चरक संहिता हिन्दी भाष्य — पृष्ठ 461–470
चरक संहिता हिन्दी भाष्य · Chaukhamba · पृष्ठ 461–470
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३७२ चरकसंहिता शारीरिक धातुओं की स्वाभाविक प्रतिक्रिया है ' Inflammation is the local defence of tissue of the site of damage which is caused by bacteria, injury or chemicals ' इन्फ्लेमेशन के परिणामस्वरूप विद्रधि ( Abscess ) की उत्पत्ति होती है । इंडिमा में विद्रधि नहीं बनती अपितु धातुओं में जल संचय हो जाने से भाग फूला हुआ दिखाई देने लगता है । साधारणतया किसी स्थान पर क्षोभ या उपसर्ग होने पर क्षोभक पदार्थ के विनाश या जीवाणुभक्षण क्रिया ( Phagocytosis ) के द्वारा उपसर्गकारी जीवाणु का नाश कर दिया जाता है जिसने साधारण प्रतिक्रिया के उपरान्त कोई लक्षण व्यक्त नहीं होते । जिस अवस्था में स्थानीय धातुओं की दुर्बलता होती है उस अवस्था में उपसर्ग के लक्षण स्पष्ट दृष्टिगोचर होने लगते है । जिन्हें दो अवस्थाओं में विभक्त किया जा सकता है— ( १ ) वाहिनीकृत अवस्था ( Vascular stage ) - यह अवस्था रक्तवाहिनियों के विस्फार के कारण उत्पन्न होती है । इसके निम्न लक्षण हैं - ( क ) रक्तिमा ( Redress ) विकृत भाग लाल हो जाता है । ( ख ) उष्णता ( Heat ) । ( ग ) स्पर्शासहता ( Tenderness ) । ( घ ) सूजन ( Swelling ) । ( ङ ) पीडा ( Pain ) । ( च ) स्वकर्मगुणहानि ( Loss of fuuction ) । ( २ ) धातुकृत अवस्था ( Cellular stage ) - इस अवस्था में उपसर्ग का मुकाबला करने के निमित्त स्थानीय प्रतिक्रियास्वरूप श्वेतकायाणुओं की वृद्धि होती है । बहाकारी ( Polymorph ) श्वेतकण जीवाणुओं का भक्षण कर लेते है । इस अवस्था में कुछ जीवाणु और श्वेतकायाणुओं की मृत्यु भी होती है । पूय के ये मुख्य घटक होते हैं । इंडिया में केवल पहिली अवस्था ही होती है, इससे वहाँ प्रयोत्पत्ति नहीं होती । अयं त्वत्र विशेषः — शीतरूक्षलघुविशद मोपवासाति कर्शनक्षपणादिभिर्वायुः प्रकुपित-स्त्वङ्मांसशोणितादीन्यभिभूय शोफं जनयति । स क्षिप्रोत्थानप्रशमो भवति, तथा श्यामा-रुणवर्णः प्रकृतिवर्णो वा, चलः स्पन्दनः खरपरुपभिन्नत्वग्रोमा विद्यत इव भिद्यत इव पीड्यत इव सूचीभिरिव तुद्यते पिपीलिकाभिरिव संसृप्यते सर्षपकल्कावलिप्त इव चिमि-चिमायते संकुच्यत आयम्यत इवेति वातशोथः ( १ ) ( १ ) वातिक - शोथ के निदान, सम्प्राप्ति और लक्षण - वातिक शोध में यह विशेषता होती है कि शीत, रूक्ष, लघु, विशद द्रव्यों के सेवन से अधिक श्रम करने से, अधिक उपवास से शरीर अत्यन्त कृश या अधिक क्षीण होने से, कुपित हुई वायु त्वचा, मांस, रक्त आदि को दूषित कर शोथ को उत्पन्न करती है । वह वातजन्य शोथ शीघ्र ही उत्पन्न होता है और शीघ्र ही शान्त हो जाता है । वह श्याम, अरुण वर्ग का होता है अथवा त्वचा के समान ही वर्णं वाला तथा फैलने वाला होता है । उसमें स्पन्दन होता है । इसमें खर परुष, फटी हुई, त्वचा और रोम होने हैं । छेदन की तरह, भेदन की तरह, पीडन की तरह, नूई से चुभोने की तरह वेदना होती है । चीटियाँ शरीर पर चल रही है, इस प्रकार शोध पर अनुभव होता है । सरसों का कल्क शरीर पर लगाने के समान चुनचुनाहट, संकोच और तनाव होता है । इसे वानिकशोथ कहते है ( १ ) उष्णतीक्ष्णकटुकक्षारलवणाम्लाजीर्णभोजनैरग्नयातपप्रतापैश्च पित्तं प्रकुपितं स्वयांस-शोणितान्यभिभूय शोथं जनयति । स क्षिप्रोत्थानप्रशमो भवति, कृष्णपीतनीलताम्रावभास १. ' धूमोपवासा ' न. । २. ' भिन्नलोमा ' ग. । ३. ' शोणितादीन्यभिभूय ' ग. ।
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त्रिशोथीयाध्यायः १८ ] सूत्रस्थानम् ३७३ उष्णो मृदुः कपिलताम्ररोमा, उध्यते दूयते धूप्यते ऊष्मायते स्विद्यते क्विद्यते न च स्पर्शमुष्णं वा सुषूयत इति पित्तशोथः (( २ ) ( २ ) पंत्तिशीय के निदान, सम्प्राप्ति और लक्षण - उष्ण, तीक्ष्ण, कटु, क्षार, लवण, अम्लरस, और अजीर्ण में भोजन करने से, अग्नि और धूप से सन्तप्त होने से पुरुष के शरीर में कुपित पित्त त्वचा, नांस, रक्त आदि को दूषित कर शोथ उत्पन्न करता है । वह पित्तज शोथ शीघ्र ही उत्पन्न होता है और शीघ्र ही शान्त हो जाता है । वह वर्ण में काला, पीला, नीला और ताम्र के समान लाल होता है | स्पर्श में उष्ण और मृदु होता है । कपिल वर्ण, पिंगल वर्ण, ताम्र ' वर्ण के रोम, शोथ में हो जाते हैं । उस शोध में पास रखी हुई अग्नि से जल रहा हैऐसा दाह होता है । सारे शोथ में सन्ताप होता है । शोध से धूम्र निकल रहा है ऐसा अनुभव होता है । गर्मी शोथ से निकल रही है ऐसा अनुभव होता है । शोध से स्वेद निकलता है और वह गीला रहता है । स किया जाय अथवा गर्म वस्तुओं का स्पर्श किया जाय तो उसका सहन नहीं होता । इसे वित्त शोध कहते है ( २ ) * गुरुमधुरशीतस्त्रिग्धैरतिस्वमाव्यायामादिभिश्च श्लेष्मा प्रकुपितस्त्वङ्मांसशोणितादी-न्यभिभूय शोधं जनयति । स कृच्छ्रोत्थानप्रशमो भवति, पाण्डुश्वेतावभासो गुरुः स्निग्धः श्लक्ष्णः स्थिरः स्त्यानः शुक्कायरोमा स्पर्शोष्णसहश्चेति श्लेष्मशोथः ( ३ ) ( ३ ) कफज शोथ के निदान, सम्प्राप्ति और लक्षण - गुरु, मधुर, शीत तथा स्निग्ध द्रव्यों के अधिक सेवन से, अधिक निद्रा और व्यायाम आदि श्रम न करने से, कुपित हुआ कफ, त्वचा, मांस, रक्त आदि को दूषित कर शोथ उत्पन्न करता है । वह कफज शोथ कठिनता से अर्थात् देर से उत्पन्न होता है और देर से ही शान्त होता है, उसका वर्ण पाण्डु या श्वेत होता है । शोथ में भारीपन, चिकनापन, लक्ष्णता, स्थिरता और कठोरपन होता है और शोध में ऐसे रोम होते हैं जिनका अग्रभाग श्वेत होता है और उष्ण स्पर्श अच्छा लगता है, इसे कफज शोथ कहते है ( ३ ) यथास्वकारणाकृति संसर्गाद् द्विदोषजास्त्रयः शोथा भवन्ति । यथास्वकारणाकृतिसन्नि-पातात् सान्निपातिक एकः, एवं सप्तविधो भेदः ॥ ७ ॥
( ४, ५, ६, ७ ) इन्द्रज तथा सान्निपातिक शोथ के निदान, सम्प्राप्ति और लक्षण – • अपने-अपने हेतुओं और लक्षणों के संमिश्रण से दो दोष से होने वाले, तीन शोथ होते हैं और अपने कारण और लक्षणों के संमिश्रण से एक सन्निपातज शोथ होता है, इस प्रकार शोध के सात भेद होते हैं ॥ ७ ॥
विमर्श - यद्यपि अध्याय के प्रारम्भ में तीन ही शोथ होते हैं ऐसी प्रतिज्ञा कर पुनः निज आगन्तुक भेदसे दो शोध माने हैं । लेकिन अन्ततोगत्वा शोथ के सात भेद माने हैं यथा — पृथक् दोषों से ३, संसर्ग ( दो दोप ) से ३ और सन्निपात से १, इस प्रकार ७ प्रकार के शोथ माने गये हैं । प्रकृतिभिस्ताभिस्ताभिर्भिद्यमानो द्विविधविविधश्चतुर्विधः सप्तविधोऽष्टविधश्च शोथ उपलभ्यते; पुनश्चैक एव, उत्सेधसामान्यात् ॥ ८ ॥
शोथ के विभिन्न वर्गीकरण - यद्यपि भिन्न - भिन्न कारणों से भेद को प्राप्त हुआ शोथ दो प्रकार का ( निज, आगन्तुक ), त्रिविध ( वातज, पित्तज, कफज ), चतुर्विध ( वातज, पित्तज, कफज, आगन्तुज ), सप्तविध ( वातज, पित्तज, कफज, वातपित्तज, वातकफज, पित्तकफज, त्रिदोषज ), अष्टविध ( सात १. ' न सुषूयते न सहते ' चक्रः । न च स्पर्शमुष्णं च सहते ' यो । २. ' एक एवं सप्तविधो भेदः ' न. । ३. एवं भेदेतिपूर्वकं पाठान्तरम् ग. ।
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२. द्विविध ( Bi - partite ) ३. त्रिविध ( Tri - partite ) ( क ) त्रिविध ३७४ चरकसंहिता निज, एक आगन्तुज ) इस प्रकार शो के भेद होते है और वह शोथ उत्सेध सामान्यसे एक ही प्रकार का होता है ॥ ८ ॥
विमर्श - शोध के विभिन्न भेदों का निम्न रूप में संग्रह ( वर्णन ) किया जा सकता है-१. एकनिष / Common ) उत्सेधसामान्यात् शोषः ( Swelling being the Common Symptom ) निज आगन्तुज ( Endogenous ) ( Exogenous ) वातिक पैत्तिक ( Vatika ) ( Paittika ) सर्वगात्राश्रित सर्वाङ्ग या सर्वसर, सु., वा. ) लैष्मिक ( Shlaishmika ) अर्धगात्राश्रित अवयवाश्रित ( एकाङ्ग ) ( च. चि. १२ ) ( General Anasarca ) ( Hemi type ( Local cedemas of cedema ) including inflammatory ) ( a ) त्रिविध ( माधव - साध्या-ऊर्ध्वगन मध्यगत अधोगत साध्यता प्रकरण ) ( ग ) त्रिविध पृथु उन्नत ग्रथित ( वाग्भट - आकृति भेद ) ( Thick ) ( Elevated ) ( Hard like glands ) ४. चतुर्विध वातिक पैत्तिक लैष्मिक आगन्तुज ( Quadru - partite ) ५. सप्तविध वातिक पैत्तिक लैष्मिक वातपैत्तिक ( Septa - partite ) वातश्लैष्मिक पित्तश्लैष्मिक सन्निपातज ६. अष्टविध वातिक पैत्तिक लैष्मिक वातपैत्तिक ( Octo - partite ) वातलैष्मिक पित्तश्लैष्मिक सन्निपातज आगन्तुज भवन्ति चात्र शूयन्ते यस्य गात्राणि स्वपन्तीव रुजन्ति च । पीडितान्युन्नमन्त्याशु वातशोथं तमादिशेत् ॥ यश्चाप्यरुणवर्णाभः शोथो नक्तं प्रणश्यति । स्नेहोष्णमर्दनाभ्यां च प्रणश्येत् स च वातिकः ॥ वानिक - शून्य हो गए हैं ऐसा प्रतीत शोथ का लक्षण • जिस पुरुष के गात्र शोधयुक्त और हो तथा वेदनायुक्त हो, शोथ को हाथ से दबाया जाय तो दब जाय पर शीघ्र ही पुनः उठ जाय, उसे वातज शोथ कहा जाता है । और जिस शोध का वर्ण अक्षय हो, रात्रि में शोध नष्ट हो जाना हो तथा स्नेहन, स्वेदन और मर्दन से शोथ नष्ट हो जाता हो उसे वानिक शोथ कहा जाता है ॥ ९ -१० ॥ '. ' दूयन्ते ' ग.।
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त्रिशोथीयाध्यायः १८ ] सूत्रस्थानम् ३७५ विमर्श - चिकित्सा के १२ वें अध्याय में भी वातिक - शोथ का लक्षण बताया है जो विशेष स्पष्ट है यथा — ' चलस्तनुत्वक् परुषोऽरुणोऽसितः सुषुप्तिहर्षानियुतोऽनिमित्ततः । प्रशाम्यति प्रोन्नमति प्रपीडितो दिवाली च श्वयथुः समीरणात् ॥ ' अर्थात् वातिक शोध चंचल होता है । इसकी त्वचा पतली होती है । यह कठोर, लाल या काला होता है । कभी संज्ञानाश ( Anaesthesia ) एवं कभी रोमहर्ष ( Hypersthesia ) होता रहता है । अकारण ही शान्त हो जाता है और दबाने पर पुनः उभर आता है । दिन में बढ़ जाता है । जानपदिक शोध ( Epidemic dropsy ) में शोफ दिन के अन्त में सबसे अधिक होता है और रात्रिको विश्राम करने से ठीक हो जाता है । इसे दिवाली कह सकते हैं । दानवीय उत्कोठ ( Angioneurotic oedema ) का भी इसमें ग्रहण कर सकते हैं । हृद्रोग में, विशेषतः उसकी आरम्भिक अवस्था में भी वातिक शोध के लक्षण मिलते हैं । यः पिपासाज्वरार्तस्य दूयतेऽथ विदह्यते । स्विद्यति क्लिद्यते गन्धी स पैत्तः श्वयथुः स्मृतः ॥ यः पीत नेत्रेवक्त्रत्वक् पूर्वं मध्यात् प्रेशूयते । तनुत्वक् चातिसारी च पित्तशोथः स उच्यते ॥ पैत्तिक शोध के लक्षण - प्यास और ज्वर से पीडित जिस पुरुष के शोध में जलन हो, दाह होता हो, पसीना निकलता हो, क्लेद युक्त हो और उसमें से गन्ध निकलता हो, उसको पित्तजन्य शोथ कहते हैं । जिस पुरुष के नेत्र, मुख और त्वचा पीले वर्ण की हो और शोथ मध्य शरीर से उत्पन्न हो, शोथ की त्वचायें पतली हों और रोगी को अतिसार होता हो तो इसे पित्तज शोथ कहा जाता है ॥ ११-१२ ॥ विमर्श - चिकित्सा स्थान ( अ. १२ वें ) में इसका लक्षण निम्न रूप से बताया गया है, यथा-' मृदुः सगन्धोऽसितपीतरागवान् भ्रमज्वरस्वेद तृषामदान्वितः । य उष्यते स्पष्टरुपक्षिरागकृत् स पित्त-शोथो भृशदाहपाकवान् ॥ ' अर्थात् पैत्तिक शोध मृदु, विशेष प्रकार की गन्ध से युक्त, काला, पीला या लाल रंग का; भ्रम, ज्वर, स्वेद, प्यास तथा मद जैसे लक्षणों से युक्त होता है । जिसमें दाह विशेष हो तथा जिसमें पीडा की स्पष्टता एवं आँखों में सुखीं हो, पकने की जिसमें प्रवृत्ति हो उसे पैत्तिक शोथ समझना चाहिये । पित्तकृत विदाह के कारण विकृत स्थान की धातुएँ भी आक्रान्त हो जाती हैं तथा विदाह और पाक की प्रवृत्ति होने से पैत्तिक शोथ के सत्र लक्षण व्रण शोथ
( Inflammation ) या शोथ की पच्यमानावस्था से मिलते हैं ।
शीतः सक्तगतिर्यस्तु कण्डूमौन् पाण्डुरेव च । निपीडितो नोनमति श्वयथुः स कफात्मकः ॥
यस्य शस्त्रकुशच्छिन्नाच्छोणितं न प्रवर्तते । कृच्छ्रेण पिच्छा स्स्रवति स चापि कफसंभवः ॥ इलैमिकशोथ के लक्षण -- जो शोथ स्पर्श में शीतल, शोथ की गति आगे न बढ़नी हो, खुजली युक्त हो, पाण्डु वर्ण का हो, दबाने पर दब जाता हो पर उठता न हो, उसे कफज शोध कहते हैं । जिस शोध में शस्त्र, कुश आदि से कट जाने पर रक्त न निकले और कठिनता से उससे चिपचिपा झाग निकले वह शोध कफज कहा जाता है ॥ १३-१४ ॥ विमर्श - चिकित्सा स्थान ( अ. १२ ) में इसके लक्षण निम्न बताये हैं - ' गुरुः स्थिरः पाण्डुररोचका-न्वितः प्रसेकनिद्रावभिवह्निमान्यकृत् । स कृच्छ्रजन्मप्रशमो निपीडितो न चोन्नमेद्रात्रिबली कफात्मकः ॥ ” अर्थात् जो शोथ गुरु, स्थिर, पाण्डुवर्ण का हो, रोगी अरुचि से पीडित हो, मुख से लालास्राव होता हो, निद्रा अधिक आती हो, वमन और अग्निमान्द्य से पीडित हो, शोथ की उत्पत्ति और शान्ति कठिनाई से होती हो, दबाने पर दब जाना हो पर शीघ्र उठता न हो, रात्रि में शोध का बल १. ‘ पीतमुखनेत्रत्वक् ’ ग. । ३. ' पाण्डुः कण्डूयतेऽपि च ' यो । २. ‘ प्रसूयते ' ग. । ४. ' पिच्छा ' ग. ।
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३७६ चरकसंहिता अधिक हो तो उसे कफज शोथ कहते हैं । कफज शोध रात्रि में अधिक रहता है क्योंकि रात्रि में जब मनुष्य शयन करता है तो सारे स्रोतों का मुख बन्द हो जाता है और मनुष्य स्थिर रहता है, इसलिये कफ बढ़ जाता है । दिन में सभी स्रोत खुले रहते हैं, चेष्टा मनुष्य कुछ न कुछ किया करना है, इसलिये कफ दुर्बल रहता है । अतः इसका वेग दिन में नहीं रहता है । यह शोथ घन रहता है । इसे घन शोत्र ( Solid oedema ) कहा जा सकता है । यह लसीका वाहिनियों ( Lymphatic ) के अवरोध से पैदा होता है । निदानाकृति संसर्गाच्छ्रयथुः स्याद् द्विदोषजः । सर्वाकृतिः सन्निपाताच्छोधो व्यामिश्रहेतुजः ॥ द्वन्द्व तथा सान्निपातिक शोध - निदान और लक्षणों के संसर्ग से द्वन्द्वज शोथ तीन प्रकार का होता है और सभी दोषों के लक्षणों के मिलने से सन्निपातज शोध एक प्रकार का होता है || १५ || विमर्श - आचार्य की यह शैली है कि प्रकृतिसमसमवेत रूप में दोप मिल कर जब रोग उत्पन्न करते हैं तो उनका लक्षण और कारण अलग नहीं बताते । इन्द्रज तथा सान्निपातिक शोध को अलग न कह कर उन्हीं के लक्षणों से इन्द्रज और सन्निपात का लक्षण बताया है । 1 * यस्तु पादाभिनिर्वृत्तः शोर्थः सर्वाङ्गगो भवेत् । जन्तोः स च सुकष्टः स्यात् प्रसृतः स्त्रीमुखाच्च यः ॥ यश्वापि गुह्यप्रभवः स्त्रिया वा पुरुषस्य वा । स च कष्टतमो ज्ञेयो यस्य च स्युरुपद्रवाः ॥१७ ॥
स्थान के अनुसार शोथ की साध्यासाध्यता - जो शोध प्रथम पैर से उत्पन्न होकर सम्पूर्ण शरीर में फैल जाय वह पुरुष के लिये कष्टसाध्य होता है । स्त्री के मुख से शोथ प्रथम उत्पन्न होकर सम्पूर्ण शरीर में फैल जाय तो वह भी कष्टसाध्य होता है । स्त्री एवं पुरुष दोनों के गुह्य स्थान ( गुदा और योनि या मूत्रेन्द्रिय ) से उत्पन्न होकर यदि सम्पूर्ण शरीर में फैल जाय तो वह अधिक कष्टकारी होता है और यदि स्त्री या पुरुष के किसी प्रकार के शोध में सारे उपद्रव हो तो वह कष्टसाध्य होता है ॥ १६-१७ ॥ विमर्श - सुश्रुत ने चि. अ. २३ में असाध्यतासम्बन्धी अपना मत इस प्रकार प्रकट किया है, यथा - ' श्वयथुर्मध्यदेशे यः स कष्टः सर्वगश्च यः । अर्धाङ्गेऽरिष्टभूतश्च यश्चोर्ध्वं परिसर्पति ॥ ' तथा क्षारपाणि ने - ' ऊर्ध्वगामी नरं पद्भयामधोगामी मुखात्त्रियम् । उभयं वस्तिसंजातः शोधो हन्ति न संशयः ॥ ' तथा - ' पादप्रवृत्तः श्वयथुर्नृणां यः प्राप्तयान्मुखन् । स्त्रीणां वक्त्रादधो यानि वस्निजश्च न सिध्यति ॥ ' तथा वृद्ध वाग्भट ने भी ' नन्द्रादाहारचिच्छर्दिमूर्च्छाध्मानानितारवान् । अनेको-पद्रवयुतः पादाभ्याम् प्रसृतो नरम् ॥ नारीं शोथो मुखाद्धन्ति कुक्षिगुह्यादुभावपि ॥ ' ( अ. सं. शा. अ. ११ ) । इस प्रकार सभी आचार्यों ने बताया है कि पैर से उत्पन्न होने वाले शोथ पुरुषों के लिये और मुख से उत्पन्न होने वाले शोथ स्त्रियों के लिये तथा गुह्य स्थान से उत्पन्न होने वाले शोथ दोनों के लिये घातक होते हैं । माधव ने इसको स्पष्ट रूप में कहा है- ' अनन्योपद्रवकृतः शोथः पादसमुत्थितः । पुरुषं हन्ति नारीं च मुखजो गुह्यजो द्वयम् ॥ ' अर्थात् जो शोध किसी रोग के उपद्रव स्वरूप न हो और पैर से पुरुष को प्रारम्भ हो और स्त्री को मुख से और उभय ( स्त्री पुरुष दोनों ) को गुह्य स्थान से उत्पन्न हो तो वह घातक होता है । चक्रपाणि ने पुरुष के पाठोन्थ शोथ की कृच्छ-साध्यता के बारे में निम्नांकित युक्ति दी है । उनके विचार से पुरुष का अधोभाग लघु होता है अत एव अगर इस शोध को लघु स्थान में ही अच्छा नहीं किया जा सका तो वह ऊर्ध्व भाग में १. ‘ पात्राभिनिर्वृत्तः पुरुषाणां लघावधोदेशे जातः सन् स यदा न जीयते तदा गुरुमुर्ध्वप्रदेशं गतः स च न पार्यते जेतुं, यो हि लवौ प्रदेशे जेतुं न पार्यते गुरुप्रदेशगतो नितरामेव न पार्यते; एवं प्रदतः स्त्रीमुग्वाच्च य इत्यपि ज्ञेयं; वचनं हि - ' अधोभागो गुरुः स्त्रीणामूर्ध्वः पुंसां गुस्ता ' इति चक्रः । २. ' शोथो गुर्वङ्गगो ' ग. ।
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' त्रिशोथीयाध्यायः १८ ] सूत्रस्थानम् ३७७ जाने पर और कष्टसाध्य होना क्योंकि पुरुष का ऊर्ध्व भाग गुरु होता है । यथा - ' अधोभागो गुरु: स्त्रीणामूर्ध्वः पुंसां गुरुस्तथा । इसके विपरीत स्त्री का मुखोत्थ शोध कष्टसाध्य होगा, युक्ति उपर्युक्त वाली ही है । * छदिः श्वासोऽरुचिस्तृष्णा ज्वरोऽतीसार एव च । सप्तकोऽयं सदौर्बल्यः शोथोपद्रवसंग्रहः ॥ शोध का उपद्रव - संक्षेप में वमन, श्वास, भोजन में अरुचि, प्यास की अधिकता, ज्वर, अनिसार और दुर्बलता ये ७ शोथ के उपद्रव है ॥ १८ ॥
विमर्श - सुश्रुत ने हिचकी और कास, यह दो उपद्रव शोध के अधिक माने हैं, यथा-' श्वासः पिपासा दौर्बल्यं ज्वरछर्दिर रोचकः । हिक्कातिसारकासाश्च शोथिनं क्षपयन्ति हि ॥ ' ( सु. चि. अ. २३ ) यस्य श्लेष्मा प्रकुपितो जिह्वामूलेऽवतिष्ठते । आशु संजनयेच्छोथं जायतेऽस्योपजिह्निका ॥ ( २ ) एकदेशीय शोथ ( Local Swellings ) ( १ ) उपजिविका कुपित हुआ कफ जिस पुरुष के जिहा के मूल भाग में अपना स्थान बनाता है, उसके जिहा के मूल भाग में शीघ्र ही शोथ उत्पन्न कर देता है । इसे उपजिह्निका कहते हैं ॥ १ ९ ॥ विमर्श - जिल्हा के मूल में जो शोध होता है उसका रूप यहाँ नहीं बनाया गया है पर सुश्रुत ने नि. अ. १६ में, इसे जिवा के अग्र भाग के समान शोध को अधिजिह्वा माना है यथा - ' जिह्वाग्ररूपः - श्वयथुः कफात्त जिह्वोपरिष्टादपि रक्तमिश्रात् । ज्ञेयोऽविजिह्नः खलु रोग एष विवर्जयेदागतपाकमेनम् ॥ ' अर्थात् जिसे चरक ' उपजिह्वा ' मानते हैं उसी को सुश्रुत ने ' अधिजिहा ' माना है । पर चरक ने जिह्वा के ऊपरी भाग में होने वाले शोध को उपजिह्वा और जिह्वा के अधोभाग में होने वाले शोध को अधिजिह्वा माना है, यथा- ' जिड़ोपरिष्टादुपजिह्निका स्यात् कफादधस्तादधिजिह्निका च । ( च. चि. अ. १२ ) । वाग्भट ने भी उपजिडा और अधिजिल्हा का यही भेद माना है- ' प्रबन्धनेऽधो जिह्वायाः शोको जिह्वाग्रसन्निभः । साङ्कुरः कफपित्तात्रैर्लालोषास्तम्भवान् खरः ॥ अधिजिह्वः सरुक्कण्डर्वाक्या-SS हारविघातकृत् । नादृगेोपजिह्वस्तु जिह्वाया उपरि स्थितः ॥ ' ( अ. हृ. उ. अ. २१ ) । सुश्रुत भी उपजिह्निका का वर्णन किया है पर वह जिला के नीचे होता है या ऊपर होता है यह स्पष्ट नहीं कहा है क्योंकि अधिजिह्वा के वर्णन में ' जिडोपरिष्टादपि ' से जिहा के ऊपरी भाग में ही उपजिड़ा होती हैं -- ऐसा सूचित किया है, पर लक्षण से यह बात स्पष्ट नहीं होती, यथा-' जिहाग्ररूपः श्वयथुर्हि जिह्वामुन्नम्य जातः कफरक्तमूलः । लालाकरः कण्डुयुनः सचोपः सा तूपजिहा पठिता भिषग्भिः ॥ ' ( मु. नि. अ. १६ ) । अर्थात् जिड़ा के अग्र भाग के समान जिहा को ऊपर उठा कर कफ और रक्त के कारण एक शोथ होता है, उसे ' उपजिदिका ' कहते हैं । इसमें लालास्राव, कण्डू और जलन होती है । यहाँ पर जिल्हा को ऊपर उठा कर का तात्पर्य, जिवा के अधः भाग में होने वाले शोध को अधिजिहा माना ' है । डल्हण ने ' एतेन जिड़ाया अधोभवति इत्युक्तम् ' कहा है । उपजिह्निका को जिहा रोग में और अधिजिया को कण्ठ रोग में माना है, यह दोनों में भेद किया है । आज कल इस रोग को रेनुला ( Ranula ) कहते हैं । जिहा के नीचे श्लेष्मल पदार्थ के संचय होने से एक उभार हो जाता है । १. ‘ संजनयन्छोथम् ' यो. ।
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३७८ चरकसंहिता यह जिड्डामूलीय ग्रन्थि ( Sublingual gland ) की नली में अवरोध होने से होता है । चरक के मन से Ranula को अविजिता कहा जाता है और उपजिहा को Acute glossitis कहा जा सकता है । & यस्य श्लेष्मा प्रकुपितः काकले व्यवतिष्ठते । आशु संजनयेच्छोकं करोति गलशुण्डिकाम् ॥ ( २ ) गलशुण्डी - जिस व्यक्ति के शरीर में कुपित हुआ कफ काकल ( तालु मूल ) प्रदेश में अपना स्थान बनाता है तो शीघ्र ही वहाँ शोथ उत्पन्न कर देता है, उसे ' गलशुण्डी ' कहते है || २० || विमर्श - जिह्वामूल, नालुमूल तथा काकल ये तीनों समीपवर्ती प्रदेश है अतः शोथ - सामान्य लक्षण के अनुसार इन प्रदेशों में ये तीनों रोग होते है, सुश्रुत ने इसे ' कण्ठशुण्डी ' माना है, यथा-' इलेष्मातृग्भ्यां तालुमूलात् प्रवृद्धो दीर्घः शोफो ध्मातवस्तिप्रकाशः । तृष्णाकासश्वासकृत् संप्रदिष्टो व्याधिर्वैद्यैः कण्ठशुण्डीति नाम्ना ॥ ' ( सु. नि. अ. १६ ) अर्थात् कफ और रक्त के प्रकुपित होने से नालु के मूल में बढ़ा हुआ लम्बा शोथ वायु से भरी हुई वस्ति के समान प्रतीत होता है । इसमें रोगी को प्यास, कास और श्वास हो जाता है । इन दोनों के लक्षणों को देखकर गलशुण्डी या कण्ठशुण्डी कोई भयंकर रोग नहीं प्रतीत होता है पर वाग्भट ने इसे एक भयंकर रोग माना है, यथा - ' तालुमूले कफात्सास्रान्मत्स्यबस्तिनिभो मृदुः । प्रलम्बः पिच्छिलः शोफो नासयाऽऽहारमी-रयन् ॥ कण्ठोपरोधतृट् कासवमिकृद् गलशुण्डिका ' । ' ( अ. हृ. उ. अ. २१ ) अर्थात् तालु के मूल में कफ और रक्त के दूषित होने से मछली की वस्ति के समान मृदु लटकने वाला चिपचिपा शोथ होता है । इसमें कण्ठ रुक जाता है और प्यास, कास तथा वमन होता है । इसे आजकल ( Urulitis या Quinsi Abscess ) कह सकते है । * यस्य श्लेष्मा प्रकुपितो गलबाह्येऽवतिष्ठते । शनैः संजनयेच्छोकं गलगण्डोऽस्य जायते ॥ ( ३ ) गलगण्ड - जिस व्यक्ति के गले के बाहरी प्रदेश में कुपित हुआ कफ अपना स्थान बनाता है और वहाँ धीरे - धीरे शोथ उत्पन्न करता है, उसे ' गलगण्ड ' कहा जाता है ॥ २१ ॥
विमर्श - सुश्रुत ने इसका लक्षण इस प्रकार बनया है, यथा- ' वातः कफश्चापि गले प्रदुष्टो मन्ये च संश्रित्य तथैव मेदः । कुर्वन्ति गण्डं क्रमशः स्वलिङ्गैः समन्वितं तं गलगण्डमाहुः ॥ ' तथा ' निबद्धः श्वयथुर्यस्य मुष्कवलम्बते गले । महान् वा यदि वा ह्रस्वो गलगण्डं तमादिशेत् ॥ ' ( सु. नि. अ. ११ ) । यह ग्रन्थि एक ही होती है, यथा- ' गलस्य पार्श्वे गलगण्ड एकः स्याद्गण्डमाला बहु-भिस्तु गण्डैः ॥ ' ( च. चि. अ. १२ ) । इसे आधुनिक दृष्टि से Enlarged Thyroid Swellings कह सकते है । यस्य श्लेष्मा प्रकुपितस्तिष्ठत्यन्तर्गले स्थिरः । आशु संजनयेच्छोफं जायतेऽस्य गलग्रहः ॥ ( ४ ) गलग्रह — जिस मनुष्य का कुपित हुआ कफ गले के अन्तः प्रदेश में जाकर स्थिर हो जाय और शीघ्र ही शोथ उत्पन्न कर दे तो इसे ' गलग्रह ' कहा जाता है ॥ २२ ॥
यस्य पित्तं प्रकुपितं सरक्तं त्वचि सर्पति । शोधं सरागं जनयेद्विसर्पस्तस्य जायते ॥ २३ ॥
( ५ ) विसर्प - में फैल जाना • जिस व्यक्ति के शरीर में कुपित हुआ पित्त रक्त के साथ त्वचा है, और रक्त वर्ण का शोथ उत्पन्न करता है उसे ' विस ' कहा जाता है ॥ २३ ॥
विमर्श - - इसका विशेष वर्णन चिकित्सा के २१ वें अध्याय में किया जायगा । इसको आजकल Eryseplas कहते हैं । १-२-३. ' संजनयन्द्वोयम् ' यो । ४. ' जनयत् ' यो ।
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त्रिशोथीयाध्यायः १८ ] सूत्रस्थानम् ३७६ यस्य पित्तं प्रकुपितं त्वचि रक्तेऽवतिष्ठते I । शोफं सरागं जनयेत् पिडका तस्य जायते ॥२४ ॥
( ६ ) पिडका - जिस व्यक्ति का प्रकुपित पित्त, त्वचा और रक्त में स्थिर होता है और लालिमा के साथ शोथ उत्पन्न करता है, उसे पिडका कहते है ॥ २४ ॥
विमर्श - विसर्प में शोथ फैलने वाला होता है और पिडका में शोध स्थिर होता है । यस्य प्रकुपितं पित्तं शोणितं प्राप्य शुप्यति । तिलकाः पिप्लवो व्यङ्गा नीलिका तस्य जायते ॥ ( ७, ८, ९, १० ) तिलक, पिप्लु, व्यङ्ग, नीलिका - • जिस व्यक्ति की त्वचा में कुपित हुआ पित्त रक्त में जाकर सूख जाता है उसे तिल, पिप्लु, व्यङ्ग और नीलिका उत्पन्न होती हैं ॥ २५ ॥
विमर्श - ये रोग क्षुद्ररोगाधिकार के हैं । तिल का लक्षण - ' कृष्णानि तिलमात्राणि नीरुजानि समानि च । वातपित्तकफोच्छोषात्तान्विद्यात्तिलकालकान् ॥ ' ( सु. नि. अ. १३ ) । ' पिप्लु ' को सुश्रुत ' मणि ' कहा है, यथा - ' नीरुजं सममुत्पन्नं मण्डलं कफरक्तजम् । सहजं रक्तमीपच्च श्लक्ष्णं जतुमणि विदुः ॥ ' ( सु. नि. अ. १३ ) । व्यङ्ग का लक्षण - ' क्रोधायासप्रकुपितो वायुः पित्तेन संयुतः । मुखमागत्य सहसा मण्डलं विसृजत्यनः । नीरुजं तनुकं श्यावं मुखे व्यङ्गं तमादिशेत् ॥ ’ ( स. नि. अ. १३ ) और नीलिका का लक्षण माधवकर ने इस प्रकार बताया है, यथा - ' कृष्णमेवं गुणं गात्रे मुखे वा नीलिकां विदुः । परन्तु वाग्भट ने ' मुख में श्याम वर्ण के मण्डल का नाम ' व्यङ्ग ' और शरीर के अन्य प्रदेश में होने वाले श्याम मण्डल का नाम ' नीलिका ' माना है, यथा - ' श्यामलं मण्डलं व्यङ्गं वक्त्रादन्यत्र नीलिका ॥ ' ( अ. हृ. उ. अ. ३१ ) । * यस्य पित्तं प्रकुपितं शङ्खयोरवतिष्ठते । श्वयथुः शङ्खको नाम दारुणस्तस्य जायते ॥२६ ॥
( ११ ) शंखक - जिस व्यक्ति के शङ्ख प्रदेश में कुपित हुआ पित्त अपना स्थान बनाना है । वहाँ शङ्खक नाम का भयानक शोध हो जाता है ॥ २६ ॥
विमर्श - इसकी अमाध्यता का उल्लेख सिद्धि स्थान के नवें अध्याय में किया गया है - ' त्रि-रात्राजीवितं हन्ति शंखको नाम नामतः । जीवेत् त्र्यहं चेद्वैषज्यं प्रत्याख्याय समाचरेत् ॥ ' चरक ने केवल इसमें पित्त की दृष्टि मानी है पर सुश्रुत ने तथा अन्य आचार्यों ने कफ और रक्त का भी सम्बन्ध माना है । यथा - ' शंखाश्रितो वायुरुदीर्णवेगः कृतानुयात्रः कफपित्तरक्तैः ' । ( सु. उ. अ. २५ ) तथा विदेह ने भी इसमें वात, पित्त और रक्त का सम्बन्ध माना है जैसा कि मधुकोषकार ने बताया है - ' चीयते तु तदा पित्तं शंखयोरनिलाचितम् । निरुणद्धि ततो मर्म परिपूरितमुल्व-णम् ॥ ततः शंखौ प्ररुज्येते दह्येत इव वह्निना । सूचीभिरिव तुद्येते निकृत्येत इवासिना || शंखको नाम शिरसि व्याधिरेष सुदारुणः । तृष्णामूर्च्छाज्वरकरस्त्रिरात्रात् परमन्तकृत् ॥ कुशलेन तूपकान्न-स्त्रिरात्रादेव जीवति ॥ ' इस प्रकार चरक से और इन वचनों से शंखक की उत्पत्ति के विषय में मतभेद दिखाई देता है । इसलिये चरक का तात्पर्य पित्त की प्रधानता बतानी है, शेष दो की अप्रधानता इसमें रहती है । इसी बात का समर्थन वाग्भट ने भी किया है, यथा- ' पित्तप्रधानै-र्वाताद्यैः शंख शोफः सशोणितैः । तीव्रदारुजारागप्रलापज्वरतृभ्रमाः ॥ तिक्तास्यः पीतवदनः क्षिप्रकारी स शंखकः । त्रिरात्राजीवितं हन्नि सिध्यत्यप्याशु साधितः ॥ ' ( अ.हृ. उ. अ. २३ ) । यस्य पित्तं प्रकुपितं कर्णमूलेऽवतिष्ठते । ज्वरान्ते दुर्जयोऽन्ताय शोथस्तस्योपजायते ॥२७ ॥
( १२ ) कर्णमूलिकशोथ · - जिस व्यक्ति के कर्णमूल में कुपित पित्त स्थिर होता है और वह १. ' विसर्पस्य पिडकायाञ्च तुल्यकारणत्वेऽपि विसर्पे सर्पणशीलो दोषः पिडकायां च स्थिरो शेयः, अत एव पिडका संप्राप्तौ ' अवतिष्ठते ' इयुकम् ' इति चक्रः । २. ' जनयत् ' यो । ३. यस्य पित्तमित्यादौ पित्तं प्राप्य शोणितं कर्तृ शुष्यतीति योजनीयम् ' इति चक्रः ।
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३८० चरकसंहिता ज्वर के अन्त में शोथ उत्पन्न करता है तो वह असाध्य होता है, और मरण के लिए होता है || २७ | विमर्श -- यह कर्णमूलिक ग्रन्थि ( Parotid gland ) या शोध है । इसका वर्णन अन्यत्र भी किया गया है, यथा- सन्निपातज्वरस्यान्ते कर्णमूले सुदारुणः । शोथः संजायते तेन कश्चिदेव-प्रमुच्यते । ( च. चि. अ. ३ ) । हारीतसंहिता में इसका वर्णन विस्तृत रूप से किया गया है, यथा-' ज्वरादितो वा ज्वरमध्यतो वा ज्वरान्ततो वा श्रुतिमूलशोथः । क्रमेण साध्यः खलु कष्टसाध्य-स्ततोऽप्यसाध्यो मुनिभिः प्रदिष्टः ॥ ' * वातः प्लीहानमुद्भूय कुपितो यस्य तिष्ठति । शनैः परितुदन् पार्श्व लीहा तस्याभिवर्धते ॥२८ ॥
( १३ ) प्लीहावृद्धि - • जिस व्यक्ति की कुपित हुई वायु प्लीहा को अपने स्थान से हटाकर स्थित होती है उस व्यक्ति के वाम पार्श्व में धीरे - धीरे वेदना करती हुई प्लीहा बढ़ जाती है ॥ २८ ॥
विमर्श - चिकिस्था स्थान में बताया है कि प्लीहा अपने स्थान से नीचे आ जाती है और बढ़ जाती है, यथा— ' वामपार्श्वे स्थितः प्लीहा च्युतः सानात् प्रवर्धते ॥ ' ( च. चि. अ. १३ ) । इसे आजकल ( Splenomegaly ) कहते है | * यस्य वायुः प्रकुपितो गुल्मस्थानेऽवतिष्ठते । शोफं सशूलं जनयन् गुल्मस्तस्योपजायते ॥ ( १४ ) गुल्म - जिस व्यक्ति की कुपित हुई वायु गुल्म होने वाले स्थान में अपना स्थान बनाती है तो उस स्थान में वह शोथ, शूल उत्पन्न करती हुइ गुल्म उत्पन्न करती हैं ॥ २ ९ ॥ विमर्श - गुल्म के भेद तथा लक्षग का वर्णन इस प्रकार मिलता है यथा- ' तस्य पञ्चविधं स्थानं पार्श्वन्नाभिवस्तयः । ' ' हृद्वस्त्योरन्तरे ग्रन्थिः संचारी यदि वाऽचलः । चयापचयवान् वृत्तः स गुल्म इति कीर्तितः ॥ ' ( सू. उ. अ. ४२ ) । इसका विस्तृत वर्णन च. चि. अ. ५ में दर्शनीय है । * यस्य वायुः प्रकुपितः शोफशूलकरश्चरन् । वंक्षणाद्वृषणौ याति वृद्धिस्तस्योपजायते ॥ ( १५ ) वृद्धि रोग - • जिस व्यक्ति के शरीर में प्रकुपित वायु शोथ, शूल उत्पन्न कर चलती हुई वंक्षण प्रदेश से वृषण में जाती है उसे वृद्धि रोग हो जाता है ॥ ३० ॥
विमर्श - वृद्धि की सम्प्राप्ति और कारण वाग्भट ने निम्न बताया है - ' क्रुद्धो रुद्धगतिर्वायुः शोथशूलकरश्चरन् । मुष्कौ वङ्क्षणतः प्राप्य फलकोपाभिवाहिनीः ॥ प्रपीड्य धमनीवृद्धिं करोति फल-कोपयोः । दोषास्र मेदोमूत्रान्त्रैः स वृद्धिः सप्तथा गदः ॥ ' ( अ.हृ. नि. अ. ११ ) | वृद्धि के ये ७ भेद माने गये हैं । पर चरक का तात्पर्य वृषगशोध की तरफ प्रतीत होता है जिसे ( Orchitis ) कहते हैं या इसको ( Inguino - scrotal swellings ) कह सकते हैं । * यस्य वातः प्रकुपितस्त्वङ्मांसान्तरमाश्रितः । शोथं संजनयेत् कुक्षावुदरं तस्य जायते ॥३१ ॥
( १६ ) उदर रोग - जिस व्यक्ति के शरीर में कुपित हुई वायु त्वचा और मांस के बीच में आश्रित होकर कुक्षि में शोध उत्पन्न करती हो उसे उदर रोग उत्पन्न हो जाता है ॥ ३१ ॥
विमर्श - उदररोग का विस्तृत वर्णन च. चि. १३ मे दर्शनीय है । * यस्य वातः प्रकुपितः कुत्तिमाश्रित्य तिष्ठति । नाधो ब्रजति नाप्यूर्ध्वमानाहस्तस्य जायते ॥ ( १७ - हुई वायु कुक्षि में आश्रित होकर स्थिर हो जाती ) आनाह • जिस पुरुष की प्रकुपित
है उसे आनाह रोग हो जाता है । इसमें वायु न ऊपर जाती है और न नीचे ॥ ३२ ॥
विमर्श -- आनाह की परिभाषा सुश्रुत ने निम्न प्रकार से दी है- ' आमं शद वा निचितं क्रमेण भूयो विबद्धं विगुणानिलेन । प्रवर्तमानं न यथास्वमेनं विकारमानाहमुदाहरन्ति ॥ ' ( सु. उ. ५३ ) । इसको Constipiaton कहने की तरफ झुकाव अधिक होता जा रहा है । १. पार्श्वन्नाभिवस्तिष्वित्यर्थः । २ ' कुक्षिमावार्य ग. ।
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त्रिशोथीयाध्यायः १८ ] सूत्रस्थानम्
* रोगाश्चोत्सेधसामान्यदधिमांसार्बुदादयः ।
विशिष्टा नामरूपाभ्यां निर्देश्याः शोथसंग्रहे ॥ ३३ ॥
३८१ ( १८ ) उत्सेथ अधिमास अर्बुद आदि रोग नाम और स्वरूप में भिन्न होने पर भी उत्सेध-सामान्य से शोध - संग्रह में कहने योग्य है ॥ ३३ ॥
विमर्श - अर्थात् इसी प्रकार कुपित हुये वातादिदोष अधिमांस, अर्बुद, अर्श, श्रीपद ग्रन्थि, गण्डमाला आदि शोध को उत्पन्न करते हैं, पर इनके स्थान नाम और रूप भिन्न - भिन्न होते हैं । अतः इनका वर्णन अलग किया जायगा । aaf पत्ता यस्य युगपत्कुपितास्त्रयः । जिह्वामूलेऽवतिष्ठन्ते विदहन्तः समुच्छ्रिताः ॥ * जनयन्ति भृशं शोथं वेदनाश्च पृथग्विधाः । तं शीघ्रकारिणं रोगं रोहिणीति विनिर्दिशेत् ॥ त्रिरात्रं परमं तस्य जन्तोर्भवति जीवितम् । कुशलेन त्वनुक्रान्तः क्षिप्रं संपद्यते सुखी ॥ ( १ ९ रोहिणी - एक साथ कुपित हुये वात, पित्त, कफ बढ़कर जिहा के मूल में विदाह करते हुये अपना स्थान बनाते हैं, जिससे वे वहाँ पर अनेक प्रकार की वेदनाओं के साथ भयंकर शोध उत्पन्न करते हैं । शीघ्र ही मृत्यु देने वाले इस रोग का नाम रोहिणी है । रोगी व्यक्ति के जीने की परम अवधि तीन दिन होती है । पर यदि कुशल चिकित्सक द्वारा चिकित्सा कराई जाय तो शीघ्र ही रोग अच्छा भी हो जाता है ॥ ३४-३६ ॥ विमर्श - मुश्रुत ने इस रोग में गले में अंकुर होना बताया है । यह वातज, पित्तज, कफज, सन्निपातज, रक्तज भेद से पाँच तरह की होती है, यथा- ' गलेऽनिलः पित्तकफौ च मूच्छितौ पृथक् समस्ताश्च तथैव शोणितम् । प्रदृष्य मांसं गलरोधिनोऽङ्कुरान् सृजन्ति यान् साऽमुहरा हि रोहिणी ॥ जिहां समन्ताद्भशवेदना ये मांसाङ्कुराः कण्ठनिरोधिनः स्युः । तां रोहिणीं वातकृतां वदन्ति वातात्मकोद्रवगाढयुक्ताम् ॥ क्षिप्रोमा क्षिप्रविदाहपाका तीव्रज्वरा पित्तनिमित्तजा स्यात् । स्रोतो-निरोधिन्यपि मन्दपाका गुर्वी स्थिरा सा कफसंभवा वै ॥ गम्भीरपाकाऽप्रतिवारवीर्या त्रिदोषलिङ्गा त्रयसंभवा स्यात् । स्फोटाचिता पित्तसमानलिङ्गाऽसाध्या प्रदिष्टा रुधिरात्मिकेयम् ॥ ' ( सु. नि. २६ ) चरक ने रोहिणी रोग में तीन दिन के अन्दर ही मृत्यु हो जाती है, ऐसा बताया है और इसे सन्निपातज माना है । भोज ने इसे अलग - अलग दोषों से, सन्निपातज एवं रक्तज माना है और दोष के अनुसार मारक- अवधि अलग - अलग बताई है, यथा- ' तालुः शुष्यति कण्ठश्च वातेनाय-म्यते यदा । कण्ठेऽस्यान्नं प्रसज्येत सप्ताहात्स जहात्यसून् ॥ उष्यते नृष्यते पित्ताद् धूप्यते परिदह्यते । अङ्गारैरिव जह्यात् स प्राणानागु चतुर्दिनात् । कफादन्तर्बहिः शोथ: श्वासः कण्ठश्च बाध्यते ॥ यस्य सोऽस्त्यजेद्रोगी व्यहाद्रोहिणिपीडितः । लक्षणं पित्तरोहिण्या तुल्यं शोणितजन्मनः । सर्वदोषकृता या तु सर्वलिङ्गसमन्विता । असाध्यां तां विजानीयाद्रोहिणीं सन्निपातजाम् ॥ एषा सद्यो मारयति तिस्र आद्याः क्रियां विना । ' आधुनिक दृष्टि से इसे डिप्थेरिया ( Diptheria ) कहा जा रहा है । इसका B. Diptheria नामक दण्डाणु कारण होता है । इस दण्डाणु के उपसर्ग ( Infection ) से गले में झिल्ली पड़ जाती है जो स्वरयंत्र और नासिका में फैल कर श्वासावरोध उत्पन्न करती है । यह रोग बच्चों में अधिक होता है तथा ' Infectious होता है । यह बड़ा ही बातक रोग है । यदि समय पर चिकित्सा न की जाय तो इसमें श्वासावरोध ( Asphyxia ) या हृदयावसाद ( Cardiac failure ) से मृत्यु हो जाती है । १. ' क्षिप्रमनुक्रान्तः शीघ्रं चिकित्सित इत्यर्थः ' चक्रः ।