चरक संहिता हिन्दी भाष्य — पृष्ठ 531–540

चरक संहिता हिन्दी भाष्य · Chaukhamba · पृष्ठ 531–540

पृष्ठ 531

चरक संहिता हिन्दी भाष्य, पृष्ठ 531 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

४४२ चरकसंहिता अथ चतुर्विंशतितमोऽध्यायः अथातो विधिशोणितीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥

इति ह स्माह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥

अब संतर्पणीय अध्याय के बाद ' विधिशोणितीय ' अध्याय की व्याख्या की जायगी, जैसा कि भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥ १-२ ॥ विमर्श - चक्रपाणि के अनुसार वान दोत्र की तरह रक्त भी बहु - विकारकारी है । अतएव पूर्वोक्त अध्याय ( अ. २२ ) में वर्णित लंघनादि उपक्रमों का प्रयोग किस प्रकार करना चाहिये इसी तथ्य को विशेष रूप से स्पष्ट करने के लिए रक्त का प्रकरण उदाहरण स्वरूप प्रारम्भ किया गया है । * विधिना शोणितं जातं शुद्धं भवति देहिनाम् । देशकालौकसाम्यानां विधिर्यः संप्रकाशित ॥ ( १ ) रक्त तथा रक्त - रोग विमर्श शुद्ध रक्त की प्रक्रिया — • जिन मनुष्यों को देशसात्म्य, कालसात्म्य और ओक ( अभ्याम ) सात्म्य ज्ञात हैं ऐसे मनुष्यों के लिए आहार करने की जो विधि बताई गई है उस विधि से खाए हुए आहार रस से जो रक्त की उत्पत्ति होती है उसे ' शुद्ध रक्त ' कहते हैं ॥ ३ ॥

विमर्श - रक्त की उत्पत्ति प्रधानतः दो प्रकार के तत्त्वों पर निर्भर है - बाह्य तत्त्व ( Extrinsic Factor ) और आभ्यन्तर तत्त्व ( Intrinsic Factor ) । बाह्य तत्त्व हमें आहार द्रव्यों से प्राप्त होते हैं और आभ्यन्तर तत्त्व शरीर के भीतर ही प्राप्त होता है । यथा रक्त के घटक - लौह आदि तत्व जो आहार द्रव्यों से मिलते हैं वे बाह्य तत्त्व हैं और उनके समुचित सात्म्यीकरण के लिये आमाशय तथा यकृत् से प्राप्त रंजक पित्त तथा मज्जागत पदार्थ, आभ्यन्तर तत्त्व होते हैं । इसलिये आचार्य ने उपर्युक्त श्लोक में यह संकेत किया है कि विधिवत् अर्थात् आहार - विधि - विशेषायतन के विधान से प्रयुक्त आहार द्रव्य से जो रक्त शरीर में उत्पन्न होता है वह रक्त शुद्ध होता है । देश सात्म्य, काल - सात्म्य तथा ओक - सात्म्य का आदेश इस तथ्य को और भी स्पष्ट कर देता है । आधुनिक विज्ञान के अनुसार रक्त कणों की उत्पत्ति अस्थियों की लोहिन - मज्जा ( Red Marrow ) से होती है । लोहित - मज्जा अस्थियों के सुषिर - संधान में ( Spongy Tissue ), विशेषकर कशेका, पर्शुका, उर: फलक और कपालास्थि में होती है । भ्रूण और शिशु की नलकास्थियों के विवर ( Medulary Cavity ) में भी लोहित - मज्जा होती है । शैशव के बाद इनरों में लोहित मज्जा का स्थान पीत - मज्जा ( Yellow Marrow ) लेनी है । साथ ही साथ रक्त की उत्पत्ति एवं विकास पर आमाशय तथा यकृत् का प्रभाव होता है । रक्त की उत्पत्ति के कारणभूत द्रव्य उक्त दो तत्त्व ( आभ्यन्तर तथा बाह्य तत्व ) है । बाह्य तत्व भोजन द्वारा शरीर में पहुंचता है तथा आभ्यन्तर तत्त्व शरीर में पहले से विद्यमान रहता है जिसकी बाह्य तच्च पर क्रिया होने से रक्त कणों की उत्पत्ति होती है । यह आभ्यन्तर तत्त्व आमाशय कला में स्थित ब्रूनर की ग्रन्थियों तथा मुद्रिका द्वार के समीप स्थित इसी प्रकार की ग्रन्थियों से निकलने वाला प्रभावी रस होता है । इस द्रव्य का यकृत् में संचय होता है । यकृत और आमाशय का रक्तोत्पत्ति के साथ उक्त सम्बन्ध के कारण ही धानक पाण्डुरोग ( Pernicious Anaemia ) में १. ' विधिनेति सम्यगाहाराचारविधिना ' चक्रः । २. ' संप्रकाशित इति तस्याशिनीयादौ चक्रः । स प्रदर्शितः ' यो ।

पृष्ठ 532

चरक संहिता हिन्दी भाष्य, पृष्ठ 532 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

विधिशोरिणतीयाध्यायः २४ ] सूत्रस्थानम् ४४३ आजकल यकृत् तथा आमाशय के तत्त्व दिये जाते हैं । आयुर्वेद में भी रक्तपित्त में अति रक्तस्राव होने पर रक्त अथवा यकृत् के सेवन का आदेश इस तथ्य को पुष्ट करता है जैसा - ' अतिनिः-स्रुतरक्तो वा क्षौद्रयुक्तं पिबेदसृक् । यकृद् वा भक्षयेद्राजमानं पित्तसमायुतम् ' ( सु. उ. त. अ. ४५ ) । इन उद्धरणों से यह स्पष्ट हो जाता है कि शुद्ध रक्त के निर्माण में बाह्य रूप ( Extrinsic Factor ) भी परमावश्यक है, जो भोजन द्रव्यों से प्राप्त होता है । उक्त श्लोक में आचार्य ने इसी तथ्य का संकेत किया है । तद्विशुद्धं हि रुधिरं बलवर्णसुखायुषा । युनक्ति प्राणिनं प्राणः शोणितं ह्यनुवर्तते ॥ ४ ॥

रक्त ही प्राण का आधार - इस प्रकार विधिपूर्वक निर्मित विशुद्ध रक्त प्राणियों को बल, वर्ण, सुख और उत्तम आयु से संयुक्त करता है । प्राणियों का प्राण रक्त का ही अनुसरण करता है ॥ विमर्श - रक्त के कार्य का वर्णन करते हुये आयुर्वेद के संहिता ग्रंथों में निम्न वाक्य और उपलब्ध होते हैं, जैसे- ' रक्तं वर्णप्रसादं मांसपुष्टिं जीवयति च । " ( सु. सू. १५ ) । ' तेषां ( धातूनां ) क्षयवृद्धी शोणितनिमित्ते । ( सु. सू. १४ ) | ' लोहितं प्रभवः शुद्धं ननौस्तेनैव च स्थितिः । ' ( अ. हृ. मू. २७ ) | ' धातुक्षयान् स्रते रक्ते मन्दः संजायतेऽनलः । पवनश्च परं कोपं याति * " " " " ' ( सु. सू. १४ ) । ' तदेभिरेव ( वातपित्तश्लेष्मभिः ) शोणितचतुर्थैः सम्भवस्थितिप्रलयेष्व-प्यविरहितं शरीरं भवति । ' ( सु. सू. ३१ ) । ' देहस्य रुधिरं मूलं रुविरेणैव धार्यते । तस्माद्यत्नेन संरक्ष्यं रक्तं जीव इति स्थितिः । ' ( सु. सु. १४ ) ' असृजः पित्तं मल:) ' ( च. चि. १५ ) । शरीर की ही अधीन है । विशुद्ध रुधिर ही शरीर के क्षय होने पर वातदोष अतिप्रकुपित हो जाता प्राण रक्त का अनुसारी है अर्थात् रक्त की उत्पत्ति और स्थिति रक्त के बल, वर्ण और सुखी जीवन का मूल है । रक्त के है और शरीर की धातुयें अतिक्षीण होने लगती है । स्थिति के अनुसार ही पुरुष के जीवन की स्थिति निर्धारित होती है, अतएव यह भी कहा जाता है कि रक्त ही प्राण है । रक्त का मल, वित्त ( यकृत - पित्त ) है । रक्त के द्वारा जहाँ धातुओं को प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, स्नेह, खनिज, लवण तथा जल इन पोषक और शक्त्युत्पादक द्रव्यों की प्राप्ति होती है वहाँ शरीर की स्थिति के लिये अनिवार्य जीवनीय - तत्त्व भी उन्हें रक्त द्वारा ही मिलते हैं । रक्त ही अन्य शरीरावयवों के सदृश विविध अन्य ग्रन्थियों को भी मूल द्रव्य पहुँचाता है, जिससे वे विविध जीवनोपयोगी स्रात्रों को उत्पन्न करने में समर्थ होती है । रक्त उत्पन्न हुये इन स्रावों को समस्त शरीर में फैला देता है जहाँ वे अपनी प्रतिनियत क्रिया सम्पन्न करते हैं । लालाग्रन्थि, अग्नयाशय आदि बहिःस्रावी ग्रन्थियाँ भी रक्त द्वारा अपेक्षित द्रव्य की प्राप्ति के बाद ही स्रावों का निर्माण करती हैं । पाचक अङ्गों की यथोचित क्रिया करने के लिए रक्त का उन अवययों में समुचित अभिसरण अनिवार्य होता है । रक्त ही अपने रक्त कणों के द्वारा धातुओं को ओषजन ( Oxygen ) पहुँचाता है । रक्त धातुपाकजन्य मलों ( कार्बनिकाम्ल, यूरिया आदि ) को मलोत्सर्जक अवयवों द्वारा बाहर निकालता है । रक्त पेशियों, ग्रन्थियों तथा अन्य अवयवों में उत्पन्न ऊष्मा को समस्त शरीर में व्यवस्थित कर देता है । रक्त के श्वेतकण जीवाणुओं और उनके त्रिषों ( Toxins ) का ग्रास कर शरी की विकारों से रक्षा करते हैं । रक्त की इन बहुमूल्य क्रियाओं को देखते हुए आयुर्वेद में जो रक्त को प्राण कहा है वह वह उचित ही प्रतीत होता है । प्रदुष्टवहुतीक्ष्णोष्णैर्मद्यैरन्यैश्च तद्विचैः । तथाऽतिलवणक्षारैरम्लैः कटुभिरेव च ॥ ५ ॥

कुलत्थमानष्पावतिलतैल । नषेवणैः । पिण्डालुमूलकादीनां हरितानां च सर्वशः ॥ ६ ॥

जलजानूपबैलानां प्रसहानां च सेवनात् । दध्यम्लमस्तुसुक्तानां सुरासौवीरकस्य च ॥ ७ ॥

पृष्ठ 533

चरक संहिता हिन्दी भाष्य, पृष्ठ 533 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

४४४ -चरकसंहिता विरुद्धानामुपक्लिन्नपूतीनां भक्षणेन च । भुक्त्वा दिवा प्रस्वतां इवस्त्रिग्धगुरूणि च ॥ ८ ॥

अत्यादानं तथा क्रोधं भजतां चातपानलौ । छदिवेगप्रतीघातात् काले चानवसेचनात् ॥ ९ ॥

श्रमाभिघात संतापैरजीर्णाध्यशनैस्तथा । शरत्कालस्वभावाच्च शोणितं संप्रदुष्यति ॥ १० ॥

रक्तदुष्टि के निदान - दूषित, मात्रा से अधिक, अनितीक्ष्ण, अतिउष्ण, मदिरा सेवन से, तथा इसी प्रकार के अन्य मादक द्रव्यों के सेवन से, अधिक नमक, अधिकार, अधिक अन्तरस और अधिक मात्रा में कटु रस के सेवन से, कुल्थी, उड़द, सेम, तिल का तेल इनके सेवन से, पिण्डालु ( आलु ), मूली आदि के सेवन से, हरित वर्गों के द्रव्यों के सदा सेवन से जलज मांस, आनूपमांस, बिलेशयमांस, प्रसहमांस के सेवन से, दही, अम्ल ( कांजी ), दही का पानी, सत्तू, सुरा, सौवीर ( मद्य का भेद ) तथा विरुद्ध भोजन, सड़े - गले दुर्गन्धित आहार द्रव्यों के सेवन से, द्रव, स्निग्ध और गुरु आहार द्रव्यों का सेवन करने के बाद दिन में शयन से, मात्रा से अधिक भोजन से, अधिक क्रोध से, धूप और तेज हवा के अधिक सेवन से, वमन के वेग को रोकने से, समय पर ( शरद् ऋतु में ) स्वभावनः दूषित रक्त को न निकालने से, श्रम से, अभिघात के लगने से, शरीर एवं मन में अधिक संताप होने से, अजीर्णावस्था में भोजन करने से, अध्ययशन से तथा स्वभाव से ही शरद् ऋतु में रक्त की दृष्टि होती है ॥ ५-१० ॥ विमर्श - यहाँ पिण्डालु से आलू का ग्रहण किया जाता है । हरितक से हरीवस्तु, जैसे-अदरक, सोआ, पालक, नींबू, पुदीना आदि का ग्रहण करना चाहिए, जिनका सर्वदा हरी अवस्था में प्रयोग होता है । विरुद्ध भोजन के संयोग, संस्कार, देश, काल, मात्रा, रस, वीर्य, विपाक आदि सभी प्रकार के विरुद्ध द्रव्यों का ग्रहण किया जाता है । अध्यशन से, भोजन के ऊपर ही शीघ्र ही भोजन करना लिया जाता है । अजीर्णभोजन और अध्यशन यह दोनों में यह भिन्नता है कि प्रातःकाल का खाया हुआ भोजन यदि द्वितीय भोजन काल तक न पचा हो और पुनः खा लिया जाय तो उसे ' अजीर्ण भोजन ' कहते हैं । अध्यशन - एक बार अल्प मात्रा में या पूर्ण मात्रा में भोजन करने के वाद पुनः शीघ्र ही भोजन करना है, जैसा कि - ' विद्यादध्यशनं भूयो भुक्तस्योपरि भोजनन् । ' ( चि. अ. १५ ) । कुछ लोग ' अजीर्णाध्यशन ' इसे एकपद मानते हैं और अजीर्णावस्था में भोजन करने को ' अजोध्यशन ' कहते हैं, जैसा कि - " भुक्तं पूर्वान्नशेषे तु पुनरध्यशनं मनम् । ’ ( चि. अ. १५ ) । पर अजीर्ग और अध्यशन इन दोनों को अलग - अलग मानना ही समुचित प्रतीत होता है । सुश्रुत ने अजीर्ण और अध्यशन को अलग - अलग माना है, यथा- ' पित्तप्रकोप-रेव चाभीक्ष्णं गुरुनिराहारै दिवास्त्रमक्रोधानात पश्रनानिवानाजीर्णविरुद्धाध्यशनादिभिविशे-पैरसृक् प्रकोपमापद्यते । ' ( सू. अ. २१ ) । सुश्रुत ने यह भी स्पष्ट किया है कि जिन कारणों में पित्त कुपित होता है, उन्हीं कारणों से रक्त भी दूषित होता है क्योंकि रक्त को आग्नेय माना है और पित्त भी आग्नेय है । आग्नेयगुण होने से दोनों समान है । पित्त के दूषित होने के निम्न कारण है - ' क्रोधशोकभयायासोपवासविदग्धमैथुनोपगमनवत्वम्ललवणोष्णलघुविदाहितिलतैलपिण्याक-कुलत्थसर्षपातसीहरितकशाकगोवामत्स्याजाविक मांसद विक्रकृचिकामस्तु सौवीरकसुराविकारान्तफलक-वरप्रभृतिभिः पित्तं प्रकोपमापद्यते । ' ( सु. सू. अ. २१ ) ततः शोणितजा रोगाः प्रजायन्ते पृथग्विधाः । मुखपाकोऽचिरोगश्च पूतिघ्राणास्यगन्धिता गुल्मोपकुशवीसर्परक्तपित्तप्रमीलकाः । विद्र्धी रक्तमेहश्च प्रदरो वातशोणितम् ॥ १२ ॥

वैवर्ण्यमग्निसादश्च पिपासा गुरुगात्रता । संतापश्चातिदौर्बल्य मरुचिः शिरसश्च रुक् ॥ १३ ॥

१. ' अत्यादानं तृप्तिमतिक्रम्य भोजनम् ' चक्रः । २. ' मुखनासाक्षिपाकश्च ' ग. । ३. ' वैरस्य ' ग. ।

पृष्ठ 534

चरक संहिता हिन्दी भाष्य, पृष्ठ 534 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

विधिशोणितीयाध्यायः २४ ] सूत्रस्थानम् ४४५ विदाहश्चान्नपानस्य तिक्ताम्लोरिणं क्लमः । क्रोधप्रचुरता बुद्धेः संमोहो लवणास्यता ॥१४ ॥

स्त्रेदः शरीरदौर्गन्ध्यं मदः कम्पः स्वरक्षयः । तन्द्रा निद्रातियोगश्च तमसश्चातिदर्शनम् ॥ कण्ड्वरुःकोठपिडका कुष्ठचर्मदलादयः । विकाराः सर्व एवैते विज्ञेयाः शोणिताश्रयाः ॥ १६ ॥

रक्तजरोग - अशुद्ध रक्त की यदि शुद्धि न की जाय तो उससे अनेक प्रकार के रक्तदुष्टि-जन्य दोष होने हैं, जैसे - मुखपाक, नेत्र में लालिमा, नासिका और मुख से दुर्गन्ध का आना, रक्त जगुल्म, उपकुश, विसर्प, रक्तपित्त, प्रमीलक ( सर्वदा चिन्तित रहना ), विद्रधि, रक्तमेह, प्रदर, वातरक्त, वैवर्ण्य, अन्निनान्द्य, पिपासाधिक्य, शरीर का भारीपन, सन्ताप, अधिक दुर्बलता, भोजन में अरचि, सिर में वेदना, भोजन में विवाह अर्थात् भोजन के बाद पाकावस्था में गले का जलना, नीती और खट्टी डकार का आना, क्लम ( बिना श्रम के थकावट ), क्रोध की अधिकता, बुद्धि का मोह ( बुद्धिभ्रम ), मुख का नमकीन होना, स्वेदाधिक्य, शरीर में दुर्गन्धि की अधिकता, मद, शरीर में कम्प, स्वरभेद, तन्द्रा, निद्राधिक्य, उठने या चलने के समय आँखों के सामने अन्धकार का होना, कण्डू, फुन्सियाँ, चकत्ता, पिडिकायें, कुष्ठ, चर्मदल आदि ये सभी रोग दूषित रक्त से उत्पन्न होते हैं अर्थात् इन रोगों का अधिष्ठान रक्त होता है ॥ १४-१६ ॥ हैं, फिर भी जो रक्तज रोग विमर्श - रक्त दृष्य का वर्णन मिलता है वह वृद्धवाग्भट के इस वचन से स्पष्ट है यथा - ' रसादिस्थेषु दोषेषु व्याधयः सम्भवन्ति ये । तज्जानित्युपचारेण ताना-हुर्घृतदग्धवत् ' ॥ ( अ. सं. सू. अ. १ ) रक्तज रोगों के परिगणन में उपकुश रोग की गणना की गई है | यह रोग दन्तवेष्ट में होता है जैसा कि सुश्रुत ने बताया है - ' वेष्टेषु दाहः पाकश्च तेभ्यो दन्ताश्चलन्ति च । आघट्टिताः प्रस्रवन्ति शोणितं मन्दवेदनाः || आध्मायन्ते स्रुते रक्ते मुखं पूति ` च जायते । यस्मिन्नुपकुशः स स्यात् पित्तरक्तकृतो गदः ॥ ' ( सु. नि. अ. १६ )

शीतोष्णस्त्रिग्धरूक्षाद्यैरुपक्रान्ताश्च ये गदाः ।

सम्यक् साध्या न सिध्यन्ति रक्तजांस्तान्विभावयेत् ॥ १७ ॥

अनुपशय के द्वारा रक्तज रोगों का निर्णय -- शीत, उष्ण, स्निग्ध, रूक्ष आदि वीर्यं और गुणविशिष्ट औषधियों से चिकित्सा करने पर भी जो साध्य रोग अच्छे नहीं होते हैं उन्हें रक्तज रोग जानना चाहिए ॥ १७ ॥

विमर्श - ' गूढलिङ्गं व्याधिमुपशयानुपशयाभ्यां परीक्षेत ' यह सिद्धान्त है । यदि वातजन्य रोग होगा तो स्निग्ध - उष्ण द्रव्य उसमें उपशय ( लाभकर ) होगा, यदि पितजन्य रोग होगा तो स्निग्ध - शीत द्रव्य उसमें उपशय होगा, यदि कफजन्य रोग होगा तो रुक्ष - उष्ण द्रव्य उसमें उपशय होगा और परस्पर विरोधी तीनों प्रकार की चिकित्सा की गई पर उपशय ( लाभकर ) न हो कर अनुपशय ( अहितकर ) हुआ तो उसे रक्तज रोग माना जाता है । इस प्रकार रक्तज रोगों की परीक्षा अनुपश्य द्वारा की जाती है । यदि रोग असाध्य हो और उसमें इन गुणों से औषध लाभ न करें तो उसे रक्तज नहीं मानना चाहिए, पर रोग साध्य होते हुए भी इन गुणों युक्त से युक्त औषध यदि लाभ न करे तो रक्तज रोग का निश्चय करना चाहिए । र्याच्छोणितरोगेषु रक्तपित्तहरों क्रियाम् । विरेकैमुपवासं च स्रावणं शोणितस्य च ॥१८ ॥

रक्तज रोगों की चिकित्सा - विकृत रक्त से होने वाले रोगों में विकृति के अनुसार रक्त-पित्त नाशक उपाय विरेचन, उपवास अथवा रक्त विस्रावण क्रिया द्वारा चिकित्सा करनी चाहिए ॥ विमर्श -- रक्त एवं पित्त इन दोनों की प्रकृति एक समान मानी जाती है कहा भी है- ' संयो-१. ' विरेकमनुवासं च ' ग. ।

पृष्ठ 535

चरक संहिता हिन्दी भाष्य, पृष्ठ 535 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

४४६ चरकसंहिता गादूषणात्तत्तु सामान्याद्गन्धवर्णयोः । रक्तस्य पित्तमाख्यातं रक्तपित्तं मनीषिभिः ॥ ' ( च. चि. अ. ४ ) । इसके अतिरिक्त रक्त का पित्तवर्ग में भी परिगणन किया गया है और रक्त का मल पित्त होता है इसीलिये रक्त के दूषित होने पर रक्तपित्त रोग की जो चिकित्सा होती है वह चिकित्सा दूषित रक्त में करने का आदेश है । विरेचन पित्तको नाश करने में सर्वश्रेष्ठ होता है और उपवास के द्वारा दूषित रक्त का पाचन होता है क्योंकि यह नियम है कि अन्न के अभाव में अग्निदोष को ही पकाती है इसलिये उपवास करने का विधान है । रक्त के दूषित होने पर, ' एकतस्तु क्रिया सर्वा रक्तमोक्षणमेकतः ' अर्थात् रक्त दुष्टि की नारी चिकित्सा एक तरफ और केवल रक्तमोक्षण एक तरफ माना जाता है । तात्पर्य यह है कि दूषित रक्त में रक्तमोक्षण प्रधान चिकित्सा है इससे रक्त में जो दूषित भाग होता है वह निकल जाता है और रक्त में जो अम्लता होती हैं उससे सारे विकारों के होने की संभावना होती है, वह नष्ट हो जाती हैं जिससे रक्तज रोग स्वयं नष्ट हो जाते हैं जैसा कि - ' रक्तं हि व्यम्लतां याति तच्च नास्ति न चास्त्यरुक् ॥ ' बताया गया है । * बलदोषप्रमाणाद्वा विशुद्धया रुधिरस्य वा । रुधिरं खावयेजन्तोराश ( म ) यं प्रसमीच्य वा ॥ रक्तमोक्षण में रक्त निकालने का प्रमाण पुरुष के बल और दोष के अनुसार रक्त का मोक्षण करना चाहिये अथवा जब तक रक्त की शुद्धि न हो जाय तब तक रक्तमोक्षण करना चाहिये | अथवा दूषित रक्त के स्थान या दूषित रक्त से उत्पन्न होने वाले रोगों का विचार कर रक्त का मोक्षण करना चाहिये ॥ १ ९ ॥ विमर्श - रक्त का मोक्षण पुरुष के बल के अनुसार किया जाता है अर्थात् बलवान् में एक प्रस्थ, मध्यम बल में आधा प्रस्थ और दुर्बल में एक कुडव या रक्तमोक्षण नहीं ही करना चाहिये जैसा कि – ' अशुद्धौ बलिनोऽप्यस्रं न प्रस्थात् स्रावयेत् परम् ' । ( अ. हृ. सू. अ. २७ ) । इसी तरह अधिक दोष, मध्य दोष और अल्प दोष में यही क्रम लागू होता है । जब तक रक्त की शुद्धि न हो जाय तबतक रक्तमोक्षण करना चाहिये, इसका तात्पर्य यह है कि शिराव्यध करने पर सर्व-प्रथम अशुद्ध रक्त गिरना शुरू होता है जब शुद्ध रक्त आने लगता है तो वह जम जाता है और वह निकलता नहीं है, जैसा कि - ' सम्यग् गत्वा यदा रक्तं स्वयमेवावतिष्ठते । शुद्धं तदा विजानीयात् सम्यग् विस्रावितञ्च तत् ॥ ' ( सु. सू. अ. १४ ) । जलौका से रक्तमोक्षण करने पर जबतक अशुद्ध रक्त रहता है तबतक वेदना नहीं होती है जब शुद्ध रक्त जलौका लेने लगती है तब वेदना होती है और तब रक्तमोक्षण करना बन्द कर देना चाहिये जैसा कि - ' दंशे तोदकण्डू प्रादुर्भाव जानी-याच्छुद्धमियमादत्त इति शुद्धमाददानामपनयेत् ॥ ' ( सु. सू. अ. १३ ) आशय और आमय देखकर रक्तस्राव कराने का तात्पर्य यह है कि एकदेशीय विकृति होने पर श्रृंग, जलौका ( जोंक ), अलाबू के द्वारा तथा सर्वाङ्ग रक्त दुष्टि होने पर शिरामोक्ष के द्वारा रक्त निकालना चाहिये । आमय के अनुसार वानज में शृंग, पित्तज में जोंक, कफज में अलाबू के द्वारा रक्तमोक्षण कराया जाता है जैसा कि सुश्रुत में कहा है- ' तत्र वातपित्तकफदुष्टशोणितं यथासंख्यं शृङ्ग जलौकालाबुभिरवसेचयेत्, स्निग्धशीतरूक्षत्वात् सर्वाणि सर्वैर्वा ।...........॥ ' ( सु.सू.अ. १३ ) । यहाँ प्रस्थ से ५४ तो ० लिया जाता है, यथा-- ' वमने च विरेके च तथा शोणितमोक्षणे । सार्धत्रयोदशपलं प्रस्थमाहुर्मनी-षिणः ॥ ' ( शार्ङ्गधर उ. अ. ३ ) । अरुणाभं भवेद्वाताद्विशदं फेनिलं तनु । पित्तात् पीतासितं रक्तं स्त्यायत्यौष्ण्याञ्चिरेण च ॥ ईषत्पाण्डु कफाद्दुष्टं पिच्छिलं तन्तुमद्धनम् । संसृष्टलिङ्गं संसर्गात्रिलिङ्गं सान्निपातकम् ॥ वातादि दोष से दुष्ट रक्त के लक्षण - वायु से दुष्ट रक्त अरुग वर्ग, विशद, फेनयुक्त और

पृष्ठ 536

चरक संहिता हिन्दी भाष्य, पृष्ठ 536 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

विधिशोरिणतीयाध्यायः २४ ] सूत्रस्थानम् ४४७ पतला होता है । पित्त से दुष्ट रक्त पीला, काला और उष्णता के कारण बाहर निकलने पर देर से जमता है । कफ से दुष्ट रक्त कुछ पाण्डु वर्ण, पिच्छिल, तन्तुयुक्त और गाढ़ा होता है । दो दोप के या तीन दोष से दूषित होने पर क्रमशः उन दोनों या तीनों दोषों के लक्षणों से युक्त

होता है ॥। २०-२१ ॥

विमर्श - सुश्रुत ने वात से दूषित रक्त का काला, परुष, शीघ्र बहने वाला और वह जमने वाला होता है — इतना अधिक लक्षण बताया है । पित्त से दूषित रक्त को नीला, हरा, दुर्गन्धयुक्त, चींटी और मक्खियों के लिए अप्रिय तथा कफ से दूषित रक्त का वर्ण गेरु के पानी की तरह स्निग्ध, शीतल, बहल, चिरस्रावी, मांसपेशी के समान गाढ़ा - इतना लक्षण अधिक बताया है यथा- ' तत्र, फेनिलमरुणं कृष्णं परुपं तनु शीघ्रगमस्कन्दि च वातेन दुष्टं; नीलं पीतं हरितं श्यावं विस्रमनिष्टं पिपी-लिकामक्षिकाणामस्कन्दि च पित्तेन दुष्टं; गैरिकोदकप्रतीकाशं स्निग्धं शीतलं बहलं पिच्छिलं चिरस्रावि मांसपेशीप्रभं च श्लेष्मदुष्टम् । ' ( सु. सू. अ. १४ ) * तपनीयेन्द्रगोपाभं पद्मालक्तकसंनिभम् । गुञ्जाफलसवर्णं च विशुद्धं विद्धि शोणितम् ॥ शुद्ध रक्त का लक्षण -- तपनीय ( शुद्ध सुवर्ण ) और इन्द्रगोप ( वीरबहूटी ) की कान्ति की तरह तथा लाल कमल, अलक्तक ( महावर ) की तरह तथा रक्त वर्ण के गुंजाफल के समान रक्त शुद्ध माना जाता है ॥ २२ ॥

विमर्श - चक्रपाणि ने कहा है ' विशुद्धरक्तलिङ्गे नानावर्णता वातादिप्रकृतित्वान्मनुष्या-णाम् ' । अर्थात् विशुद्ध रक्त में नाना वर्णों की उत्पत्ति वातादि प्रकृतियों के अनुसार होती है । सुश्रुत ने भी कहा है – ' इन्द्रगोपप्रतीकाशनमंहतमविवर्णे च प्रकृतिस्थं जानीयात् ॥ ' ( सु. सू. १४ ) । शुद्ध रक्त का वर्ण लाल होता है परन्तु मनुष्यों की वातिक पैत्तिक, कफज प्रकृतियों के कारण सके वर्ण - भेद में कुछ अवान्तर भेद होता है । सुश्रुत के मतानुकूल समदोष प्रकृति वाले का रक्त वर्ण वीर-बहूटी की आभा के समान होता है । प्रकृत वचन के अनुसार कफ प्रकृति वाले पुरुषों के रक्त का वर्ग तपाये हुए सुवर्ण के समान, पित्तप्रकृति पुरुषों का रक्त लाल कमल के समान और लाक्षारस या आलता के समान होता है । आधुनिकमत से शरीर में अनुधावन करता हुआ रक्त जब फेफड़ों में आता है तो उससे प्रागांर द्विजारेय ( Co २ ) निकल जाता है । यह वायु तापोत्पादक द्रव्यों के धातुपाक से शरीर में उत्पन्न एक मल है । साक तत्त्व, स्नेह तथा नत्रजन से रहित मांस तत्त्व के पाक से प्रांगार से मल रूप में उत्पन्न होता है । यह अधिकांश उच्छ्वास वायु के साथ प्रांगार द्विजारेय के रूप में फुफ्फुसों से श्वास के रूप में निकलता है । यह रुधिर द्वारा संगृहीत होकर फुफ्फुसों के मार्ग से बाहर कर दिया जाता है । वायुमंडल में रहने वाला ओषजन ( Oxygen ) वायु नासा द्वारा फुफ्फुस में जाने पर रक्त में रहने वाले रक्तरंजक द्रव्य से मिल जाता है । ओषजन और रक्तरंजक द्रव्य के मिश्रण से ओष- रक्तरंजक ( Oxyhemoglobin ) नामक द्रव्य प्रस्तुत होता है इसका वर्ण बीरबहूटी के समान चमकीला लाल ( Bright Red ) होता है । इसके बादशुद्ध रक्त फुफ्फुसों से हृदय में आता है और वहाँ से सम्पूर्ण शरीर में प्रसारित हो जाता है । शारीर धातु इस रक्त से पोषक द्रव्यों के साथ ओषजन का भी ग्रहण करते हैं जिससे ओषरक्तरंजक पुनः रक्तरंजक में परिणत हो जाता है यह अपचित अर्थात् ओषजनरहित ( Deoxygenated ) अब हृदय की ओर लौटने लगता है इसमें उस समय पूर्वोक्त धातुपाकजन्य प्रांगार द्विजारेय भी मिश्रित होता है । रक्त रंजक का अपना रंग गहरा बैंगनी होता है अतः शिराओं द्वारा धातु से हृदय की ओर आते हुए रक्त का वर्ण भी गहरा बैगनी होता है । हृदय से होकर फुफ्फुसीया धमनी द्वारा यह रक्त पुनः में होने के लिए जाता है, और वहाँ से शुद्ध होकर पूर्वोक्त चक्र के अनुसार शरीर फुफ्फुस शुद्ध

पृष्ठ 537

चरक संहिता हिन्दी भाष्य, पृष्ठ 537 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

४४८ चरकसंहिता में धातुओं का पोषण करता रहता है । इस प्रकार यह क्रिया आजीवन चलती रहती है । रक्तरंजक द्रव्य का प्रधान तत्त्व अयस् ( लोहा ) है जो बहुत अल्प मात्रा में ही रहता है । उक्त वर्णन से प्रतीत होता है कि रक्तरंजक द्रव्य ओषजनवाहक ( Oxygen carrier ) है । धमनीगत रक्त के १०० घन सेन्टीमीटर में २० घन सेन्टीमीटर ओपजन होता है । रक्तरंजक द्रव्य आयुर्वेद का रक्तरंजक पित्त है । रक्त कणों के अतिरिक्त रक्त में दो प्रकार के कण और होते है । ( I. White Blood Corpuscles, II. Blood Platelets ) 1 इनमें श्वेत कणों के ५-७ भेद हैं । श्वेत कणों का कर्म जीवाणुओं का भक्षण करना है । इस क्रिया को जीवाणुभक्षग ( Phagocytosis ) कहते हैं । क्षत्रकण नाम भी इनका इन्हीं क्रियाओं के कारण है ( क्षत् + त्र = क्षतान् त्रायते ) चक्रि काएँ रक्तकणों से बहुत छोटी होती हैं । इनकी क्रिया अभी ठीक नहीं मालूम हो पाई है । रुधिर के रक्तकण, श्वेत कण, चक्रिकाओं से अतिरिक्त शेषांश को रक्तमस्तु ( Plasma ) कहते हैं । रुधिर के शेष घन द्रव्य इसी में विलीन रहते हैं । शुद्ध रक्त को ' जीवरक्त ' भी कहते है । मुख, गुद, योनि आदि से कभी - कभी जीवरक्त भी निकल जाया करता है, इसका कारण दुर्बलता या दोष के प्राबल्य के कारण अन्त्र, आमाशय, गर्भाशय आदि अवयवों की केशिकाओं का विदीर्ण हो जाना है, इसी विदीर्ण मार्ग से जावरक्त आता है अतितीव्र विरेचन आदि से भी जीवरक्त का निस्सरण होता है जैसे – ' अतितीक्ष्णं मृदौ कोष्ठं लघुदोषस्य भेषजम् । दोषान् हृत्वा विनिर्मथ्य जीवं हरति शोणितम् ॥ ' ( च. सि. अ. ६ ) । इसे देखकर रक्तातिसार, रक्तवमन, रक्तप्रदर, अर्श आदि की शंका हो सकती है अतः जीवरक्त और दूषित रक्त का भेद - ज्ञान चिकित्सा की दृष्टि से परमावश्यक है, क्योंकि रक्तातिसार, रक्तप्रदर का दूषित रक्त तब तक स्तम्भनीय नहीं होता जब तक अशुद्ध न गिर जाय, कहा भी है- ' अक्षीणबलमांसस्य रक्तपित्तं यदश्नतः । तद्दोषदुष्टमकिष्टं नादौ स्तम्भनर्महति ॥ ' ( च. चि. अ. ४ ) परन्तु जीवरक्त की एक बूँद भी रक्षणीय है क्योंकि कहा है- ' यदस्य रुधिरं मूलं रुधिरेणैव धार्यते । तस्माद्यत्नेन संरक्ष्यं रक्तं जीव इति स्थितिः ॥ ' दोनों रक्तों की भेदक परीक्षा निम्नांकित है - ' जीवशो-णितरक्तपित्तयोश्च जिज्ञासार्थं तस्मिन् पिचुं प्लोतं वा क्षिपेत्, यद्युष्णोदकप्रक्षालितमपि वस्त्रं रञ्जयति तज्जीवशोणितमवगन्तव्यं, सभक्तं च शुने दद्यात्सक्तुमिश्रं वा स यद्युपभुञ्जीत तज्जीवशोणितमव-गन्तव्यम् अन्यथा रक्तपित्तमिति । ' ( सु. चि. ३४ ) अर्थात् निःसृतरक्त में श्वेत शुष्क वस्त्र किम्वा पिचु ( रुई का टुकड़ा ) डाले या भिगोवे । गरम जल से धोने पर यदि वह वस्त्र या पिचु न रञ्जित हो तो उसे जीवरक्त समझे । इसी प्रकार अन्न या सत्तू मिलाकर कुत्ते को देने पर यदि वह खा-जाय तो जीवरक्त समझे अन्यथा रक्तपित्त ।

नात्युष्णशीतं लघु दीपनीयं रक्तेऽपनीते हितमन्नपानम् ।

तदा शरीरं ह्यनवस्थितासृगग्निर्विशेषेण च रक्षितव्यः ॥ २३ ॥

रक्तमोक्षण के बाद पथ्य -- अशुद्ध रक्त के निकल जाने पर जो अन्न - पान न अधिक गर्म हो, अधिक ठंढा हो, हलका हो और अग्नि को उद्दीप्त करने वाला हो, वह हितकारी होता है । रक्त निकलने के बाद शरीर में रक्त स्थिर नहीं रहता है । इसलिये उस समय विशेष रूप से अग्नि की रक्षा करनी चाहिये ॥ २३ ॥

विमर्श - अशुद्ध रक्त के निकलने पर रक्त की मात्रा शरीर में कम हो जाती है । रक्त की अल्पता के कारण अग्नि मन्द हो जाती हैं यथा - ' धातुक्षयात् स्रुते रक्ते मन्दः सञ्जायते-नल: ' ( सु. सू. अ. १४ ) । इसलिये अग्नि की रक्षा अत्यन्त आवश्यक होती है । यदि अतिशीत अन्न - पान का सेवन किया जाय तो मन्दाग्नि हो जाती है । यदि अत्यन्त उष्ण अन्न - पान का

पृष्ठ 538

चरक संहिता हिन्दी भाष्य, पृष्ठ 538 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

विधिशोरिणतीयाध्यायः २४ ] सूत्रस्थानम् ४४६ सेवन किया जाय तो रक्त जमता नहीं हैं और अधिक मात्रा में निकल जाता है । इसलिये न अधिक गर्म, न अधिक शीत अन्न - पान देने का और यदि गुरु अन्न का सेवन किया जाय तो आदेश किया है । उस समय अग्नि मन्द रहती है उसका पाचन नहीं हो पाता है, इसलिये लघु, दीपनीय अन्न का सेवन करना चाहिये, ऐसा आदेश दिया है ।

प्रसन्नवर्णेन्द्रियमिन्द्रियार्थानिच्छन्त मध्याहतपक्तृवेगम् ।

सुखान्वितं तु ( पु ) ष्टिबलोपपन्नं विशुद्ध रक्तं पुरुषं वदन्ति ॥ २४ ॥

शुद्ध रक्त वाले व्यक्तियों के लक्षण - जिन व्यक्तियों के शरीर का वर्ण ( रूप ) प्रसन्न हो, इन्द्रियाँ स्वस्थ हों, इन्द्रियाँ अपने शब्दादि विषयों को उचित रूप से ग्रहण करती हों, जिसकी जठराग्नि पाचन - क्रिया करने में समर्थ हो और मल - मूत्र का वेग उचित रूप से निकलता हो और जो सुख से युक्त हो ( आरोग्य हो ) तथा पुष्टि और वल से युक्त हो, तो वह शुद्ध रक्त वाला कहा जाना है ॥ २४ ॥

यदा तु रक्तवाहीन रससंज्ञावहीनि च । पृथक् पृथक् समस्ता वा स्रोतांसि कुपिता मलाः ॥

मलिनाहारशीलस्य रजोमोहावृतात्मनः । प्रतिहत्यावतिष्ठन्ते जायन्ते व्याधयस्तदा ॥२६ ॥

मदमूर्च्छायसंन्यासास्तेषां विद्याद्विचक्षणः । यथोत्तरं बलाधिक्यं हेतुलिङ्गोपशान्तिषु ॥२७ ॥

( २ ) मद - मूर्च्छा - संन्यास प्रकरण म. मूर्च्छा और संन्यास रोग की सम्प्राप्ति - मलिन आहार करने वाले जिस मनुष्य की आत्मा रज और मोह से युक्त है ऐसे पुरुषों के शरीर में जब कुपित हुये वात, पित्त, कफ अलग - अलग या समस्त दोष रक्तवाही रसवाही, संज्ञावाही स्रोतों को अवरुद्ध कर रुक जाते है तो मद, मूर्च्छा, संन्यास इन तीनो व्याधियों को उत्पन्न करते हैं । इन तीनों रोगों में हेतु ( निदान ), लिंग ( लक्षण ), उपशान्ति ( उपशय ) में मद से मूर्च्छा और मूर्च्छा से संन्यास अधिक बलवान् होता है ॥ २५-२७ ॥ विमर्श -- ये तीनों रोग मूर्च्छा के ही अवस्था भेद हैं । जब मूर्च्छा उत्पन्न करने वाले दोष अल्पमात्रा में कुपित होकर रक्तवह, रसवह और संज्ञावह स्रोतों में अल्प रूप में अवरोध उत्पन्न करते हैं तो मद और मध्य रूप में कुपित दोष जब उन स्रोतों को अवरुद्ध करते हैं तो मूर्च्छा और जब अधिक रूप में कुपित दोष उन स्रोतों को अवरुद्ध करते है तो संन्यास रोग उत्पन्न होता है । ये तीनों रोग मानसिक रोग हैं । रजोगुण, मोह ( तमोगुण ) से जब आत्मा ( मन ) आवृत होती है तब ये रोग उत्पन्न होते है । रज और तम ये दोनों दोष मन के होते हैं और इनका प्रभाव मन पर पड़ने के बाद आत्मा पर पड़ता है । मन के प्रभावित होने से इसे मानसिक रोग कहा जाता है । दुर्बलं चेतसः स्थानं यदा वायुः प्रपद्यते । मनो विक्षोभयञ्जन्तोः संज्ञां संमोहयेत्तदा ॥२८ ॥

पित्तमेवं कफश्चैवं मनो विक्षोभयन्नृणाम् । संज्ञां नयत्याकुलतां विशेषश्चात्र वक्ष्यते ॥२ ९ ॥ ( क ) मदरोग मद रोग की सम्प्राप्ति - अपने कारणों से प्रति वायु, दुर्बल मन के स्थान हृदय या मनोवाही स्रोत में प्रवेश करती है तो मन को धुब्ब करती हुई प्राणियों की संज्ञा ( ज्ञान ) को नष्ट कर देती हैं । इसी प्रकार पित्त और कफ, दुर्बल हृदय में जाकर मन को क्षुब्ध करते हुये ज्ञान को नष्ट कर देते है जिससे मद रोग की उत्पत्ति होती है ॥ २८-२९ ॥ १. ' संज्ञावहानीति संज्ञा हेतुमनोवहानि ' चक्रः । २६ च ० सं ०

पृष्ठ 539

चरक संहिता हिन्दी भाष्य, पृष्ठ 539 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

४५० चरकसंहिता विमर्श - मद को अन्यत्र मोह कहा गया है । इसमें मनुष्य ज्ञानशून्य होकर गिरता नहीं है अपितु केवल ज्ञानशून्य होकर स्वस्थावस्था में बैठा या सोया रहता है । इसमें पूर्ण बेहोशी नहीं होती है । किसी विशेष कारणवश जब हृदय दुर्बल होता है तभी यह रोग होता है । यदि हृदय दुर्बल नहीं है तो दोषों के वहाँ प्रविष्ट होने पर भी यह रोग नहीं होता है । मन का स्थान हृदय होता है यह आयुर्वेद का सिद्धान्त है जैसा कि सुश्रुत ने बनाया है यथा- ' हृदयं चेतनास्थानमुक्तं सुश्रुत! देहि-नान् ' ( सु. शा. अ. ४ ) । पर आधुनिक वैज्ञानिक चेतना ( मन ) का स्थान मस्तिष्क को मानते हैं पर आयुर्वेद की दृष्टि से हृदय को मन का स्थान मानना अधिक उपयुक्त है । गर्भावस्था में मस्तिष्क की उत्पत्ति के पूर्व हृदय का निर्माण होता है, मस्तिष्क के अभाव में भी गर्भ में चेतना रहती है इसीलिये गर्भ में स्पन्दन किया की प्रतीति होती है । गति चेतना का द्योतक है, चेतना के अभाव में गति का भी पूर्ण अभाव रहता है, यदि चेतना मस्तिष्क के अधीन है तो मस्तिष्क के अभाव में चेतना का द्योतक गति की सत्ता नहीं होनी चाहिये । पर हृदय के निर्माण के पूर्व गति नहीं रहती और स्पन्दन की प्रतीति भी नहीं होती है इस तरह हृदय के अभाव में चेतना का अभाव और हृदय के उत्पन्न होने पर चेतना का रहना, इस युक्ति से हृदय को चेतना का स्थान आयुर्वेद मानना है । मस्तिष्क को भी आयुर्वेद चेतना का स्थान मानना है पर उसे प्रधान रूप से न मान कर गौण रूप मानना है | चेतना मन के अधीन है नन का कार्य करने का स्थान मस्तिष्क है, जब तक मन मस्तिष्क में रह कर अपने कार्यों को करना है तब तक मस्तिष्क चेतना का आधार होता है, पर विश्राम काल में मन जब अपने मूल स्थान हृदय में चला जाता है तो मस्तिष्क चेतना का आधार नहीं रह जाता है । किन्तु उस काल में हृदय ही केवल चेतना का स्थान होता है । मन का प्रधान रूप से स्थान हृदय है इसीलिये चेतना का स्थान हृदय ही माना जाता है और उसके दुर्बल होने पर मद, मूर्च्छा और संन्यास रोग उत्पन्न होते हैं । सक्तानल्पद्रुताभापं चलस्खलितचेष्टितम् । विद्याद्वातमदाविष्टं रूक्षश्यावारुणा कृतिम् ॥३० ॥

( १ ) वातिक मद के लक्षण - जो मनुष्य वातजन्य मद से पीड़ित होता है ह रुक - रुक कर, अस्पष्ट, अधिक और शीघ्रतापूर्वक वचन दोलता है । उसकी सारी चेष्टायें चंचल और अव्यवस्थित होती है । उसके शरीर की आकृति रूक्ष, श्याव, अरुण वर्ण की हो जाती है ॥ ३० ॥

सोधपरुषाभाषं संप्रहारकलिप्रियम् । विद्यात् पित्तमदाविष्टं रक्तपीतासिताकृतिम् ॥३१ ॥

( २ ) पैत्तिक मद के लक्षण – जो व्यक्ति पित्तजन्य नद से पीड़ित रहता वह क्रोधयुक्त, कठोर वचन बोलता है । मारपीट, लड़ाई - झगड़े में अधिक प्रेम रखता है, उसके शरीर की आकृति रक्त या पीत या काले वर्ण की हो जाती है ॥ ३१ ॥

स्वल्पासंबद्धवचनं तन्द्रालस्यसमन्वितम् । विद्यात् कफमदाविष्टं पाण्डुं प्रध्यानतत्परम् ॥ ( ३ ) इलैष्मिक मद के लक्षण - जो व्यक्ति कफजन्य मद से पीड़ित होता है वह थोड़ा-विना सम्बन्ध का वचन बोलता है । तन्द्रा और आलस्य से युक्त रहना है । शरीर का वर्ण पाण्डु हो जाता है । और सर्वदा किसी न किसी बात को सोचा करता है ॥ ३२ ॥

सर्वाण्येतानि रूपाणि सन्निपातकृते मदे । जायते शाम्यति क्षिप्रं मदो मद्यमदाकृतिः ॥ ( ४ ) सन्निपातज मद का स्वरूप - • सन्निपातज मद रोग में वातज, पित्तज, कफज के अलग-अलग जो लक्षण बनाये गये है वे सभी लक्षण एकत्र पाये जाते हैं । मद का स्वरूप - ये सभी प्रकार के मद -विकार मदिरा पीने पर जो मद ( नशा ) होता है उसी के स्वरूप के रोग होते हैं । ये शीघ्र ही उत्पन्न होते है और शीघ्र ही अच्छे हो जाते हैं ॥ ३३ ॥

१. सक्रोधं परुषाभाषम् ' इति पा. । २. ' निद्रा ' ग. ।

पृष्ठ 540

चरक संहिता हिन्दी भाष्य, पृष्ठ 540 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

विधिशोणितीयाध्यायः २४ ] सूत्रस्थानम् ४५१

यश्व मद्यकृतः प्रोक्तो विषजो रौधिरश्व यः । सर्व एते मदा नत वातपित्तकरुयात् ॥३४ ॥

अन्यमर - जो मदिरा पीने से उत्पन्न होने वाला या विष सेवन से उत्पन्न होने वाला या रक्त दूषित होने के कारण उत्पन्न होने वाला मद रोग होता है वह सभी मद रोग वात, पित्त, कफ इन तीन दोषों को छोडकर अन्य से नहीं होना है ॥ ३४ ॥

विमर्श - पर्य यह है कि मद चाहे मदिरा पीने से हो चाहे विष खाने से हो या रत के विकृत होने मे हो उन सभी में वात, पित्त, कफ ये ही तीन दोष होते हैं । उक्त इलोक में यह स्पष्ट कर दिया गया है कि प्रधानतः म रोग ३ कारणों से होता है । जैसे - ( १ ) मद्यज, ( २ ) विण्जन्य ( ३ ) रक्तविकारजन्य । नधुन में मूर्च्छा के प्रकरण में उक्त तीनों प्रकार के मदों का वर्णन मिलता है— ' पृथिव्यं गन्धच तन्मयः । तस्नाद्रक्तस्य गन्धेन मूर्च्छन्ति भुवि मानवा: ॥ द्रव्यस्वभाव इत्येके दृष्ट्वा यदभमुह्यति । गुणास्तीवारत्वेन स्थिनास्तु विषनद्ययोः ॥ ते एव तस्माज्जायेत मोहम्नाभ्यां यथेरितः । स्तब्धाङ्गदृष्टिस्वसृजा गुडोच्छ्वान मूर्च्छितः ॥ मयेन विलरश्छेत्रे नष्टविभ्रान्तमानसः । गात्राणि विक्षिपन भूमौ जरां यावन्न यानि नन् । वेपथुस्वकृष्णाः म्युः स्तम्भ विषमृच्छिते । वेदितव्यं तीव्रतरं यथास्त्रं विषलक्षणैः ॥ ' ( सु. उ. अ. ४६ ) । इम वर्णन से यह स्पष्ट हो जाता है कि इस मद का वर्णन कविर - विकारजन्य मद का है नयज तथा विषज का नहीं है । यहीं कारण है कि इस यि अध्याय में उसका वर्णन किया गया है । परन्तु सामान्य ज्ञान के लिये यह संकेत कर दिया है कि अन्य मद ( मद्य तथा विष ) भी वात पित्त, कफ तथा विमान के बिना नहीं होते । अतः उनका भी यहाँ अन्तर्भाव कर सकते हैं चक्रपाणि ने कहा है कि वातज, पित्तज, कफज और सन्निदानज भेद ने इनको चार - चार

प्रकारों से कर दिया है ।

नीलं वा यदि वा कृष्णमाकाशमथवाऽ‌गम् । पश्यंस्तमः प्रविशति शीघ्रं च प्रतिबुध्यते ॥

वेपथुश्चाङ्गमर्दश्च प्रपीडा हृदयस्य च । कार्थं श्यावाऽरुणाच्छाया सूच्छये वानसंभवे ॥३६ ॥

( ख ) सूर्छा रोग ( १ ) वानज मूर्च्छा के लक्षण - वानजन्य मूर्च्छा रोग में मूति होने के पहले आकाश को नीला, काला अथवा अन्य वर्ग का देखता हुआ व्यक्ति मूच्छित हो जाता है और शीघ्र ही पुनः होश में आ जाता है । मूर्च्छा - काल में शरीर में कम्पन, अंगमर्द, हृदय में पीड़ा, शरीर में कृशता, और शरीर का वर्ण काला या अरुण वर्ण का हो जाता है ॥ ३५-३६ ॥ विमर्श - मूर्च्छा होने के पहले रोगी के नेत्र के सामने नीला, काला या रक्त वर्ग का अन्धकार सहसा दिखाई पड़ता है । यह देख कर रोगी को यह ज्ञान हो जाता है कि मुझे मूर्द्धा आ जायेगी । आने के पहले शरीर में कम्प, अंगों का टूटना, हृदय में पीड़ा भी होती है । वातज मूर्च्छा से पीड़ित रोगियों में कृशता और काला या अरुण वर्ण शरीर में बना रहता है । अचेतनावस्था में इन लक्षणों का ज्ञान नहीं किया जा सकता अतः इस तरह की कल्पना करना उचित है कि वायु चंचल होता है वह शीघ्र ही दुर्बल हृदय में प्रवेश कर पुनः शीघ्र ही निकल आता है । हृदय से वायु के निकल जाने पर ज्ञान ठीक हो जाता है । रक्तं हरितवर्ण वा वियत् पीतमथापि वा । पश्यंस्तमः प्रविशति सस्वेदः प्रतिबुध्यते || ३७ || सपिपासः ससंतापो रक्तपीताकुलेत्क्षणः । संभिन्नवर्चाः पीताभो मूर्च्छाये पित्तसंभवे ॥३८ ॥

( २ ) पित्तज मूली के लक्षण - वित्तजन्य मूर्च्छा में आकाश को लाल, हरित वर्ग अथवा पीन वर्ण का देखने हुये नेत्रों के सामने अंधकार आ जाता है । जब रोगी होश में आता है तो १. ' कफाश्रयात् ' ग. ।