चरक संहिता हिन्दी भाष्य — पृष्ठ 541–550
चरक संहिता हिन्दी भाष्य · Chaukhamba · पृष्ठ 541–550
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४५२ चरकसंहिता उसके शरीर में पसीना आने लगता है, साथ ही प्यास और संताप का भी अनुभव करता है । नेत्र रक्त और पीत वर्ण के हो जाते हैं और नेत्र में व्याकुलता दिखाई पड़ती है । होश में आने पर पतला पुरीष निकलता है और सर्वदा शरीर का वर्ण पीला रहता है ॥ ३७-३८ ॥ मेघसंकाशमाकाशमावृतं वा तमोघनैः । पश्यंस्तमः प्रविशति चिराञ्च प्रतिबुध्यते ॥ ३ ९ ॥ गुरुभिः प्रावृतैरङ्गैर्यथैवार्द्रेण चर्मणा । सप्रसेकः सहृह्रासो मूर्च्छाये कफसंभवे ॥ ४० ॥
( ३ ) कफज मूर्च्छा के लक्षण - कफजन्य मूर्च्छा में मेघ से भरे हुये या घने अंधकार से घिरे हुये आकाश को देखते हुये उसके नेत्र के सामने तम प्रवेश करता है । देर से होश में आता है, होश आने पर जैसे गीले चमड़े से शरीर ढँक दिया गया है वैसा अनुभव करता है, मुख से लाल स्राव और मिचली अधिक आती है ॥ ३ ९ -४० ॥ विमर्श - कफ स्वयं तमः स्वरूप है इसी से रोगी आकाश को नेच्छन्न या अन्धकार से घिरा हुआ देखना है । कफ चिरकारी होता है क्योंकि वह स्थिर गुण वाला होता है इसीलिये देर में ज्ञान हो पाता है । बाक मोम गुण प्रधान होता है इसी लिये शरीर का अङ्ग - प्रत्यङ्ग गीले चमड़े से ढके हुये की तरह सुन प्रतीत होता है । इसमें लालास्राव और जी का नचलाना तो रहता ही है पर कभी कभी होश में आने पर वमन भी होने लगता है । सर्वाकृतिः सन्निपातादपरमार इवागतः । स जन्तुं पातयत्याशु विना बीभत्स चेष्टितैः ॥४१ ॥
( ४ ) सन्निधान मू के लक्षण - सन्निपातज मूच्ची में अलग - अलग बनाये गये वात, दिन्त, कफ के सभी लक्षन होते हैं और इसका वेग अपस्मार की तरह बिना भयंकर चेष्टाओं के किये हुये शीघ्र ही भाकर मनुष्य को मृच्छित कर देता है । ४१ ॥ विमर्श - मूर्च्छा उन शारीरिक अवस्था का नाम है जिसमें रोगी अचानक बेहोश ( संग्राहीन ) हो जाता है जो भयंकर परिणाम का सूचक होता है । यह अवस्था सामान्यतः मस्तिष्क प्रदेश में रक्ताल्पता ( Aneamia of the Brain ) के कारण होती है । इसका कारण प्रायः रक्त-वाहनियों की अथवा हृदय की ( Vascular and Cardiac ) विकृति होती है । रक्त वाहिनियों की विकृति में रक्तचाप ( Blood Pressure ) का अत्यधिक न्यून हो जाना तथा हृदय की विकृतियों में मस्तिष्क प्रदेश में रक्तानुधावन को यथेष्ट रखने की अक्षमता, प्रधान है । ( १ ) रक्तवाहिनी विकृतिजन्य मूर्च्छा ( Syncope ) 1- . ( क ) इसमें प्रायः रोगी जब अचानक खड़ा होता है तब बेहोश हो जाता है । यह मूर्च्छा विशेषकर भोजनोपरान्त होती है जब औद रक्तवाहिनियों में रक्त का संचार अधिक हो जाता है और वह किसी कारणवश हृदय की ओर नहीं लौटना है जिससे मस्तिष्क प्रदेश में रक्त की कमी हो जाती है । इस स्थिति की मूर्च्छा ( Postural syncope ) प्रौढ़ पुरुषों को अधिक हुआ करती है । ( ख ) यह अत्यधिक काल तक किसी भयंकर रोग से पीड़ित रहने पर तथा अत्यधिक थकान्ट के बाद रक्तवाहिनी एवं प्राणदा नाडी की विकृति ( Vago - vagal attack ) के कारण भी होती है । यह अत्यधिक पोडावश तथा अकस्मात् शोकावात आदि से नाडियों में अनावश्यक उत्तेजना ( Nervous excitement ) से दुर्बल एवं अपतन्त्रित व्यक्ति तथा हृदय विकार ( Aortic regurgitation ) से युक्त पुरुष को भी होती है । इस रोग के उत्पन्न होने के सचेतक चिह्न विचित्र होते हैं । इसका वर्णन वातादि के लक्षण में कर चुके है । रोगी को अनुभव होता है कि वह डूब रहा है ( Sinking feeling ), उसे मिचली आती है और ऐसा प्रतीत होता है कि वह मल - त्याग के लिये वेगित है । १. ' तमोधनैरिति तमोभिर्धेनेश्व ' चक्रः । २. ' बिना बीभत्स चेष्टितरिति दन्तखादनाङ्गविक्षेपणादिकं विना चक्रः ।
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विधिशोणितीयाध्यायः २४ ] सूत्रस्थानम् ४५३ शिर में चक्कर और आँखों के सम्मुख अँधियारा अनुभव होने लगता है और वह बेहोश हो जाता है । त्वचा का रंग पीला हो जाता है और स्वेद अधिक होता है । नाही की चाल धीमी हो जाती है । यहाँ तक कि कभी - कभी प्रति मिनट तीस तक हो जाती है । चार अत्यधिक गिर जाना है । हृदय की गति का मन्द होना प्राडा नाडियों के अत्यविक कार्यशील होने के कारण तथा रक्तचाप की कमी और औदर्य वाहिनियों के फैलाव तथा रक्तवाहिनियों के अनुप्राणित करने वाले ( Vasomoter Nerve ) नाडियों के मन्द प्रभाव के कारण होता है । इसका वेग प्रायः दो से दस मिनट तक रहना है परन्तु अरति तथा अवसाद घंटों तक बना रहता है । ( २ ) हृदय विकृतिजन्य मू - यह मूर्च्छा आंशिक हृदयादव ( Partial Heart Block ) जब पूर्ण होने लगती है तब होती है और जब अलन्द्रीय उत्तेजना ( Auricular Impulses ) निलयों तक नहीं पहुँच पानी और अनिन्दनिलयीय गति ( Auriculo ventricular rhythm ) का श्रीगणेश नहीं होता तब मिल्यों के कार्य का स्थगन होकर मूर्च्छा की स्थिति आ जाती है । अत्यधिक हृदय - स्पन्दन से भी नूर्च्छा हो जाती है इसमें हृदय के अन्यकालिक विस्तार के कारण निलय में रक्त पर्याप्त नहीं पहुँच पाता है जिससे क्रमिक रक्तसंचार के लिए एक साथ पर्वात रक्त न मिलने से रक्तसंचार कम हो जाता है और मस्तिष्क प्रदेश में रक्ताल्पता हो जाती है जिसका परिणाम मूर्च्छा होती है । यह महाधमनी के विकार के कारण तथा हृदय के मांस पेशियों, स्नैहिक तथा सौत्रिक परिवर्तनों के कारण भी हो सकता है । * दोषेषु मदमूर्च्छायाः कृतवेगेषु देहिनाम् 1 । स्वयमेवोपशाम्यन्ति संन्यासो नौषधैर्विना ॥४२ ॥
* ( ग ) संन्यास रोग मद तथा मूर्च्छा से संन्यास की विशेषता - - देहधारियों में दोषों के वेग शान्त होने पर मद्य तथा मूर्च्छा तुरन्त शान्त हो जाते हैं । परन्तु संन्यास में दोषों का वेग ( दौरा ) औषधि के बिना शान्त नहीं होता अर्थात् जब तक होश में लाने के लिये औषधि नहीं दी जाती तबतक रोगी बेहोश रहता है || ४२ ॥ * वाग्देहमनसां चेष्टामाक्षिष्यातिवला मलाः । संन्यस्यन्त्यवलं जन्तुं प्राणायतनसंश्रिताः ॥४३ ॥
सना संन्याससंन्यस्तःकाष्ठीभूतो मृतोपमः । प्राणैर्वियुज्यते शीघ्रं मुक्त्वा सद्यः फलाः क्रियाः ॥ संन्यास की सम्प्राप्ति - प्राणयतन ( हृदय मस्तिष्क आदि ) में अधिक डुवे प्रबल दोष वाणी, देह और मन की चेष्टा को नष्ट कर निर्बल प्राणी को संन्यास रोग से पीड़ित करते हैं अर्थात् निःसंज्ञ कर देते है | वह संन्यास रोग से संन्यस्त ( निःसंज्ञ - बेहोश ) मनुष्य काठ के समान ( सर्वथा निश्चेष्ट ) तथा मरे हुये के सदृश हो जाता है । यदि इस रोग में मद्यः फल देने वाली ( आशुकारी ) चिकित्सा न की जाय तो वह शीघ्र ही प्राणों से रहित हो जाता है अर्थात् मर जाता है ॥ ४३-४४ ॥ विमर्श - उक्त ' सद्यः फलाः क्रियाः ' से शीघ्र प्रतिकार करने का संकेत किया है । ' प्राणायतन ' शब्द से यहाँ रक्तका ग्रहण करना ही उपयुक्त होगा क्योंकि यह प्रकरण रक्त का है । ' रक्तं जीव इति स्थितिः ' से रक्त को प्राणायतन स्वीकार किया जा चुका है । तथा ' प्राणः शोणितं ह्यनुवर्त्तते ' यह भी कहा जा चुका है । प्राणायतन से सिर या मस्तिष्क का भी ग्रहण किया जा सकता है । सिर में १. ' कृतवेगेष्विति वेगं कृत्वा क्षीणबलेपु, वेगो हि दोषाणां बलक्षयकारणं भवति, यदुक्तं विषम-ज्वरे ' कृत्वा वेगं गतबला ' इत्यादि ' चक्रः । ' हृतवेगेषु ' इति पा ० । २. ' प्राणायतनं हृदयम् ' चक्रः । ३. ' मुक्त्वेति अप्राप्य ' चक्रः ।
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४५४ चरकसंहिता संज्ञावह तथा चेष्टावह नाडियों के केन्द्र हैं और दोषों द्वारा उनके आक्रान्त होने पर मूर्च्छा, संन्यास आदि रोग होते है तथा १७ वें अध्याय में भी स्पष्ट कहा जा चुका है - ' प्राणाः प्राणभृतां यत्र श्रिताः सर्वेन्द्रियाणि च । यदुत्तमाङ्गमङ्गानां शिरस्तदभिधीयते ॥ ' इस अध्याय में ही कहा जा चुका है कि मद, मूर्च्छा और संन्यास में रक्तवह, रसवह तथा संज्ञावह स्रोतों को वात, पित्त, कफ तीनों दोप अवरूद्ध कर वहीं पर ठहर जाते है । हृदय को भी पहले प्राणायतन कहा ही ग्या है । आधुनिक चिकित्मक संन्यास को Apoplexy कहते है और इसके ३ प्रधान कारणों का निर्देश करते हैं - ( १ ) मन्तिष्क में रक्त का किसी प्रकार से स्थगन हो जाना ( Thrombosis ), ( २ ) मस्तिष्क में रक्तस्राव ( Haemmorhage ), ( ३ ) मस्तिष्कीय रक्तवाहिनी में अन्तःशल्यता ( Embolism ), जिनमें प्रथम दो धमनी की डीवालों के अपचय के कारण होती है, रक्त स्राव प्रायः किसी कारण से हुआ करता है अर्थात् किसी रोग विशेष में रक्तस्राव बढ़ जाता है, तब हुआ करता है । शल्य किसी - किसी आन्तरिक अवरोध का परिणाम होता है । रक्तस्राव निम्न कारणों से होता है । ( १ ) फिरङ्ग, ( २, धमनी की भित्तिका नंदम अपचय या ग्रन्थि, ( ३ ) रक्तचापाधिक्य के कारण धमनीप्रतिक्षय, ( ४ ) व्रणशोथजन्य परिवर्तन, ( ५ ) मस्तिष्क में अबुई या अभिधान, ( ६ ) चिरस्थायी न्यून रक्तचाप, ( ७ ) रक्तविकार ( पाण्डु, कामला आदि ) । दुर्गेऽम्भसि यथा मजद्भाजनं त्वरया बुधः । गृह्णीयात्तलमप्राप्तं तथा संन्यासपीडितम् ॥ संन्यास रोग की चिकित्सा में दृष्टान्त - जिस प्रकार अधिक गहरे जल वाले कूप या नदी में डूबते हुए पात्र को जब तक वह जल के अन्तस्तल तक न पहुँच जाय तब तक ही उसे विद्वान् शीघ्र ही निकाल लेना है, ठीक इसी प्रकार संन्यास रोग से पीड़ित रोगियों की चिकित्सा जब तक दोष गहराई में नहीं पहुंचते हैं उसके पूर्व ही कर लेनी चाहिए ॥ ४५ ॥
* अञ्जनान्यवपीडाश्च धूमाः प्रधमनानि च । सूचीभिस्तोदनं शस्तं दाहः पीडा नखान्तरे ॥
लुञ्चनं केशलोम्नां च दन्तैर्दशनमेव च । आत्मगुप्तावघर्षश्च हितं तस्याववोधने ॥ ४७ ॥
संन्यास रोग में आशुलाभकारी उपाय - तीक्ष्ण अञ्जन, अवपीड, धून, प्रधमन, सुहद्वारा शरीर में छेद कर पीडा पहुंचाना, शरीर प्रदेश में दाह, नख के भीतर सुइ चुभोना, केश और लोगों को नोचना, दोनों ने काटना, केवॉच के फल को शरीर में रगड़ देना, इन सब क्रियाओं को कर देने से शीघ्र ही रोगी को होश हो जाता है ॥ ४६-४७ ॥ विमर्श - ऊपर बनाए हुए सभी उपाय संन्यास रोग में या सामान्यतः सभी प्रकार के मूर्च्छा रोग में शीघ्र होश में लाने के लिए हैं, इन क्रियाओं द्वारा मस्तिष्क पर प्रभाव पर होकर किसी शरीर की प्रसुप्त प्रत्यावर्तन क्रिया में उत्तेजना होती है । प्रत्यावर्तन क्रिया शरीर किया प्रकार के भी आघात आदि के लगने पर प्रारम्भ हो जाती है और यही प्रत्यावर्तन चेन्नता का सूचक है । वाग्भव में बिच्छू से काटने का भी आदेश है यथा - ' अनुप्रयोज्यं संन्या दंशो सुतीक्ष्णं नस्यमञ्जनम् । धृन्: प्रथमनं वः सूचीभिश्च नखान्तरे ॥ केशानां लुञ्चनं दाहो दशनवृद्धिकैः । ( वा. चि. अ. ७ ) संमृच्छितानि तीच्णानि मद्यानि विविधानि च । प्रभूतकटुयुक्तानि तस्यास्ये गालयेन्मुहुः ४ ९ ॥ ॥ मातुलुङ्गरसं तन्महौषधसमायुतम् । तद्वत् सौवर्चलं दद्याद्यतं मद्याम्लकाञ्जिकैः ॥ ॥ ५० ॥
हिङ्गपणसमायुक्तं यावत् संज्ञाप्रवोधनम् । प्रबुद्धसंज्ञमन्नेश्च लघुभिस्तमुपाचरेत् और भी - ( १ ) अनेक प्रकार के ताक्ष्ण मद्यों को एकत्र मिलाकर उसमें कटु द्रव्य चाहिए जस । मरिच का चूर्ण प्रभृत मात्रा में मिलाकर मूच्छित व्यक्ति के मुख में बार - बार डाल देना १. ' गालयेदिति यत्नेन मुखे प्रक्षिपेत् ' चक्रः ।
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विधिशोणितीयाध्यायः २४ ] सूत्रस्थानम् ४५५ ( २ ) इसी तरह मातुलुङ्ग ( बिजौरा ) नीबू का रस निकाल कर उसमें सोंठ का चूर्ण मिलाकर मूच्छित व्यक्ति के मुख में डाल देना चाहिए । ( ३ ) मद्य, अम्लरस और काजी में सोंचर नमक, अशुद्ध हींग और निप्पली का चूर्ण मिलाकर मूच्छित व्यक्ति के मुख में डालना चाहिए । इन उपायों का प्रयोग तब तक करना चाहिए जब तक रोगी होश में न आ जाय । जब रोगी अपनी पूर्ण चेतना अवस्था को प्राप्त हो जाय तो लघु ( हल्का ) अन्न खिलाते हुए उसकी सेवा करनी चाहिए ॥ * विस्मापनैः स्मारणैश्च प्रियश्रुतिभिरेव च । पटुभिर्गीतवादित्रशब्दैचित्रैश्व दर्शनैः ॥ ५१ ॥
संसनोल्लेखनैर्धूमैरञ्जनैः कवलग्रहैः । शोणितस्यावसेकैश्च व्यायामोदर्पणैस्तथा ॥ ५२ ॥
प्रवुद्धसंज्ञं मतिमाननुबन्धमुपक्रमेत् । तस्य संरक्षितव्यं हि मनः प्रलयहेतुतः ॥ ५३ ॥
और भी: - आश्चर्य उत्पन्न करने से, किसी मनोनुकूल विषय को स्मरण दिलाने से, यि शब्दो को सुनने से, चतुर व्यक्तियों के गाना बजाना आदि के विचित्र शब्दों को सुनने से, विचित्र अद्भुत वस्तुओं को देखने से, तीक्ष्ण विरेचन से, तीक्ष्ण वमन से, तीक्ष्ण धूम के सेवन से, तीक्ष्ण अञ्जन लगाने से, कवलग्रह से, रक्तमोक्षण से, व्यायाम से तथा उद्धर्षण क्रिया से रोगी जब होश में आ जाय तो अनुवन्ध रूप में जो भी उपद्रव हो उसके अनुसार चिकित्सा करें । होश में आ जाने पर रोगी के मन में आवान किसी भी कारण से न होने पाए इसका ध्यान देते हुए उसके मन की रक्षा करनी चाहिए ॥ ५१-५३ ॥ विमर्श - ' अञ्जनान्यवपीडाश्च ' से लेकर ' व्यायामोद्धर्षणैस्तथा ' यहाँ तक के सभी उपाय मूच्छित व्यक्तियों को शीघ्र होश में लाने के लिए सद्यः लाभप्रद चिकित्सा हैं । पर इन उपायों से स्थायी लाभ नहीं होता है इसी लिए बताया है कि- ' प्रबुद्धसंशं मतिमाननुबन्धमुपक्रमेत् । अतः स्थायी लाभ के लिए वातादि दोष और दृष्य आदि का विचार कर चिकित्सा करनी चाहिए । पर सर्वदा रोगी के मन का ध्यान रखना चाहिए । अर्थात् किसी भी प्रकार उसका मन चिन्ता - शोक ग्रस्त न होने पाए और इनसे मन की रक्षा करते रहें । अन्यथा मन के आघातग्रस्त होने पर पुनः रोग अनुवर्तन कर जाता है और मूर्च्छा का वेग आने लगता है । यह मानसिक रोग है अतः मन को बलवान् बनाना चाहिए । * स्नेहस्वेदोपपन्नानां यथादोषं यथाबलम् । पञ्च कर्माणि कुर्वीत मूर्च्छायेषु मदेषु च ॥५४ ॥
मद और मूर्च्छा में पञ्चकर्म चिकित्मा - मद और मूर्च्छा रोग से पीड़ित रोगियों का सर्वप्रथम स्नेहन और स्वेदन कर्म कराकर दोप के अनुसार और रोगी के बल के अनुसार पञ्चकर्म कराना चाहिए ॥ ५४ अष्टाविंशत्योपधस्य तथा तिक्तस्य सर्पिषः । प्रयोगः शस्यते तद्वन्महतः षट्पलस्य वा ॥५५ ॥
त्रिफलायाः प्रयोगो वा सघृतक्षौद्रशर्करः । शिलाजतुप्रयोगो वा प्रयोगः पयसोऽपि वा ॥
पिप्पलीनां प्रयोगो वा पयसा चित्रकस्य वा । रसायनानां कौम्भस्य सर्पिषो वा प्रशस्यते ॥ रक्तात्रसेकाच्छास्राणां सतां सच्ववतामपि । सेवनान्मदमूर्च्छायाः प्रशाम्यन्ति शरीरिणाम् ॥ और भी - २८ ओपावया का जो पानीयकल्याग घुट उन्माद प्रकरण में बनाया जायगा या तिक्त घृत जो कुछ अधिकार में कहा जायगा उनका प्रयोग, महानिक घृत या पट्पल घृत या त्रिफला का प्रयोग घृत. मधु, चीनी के साथ, या दूध के साथ शिलाजुन का प्रयोग, या केवल दूध का प्रयोग या दूध के साथ पिप्पली का प्रयोग या दूध के साथ चित्रक का प्रयोग, या १. ' ततः स रक्षितव्यो हि मनःप्रलयहेतुतः ' ग. । २. ' अष्टाविंशत्यौषधस्येति पानीयकल्याणस्य ' चक्रः । ३. ' कौम्भस्य दशाब्दिकस्य चक्रः ।
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४५६ चरकसंहिता रसायन द्रव्यों का प्रयोग, या कौम्भ घृत ( जो दस वर्ष का पुराना होता है ) का प्रयोग मद और मूर्च्छा रोग में उत्तम माना जाता है । मद और मूर्च्छा रोग रक्तमोक्षण करने से धर्म शास्त्रों, सज्जन पुरुषों और जितेन्द्रिय पुरुषों की सेवा करने से शान्त हो जाते हैं ॥ ५५-५८ ॥ विमर्श - मद और मूर्च्छा रोग मानसिक रोग हैं । इन रोगों में मन को पुष्ट एवं प्रसन्न रखना परम आवश्यक है । सामान्यतः जिनने मानसिक रोग होते है उनमें बनाई हुई औषद चिकित्सा परस्पर सभी मानसिक रोगों में चलती है । यहाँ भी उन्माद, अपस्मार और रविकृति ने बनाई हुई औषवियों के प्रयोग करने का आदेश दिया है । प्रायः मानसिक रोग में रक्त में उष्णता बढ़ जाती है इसलिये रक्तमोक्षण का आदेश दिया है । शिलाजीत आदि औषधों का रसायनविवि से प्रयोग करने का तात्पर्य मनको पुष्टि करने से है । अच्छे - अच्छे धार्मिक पुस्तकों का अध्ययन, सज्जन और जितेन्द्रिय पुरुषों का संसर्ग मन को शान्त करने वाले होते हैं । इसलिये धर्मशास्त्रों का अध्ययन और सज्जनों का साथ करने का आदेश दिया गया है । मूल में दूध का प्रयोग करना बताया है । पर केवल दूध का प्रयोग का तात्पर्य केवल दुग्धाहार पर रखना होता है । यह नद, मूर्च्छा के रोगियों के लिये उचित नहीं प्रतीत होता, सुश्रुत ने – ' सिद्धानि वर्गे मधुरे पयांसि ' यह उत्तर तन्त्र के ४६ वें अध्याय में बताया है, उसके अनुसार मधुर वर्ग ते सिद्ध किये हुए दूध का प्रयोग करना चाहिये । कौम्भसर्पिः- दस वर्ष पुराने घृत का नाम है और सुश्रुत ने – ' एकादशशतं चैव वत्सरानुषितं घृतम् । रक्षोघ्नं कुम्भसर्पिः स्यात् परतस्तु महाघृतम् ॥ ' अर्थात् २११ वर्ष के पुराने घृत का नाम कौम्भसर्पिः होता है । कुछ लोग - ' स्थितं वर्षशतं श्रेष्ठं कौम्भं सर्पिस्तदुच्चते ' अर्थात् एक सौ वर्ष के पुराने घृत का नाम कौम्भसर्पिः मानते हैं । पुराने घृत का गुण बताने हुये सुश्रुत ने बताया है — ‘ सर्पिः पुराणं तिमिर प्रतिश्याश्वासकासनुत् । मूर्च्छाच्छद्दिविषोन्मादमहापस्मारनाशनम् ॥ ’ ( सु. सू. अ. ४५ ) अर्थात् पुराना घृत तिमिर, जुकाम, श्वास, कास, मूर्च्छा, वमन, विष, उन्माद, मद, अपस्मार को दूर करने वाला होता है । अतः यह कुम्भ सर्पिः अपने प्रभाव से मद और मूर्च्छा को दूर करने वाला होता है । तत्र श्लोकौ -विशुद्धं चाविशुद्धं च शोणितं तस्य हेतवः । रक्तप्रदोषजा रोगास्तेषु रोगेषु चौषधम् ॥५ ९ ॥ मदमूर्च्छायसंन्यासहेतुलक्षणभेषजम् । विधिशोणितकेऽध्याये सर्वमेतत् प्रकाशितम् ॥६० ॥
इत्यनिवेशकृते तत्रे चरकप्रतिसंस्कृते सूत्रस्थाने योजनाचतुष्के विधिशोणितीयो नाम चतुर्विंशतितमोऽध्यायः ॥ २४ ॥
अध्यायगत विषयों का उपसंहार - इन विधिशोणितक नानक अध्याय में विशुद्ध रक्त और अविशुद्ध रक्त, शुद्ध - अशुद्ध रक्त के कारण, रक्त दोष से उत्पन्न होने वाले रोग, उन रोगों में औषध का विधान, मद, मूर्च्छा, संन्यास रोगों के कारण, लक्षण और औषध वे सभी बातें प्रकाशित की गई है अर्थात् स्पष्ट रूप से वर्णित की गई हैं ॥ ५ ९ -६० ॥ चरक के द्वारा प्रतिसंस्कृत अग्निवेशकृत तन्त्र ( चरक संहिता ) के सूत्रस्थान में योजनाचतुष्क-विषयक ' विधिशोणितीय ' नामक चौबीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ || २४ ||
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यज्जः पुरुषीयाध्यायः २५ ] सूत्रस्थानम् अथ पञ्चविंशतितमोऽध्यायः अथातो यज्जःपुरुषीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्माह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
४५७ अव ( योजनाचतुष्क के बाद ) चरजःपुरुषीय अध्याय की व्याख्या की जायगी जैसा कि भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥ १-२ ॥ विमर्श - इस अध्याय का नाम ' यजः पुरुषीय ' होने में चक्रपाणि का मत अग्रांकित है । पूर्वोक्त योजनाचतुष्क ( अ. २२ ) में चिकित्सा के ६ उपक्रम बताये गये हैं । वे चिकित्सायें अन्न - पान के द्वारा ही व्याविहरण में समर्थ होती हैं । अतएव संक्षेप में अन्न - पान गुण को बतलाने वाला यह अध्याय है, इसमें भी प्रारम्भ में पुरुष तथा व्याधि के कारणों का विचार है तथा उसके बाद प्रश्नावतार के रूप में आहार के गुणों का वर्णन किया है । ' यज्ञः पुरुष ' - जिससे पुरुष उत्पन्न हो -- इस प्रश्न को लेकर जिस अध्याय का निर्माण हुआ हो वह यज्जः पुरुषीय अध्याय है । पुरा प्रत्यधर्माणं भगवन्तं पुनर्वसुम् । समेतानां महषीणां प्रादुरासीदियं कथा ॥ ३ ॥
आत्मेन्द्रियमनोर्थानां योऽयं पुरुषसंज्ञकः । राशिरस्यामयानां च प्रागुत्पत्तिविनिश्चये ॥ ४ ॥
( १ ) राशिपुरुषोत्पत्ति तथा रोगोत्पत्ति - विषयक सम्भाषा - परिषद् ( Symposium on Origin of Man & Disease ) सम्भाषापरिषद् का उद्देश्य - प्राचीन काल में जिसने धर्म का प्रत्यक्ष कर लिया है, ऐसे भगवान् पुनर्वसु के पास एकत्र हुये महर्षियों के बीच में आत्मा, इन्द्रिय, मन और उनके अर्थों का जो यह समुदाय पुरुष है, उसके और रोगों की प्रथम उत्पत्ति के कारणों को निश्चय करने के लिये यह कथा प्रारम्भ की गई ॥ ३४ ॥
विमर्श - जब - जब देशों में रोगों की बाढ़ हुई है और जनता पीड़ित हुई है तब - तब महर्षियों की सभा प्राचीन काल में होती आई है और परस्पर वाद - विवाद के द्वारा वे लोग उसे हल करते आये हैं । यह सभा भी उसी तथ्य का सूचक है । यहाँ यह कथा प्रारम्भ की गई है कि आत्मा, इन्द्रिय, मन, अर्थ के समुदाय स्वरूप इस पुरुष की तथा इस पुरुष में होने वाले रोगों की उत्पत्ति किस प्रकार हुई । यद्यपि रोगों की उत्पत्तिका कारण, लक्षण, चिकित्सा आदि सृष्टि की उत्पत्ति के पूर्व ही ब्रह्मा ने बना दी है यथा- ' अनुत्पाद्यैव प्रजाः श्लोकशतसहस्रमध्यायसहस्रञ्च कृतवान् स्वयम्भूः । ' ( सू. अ. १ ), फिर भी समय - समय पर तत्कालीन विद्वान एक गोष्ठी कर नूतन और विस्तृत मार्ग अपनाया करते थे । इस सभा में भी सर्वप्रथम पुरुष और रोगों की उत्पत्ति
कैसे हुई इस पर प्रकाश डाला गया है ।
तदन्तरं कौशिपतिर्वामको वाक्यमर्थवित् । व्याजहारर्षिसमितिमुपसृत्याभिवाद्य च ॥५ ॥
* किं नु भोः पुरुषो यज्जतजास्तस्यामयाः स्मृताः । न वेत्युक्ते नरेन्द्रेण प्रोवाचर्षीन् पुनर्वसुः ॥ सर्व एवामितज्ञानविज्ञानच्छिन्नसंशयाः । भवन्तश्छेत्तुमर्हन्ति काशिराजस्य संशयम् ॥ ७ ॥
१. प्रत्यक्षधर्माणं साक्षात्कृतधर्माणं, सुदृढेन प्रमाणेनावधारिता अर्था येन स साक्षात्कृतधर्मा । २. ‘ उपासताम् ' ग.; ' महर्षय उपासीनाः प्रादुश्चक्रुरिमां कथाम् ' इति पा. । ३. ' अथ काशिपतिर्वाक्यं वामकोऽर्थवदन्तरा ' इति पा । ४. ' मभिष्टुत्या ' ग. । ५. " स्यात् ' इति पा ० । ६. ' तत एव पुरुषजनकात् कारणाज्जातास्तज्जाः ' चक्रः ।
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४५८ चरकसंहिता काशीपति वा क का प्रस्ताव - जब पुरुष और रोगों की प्रथम उत्पत्ति के विषय में प्रश्न उपस्थित किया गया तो ऋषियों की सभा में आगे आकर और ऋषियों का अभिवादन करके अर्थवेत्ता, काशीपति वामक ने कहा कि क्या जिन कारणों से पुरुष उत्पन्न होता है, उन्हीं कारणों से पुरुषों के रोग भी उत्पन्न होते हैं अथवा नहीं? इस प्रकार राजा वामक के प्रश्न उपस्थित करने पर भगवान् पुनर्वसु ने ऋषियों को सम्बोधित कर कहा कि अपरिमित ज्ञान और विज्ञान से नष्ट हो गये हैं सन्देह जिनके ऐसे आप सभी महर्षिगण काशिराज के सन्देह को दूर करने में समर्थ है |
पारीक्षिस्तत् परीक्ष्याग्रे मौद्गल्यो वाक्यमब्रवीत् ।
आत्मजः पुरुषो रोगाश्चात्मजाः कारणं हि सः ॥ ८ ॥
स चिनोत्युपभुङ्क्ते च कर्म कर्मफलानि च । नह्यते चेर्तनाधातोः प्रवृत्तिः सुखदुःखयोः ॥९ ॥
( १ ) मौल्य पारीक्षि का पक्ष - इस प्रकार आत्रेय पुनर्वसु के आदेश देने पर सर्व-प्रथन मुदगलगोत्र में उत्पन्न पारोक्षि नामक ऋषि ने राजा के वचन को भली प्रकार विचार कर बोले पुरुष आत्मज होता है और रोग भी आज होते हैं । आत्मा को ही पुरुष और रोग इन दोनों का कारण माना जाता है । आत्मा ही कर्म को करता है इसलिए उस कर्म के फलों को वह स्वयं भोगता है बिना आत्मा के मुख और दुःख की प्रवृत्ति नहीं होती है ॥ ८ - ९ ॥ विमर्श - तात्पर्य यह है कि इस चराचर जगत् में आत्मा स्वतन्त्र है, स्वतन्त्र व्यक्ति जैसा कार्य करता है वैसा फल उसे मिलता है । पुरुष ( चतुर्विंशतितत्त्वात्मक ) परतंत्र है अर्थात् आत्मा के अधीन है, मन से युक्त आत्मा अच्छा या बुरा जो कुछ कार्य करता है उसी के अनुसार पुरुष शरीर धारण करता है और शरीर को ही आयुर्वेद शास्त्र में पुरुष माना है उस शरीर के द्वारा ही आत्मा सुख - दुःख का अनुभव करता है अर्थात् जब आत्मा अच्छा कार्य करता है तो सुखी रहता हैं । और जब युग कार्य करता है तो दुखी रहता है । सुन्न का ही नाम आरोग्य और दुःख का ही नाम रोग है । जिस प्रकार अपने कर्तव्य के अनुसार आत्मा शरीर धारण कर पुरुष बनता है उसी प्रकार अपने कर्तव्य के अनुसार दुःख प्राप्त करता है और रोगी होता है । इस प्रकार शरीर और रोग इन दोनों का कारण आत्मा है और यह पारीक्षि ने सिद्ध किया है क्योंकि बिना आत्मा के स्वस्थ रहना अर्थात् सुखी रहना, अस्वस्थ रहना अर्थात् दुखी होना सम्भव नहीं है । यह बात ' कविधा पुरुषीय ' अध्याय में स्पष्टरूप से बनायी जायगी यथा - ' भारतमः सत्यमनृतं वेदाः कर्म शुभाशुभम् । न स्युः कर्ता वेदिना च पुरुषो न भवेद्यदि । नाश्रयो न सुखं नातिने गतिर्नागतिर्न वाक् । न विज्ञानं न शास्त्राणि न जन्म मरणं न च ॥ न वन्धो न च मोक्षः स्यात् पुरुषो न भवेद्यदि । कारणं पुरुषस्तस्मात् कारणग्दाहृतः ॥ न चेत् कारणमात्मा स्याद्भादयः स्युरहेतुकाः । ” ( च. शा. अ. १ ) । & शरलोमा नु नेत्याह न ह्यात्माऽऽत्मानमात्मना । योजयेद्व्याधिभिर्दुःखैर्दुःखद्वेषी कदाचन ॥
रजस्तमोभ्यां तु मनः परीतं सवसंज्ञकम् । शरीरस्य समुत्पत्तौ विकाराणां च कारणम् ॥
( २ ) शरलोमा का पक्ष - इस प्रकार पाक्षि के उत्तर को सुनकर शरलोमा ने कहा कि यह कहना उचित नहीं है, दु: ख से द्वेष करने वाला आत्मा स्वयं अपने आप को दु: ख देने वाले रोगों से युक्त करेगा यह कदापि सम्भव नहीं है इसलिए सत्य संज्ञक मन जब रज और तम से युक्त होता है तो वह शरीर और रोगों की उत्पत्ति में कारण होता है ॥ १०-११ ॥ विमर्श - शरलोमा ने रज और नम से युक्त मन को शरीर और रोग की उत्पत्ति में कारण माना है । गीता में भी कहा है- ' मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः । ' कोई भी व्यक्ति स्वयं १. ' चेतनाधातुरात्मा ' चक्रः । २. ‘ सुखदुःखयोरारोग्य रोगयोः ' शिवदासः ।
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यज्ञः पुरुषीयाध्यायः २५ ] सूत्रस्थानम् ४५६ दुःख भोगना नहीं चाहता तो आत्मा स्वयं दुःख भोगने के लिए रोगों को क्यों उत्पन्न करेगा? तथा आत्मा स्वतन्त्र है वह शरीर की उत्पत्ति में कारण हो तो सर्वदा उत्तम योनि में ही उत्पन्न हो सकता है, पर देखा जाता है कि वह नीच योनि शूकर - कुक्कुर में भी उत्पन्न होता है । अतः
आत्मा न शरीर की उत्पत्ति में कारण है न रोग की उत्पत्ति में ।
वायविदस्तु नेत्याह न ह्येकं कारणं मनैः । नर्त शरीराच्छारीररोगा ने मनसः स्थितिः ॥
रसजानि तु भूतानि व्याधयश्च पृथग्विधाः । आपो हि रसवत्यस्ताः स्मृता निर्वृत्तिहेतवः ॥ ( ३ ) वायविद का पक्ष इस प्रकार शरलोमा के वचन को सुनकर वार्बोविद ने कहा कि. यह कहना उचित नहीं है, केवल एक मन न शरीर को उत्पत्ति में कारण है, न रोगों की उत्पत्ति में है तथा शरीर के विना न शारीरिक रोगों की स्थिति रहेगी न मन की स्थिति । इसलिए प्राणिमात्र रस से उत्पन्न होते है और अनेक प्रकार के रोग भी रस के कारण ही उत्पन्न होते है । जल रस युक्त होता है और वही प्राणियों की तथा रोगों की उत्पत्ति में कारण है ॥१२-१३ ॥ विमर्श - अर्थात् जब शरीर की सत्ता न मानी जाय तो मन की सत्ता नहीं है । अतः मन रोगों की उत्पत्ति में अकेले कारण नहीं बन सकता है, रोग शारीरिक और मानसिक दो प्रकार के होते हैं, मन को कारण मानने पर केवल मानसिक रोग हो सकते हैं, शारीरिक रोग का सर्वथा अभाव हो जायगा । अतः वायविड ने रस को शरीर एवं रोगों की उत्पत्ति में कारण माना है । शरीर की उत्पत्ति, माता - पिता के आहार रस से ही शुक्र शोणित का निर्माण होता है जो गर्भ का कारण है, उसमें ही होती है । गर्भ स्थिति के पश्चात् गर्भिणी के आहार रस से गर्भ की पुष्ठि होती है अतः पुरुष रसज कहा जाता है, जल रसमय है, बताया भी है- ' आप्यो रसः इति ।
ॐ हिरण्याचस्तु नेत्याह न ह्यात्मा रसजः स्मृतः ।
नातीन्द्रियं मनः सन्ति रोगाः शब्दादिजास्तथा ॥ १४ ॥
sage पुरुषो रोगाः पड़धातुजास्तथा । राशिः षड्धातुजो ह्येष सांख्यैराद्यैः प्रकीर्तितः ॥ ( ४ ) हिरण्याक्ष का पक्ष इस प्रकार वार्योविद के वचन को सुनकर हिरण्याक्ष ने कहा कि यह कहना उचित नहीं है । क्योंकि ' आत्मा रस से उत्पन्न होता है ' ऐसा नहीं माना जाता और मन अतीन्द्रिय है उसकी उत्पत्ति भी रस से नहीं हो सकती है, यदि रस से रोगों की उत्पत्ति मानी जाय तो यह भी कहना उचित नहीं है क्योंकि असात्म्य शब्द, स्पर्श, रूप, गन्ध से भी रोगो की उत्पत्ति होती हैं । पधातु से पुरुष की उत्पत्ति और षड्धातु से ही रोगों की भी उत्पत्ति होती है । प्राचीन विद्वानों ने चिकित्सा के लिए उपयोगी इस राशि- पुरुष को पूर्ण परीक्षा करने के बाद ' पद्मानुज है ' ऐसा माना है ॥ १४-१५ ॥ विमर्श -- हिरण्याक्ष ने यह स्पष्ट किया है कि यदि राशि पुरुष के घटक आत्मा और मन को रस से उत्पन्न माना जाय तो ये अनीन्द्रिय नहीं है । क्योंकि रस इन्द्रिय ग्राह्य है, ' कारण के अनुसार कार्य होता है ' इस सिद्धान्त के अनुमार रस से उत्पन्न पदार्थ भी इन्द्रियग्राह्य ही होंगे इस प्रकार १. ' न ह्येकं कारणं मन इति व्याधिमात्रं प्रतीति शेषः शिवदासः । २. ' शरीराच्छारीरोगाणाम् ' ग. । ३. ' रमजानीत्यादौ स्मृता निर्वृत्तिहेतव इति व्याधिपुरुषयोः एतेन व्याधिपुरुषजनकरस्कार-णत्वेनापः कारणकारणतया पुरुपवि + रयोः कारणं भवन्ति ' चक्रः । ४. यस्मादतीन्द्रियं मन आत्मा चानीन्द्रियः, तस्मान्न रसजौ; रसाद्धि जायमानं कारणगुणानुवि-धानादैन्द्रियकं स्यादित्यर्थः । हेत्वन्तरमाह - सन्तीत्यादि । अहितशब्दादिजन्ये विकारे न रसः कारण-मित्यर्थः ' चक्रः । ५. ' आत्मा पृथिव्यादीनि च पञ्च षड् धातवः ' चक्रः । ६. ' परीक्षितः ' ग. ।
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४६० चरकसंहिता आत्मा और मन को ऐन्द्रियक होना चाहिए । पर वस्तुतः आत्मा और मन दोनों अतीन्द्रिय हैं अतः उनका उत्पादक रस नहीं हो सकता है । रोग भी रस के अतिरिक्त शब्दादि के द्वारा उत्पन्न होते हैं अतएव केवल रसज कहना अनुचित है । इस प्रकार वायविद के सिद्धान्त का खण्डन करते हुए षड्दातु को पुम्प एवं रोग का कारण नाना है । * तथा ब्रुवाणं कुशिकमाह तन्नेति कौशिकः । कैस्मान्मातापितृभ्यां हि विना पड़धानुजो भवेत् ॥ पुरुषः पुरुषाद्वौगौरश्वादश्वः प्रजायते । पित्र्या मेहादयश्वोक्ता रोगास्तावत्र कारणम् ॥ १७ ॥
( ५ ) कौशिक का पक्ष - • ऐसा कहने हुए कुशिक ( हिरण्याक्ष ) से कौशिक ( शौनक पा ० भेट ) ने कहा कि यह कहना उचित नहीं है क्योंकि माता - पिता के विना षड्धातु से उत्पत्ति कैसे होगी? पुरुष से पुरुष, बैल से बैल, घोड़े से घोड़ा और प्रमेह आदि रोग पिता से होते हैं, अतः पुरुष और रोग की उत्पत्ति में माता - पिता कारण है ॥ १६-१७ ॥ विमर्श - तात्पर्य यह है कि स्वतंत्र पड़वा को पुत्र एवं रोग में कारण नहीं मान्दा जा सकता क्योंकि माता - पिता के बिना पातु शरीर को उत्पन्न नहीं कर सकते है तथा पुरुष से पुरुष, गौ से गौ की उत्पत्ति तभी सम्भव है जब माता - पिता को कारण माना जाय अन्यथा पुरुष से गौ की तथा गौ ने पुरुष की उत्पत्ति भी सम्भव हो सकती है । पर ऐसा देखा नहीं जाता है अतः पुरुष की तथा रोगों की उत्पत्ति में माता - पिता कारण हैं । * भद्रकाप्यस्तु नेत्याह नह्यन्धोऽन्धात् प्रजायते । मातापित्रोरपि च ते प्रागुत्पत्तिर्न युज्यते ॥ कर्मजस्तु मतो जन्तुः कर्मजास्तस्य चामयाः । नह्यते कर्मणो जन्म रोगाणां पुरुषस्य वा ॥ ( ६ ) भद्रकाप्य का पक्ष — भद्रकाप्य ने नहीं, ऐसा कहा, क्योंकि अन्धे ते अन्धा उत्पन्न नहीं होता है । तथा तुम्हारे मत में माता - पिता की सृष्टि से पहिले उत्पत्ति नहीं हो सकती है । अतः जीव मात्र कर्म से उत्पन्न माना जाता है और उसके रोग भी कर्मज माने गये हैं । क्योंकि कर्म के बिना रोगों को अथवा पुरुषों की उत्पत्ति नहीं होती है ॥ १८-१९ ॥ विमर्श - कौशिक के वचनों को सुन कर भद्रकाप्य ने कहा कि पुरुष तथा रोग की उत्पत्ति में माता - पिता कारण नहीं हैं क्योंकि पुरुष के सादृश्य से पुरुष की तथा गौ के सादृश्य से गौ की उत्पत्ति होती है इसी लिए माता - पिता को कारण माना है तो सादृश्य से, अन्धे माता - पिता से अन्धे ही सन्तान की उत्पत्ति होनी चाहिए पर अन्धे माता - पिता से अन्धे सन्तान की ही उत्पत्ति हो, ऐसा होता नहीं है । अतः माता - पिता उत्पत्ति में कारण नहीं है । दूसरी आपत्ति यह है कि यदि माना ही उत्पत्ति में कारण हैं तो माता पिता की उत्पत्ति के पूर्व पुरुष की उत्पत्ति कहना सम्भव नहीं है अर्थात् पुत्र की उत्पत्ति में माता - पिता कारण, माता - पिता की उत्पत्ति में उनके माता - पिता कारण होंगे इस प्रकार पूर्व पूर्व की उत्पत्ति में उनके माता - पिता कारण होंगे पर पूर्व - पूर्व की कल्पना में एक ऐसा काल आ जायगा कि माता - पिता का क्रम टूट जायगा, तब उसके पूर्व उत्पत्ति सम्भव नहीं है । पर ब्रह्मादि की उत्पत्ति विना माता - पिता के भी देखी जाती है ।
नेत्याह कर्ता पूर्व हि कर्मणः । दृष्टं न चाकृतं कर्म यस्य स्यात् पुरुषः फलम् ॥
भरद्वाजस्तु १. ' शौनकः ' यो । २. ' मातापित्रनपेक्षित्वे सर्वप्राणिषु षड्धातुसमुदायस्य विद्यमानत्वेनं नरगोऽश्वादिभेदो न स्यादिति भावः ' चक्रः । ३. ' पुरुषः पुरुषं गौर्गामश्वोऽश्वं तु प्रजायते ' ग. । अस्मिन् पाठे प्रजायते इत्यस्य उत्पादयतीत्यर्थः । ४. ' मातापितृभवाश्चोक्ता ' ग. । ५. ' प्रागिति ६. ' कर्मणः पूर्व कर्ता ' भवति ' इति सर्गादौ निःशरीरिणी मातापित्रोरुत्पत्तिर्न स्यात्, चक्रः । शेषः, येन कर्मणा स पुरुषः कर्तव्यस्तस्य कर्मणः पुरुषपूर्व भावित्वात् कारणत्वं स्वीकर्तत्र्यं ततश्च स चेदिना कर्म पुरुषोऽभूत् कथं पुरुषस्य कर्म कारणमिति भावः ' चक्रः ।
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यज्जः पुरुषीयाध्यायः २५ ] सूत्रस्थानम् ४६१ ॐ भौवहेतुः स्वभावस्तु व्याधीनां पुरुषस्य च । खरद्र्वचलोष्णवं तेजोन्तानां यथैव हि ॥२१ ॥
( ७ ) भरद्वाज का पक्ष - भद्रकाप्य के वचन को सुनकर भरद्वाज ने कहा कि कर्म से पुरुष और रोग की उत्पत्ति मानना उचित नहीं है क्योंकि कर्म करने के पहले कर्त्ता का होना परम आवश्यक है । ऐसा कोई भी कर्म नहीं देखा जाता है जो कर्त्ता द्वारा न किया गया हो और जिस कर्म के फल स्वरूप पुरुष की उत्पत्ति हो । अनः व्याधि और पुरुष दोनों की उत्पत्ति का कारण स्वभाव है जिस प्रकार पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि इन भाव पदार्थों में खरत्व, द्रवत्व, चलव और उष्यत्व स्वभावतः उत्पन्न होते हैं ॥। २०-२१ ॥ विमर्श - यह सर्वतंत्र सिद्धान्त है कि ' कृतस्य कर्मणः फलं नाकृतस्य ' अर्थात् जो कर्म किया जाता है, उसी का फल होता है, बिना किये हुये कोई कर्म नहीं होता है न उसका फल होता है । इसलिये कर्म को कारण न मानकर स्वभाव को पुरुष एवं रोग का कारण माना है और उदाहरण स्वरूप यह बताया है कि जिस तरह पृथ्वी आदि में स्वभाव से ही खरत्व, द्रवत्व, चलव और उष्ण उत्पन्न होता है उसका कोई कारण नहीं है तथा योगवाशिष्ठ में भी बताया है, यथा - ' कः कण्टकानां प्रकरोति क्षम्यं चित्रं विचित्रं नृगपचिणां च माधुर्यभिक्षौ कटुना मरीचे, स्वभावनः सर्वमिदं प्रवृत्तम् ॥ ' ये सभी वस्तु स्वभाव से ही उत्पन्न होते हैं इसमें कोई अन्य कारण नहीं हैं उसी प्रकार पुरुष और रोग की उत्पत्ति में दूसरा कोई कारण नहीं हैं, केवल स्वभाव कारण है । काङ्कायनस्तु नेत्याह नह्यारम्भफलं भवेत् । भवेत् स्वभावाद्भावानामसिद्धिः सिद्धिरेव वा ॥ स्रष्टा त्वमितसंकल्पो ब्रह्मापत्यं प्रजापतिः । चेतनाचेतनस्यास्य जग॑तः सुखदुःखयोः ॥२३ ॥
( ८ ) काङ्कायन का पक्ष – स्वभाववादी भरद्वाज के वचन को सुनकर कांकाचन ने कहा कि स्वभाव से ही रोग और शरीर तथा सभी पदार्थों की उत्पत्ति अथवा अनुत्पत्ति हो तो प्रयोजन-विशेष मे किये गये अन्य व्यापारों का कोई महत्त्व ही नहीं रह जायगा अतः इस सृष्टिमात्र का तथा पुरुष एवं रोगों की उत्पत्ति के, ब्रह्मा के पुत्र प्रजापति जिनका संकल्प अपरिमित हैं और जो इस चेतन - अचेतन जगत् के और सुख - दुःख के कर्त्ता है, वही कर्त्ता हैं ॥ २२ - २३ ॥ विमर्श - तात्पर्य यह है कि स्वभाव से यदि सभी कार्य होने लगे तो भिन्न प्रयोजन के उद्देश्य से किये गये यज्ञ, अध्ययन, कृषि, वाणिज्य आदि का कोई फल या महत्त्व नहीं रह जायेगा और फिर इसे कोई करेगा भी नहीं क्योंकि सारे कार्य स्वभाव से ही होने लगेंगे । इसलिये स्वभाव को कारण न मानकर प्रजापति को सुख - दुःख और शरीर की उत्पत्ति में कारण माना है । $ सन्नेति भिक्षुरात्रेयो नह्यपत्यं प्रजापतिः । प्रजाहितैषी सततं दुःखैर्युन्ज्यादसाधुवत् ॥२४ ॥
कालजस्त्वेव पुरुषः कालजास्तस्य चामयाः । जगत् कालवशं सर्वं कालः सर्वत्र कारणम् ॥
( ९ ) भिक्षु आत्रेय का पक्ष - कांकायन के इस वचन को सुनकर आत्रेयभिक्षु ने कहा कि ब्रह्मा के पुत्र प्रजापति दुःख के कर्त्ता नहीं माने जा सकते क्योंकि प्रजापति को पुरुष की उत्पत्ति में कारण माना जाय तो प्रजापति की प्रजा ( सन्तान ) सभी प्राणी होंगे । पिता पुत्र की सदा हित कामना करता है तो सन्तानों के हित चाहने वाले प्रजापति अपनी सन्तानों में दुष्ट मनुष्यों के समान दुःख का संयोग नहीं कर सकते हैं । अतः रोग और पुरुष की उत्पत्ति में काल कारण है, यह सम्पूर्ण जगत् काल के ही वशीभूत है और सभी प्रकार के कार्यों के होने में काल ही कारण है । १. ' भावहेतुरुत्पत्तिहेतुः ' चक्रः । २. ' यदि स्वभावादेव भावानां विकारशरीरादीनां सिद्ध्यसिद्धी भवतः, तदाऽऽरम्भफलं न भवेत्, स्वाभाविकत्वाद्भावानां य इमे लोकशास्त्रसिद्धा यागकृष्यध्ययनाद्यारम्भास्ते निष्प्रयोजना भवेयुरकारणत्वादित्यर्थः ' चक्रः । ३. ' चेतनाचेतनस्यायं कारणम् ग. ।