चरक संहिता हिन्दी भाष्य — पृष्ठ 561–570

चरक संहिता हिन्दी भाष्य · Chaukhamba · पृष्ठ 561–570

पृष्ठ 561

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४७२ चरकसंहिता विमर्श - इस प्रकरण में उन कर्मों तथा औषधों का उपदेश किया गया है जो हितकर एवं अहितकर कर्मों और औषधों में श्रेष्ठ हैं । इसके अतिरिक्त कुछ प्रधान एवं अन्य भावों का भी संकेत किया गया है, जिनका निम्नतालिका के रूप में संग्रह किया जा रहा है— आहार द्रव्य औषध द्रव्य १ अन्न श्रेष्टहितकर वृत्तिकर श्रेष्ठ अहितकर २ जल ३ सुरा सुरा आश्वासकर श्रमहर ४ दुग्ध दूध जीवनीय ५ मांस बृंहण ६ मांसरस तर्पण ७ लवण लवण अन्नद्रव्य में रुचिकारक ८ अम्लरस अम्लरस हृद्य ९ कुक्कुट ( मुर्गा का मांस ) वल्य १० नक्र रेनम् वृष्य ११ मधु मधु १२ घृत घी १३ तैल III १४ १५ १६ क्षार तिन्दुक कच्चा केंथ श्लेष्म - पित्तनाशक वात - पित्तनाशक बात- इलेष्मनाशक पुंस्त्वोपघाती अन्नद्रव्य में अरुचि -कारक कण्ठ को खराब करने १७ १८ वकरी का दूध भेड़ी का घी अजाक्षीर वाला अहृद्य शोषघ्न, स्तन्य, सात्म्य, डोपन, रक्तसांग्रा हिक, रक्तपित्तप्रशमन श्लेष्मपित्तोपचयकारक १ ९ नेड़ी का दूध २० भैंस का दूध निद्राकर २१ मन्द्रदधि २२ गवेधुक २३ उद्दालक ( कोदो ): अभिष्यन्दकारक कर्शन ( शरीर को कृश करने वाला ), विरूक्षण ( शरीर को रूक्ष करने वाला ) २४ ईख ईख २५ जौ मूत्रजनन पुरीषजनन २६ जामुन जामुन २७ शष्कुली २८ कुल्थी कुल्थी २ ९ उड़द ( माष ) वानजनन इलेष्मपित्तजनन अम्लपित्तजनन श्लेष्मपित्तजनन

पृष्ठ 562

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यज्जः पुरुषीयाध्यायः २५ ] सूत्रस्थानम् आहार द्रव्य औषध द्रव्य श्रेष्ठहितकर श्रेष्ठ अ ३० मैनफल वमन, निरूह तथा अनुवासनोपयोगी ३१ त्रिवृत् ( निशोथ ) सुखविरेचक ३२ अमलतास मृदुविरेचक ३३ नही क्षीर तीक्ष्णविरेचक ३४ अपामार्ग शिरोविरेचक ३५ विडङ्ग कृमिनाशक ३६ शिरीष विषनाशक ३७ खदिर कुष्ठनाशक ३८ राखा ३ ९ ४० ४१ ४२ एरण्डमूल पिपरामूल ४३ आमला हरीतकी वातहर वयःस्थापन पथ्य वृष्य, वानहर दीपन, पाचन, आनाह-प्रशमन, चित्रकमूल दीपन, पाचन, गुद-शूलनाशक, अर्शहर ४४ हिक्का, कास, श्वास पुष्करमूल और पार्श्वशूल नाशक ४५ नागरमोथा संग्राहक, दीपन, पाचन, ४६ सुगन्धवाला दाहप्रशमन, दीपन, पाचन, छर्दि और अतिसार - नाशक ४७ सोनापाठा संग्राहक, दीपन, पाचन ४८ अनन्तमूल संग्राहक, दीपन, रक्त-पित्तप्रशमन II गुडूची संग्राहक, वातहर, दीपन, इलेष्म तथा शोणित - विबन्धहर ५० बिल्व संग्राहक, दीपन, वात - कफ - प्रशमन ५१ अतिविषा ५२ नीलोत्पल, लाल कमल ५३ दुरालभा और कुमुद का केशर दीपन, पाचन, संग्रा हक, सर्वदोषहर संग्राहक, रक्तपित्त-प्रशमन पित्तश्लेष्मप्रशमन

पृष्ठ 563

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द्रव्य चरकसंहिता औषध द्रव्य गन्धप्रियंगु श्रेष्ठहितकर शोणितपित्तातियोग-प्रशमन कुटजत्वक् इलेष्म- पित्त - रक्त - संग्रा-हक और उपशोषण गम्भारीफल रक्तसंग्राहक, रक्त-पित्त - प्रशमन पृश्चिपण संग्राहक, वातहर, दीपन, वृष्य शालपर्णी वृष्य और सर्वदोषहर बला संग्राहक, बल्य, वातहर गोक्षुरक वल्य, मूत्रकृच्छ्रनाशक और वातहर हिंगु छेदन, दीपन, भेदन, अनुलोमन, वातकफ-प्रशमन अम्लवेतस भेदन, दीपन, अनु-यावशूक चन्दनलेप लोमन, वातश्लेष्म-प्रशमन स्रंसन, पाचन, अर्शोघ्न दाहप्रशमन उदुम्बरलेप दाहप्रशमन रास्नालेप, अगलेप शीतापनयन लामज्जक दाहप्रशमन, त्वग-दोषहर तथा स्वेदा पनयन कुष्ठ ( अभ्यंग में ) वातहर ( अभ्यंग और मुलेठी वायु अग्नि जल मृदभृष्टलोष्ट्र निर्वापित-जल मद्य उपनाह ) चक्षुष्य, वृष्य, केश्य, कण्ठ्य, वर्ण्य, बल्य, विरजनीय, रोपण प्राणधारक आम - स्तम्भ, शीत-शूल - कम्पनाशक स्तम्भन तृष्णाति योग- प्रशमन सौमनस्यजनन

पृष्ठ 564

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यः पुरुषीयाध्यायः २५ ] सूत्रस्थानम् भाव ७५ तक्रसेवन का अभ्यास ७६ क्रव्याद - मांस रसाभ्यास ७७ नक्षीर अभ्यास ७८ समधृत, मत्तृ प्राशाभ्यास ७ ९ ८० वमन पायांस ८१ विरेचन ८२ वस्ति कर्म ८३ स्वेदन कर्म ८४ व्यायाम प्रभाव ग्रहणी दोष, अर्श और ताप का न ग्रहणीदोष शोष- अर्शनाशक | रसायनों में श्रेष्ट वृष्य उदाहर दन्तवलकर, रुचिकर कफसंशोधन पित्तसंशोधन वातसंशोधन मार्दवकर शरीर में स्वेर्व उत्पन्न करनेवाला आमदोष को बढ़ानेवाला ८५ अनिमात्राशन ८६ वधाऽग्निभोजन ८७ यथासाम्य चेष्टा और भोजन अग्निसंधुक्षण करनेवाला उपसेन्य ८८ काल भोजन ( समय पर भोजन करना ) | आरोग्यकर ८ ९ मल - मूत्र आदि का वेगसंधारण रोगकार ९ ० तृप्ति ९ १ माक्षेप ९ २ गुरुभोजन ९ ३ एककालभोजन ९ ४ अतिसंभोग ९ ५ शुक्र वे गरोकना ९ ६ पराघातन ( वधस्थान ) ९ ७ अनशन ९ ८ प्रमिताशन ९९ अजीर्ण में भोजन अथवा अध्यशन १०० दिपमाशन १०१ विरुद्धवीर्यभोजन आहार गुण बुद्धि स्मृति और धैर्य का नाशक अजात्यादक सुख - परिणामकर शोषकर नपुंसकता उत्पन्न करनेवाला अन में अरुचि करनेवाला आयुहासकर शरीर का कर्शन ग्रहणीदूषक अभिवैपम्यकर निन्दित व्याधियों को उत्पन्न करने वाला पथ्य अपथ्यकर रोग के कारण दारिद्र्यजनक १०२ प्रशम ( शान्ति, कामादि से निवृत्ति ) १०३ आयास ( थकावड ) १०४ मिव्यायोग १०५ रजस्वलाभिगमन २०६ ह्मचर्य १०० पदाभिगमन १०८ स्त्री संकल्प १० ९ दौर्मनस्य ( मानसिक शैथिल्य ) वृष्य अवृष्य ११० अयथाबल आरम्भ ( शक्ति से अधिक कार्य! प्राणनाशक आयुवर्धक आयुनाशक करना ) २११ विषाद रोगवर्धक

पृष्ठ 565

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४७६ भाव ११२ खान ११३ हर्ष ( प्रसन्नता ) ११४ शोक ( दुःख ) ११५ निर्वृत्ति ( मन की शान्ति ) उपचय होना ) ११७ अतिनिद्रा ११८ सर्वरसाभ्यास ११ ९ एकरसाभ्यास १२० गर्भशल्य १२१ अजीर्ण १२२ बालक १२३ वृद्ध १२४ गर्भिणी ( गर्भवती स्त्री ) १२५ मन की प्रसन्नता १२६ सन्निपात ( रोग ) १२७ आमविष १२८ स्वर १२ ९ कुष्ठ १३० राजयक्ष्मा १३१ प्रमेह १३२ जलौका १३३ वस्ति १३४ हिमालय पर्वत १३५ सोम १३६ मरुभूमि १३७ अनूपदेश १३८ निर्देशकारित्व १३ ९ वैद्य १४० नास्तिक १४१ लौल्य १४२ अनिर्देशकारित्व १४३ अनिर्वेद १.४४ वैद्यसमृह् १४५ योग ( औषध - योजना ). १४६ विज्ञान १४७ शास्त्रसहित तर्क १४८ कर्म का सम्यक् सम्पादन चरकसंहिता प्रभाव श्रमहर तृप्तिकर शरीर को मुखाने वाला पुष्टिकर तन्द्राकर बलकर दौर्बल्यजनक आय उद्धरणीय मृदुऔषध देने योग्य यापन करने योग्य तीक्ष्ण औषध मैथुन तथा व्यायाम के अन गर्भधारक दुश्चिकिल्ल्य विषमचिकित्स्य रोगराद चिरकालिक रोग रोग समुह अनुषंगी अनुशस्त्र तंत्र औषधभूमि औषध में श्रेष्ठ आरोग्यजनक अनारोग्यकर आनुरगुण चिकित्सा में श्रेष्ठ वर्ज्य क्लेशकर अरिष्टकर वातर्लक्षण संशय नष्ट करने वाला वैद्य का गुण औषधि साधन काल ज्ञान का प्रयोजन ११६ पुष्टि ( शरीर में मांस आदि का ठीक से निद्राकर

पृष्ठ 566

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यज्जः पुरुपीयाध्यायः २५ ] भाव १४ ९ अव्यवसाय १५० दृष्टकर्मना १५१ असमर्थता १५२ तद्विद्यसंभाषा १५३ आचार्य १५४ आयुर्वेद १५५ सहचन १५६ असम्बद्ध वचन १५७ सर्वसन्यास भवन्ति चात्र-१. ' अलमिति समर्थम् ' चक्रः । ४७७ सूत्रस्थानम् प्रभाव समय व्यर्थ विताना निःसंशयकर भयकर बुद्धिवर्धक विद्या प्राप्ति का कारण जीवनदायक अनुष्ठेय असंग्राह्य तथा सर्वाहितकर सुखोत्पादक २. ' कार्यकर्तृत्वेऽवरत्वम् ' ग. । मूल में १५२ अग्रथ का निर्देश किया है । पर मूल की गणना करने पर १५७ कुल अग्रथ होते है | सुग. तिन्दुक और उदुम्बर ये तीन प्रक्षिप्त हैं, यह मूल से ही ज्ञात होता है क्योंकि ये कोष्ठक नें पढ़े गये है । शेष २ का ज्ञान नहीं होता कि कौन प्रक्षिप्त हैं इसे विज्ञ विचारक स्वतः समझे । अग्रयाणां शतमुद्दिष्टं यद्विपञ्चाशदुत्तरम् | अलमेतद्विकाराणां विघातायोपदिश्यते ॥४१ ॥

हिनाहित आहार का उपसंहार - यहाँ पर वे जो १५२ श्रेष्ठ भाव कहे गये हैं । वे रोगों के नाश के लिये पर्याप्त हैं ॥ ४१ ॥

विमर्श - यहाँ पर यह जो भिन्न - भिन्न वस्तुओं में भिन्न - भिन्न द्रव्य और कार्यों को श्रेष्ठ माना गया है, इनके द्वारा चिकित्सा और पथ्य की व्यवस्था में पूर्ण रूप से सहायता मिलती है । साथ ही रोगों के निदान और ज्ञान में भी इससे सहायता मिलती है । इसलिये इन भावों को चिकित्सा की दृष्टि में पर्याप्त माना गया है । समानकारिणो येऽर्थास्तेषां श्रेष्ठस्य लक्षणम् । ज्यायस्त्वं कार्यकर्तृत्वे वरेवं चाप्युदाहृतम् ॥ और भी - एक समान कार्य करने वाले जो भाव है उनमें श्रेष्ठ का और साथ ही कार्य करने में उनकी श्रेष्ठता तथा अश्रेष्ठता भी बताई गई है ॥ ४२ ॥

विमर्श - तात्पर्य यह है कि यहां इस १५२ श्रेष्ठ भावों में तुल्य कार्य करने वाले पदार्थों में जो एक सर्व श्रेष्ठ होता है, उसका वर्णन यहां बताया गया है । जैसे वृत्तिकर अर्थात् जीवन की वृत्ति ( व्यवहार कार्य ) करने वाले अनेक द्रव्य हैं, जैसे अन्न, जल, विहार, ब्रह्मचर्य, स्वम आदि पर उन वृत्तिकर भावों में अन्न सर्व श्रेष्ठ होता है । इसी प्रकार शरीर के आध्यापन के लिये हर्ष, स्वप्न, भोजन, जल आदि अनेक वस्तुयें है पर उन आध्यापन करने वाली वस्तुओं में जल सर्वश्रेष्ठ है, यह यहां सूचित किया गया है । जिस प्रकार यहां पदार्थों की श्रेष्ठता बताई गई है । उसी प्रकार अपथ्य की दृष्टि से अश्रेष्ठता भी बतायी गयी है, जैसे क्षार पुंस्त्व शक्ति को नाश करने में सर्वश्रेष्ठ है । अर्थात् सबसे अधिक हानि पुंस्स्व शक्ति के लिये क्षार ही पहुंचाता है तथा अहित देशों में आनूप देश सबसे अधिक हानि पहुंचाने वाला है । इन दोनों ( श्रेष्ठ, अश्रेष्ठ ) का वर्णन और उदाहरण यहां स्पष्ट किया गया है । वातपित्तकफानां च यद्यत् प्रशमने हितम् । प्राधान्यतश्च निर्दिष्टं यद्व्याधिहरमुत्तमम् ॥ और भी इन श्रेष्ठ भावों का वर्णन करते समय वात, पित्त, कफ को शान्त करने में जो

पृष्ठ 567

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४७८ चरकसंहिता प्रधान रूप से हितकर हैं तथा रोगों को नष्ट करने में श्रेष्ठ हैं, उन भावों का भी इन श्रेष्ठ भावों में वर्णन किया गया है ॥ ४३ ॥ •

एतन्निशम्य निपुणं चिकित्सां संप्रयोजयेत् । एवं कुर्वन् सदा वैद्यो धर्मकामौ समश्रुते || १४ || और है कि इस अग्रथ अधिकार में बनाये हुये भी - • कुशल वैद्य के लिये यह आवश्यक वस्तुओं को सुनकर ( जनकर ) चिकित्सा का प्रयोग करे इस प्रकार करने से वैद्य सर्वदा धर्म और काम को प्राप्त करता है ॥ ४४ ॥

I पथ्यं पथोऽनपेतं यद्यञ्चोक्तं मनसः प्रियम् । यचाप्रियमपथ्यं च नियतं तन्न लक्षयेत् ॥ मात्राकालक्रियाभूमिदेहदोषगुणान्तरम् । प्राप्य तत्तद्धि दृश्यन्ते ते ते भावास्तथा तथा ॥ पथ्य तथा अपथ्य के लक्षण - जो आहारादि द्रव्य पथ ( शारीरिक स्रोतों ) में अपकार ( हानि ) करने वाला न हो और मन के लिये प्रिय हो अर्थात् शरीर और मन के लिये हानि-कारक न हो उसे ' पथ्य ' कहते हैं । अपथ्य - जो आहारादि द्रव्य पथ ( शारीरिक स्रोतों ) नें अपकार ( हानि ) करने वाला हो तथा मन के लिये अप्रिय हो अर्थात् शरीर और मन के लिये हानिकारक हो उसे अपथ्य कहते हैं । यह पथ्य और अपथ्य वस्तु नियत रूप से नहीं रहने है । किन्तु पथ्य वस्तु भी मात्रा, काल, क्रिया, भूमि, देह, एवं डोप की विभिन्न अवस्थाओं को प्राप्त होकर अपथ्य हो जाती है । और इन्हीं कारणों से अपथ्य वस्तु भी पथ्य हो जाती है ॥ ४५-४६ ॥ विमर्श -तापर्य यह है, कि इस अग्रय अधिकार में जो पथ्य और अपथ्य भावों का वर्णन किया गया है, वह सामान्य दृष्टि से है । वस्तुतः मात्रादि पर ही पथ्यापथ्य का निचय निर्भर है, जैसे अन्न प्रत्येक प्राणी के लिये पथ्य एवं हितकर है पर वही अन्न मात्रादि का विचार न कर सेवन किया जाय तो अपव्य होता है, यथा- ' अनात्मवन्तः पशुवद् भुञ्जते येऽप्रमाणतः । रोगानीकस्य ते मूलमजीर्णे प्राप्नुवन्ति हि ॥ ' तथा ' प्राणाः प्राणभृतामन्नं तदयुक्त्या हिनम्म्यमून् । पिप्राणहरं तच्च युक्तियुक्तं रसायनन् । ' इसी प्रकार मद्य सभी प्राणियों के लिये अपथ्य एवं अहित-कर है । परन्तु मात्रादि के अनुसार उसका प्रयोग किया जाय तो लाभकर होता है, यथा-' किन्तु मद्यं स्वभावेन यथैवान्न तथा स्मृतम् । ' तस्मात् स्वभावो निर्दिष्टस्तथा मात्रादिराश्रयः । तदपेच्योभयं कर्म प्रयोज्यं सिद्धिमिच्छता ॥ और भी - इसलिये चिकित्सा में सफलता की कामना करने वाले चिकित्सकों के लिये उचित है कि जो स्वभावतः द्रव्यों के हितकर तथा अहितकर भाव बताये गये हैं और मात्रा आदि के अनुसार जो द्रव्यों के हिनकर तथा अहितकर बताये गये है, इन दोनों की अपेक्षा कर अर्थात् ज्ञान कर चिकित्सा कर्म में इनका प्रयोग करें ॥ ४७ ॥

* तदात्रेयस्य भगवतो वचनमनुनिशम्य पुनरपि भगवन्तमात्रेयमग्निवेश उवाच -यथोद्देशमभिनिर्दिष्टः केवलोऽयमर्थो भगवता श्रुतश्चास्माभिः । आसवद्रव्याणामिदानीमन-पवादं लक्षणमनतिसंक्षेपेणोपदिश्यमानं शुश्रूषामह इति ॥ ४८ ॥

१. ' पथः शरीरमार्गात् स्रोतोरूपादनपेतम् अपेतमपकारकम्, अनपेतमनपकारकमित्यर्थः पथ-ग्रहणेन पयो बाह्या दोषा धातवश्च तथा पथो निर्वर्तका धातवो गृह्यन्ते, तेन कृत्स्नमेव शरीरं गृहीतं भवति, ततश्च शरीरानुपधाति पथ्यमिति भवतिः मनसो हितमिति प्रियार्थः । एतेन मनःशरीरानु-पघाति पथ्यमिति पथ्यलक्षणमनपवादं भवति ' चक्रः । २. नियतं निश्चितमिदमप्रियमेव सर्वदेदमपथ्यमेवेत्येवंरूपं किञ्चिन्नास्तीत्यर्थः । कुतो नास्ती-त्याह - मात्रेत्यादि ' चक्रः ।

पृष्ठ 568

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यज्ञः पुरुपीयाध्यायः २५ ] सूत्रस्थानम् ( ३ ) ८४ आसवों का वर्णन ( Eighty - Four Fermentative Products ) ४७६ अग्निवेश का आसव- विषयक प्रश्न - इस प्रकार भगवान आत्रेय के वचनों को सुनकर अग्निवेश ने पुन: भगवान आत्रेय से कहा कि जो आपने संक्षेप में इन विषयों का निर्देश किया है, उन सभी विषयों को हमने आप से सुन लिया है । अब इस समय विस्तारपूर्वक आप से उपदेश किये गये आसव द्रव्यों के निश्चित लक्षणों को सुनना चाहता हूँ । ॐ तमुवाच भगवानात्रेयः -- धान्यफलमूलसारपुष्पकाण्डपत्रत्वचो भवन्त्यासवयोन-योऽग्निवेश! संग्रहेणाष्टौ शर्करानवमीकाः ( १ ) । नव आसव योनियाँ — - अग्निवेश से भगवान आत्रेय ने कहा कि हे अग्निवेश! धान्य, फल, मूल, सार, पुष्प, काण्ड, पत्र व छिलका यह आठ और शर्करा ( खाँड़ ) यह नौ द्रव्य आसव के मूलद्रव्य हैं । इन्हीं से आसवों का निर्माण किया जाता है ( १ ) । तास्वेव द्रव्यसंयोगकरणतोऽपरिसंख्येयासु यथापथ्यतमानामासवानां चतुरशीति निवोध । तद्यथा - सुरासौवीरतुषोदकमैरेयमेदकधान्याम्लाः षड् धान्यासवा भवन्ति, मृद्वीकाखर्जूर काश्मर्यधन्वनराजादनतृणशून्यपरूपकाभयामलकमृगलिण्डिकाजास्ववकपित्थ-कुवलबदर कर्कन्धुपीलुप्रियालपनसन्यग्रोधाश्वत्थप्लक्ष कपीतनोदुम्बराजमोदशृङ्गाटकशङ्खिनी-फलासवाः षड्विंशतिर्भवन्ति, विदारिगन्धाश्वगन्धाकृष्णगन्धा शतावरीश्यामात्रिवृदन्ती-द्रवन्तीविल्वोरुबूकचित्रकमूलैरेकादश मूलासवा भवन्ति, शालप्रियकाश्वकर्णचन्दनस्यन्द-नखदिरकदर सप्तपर्णार्जुनास नारिमेदतिन्दुक किणिही शमीशुक्तिशिशपाशिरीषवञ्जुलधन्वनम-धूः सारासवा विंशतिर्भवन्ति, पद्मोत्पलन लिन कुमुद सौगन्धिकपुण्डरीकशतपत्र मधूक-प्रियङ्गुधातकीपुष्पैर्दश पुष्पासवा भवन्ति, इक्षुकाण्डेदिवत्तुबालिका पुण्ड्रकचतुर्थाः काण्डा-सवा भवन्ति, पटोलताडकपत्रासवौ द्वौ भवतः, तिल्वे कलोधैलवालुकक्रमुकचतुर्थास्वगा-सवा भवन्ति, शर्करासव एक एवेति, एवमेषामासवानां चतुरशीतिः परस्परेणा संसृष्टानामा-सवद्रव्याणामुपनिर्दिष्टा भवति ( २ ) चौरासी ( ८४ ) आसवों के उदाहरण - यहाँ पर संक्षेप में जो नव आसवों के मूल द्रव्य बताये हुये हैं उन्हीं मूल द्रव्यों के संयोग और संस्कार के द्वारा आसव अगणित होते है । उन अगणित आसवों में ८४ आसव पथ्य होते हैं अर्थात् अधिकतर हितकर होते है । उनका वर्णन यहां दिया जाता है । उनको हे अग्निवेश तुम समझो । जैसे - ( १ ) सुरा, ( २ ) सौवीर ( ३ ) तुषोदक, ( ४ ) मैरेय, ( ५ ) मैदक, ( ६ ) धान्याम्ल ये छ: धान्यासव होते हैं । ( १ ) मुनक्का, ( २ ) खर्जूर, ( ३ ) गंभार, ( ४ ) धन्वन, ( ५ ) राजादन ( खिरनी ), ( ६ ) तृण-शून्य ( केवड़ा फल ), ( ७ ) परुषक ( फालसा ), ( ८ ) अभया ( हर्रे ), ( ९ ) आमला, ( १० ) मृगलिण्डिका ( बहेरा, विभीतकमिति चक्रः ), ( ११ ) जामुन, ( १२ ) कॅथ, ( १३ ) कुत्रल ( बडी बेर ), ( १४ ) वदर ( मध्यम बेर ), ( १५ ) कर्कन्धु ( झरबेर ), ( १६ ) पीलु ( जंगली फल ), ( १७ ) प्रियाल ( चिरौजी ), ( १८ ) पनस ( कटहल ), ( १ ९ ) न्यग्रोध ( वट ), ( २० ) पीपल, ( २१ ) पाकड़, ( २२ ) कपीतन ( आमड़ा ), ( २३ ) उडुम्बर ( गूलर ), ( २४ ) अजमोदा, ( २५ ) शृंगाटक ( सिवाड़ा ), ( २६ ) शंखिनी ( चोरपुष्पी ) ये छब्बीस १. द्रव्यञ्च संयोगश्च करणं च ततोऽपरिसंख्येयाः स्युः ' चक्रः । २. ' बिल्व ' इति पा ० ।

पृष्ठ 569

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४५० चरकसंहिता फलों के आसव होते है; अर्थात् इन छब्बीस द्रव्यों के फलों से जो आसव तैयार किये जाते हैं, उन्हें फलासव कहते हैं । ( १ ) विदारिगंधा ( सरिवन ), ( २ ) असगंध, ( ३ ) कृष्णगंधा ( सहिजन ), ( ४ ) शतावर, ( ५ ) काला निशोथ, ( ६ ) सफेद निशोथ, ( ७ ) दंती, ( ८ ) द्रवन्ती, ( ९ ) वेल, ( ५० ) एरण्ड, ( ११ ) चित्रक इनके मूल से बनाये गये ग्यारह आसवों का नाम मूलासव होता है । ( १ ) शाल ( सागौन ), ( २ ) प्रियक, ( ३ ) अश्वकर्ण ( साल ), ( ४ ) श्वेत चंदन, ( ५ ) स्यन्दन ( तिनिश ), ( ६ ) खदिर, ( ७ ) कदर ( श्वेन खदिर ), ( ८ ) सप्तवर्ग, ( ९ ) अर्जुन, ( १० ) असन ( विजयसार ), ( ११ ) अरिमेद ( विटखदिर ), ( १२ ) तिन्दुक ( तेंदु ), ( १३ ) किनही ( चिचिड़ी, अपामार्ग इति चक्र: ), ( १४ ) शमी, ( १५ ) शुक्ति ( बेर ), ( १६ ) शिंशपा ( शीशम ), ( १७ ) शिरीष, ( १८ ) वञ्जुल, ( १ ९ ) धन्वन, ( २० ) मधूक ( महुआ ) इनके सार से बनाये हुये बीस आसवों का नाम सारासव है । ( १ ) पद्म, ( २ ) उत्पल ( नील कमल ), ( ३ ) नलिन, ( ४ ) कुमुद ( कोंई ) ( ५ ) सौग-न्धिक, ( ६ ) पुण्डरीक ( श्वेत कमल ), ( ७ ) शतपत्र ( लाल कमल ), ( ८ ) नहुआ, ( ९ ) प्रियंगु, ( १० ) धाय इनके फूल से बनाये हुये दश आसवों का नाम पुष्पासव है! ( १ ) ईस. ( २ ) काण्डे, ( ३ ) इक्षुबालिका, ( ४ ) पुण्ड़क ये चार ईख के भेद हैं । इनके काण्ड से बनाये हुये चार आसवों का नाम काण्डासव होता है । ( १ ) पटोल, ( २ ) नाड़ इन दोनों के पत्र से बनाये हुए आसव का नाम पत्रासव होता है । ( १ ) तिल्वक, ( २ ) लोध, ( ३ ) एलुआ, ( ४ ) क्रमुक ( सुपारी ) इन चारों की छाल से बनाये हुये आसव का नाम त्वगासव है । ( १ ) शर्करा से बनाये हुये आसव का नाम शर्करासव होता है । इस प्रकार अलग - अलग द्रव्यों से बने हुये आसर्वो की संख्या ८४ होती है, जिनका आसव द्रव्यों के अनुसार यहाँ उपदेश किया गया है ( २ ) उपर्युक्त ८४ आसवों की गणना निम्नप्रकार से पूर्ण होती है-विमर्श - धान्यासव ६ फलासव २६ मूलासव ११ सारासव २० पुष्पासव १० काण्डासव ४ पत्रासव I त्वगासव ४ शर्करासव १ कुल ८४ आसव | एषामासवानामासुतत्वादासवसंज्ञा । द्रव्यसंयोगविभागविस्तारस्त्वेषां बहुविधकल्पः संस्कारश्च । यथास्वं संयोगसंस्कार संस्कृता ह्यासवाः स्वं कर्म कुर्वन्ति । संयोगसंस्कार-देशकालमात्रादयश्च भावास्तेषां तपामासवानां ते ते समुपदिश्यन्ते तत्तत्कार्यमभिसमी-चयेति ॥ ४ ९ ॥ आसाव की संज्ञा का आधार - इन आसवों की आसव संज्ञा इसलिये की गई है कि ये आसुत अर्थात् संधान क्रिया ( Fermentation ) के द्वारा निर्मित होने है । द्रव्यों के संयोग और विभाग का विस्तार किया जाय तो इन आसवों का भेद बहुत अधिक हो जाता है । १. ' आसुतत्वात् सन्धानरूपत्वात् ' चक्रः । २. ' संयोगसंस्कारादौ देशकालमात्रादयश्च भावास्तेषाम् ' ग. ।

पृष्ठ 570

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आत्रेयभद्रकाप्यीयाध्यायः २६ ] सूत्रस्थानम् ४८१ इसी तरह इन द्रव्यों के संस्कार भी अनेक प्रकार के होते हैं । अपने - अपने संयोग और संस्कारों से सिद्ध किये हुये आसब अपना - अपना कार्य करते हैं । इन आसवों के उन कर्मों का विचार करके द्रव्यों के संयोग, संस्कार देश, काल, तथा मात्रादि भावों का यहाँ उपदेश किया जा रहा है । उसे ठीक विचार कर काम में लाना चाहिये ॥ ४ ९ ॥

भवति चात्र-* मनःशरीरानिबलप्रदानामस्वनशोकारुविनाशनानाम् ।

संहर्षणानां प्रवरासवानामशीतिरुक्ता चतुरुत्तरैषा ॥ ५० ॥

आसव के गुण - मन, शरीर तथा अग्नि के बल को बढ़ाने वाले और अनिद्रा, शोक और अरुचि को नष्ट करने वाले, एवं मन को प्रसन्न करने वाले ८४ उत्तम आसवों का वर्णन यहाँ किया गया है ॥ ५० ॥

तत्र श्लोकः-शरीररोगप्रकृतौ मेतानि तत्त्वेन चाहारविनिश्वयं च ।

उवाच यज्जः पुरुषादिकेऽस्मिन्मुनिस्तथाऽग्रथाणि वरासवांश्च ॥ ५१ ॥

इत्यनिवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते सूत्रस्थाने अनपानचतुष्के यजः पुरुषीयो नाम पञ्चविंशतितमोऽध्यायः ॥ २५ ॥

अध्यायगत विषयों का उपसंहार - भगवान् पुनर्वसु ने इस अध्याय में शरीर, रोग, एवं उसकी प्रकृति ( कारण ) के सम्बन्ध में ऋषियों के मत, तत्त्वपूर्वक आहार विनिश्चय का श्रेष्ठ ( अग्रथ ) द्रव्य तथा उत्तम आसवों का वर्णन किया है ॥ ५१ । चरक के द्वारा प्रतिसंस्कृत अग्निवेशकृततन्त्र ( चरक संहिता ) के सूत्रस्थान में अन्नपान-चतुष्कविषयक पचीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ २५ ॥

अथ षड्विंशोऽध्यायः अथात आत्रेयभद्रकाप्यीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥

इति ह स्माह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥

अब ( यज्जः पुरुषीय के बाद ) आत्रेयभद्रकाप्यीय अध्याय की व्याख्या की जायगी । जैसा कि भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥ १-२ ॥ विमर्श - हितकारी और अहितकारी द्रव्यों का वर्णन पूर्व के अध्याय में उदाहरण स्वरूप किया जा चुका है । अब इस अध्याय में हितकर और अहितकर द्रव्यों के रस, गुण, वीर्य, विपाक तथा प्रभाव के अनुसार वर्णन किया जायगा, जिससे द्रव्यों के हिताहितत्व का निश्चित सिद्धान्त स्थिर किया जा सके । इस अध्याय का विषय सम्भाषा परिषद् के द्वारा निर्णीत है । परिषद् १. ' मनःशरीरेत्यादिना गुणकथनं युक्त्या पीतस्यासवस्य ज्ञेयम् ' चक्रः । २. ' शरीररोगप्रकृतौ मतानीति शरीररोगयोः कारणे ये मुनीनां मतभेदास्तानित्यर्थः ' शिवदासः । ३. ' चाहारविनिश्चयाय ' ग. । ३१ च ० सं ०