चरक संहिता हिन्दी भाष्य — पृष्ठ 61–70
चरक संहिता हिन्दी भाष्य · Chaukhamba · पृष्ठ 61–70
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( १७ ) प्रश्न: खेहपान से पहले क्या हिला-हित है? ( कि पानात्प्रथमं हिताहि-तम् उत्तर पान का समय ( १८-१९ ) प्रश्न संपान के बाद तथा उसके जीर्ण ( पाचन ) होने पर क्या करना चाहिये १ ( पीते जी किंच हिताहितम् ), उत्तर ( १२ ) २७१ २७२ ( २०-२१ ) प्रश्न: मदुऔरक्रूर्कोष्ठ कौन? २७३ मृदुकोष्ठ का लक्षण क्रूरकोष्ठ का लक्षण ( के मृदुक्रूरकोष्ठाः ), उत्तर मृदुकोष्ठ में दोष की प्रधानता ( २२ ) प्रश्न अविधिपूर्वक स्नेह सेवन से उपद्रव ( का व्यापदः ), स्नेह के अजीर्ण तथा तृष्णा में चिकित्सा सामपित्त में अच्छ - सर्पि का निषेध स्नेह - व्यापद् ( उपद्रव ) की गणना [ Complications in Oleation Therapy ] ( २३ ) प्रश्न: अविधि - स्नेह - सेवन से उत्पन्न उपद्रवों ( व्यापद ) की चिकित्सा ( सिद्धय का ), उत्तर 39 स्नेह सेवन से उपद्रव होने में हेतु ( २४ ) प्रश्न संशोधन के लिये खंड पोने में आचार ( अच्छे संशोधने चैत्र नेहे का वृत्तिरिष्यते, उत्तर 29 27 २७४ २७५ २७६ स्नेहनार्थं कुछ द्रव्यों का विशिष्ट रोगों में निषेध २७८ कुष्ठादि रोगों में स्नेहन विधि विचारणा - विधि विचारण - विधि विचारणा - विधि शीघ्र स्नेहन तथा अनिस्नेहन के दोष के बारे में उपमा सलवण स्नेह का गुण पूर्व कर्म ( स्नेहन - स्वेदन ) तथा संशोधन कर्म का आपसी क्रम अध्यायगत विषयों का उपसंहार स्वेदाध्याय १४ ( १ ) स्वेदन ( Sudation ) सम्बन्धी सामान्य चर्चा स्वेदन से लाभ " २७ ९ 99 " " २८० " २८१ इन किया के बाद स्वेदन करने से लाभ,, स्वेदन की प्रशंसा में उपमा 29 सफल स्वेदन के आधार स्वेद के तीन भेद ( महान्, मध्यम तथा दुर्बल ) स्वेद के दो भेद ( निग्ध तथा रूक्ष ) आमाशय तथा पक्वाशयगत दोषों में स्वेद-विधि २८२ 27 39 कृपणादि स्थान पर स्वेद मात्रा २८३ नेत्र की स्वेदन विभि हृदय को स्वेदन विधि वमन के लिये स्नेह प्रयोग करने पर आचार २७७ संशमन ने पीने में आचार ( २५ ) प्रश्न: विचारणा के योग्य पुरुष ( विचारणाः केषु योज्या विधिना केन तत् प्रभो ) उत्तर विचारणा की विधि स्नेहनार्थ रमों में मिलाने योग्य द्रव्य खंडन विधि रूक्ष पुरुषों का स्नेहन वातप्रधान पुरुषों का स्नेहन सम्पर्क स्वेदन का लक्षण • स्वेदन के अतियोग का लक्षण स्वेद के अतियोग में चिकित्सा स्वेद के अयोग्य रोगी तथा रोग 99 स्वेद के योग्य रोग तथा रोगी " पिण्ड स्वेद के द्रव्य 29 प्रस्तर स्वेद के द्रव्य २७८ स्वेदन के लिये विविध स्थान 31 " २८४ " २८५ २८६ २८८ २८ ९ " नाडीस्वेद के द्रव्य " अवगाह स्वेद के द्रभ्य सद्य: ( शीघ्र ) स्नेहन विधि 27 उपनाह स्वेद के द्रव्य 99 पाञ्चप्रसृतिक पेया 29 उपनाह स्वेद विभि 23
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२ तेरह अनि स्वेदन विधि Sudation ) ( Thirteen Method of Thermal अनि स्वेद के १३ भेद ( १ ) संकरस्वेद की विधि [ MixedFomentation ] ( २ ) प्रस्तरस्वेद की विधि [ Hot Bed Sudation ] ( ३ ) नाडीस्वेदन की विधि [ Steam Kettle Sudation ] ( ४ ) परिषेक स्वेद की विधि [ Affusion Sudatoin ] ( ५ ) अवगाहस्वेद की विधि [ BathSudation ] ( १३ ) २ ९ ० 29 " २ ९ १ 22 सम्भारद्रव्य के इकट्ठा करने में हेतु सम्भारद्रव्यों की आवश्यकता के बारे में अग्निवेश की शङ्का उपयुक्त शङ्का पर भगवान् आत्रेय का वैज्ञानिक उत्तर विविध सम्भारों की संक्षेप में गणना विस्तार से विविध संभारों की गणना ( २ ) संशोधन ( वमन विरेचन कर्म ) की प्रक्रिया ( Purifactory Measures ) पूर्वकर्म विधान ( स्नेहन - स्वेदन ) वमनकर्म ( मदनफल- कपाय से ) मदनफल के कषाय की मात्रा मनकर्म की मुख्य विधि २ ९ २ ( क ) वमन कर्म ( Emesis ) २ ९ ३ ( ६ ) जेन्ताकद की विधि [ Sudatorium Sudation ] २ ९ ४ ( ७ ) अश्मघनस्वेद की विधि [ StoneBed Sudation ] २ ९ ६ ( ८ ) कर्पूस्वेद की विधि [ TrenchSudation ] ( ९ ) कुटीस्वेद की विधि [ Cabin Sudation ] ( १० ) भूस्वेद की विधि [ Ground - Bed Sudation ] ( ११ ) कुम्भीस्वेद की विधि [ PitcherBed Sudation ] ( १२ ) कूपस्वेद की विधि [ Pit Sudation ] ( १३ ) होलाकस्वेद की विधि [ Under Bed Sudation ] ३ दश निरग्नि ( अग्निरहित ) स्वेदन ( Ten Non - Thermal Sudation ) दश निरग्नि स्वेद 29 २ ९ ७ " २ ९ ८ २ ९९ 19 वमन कर्म के अयोग, योग तथा अतियोग के लक्षण वमन के अयोग का लक्षण वमन के योग ( सम्यक् ) का लक्षण वमन के अतियोग का लक्षण ३०२ 23 ३०३ ३०५ ३०६ ३०७ 22 ३०८ ३० ९ " ३११ " ३१२ वमन कर्म के अतियोग तथा अयोग से उपद्रव " वमन कर्म के बाद धूमपान वमन के बाद रोगी को आदेश ( ख ) संसर्जन क्रम ( Post - Panch Karma Dietetic Regimen वमन के बाद द्वादशकाल का संसर्जन क्रम ( पथ्यविधि ) ( ग ) विरेचन कर्म ( Purgation ) विरेचनकर्म विधि उपर्युक्त विधि राजाओं के लिये दरिद्रों के लिये पञ्चकर्म विधि अध्यायगत विषयों का उपसंहार ४ उपसंहार ३०० संशोधन से लाभ स्वेद के तीन द्वन्द्व ( युग्म ) स्वेदन में निषेध अध्यायगत विषयों का उपसंहार उपकल्पनीयाध्याय १५ ( १ ) सम्भारद्रव्य ( सामग्री ) की उप-कल्पना ( तैयारी ) ( Collectiou of Equipments ) II " " ३०१ चिकित्साप्राभृतीयाध्याय १६ ( १ ) चिकित्सा - प्राभृत की महत्ता ( Importance of the Fully Equipped Physician ) • चिकित्साप्राभृत - चिकित्सक से लाभ ३०२ | वैद्यमानी ( मूर्खवैद्य ) से हानि " ३१३ " " ३१५ " " ३१७ : 9 " ३१८ ३१ ९ 27 "
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( २ ) संशोधन कर्म - विमर्श ( Views on Purifactory Measures ) सम्यग्विरिक्त पुरुष के लक्षण अविरिक्त के लक्षण ( १४ ) शिरको परिभाषा ३२० शिरोरोग के उदाहरण पाँच प्रकार के शिरोरोग " " 23 विरेचन के अतियोग का लक्षग " " " " 99 वमन के अतियोग का लक्षण चिकित्साप्राभृत चिकित्सक से लाभ संशोधन योग्य या अधिक दोष से युक्त पुरुष का लक्षण संशोधन का फल संशोधन चिकित्सा की ता संशोधन की में उपमा ३२१ " " 27 ३२२ संशोधन से उत्पन्न लंघन में इंद्रण पथ्य संशोधन के अतियोग की चिकित्सा संशोधन का अयोग होने पर चिकित्सा २२३ हनादि कर्म में उपद्रवों को चिकित्सा ( ३ ) स्वभावोपरम ( स्वभाव उपरम ) वाद ( Theory of Natural Destruction ) स्वभावीपरमवाद स्वभावोपरमवाद का दार्शनिक आधार स्वभावोपरमवाद के विषय में अधिवेश को शङ्का स्वभावोपरमवाद के विषय में आत्रेय का उत्तर चिकित्सा की परिभाषा और वैद्यों का कर्तव्य चिकित्सा का उद्देश्य ( १ ) वातजन्य ( वातिक ) शिरोरोग का कारण ( निदान ) वानज ( वातिक ) शिरोरोग का लक्षण ( २ ) पित्तजन्य ( पैत्तिक ) शिरोरोग का कारण ( निदान ) पित्तजन्य ( तिक ) शिरोरोग का क्षण ( ३ ) कफजन्य ( सैमिक ) शिरोरोग का कारण ( निदान ) कफजन्य ( मिक ) शिरोरोग का लक्षण ( ४ ) सनिपातज शिरोरोग का लक्षण ( ५ ) किमिजन्यशिरःशूल का कारण ( निदान ) क्रिमिज शिरःशूल के लक्षण ३३२ 29 ३३३ २३४ " " " ३३५ 27 ( २ ) हृद्रोग ( Cardiac Diseases ) ३३६ ( १ ) वातजन्य हृदय रोग के कारण " " वातजन्य हृदय रोग के लक्षण " " ( २ ) पित्तज हृदय रोग का कारण ३२५ पित्त हृदय रोग का लक्षण ३२६ ३२८ " " धातुसाम्य प्राप्ति का सावन " " चिकित्साप्रामृत से लाभ ३२ ९ अध्यायगत विषयों का उपसंहार कियन्तः शिरसीयाध्याय १७ अग्निवेश के प्रश्न आत्रेय का उत्तर संक्षेप में सम्पूर्ण उत्तर ( १ ) शिरोरोग ( Diseases of the Head ) शरोरोग का निदान और सम्प्राप्ति 93 ३३० " 39 ३३१ ( ३ ) कफजन्य हृदय - रोग के कारण कफजन्य हृदय रोग का लक्षण ( 3 ) त्रिदोषज हृदय रोग के कारण और लक्षण ( ५ ) क्रिमिजन्य हृदय रोग के कारण और सम्प्राप्ति -कृमिजन्य हृदयरोग का लक्षण ( ३ ) दोषों के मान के अनुसार ६२ व्याधियाँ ( Sixty - two Permatations and Combinations of Doshas ) ३३ ९ १३ प्रकार के सन्निपात इन्द्र दोषों के ९ भेद तथा पृथक दोषों के भेद क्षीण दोषों के २५ भेद 39 23 72 ३३७ 33 ३४० 22 विशेष में युगपत् वृद्धि तथा क्षय से १२ भेद ३४२ ( १ ) एक साथ दोपों के सम, क्षीण और होने वाले कपों के लक्षण ३४३
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( २ ) जब कफ सम, पित्त क्षीण औरवायु अधिक बलवान रहती है तब लक्षण ( ३ ) अब क्षीण कफ और सम वायु और पित्त अधिक होता है तब लक्षण ( ४ ) अ फसम, यातक्षीण और पित्त अधिक रहता है तब लक्षण ( ५ ) जब पित्त क्षीण, वायु सम और कफ बढ़ा हुआ रहता है तब लक्षण ( ६ ) जब वायु क्षीण, पित्त सम और कफ अधिक रहता है तब लक्षण " ( १ ) जब पित्त और कफ बढ़े हुए हों और वायु क्षीण हो तत्र लक्षण ( २ ) जब कफ और वायु वृद्ध होते हैं और पती होता है तब लक्षण ( १५ ) ३४३ ३४४ 19 ( १२, १४, १५, १६, १७ ) नाक, कान, नेत्र, मुख तथा लोमकूप के मलों ( पञ्चेन्द्रियाधिष्ठान मल ) की क्षीणता के लक्षण ( १८ ) ओजः क्षय के लक्षण ओज का लक्षण ओज की उत्पत्ति शरीर में कैसे होती है? ओज की उत्पत्ति में उदाहरण 29 क्षयों के सामान्य कारण ( ५ ) सप्त पिढका वर्णन ( Seven Inflammatory Swellings ) मधुमेह - विषयक निदान और सम्प्राप्ति प्रमेह - पिडकाओं की उत्पत्ति ३४५ ( १ ) शराविका का लक्षण ( ३ ) जब बात और पित्त ये दोनों वृद्ध रहते है और कफ क्षीण होता है तब लक्षण " ( १ ) अब बात और पित्त क्षीण रहते हैं " और कफ बढ़ा हुआ होता है तब लक्षण " ( २ ) जब बात और कफ का क्षय होता है और पित्त बढ़ा हुआ होता है तब लक्षण ३४६ ( ३ ) पित्त और कफ के क्षय होने पर और वायु के बढ़ जाने पर बढ़ी हुई वायु जब शरीर में चलती है तब लक्षण दोषों के वृद्धि - क्षयापक सूत्र ( ४ ) अठारह प्रकार के क्षय ( Eighteen Type of Kshaya ) १८ प्रकार के क्षय " " " ३४७ ( २ ) कपिका का लक्षण ( ३ ) जालिनी का लक्षण ( ४ ) सपी का लक्षण ( ५ ) अलजी का लक्षण ( ६ ) विनता के लक्षण ( ७ ) विद्रधिपिका के मेद्र ( क ) वा विद्रधि के लक्षण ( ख ) अन्तविधि के कारण, सम्प्राप्ति और स्थान विद्रधि की निरुक्ति वातजन्य और पिजन्य अन्तविधि के लक्षण कफज अन्तविद्रधि के लक्षण सब विद्रधियों का ( पच्यमान ) लक्षण स्राव के अनुसार विद्रधियों में दोष की कल्पना अन्तर्विद्रधियों का सापेक्ष निदान अन्तर्विद्रधियों के स्रवों का मार्ग ३४ ९ ३५० ३५१ 19 ३५२ ३५३ " ३५५ ३५६ 99 " ३५७ " " ३५८ " " " ३५ ९ " " " " ३६१ ३६२ " " " ( १-३ ) वातादि दोष के क्षय के लक्षण " ( ४ ) रसक्षय के लक्षण ( ५ ) रक्तक्षय के लक्षण ३४८ ( ६ ) मांसक्षय के लक्षण विद्रधियों में मृत्यु का कारण 33 ( ७ ) मेदःक्षय के लक्षण प्रमेहेतर पिडकायें ( ८ ) अस्थिक्षय के लक्षण पिडका की साध्यासाध्यता " " " ( ९ ) मज्जा क्षय के लक्षण स्थान के अनुसार पिडकाओं की असा-" ( १० ) शुक्रक्षय के लक्षण ( ११ ) पुरीषक्षण के लक्षण ( १२ ) मूत्रक्षय के लक्षण ३४ ९ ध्यता अन्य पिडकार्ये ३६३ " " 99 पिडकाओं के उपद्रव [ Complications ] " "
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( ६ ) दोषों की त्रिविध गति ( Three Pathways of Doshas ) दोषों की गतियों ऋतु के अनुसार दोषों की गति दोषों की दो अन्य गतियाँ ( प्राकृती तथा वैकृती ) पित्त की प्राकृती और बनियों 39 igs ) ( १ ) उपजिड़िया ३६४ | ( २ ) गलझुण्डी ( १६ ) ( २ ) एकदेशीय शोथ ( Local Swelli-३६३ ३७७ " ३७८ ( ३ ) गलगण्ड 33 २६६ ( ४ ) " " ( ५ ) विसर्प 19 का वर्णन कफ की प्राकनी और बेटी गतियों का वर्णन ( ६ ) पिडका ३७ ९ ( ७, ८, ९, १० ) तिलक, पिप्लु, व्यङ्ग, नीलिका " बात की प्राकृती और वैकृती गतियों का वर्णन ३६७ । ( ११ ) शंखक " उपसंहार अध्यायगत विषयों का उपसंहार ( १२ ) कर्णमूलकशी व 27 " ( १३ ) प्लीहा वृद्धि ३८० " ( १४ ) गुल्म " " त्रिशोथीयाध्याय १८ ( १ ) निज - आगन्तुज शोध ( Badog. enous & Exogenous Oedemas ) ३६७ शो के भेद आगन्तुक शोध के कारण [ Aetiology of Exogenous oedemas ] आगन्तुक शोध की सम्प्राप्ति और उपशय निज ( वातादि दोषज ) शोध के कारण [ Aetiology of Endogenous Oedema ] ( १ ) वातिक - शोथ के निदान, सम्प्राप्ति और लक्षण ( २ ) दैतिकशोध के निदान, सम्प्राप्ति और लक्षण ( ३ ) कफज शोथ के निदान, सम्प्राप्ति और लक्षण ( १५ ) वृद्धि रोग ( १६ ) उदर रोग ( १७ ) आनाह " ( १८ ) उत् २६८ 19 ( १ ९ ) रोहिणी ( ३ ) साध्यासाध्यता तथा विकार नाम समस्या ( Problem of Prognosis & Diagnosis ) साध्यासाध्यता ३६ ९ | असंख्य व्याधियाँ सब रोगों का विकार नाम ( निदान ) कठिन ३७२ दोष ही ज्ञातव्य ( १ ) प्राकृत ( अविकारज ) वात का कार्य " ३७३ ( २ ) प्राकृत ( अविकारज ) पित्त का कार्य " " ( ४, ५, ६, ७ ) इन्द्रज तथा सान्निपानिक शोध के निदान, सम्प्राप्ति और लक्षण शोध के विभिन्न वर्गीकरण वातिक शोध के लक्षण पैत्तिक शोध के लक्षण इलैष्मिक शोध के लक्षण द्वन्द्वज तथा सान्निपातिक शोथ स्थान के अनुसार शोय की साध्यासाध्यता " शोध का उपद्रव " " " " ३७४ " " " " 97 ३८१ " " ३८२ " " ३८३ 39 ३८४ ( ३ ) प्राकृत ( अविकारज ) कफ का कार्य ३८५ क्षीण दोषों के संक्षेप में लक्षण दोषों की वृद्धि के लक्षण अध्यायगत विषयों का उपसंहार अष्टोदरीयाध्याय १६ ३७५ सामान्यज विकार ( General " " ( Diseases ) ३७६ ४८ रोगों के भेद ३८६ ३८७ " ( १ ) ८ भेद वाले ४ रोग 23 ३७७ ( २ ) सात भेद वाले रोग ३८८ ३
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( ३ ) ६ भेद वाले २ रोग ( ४ ) पाँचवा १२ रोग ( ५ ) चार भेद वाले १० रोग ( ६ ) तोन भेद वाले३रोग ( ७ ) दो मेद्र वाले ८ रोग ( ८ ) एक भेद वाले ३ रोग ( ९ ) बोस मेद वाले ३ रोग त्रिदोष ( वात - पित्त कफ ) ही सब रोगों के आधार निज और आगन्तुज रोग निज और आगन्तुक का परस्पर सम्बन्ध अध्यायगत विषयों का उपसंहार महारोगाध्यायः २० ( 1 ) सामान्य रोगभेद - विमर्श रोगों के विविध प्रकार से मेद्र आगन्तुक रोग के कारण आगन्तुक और निज रोगों के कारण ( बाहरी हेतु ) विभिन्न भेदों का आपसी सम्बन्ध ( १७ ) ३८८ अष्टौनिन्दतीयोऽध्यायः २१ ३८ ९ ( १ ) निन्दनीय पुरुष ( Undesirable " " ३ ९ ० " ३ ९ १ 99 or Censurable Persons ) आठ निन्दनीय शरीर - ( २ ) अतिस्थूल तथा अतिकृश पुरुष ४०८ " " ( Obese & Emaciated Persons ) ४० ९ अतिकृश और अतिस्थूल पुरुषों के निन्दित होने में विशेष कारण " " ३ ९ २ | मेस्त्री ( अतिस्थूल ) पुरुष के दोष, कारण ३ ९ ३ और स्वरूप अतिकृश होने के कारण 17 ३ ९ ४ अतिकृश से होनेवाले रोग अतिकृश की परिभाषा २ ९ ४ चिकित्सा - सिद्धान्त स्थौल्य तथा कार्य में कौन अच्छा? ३ ९ ५ स्वस्थ पुरुष " " " आगन्तुज तथा निज रोगों की परिभाषा ३ ९ ६ त्रिदोष ( वात - पित्त - कफ ) का शरीर में अधिप्रान दोष हो रोग तथा आरोग्य के कारण ( २ ) नानात्मज विकार ( Specific Diseases of Doshas ) रोग के सामान्यज तथा नानात्मज भेद ( १ ) बात के ८० नानात्मज विकार ४११ " 3 ४१२ 39 " " ४१३ 99 स्थौल्य तथा कार्य के चिकित्सा - सिद्धान्त ४१४ अतिस्थूलता ( मेदोरोग ) की चिकित्सा अनिस्थूल के लिए पथ्य अतिस्थूलता में बिहार अतिकृशता ( कार्य ) की चिकित्सा " ( ३ ) निद्रा ( Sleep: विमर्श ३ ९ ८ | निद्रा का कार्य - चिकित्सा में महत्त्व निद्रा को परिभाषा ३ ९९ निद्रा से लाभ और अनिद्रा से हानि उचित निद्रा से लाभ ४०० दिन में शयन करने के योग्य पुरुष ४०१ निद्रा से लाभ ग्रीष्म ऋतु में दिन में शयन अन्य ऋतु में दिन में शयन से हानि सर्व दिवाशय के अयोग्य पुरुष ४१५ 99 " " ४१६ 29 99 ४१८ " " ४१ ९ " असमय काल में दिन में शयन से हानियाँ ४२० वायु के रूप तथा कर्म वात दोष की चिकित्सा ४०२ ( २ ) पित्त के ४० नानात्मज विकार ४०३ पित्तदोर के रूप तथा कर्म ४०४ पित्त दोष को चिकित्सा 39 ( ३ ) इलेमा के २० नानात्मज रोग ४०५ जागरण तथा निद्रा के गुग श्लेष्मा के रूप तथा कर्म 99 निद्रा का महत्त्व कुपित कफ को चिकित्सा " रोग परीक्षा प्रथम कर्त्तव्य ४०६ अनिनिद्रा की चिकित्सा यदृच्छया सिद्धि निद्रानाश के कारण " " निश्चित सफलता उपसंहार ४०७ निद्रा के भेद " " " निद्रानाश ( Insomnia ) की चिकित्सा ४२१ अध्यायगत विषयों का उपसंहार " 99 ४२२ ४२३ ( ख )
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लङ्घनबृंहणीयोऽध्यायः २२ ( १८ ) संतर्पणजन्य रोगों की सामान्य चिकित्सा ४१० ४२४ त्रिफलादि काथ मुस्तादि क्वाथ कुदिचूर्ण छः प्रकार की चिकित्सा अनिवेश के प्रश्न आत्रेय के उत्तर ( १ ) संपन के द्रव्य ४२५ ( २ ) बृंहण के द्रव्य ( ३ ) रूक्षण के द्रव्य ( ४ ) लंदन के द्रव्य ( ५ ) स्वेदन के द्रव्य ( ६ ) स्तम्भन के द्रव्य लङ्घन के दश प्रकार शोधन से लड़नीय पुरुष पाचन के द्वारा लङ्घनीय पुरुष उपर्युक्त में विशेषता शेष उपायों से लंघनीय पुरुष लंघन का काल ( ऋतु ) " " प्रमेह किसा यूषणादिमन्ध ४२६ संतर्पणजन्य रोगों में आहार एवं बिहार " ( २ ) अपतर्पण करण ४२७ अपतर्पण से होने वाले रोग संतर्पण के दो भेद ४२८ चरण रोनियों को चिकित्सा ४२ ९ विधिशोणितीयोऽध्यायः २४ 19 अध्यागन विषयों का उपसंहार ( १ ) रक्त तथा रक्त - रोग विमर्श ४३० शुद्ध रक्त की प्रक्रिया 39 रक्त ही प्राण का आवार 29 रतदुष्टि के निदान ४३१ रक्तज रोग " " " " ४३८ " " 3 93 ४३ ९ 17 " ४४० " " ४४१ ४४२ बृंहण द्रव्य बृंहण के योग्य पुरुष मांसरस द्वारा वृंण करने योग्य पुरुष सभी व्यक्तियों के लिये बृंहण द्रव्य रूक्षण द्रव्य रूक्षण करने योग्य रोग खंद और खंडन करने योग्य व्यक्ति, स्वेद और स्वेदन करने योग्य पुरुष का वर्णन,, स्तम्भन स्तम्भनीय पुरुष सम्यक् लंघन के लक्षण अतिलंघन के लक्षण कचित बृंहण के लक्षण रूक्षण तथा स्तम्भन कर्म के लक्षण स्तम्भन के अतियोग का लक्षण सामान्य रूप से अयोग के लक्षण पविध चिकित्सा उपसंहार अध्यायगत विषयों का उपसंदार संतर्पणीयोऽध्यायः २३ ( १ ) सन्तर्पण - प्रकरण संतर्पण से होने वाले रोगों के कारण संतर्पणजन्य रोग " अनुपशय के द्वारा रक्तज रोगों का निर्णय " रक्तज रोगों की चिकित्सा 29 रक्तमोक्षण में रक्त निकालने का प्रमाण वातादि दोष से दुष्ट रक्त के शुद्ध रक्त का लक्षण रक्तमोक्षण के बाद पथ्य शुद्ध रक्त वाले व्यक्तियों के लक्षण ४३२ | ( २ ) मद - मू - संन्यास प्रकरण ४४३ ४४४ ४४५ ४४६ ४४७ ४४८ ४४ ९ मद, मूच्छी और संन्यास रोग की सम्प्राप्ति. ( क ) मदरोग " मद रोग की सम्प्राप्ति " ४३१ " 99 ( १ ) वातिक मद के लक्षण ४५० ,, ( २ ) पैत्तिक मद के लक्षण ( ३ ) कि मद के लक्षण ०३६ " " " ( ४ ) सन्निपात मंद का स्वरूप अन्य मद ( ख ) मूर्च्छा रोग ( १ ) वातज मूर्च्छा के लक्षण ४१७ | ( २ ) पिरान मू के लक्षण 29 29 ४५१ 29
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( ३ ) कफज मूर्च्छा के लक्षण ( ४ ) सन्निपानज मूर्च्छा के लक्षण ( ग ) संन्यास रोग मद तथा मूर्च्छा से संन्यास की विशेषता संन्यास की सम्प्राप्ति संन्यास रोग की चिकित्सा में दृष्टान्त संन्यास रोग में आशुलाभकारी उपाय मद और मूर्च्छा में पञ्चकर्म चिकित्सा अध्यायगत विषयों का उपसंहार यज्जः पुरुषीयोऽध्यायः २५ ( १ ) राशिपुरुषोत्पत्ति तथा रोगोत्पत्ति-विषयक सम्भाषा परिषद् ( Symposium on Origin of man & Disease ) ४५७ सम्भाषापरिषद् का उद्देश्य काशीपनि वामक का प्रस्ताव ( १ ) मौल्य पारीक्षि का पक्ष ( २ ) शरलोमा का पक्ष ( ३ ) वायविंद का पक्ष ( ४ ) हिरण्याक्ष का पक्ष ( ५ ) कौशिक का पक्ष ( ६ ) भद्रकाप्य का पक्ष ( ७ ) भरद्वाज का पक्ष ( ८ ) काङ्कायन का पक्ष ( ९ ) भिक्षु आत्रेय का पक्ष ( १६ ) ४५२ प्रधान उदाहरण ४६६ " ४५३ प्रकृति ( स्वभाव ) से ही हितकर आहार अहितकर आहार के उदाहरण " ४६७ 29 ४७७ ४७८ 77 प्रधान औषध द्रव्यों के हित तथा अतिकर कर्म के उदाहरण ४६ ९ ४५४ हिताहित आहार का उपसंहार 29 पथ्य तथा अपथ्य के लक्षण ४५५ | ( ३ ) ८४ आसवों का वर्णन ( Eighty-४५६ " ४५८ ४५ ९ 22 ४६० Four Fermentative Produ ets ) निवेश का आसव - विषयक प्रश्न नय आसव योनियाँ ४७ ९ " चौरासी ( ८४ ) आसदों के उदाहरण ४८० ४८१ आसव की संज्ञा का आधार आसव के गुण अध्यादपियों का उपसंहार आत्रेयभद्रकाप्यीयोऽध्यायः २६ ( १ ) रस- संख्याविषयक सम्भाषा-परिषद् ( Symposium on Number of Rasas ) III सम्भाषा परिषद् के वक्ता 97 रस तथा आहार - विचारार्थ विषय ४६१ ( १ ) भद्रकाप्य का एक रस पक्ष " 39 ( २ ) शाकुन्तेय ब्राह्मण का दो रस पक्ष ( ३ ) मौद्गल्य पूर्णाक्ष का तीन रस पक्ष 29 " " 29 विभिन्न पक्षों के ऐकान्तिक दुराग्रह की निन्दा पुनर्वसु आत्रेय का समन्वयात्मक कत ४६३ ( २ ) पुरुष तथा रोग की वृद्धि में हेतु ( Factors Responsible for the 29 ४८३ ( ४ ) कौशिक हिरण्याक्ष का चार रस पक्ष 99 ४६२ | ( ५ ) कुमारशिरा भरद्वाज का पाँच रस पक्ष " ( ६ ) यदि का छः रस पक्ष " Growth of Man and Diseases ) 29, काशीपति वामक का दूसरा प्रस्ताव 99 पुनर्वसु आत्रेय का उत्तर अग्निवेश का दिसाहिन आहार के लक्षण के बारे में प्रश्न पुनर्वसु आत्रेय का उत्तर अभिवेश का दूसरा प्रश्न पुनर्वसु आत्रेय का उत्तर ४६४ ( ७ ) विदेहराज निमि का सात रस पक्ष ( ८ ) भामार्गव का आठ रस पक्ष ( ९ ) नाहीवदेशी काड्रायन का असंख्येय रस पक्ष ( १० ) पुनर्वसु आत्रेय द्वारा पदरस सिद्धान्त का समर्थन तथा अन्य सिद्धान्तों का खण्डन एकरस पक्ष का खण्डन दो रस तथा तीन रसपक्ष का खण्डन चार रस पक्ष का खण्डन " " आहार के विभिन्न दृष्टि से द ४६५ पांच रस पक्ष का खण्डन " " ४८४ 29 " " 23 ४८५
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छ रस पक्ष का खण्डन ( २० ) ४८६ | रसों के पाचभौतिक संगठन सात रस पक्ष का खण्डन ( क्षार रस ) " " आठ रस पक्ष का खण्डन ( अव्यक्त रस ) ४८७ अपरिसंख्येय रस पक्ष का खण्डन ४८८ ( १ ) द्रव्य प्रकरण तथा रसानुसार उनके ६३ भेद ( Topic of Dravyas and Their Sixty Three Varieties According to Rasas ) ४८ ९ द्रव्य - विमर्श " " ( ४ ) वायव्य द्रव्य के लक्षण ४ ९ २ ( १ ) पार्थिव द्रव्य के लक्षण ४ ९ ० ( २ ) जलीय द्रव्य के लक्षण " " ( ३ ) तैजस द्रव्य के लक्षण " " " " ( ५ ) आकाशीय द्रव्य के लक्षण " " सभी द्रव्य पाजभौतिक द्रव्यों की कार्यप्रणाली द्रव्यों के रसानुसार ६२ द दो रसों के १५ संयोग तीन रसों के बीस संयोग चार रसों के २५ संयोग पाँच रसों के ६ संयोग उपसंहार रस तथा दोष के ज्ञान का महत्त्व रस और अनुरस के लक्षण ( ३ ) गुण प्रकरण ( Tople of Guna ) परादि गुण की संख्या परत्वापरत्व तथा युक्ति के लक्षण संख्या तथा योग के लक्षण विभाग तथा पृथक्त्व के लक्षण परिमाण, संस्कार तथा अभ्यास के लक्षण गुणविषयक उपसंहार गुण के आश्रय द्रव्य, रस नहीं प्रकरणानुसार अभिप्राय ( ४ ) पडू रस - प्रकरण ( कर्म ) ( Topic of Six Rasas and Their " ४ ९ ३ ४ ९ ४ " ४ ९ ५ " " ४ ९ ७ ४ ९ ८ 23 " ४ ९९ ५०० " पंचमहामौतिक संगठन और रसों की गति ( कार्य ) ५०३ प्रत्येक रस के गुण कर्म ( १ ) मधुर रस के गुण - कर्म मधुर रस के अधिक सेवन से दोष ( २ ) अम्लरस के गुण कर्म अम्ल रस के अधिक सेवन से दोष ( ३ ) लवण रस के गुण कर्म लवण रस के अधिक सेवन से दोष ( ४ ) कटु रम के गुण कर्म कटुरस के अधिक सेवन से दोष ( ५ ) तिक्त रस के गुण कर्म तिक्तरस के अधिक सेवन से दोष ( ६ ) कषाय रस के गुण कर्म कषाय रस के अधिक सेवन से दोष रस के कर्मो का उपसंहार द्रव्य के रस- विपाक तथा वीर्य का परस्पर सम्बन्ध अविरुद्ध वीर्य और विपाक वाले द्रव्यों के उदाहरण विरुद्ध वीर्य वाले द्रव्यों का निर्देश मधुरादिरसों में गुणविषयक न्यून, मध्य अधिकता का निर्देश ( ५ ) विपाक प्रकरण ( Topic of Vipaka ) विपाक लक्षण स्निग्ध तथा रूक्ष रस विपाक का अलग - अलग कार्य ५०२ ५०४ " " ५०५ 29 99 ५०६ ५०७ 99 " ५०८ " " " ५० ९ ५१० " " ५१२ ( ६ ) वीर्य प्रकरण ( Topic of Virya ) ५१३ वीर्य के भेद ५०१ वीर्य का लक्षण " ५०२ रस, विपाक तथा वीर्य के जानने के साधन, ” ( ७ ) प्रभाव प्रकरण ( Topic of Prabhava ) प्रभाव का लक्षण द्रव्यगत पदार्थों की कार्यप्रणाली | Mode Karmas ) [ घड़ - रसोत्पत्ति of Actions of Drugs ] 23 आकाशीय जल और रस विशेष वर्णन 29 ५१४ ५१५ ५१६
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( ८ ) पड़ रस विज्ञान ( लक्षण ) ( २१ ) ( Definition of Six Rasas ) ५१६ 29 ( १ ) मधुर रस की परिभाषा ( २ ) अम्ल रस की परिभाषा ( ३ ) लवण रस की परिभाषा 39 ( ४ ) वड रस की परिभाषा ( ५ ) तिक्त रस की परिभाषा ( ६ ) कषाय रस की परिभाषा ( ९ ) वैरोधिक आहार ( Dietetic Incompatibilities ) अधिवेश का वैरीनिक आहारविषयक प्रश्न वैरीधिक आहार की परिभाषा उदाहरण चिलत्रिम मछली विषयक भद्रकाप्य का विचार इस प्रकार भद्रकाप्य के वचनों को सुनकर भगवान् आत्रेय का उत्तर संयोगविरुद्ध द्रव्यों के उदाहरण ( १० ) वैरोधिक आहार के घटक ( Factors Responsible for " 99 ५१७ " " " ५१८ " " 39 ५१ ९ ( १७ ) संपद- विरुद्ध ( १८ ) विधिविरुद्ध सामान्यतः विरुद्ध अन्न के खाने से उत्पन्न होने वाले रोग विरुद्ध आहारजन्य रोगों की चिकित्सा अध्यायगत विषयों का उपसंहार अन्नपानविध्यध्यायः २७ ( क ) अपान विषयक सामान्य प्रकरण ( General Consideration Regarding Diets ) ५२५ अन्नपान की प्राण से तुलना हितकर तथा अहितकर आहार अन्नपानविषयक १२ वर्ग ( ख ) अन्नपान विषयक वर्गसंग्रह ( Classification of Diets ) १. शुकधान्य वर्ग ( Class of Corns or Mono - Cotledons ) वर्ग के सामान्य गुण शूकधान्य षष्टिकधान्यके गुण Dietetic Incompatibilities ) ५२१ ब्रीहिधान्य वैरोधिक आहार की परिभाषा वैरोधिक आहार के घटक ( १ ) देशविरुद्ध कोरदूष ( कोदो ), श्यामाक ( साँवा ) के गुण ५२३ " ५२४ " 23 ५२६ 99 ५२७ : 39 ५२८ 99 " " जीके गुण ५२ ९ 39 बांस से उत्पन्न जौ के गुण ( २ ) कालविरुद्ध 39 " ( ३ ) अग्निविरुद्ध गेहूँ के गुण " " ( ४ ) मात्राविरुद्ध " ( ५ ) साम्यविरुद्ध 99 ( ६ ) दोषविरुद्ध 99 ( ७ ) संस्कारविरुद्ध ५२२ २. शमीधान्य वर्ग ( Class of Pulses or Di - cotyledons ) गुण उड़द के गुण " ( ८ ) वीर्यविरुद्ध राजमाष के गुण " " ५३० " ( ९ ) कोशविरुद्ध कुल्थी के गुण " ( १० ) अवस्थाविरुद्ध ( ११ ) क्रमविरुद्ध " " कुष्ठ ( मोठ ) के गुण चना आदि के गुण " ( १२ ) परिहारविरुद्ध ( १३ ) उपचारविरुद्ध ( १४ ) पाकविरुद्ध ( १५ ) संयोगविरुद्ध ( १६ ) हृदयविरुद्ध तिल के गुण 33 " अनेक प्रकार के शिम्बीधान्यों के गुण 99 " शिम्बी धान्य के गुण ५२३ अरहर के गुण 99 39 ३. मांस वर्ग ( Class of Fleshes ) ५३१ "