शीघ्रो दाह-रुजाकर: । ' ( वा. नि. अ. १३ ) । निजाः पुनः स्नेहस्वेदवमन विरेचनास्थापवानुवासन शिरोविरेचनानामयथावत्प्रयोगा-न्मिथ्यासंमर्जनाद्वा छलस कविसूचिकाश्वासकासातिसार शोषपाण्डुरोगोदरज्वरप्रदरभग-दुराशविकारातिर्शनैर्वा कुष्ठकण्डूपिडकादिभिर्वा छर्दितवथूद्गारशुक्रवातमूत्रपुरीषवेग-धारणैर्वा कर्मरोगोपवासोध्वकशितस्य वा सहसाऽतिगुर्वम्ललवणपिष्टान्न फलशाकरागद-धिहरितकमद्यमन्दकविरूढनवशू कशमीधान्यानूपौदक पिशितोपयोगान्मृत्पङ्कलोष्टभक्षणाब्ल-वणातिभक्षणाद्गर्भसंपीडनादामगर्भप्रपतनात् प्रजातानां च मिथ्योपचारादुदीर्णदोषत्वाञ्च शोकाः प्रादुर्भवन्ति इत्युक्तः सामान्यो हेतुः ॥ ६ ॥
निज ( वातादि दोषज ) शोध के कारण [ Aetiology of Endogenous Oedema ] -निज शोथ सामान्यतः स्नेहन, स्वेदन, वमन, विरेचन, आस्थापनवस्ति, अनुवासन वस्ति और शिरोविरेचन ( नस्य ) के ठीक - ठीक प्रयोग न करने से अथवा इनके ठीक प्रयोग होने पर भी उचित रूप से पेया आदि संसर्जन क्रम का प्रयोग न होने से, अथवा वमन, अलसक, विसूचिका, श्वास, कास, अतिसार, शोष, पाण्डुरोग, उदर रोग, ज्वर, प्रदर, भगन्दर और अर्श रोगों के उपद्रवों से, रोगी के अत्यन्त क्षीण हो जाने से अथवा कुष्ठ, क्रिमि, पिडका आदि के होने से अथवा वमन, छींक, डकार, शुक्र, वात, मूत्र, मल इनके आये हुये वेगों को धारण करने से, अथवा पंचकर्म, रोग, उपवास, अधिक रास्ता चलने से, अत्यन्त दुर्बलता हो जाने से, अथवा रोगी सहसा अत्यन्त गुरु, अम्ल, लवण, पिष्टान्न ( चावल का आटा ), फल, शाक, राग ( अचार चटनी ), दही, हरितक, मदिरा, मन्दक ( पूर्ण रूप से न जमो हुई दही ), विरूढ ( अंकुरित अन्न ), नूतन शूक धान्य, नये शमी धान्य, अनूप और उदकदेश में होने वाले पशु - पक्षियों के मांस का सेवन करने से अथवा मट्टी, कीचड़ और भूनी हुई मट्टी खाने से, अथवा अधिक नमक खाने से, गर्भवती स्त्रियों में गर्भ से अति पीड़ित होने से, कच्चे गर्भ के गिरने से, बच्चा हो जाने पर प्रसूता के नियमों का उचित रूप से पालन न करने से जब दोष अधिक बढ़ जाते है तब शोथ उत्पन्न होता है । ये निज शोथ के सामान्य कारण बताये गये हैं || ६ || विमर्श - इन्हीं कारणों को चिकित्सास्थान के १२ वें अध्याय में संक्षेप में लिखा गया है - ' शुद्धयामया मुक्तकृशाबलानां क्षाराग्लतीक्ष्णोष्णगुरूपसेवा । दध्याममृच्छाकविरोधिदुष्टगरोप-सृष्टान्ननिपेवणं च ॥ अर्शास्यचेष्टा न च देहशुद्धिर्मोपघातो विषमा प्रसूतिः । मिथ्योपचारः प्रतिकर्मणां च निजस्य हेतुः श्वयथोः प्रदिष्टः ॥ ' ( चरक ) | यहाँ यह शोथ का सामान्य कारण बताया है पर शोध का सामान्य लक्षण नहीं बताया है । चिकित्सा स्थान में शोध का सामान्य लक्षण इस प्रकार बताया है, यथा- ' सगौरवं स्यादनवस्थितत्वं सोत्सेधमूष्माऽथ सिरात -त्वम् । सलोमहर्षाङ्गविवर्णता च सामान्यलिङ्गं श्वयथोः प्रदिष्टम् ॥ ' ( च. चि. अ. १२ ) । आयुर्वेद में शोथ, श्वयथु तथा शोफ इन तीन शब्दों का व्यवहार कहीं सूजन सामान्य के लिये पर्याय रूप में और कहीं विभिन्न अर्थों में प्रयुक्त होता है । किन्तु इस अध्याय शोथ शब्द विशिष्ट अर्थ में है । जिस अवस्था में दोष त्वचा और मांस का आश्रय ग्रहण कर अर्थात् उनके बीच में स्थित होकर उभाड़ उत्पन्न करते हैं तथा जिनमें पाक की प्रवृत्ति नहीं होती १. ' कर्मरोगोपवासाध्वकर्षितस्य ' ग. । २४ च ० सं ०
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३७० चरकसंहिता है उसी का यहाँ वर्णन है । जिनमें दोष त्वचा, मांस, रक्त आदि आठ व्रण वस्तुओं को दूषित करते हैं एवं पाक की प्रवृत्ति होती है उसे ' व्रणशोय ' कहते है । अर्वाचीन शास्त्रों में इनके लिए क्रमशः Oedema तथा Inflamation संज्ञा दी जाती है । यहाँ प्रथम प्रकार का ही वर्णन है । यद्यपि प्रथम प्रकार अपचारादि से दूसरे प्रकार में भी परिणत हो सकता है । विशेषतः पैत्तिक शोध एवं आगन्तुक शोथों में इसकी संभावना अधिक रहती है । शोध की उत्पत्ति में रक्त सहित तीनों ही दोष भाग लेते हैं किन्तु कारणों और लक्षणों एवं चिकित्सा की विशेषताओं के आधार पर एकदोषज तीन, द्विदोषज तीन और सान्निपातिक एक, इस प्रकार सान निज और अभिघातज एवं विषज भेद से दो आगन्तुज और सब मिलाकर नव भेद किये जाते हैं । कारणभेद से सूजन के स्थूल रूप से दो भेद किये जा सकते हैं - ( १ ) निजकारण - जन्य -विविध मिथ्याहार - विहार के कारण शरीर में प्रकुपित दोषजन्य सूजनों का समावेश किया जाता है । इसे वर्णन - सौकर्यार्थं शोफ या श्वयथु ( Oedema ) भी कह सकते हैं । ( २ ) आगन्तुक - कारण-जन्य — आघात, अग्नितप्त पदार्थों से जलना, रासायनिक पदार्थ ( तीव्र अम्ल या क्षारों ) से जलना, विष, विविध विकारी जीवाणु एवं विद्युत् प्रवाह ये सब आगन्तुक सूजन के कारण हैं । इसमें त्वचा, मांस आदि व्रगत्रस्तुओं के भी आक्रान्त होने और पूयोत्पत्ति की आशंका रहती है । आचार्य ने चि. अ. १२ में शोफ के तीन भेद किये हैं । यथा - ' त्रिविधो निजश्च सर्वार्धगात्राव यवाश्रितत्वात् । ' ( १ ) सर्वाङ्गशोफ ( Generalised Oedema या General anasarca ) – यह हृदय, यकृत् एवं वृक्क जैसे अवयवों की विकृति से होता है । ( २ ) अर्धाङ्गशोफ - उपर्युक्त अङ्गों की ही विकृति जब अल्प मात्रा में रहती है तो यह उत्पन्न होता है । हृदय एवं यकृत् की विकृति से अधरांग शोफ तथा वृक्क की विकृति से ऊर्ध्वागशोफ अधिकतर होता है । इन दोनों में सूजन के अतिरिक्त कारणानुरूप अन्य सार्वदेहिक लक्षण भी प्रचुर मात्रा में पाये जाते हैं । ( ३ ) एक-देशोत्थित या एकाङ्ग शोफ ( Local Oedema ) - आगन्तुक कारणों से एकदेश में भी शोथ उत्पन्न होता है । इनके अतिरिक्त आचार्य ने और तदनुसार माधव ने ऊर्ध्वगत, मध्यगत और अधोगत एवं सर्वसर भेद तथा सुश्रुत और वाग्भट ने सर्वसर या सर्वाग और अवयव समुत्थ या एकांग शोथ का भी वर्णन किया है । वाग्भट ने आकृति भेद से पृथु उन्नत और ग्रथित इन तीन भेदों का भी उल्लेख किया है । अर्वाचीन शास्त्रों में भी शोफ ( Oedema ) की उत्पत्ति के सम्बन्ध में निम्नलिखित विवेचन प्राप्त होता है । शरीर की समस्त धातुयें तरल पदार्थ में अवगाहित रहती हैं । इस तरल पदार्थ में रक्त-वाहिनियों द्वारा आगत रक्त, सूक्ष्म केशिकाओं या स्रोतों ( Arterial capillaries ) में पहुँच कर उपस्नेहन द्वारा पोषक पदार्थयुक्त रक्त - रस पहुँचाता है और पुनः त्याज्य पदार्थयुक्त धातुरस का सिरास्रोतों ( Venous capillaries ) द्वारा शोषण कर उसे विविध विसर्गाङ्गों में पहुँचा कर उसका निर्हरण करता रहता है । जब किसी भी कारण से इस धातुगत रस के शोषण में बाधा उत्पन्न होती है या स्रुत रक्त - रस अधिक होता है तब धातुओं के संयोजक तन्तुओं में अधिक तरल का सञ्चय होने से उत्सेध उत्पन्न होता है जिससे वहाँ का स्थितिस्थापकत्व नष्ट हो जाता है और दबाने पर गड्ढा पड़ता है और उसे ही शोफ कहते हैं । कारणभेद से इस सञ्चित द्रव में तथा अन्य लक्षणों में विविधता पायी पाती है अतः शोध के निश्चित कारण का उल्लेख दुष्कर होते हुए भी सामान्य - T तया निम्नलिखित कारण माने जाते हैं-
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त्रिशोथीयाध्यायः १८ ] सूत्रस्थानम् ३७१ ( १ ) स्रोतमिति की प्रवेश्यना ( Permeability of capillary endothelium ) सामान्यतया स्रोनोमित्ति केवल जारक ( Og ) और जल या उसमें धुले हुए पदार्थों के ही लिए प्रवेश्य होती है । रक्तरसगन प्रोभूजिन ( Protien ) के लिए अप्रवेश्य होती है । किन्तु विस्तृत और अभिधान व्रणशोप, भाराधिक्य, अम्लाविश्य एवं कुछ निज और आगन्तुज विषों से इसकी प्रवेश्यता बढ़ जाती है तब प्रोभूजिन भी रक्तरस के साथ स्रोत के बाहर आ जाती है और तरल के पुनःशोषण में बाधा उत्पन्न कर शोफ को उत्पन्न करती है । ( २ ) स्रोतोगत भारवृद्धि - हृदय रोग में रक्तसञ्चार में बाधा होने से सिराओं और स्रोतों में रक्तभार स्वाभाविक से बहुत अधिक होकर उसके पुनःशोषण कार्य में बाधा और उसकी भित्तिकी प्रवेश्यता में वृद्धि उत्पन्न कर शोफ का कारण होता है । ( ३ ) रक्तरसगन प्रोभूजिनों के आसृतीय पीडन की हीनता ( Fall of colloid - osmotic pressure of plasma - protiens ) -- रक्तरसगत प्रोभूजिन ही तरल सञ्चय एवं आसृतीय सम्पीडन द्वारा धातुगत तरल का शोषण करती है । वृकविकारों में मूत्र द्वारा उसका अधिक निर्हरण होने ( लालामेह – Albuminures ) तथा स्रोनोमित्ति की प्रवेश्यता वृद्धि में रक्तरस के साथ धातुरस में नाव होने से तथा भौग्यपदार्थों में उसकी कमी होने से जब इसकी स्वाभाविक राशि ( प्रायः ७ प्रतिशत ) रक्त - रस में हीन ( ५०५ % से कम ) हो जाती है तब शोफ की उत्पत्ति होती है । ( ४ ) रक्तगत विभिन्न संघटकों का प्रभाव / Effects of other constituents of blood ) -इसमें जल और सैन्धव ( Sodium chloride ) को अधिक महत्त्व दिया जाता है किन्तु इनके सम्बन्ध में विभिन्न विद्वानों में मतभेद है और इनकी अधिकता से शोफोत्पत्ति के पक्ष और विपक्ष में अनेक प्रमाण दिए जाने हैं । वैसे शोक की चिकित्सा में अल और नमक का निषेध करने से निचित लाभ प्राचीनगम काल से देखा जाता है । किन्तु लवलियन का सिरा में निक्षेप करने से एवं अइमरजनन मूत्रापान में रक्त में जलांश अधिक होने पर भी शोफ की उत्पत्ति न होना, इनकी शोफ की कारणता के विपक्ष में प्रमाण है । ( ५ ) चातुगत परिवर्तन ( Changes in tissue - cells ) धातुओं में लवण आदि कनिषद पदार्थों के अनुचित रूप में सचित हो जाने पर भी उनको घोलने के लिए जल की अधिक आवश्यकता होती है और अधिक जल से शोफ की उत्पत्ति होती है । आयुर्वेदोक्त सभी कारणों का समाधान इन्हीं पाँचों कारणों द्वारा सरलता से किया जा सकता है, यथा ' अमुक्तावकानाम् ' भोजन के अभाव तथा भोजन में प्रोभूजिन ( Protiens ) तथा जीवनिक्ति ए और बी की कमी से भी शोफ ( Oedems ) होना है । आधुनिक ग्रन्थों में इसे दुर्भिक्षजन्य शोफ ( Famine oedema ) नाम दिया गया है । इसके साथ रोगी को पाण्डु ( Anaemia ) तथा कभी - कभी अनिसार के आक्रमण भी होते रहते हैं । सामान्य शोफ में विकृत अवयव की त्वचा फूली या उभरी हुई होती है । तनाव के कारण स्वचा कुछ पतली, चमकदार एवं विवर्ण होती है तथा सिरा पतली और चमकती दिखाई देती हैं, कुछ उष्ण भी होती हैं । तनाव से ही रोंगटे खड़े दिखते हैं । यह लक्षण पैत्तिक शोफ, जिसमें पाक की प्रवृत्ति होती है और अन्ततोगत्वा व्रणशोथ में परिणत हो सकता है, उसमें विशेष रूप से मिलते है । दबाने पर उत्सन्न भाग में गड्ढा पड़ना ( Pitting on pressure ) शोफ का महत्त्व पूर्ण लक्षण है । आजकल सूजन के लिये इन्फ्लेमेशन तथा ईडिमा शब्द का व्यवहार होता है । इंडिमा का वर्णन पहले किया जा चुका है, आगन्तुक कारणों से प्रायः इन्फ्लेमेशन की उत्पत्ति होती है । यह