चरक संहिता हिन्दी भाष्य — पृष्ठ 551–560

चरक संहिता हिन्दी भाष्य · Chaukhamba · पृष्ठ 551–560

पृष्ठ 551

चरक संहिता हिन्दी भाष्य, पृष्ठ 551 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

४६२ वैज्ञानिकों के नाम ( Name of Scientists ) १. मौद्गल्य परीक्षि २. शग्लोना ३ वायवि ४. हिरण्याक्ष ५. कौशिक ( शौनक ) ६. भद्रकाण्य ७. भरद्वाज ८. काङ्कायन ९. आत्रेय भिक्षु चरकसंहिता उनके बाद ( पक्ष ) ( Their Theories ) आत्मवाद ( Spirit Theory ) सवाद ( Mind Theory ) रसवाद ( Fluid ( Embryonis ) Theory ) धानुवाद ( Six Element Theory ) माता- पितृवाद ( Parent Theory ) कर्मवाद ( Action Theory ) स्वनाववाद ( Nature Theory ) प्रजापतिवाद ( Creator ( God ) Theory ) कालबाद ( Time Theory ) इन लोगों ने मनों का प्रतिपादित करने दुवै यह स्पष्ट कर दिया है कि जिन कारणों से पुरुष की उत्पत्ति होती है उन्हीं कारणों से रोग की भी उत्पत्ति होती है । ३ तथर्षीणां विवदतामुवाचेदं पुनर्वसुः । मैवं वोचत तत्त्वं हि दुष्प्रापं पक्षसंश्रयात् ॥ २६ ॥

वादान् प्रतिवादान् हि वदन्तो निश्चितानिव । पक्षान्तं नैव गच्छन्ति तिलैपीडकवतौ ॥

मुक्त्वैवं वादसंवमध्यात्ममनुचिन्त्यताम् । नाविधूते तमःस्कन्धे ज्ञेये ज्ञानं प्रवर्तते ॥२८ ॥

विभिन्न पक्षों के ऐकान्तिक दुराग्रह की निन्दा - इन ९ विद्वान महर्षियों के विवादयुक्त वचनों को सुनकर आचार्य पुनर्वसु ने कहा कि आप लोग इस तरह मन कहिये क्योंकि अपने - अपने पक्षों का आश्रय लेकर विवाद करने पर तत्व की प्राप्ति अर्थात् सिद्धान्त का निर्णय नहीं हो पाता है । वाद ( उत्तर ) और प्रतिवाद ( प्रत्युत्तर ) को निश्चित सिद्धान्त की तरह कहते हुये किसी एक पक्ष का अन्त नहीं हो सकता है जैसे कि तेल पेरने वाला मनुष्य घूमता हुआ जिस स्थान से प्रथम बार भ्रमण करना प्रारम्भ करना है उस स्थान पर पुनः आ जाता है ( उसी प्रकार जो किसी भी एक पक्ष का आग्रहपूर्वक आश्रयण करना है वह वाद - विवाद करते हुये अन्य पक्ष का खण्डन मण्डन करते हुये पुनः वह अपने पक्ष पर ही चला आता है चाहे उसका पक्ष उचित हो या अनुचित ) । इसलिये वाद - विवाद की प्रक्रिया को छोड़कर अध्यात्म ( निश्चित सिद्धान्त ) की चिन्ना करनी चाहिये क्योंकि जब तक अज्ञानरूपी नम का नाश नहीं होना है तब तक ज्ञान करने योग्य सिद्वान्तयों का ज्ञान नहीं होता है ॥ २६-२८ ॥ विमर्श -- आचार्य ने इस अपनी उक्ति के द्वारा यह स्पष्ट किया है कि काशीपति के प्रश्नों का १. पक्षसंश्रयादिति जगतः पक्षसंग्रहात् कः । २. ' तिलपीडकतेलार्थं यन्त्रोपरिस्थितो ननुष्यः ' चक्रः । ३. ' पक्षराग तत्त्वज्ञानप्रतिबन्धकत्वेन तमःस्कन्ध उच्यते चक्रः । विमर्श -- अत्रेय भिक्षु ने प्रजापति की कारणता को अस्वीकार करते हुये काल को कारण माना है यथा- ' काल: पचति भूतानि कालः संहरते प्रजाः । कालः सुतं जानि कालो हि दुरतिक्रमः ॥ नाकालतो म्रियते जायने वा नाकालनो व्याहरते च वालः । नाकालनो यौवनमभ्युपैति नाकालतो रोहति बाजमुप्तन् ॥ कालमूलमिदं सर्व भावाभावी सुखानुखे । कालेनाभ्यागताः सर्वे कालो हि बलवत्तरः । ' ( महाभारत ) | ये सब सुतियां काल को कारण मानने में दी गई है । इस प्रकार काशिराज के प्रश्नों का उत्तर ९ विज्ञान महपियों ने दिया है । ये तत्कालीन ऋषियों के भिन्न - भिन्न सिद्धान्त थे और वे अपने - अपने सिद्धान्त के अनुसार उत्तर दिये, इन ९ ऋषियों के सिद्वान्त को निम्नलिखित रूप में एकत्र किया जा रहा है ।

पृष्ठ 552

चरक संहिता हिन्दी भाष्य, पृष्ठ 552 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

यज्ञः पुरुषीयाध्यायः २५ । सूत्रस्थानम् ४६३ समाधान संघाय - सम्भाषा परिषद् द्वारा किया गया है जिसमें प्रत्येक विद्वानों ने युक्तिपूर्वक अपने सिद्धान्तो का प्रतिपादन और दूसरे के पक्षों का खण्डन किया है पर अपने पक्ष को स्वीकार करने के लिए विशेष रूप से आग्रह नहीं किया है । अन्त में निर्णय देते हुए आचार्य ने यह स्पष्ट कर दिया है कि जब किसी निश्चित वस्तु की खोज में प्रवृत्त हुआ जाता है तो आग्रहवश अपने पक्ष को दूसरे पर लादने की कोशिश किया जाय तो उससे सिद्धान्त का निश्चय नहीं होता है । अन्त में सभी ऋपियों के वचनों को स्वीकार करते हुए अपना सिद्धान्त आचार्य ने निश्चित किया है । येषामेव हि भावानां संपत् संजनयेन्नरम् । तेषामेव विपद्व्याधीन् विविधान् समुदीरयेत् ॥ पुनर्वसु आत्रेय का समन्वयात्मक मन - आत्रेय पुनर्वसु का सिद्धान्त - जिन भावों की सम्पत्ति पुरुष की उत्पत्ति में कारण है उन्हीं भावो की विपत्ति अनेक प्रकार के रोगों को उत्पन्न करती है ॥ विमर्श - आचार्य ने बुद्धिमत्तापूर्वक प्रत्येक विद्वानों के मतों का आदर करते हुए बताया है कि आप लोगों की उक्ति अंशत: ठीक है और जिसके समान रूप के रहने पर पुरुष की उत्पत्ति होनी हैं । उन्हीं मूल वस्तु में विकृति आ जाने से रोगों की उत्पत्ति होती है, यद्यपि सभी विद्वानों का पक्ष एकांगी है, पर यदि यहाँ पर सभी मतों का आचार्य खण्डन करने लगते तो दूसरा व्यक्ति अपने पक्ष का मण्डन करने के लिए प्रस्तुत हो जाता, फलतः काशीपति के प्रश्न का समाधान न होता । इस विषय में आचार्य का क्या मत है यह वान उन्होंने यहाँ नहीं बताई है । वस्तुतः सभां मत किसी न किसी अंश में सत्य है पर सिद्धान्ततः समुदाय, पुरुष एवं रोग की उत्पत्ति में कारय होता है यह आचार्य का मन है और इसका वर्णन विशेष रूप से शारीर स्थान के ' खुडिकागर्भाः-क्रान्ति शारीर ' में विस्तृत रूप से किया है इसको वहीं देखना चाहिए । * अथात्रेयस्य भगवतो वचनमनुनिशम्य पुनरेव वामकः काशिपतिरुवाच भगवन्त-मात्रेयं - भगवन्? संपन्निमित्तस्य पुरुषस्य विपन्निमित्तजानां च रोगाणां किमभिवृद्धि-कारणमिति ॥ ३० ॥

( २ ) पुरुष तथा रोग के वृद्धि में हेतु ( Factors Responsible for the Growth of Man and Diseases ) काशीपति वामक का दूसरा प्रस्ताव - भगवान् पुनर्वसु आत्रेय के वचनों को सुनकर पुनः काशिराज वामक ने भगवान् आत्रेय से पूछा -- भगवन्! सम्पत्ति से उत्पन्न हुए पुरुष और विकृति से उत्पन्न हुए रोगों की वृद्धि के क्या कारण हैं? ॥ ३० ॥

* तमुवाच भगवानात्रेयः -- हिताहारोपयोग एक एव पुरुषवृद्धिकरो भवति, अहिता-हारोपयोगः पुनर्व्याधिनिमित्तमिति ॥ ३१ ॥

पुनर्वसु आत्रेय का उत्तर — हितकर आहार का सेवन ही पुरुष की वृद्धि में कारण है और अहितकर आहार का सेवन ही रोगों की वृद्धि में कारण है ॥ ३१ ॥

एवंवादिनं भगवन्तमात्रेयमग्निवेश उवाच - कथमिह भगवन्? हिताहितानामाहार-जातानां लक्षणमनपवादमभिजानीमहे, हितसमाख्यातानामाहारजातानाम हित समाख्या-तानां च मात्राकालक्रियाभूमिदेहदोषपुरुषावस्थान्तरेषु विपरीतकारित्वमुपलभामह इति ॥ अग्निवेश का हिताहित आहार के लक्षण के बारे में प्रश्न इस प्रकार कहने वाले भगवान् आत्रेय से अग्निवेश ने कहा हे भगवन्! मैं हितकारी आहार और अहितकारी विहारों के निश्चित लक्षणों को कैसे समझे, क्योंकि जो हितकर आहार तथा जो अहितकर आहार बनाये गये हैं वे ही आहार १. ' येषामिति यानीयानां ते च महाभूतादयः ' चक्रः ।

पृष्ठ 553

चरक संहिता हिन्दी भाष्य, पृष्ठ 553 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

४६४ चरकसंहिता मात्रा, काल, क्रिया, भूमि, देह, दोष, पुरुष की अवस्था विशेष से विपरीत कार्य करने वाले होते हैं, ऐसा हम लोग देखते हैं ॥ ३२ ॥

विमर्श - तात्पर्य यह है कि जो हितकर आहार द्रव्य हैं वे भी मात्रा आदि के कारण अहितकर बन जाते है । जैसे- ' प्राणाः प्राणभृताभन्नं तदयुक्त्या हिनस्त्यसून् । ' ( च ० चि ० २४ ) तथा जो अहितकर पदार्थ बताये गये हैं वे मात्रा आदि के अनुसार हितकर बन जाते हैं जैसे — ' विपं प्राणहरं तच्च युक्तियुक्तं रसायनम् । ' इन उद्धरणों से यह स्पष्ट है कि स्वाभाविक हितकर तथा अहितकर द्रव्य मात्रा आदि के अनुसार आहेतकर या हितकर बन जाते हैं तो यह कैसे निश्चित रूप से समझा जाय कि हितकर और अहितकर द्रव्यों की परिभाषा क्या? यह अग्निवेश ने प्रश्न उपस्थित किया । * तमुवाच भगवानात्रेयः - यदाहारजातमग्निवेश? समांश्चैव शरीरधातून् प्रकृतौ स्थापयति विषमांश्च समीकरोतीत्येतद्वितं विद्धि, विपरीतं स्वहितमिति इत्येतद्धिताहित-लक्षणमनपवादं भवति ॥ ३३ ॥

पुनर्वसु आत्रेय का उत्तर इस प्रकार शंका उपस्थित करनेवाले अग्निवेश से भगवान् आत्रेय ने कहा कि हे अग्निवेश! जो आहार द्रव्य समान मात्रा में रहनेवाले शारीरिक धातुओं को स्वाभाविक रूप में ही रक्खे और विषम मात्रा में रहनेवाले शारीरिक धातुओं को सममात्रा में कर दे उसे हितकर आहार द्रव्य कहना चाहिए | इससे विपरीत जो द्रव्य हों ( अर्थात् समधातु को विषम बना दें और विषम धातु को और विशेष रूप से विकृत कर दें ) उन्हें अहितकर आहार कहा जाता है यह हिनकर और अहितकर द्रव्यों का निश्चित लक्षण है ॥ ३३ ॥

एवंवादिनं च भगवन्तमात्रेयमग्निवेश उवाच - भगवन्! न खेतदेवमुपदिष्टं भूयिष्ठे-कल्पाः सर्वभिषजो विज्ञास्यन्ति ॥ ३४ ॥

अनिवेश का दूसरा प्रश्न - इस प्रकार कहनेवाले भगवान् नात्रेय से अग्निवेश ने कहा कि हे भगवन् इस प्रकार उपदेश करने पर अधिकतर सभी प्रकार के वैद्य ( अर्थात् उत्तम, मध्यम और निकृष्ट बुद्धिवाले वैय ) हितकर और अहितकर द्रव्यों का लक्षण निश्चित रूप से नहीं समझ सकते हैं ॥ ३४ ॥

तमुवाच भगवानात्रेयः -- येषां हि विदितमाहारतत्त्वमग्निवेश! गुणतो द्रव्यतः कर्मतः सर्वावयवशश्च मात्रादयो भावाः, त एतदेवमुपदिष्टं विज्ञातुमुत्सहन्ते । यथा तु खल्वेतदुप-दिष्टं भूयिष्टकल्पाः सर्वभिपजो विज्ञास्यन्ति, तथैतदुपदेच्यामो मात्रादीन् भावोननुदा हरन्तः; तेषां हि बहुविधविकल्पा भवन्ति; आहारविधिविशेषांस्तु खलु लक्षणतश्चावयवत-श्वानुव्याख्यास्यामः ॥ ३५ ॥

पुनर्वसु आत्रेय का उत्तर - अग्निवेश से भगवान् आत्रेय ने कहा कि हे अग्निवेश जिन मनुष्यों को गुणों के अनुसार, द्रव्यों के अनुसार, कर्मों के अनुसार आहार तत्त्व का ज्ञान है तथा मात्रा आदि ( आहार की मात्रा, काल, देश आदि आहार - विधिविशेपायतन ) के सर्वावयव ( सम्पूर्ण रूप ) का ज्ञान है वे ही व्यक्ति इस प्रकार के अहितकर या हितकर आहार वर्गों का उपदेश कर सकते है, तथा जो व्यक्ति आहार तत्त्वों को सभी प्रकार से जानता है वही व्यक्ति ऐसे उपदेशों को समझ भी सकता है । अधिकतर सभी प्रकार के चिकित्सक इस उपदेश को जिस प्रकार समझ सकेँ उसी प्रकार से मात्रा आदि सभी भावों को उदाहरण रूप में न देकर, उपदेश कर रहे हैं । मात्रा आदि सभी भावों का उदाहरण देना बहुत कठिन है क्योंकि मात्रा आदि के विकल्प १. ' भूयिष्ठकल्पा नानाप्रकारा उत्तमाधममध्यमा इत्यर्थः ' चक्रः । २. ' सर्वाननुदाहरन्तः ' यो ।

पृष्ठ 554

चरक संहिता हिन्दी भाष्य, पृष्ठ 554 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

यज्ञः पुरुषीयाध्यायः २५ ] सूत्रस्थानम् ४६५ ( भेद ) बहुत प्रकार के होते हैं । अब लक्षण के अनुसार और द्रव्यों के अवयवों के अनुसार आहार - विधि विशेष की व्याख्या कर रहा हूँ ॥ ३५ ॥

विमर्श - आहार तत्त्वों को जो व्यक्ति सभी प्रकार से जानता है वही आहार सम्बन्धी शङ्काओं को समझ सकता है, उन शङ्काओं का निराकरण कर सकता है तथा उपदेश कर सकता एवं उपदेश समझ सकता है । कहने का तात्पर्य यह है कि उपदेश भी अधिकारी व्यक्ति को ही दिया जाता है, अधिकारी वही व्यक्ति होता है जो प्रश्नविषयक प्रकरण का सर्वाङ्गीण ज्ञाता हो, विषय का सर्वाङ्गीण ज्ञाता होने पर प्रत्येक का उदाहरण देना आवश्यक नहीं होता है । तथा आहार - विधि - विकल्प के भेद अनन्त होते हैं, प्रत्येक का उदाहरण देकर समझाना असम्भव हैं अतः आहार तत्त्वों का वर्णन लक्षण एवं अवयव द्वारा बता रहे हैं । तद्यथा - आहारत्वमाहारस्यैकविधम्, अर्थाभेदात् स पुनर्द्वियोनिः स्थावरजङ्गमात्म-कत्वात्; द्विविधप्रभावः, हिताहिनोदर्कविशेषात् चतुविधोपयोगः, पानाशनभचयलेह्यो-पयोगात्; पडास्वादः, रसभेदतः षड्विधत्वात्; विंशतिगुणः, गुरुलघुशीतोष्णस्निग्धरूक्ष-मन्दतीक्ष्णस्थिरसरमृदुकठिन विशद पिच्छिलश्लचणखर सूक्ष्मस्थूलसान्द्रद्रवानुगमात्; अप-रिसंख्येयविकल्पः, द्रव्यसंयोगकरैणबाहुल्यात् ॥ ३६ ॥

आहार के विभिन्न दृष्टि से भेद - ( १ ) जैसे - अर्थ में अभेद होने से आहार का आहारत्व प्रायः एक ही होता है । ( २ ) वह आहार द्र, स्थावर, जंगम भेद से दो योनि का होता है । ( ३ ) १. हितकर आहार, २ अहितकर आहार परिणाम के अनुसार आहार के प्रभाव दो होते हैं । ( ४ ) पान, अशन, भक्ष्य लेह्य, यह प्रयोग - भेद से आहार द्रव्यों का चार भेद किया जाता है, ( ५ ) रस मधुर, अम्ल, लवण, कड तिक्त, कषाय भेद से छ प्रकार का होता है इसलिए आहार द्रव्य स्वाद - भेद से छ तरह के होते हैं । ( ६ ) गुरु - लघु, शीत - उष्ण, स्निग्ध - रूक्ष, मन्द - तीक्ष्ण, स्थिर - सर, मृदु - कठिन, विशद पिच्छिल, श्लक्ष्ण - खर, सूक्ष्म-स्थूल, सान्द्र - द्रव ये आहार के बीस, गुण होते हैं इसके अनुसार आहार के २० भेद होते है । इस प्रकार द्रव्यों के संयोग तथा संस्कार की बहुलता से आहार की संख्या अपरिमित भेद से युक्त होती है ॥ ३६ ॥

विमर्श - जिस प्रकार द्रव्य के ९ भेद होते हुए द्रव्यत्व सभी में एक होता है या मनुष्यों के अधिक मेद होने पर भी सभी में मनुष्यत्व एक होता है उसी प्रकार आहार द्रव्यों के अपरिमित भेद होते हुए आहार - सामान्य से आहारत्व को एक प्रकार का ही माना जाता है । आहार की व्युत्पत्ति इस प्रकार है- ' आहार्यते गलादधो नीयते इत्याहारः ' अथवा ' आह्नियन्ते शरीरधातवः अनेन इत्याहारः ' या ' गलविवरादधः संयोगानुकूलव्यापारः आहारः ' अर्थात् गले के नीचे द्रव्यों के ले जाने का नाम आहार है या जिसके द्वारा शारीरिक धातुएँ पुष्ट होती हैं उसे आहार कहते हैं या गले के विवर ( छिद्र ) से नीचे के अवयवों से द्रव्यों का संयोग कराना आहार कहा जाता है । यह आहार एक ही प्रकार का होता है चाहे उसे जल, फल, अन्न, दूध आदि कुछ भी कहा जाय क्योंकि सबका आहरण अन्न नलिका द्वारा ही होता है । पुनः आहार केभेदों को असंख्य बताने के लिए, ( १ ) योनि, ( २ ) प्रभाव, ( ३ ) उपयोग, ( ४ ) स्वाद, ( ५ ) गुणभेद से विभिन्न भेदों का उल्लेख किया है और यदि इन्हीं भेदों से विभक्त आहार द्रव्यों का संयोग और संस्कार की दृष्टि से भेद करना चाहें तो भेद की संख्या अगणित हो जायगी । १. ' उदर्क उत्तरकालीनं फलम् ' चक्रः । २ ' संस्कारादिकरण ' ग. । ३० च ० सं ०

पृष्ठ 555

चरक संहिता हिन्दी भाष्य, पृष्ठ 555 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

४६६ चरकसंहिता तस्य खलु ये ये विकारावयवा भूयिष्ठमुपयुज्यन्ते, भूयिष्टकल्पानां च मनुष्याणां प्रकृत्यैव हिततमाश्चाहिततमाश्च, तांस्तान् यथावदुपदेच्यामः ॥ ३७ ॥

प्रधान उदाहरण - उन आहार द्रव्यों के जिन - जिन विकारों में जो - जो अवयव ( अंश ) अधिक रूप में प्रयुक्त होते हैं और अधिकतर मनुष्यों के लिए स्वभाव ने ही हिनकर और स्वभाव से ही अहितकर होते हैं उन सर्वोों का उपदेश ठीक - ठीक रूप में कर रहा हूं ॥ ३७ ॥

तद्यथा - लोहितशालयः शूकधान्यानां पध्यतमत्वे श्रेष्ठतमा भवन्ति, मुद्राः शमीधा-न्यानाम, आन्तरिक्षमुदकानां सैन्धवं लवणानां जीवन्तीशाकं शाकानाम्, ऐणेयं मृग-मांसानां, लावः पक्षिणां, गोधा विलेशयानां, रोहितो मत्स्यानां गव्यं सर्पिः सर्पिषां, गोक्षीरं क्षीराणां, तिलतैलं स्थावरजातानां स्नेहानां वराहवसा आनूपमृगवसानां, चुलुकीवसा मत्स्यवसानां, पाकहंसवसा जलचर विहङ्गवसानां, कुक्कुटवसा विष्किरशकुनिवसानाम्, अज-मेदः शाखादमेदसां, शृङ्गवेरं कन्दानां मृद्दोका फलानां शर्करेचुविकाराणामिति प्रकृत्यैव हिततमानामाहारविकाराणां प्राधान्यतो द्रव्याणि व्याख्यातानि भवन्ति ॥ ३८ ॥

प्रकृति ( स्वभाव ) से ही हितकर आहार - जैसे शुकधान्यों में लाल चावल, पथ्य में ( हिनकर ) उत्तम होता है, शमीधान्यों ( छीमीवालों ) में मूँग, जलवर्ग में आकाशीय जल, लवण-वर्गों में सैन्धव, शाकवर्गों में जीवन्ती का शाक, मृगमांसों में एम ( विशेष नृग ) का माँस, पक्षियों में लावा का माँस, बिल में रहनेवाले प्राणियों के माँसों में गोह का माँस, मछलियों में रोहू मछली, घृतवर्गों में गोघृत, दुग्धवर्गों में गाय का दुग्ध, स्थावर स्नेहों में तिलतैल, आनूप मृग की चवियों में सूअर की चर्बी, मछली की चवियों में चुलुकी जाति की मछली की चर्बी, जलचर पक्षियों की चाबियों में पाक हंस ( श्वेत हंस ) की चर्बीीं । चोंच से खोदकर आहार द्रश्य को प्राप्त करनेवाले पक्षियों की चवियों में मुर्गे की चर्बी, पत्ती खानेवाले पशुओं की मेदाओं में बकरी की मेदा, कन्दों में अदरख, फलों में मुनक्का, ईख के विकारों में शर्करा । स्वभाव से ही आहार द्रव्यों में जो प्रधान रूप से हितकर होते है उन द्रव्यों की व्याख्या यहाँ कर दी गई है ॥ ३८ ॥

विमर्श - स्वभाव से जो प्रायः हितकर होते हैं उन द्रव्यों में भी जो विशेष रूप से प्रधान हैं उनका यहाँ वर्णन किया गया है । सारे हितकर द्रव्यों का यदि पृथक् - पृथक् वर्णन किया जाय तो बहुत विस्तार हो जायगा इसलिए संक्षेप में यहाँ आचार्य ने वर्णन किया है । आधुनिक खोज से भी यह स्पष्ट हो गया है कि मानव शरीर की रक्षा के लिए शरीर के घटक मांस तत्त्व ( Protien ), शाकतत्त्व ( Carbohydrate ), वसा ( Fat ), लवण ( Salt ), खनिज द्रव्य ( Minerals ), जल ( Water ), जीवतिक्ति ( Vitamin ) की आवश्यकता होती है । लाल चावल का गुण आज के वैज्ञानिक स्वीकार करते हैं और कहते हैं कि इसमें Vitamin का वह अंश रहता है जो हमें Beri - Beri से बचाता है इसीलिए वे मशीन से छटे चावल का विरोध करते हैं । दालों में सुपाच्य मूँग की दाल हैं । इसके अनन्तर लवणों का उपदेश कर जीवतिक्ति के प्राप्ति स्थान हरे शाकों का उल्लेख किये है । सैन्धव लवण खनिज होने से अनेक उपयोगी धातुओं से युक्त होता है और जीवन्ती शाक तो जीवनीयगण का विशिष्ट शाक है जो शरीर की जीवनीय शक्ति को बढ़ाना है । शरीर में निर्माण का अधिक कार्य मांस तत्त्व से होता है मांस तत्त्व प्राणिज और वानस्पतिक दो प्रकार के होते हैं । इनमें से प्राणिज मांस तत्त्व शरीर के लिए सुपाच्य एवं उपयोगी १. ‘ भूयिष्ठकल्पानामिति किञ्चिन्न्यूनबहूनाम् ' चक्रः । गङ्गाधरस्तु ' भूयिष्ठकल्पनाश्च ' इति पठित्वा ' भूयिष्ठकल्पना आहारस्य विकारा यवाग्वादयः ' इति व्याख्यानयति ।

पृष्ठ 556

चरक संहिता हिन्दी भाष्य, पृष्ठ 556 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

यज्जः पुरुषीयाध्यायः २५ ] सूत्रस्थानम् ४६७ समझा जाता है, यहाँ दोनों प्रकार के मांस तत्त्वों, उनमें भी जो अधिक उपयोगी है उनका उल्लेख आचार्य ने किया है, जैसे प्राणिज मांसतत्त्व के लिए हिरण, गोधा, रोहितमत्स्य तथा गोदुग्ध का उपदेश किया है । दूध का सेवन शाकाहारी भी करते हैं अतः प्राणिजमांस का भी तत्व भी उन्हें निल जाता है । शरीर में शक्ति का साधन बसा है यह भी प्राणिज एवं वानस्पतिक भेट से दो प्रकार का होता है । स्थावर में तिल तैल एवं प्राणिज में गोघृत का उल्लेख है । इसके अतिरिक्त सूअर, चुलकी मछली, मुर्गे आदि की चर्बी को भी श्रेष्ठ कहा गया है । कन्द्रों में तो दीपन - पाचन में श्रेष्ठ अदरक का उपदेश किया है, फलों में अंगूर एवं ईग्व के विकार में शर्करा को सर्वोत्तम बतलाया है । सारांश है कि जो द्रव्य शरीर के लिए सुपाच्य, हिनकर मलविसर्जन में सहायक, धातु - निर्माण में सर्वोत्तम तथा दोषी को न कुपित करने वाले हैं वे पदार्थ हितकर या पथ्य बतलावे गये हैं । अहिततमानप्युपदेच्यामः - यवकाः शुकधान्यानामपथ्यतमत्वेन प्रकृष्टतमा भवन्ति, मापाः शमीधान्यानां वर्षानादेयमुदकानाम, औषरं लवणानां सर्पपशाकं शाकानां, गोमांसं मृगमांसानां काणकोटः पक्षिणां, भेको बिलेशयानां, चिलिचिमो मत्स्यानाम्, आविकं सर्पिः सर्पिपाम, अविक्षीरं क्षीराणां कुसुम्भस्नेहः स्थावरस्नेहानां महिषवसा आपमृगवसानां, कुम्भीरवमा सत्स्यवपानां, काकसवमा जलचरविहङ्गमानां चटकवसा विष्किरशकुनिय सान ', हस्तिमेदः शाखादमेदसां निकुचं फलानाम, ओलुकं कन्दानां फाणितमिक्षुविकारा-णामः इति प्रकृत्यैवाहिततमानामाहारविकाराणां प्रकृष्टतमानि द्रव्याणि व्याख्यातानि भवन्ति । ( इति ) हिताहितावयवो व्याख्यात आहारविकाराणाम् ॥ ३ ९ ॥ अहितकर आहार के उदाहरण - अब इसके बाद अहितकर आहारद्रव्यों का उपदेश कर रहा हूँ । अपथ्य द्रव्यों की गणना में शुकधान्यों में यवक ( घोड़ जई ) परम अपथ्य होना है, शमीधान्यों में उड़द, जलों में वर्षा ऋतु की नदी का जल, लवणवर्गों में ऊसर से निर्मित लवण, शाकवर्गों में सरसों का शाक, मृगमांसों ( पशुनांशों ) में गोमांस, पक्षियों में काण कबूतर ( जंगली कबूतर ) का मांस, दिल में रहने वाले जीत्रों में मेढ़क का मांस, मछलियों में चिलचिम का मांस, घृतवर्गों में भेड़ का घृत, दुग्धवर्गों में भेड़ का दूध, स्थावर स्नेहों में बर्रे का तेल, आनूप मृगों की चबियों में भैस की चर्बी, मछली की चाबियों में कुम्मीर नामक मछली की चर्बी, जलचर पक्षियों की चर्बी में काक मद्गु पक्षी की चवीं, खोद - खोदकर खाने वाले पक्षियों की चवियों में चटक ( गवरैया ) की चर्बी, डाल - पत्ती खाने वाले प्राणियों में हाथी की मैदा, फलों में बड़हर, कंदों में आलू, ईख के विकारों में राब, ये स्वभाव से ही आहार - विकारों में विशेष कर अहितकर द्रव्य हैं । इनकी व्याख्या यहाँ कर दी गई है । इस प्रकार यहाँ हितकर अहितकर आहार विकारों के अवयवों ( मेदों ) की व्याख्या कर दी गई है ॥ ३ ९ ॥ अतो भूयः कमपिधानां चे प्राधान्यतः सानुबन्धानि च द्रव्याण्यनुव्याख्यास्यामः । तद्यथा - अन्नं वृत्तिकराणां ४ श्रेष्टम् उदकमाश्वासकराणां, ( सुरा श्रमहराणां ), क्षीरं जीव-नीयानां, मांसं बृंहणीयानां रसस्तर्पणीयानां, लवणमन्नद्रव्यरुचिकराणाम्, अम्लं हृद्यान, कुक्कुटो बल्यानां, नक्ररेतो वृष्याणां मधु श्लेष्मपित्तप्रशमनानां सर्पिर्वातपित्तप्रशमनानां, २. चकारेण आहारविकाराणामिति समुच्चावत । १. ' मूलकम् ' ग. 1 ३. ' द्रव्यादीनि ' ग. । ४. ‘ श्रेष्ठतमन् ’ ग. । १. ' उमाप्यायनकरागान ' यो । ६. ‘ अम्लं हृद्यानामिनि स्यानान् अलं स्वयनेव रोचते ' चक्रः ।

पृष्ठ 557

चरक संहिता हिन्दी भाष्य, पृष्ठ 557 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

४६८ चरकसंहिता तैलं वातश्लेष्मप्रशमनानां, वमनं श्लेष्महराणां, विरेचनं पित्तहराणां, वस्तिर्वातहराणां, स्वेदो मार्दवकराणां, व्यायामः स्थैर्यकराणां, क्षारः पुंस्त्वोपघातिनां, ( तिन्दुकमनन्नद्रव्यरुचिकरा-णाम् ), आमं कपित्थमकण्ठ्यानाम्, आविकं सर्पिरहृद्यानाम्, अजातीरं शोषघ्नस्तन्यसात्म्यरक्त-सांग्राहिक रक्तपित्तप्रशमनानाम्, अविक्षीरं श्लेष्मपित्तजननानां महिषीक्षीरं स्वप्नजननानां, मदेकं दध्यभिष्यन्दकराणां, गवेधुकान्नं कर्शनीयानाम्, उद्दालकानं विरूक्षणीयानाम्, इतु-मूत्रजननानां यवाः पुरीषजननानां, जाम्बवं वातजननानां, शकुल्यः श्लेप्मपित्तजननानां, कुलत्था अम्लपित्तजननानां, माषाः श्लेप्मपित्तजनानां मदनफलं वमनास्थापनानुवास-नोपयोगिनां त्रिवृत् सुखविरेचनानां, चतुरङ्गुलो मृदुविरेचनानां, स्नुकपयस्ती चणविरेच-नानां प्रत्यपुष्पा शिरोविरेचनानां, विडङ्गं त्रिमिन्नानां, शिरीषो विपन्नानां, खदिरः कुष्ठ-नानां, रास्ता वातहराणाम्, आमलकं वयःस्थापनानां, हरीतकी पथ्यानाम्, एरण्डनूलं वृप्यवातहराणां, पिप्पलीमूलं दीपनीयपाचनीयानाहप्रशमनानां, चित्रकमूलं दीपनीयपाच-नीयनुदशोथाः शूलहराणां, पुष्करमूलं हिक्काश्वासकासपार्श्वशूलहराणां, मुस्तं सांग्राहिकदी-पनीयपाचनीयानाम्, उदीच्यं निर्वापणदीपनीयपाचनीयच्छद्येतीसारहराणां कट्व सांग्राहिकपाचनीय दीपनीयानाम्, अनन्ता सांग्राहिकरक्तपित्तप्रशमनानाम्, अमृता सांग्रा-हिकवात हरदीपनीयश्लेज्मशोणित विबन्धप्रशमनानां, बिल्वं सांग्राहिकदीपनीयवातकफप्रश-मनानाम्, अतिविषादीपनीयपाचनीयसांग्राहिक सर्व दोपहराणाम, उत्पलकुमुदपद्मकिञ्जल्कः सांग्राहिकरक्तपित्तप्रशमनानां, दुरालभा पित्तश्ले - प्रप्रशमनानां गन्धप्रियङ्गुः शोणितपित्ता-तियोगप्रशमनानां, कुटजत्वक् श्लेज्मपित्तर कसांग्राहिकोपशोषणानां काश्मर्यफलं रक्तसां -ग्राहिकरक्तपित्तप्रशमनानां पृश्निपर्णी सांग्राहिकवात हरदीपनीयनृत्याणां विदारिगन्धा वृष्य सर्वदोषहराणां वला सांग्राहिकवयवातहराणां, गोक्षुरको मूत्रकृच्छ्रा निलहराणां, हिङ्गु निर्यासश्छेदनीयदीपनीयानुलोमिकवातकफप्रशमनानाम्, अम्लवेतसो भेदनीय-दीपनीयानुलोमिकवातश्लेष्महराणां, यावशूकः स्रंसनीयपाचनीयार्शोघ्नानां ताभ्यास ग्रहणीदोषशो फार्शोघृत व्यापत्प्रशमनानां क्रव्यान्मांसरसाभ्यासो ग्रहणीदोपशोपार्शोन्नानां, क्षीरघृताभ्यासी रसायनानां, समघृतसक्तुप्राशाभ्यासो वृष्योदावर्तहराणां, तैलगण्डूषाभ्यासो दन्तबलरुचिकराणां, चन्दैनं दुर्गन्धहरदाह निर्वापणलेपनानां, रास्नागुरुणी शीतापनयनप्रले-पनानां, लामज्जकोशीरं दाहत्वग्दोषस्वेदापनयनप्रलेपनानां, कुष्ठं वातहराभ्यङ्गोपनाहोपयो-गिनां, मधुकं चतुष्यवृष्यकेश्य कण्ठ्य वर्ण्यविरजनीयरोपणीयानां वायुः प्राणसंज्ञाप्रदान-हेतूनाम्, अग्निरामस्तम्भशीत शूलोद्वेपनप्रशमनानां, जलं स्तम्भनीयानां मृद्धृष्टलोष्ट्रनिर्वा-पितमुदकं तृष्णाच्छुर्द्यतियोगप्रशमनानाम्, अतिमात्राशनमामप्रदोषहेतूनां यथाग्नयभ्यव-हारोऽग्निसंधुक्षणानां यथासात्म्यं चेष्टाभ्यवहारौ सेव्यानां, कालभोजनमारोग्यकराणां, नृप्तिराहारगुणानां, वेगसंधारणमनारोग्यकराणां, मद्यं सौमनस्यजननानां, मद्याक्षेपो धीष्टति-स्मृतिहराणां, गुरुभोजनं दुर्विपाककराणाम, एकाशनभोजनं सुखपरिणामकराणां स्त्रोत-प्रसङ्गः शोषकराणां, शुक्रवेग निग्रहः पाण्ड्यकराणां, पैरावाननमन्ना श्रद्धाजननानाम, अनशन-१. ' नन्दकमिति मन्द्रजातन्' चक्रः । २. ' चन्दनोदुम्बरे ' इति पा. । ३. ‘ मृद्गुष्टलोष्टप्रसादः ' यो. । ४. ' परावानं वधानं वध्यमानप्रादर्शनादि वृणया नान्ने श्रद्धा स्यात् चक्रः, ' परा-यतनम् ' ग. । ५. ' अनशनमनायु कराणाम् ' यो ।

पृष्ठ 558

चरक संहिता हिन्दी भाष्य, पृष्ठ 558 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

यज: पुरुषीयाध्यायः २५ ] दाससेनः । ७. ' फलातिपत्ति ' इति पा ० । ४६६ सूत्रस्थानम् ८. ' अमृतानामिति जीवितप्रधा ( दा ) नहेतूनाम् ' चक्रः । मायुषो हासकराणां, प्रमिनाशनं कर्शनीयानाम्, अजीर्णाध्यशनं ग्रहणीदूषणानां विषमाश-नमग्निवैषम्यकराणां विरुद्धवीर्याशनं निन्दितव्याधिकराणां, प्रशमः पथ्यानाम्, आयासः सर्वापथ्यानां मिथ्यायोगो व्यधिकराणां, रजस्वलाभिगमनम लक्ष्मीमुखानां ब्रह्मचर्य -मायुष्याणां परदाराभिगमनमनायुष्याणां, संकल्पो वृष्याणां दौर्मनस्यमवृष्याणाम्, अयथा-बलमारम्भः प्राणोपरोधिनां विषादो रोगवर्धनानां, स्नानं श्रमहराणां, हर्षः प्रीणनानां, शोकः शोषणानां, निवृत्तिः पुष्टिकराणां, पुष्टिः स्वप्नकराणाम्, अतिस्वमस्तन्द्राकराणां, सर्वरसाभ्यासो बलकराणाम, एकरसाभ्यासो दौर्बल्यकराणां, गर्भशल्य माहार्याणाम्, अजीर्ण-मुद्रार्याणां वालो मृदुभेषजीयानां वृद्धो याप्यानां, गर्भिणी तीक्ष्णौषधव्यवायव्यायामव-र्जनीयानां सौमनस्यं गर्भधारणानां सन्निपातो दुश्चिकित्स्यानाम्, आमो विषमचिकि-त्स्यानां, ज्वरो रोगाणां, कुष्ठं दीर्घरोगाणां, राजयक्ष्मा रोगसमूहानां प्रमेहोऽनुपङ्क्षिणां, जलौकसोऽनुशस्त्राणां, बस्तिस्तन्त्राणां, हिमवानोषधिभूमीनां, सोम ओषधीनां, मरुभूमिरा-रोग्यदेशानाम्, अनूपोऽहितदेशानां निर्देशकारित्वमातुरगुणानां भिषक चिकित्साङ्गानां, नास्तिको वर्ज्यानां लौल्यं कुशकराणाम्, अनिर्देशकारित्वमरिष्टानाम्, अनिर्वेदो बार्तलक्ष-नां वैद्यसमूहो निःसंशयकराणां, योगो वैद्यगुणानां विज्ञानमोषधीनां, शास्त्रसहित-स्तर्कः साधनानां संप्रतिपत्तिः कालज्ञानप्रयोजनानाम्, अव्यवसायः कालातिपत्ति-वृदां, दृष्टकर्मता निःसंशयकराणाम, असमर्थता भयकराणां तद्विद्यसंभाषा बुद्धिवर्धनानाम्, आचार्यः शास्त्राधिगमहेतृनाम्, आयुर्वेदोऽमृतानां सद्वचनमनुष्ठेयानाम्, असद्ग्रहणं सर्वाहितानां सर्वसंन्यासः सुखानामिति ॥ ४० ॥

प्रधान औषध द्रयों के दिन तथा अहितकर कर्म के उदाहरण - अब पुनः कर्मों की दृष्टि से औषध द्रव्यों का प्रधान रूप से तथा उसके साथ २ अन्य द्रव्यों एवं भावों का भी वर्णन किया जायगा । यथा - शरीर का यापन ( धारण ) करने वाले पदार्थों में अन्न सर्वश्रेष्ठ है; श्वासन ( सन्तोष ) पदार्थों में जल सर्वश्रेष्ठ है; थकावट दूर करने वाले पदार्थों में सुरा ( मद्य ); जीवनीय द्रव्यों में दूध, बृंहण ( शरीर वृद्धिकारक ) पदार्थों में मांस; तृप्तिदायक पदार्थों में मांस-रस; भोज्य पदार्थों में रूचि उत्पन्न करने वाले पदार्थों में नमक; हृदय को प्रिय लगने वालों में अम्ल ( खट्टे ) पदार्थ वृद्धिकरों में मुर्गा का मांस शुक्रवर्द्धक में घड़ियाल का शुक्र; कफ - पित्त को शान्त करने वालों में मंत्र; वात और पित्त को शान्त करने वालों में घृत दान और कफ को शान्त करने वालों में तेल कफहरों में वमनः पित्तहरों में विरेचन; वातहरों में वस्तिकर्म; मृदुता ( शरीर में ) उत्पन्न करने वालों में स्वेद; शरीर में स्थिरता ( दृढ़ता ) उत्पन्न करने वालों में व्यायाम पुंस्त्वशक्ति नष्ट करने वालों में क्षार; अन्न द्रव्यों में रुचि न पैदा करने वालों में तिन्दुक, कंठ के लिए अहितकर द्रव्यों में कच्चा कैथ; हृदय के लिये अहितकर पदार्थों में भेड़ का घी; शोष को नष्ट करने वालों में स्तन्य ( दूध ); सात्म्य, दोषनाशक, रक्त को रोकने वाले १. ' व्याधिमुखानाम् ' इति पा । २. ‘ संकल्पः स्त्रीसंगसंकल्पः ' चक्रः । ' संकल्पः स्त्रीसंगमे तद्गुणादिविकल्पनम् ' अष्टाङ्गसंग्रह-टीकायामिन्दुः । ३. ' तन्त्राणामिति कर्मणाम् ' चक्रः । ४. ' नास्तिकोऽवर्याणाम् ' ग. । ५. ' वार्तलक्षणानामित्यारोग्यलक्षणानाम् ' चक्रः । ' अथार्ता सारलक्षणानाम् ' ग. । ६. ' संप्रतिपत्तिः यथा कर्तव्यतानुष्ठानम् ' चक्रः । ' कालानतिक्रमेण कार्यकरणं संप्रतिपत्तिः ' शिव-

पृष्ठ 559

चरक संहिता हिन्दी भाष्य, पृष्ठ 559 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

४७० चरकसंहिता तथा रक्त - पित्त को शान्त करने वालों में बकरी का दूध; कफ, पित्त को शरीर में उत्पन्न करने वालों में भेड़ का दूध; नींद लाने वालों में भैंस का दूध; अभिष्यन्द ( स्रोतों में अवरोध ) करने वालों में मन्दक दही ( जो दही पूर्णरूप से जमी न हो ); कृश करने वालों में गवेधुक ( मकई ) का भात; शरीर को रूखा करने वालों में उद्दालक ( कोदो ) का भोजन; मूत्र बढाने वालों में ईख; पुरीप उत्पन्न करने वालों में जौ; वायु उत्पन्न करने वालों में जामुन कफ, पित्त उत्पन्न करने वालों में शष्कुली ( पूड़ी ); अम्लपित्त उत्पन्न करने वालों में कुल्थी; कफपित्त उत्पन्न करने वालों में उड़द वमन, आस्थापन तथा अनुवासन में प्रयुक्त होने वाले द्रव्यों में मदनफल; सुख से विरेचन कराने वालों में त्रिवृत ( निशोध ); मृदु विरेचकों में अमलतास; तीक्ष्म विरेचनों में सेहुण्ड ( थूहर ) का दूध; शिरोविरेचन करने वालों में अपामार्ग और कृमिनाशकों में वायविडंग श्रेष्ठ हैं । विषनाशक द्रव्यों में शिरीप; कुष्ठनाशकों में खदिर; वातनाशक औषधों में रास्ना; वयःस्थापन ( आयु को स्थिर करने वाली ) औषधों में आँवला; पथ्य औषधों मे हरड़ दीपन, पाचन तथा आनाह को शान्त करने वालों में पिप्पलीमूल श्रेष्ठ है । दीपनीय, पाचनीय, गुदशोथ, अर्श और शूल नाशक द्रव्यों में चित्रकमूल; हिचकी, श्वास, कास और पार्श्व-शूल नाशक द्रव्यों में पुहकरमूल, संग्राहक, दीपनीय और पाचनीय द्रव्यों में नागरमोथा श्रेष्ठ है । दीपन, पाचन, वमन एवं अतिसार को शान्त करने वाली औषधों में सुगन्धवाला; संग्राहक, पाचन, दोपन औषधों में सोनापाठाः संग्राहक और रक्तपित्त नाशक औषधों में अनन्ता; संग्राहक, वातहर, दीपनीय, कफ, रक्तविकार एवं विवन्ध को नाश करने वाली औपधों में गुडूची; संग्राहक, दीपन, वातकफनाशक औषधों में बेल; दीपन, पाचन, संग्राहक तथा समस्त दोष नाशक औषधों में अतीस, संग्राहक तथा रक्तपित्त को शान्त करने वाले द्रव्यों में नीलोत्पल, श्वेत, कमल तथा कुमुद का केशर, पित्त, कफ को शान्त करने वालों में दुरालभा; रक्त और पित्त की वृद्धि को शान्त करने वालों में प्रियंगु कफ, पित्त तथा रक्त के संग्राहक तथा उन्हें सुखाने वाली औषधों में कुटज की छाल; रक्तसंग्राहक एवं रक्तपित्त को शान्त करने वालों में गन्नारी का फल, संग्राहक, वातहर, दीपन एवं वृष्य द्रव्यों में पृश्निपर्णी; वृष्य तथा तीनों दोषों को हरने वालों में शालपर्णी; संग्राहक, बल्य तथा वानहरों में बला ( बरियार ); मूत्रकृच्छनाशक तथा वातहरों में गोखरू; दोषों को बाहर करने वालों तथा दीपन, अनुलोमन एवं वात - कफ को शान्त करने वालों में हिंगुः भेदन, दीपन, अनुलोमन और वात कफनाशक द्रव्यों में अम्लवेतस; स्रंसन ( रेचन ), पाचन तथा अर्शनाशक औषध द्रव्यों में यवक्षार, ग्रहणी, शोय, अर्श तथा अत्यधिक घृत सेवन से उत्पन्न विकारों को शान्त करने वालों में तक्र ( मट्ठा ) का प्रतिदिन सेवन, ग्रहणी दोष, तथा अर्श को नष्ट करने वालों में मांसाहारी पशुपक्षियों के मांस का प्रतिदिन उपयोग: रसायन द्रव्यों में दूध - धी का सर्वदा सेवन, वृष्य एवं उदावत को नष्ट करने वालों ने समान घृन मिलाये हुए सत्तृका सेवन, दाँतों को दृढ़ करने वाले एवं रुचिवर्द्धक पदार्थों में तेल गण्डूष का धारण; दुर्गन्धनाशक और दाह शान्त करने वाले लेपों में चन्दनः शीतनाशक प्रलेपों में गरना और अगर; दाइ, चर्मरोग तथा पसीना को दूर करने वाले प्रलेगों में लामज्जक ( सुगन्धवाला ) तथा उशीर ( खस ); वातहर अभ्यंग तथा उपनाह में उपयोगी द्रव्यों में कुष्ठ ( कूठ ); नेत्र के लिए हितकर, बलवर्धक, पुरीप तथा मूत्र की विवर्णता को दूर करने वाले द्रव्यों में एवं नगरोपण करने वाले द्रव्यों में मुलेठी प्राण एवं संज्ञा देने वाले द्रव्यों में वायु ( हवा ): आम, स्तम्भ ( जकड़ाहट ), शीत, शूल और कम्प को शान्त करने वालों में अग्निः स्तम्भन पदार्थों में जल तथा अत्यधिक तृष्णा और वमनातियोग को शान्त करने वाले द्रयों में अग्नि में तपाये हुए मिट्टी

पृष्ठ 560

चरक संहिता हिन्दी भाष्य, पृष्ठ 560 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

यज्जः पुरुषीयाध्यायः २५ ] सूत्रस्थानम् ४७१ के ढेले से बुझाया हुआ जल सर्व श्रेष्ठ है । आमदोष को उत्पन्न करने वाले कारणों में अधिक मात्रा में भोजन करना प्रधान है । अग्निदीपक कारणों में अग्नि के अनुसार भोजन करना श्रेष्ठ है । सेवनीय कर्मों में सात्म्य के अनुसार आहार - विहार करना श्रेष्ठ है । आरोग्य करने वालों में समय पर भोजन करना श्रेष्ठ है । आहार के गुणों में तृप्ति; रोगोत्पादक कारणों में ( मल के वेगों का धारण ) पुरीषसंग्रहण, मन को प्रसन्न करने वालों में मद्य ( सुरा ); बुद्धि, धैर्य और स्मृति को नष्ट करने वालों में मद्य का अनियमित सेवन; दुष्पाच्य द्रव्यों में गुरु भोजन; सुखपूर्वक पचने वालों में एक समय भोजन, शोप ( सूखारोग ) के हेतुओं में अतिमैथुन; नपुंसकना उत्पन्न करने वालों में शुक्र के वेग का धारणः अन्न में अश्रद्धा उत्पन्न करने वालों में वधस्थान ( Slaughter House ); आयु को घटाने वालों में अनशन ( उपवास ); कृश करने वालों में अत्यल भोजन; ग्रहणी को दूषित करने वालों में अजीर्ण भोजन; जठराग्नि को विषम करने वालों में विषम ( कभी कम, कभी अधिक, कभी जल्दी, कभी देर से ) भोजन; निन्दित रोगों ( कुष्ठ ) को उत्पन्न करने वालों में विरुद्ध वीर्य वाले अन्नों को एक साथ मिलाकर सेवन करना; शरीर और मन के लिए हितकर पदार्थों में शान्तिः पूर्णतः अहितकर पदार्थों में अत्यधिक परिश्रम; काल, बुद्धि तथा इन्द्रियों का मिथ्यायोग ( अयोग, अतियोग तथा मिथ्यायोग ) व्याधि के कारणों में मुख्यतम है; अलक्ष्मी ( दरिद्रता ) के कारणों में रजस्वला स्त्री के साथ मैथुन करना; आयुवर्द्धक कार्यों में ब्रह्मचर्य सर्वश्रेष्ठ है । अनायुष्यों में परस्त्रीगमन; वृष्यों ( मैथुन शक्ति को बढ़ाने वालों ) में संकल्प ( दृढ़ इच्छा - शक्ति ) प्रधान है । अवृष्यों में मन का ( शोक - चिन्तायुक्त ) विकृत होना; जीवन - शक्ति को कम करने वालों में बल से अधिक कार्य करना; रोग को बढ़ाने वाले कारणों में विषाद ( दु: ख ) प्रधान है । थकावट दूर करने वालों में स्नान; संतृप्त करने वालों में हर्ष; शरीर को सुखा देने वालों में शोकः शरीर को पुष्ट करने वालों में मन की शान्ति सर्वश्रेष्ठ हैं । निद्रा लाने वालों में पुष्टि ( शारीरिक उपचय ); तन्द्रा लाने वालों में अत्यधिक सोना प्रधान है । बलकारक में सभी रसों ( ६ रसों ) का सर्वदा सेवन; दुर्बलता - कारक में किसी एक रस का निरन्तर सेवन; बाहर निकाले जाने वाले शल्यों में गर्भ शल्य; उद्धरणीय ( निवारणीय ) रोगों में अजीर्ण; मृदु औषधों के योग्य पुरुषों में बालक; यापन के योग्य पुरुषों में वृद्ध; तीक्ष्ण औषध एवं व्यायाम के अयोग्य पुरुषों में गर्भिणी स्त्री; गर्भ धारण कराने वालों में मन की प्रसन्नता; कष्टसाध्य रोगों में सन्निपात; जिनकी चिकित्सा अधिक कठिन है उनमें आमविष; रोगों में ज्वर; चिरकालीन रोगों में कुष्ठ; जिन रोगों में रोग का समूह उत्पन्न हो जाता है उनमें राजयक्ष्मा; नित्य लगे रहने वाले और बार - बार होने वाले रोगों में प्रमेह; अनुशस्त्रों में जोंक; साधनों में वस्ति; औषधों की भूमि में हिमवान् ( हिमालय ); औषधियों में सोम; आरोग्यकर भूमि में मरु भूमि; अहितकर देशों में अनूपदेश; रोगी के गुणों में आज्ञाकारित्व; चिकित्सा के अंगों में वैद्य; वर्जनीय व्यक्तियों में नास्तिकः कष्ट देने वालों में लालच; अरिष्ट लक्षणों में वैद्य के आदेश का पालन न करना; आरोग्य के लक्षणों में मन में खेद का न होना; संशय को दूर करने वालों में वैद्य - समूह; वैद्य के गुणों में कर्म में कुशलता; औषधियों में विज्ञान ( विशेष ज्ञान ); विषय को सिद्ध करने वालों में शास्त्रयुक्त तर्क; कालज्ञान के प्रयोजनों में कर्त्तव्य ( कर्मों ) का सम्यक् अनुष्ठान; काल को व्यर्थं बिताने में अव्यवसायः संशय दूर करने वालों में कर्म का देखना; भय उत्पन्न करने वालों में असमर्थता; बुद्धि बढ़ाने वाले उपायों में विशेषज्ञों से विचार - विमर्श करना; विद्या प्राप्ति के कारणों में आचार्य; अमृत ( जीवन - दान के कारणों ) में आयुर्वेद; अनुष्ठेय कर्मों में सत्पुरुषों के कर्म; सभी अहितकर कर्मों में असद् - ग्रहण, सुखोत्पादक कारणों में सब काम्यकर्मों का त्याग सर्वश्रेष्ठ है || ४० ||