चरक संहिता हिन्दी भाष्य — पृष्ठ 521–530

चरक संहिता हिन्दी भाष्य · Chaukhamba · पृष्ठ 521–530

पृष्ठ 521

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४३२ चरकसंहिता विमर्श - चक्रपाणि ने भूख - प्यास का असह्य रूप में उदय होना अर्थात् भूख - प्यास के वेग को न सह सकना यह समुचित रूप में हुये लंघन का लक्षण बताया है । अन्य टीकाकार एक साथ भूख, प्यास का लगना यह लक्षण बताये हैं । वाग्भट ने एक साथ भूख और प्यास का लगना बताया है यथा — ' विमलेन्द्रियता सर्गो मलानां लाघवं रुचिः । क्षुत्तृट्सहोदयः शुद्धहृदयोद्गार-कण्ठता || व्याधिमार्द्दवमुत्साहस्तन्द्रानाशश्च लङ्घिते ॥ ' ( अ ० सू ० अ ० १४ ) । यहाँ तृट् के आगे ' महोदय ' यह पढ़ा गया है । सुश्रुत ने इसके विपरीत कहा है यथा - ' सृष्टमारुतविण्मूत्रं क्षुत्पि-पासासहं लघुम् । प्रसन्नात्मेन्द्रियं क्षामं नरं विद्यात् सुलङ्घितम् ॥ ' ( सु ० उ ० अ ० ३ ९ ) । इस सुश्रुत के बचन से ' क्षुत्पिपासासहम् ' अर्थात् भूख - प्यास का असह्य रूप में लगना यह बताया गया है । इन आचार्यों के मत को देखते हुये भूख - प्यास का एक साथ इतने वेग से लगना कि जिसे रोगी सहन न कर सके, यह लंघन का लक्षण होना चाहिये । उपर्युक्त विचार शिवदाससेन-सम्मत है । * पर्वभेदोऽङ्गमर्दश्च कासः शोषो मुखस्य च । तुत्प्रणाशोऽरुचिस्तृष्णा दौर्बल्यं श्रोत्रनेत्रयोः ॥ मनसः संभ्रमोऽभीक्ष्णमूर्ध्ववातस्तमो हृदि । देहाग्निबलनाशश्च लङ्घनेऽतिकृते भवेत् ॥३७ ॥

अतिलंघन के लक्षण - यदि मात्रा से अधिक लंघन हो जाय तो गांठों में दर्द, अंगमर्द, कास, मुख, का सूखना, भूख का नाश, भोजन में अरुचि, प्यास की अधिकता, श्रोत्र और नेत्र में दुर्बलता, मन में भ्रम अर्थात् चित्त का स्थिर न होना, बार - बार ऊर्ध्व वात का होना, हृदय में

अंधकार का होना, देह और अग्नि के बल का नाश हो जाना । ये लक्षण होते हैं ॥ ३६-३७ ॥

विमर्श - लंघन मात्रा से ही कराया जाता है यदि वह वैद्य की उपेक्षा या अज्ञानता से अधिक मात्रा में हो जाय तो उपर्युक्त लक्षण उत्पन्न होते हैं । सुश्रुत ने लंघन के अधिक हो जाने पर अग्रांकित लक्षण बताया है, यथा- ' रसक्षयस्तृषाशोषतन्द्रानिद्राभ्रमकुमाः । उपद्रवाश्च श्वासाद्याः सम्भवन्त्य-तिलहनात् ॥ ' ( मु.उ. अ. ३ ९ ) तथा वृद्ध वाग्भट ने- ' अतिकार्यं भ्रमः कासस्तृष्णाधिक्यमरोचकः । स्नेहाग्निनिद्रादृक्श्रोत्रशुक्रौञः क्षुत्स्वरक्षयः ॥ वस्तिहृन्मूर्धजङ्घरु त्रिकपार्श्वरुजा ज्वरः । प्रलापोर्ध्वानि-लग्लानिच्छदिपर्वास्थिभेदनम् ॥ वर्चोमूत्रग्रहाद्याश्च जायन्तेऽतिविलङ्घनात् । ' ( अष्टा. सं. सू. अ. २४ ) । उपर्युक्त श्लोक में अतिलंघन के लक्षण के प्रकरण में जो ' ऊर्ध्ववात ' शब्द आया है उस पर शिवदास-सेन ने अपना विचार प्रस्तुत किया है । ऊर्ध्ववान से ऊर्ध्ववात ( Eructation ) नामक रोग न लेकर उन्होंने हिक्का, श्वास, कर्णस्वन, जृम्भा इत्यादि रोग लिया है । तर्क में उपस्थित किया है कि ऊर्ध्व बात तो कफ के अवरोध के कारण से होता है, यथा- ' अधः प्रतिहतो वायुः इलेष्मणा कुपितेन च । करोति नित्यमुङ्गारमूर्ध्ववानः स उच्यते ॥ ' ( आ. दर्पण ) और प्रकृत विषय लंघन में तो कफ का क्षय होता है । अनएव कफ निरोधजन्य ऊर्ध्ववात का यहाँ प्रश्न ही नहीं उठता है । निष्कर्ष यह है कि ऊर्ध्ववात से यहाँ श्वास, कास इत्यादि रोग लेना चाहिये तथा उसका अर्थ इस प्रकार करना चाहिये - ' ऊर्ध्वकाचे वात ऊर्ध्ववातः हिक्काश्वासकर्णस्वनजृम्भादयः । ' & बलं पुष्टयुपलम्भश्च कार्श्यदोषविवर्जनम् । लक्षणं बृंहिते, स्थौल्यमति चात्यर्थबृंहिते ॥३८ ॥

उचित बृंहण के लक्षण -- यदि बृंहण क्रिया मात्रा से की जाय तो शरीर में बल की वृद्धि और धातुओं की पुष्टि होती है और कृशता के दोष छूट जाते हैं । यदि बृंहण अधिक मात्रा में किया जाता है तो शरीर में स्थूलना उत्पन्न हो जाती है ॥ ३८ ॥

विमर्श - नात्पर्य यह है कि जब कृश, दुर्बल व्यक्तियों में बृंहण क्रिया का प्रयोग किया जाता है । १. ' कार्यदोषविवर्जन मिति कायें ये दोषाः शीतोष्णासहत्वादयः, तेषां वर्जनम् ' चक्रः ।

पृष्ठ 522

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लङ्घनबृंहणीयाध्यायः २२ ] सूत्रस्थानम् ४३३ तो शरीर में बल की वृद्धि, धातुओं की पुष्टि, कृशना तथा शरीर के कृश होने पर उसमें जो दोष उत्पन्न होते है उन सभी का नाश हो जाना, उचित बृंहण का लक्षण है । कृतातिकृत लिङ्गं यल्लङ्घिते तद्धि रूचिते । स्तम्भितः स्याइले लब्धे यथोक्तैश्वामयैजितैः ॥ रूक्षण तथा स्तम्भन कर्म के लक्षण - लंघन के कृत और अतिकृत में जो लक्षण उत्पन्न होते है वे सभी लक्षण रूक्षण क्रिया के उचित रूप से करने पर और अधिक मात्रा में करने पर होते हैं । स्तम्भन क्रिया का जिन रोगों में करने का विधान है यदि उन रोगों का क्षय हो जाय और शरीर में बल की प्राप्ति हो जाय तो स्तम्भन क्रिया उचित रूप में की गई है ऐसा समझना चाहिए ॥ ३ ९ ॥ श्यावता स्तब्धगात्वमुद्वेगो हनुसंग्रहः । हृद्वचनिग्रहश्च स्यादतिस्तम्भितलक्षणम् || ४० || स्तम्भन के अतियोग का लक्षण - स्तम्भन क्रिया यदि अधिक मात्रा में हो जाय तो शरीर में श्यावना, जकडाहट, मन में उद्वेग, हनुस्तम्भ, हृदय की गतियों में रुकावट, मल की रुकावट होना ये लक्षण होते हैं ॥ ४० ॥

लक्षणं चाकृतानां स्यात् षण्णामेषां समासतः ।

दौषधानां व्याधीनामशमो वृद्धिरेव च ॥ ४१ ॥

सामान्य रूप से अयोग के लक्षण - इन ऊपर बताये हुये लंघन, बृंहण, रूक्षण, स्नेहन, स्वेदन, स्तम्भन के अयोग के लक्षण संक्षेप में ये हैं - उन - उन लंघन आदि औषधों से साध्य रोगों की शान्ति न होना और उसकी वृद्धि हो जाना ॥ ४१ ॥

विमर्श - तात्पर्य यह हैं कि ऊपर बताये हुये लंघन आदि ६ क्रियाओं द्वारा रोगों की शान्ति की जाती है । यदि इन ६ क्रियाओं के प्रयोग करने पर इन रोगों की शान्ति न हो और उन रोगों की वृद्धि हो जाय तो यह समझना चाहिये कि ये क्रियायें उचित रूप में नहीं हुई हैं ।

इति पट् सर्वरोगाणां प्रोक्ताः सम्यगुपक्रमाः ।

साध्यानां साधने सिद्धा मात्राकालानुरोधिनः ॥ ४२ ॥

षड्विध चिकित्सा - इस प्रकार यह ६ लंघन आदि सभी रोगों की उचित चिकित्सा बताई गई है जिनका प्रयोग मात्रा तथा काल के अनुसार किया जाय तो साध्य रोगों की चिकित्सा में ये प्रयोग सिद्ध होते हैं ॥ ४२ ॥

भवति चात्र-दोषाणां बहुसंसर्गात् संकीर्यन्तेद्युपक्रमाः ।

घट्त्वं तु नातिवर्तन्ते त्रित्वं वातादयो यथा ॥ ४३ ॥

उपसंहार - दोषों के संसर्ग अनेक प्रकार के होते हैं इसलिये चिकित्सा भी मिश्रित रूप में अनेक होती है । पर वह चिकित्सा उन ६ क्रियाओं का अतिक्रमण नहीं करती है अर्थात् चिकित्सा के अनेक नेद होते हुये भी इन ६ के अन्दर ही सबका समावेश हो जाता है, जिस प्रकार कि वातादि दोघ के संसर्ग - विकल्प ६३ या नर, तम के भेद से असंख्य होते हैं फिर भी वे वात पित्त कफ इन तीन संख्या का अतिक्रमण नहीं कर पाते है ॥ ४३ ॥

१. ' कृताकृतस्य लिङ्गम् ' इति पा । २. ' तदौषधानां लङ्घनादिसाध्यानाम् ' चक्रः । ३. ' दोषाणां यस्मात् संसर्गा बहवस्तस्मात्तत्साधनार्थमुपक्रमा अपि संकीर्यन्ते मिश्रतां यान्ति; यथा - क्वचिल्लङ्घनस्वेदे, कचिद्वृंहणस्वेदने, एवमादि; षट्त्वं तु नातिवर्तन्त इति संसृष्टा अपि लङ्घना-दिस्वरूपं न जहनि, लङ्घनादयो मधुसर्पिःसंयोगवन्न प्रकृतिगुणानपेक्षिकार्यान्तरमारभन्त इति भावः ' चक्रः । २८ च ० सं ०

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४३४ चरकसंहिता Reducing ( Roborant ( रूक्षण Drying ( ) therapy ) therapy ) therapy है-रहा जा किया संग्रह एकत्र से दृष्टि की व्याधि तथा द्रव्य गुण ) का ( उपक्रम चिकित्सा वृंहण की प्रकार ६ वर्णित में लड़न अध्याय इस विमर्श -) स्तम्भन Astringent therapy ( स्नेहन Oleation ( ) therapy ) स्वेदन (Sadation therapy गुरु लघु १ २ गुण + + + 13 + + + शीत ३ " + + + उष्ण ४ 19 + + खिग्ध ५ " + + - -रूक्ष ६ " + + मन्द ७ + + तीक्ष्ण ८ + स्थिर ९ 11 + + + सर १० + + + + + + + + + + + मृदु कठिन ११ १२ " + + + 95 + + विशद १३ 93 + +

पृष्ठ 524

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11 + + + + लङ्घनबृंहणीयाध्यायः २२ ] + + " द्रव्य उदाहरणार्थं , , घृत , क्षीर मांस , , खली मधु , तक्र , + वसा , तेल , घृत ), १३ ( त्रयोदश , कषाय , तिक्त मधुर ,, लंघन विरेचन , दशविध वमन , रस , मधुर शर्करा - कपाय कटुतिक्त इत्यादि मज्जा , अग्निस्वेद शीतवीर्य , रस इत्यादि , निरूह्वस्ति , , स्नान स्नेहवस्ति अतिमैथुन , रस इत्यादि ), १० ( दशविध , शिरोविरेचन इत्यादि , निद्रा उबटन इत्यादि निरग्निस्वेद खर १६ सूक्ष्म १७ स्थूल १८ सान्द्र द्रव ९ ]१ २० 13 7" " , , उपवास पाचन , , व्यायाम पिपासा ), धूप ( आतप सूत्रस्थानम् व्याधियाँ प्रयोगार्थं , , ज्वर दोष प्रभूत , शोष , क्षत , क्षीण , , छर्दि अतिसार ) उदाहरणस्वरूप ( , , हलास , अरुचि छर्दि , , कृश , ग्रहणी इत्यादि अर्श दुर्बल , , विसूचिका अतिसार , मर्मस्थ , इत्यादि अभिष्यन्द ऊरुस्तम्भ व्याधि ,, हिक्का ,, पक्षबंध कास ,, अदित श्वास शूल -,, संशोधन वातव्याधि स्वेदयोग्य , स्वेदाति-अग्निदग्ध इत्यादि रोगी योग्य , विबन्ध , इत्यादि अलसक हृद्रोग , कोष्ठानाह इत्यादि , गृधसी मूत्रकृच्छ्र इत्यादि योग ) इत्यादि हवा ( मारुत । हैं जाते पाये में चिकित्सा लङ्घनादि उस गुण चिह्नित यह कि है द्योतक का तथ्य इस निशान यह + ४३५

पृष्ठ 525

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४३६ तत्र श्लोकः-चरकसंहिता इत्यस्मिल्लङ्घनाध्याये व्याख्याताः षडुपक्रमाः । यथाप्रभं भगवता चिकित्सा यैः प्रवर्तते । इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते सूत्रस्थाने योजनाचतुष्के लङ्घनबृंहणीयो नाम द्वाविंशतितमोऽध्यायः ॥ २२ ॥

अध्यायगत विषयों का उपसंहार - इस ' लङ्घनबृंहणीय ' अध्याय में आचार्य आत्रेय पुनर्वसु ने प्रश्नों के अनुसार उन छ उपक्रमों की व्याख्या की है जिनके द्वारा चिकित्सा की प्रवृत्ति होती है ॥ ४४ ॥

चरक के द्वारा प्रतिसंस्कृत अग्निवेशकृत तंत्र ( चरक संहिता ) के सूत्रस्थान में योजनाचतुष्क-विषयक लङ्घनबृहंणीय नामक बाइसवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ २२ ॥

अथ त्रयोविंशतितमोऽध्यायः अथातः संतर्पणीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥

इति ह स्माह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥

अब इन ६ उपक्रमों के बाद संतर्पणीय अध्याय की व्याख्या की जायगी जैसा कि भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥ १-२ ॥ संतर्पयति यः स्निग्धैर्मधुरैर्गुरुपिच्छिलैः । नवान्नैर्नवमद्यैश्च मांसैश्वानूपवारिजैः ॥ ३ ॥

गोरसैगौंडिकैश्चान्नैः पैष्टिकैश्वातिमात्रशः । चेष्टाद्वेषी दिवास्वप्नशय्यासनसुखे रतः ॥४ ॥

रोगास्तस्योपजायन्ते संतर्पणनिमित्तजाः । ( १ ) सन्तर्पण- प्रकरण संतर्पण से होने वाले रोगों के कारण - जो व्यक्ति स्निग्ध, मधुर, गुरु, पिच्छिल, नूतन अन्न, नूतन मदिरा, आनूप और जलीयमांस, गोरस ( दुग्ध - वृत ), गौडिक ( गुड़ से बने हुए भक्ष्य पदार्थं जैसे पूआ आदि ) और पिष्ट ( चावल आदि का आटा ) द्वारा निर्मित भोज्य पदार्थों से अपने को अधिक मात्रा में तृप्त करता है और चेष्टा ( शारीरिक चेष्टा ) से द्वेष रखता है अर्थात् शारीरिक श्रम नहीं करता है । दिवाशयन, शय्या या आसन पर सुखपूर्वक लेटे या बैठे रहना है तो उस व्यक्ति के शरीर में संतर्पण के कारण अधोलिखित रोग उत्पन्न होते हैं ॥ ३-४ ॥ विमर्श - इन स्निग्ध वस्तुओं के सेवन करने के बाद यदि मनुष्य श्रम नहीं करता है तो गुरु भोजन और विश्राम के कारण शरीर में कफ की वृद्धि हो जाती है और कफ के द्वारा धातुवह स्रोतों का मुख अवरुद हो जाता है जिसमे निम्न रोगों की उत्पत्ति होती है * प्रमेहपिडका कोठकण्डूपाण्ड्रामयज्वराः ॥ ५ ॥

कुष्टान्यामप्रदोषाश्च मूत्रकृच्छ्रमरोचकः । तन्द्रा कुव्यमतिस्थौल्यमालस्यं गुरुगात्रता ॥ ६ ॥

इन्द्रियस्रोतसां लेपो बुद्धमोंहः प्रमीलकः । शोफाश्चंवंविधाश्वान्ये शीघ्रमप्रति कुर्वतः ॥ ७ ॥

१. ' चान्यैः ' यो । २. ' प्रमेहकण्डूपिडकाकोठपाण्ड्वामयज्वराः ' इति पा. । ३. ' प्रमीलकः सततं प्रध्यानम् ' चक्रः ।

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संतर्पणीयाध्यायः २३ ] सूत्रस्थानम् ४३७ संतर्पगजन्य रोग नमेद, पिडका, कोठ ( चकत्ता ), कण्डू, पाण्डुरोग, ज्वर, कुष्ठ, आम-दोष, मूत्रकृच्छ, भोजन में अरुचि, तन्द्रा, नपुंसकता, अनिस्थूलना, आलस्य, गुरुगात्रता, इन्द्रियों और स्रोतों में कफ का लिप्त हुआ प्रतीत होना, बुद्धि का व्यानोह ( बुद्धि का भ्रम ), प्रमीलक, ( सदा चिन्तित रहना ), शोथ, इसी प्रकार के अन्य रोग भी, यदि शरीर के अतितृप्त होने पर उत्पन्न विकारों की शीघ्र ही चिकित्सा न की जाय तो ये रोग उत्पन्न हो जाते हैं ॥ ५-७ ॥ विमर्श - आयुर्वेद दोषों के संचय - काल में ही चिकित्सा करने का उपदेश देता है । संतर्पग से बढ़ा हुआ कफ जो स्रोतों में एकत्र होता है उसका ' संचयेऽपहृता दोषाः ' के अनुसार निर्हरण न किया गया तो फलस्वरूप ये रोग होते हैं । यदि सम्प्राप्ति काल में ही दोष का निर्हरण कर दिया जाना है तो ये रोग उत्पन्न ही नहीं होते हैं इसीलिए ' शीघ्रमप्रतिकुर्वतः ' यह संकेत किया गया है । शस्तमुल्लेखनं तत्र विरेको रक्तमोक्षणम् । व्यायामश्चोपवासश्च धूमाश्च स्वेदनानि च ॥८ ॥

सक्षौद्रश्चाभयाप्राशः प्रायो रूक्षान्नसेवनम् । चूर्णप्रदेहा ये चोक्ताः कण्डूकोठविनाशनाः ॥९ ॥

संतर्पणजन्य रोगों की सामान्य विकित्सा - किसी भी प्रकार संतर्पण से उत्पन्न होने वाले रोगों में वमन, विरेचन, रक्तमोक्षण, व्यायाम, उपवास, धूमपान और स्वेदन कर्म करना उत्तम होता है । इसके अतिरिक्त मधु के साथ हर्रे के चूर्ण का सेवन, प्रायः रूक्ष अन्न का सेवन तथा ' आरग्वधीय अध्याय ' में कण्डू - कोठनाशक बताये गये चूर्ण और प्रदेहों का प्रयोग करना उत्तम होता है ॥ ८ - ९ ॥ विमर्श - चक्रपाणि ने ' अभयाप्राश ' से ' अगस्त्यहरीतकी का सेवन करना बताया है । पर सामान्यतः संतर्पण से होने वाले रोगों में हर्रे का प्रयोग अधिक उपयोगी होता है । यदि केवल हरे का ही प्रयोग किया जाय तो भी संतर्पण जन्य रोगों का नाश होता है । संतर्पण से विशेषकर स्थूलता होती है इसकी चिकित्सा वाग्भट ने निम्न रूप से बताई है - ' कुलत्थचूर्णश्यामाकयव-मुद्द्रमधूदकम् | मस्तुदण्डाहनारिष्टचिन्ताशोधनजागरम् ॥ मधुना त्रिफलां लिह्याद् गुडूचीमभयां घनम् । रसाञ्जनत्य महतः पञ्चमूलस्य गुग्गुलोः || शिलाजतुप्रयोगश्च साग्निमन्थरसो हितः ॥ विडङ्गं नागरं क्षारः काललोहरजो मधु । यवामलकचूर्णे च योगोऽतिस्थौल्य दोषजित् ॥ ' ( सू. अ ' १४ ) । त्रिफलारग्वधं पाठां सप्तपर्णं सवत्सकम् । मुस्तं समदनं निम्बं जलेनोत्कथितं पिबेत् ॥१० ॥

तेन मेहादयो यान्ति नाशमभ्यस्यतो ध्रुवम् । मात्राकालप्रयुक्तेन संतर्पणसमुत्थिताः ॥११ ॥

त्रिफलादि क्वाथ - त्रिफला ( आँवला, हर्रे, बहेड़ा के छिलके ), अमलतास की गुद्दी, पाठा, छतिवन की छाल, कोरैया की छाल, खेत का मोया, मदनफल, नीम की छाल, इन्हें जल में बाथ कर मात्रानुसार पीने से संतर्पण से उत्पन्न होने वाले प्रनेह आदि रोग निश्चित रूप से नष्ट हो जाते हैं । पर यह काथ एक - दो दिन पीने से लाभ नहीं करता किन्तु निरंतर कुछ दिन अभ्यास करने से लाभकारी होता है ॥ १०-११ ॥ मुस्तमारग्वधः पाठा त्रिफला देवदारु च । श्वदंष्ट्रा खदिरो निम्बो हरिद्वे त्वक्च वत्सकात् ॥ रसमेषां यथादोपं प्रातः प्रातः पिवन्नरः । संतर्पणकृतैः सर्वैर्व्याधिभिः संप्रमुच्यते ॥ १३ ॥

एभिश्चोद्वर्तनोद्वेर्षस्त्रानयोगोपयोजितैः । त्वग्दोषाः प्रशमं यान्ति तथा स्नेहोपसंहितैः ॥१४ ॥

मुस्तादिकाथ - खेत का मोथा, अमलतास की गुद्दी, पाठा, त्रिफले का छिलका, देवदारु, गोखरू, खदिर, नीम की छाल, हल्दी, दारूहल्दी, कुरैया की छाल, इनका रस दोषों की मात्रा के अनुसार प्रतिदिन पीने से संतर्पणजन्य सभी व्याधियाँ शांत हो जाती हैं । और इन्हीं औषधों का उद्वर्तन, उदूघर्षण तथा इन्हीं औषधियों के क्वाथ में स्नेह द्रव्य मिलाकर स्नान करने से या १. ' उद्वर्तनमभ्यङ्गपूर्वकम्, उद्धर्षस्त्वनभ्यङ्गपूर्वकः ' चक्रः ।

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४३८ चरकसंहिता इन्हीं द्रव्यों से सिद्ध किये हुए घृत और तेल के प्रयोग से सभी प्रकार के त्वचा के दोष, जैसे कण्डू, कुष्ठ आदि, शान्त हो जाते है ॥ १२-१४ ॥ कुष्ठं गोमेदको हिङ्गु क्रौञ्चास्थि त्र्यूषणं वचा । वृषकैले श्वदंष्ट्रा च खराह्वा चाश्मभेदकः ॥१५ ॥

तत्रेण दधिमण्डेन बदराम्लरसेन वा । मूत्रकृच्छ्रं प्रमेहं च पीतमेतद्व्यपोहति ॥ १६ ॥

कुष्ठादिचूर्ण – कूठ, गोनेदमणि, हींग, क्रौंच नामक पक्षी की हड्डी, सोंठ, पीपर, मिर्च, वच मीठा, अडूसा की पत्ती, बड़ी इलायची, गोखरू, अजमोदा, पाषाणभेद इन द्रव्यों का सम भाग गृहीत कर कपड़छान चूर्ण खाकर अनुपान के रूप में मट्टा या दही का पानी या खट्टी बेर का रस पीने से मूत्रकृच्छ और प्रमेह दूर हो जाते हैं ॥ १५-१६ ॥ विमर्श - इस योग में गोमेद्र मणि का समावेश किया गया है । यहाँ गोमेद की भस्म या पिष्टी सममात्रा में तथा अन्य औषधियों का कपड़छान चूर्ण डालना चाहिए । यह योग अष्टाङ्ग संग्रह सू. अ. २४ में भी आया है उसमें क्रिमि एवं स्थूलतानाशक भी इसे बताया है यथा — ' मूत्रकृच्छ्रं क्रिमीन् मेहान् स्थूलनां च व्यपोहति । ' इतक्राभयाप्रयोगैश्च त्रिफलायास्तथैव च । अरिष्टानां प्रयोगैश्च यान्ति मेहादयः शंमम् ॥१७ ॥

प्रमेह चिकित्सा - • तक्र, हर्रा और त्रिफला के प्रयोग से तथा अरिष्टों के प्रयोग से प्रमेह आदि रोग शान्त हो जाते है ॥ १७ ॥

यूषणं त्रिफला क्षौद्रं क्रिमिघ्नमजमोदकः । मन्थोऽयं सक्तवस्तैलं हितो लोहोदकाप्लुतः ॥ त्र्यूषणादिमन्थ - • सोंठ, पीपर, मरिच, आँवला, हर्रा, बहेरा, वायविडंग, अजमोदा, इनका कपड़छान चूर्णं, सब के समान जौ का सत्तू मिला, शहद और घी से युक्त कर, अगर के क्वाथ से घोलकर बनाया हुआ यह मन्थ संतर्पणजन्य सभी रोगों को शान्त करता है ॥ १७-१८ ॥ व्योषं विडङ्गं शिणि त्रिफलां कटुरोहिणीम् । बृहत्यौ द्वे हरिद्वे द्वे पाठामतिविषां स्थिराम् ॥

fessor नीधान्यचित्रकान् । सौवर्चलमजाजीं च हपुषां चेति चूर्णयेत् ॥ २० ॥

चूर्णतैलघृतक्षौद्रभागाः स्युर्मानतः समाः । सक्तृनां षोडशगुणो भागः संतर्पणं पिबेत् ॥२१ ॥

प्रयोगादस्य शाम्यन्ति रोगाः संतर्पणोत्थिताः । प्रमेहा मूढवाताश्च कुष्टान्यर्शासि कामलाः ॥ प्लीहा पाण्ड्वामयः शोफो मूत्रकृच्छ्रमरोचकः । हृद्रोगो राजयक्ष्मा च कासः श्वासो गलग्रहः ॥ मियो ग्रहणीदोषाः वैत्र्यं स्थौल्यमतीव च । नराणां दीप्यते चाग्निः स्मृतिर्बुद्धिश्व वर्धते ॥ व्योषाद्य I सक्तु • सोठ, पीपर, मरिच, बायविडंग, सहजन की छाल, आँवला, हर्रा, बहेरा, कटुकी, भटकटैया ( रेंगनी ), बनभंटा, हल्दी, दारूहल्दी, पाठा, अतीस, सरिवन, हींग, करेमू के साग का मूल ( कर्मी का माग ), अजवाइन, धनियाँ, चित्रक, सौचर नमक, सफेद जीरा, हाऊबेर. इन सभी औषधों का समभाग- गृहीत कर कपड़छान चूर्ण बनाकर तैल, घृत, मधु, इन तीनों को अलग - अलग सभी चूर्ण के समान भाग में लेकर उसमें चूर्ण को मिला डाले और उसमें चूर्ण के १६ गुना जौ का मत्तू भां मिलाकर बना हुआ संतर्पणमन्थ पान करना चाहिये । इसके प्रयोग से संतर्पण जन्य प्रमेह ( बीस प्रकार के ), मूढवान ( कुपित वात से उत्पन्न होनेवाले रोग ), कुछ ( Skin - disease ), अर्श, ( Piles ), कामला ( Jaundice ), प्लीहावृद्धि ( Splenomegaly ), पाण्डुरोग ( Anaemia ), शोथ ( Oedema ), मूत्रकृच्छ्र, अरोचक, हृदय-रोग, राजयक्ष्मा ( Pulmonary Tuberculosis ), कास, श्वास, गलग्रह ( कंठावरोध ), कृमिरोग १. ‘ क्षयम् ' यो. । २. ' लोहोकाप्लुत इत्यगुरूदकाप्लुतः, उदककरणं च षडङ्गविधानेन ' चक्रः । ३. ' सन्तर्पणमिति जलालोडितसक्तरूपतया तेन संतर्पणसंज्ञकस्याप्यपतर्पणरूपता ज्ञेया ' चक्रः ।

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संतर्पणीयाध्यायः २३ ] सूत्रस्थानम् ४३६ ग्रहणी रोग, श्वेत कुष्ठ ( Leucoderma ), अतिस्थूलता आदि रोग शान्त होते हैं और इसके सेवन से मनुष्यों की अग्नि प्रदीप्त होती है । स्मरणशक्ति और बुद्धि की वृद्धि होती है ॥ १ ९ -२४ ॥ विमर्श - यह संतर्पण से उत्पन्न रोगों में भोजन के रूप में प्रयुक्त किया जाता है, इसके बनाने की विधि यह है कि पहले हींग को घी में भून ले प्रत्येक औषधि का चूर्ण चवन्नी चक्त्री भर ले ले । सभी चूर्ण का मान मिलकर ८ तोला होगा, आठ - आठ तोला तिल का तेल, घृत और मधु में इस चूर्ण को मिला दिया जाता है । पुनः इसमें १२८ तोला जौ का सक्तु मिलाकर रख ले और प्रतिदिन प्रातः -सायंकाल दस - दस तोले की मात्रा में जल में घोल कर पिये । यद्यपि यह औषध है परन्तु इसमें सक्तु की मात्रा अधिक है इसलिये इसकी मात्रा अन्न के समान ही होती है । इसका प्रयोग जल में घोल कर तर्पण के समान किया जाता है, इसलिये इसका नाम ' संतर्पण ' रखा गया है किन्तु यह गुण में है अपतर्पण । इसीलिये संतर्पण से होने वाले प्रमेह आदि रोगों की शान्ति के लिये इसका प्रयोग किया जाता है । * व्यायामनित्यो जीर्णाशी यवगोधूमभोजनः । संतर्पणकृतै दोषैः स्थौल्यं ' मुक्त्वा विमुच्यते ॥ संतर्पणजन्य रोगो में आहार एवं विहार - नित्य व्यायाम करनेवाला, भोजन के पूर्ण पच जाने पर ही भोजन करने वाला, जौ, गेहूं का भोजन करनेवाला पुरुष स्थूलता से छुटकारा पाकर संतर्पण से उत्पन्न दोषों से भी छूट जाता हैं ॥ २५ ॥

उक्तं संतर्पणोत्थानामपतर्पणमौषधम् । वच्यन्ते सौषधाश्चोर्ध्वमपतर्पणजा गदाः ॥ २६ ॥

( २ ) अपतर्पण -प्रकरण यहाँ तक संतर्पण से उत्पन्न होने वाले रोगों में अपतर्पण करने वाले औषधों का वर्णन किया गया है । अब यहाँ से आगे अपतर्पण से उत्पन्न होने वाले रोगों और उनमें प्रयुक्त होने वाले औषधों का वर्णन किया जायगा ॥ २६ ॥

B देहाग्निबलवर्णौजःशुक्रमांसपरिक्षयः । ज्वरः कासानुबन्धश्च पार्श्वशूलमरोचकः ॥ २७ ॥

श्रोत्रदौर्बल्यमुन्मादः प्रलापो हृदयव्यथा । विण्मूत्रसंग्रहः शूलं जङ्घोरुत्रिकसंश्रयम् ॥ २८ ॥

पर्वास्थिसंधिभेदश्च ये चान्ये वातजा गदाः । ऊर्ध्ववातादयः सर्वे जायन्ते तेऽपतर्पणात् ॥ अपतर्पण से होने वाले रोग — अपतर्पण होने से शरीर और अग्नि का बल एवं वर्णं, ओज, शुक्र और मांस का क्षय होता है कास से अनुबन्धित ज्वर, पार्श्वशूल, अरोचक, श्रोत्रेन्द्रिय की दुर्बलता, उन्माद, प्रलाप, हृदय के रोग, मल - मूत्र की रुकावट, जंघा, ऊरु तथा त्रिक प्रदेक में शूल, पर्व ( गांठ ), हड्डी और सन्धियों में चोरने के समान पीड़ा होती है । इसके अतिरिक्त अन्य ऊध्वंवात आदि सभी वातजन्य रोग उत्पन्न होते है ॥ २७-२९ ॥ विमर्श - अपतर्पण का तात्पर्य शरीर का तृप्त न होना है । इससे शरीर में रूक्षता बढ़ जाती और स्नेहांश की कमी हो जाती है जिसके कारण ये उपर्युक्त रोग होते हैं । यहाँ श्रोत्रेद्रिय की दुर्ब-लता कहने का तात्पर्य चक्षु इन्द्रिय की दुर्बलता से भी है क्योंकि लङ्घन के अधिक होने पर अर्थात् अपतर्पण होने पर ' दौर्बल्यं श्रोत्रनेत्रयोः ' यह अध्याय २२ में कह आये हैं । * तेषां संतर्पणं तज्ज्ञैः पुनराख्यातमौषधम् । यत्तदात्वे समर्थ स्यादभ्यासे वा तदिष्यते ॥ १. ‘ शैल्यम् ' यो. । २. ' ऊर्ध्व वातः श्वासादियंत्रोर्ध्वं वायुर्याति, किं वा तन्त्रान्तरोक्तो रोगविशेषः; यथा -- ' अधः प्रतिहतो वायुः श्लेष्मणा कुवितेन च । करोत्यनिशमुद्द्वारमूर्ध्ववातः स उच्यते ॥ ' चक्रः । ३. ' यत्तदर्थे ' ग. ।

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४४० चरकसंहिता संतर्पण के दो भेद - वैद्य - समुदाय अपतर्पण से होने वाले रोगों में संतर्पण वाली औषों का विधान बताया है । वह संतर्पण दो प्रकार का होता है - ( १ ) तत्काल शरीर एवं धातुओं को तृप्त करने वाला । ( २ ) निरन्तर अन्यान द्वारा शरीर एवं धातुओं को तृप्त करने वाला || ३८ || * सद्यः क्षीणो हि सद्यो वै तर्पणेनोपचीयते । नर्ते संतर्पणाभ्यासाच्चिरचीणस्तु पुष्यति ॥ और -भी जो व्यक्ति कारणान्तर से शीघ्र ही क्षीण होता है उसे संर्पण का प्रयोग शीघ्र ही तृप्त कर पुष्ट बनाता है । शनैः शनैः धातुओं के क्षीण होने से अधिक दिनों में जो व्यक्ति क्षीण होता है तो संतर्पण जब तक कुछ दिन लगातार नहीं किया जाता है तो लाभ नहीं होता है ॥ ३१ ॥

विमर्श - तात्पर्य यह है कि जो व्यक्ति शोक, चिन्ता, आधान, साहस, अधिक रास्ता चलना आदि कारणों से शीघ्र ही क्षीण हो जाता है उसके लिये सद्यः संतर्पण करने वाली औषधियों का या विहार का प्रयोग किया जाय तो वह शीघ्र ही ठीक हो जाता है । परन्तु जो व्यक्ति अधिक दिनों से क्षीण हुआ है तो उसके अच्छे होने के लिये संतर्पण का प्रयोग कुछ दिन लगातार करना पड़ता है क्योंकि उसकी शारीरिक धातुयें शुष्क हो गई रहती हैं । अनएव अल्प दिन संतर्पण करने से लाभ नहीं हो पाता है । इसीलिये सद्यः संतर्पण और अभ्यास संतर्पण यह दो भेद संतर्पण के

ऊपर बताये हैं ।

* देहाग्निदोषभैषज्यमात्राकालानुवर्तिना । कार्यमत्वरमाणेन भेषजं चिरदुर्बले ॥ ३२ ॥

और भी - देह, अग्नि, दोष, औषध, मात्रा एवं काल का अनुसरण करने वाले वैद्य के लिये यह उचित है कि अधिक दिनों से दुर्बल ( क्षीण ) रोगियों में शीघ्रता न करते हुये औषधियों का प्रयोग करें ॥ ३२ ॥

* हिता मांसरसास्तस्मै पयांसि च घृतानि च । स्नानानि वस्तयोऽभ्यङ्गास्तर्पणास्तर्पणीश्च ये ॥ चिरक्षीण रोगियों की चिकित्सा - • जो व्यक्ति बहुत दिनों से क्षीण हो गया है उसके लिये मांसरस, दूध, घृत, स्नान, स्नेहन- वस्ति का प्रयोग, अभ्यंग ( तैल - मईन ) और शरीर को तृप्त करने वाले जल में घोले हुये सत्तू के सेवन का अभ्यास करना हितकारी होता है ॥ ३३ ॥

ज्वरकासप्रसक्तानां कृशानां मूत्रकृच्छ्रणाम् । तृप्यतामूर्ध्व वातानां वच्यन्ते तर्पणा हिताः ॥ शर्करापिप्पलीतैलघृतक्षौद्रः समांशकैः । द्विगुणितो वृत्यस्तेषां मन्धः प्रशस्यते ॥३५ ॥

और भी - अपतर्पण के कारण उत्पन्न होने वाले ज्वर तथा कास से युक्त, कृश, मूत्रकृच्छ्र, तृष्णा और ऊर्ध्ववान से पीड़ित रोगियों के लिये हिनकारी नर्पण का वर्णन किया जा रहा है । चीनी, पिप्पली, तेल, घृत, मधु इनको सनान भाग में लेकर सबके द्विगुण जौ का सत्तृ मिला, जल में घोलकर पीने से यह मन्थ वृष्य होता है । अर्थात् सभी धातुओं को बढ़ाता हुआ शुक्रवर्द्धक होता है ॥ ३४-३५ ॥ सक्तो मदिरा क्षौद्रं शर्करा चेति तर्पणम् । पिवेन्मारुतविण्मूत्रकफपित्तानुलोमनम् ॥३६ ॥

और भी - जौ के सत्तू में सुननाग चीना मिला मधु और मांग में घोलकर पीने से वान, मल, मूत्र, कफ और पित्त का अनुलोमन होता है ॥ ३६ ॥

फाणितं सक्तवः सर्पिर्दधिमण्डोऽम्लकाञ्जिकम् । तर्पणं मूत्रकृच्छ्रन्नमुदावर्तहरं पिवेत् || ३७ || और भी - अपतर्पण के कारण यदि मूत्रकृच्छ और उदावर्त रोग हो गया हो तो राव, १. ' तर्पणास्तर्पणाश्चेति संतर्पणकारकमन्थादय:, तेनेह संज्ञामात्रेण ये तर्पणा अतर्पणकारका व्योषादयस्ते न ग्राह्याः ' चक्रः । २. ' पिप्पलीमूल ' इति पा ० ।

पृष्ठ 530

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संतर्पणीयाध्यायः २३ ] सूत्रस्थानम् ४४१ सत्तू, घृत, दही का पानी, खट्टी कांजी एक में मिलाकर पीने से उनका नाश हो जाता है || ३७ || विमर्श - यहाँ किसी भी द्रव्य की मात्रा निर्धारित नहीं की गई है परन्तु पूर्व की भांति सत्त में समान भाग राब मिलाकर उसमें आलोडित करने योग्य घी, दही का पानी और कांजी मिलाना चाहिये । इन वृत आदि की मात्रा निश्चित समान भाग में होना आवश्यक नहीं है । दही का पानी, खड्ट्टी कांजी वे जलीय द्रव्य है इसके द्वारा ही आलोडन संभव है । अतः इन दोनों की मात्रा अधिक होनी चाहिये । * मन्थः खर्जूरमृद्वीकावृक्षाम्लाम्लीक दाडिमैः । परूषकैः सामलकैर्युक्तो मद्यविकारनुत् ॥ ३८ ॥

और भी -- खजूर, मुनक्का, वृक्षाम्ल, इमली, खट्टा अनारदाना, फालसा, आंवला इनके रस से घोला हुआ मन्ध मदिरा से उत्पन्न होने वाले सभी विकारों को नष्ट करने वाला होता है || ३८ || विमर्श -- इस मन्थ को बनाने में यदि सभी वस्तु ताजी मिल सके तो उसी के रस में सत्तू का घोलना उत्तम होता है । अभाव में जल के साथ इन द्रव्यों को पीस कर निकाले गये गाढ़े स्वरस में सत्तू को घोलना चाहिये ।

स्वादुरम्लो जलकृतः सस्नेहो रूक्ष एव वा ।

सद्यः संतर्पणो मन्थः स्थैर्यवर्णबलप्रदः ॥ ३ ९ ॥

और भी - जो मन्थ मधुर या अम्ल रस के द्वारा या जल से बनाया गया हो वह चाहे स्नेह-युक्त हो अथवा स्नेहरहित हो फिर भी शीघ्र ही संतर्पण करने वाला होता है । और शरीर एवं धातुओं में स्थिरता, वर्ण और बल को देने वाला होता है ॥ ३ ९ ॥ विमर्श - सत्त को जल में घोल कर पी लेने से ही संतर्पण होता है, यदि मधुर आदि रस का संसर्ग उसमें हो तो उत्तम कार्य करने वाला होता है । जल में घोलने मात्र से ही सत्तू का नाम ' संतर्पण ' होता है पर इसका प्रयोग नाना औषधियों के संयोग से अपतर्पण के लिये भी होता है किन्तु इसका नाम संतर्पण ही रहता है ।

तत्र श्लोकः-संतर्पणोत्था ये रोगा रोगा ये चापतर्पणात् ।

संतर्पणीये तेऽध्याये सौषधाः परिकीर्तिताः ॥ ४० ॥

इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते सूत्रस्थाने योजनाचतुष्के संतर्पणीयो नाम त्रयोविंशतितमोऽध्यायः ॥ २३ ॥

अध्यायगत विषयों का उपसंहार -संतर्पण से होने वाले रोग तथा अपतर्पण से होने वाले रोग और उनकी चिकित्सा इस संतर्पणीय अध्याय में कही गई है ॥ ४० ॥

चरक के द्वारा प्रतिसंस्कृत अग्निवेशकृततन्त्र ( चरकसंहिता ) के सूत्रस्थान में योजनाचतुष्क-विषयक ' संतर्पणीय ' नामक तेईसवाँ अध्याय समाप्त हुआ || २३ ॥ - * -