चरक संहिता हिन्दी भाष्य — पृष्ठ 571–580

चरक संहिता हिन्दी भाष्य · Chaukhamba · पृष्ठ 571–580

पृष्ठ 571

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४८२ चरकसंहिता के अध्यक्ष आत्रेय और प्रधान प्रष्टा भद्रकाप्य थे । अतः इन्हीं दोनों आचार्यों के नाम पर इस अध्याय का नाम आत्रेय भद्रकाप्यीय रखा गया है । आत्रेयो भइकाप्यश्च शाकुन्तेयस्तथैव च । पूर्णाक्षश्चंव मौल्यो हिरण्याक्षश्च कौशिकः ॥३ ॥

यः कुमारशिरा नाम भरद्वाजः स चानघः । श्रीमान् वायविदश्चैव राजा मतिमतां वरः ॥

निमिश्च राजा वैदेहो वडिशश्च महामतिः । काङ्कायनश्च बाह्रीको बाहीक भिषजां वरः एते श्रुतवयोवृद्धा जितात्मानो महर्षयः । वने चैत्ररथे रम्ये समीयुर्विजिहीर्षवः ॥ ६ ॥

( १ ) रस - संख्याविषयक सम्भापा - परिषद् ( Symposium on Number of Rasas ) सम्भाषा परिषद् के वक्ता - • मनोरम चैत्रन्थ नामक वन में विहार करने की इच्छा से, ( १ ) आत्रेय, ( २ ) भद्रकाप्य, ( ३ ) शाकुन्तेय, ( ४ ) मुगलगोत्रोत्पन्न पूर्णाक्ष, ( ५ ) कुशिक वंश में उत्पन्न कौशिक हिरण्याक्ष, ( ६ ) कुमारशिरा भरद्वाज जो सर्वथा पापरहित थे, ( ७ ) बुद्धि-मानों में श्रेष्ठ श्रीमान् राजा वाचविद, ( ८ ) विदेह देश के राजा निमि, ( ९ ) महामति बडिश, ( १० ) बाह्लीक देश के सर्वश्रेष्ठ वैद्य, वाहीक देशवासी काङ्कायन, ये दश महर्षि जो शास्त्र - ज्ञान में और क्य में श्रेष्ठ थे तथा जो अपने इन्द्रियों को वश में कर चुके हैं ऐसे महर्षिगण एकत्र हुए ||

तेषां तत्रोपविष्टानामियमर्थवती कथा । बभूवार्थविदां सम्यग्र साहारविनिश्वये ॥ ७ ॥

रम तथा आहार विचारार्थ विषय — उस चैत्ररथ वन में एकत्र बैठे हुए अर्थतन्त्र के ज्ञाता उन महर्षियों के बीच में रस द्वारा आहार के निश्रय करने के सम्बन्ध में यह अर्थयुक्त कथा ( वार्ता ) प्रारम्भ हुई ॥ ७ ॥

विमर्श - चक्रपाणि ने ' रसाहारविनिश्चय ' पर टीका करते हुये विचार प्रकट किया है कि रस के द्वारा आहार का निश्चय, यथा- ' रसेनाहारविनिश्चयो रसाहारविनिश्चयः, ( चक्र ० ) । दूसरा अर्थ उन्होंने किया है कि इस अध्याय के इलोक नं ० ५७ - परं चानो विपाकानां दक्षगं संप्रवक्ष्यते ' के आगे आहार विनिश्चय का वर्णन है तथा इसके पहले रसविनिश्चय का वर्णन है । * एक एव रस इत्युवाच भद्रकाप्यः, यं पञ्चानामिन्द्रियार्थानामन्यतमं जिह्वावैपयिकं भावमाचक्षते कुशलाः, स पुनरुदकादनन्य इति । ( १ ) भद्रकाप्य का एक रस पक्ष - भद्रकाप्य ने कहा कि रस एक ही प्रकार का होता है, कुशल विद्वान् गण कहते हैं कि पाँचो ज्ञानेन्द्रियों के अर्थों ( शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्व ) में एक मात्र जिह्वा इन्द्रिय का विषय रस होता है । वह रस जल से अभिन्न है अर्थात् जल और रस एक ही वस्तु है । * द्वौ रसाविति शाकुन्तेयो ब्राह्मणः, छेदनीय उपशमनीयश्चेति । ( २ ) शाकुन्तेय ब्राह्मण का दो रस पक्ष - शाकुन्तेय ब्राह्मण ने कहा कि रस दो प्रकार का होता है, ( १ ) छेदनीय और ( २ ) उपशमनीय । विमर्श - अर्थात् जो व्यक्त होते हुए जिह्वा इन्द्रिय से ग्राह्य है वह रस एक ही प्रकार का होता है पर कार्य के अनुसार उसके दो प्रकार और होते हैं । ( १ ) छेदनीय - जो शारीरिक दोषों का छेदन कर बाहर निकाल देते हैं उसे छेदनीय रस कहते हैं । ( २ ) उपशमनीय- जो शारीरिक दोषों को शरीर में ही शान्त कर देते हैं । १. ' महामुनिः ' यो । २. ' जिह्वापयिकमिति जिह्वाग्राह्यम् ' चक्रः ।

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आत्रेयभद्रकाप्यीयाध्यायः २६ ] सूत्रस्थानम् ४८३ * त्रयो रसा इति पूर्णाक्षो मौद्गल्यश्छेदनीयोपशमनीयसाधारेगा इति । ( ३ ) मौद्गल्य पूर्णाक्ष का तीन रस पक्ष -- मुगलगोत्रोत्पन्न पूर्णाक्ष ने कहा कि रस तीन प्रकार के होते है, ( १ ) छेनीय, ( २ ) उपशमनीय, ( ३ ) साधारण । विमर्श --जो अभिक होने हर रसनेन्द्रियग्राह्य होता है वह रस, एक होते हुए भी कार्य के अनुसार नीन प्रकार का होता है, जिसमें छेदनीय, उपशमनीय की व्याख्या ऊपर की गई है । साधारण उसे कहते हैं जो छेडनीय, उपशमनीय उभय गुण विशिष्ट हो । चक्रपाणि ने छेदनीय को अपतर्पण कारक, उपशमनीय को वृंगकारक, और साधारण को आग्नेय तथा सौम्य गुण मिश्रित होने से लङ्घन तथा वृंङगकारक या विरोधी होने से लङ्घन और वृंहण इन दोनों का कर्ता माना है । & चत्वारो रसा इति हिरण्याक्षः कौशिकः, स्वादुर्हितैश्च स्वादुरहितश्चास्वादुर्हितश्चास्वा-दुरहितश्चेति । ( ४ ) कौशिक हिरण्याक्ष का चार रस पक्ष – • कुशिक गोत्रोत्पन्न हिरण्याक्ष ने कहा कि रस चार प्रकार के होते हैं. ( १ ) स्वादु हिनकर, ( २ ) स्वादु अहितकर, ( ३ ) अस्वादु हितकर और ( ४ ) अस्वाद अहितकर । विमर्श - अभिव्यक्त होता हुआ रसनेन्द्रिय से ग्राह्य रस एक होता हुआ प्रभाव भेद से ४ प्रकार का होता है, ( १ ) स्वाद दिनकर – जैसे रक्तशालि, जौ, गेहूं, मूंग आदि, ( २ ) स्वादु अहितकर — जैसे उड़द आदि, ( ३ ) अम्बाद हितकर जैसे चुलुकी मछली की चर्बी, ( ४ ) अस्वादुं अहितकर - जैसे भेंडी का घृत । पञ्च रसा इति कुमारशिरा भरद्वाजः, भौमौदकाय वायव्यान्तरिक्षाः । ( ५ ) कुमारशिरा भरद्वाजका पाँच रस पच — कुमारशिरा भरद्वाज ने कहा रस पाँच प्रकार का होता है । ( १ ) भौम, ( २ ) जलीय, ( ३ ) आग्नेय, ( ४ ) वायव्य और ( ५ ) आकाशीय । विमर्श - अभिव्यक्त होते हुए रसनेन्द्रिय से ग्राह्य रस एक होते हुए उत्पत्ति के अनुसार पाँच प्रकार का होता है । अर्थात् पञ्चमहाभूत पाँच होते हैं उनसे उत्पन्न होनेवाला रस भी पाँच प्रकार का होता है । * पड्सा इति वायविदो राजर्षिः, गुरुलघुशीतोष्णस्निग्धरूक्षाः । -( ६ ) त्रायविद का छः रस पक्ष राजर्षि वार्योविद ने कहा कि रस के छ प्रकार होते । जैसे - ( १ ) गुरु, ( २ ) लघु, ( ३ ) शीत. ( ४ ) उष्ण, ( ५ ) स्निग्ध, ( ६ ) रुक्ष | सप्त रसा इति निमिर्वैदेहः, मधुराम्ललवणकटुतिक्तकषायक्षाराः । ( ७ ) विदेहराज निमि का सान रस पक्ष - मिथिलापति निमि ने कहा कि रस सात प्रकार के होते हैं, ( १ ) मधुर, ( २ ) अम्ल, ( ३ ) लवण, ( ४ ) कटु, ( ५ ) तिक्त, ( ६ ) कषाय, ( ७ ) क्षार | विमर्श - अभिव्यक्त होते हुए रसनेन्द्रिय ग्राह्य रस एक होते हुए स्वाद भेद से सात प्रकार का होता है । १. ' छेदनीय इति कर्शनीयः, उपशमनीय इति बृंहणीयः, साधारण इति आग्नेय सौम्यसंबन्धा-लङ्घनबृंहणयोः कर्ता, यथा— तैलम् ' शिवदासः । २. ' स्वादुरित्यभीघ्र हित इत्वावन्यनपकारी ' चक्रः ।

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४८४ चरकसंहिता * अष्टौ रसा इति बडिशो धामार्गवः, मधुराम्ललवणकटुतिक्तकषाय ताराव्यक्ताः । ( ८ ) बडिश धामार्गव का आठ रस पक्ष - धामार्गव वडिश ने कहा कि रस ८ प्रकार के होते हैं -- ( १ ) मधुर, ( २ ) अम्ल, ( ३ ) लवण, ( ४ ) कटु, ( ५ ) तिक्त, ( ६ ) कषाय, ( ७ ) क्षार, ( ८ ) अव्यक्त । विमर्श - स्वाद के अनुसार ही ये आठ रस माने गए हैं । ७ सात में विभिन्न स्वाद रहता है और आठवें में कुछ भी स्वाद नहीं रहता है । जिह्वा से रसों का ग्रहण और रसाभाव का भी ग्रहण होता है अतः अव्यक्त भी एक रस है । अपरिसंख्येया रसा इति काङ्कायनो बाह्रीकभिषग्, आश्रयगुणकर्मसंस्वादविशेषाणाम-परिसंख्येयत्वात् ॥ ८ ॥

( ९ ) बाहीक देशी काङ्कायन का असंख्येय रस पक्ष - बाह्रीक देश के वैद्य काङ्कायन ने कहा कि रसों की संख्या अगणित है क्योंकि रसों के आश्रयभूत द्रव्यों, गुणों, कर्मों और स्वादों की विशेषता अपरमित है और इन्हीं के अनुसार रसों की कल्पना की जाती है अतः रस भी अगणित होते हैं ॥ ८ ॥

विमर्श - तात्पर्य यह है कि रस का आधार द्रव्य है, द्रव्य के भेद अनेक होते हैं, आधार भेद आश्रित रस के भी अनेकों भेद हो जायेंगे । आश्रय कारण होता है, कारण भेद से कार्य का भेद अवश्य होता है । रस कार्य है अतः इसके भेद अनेकों हो जाते हैं । जैसे एक ही मधुर रस का भेद भिन्न - भिन्न द्रव्यों में भिन्न - भिन्न प्रकार का होता हैं पर उसका अन्तर करना असम्भव है । यथा - ' इक्षुक्षीरगुडादीनां माधुर्यस्यान्तरं महत् । भेदस्तथापि नाख्यातुं सरस्वत्यापि शक्यते ॥ " ( चक्रपाणि ) । * पडेव रसा इत्युवाच भगवानात्रेयः पुनर्वसुः, मधुराम्ललवणकटुतिक्तकषायाः । ( १० ) पुनर्वसु आत्रेय द्वारा षड्रस सिद्धान्त का समर्थन तथा अन्य सिद्धान्तों का खण्डन -- ( १ ) इस प्रकार परस्पर विवादयुक्त ऋषियों को देखकर सिद्धान्त की स्थापना करते हुए आत्रेय भगवान् पुनर्वसु ने कहा कि रस ६ प्रकार के ही होते हैं - ( १ ) मधुर, ( २ ) अम्ल, ( ३ ) लवण, ( ४ ) कटु, ( ५ ) तिक्त, ( ६ ) कषाय । तेषां षण्णां रसानां योनिरुदकम, एकरस पक्ष का खण्डन — भद्रकाप्य ने रस को एक माना है और जल एवं रस में अभेद माना है | आचार्य ने उसका खण्डन करते हुये बताया कि उन छ रसों की योनि अर्थात् उत्पत्ति कारण जल होता है । विमर्श - जल और रस दोनों एक नहीं हो सकते क्योंकि कारण से कार्यं भिन्न होता है । कार्यं रस है और उसका कारण जल है कहा भी है कि - ' आपो हि रसवत्यस्ताः स्मृता निर्वृत्तिहेतवः । ( च ० अ ० २५ ) । अतः जल तथा रस एक नहीं है अपितु जल रस की योनि है इससे एक रस माननेवाले भद्रकाप्य का मत खण्डित हो जाता है । * छेदनोपशमने द्वे कर्मणी, तयोर्मिश्रीभावात् साधारणत्वम्, दो रस तथा तीन रसपक्ष का खण्डन - छेदन, उपशमन ये दो रस के कर्म हैं और इन दोनों कर्मों का मिश्रण होने से साधारण रस होता है । १. ' आश्रयगुणकर्मसंस्कारविशेषाणामपरिसंख्येयत्वात् ' ग. । २. ' योनिराधारकारणम् ' चक्रः ।

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आत्रेयभद्रकाप्यीयाध्यायः २६ ] सूत्रस्थानम् ४८५ विमर्श - शाकुन्तेय ब्राह्मण ने रस के भेद दो माने थे । उसका खण्डन करते हुये आचार्य ने बताया है कि छेदन और उपशमन ये दो रसों के कर्म हैं न कि रस हैं । शमन की परिभाषा इस प्रकार वर्णित है यथा - ' न शोधयति यद्दोषान् समान्नोदीरयत्यपि । समीकरोति विषमान्छुमनं तच सप्तधा ॥ ' ( अ ० हृ ० स ० अ ० १४ ) । रस के द्वारा दोष - शमन विषयक वर्णन अग्रांकित है— ' स्वाद्वम्ललवणा वायुं कषायस्वादुतिक्तकाः । जयन्ति पित्तं श्लेष्माणं कषायस्वादुतिक्तकाः ॥ ' ( च ० अ ० १ ) । तथा छेदन उसे कहते हैं जो विकृत दोष या मल को छिन्न - भिन्न करके बाहर निकाल दे, यथा - ' श्लिष्टान्कफादिकान्दोषानुन्मूलयति यद्बलात् । छेदनं तद्यवक्षारो मरिचानि शिलाजतु ॥ ' ( शार्ङ्गवर ) । जिसमें छेदन और उपशमन करने वाले रसों का संमिश्रण होता है उसे साधारण रस कहते हैं । इन युक्तियों से दो रस मानने वाले शाकुन्तेय का और तीन रस माननेवाले मौद्गल्य पूर्णाक्ष के मतों का खण्डन हो जाता है । * स्वास्वादुता भक्तिः, हिताहितौ प्रभावौ, चार रस पक्ष का खण्डन - स्वादु और अस्वादु ये दोनों रुचि और द्वेष पर आधारित हैं । हित और अहित ये दो प्रभाव हैं । विमर्श - तात्पर्य है कि जो वस्तु अपने लिये रुचिकर हो उसे स्वादु और जिसे खाने की इच्छा न हो उसे अस्वादु कहा जाता है । ये दोनों इच्छा और द्वेष पर आधारित हैं । और हित तथा अहित यह रस का प्रभाव है, इन युक्तियों के द्वारा चार रस माननेवाले हिरण्याक्ष का Has T है 1 * पचमहाभूतविकारास्त्वाश्रयाः प्रकृतिविकृतिविचारदेशकालवशाः, पांच रस पक्ष का खण्डन - • पंचमहाभूत के विकार स्वरूप द्रव्य, रसों के आश्रयभूत हैं अर्थात् द्रव्य आश्रय हैं और रस आश्रयी हैं । और द्रव्य प्रकृति, विकृति, विचार, देश और काल के वशीभूत - होकर अपना - अपना कार्य करते हैं । विमर्श - तात्पर्य यह है कि पंचमहाभूत के अनुसार कुमारशिरा भरद्वाज ने पाँच रस माना था उसका खण्डन करते हुये आचार्य ने बताया है कि पंचमहाभूत का विकार द्रव्य होता है, वही द्रव्य ( १ ) प्रकृति ( स्वभाव ) के अनुसार कहीं कार्य करता है जैसे मूँग - कषाय और मधुर रस होते हुये स्वभाव से लघु होता है । मूँग में लघुता रस के अनुसार नहीं होती है यदि रस के अनुसार इसका गुण माना जाय तो गुरु होना चाहिये क्योंकि कषाय और मधुर गुरु होते हैं । ( २ ) विकृति - व्रीहि ( धान ) गुरु होता है । पर उसका विकार धान का लावा लघु होता है तथा यवशक्तु ( सत्तु ) का पिंड गुरु होता है और सत्तू को जल में घोलकर लिया जाय तो लघु होता है । यह भी रस के अनुसार नहीं होता है क्योंकि धान और यव मधुर होते हैं । इसके अनुसार इन्हें गुरु होना चाहिये । लेकिन द्रव्य की विकृति ( रूपान्तर ) ही इसका कारण होता है । ( ३ ) विचार - ' विचारो द्रव्यान्तरसंयोगः ' दूसरे द्रव्यों से संयुक्त करने को विचार कहा जाता है जैसे मधु और घृत समान मात्रा में मिलाने पर विष हो जाता है । यह कार्य रस का नहीं है, मधु और घृत दोनों मधुर होते हैं किन्तु यह द्रव्य के संयोग का कार्य है । ( ४ ) देश - देश से दो अर्थ लिये जाते हैं - ( क ) भूमि - भूमि के अनुसार हिमालय में उत्पन्न सभी १. ‘ भक्तिद्वेषौ ’ इति पा. । ' भक्तिरितीच्छेत्यर्थः तेन यो यमिच्छति स तस्य स्वादुरस्वादुरितर इति पुरुषापेक्षौ धर्मों ' चक्रः । २. ' विचारो विचारणा द्रव्यान्तरसंयोग इत्यर्थः ' चक्रः ।

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४५६ चरकसंहिता औषधियाँ उत्तम गुणवाली होती हैं, श्वेतकापोती एक जड़ी होती है जो वल्मीक मिट्टी पर उत्पन्न हो तो वह विषनाशक होती है ( चक्र ० ) ( ख ) शरीर - मांस प्रकरण में बताया गया है कि सक्थि ( पैर ) के मांस से स्कंध तथा कोड ( शिर ) का मांस गुरु होता है यथा -- ' शरीरावयवाः सक्थिशिरःस्कन्धादयस्तथा । -सस्थिमांसाद्गुरुः स्कन्धस्ततः क्रोडस्तः शिरः । वृपणौ चर्म मैह्रू ं च श्रोणी वृक्कौ यकृद्गुदम् । मांसाद्गुरुतरं विद्याद्यथास्वं मध्यमस्थि च ॥ ' ( च ० सू ० २७ ) । यह सभी कार्य देश के अनुसार होते हैं ( ५ ) काल - काल समय को कहा जाता है | समय से कोई द्रव्य अपूर्ण या पूर्ण वीर्य वाला होता है । अल्प समय की ( बाल ) मूलो दोष को दूर करने वाली होती है और वृद्ध मूली त्रिदोष को उत्पन्न करनेवाली होती है । यह सभी कार्य द्रव्य की प्रकृति आदि ५ कारणों के अधीन है न कि रस के । इसलिये पंचमहाभूत के अनुसार पाँच रसों की कल्पना करनी उचित नहीं है । उपर्युक्त विमर्श चक्रपाणि सम्मत है । * प्वाश्रयेषु द्रव्यसंज्ञकेषु गुणा गुरुलघुशीतोष्णस्निग्धरूक्षाद्याः, छ रस पक्ष का खण्डन - रसों का आश्रय जी द्रव्य होता है उन्हीं के गुण गुरु, लघु, शीत, उष्ण, स्निग्ध, रूक्ष आदि होते हैं । विमर्श - राजर्षि वायविद ने गुरु, लघु आदि छ रस माना था उसका खण्डन करते हुये आचार्य ने बताया है कि गुरु, लघु रस नहीं है किन्तु रस के आश्रय भूत द्रव्य के गुण हैं । यहाँ ' रूक्षादयः ' से तीक्ष्ण, मृदु आदि बीस गुणों का ग्रहण करना चाहिये । गुण द्रव्य के होते हैं रस के नहीं है क्योंकि रस स्वयं गुण है और ' गुणा गुणाश्रया नोक्ताः ' के अनुसार गुण के गुण आश्रयीभून नहीं होते अर्थात् गुण में गुण नहीं रहता है । रस में जो गुरु आदि गुण का व्यवहार होना है । वह द्रव्य के अनुसार ही होता है, यथा- ' रसेषु व्यपदिश्यन्ते साहचर्योपचारतः । ' इस प्रकार गुरु आदि छ रसों का आचार्य ने खण्डन कर दिया । क्षरणात्क्षारः, नासौ रसः, द्रव्यं तदनेकरससमुत्पन्नमनेकरसं कटुकलवणभूयिष्ठ-मनेकेन्द्रियार्थसमन्वितं करणाभिनिर्वृत्तम्; सात रस पक्ष का खण्डन ( क्षार रस ) - क्षरण करने से क्षार कहा जाता है । यह रस नहीं है, किन्तु अनेक रस से उत्पन्न अनेक रस वाला द्रव्य है । इसमें कटु और लवण रस की अधिकता होती है । अनेक इन्द्रियों से ग्रहण करने योग्य विषयों से यह संयुक्त है और यह करणों द्वारा ( संस्कार द्वारा ) या साधन द्वारा उत्पन्न होता है । विमर्श -- ( १ ) क्षार के साथ मधुर, लवण आदि भेद से निमि विदेह ने सात रस माना था । उसका खण्डन करते हुए आचार्य ने यह बताया है कि मधुर आदि छ रस मानना युक्तिसंगत है, परन्तु क्षार को रस मानना ठीक नहीं है क्योंकि ' क्षरणात् अधोगमनक्रियायोगात् क्षारः ' अर्थात् जो नीचे गमन करे उसे क्षार कहते है, गमन करना यह द्रव्य का कार्य है, इसलिये इसे द्रव्य माना जाता है रस नहीं । क्षार की व्युत्पत्ति के विषय में चरक चिकित्मा पाँचवें अध्याय में भी ' छत्वा छत्वाऽशयात् क्षारः क्षरत्वात् क्षारयत्यथः ' कहा गया है । ( २ ) क्षार - द्रव्य है इस विषय में आचार्य की एक दूसरी युक्ति है कि यह अनेक रस से उत्पन्न होता है अर्थात् अपामार्ग आदि अनेक रस वाले द्रव्यों से उत्पन्न क्षार अनेक रस युक्त होता है । यह नियम है कि कारण के अनुसार कार्य होता है । जब कारण अपामार्ग आदि अनेक रसों से युक्त है तो उससे उत्पन्न १. ' तेषामाश्रयेषु ' इति पा ० । २. ' क्षरणादधोगमनक्रियायोगात् क्षारो द्रव्यं न रसः, रसस्य हि निष्क्रियस्य क्रियाऽनुप-पन्नेत्यर्थः ' चक्रः ।

पृष्ठ 576

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आत्रेयभद्रकाप्यीयाध्यायः २६ ] सूत्रस्थानम् ४८७ होने वाला कार्य क्षार भो अनेक रस से युक्त होगा । क्षार में कटु और अवण - रस अधिक मात्रा में होता है " यह बनाकर यह स्पष्ट किया है कि क्षार में अन्य रस भी होते में किन्तु वह मात्रा मेंन्यून होते हैं । इस प्रकार क्षार को अनेक रसों से युक्त बताकर यह सिद्ध किया है कि क्षार रस नहीं है क्यों कि रस में अन्य रेंस नहीं रहते हैं । द्रव्य अनेक्ररसयुक्त होता है और क्षार भी अनेक रस युक्त है इसलिये यह भी द्रव्य है । ( ३ ) क्षार को द्रव्य सिद्ध करने के लिये ' अनेकेन्द्रियार्थसमन्वितम्? यह पद दिया है अर्थात् जैसे द्रव्य अनेक इन्द्रियों से ग्राह्य होता है उसी तरह क्षार स्पर्श में शीन होता है जिसका ग्रहण स्पेशन - इन्द्रिय से होता है, क्षार का गन्ध विस्र होता है इसका ग्रहण प्राण-इन्द्रिय से होता है । इसका रूप श्वेत होता है. इसका ग्रहण चक्षु इन्द्रिय से होता है । इस प्रकार अनेक इन्द्रियों से क्षार का ग्रहण होना है । रस का केवल एक इन्द्रिय जिय से ही प्राण होता है इसलिये क्षार को रस नहीं माना जा सकता । ( ४ ) क्षार को द्रव्य सिद्ध करने के लिये ' करणाभिनि-वृत्तम् ' यह पद दिया गया है अर्थात् भस्म को जल आदि में पोडकर तथा छानकर वार का निर्माण किया जाना है, रस का निर्माण इस प्रकार नहीं होता है इसीलिये क्षार को रस न मानकर द्रव्य माना जाता है इन युक्तियों से विदेह निमि के मत का खण्डन आचार्य ने किया है । ॐ अव्यक्तीभावस्तु खलु रसानां प्रकृतौ भवत्यनुरसेऽनुरससमन्विते या इच्ये; आठरम पक्ष का खण्डन ( अव्यक्त रस ) रस की अव्यक्तता तो रस के प्रकृतिभूत जल में या अनुरस में या अनुरस युक्त द्रव्यों में होती है । विमर्श - तात्पर्य यह है कि रस का उत्पत्ति स्थान जल है, जल में रस अव्यक्त रूप में रहना है । जल में रसों की अभिव्यक्ति होने से वह दूषित समझा जाता है, सुश्रुत ने भी कहा है यथा — ' व्यक्तरसता रसदोष: ' । अनुरस का तात्पर्य यह है कि जो रस दूसरे रस सें अभिभूत होने के कारण स्पष्ट ज्ञान नहीं होता है, अर्थात् यह रस मधुरं है या अम्ल है इस प्रकार का स्पष्ट ज्ञान नहीं होता है । परन्तु कभी - कभी अनुरस की अभिव्यक्ति भी स्पष्ट रूप में होती है जैसे कषाय रस वाले आँवला के खाने के बाद यदि जल पिया जाय तो मधुर रस की स्पष्ट अभिव्यक्ति होती है । वस्तुतः आँवले में मधुर रस अनुरस है और कषाय रस उसका प्रधान रस है, इस को दृष्टि में रख कर आचार्य ने ' अनुरससमन्विते द्रव्ये ' यह पद दिया है । यद्यपि रस का प्रयोग विना द्रव्य के नहीं होता है फिर भी आँवला खा लेने के बाद जब मुख में द्रव्य की उपस्थिति नहीं रहती है और जल पिया जाता है तो द्रव्य के अभाव में मधुरता व्यक्त होती हैं । इसलिये अनुरम - समन्वित द्रव्य बनाया है अर्थात् जिस समय मुख में अन्य रखा हुआ है उस समय द्रव्य में जो रस प्रधान होता है उसकी अभिव्यक्ति होती है और जो रस अनुन्स होता है । उसकी अभिव्यक्ति नहीं होती है । इस प्रकार अव्यक्त रस का जल में या अनुरस समन्वित द्रव्य में रहना माना है । परन्तु रस में अव्यक रस का रहना नहीं बताया है इसीलिये इसी अध्याय में आगे ' रसो नास्ति हि सप्तमः ' यह बताकर अनुरस को अव्यक्त होने के कारण रस नहीं माना है । तात्पर्य यह है कि अन्य रम नहीं माना जा सकता है । इन युक्तियों के साथ आचार्य ने बडिश धामार्गव के मन का खण्डन किया है । अतः आठ रस नहीं होते है । ' अनुरससमन्विते ' के स्थान पर किसी किसी पुस्तक में ' अणुरससमन्वि ' यह पाठ है । इसका नात्पर्य यह है कि अणु ( अप ) रस जिस अन्य में हो उसमें अन्यत रस की प्रांति होती है । १. ' अव्यक्तभावस्तु ' यो । २. प्रकृती कारणे जइत्यर्थः चक्रः । ३. ' अणुरसेऽणुरस समन्विते वा द्रव्ये ' ग. ।

पृष्ठ 577

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४५५ चरकसंहिता * अपरिसंख्येयत्वं पुर्नस्तेषामाश्रयादीनां भावानां विशेषापरिसंख्येयत्वाश्च युक्तम्, एकैको-s पि ह्येषामाश्रयादीनां भावानां विशेषानाश्रयते विशेषापरिसंख्येयत्वात् न च तस्मादन्य-त्वमुपपद्यते; पैरस्परसंसृष्टभूयिष्ठत्वाच चैषामभिनिर्वृत्तेर्गुणप्रकृतीनामपरिसंख्येयत्वं भवति; तस्मान संसृष्टानां रसानां कर्मोपदिशन्ति बुद्धिमन्तः । तच्चैव कारणमपेक्षमाणाः षण्णां रसानां परस्परेणासंसृष्टानां लक्षणपृथक्त्वमुपदेच्यामः ॥ ९ ॥

( ९ ) अपरिसंख्येय रस पक्ष का खण्डन उन आश्रय, गुण, कर्म, संस्कार आदि भावों की विशेषता ( विभिन्नता ) के अगणित होने पर रसों का भेद अगणित होता है, यह कहना युक्ति-संगत नहीं है, क्योंकि इन मधुर आदि ६ रसों में एक - एक रस भी आश्रयविशेष, गुणविशेष, कर्मविशेष, स्वादविशेष और संस्कारविशेष भावों के भेदों के अगणित होने के कारण आश्रय करता है । अतः इससे रसों को भिन्नता नहीं सिद्ध होती है । एक दूसरे में अधिकता से मिले होने के कारण रसों की उत्पत्ति होने से गुण और प्रकृति अगणित नहीं होती है । इसीलिए बुद्धिमान् चिकित्सक संसृष्ट रसों के कर्मों का उपदेश नहीं करते हैं । इसी कारण को ध्यान में रखकर ( अर्थात् प्रधान रस को ही अभिव्यक्ति होती है न कि अप्रधान रस की ) परस्पर में न मिले हुए रसों के लक्षणों का अलग - अलग उपदेश कर रहें हैं ॥। ९ ॥ विमर्श -- तात्पर्य यह है कि बाहीक काङ्कायन ने बताया है कि रस अपरिसंख्येय होते हैं | ( १ ) उसका खण्डन करते हुए आचार्य ने कहा है कि आश्रय आदि के अपरिसंख्येय होने से रस की संख्या अपरिमंख्येय नहीं हो सकती है जैसे मधुर रस का आश्रय शालि, मूंग, घृत, दुग्ध, शर्करा आदि अनेक हैं और इनमें मधुरत्व की प्रतीति भी भिन्न - भिन्न रूप में होती है किन्तु मधुर से अन्य रस का ज्ञान नहीं होता है । तथा मधुरत्व को जाति सामान्य के कारण आश्रय के भिन्न या अपरिसंख्येय होते हुए भी उसको एक ही प्रकार का माना जाता है । उसी तरह अन्य स्थल पर भी आश्रय आदि के भिन्न होते हुए भी रसत्व सामान्य को स्वाद की भिन्नता से उसे ६ प्रकार का ही मानते हैं । ( २ ) गुण - गुरु, पिच्छिल, स्निग्ध आदि गुण की भिन्नता से या रसादि धातुवर्धन, आयुर्जनन १. ' आदिशब्देन गुणकर्मसंस्वादानां ग्रहणम्, आश्रयगुणकर्मसंस्वादानां विशेषा भेदास्तेषामप-रिसंख्येयत्वात्तेषां रसानामपरिसंख्येयत्वं यदुच्यते तन्न युक्तं, तत्र हेतुमाह – एकैकोऽपीत्यादि । एषामाश्रयगुणकर्मसंस्वादानां विशेषाने कैकोऽपि मधुरादिराश्रयते, न त्वस्मादाश्रयादिभेदादन्यत्व-माश्रितस्य मधुरादेर्भवति, एतेन आश्रयादय एव परं भिन्नाः, मधुरादिस्त्वेक एवेत्यर्थः । तथाहि-यद्यपि शालिमुद्गघृत क्षीरादयो मधुरस्याश्रया भिन्नास्तथाऽपि तत्र मधुरत्वजात्याक्रान्त एक एव रसो भवति बलाकाक्षीरादिषु शुक्कुवर्णवत्, एवं गुणादावपि बोद्धव्यम् ' इति शिवदासः । २. ' पुनर्न तेषाम् ' ग. । ४. ' विशेषानेवाश्रयते ' ग. । ३. " विशेषापरिसंख्येयत्वाद्युक्तम् ' ग. । ५. ' परस्परसंसर्गभूयिष्ठत्वादेषां रसानामभिनिर्वृत्तेः प्रकृतिभूतानां मधुरादिगुणानामसंख्येयत्वं न चेति योजना, तेन रसानां रसान्तरसंसर्गे तत्संसर्गाणामेवापरिसंख्येयत्वं न पुनः प्रकृतिभूतमधु-रादिषसानां षट्स्वातिक्रमः ' शिवदासः । ६. ‘ न च तस्मादन्यत्वमुपपद्यते परस्परसंसृष्टभूयिष्ठत्वात् । न चैषामभिनिर्वृत्तौ गुणप्रकृतीना-मसंख्येयत्वं भवति ' यो । ७. ‘ अस्मिन्नर्थेऽस्मिन् प्रकरणे ' चक्रः ।

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आत्रेयभद्रकाप्यीयाध्यायः २६ ] सूत्रस्थानम् ४८६ और वर्णकर कर्म की भिन्नता से भी रस अपरिसंख्येय नहीं है, क्योंकि एक मधुर रस का ही गुरु, पिच्छिल आदि गुण से रसादिधातुवर्धन कर्म है न कि अन्य किसी रस का है । यहाँ यह दूसरी शंका उपस्थित होती है कि आश्रय आदि के भेद से रसों की अपरिसंख्येयता मत मानी जाब पर जब रसों का संसर्ग - विकल्प किया जाता है तो रसों के संयोग से अपरिसंख्येयता हो ही जाती है, जैसे दो रसों का संयोग - मधुराम्ल रस, यह मधुर और अम्ल से भिन्न है, और अलग-अलग मधुर से या अम्ल से जिस कार्य का सम्पादन होता है वह मधुराम्ल से भिन्न है । अतः रसों के संयोग से रसों की असंख्येयता हो सकती है, इसका खण्डन करते हुए आचार्य ने उत्तर दिया है - ' परस्परसंसृष्टभूयिष्ठत्वात् ' अर्थात् यद्यपि रस परस्पर संयोग से अत्यधिक होते हैं और जो कार्य मधुराम्ल संसृष्ट रस से होता है वह कार्य मधुर रस से नहीं होता है अतः इनमें पृथक्त्व स्पष्ट प्रतीत होता है । पर इस प्रकार से रस की भिन्नता होने पर भी गुरु, लघु आदि गुणों में तथा मधुरादिरसों की प्रकृति में, और धातुवर्धनादि कर्मों में भिन्नता नहीं होती है, क्योंकि गुरु, -लघु आदि गुण और रसों की अलग - अलग जो प्रकृति होती है उनका ही संमिश्रण इस संयुक्त रस में रहता है, संयोग - विकल्प से भिन्नता होते हुए मूल संख्या में व्याघात नहीं होता है, जैसे दोषों का संसर्ग - विकल्प ६२ होते हैं पर दोष तीन ही हैं, इस संख्या में कोई व्याघात न मानकर तीन दोष ही माने जाते हैं । उसी प्रकार संसर्ग - विकल्प के द्वारा रसों की संख्या अपरि-संख्येय मानी जाय यह उचित नहीं है । अतः स्वाद के द्वारा जानने योग्य रस ६ होते हैं यथा-( १ ) मधुर, ( २ ) अम्ल. ( ३ ) लवण, ( ४ ) कटु, ( ५ ) तिक्त और ( ६ ) कषाय । संयुक्त रसों वर्णन शास्त्रों में अवश्य पाया जाता है पर संयुक्त रसों के गुणों एवं कर्मों का वर्णन नहीं प्राप्त होता है इससे यह स्पष्ट है कि शास्त्रों में स्वतन्त्र रूप से संयुक्त रस को सत्ता नहीं है । इसीलिए आचार्य ने अलग - अलग ६ रसों के गुण - कर्मों का वर्णन किया है 1 $ अग्रे तु तावद्रव्यभेदमभिप्रेत्य किंचिदभिधास्यामः । सर्व द्रव्यं पाञ्चभौतिकमस्मि -नर्थे । तच्चेतनावदचेतनं च । तस्य गुणाः शब्दादयो गुर्वादयश्च द्रवान्ताः, कर्म पञ्चविध-मुक्तं वमनादि ॥ १० ॥

( २ ) द्रव्य - प्रकरण तथा रसानुसार उनके ६३ भेद ( Topic of Dravyas and Their Sixty Three Varieties According to Rasas ) द्रव्य- विमर्श - अब आगे द्रव्य भेद को दृष्टि में रखकर कुछ द्रव्यों को कह रहा हूँ । सभी कार्य द्रव्य इस प्रकरण में पाञ्चभौतिक माने जाते हैं, वह द्रव्य ( १ ) चेतन, ( २ ) अचेतन, भेद से दो प्रकार का होता है । उस द्रव्य के गुण शब्दादि ( शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध ) पाँच और गुर्वादि से द्रवान्त २० हैं । तथा उस कार्य द्रव्य का कर्म वमन आदि पाँच हैं यह पहले कह आये हैं ॥ १० ॥

विमर्श - रस के वर्णन के पूर्व रस के आश्रयभूत द्रव्य का ज्ञान करना परम आवश्यक होता है । अतः द्रव्य का वर्णन प्रकरणागत है । किञ्चित् अर्थात् कुछ द्रव्य कह रहा हूँ इसका तात्पर्य यह है कि द्रव्य कारण और कार्य भेद से दो प्रकार के होते हैं, आयुर्वेद में कार्य द्रव्य की ही उपयोगिता है अतः कुछ द्रव्य ( कार्य द्रव्य ) का वर्णन कर रहे हैं । अस्मिन्नर्थे – इस प्रकरण में सभी कार्य द्रव्य पञ्चभौतिक माने जाते हैं । यह कार्य द्रव्य चेतन - अचेतन भेद से दो प्रकार का होता है । कार्य द्रव्यों के गुण ४१ होते हैं, पर यहाँ चिकित्सा में विशेष उपयोगी शब्दादि ५, गुर्वादि २०, ये २५ गुण ही माने गये हैं । परत्वादि १० गुण तथा इच्छा, द्वेषादि ६ गुण

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४६०० चरकसंहिता चिकित्सा में अप्रधान हैं अतः यहाँ उनका उल्लेख नहीं किया है । कर्म - ( १ ) वमन, ( २ ) विरे-चन, ( ३ ) निरूहवस्ति, ( ४ ) अनुवासनबस्ति, ( ५ ) नस्य ये पाँच कर्म कार्य द्रव्यों के होते हैं! इस प्रकार आचार्य ने कार्य द्रव्यों का लक्षण बताया है । तत्र द्रव्याणि गुरुखरकठिनमन्दस्थिरविशदसान्द्रस्थूलगन्धगुणबहुलानि पार्थिवानि, तान्युपचय संघात गौरवस्थैर्यकराणि; - ( १ ) पार्थिव द्रव्य के लक्षण - जो द्रव्य ( १ ) गुरु, ( २ ) खर, ( ३ ) कठिन, ( ४ ) मन्द्र, ( ५ ) स्थिर, ( ६ ) विषाद, ( ७ ) सान्द्र, ( ८ ) स्थूल तथा ( ९ ) गन्ध गुण प्रधान होते हैं वे द्रव्य पार्थिव हैं । इन पार्थिव द्रव्यों का यदि सेवन किया जाय तो शरीर में उपचंय ( वृद्धि ), संघात ( शरीर का ठोस होना ), गुरुता और स्थिरता उत्पन्न होती है । इवस्त्रिग्धशीतमन्दमृदु पिच्छिलरसगुणव हुलान्याप्यानि, ताम्युपकेदस्नेहवन्धंविष्यन्द-मार्दवप्रह्लादकराणि ( २ ) जलीय द्रव्य के लक्षण – जिन द्रव्यों में ( १ ) द्रव, ( २ ) स्निग्ध, ( ३ ) शीत; ( ४ ) नन्द; ( ५ ) मृदु, ( ६ ) पिच्छिल और ( ७ ) रस गुण की प्रधानता होती हैं उसे जलीय द्रव्यं कहते हैं । इनके सेवन से ये शरीर में उपक्लेद ( गीलापन ), स्नेह ( स्निग्धता ), बन्ध ( सन्धिबन्धनों को समुचित रूप में रखना ), विष्यन्द, माईव ( शरीर में मृदुता उत्पन्न करना ) और प्रह्लाद उत्पन्न करते हैं । • उष्णतीक्ष्ण सूक्ष्म लघु रूक्षविशदरूपगुणवहुलान्याग्नेयानि तानि दाहपाकप्रभाप्रकाश-वर्णकराणि ( ३ ) तैजस द्रव्य के लक्षण - जिन द्रव्यों में ( १ ) उष्ण, ( २ ) तीक्ष्ण, ( ३ ) सूक्ष्म, ( ४ ) लघु, ( ५ ) रूक्ष, ( ६ ) विशद और ( ७ ) रूप गुण की प्रधानता होती है वे तैजस द्रव्य कहे जाते हैं । ये तैजम द्रव्य सेवन करने पर शरीर में दाह, पाक, प्रभा, प्रकाश और शरीर में वर्ण ( रूप ) को विकसित करते हैं । लघुशीतरूक्षखरविशदसूक्ष्म स्पर्शगुणबहुलानि वायव्यानि तानि रौच्यग्लानिविचार-वैशद्यलाघवकराणि ( ४ ) वायव्य द्रव्य के लक्षण – जिन द्रव्यों में ( १ ) लघु, ( २ ) शीत, ( ३ ) रूक्ष, ( ४ ) खर, ( ५ ) विशद, ( ६ ) सूक्ष्म और ( ७ ) स्पर्श गुण की प्रधानता होनी है वे वायव्य द्रव्य कहे जाते है । ये वायव्य द्रव्य सेवन करने पर शरीर में रूक्षता, ग्लानि, विचार ( गति ),

विशदता और लघुता उत्पन्न करते हैं ।

मृदुलघुसूक्ष्मश्लक्ष्णशब्दगुणवहुलान्याकाशात्मकानि तानि मार्दवसौपिर्य लाघवकराणि ॥

( ५ ) आकाशीय द्रव्य के लक्षण - • जिन द्रव्यों में ( १ ) मृदु, ( २ ) लघु, ( ३ ) सूक्ष्म, ( ४ ) और ( ५ ) शब्द गुण की प्रधानता होती है वे आकाशीय द्रव्य कहे जाते है । ये आकाशीय द्रव्य सेवन करने पर शरीर में कोमलता, सुषिरता और लघुता उत्पन्न करते है || ११ | विमर्श - यहाँ प्रत्येक लक्षणों में ' बहुल ' शब्द का प्रयोग आया है उसका तात्पर्य यह है कि जो गुण जिम भौतिक द्रव्य के बताये गये है वे गुण प्रधान रूप से उस द्रव्य में रहते है और सामान्य रूप से सभी गुण सभी में रहते हैं । वाग्भट ने पार्थिवद्रव्यों में खर गुणों को नहीं माना १. ' संघातः काठिन्यम् ' चक्रः । ३. ' सूक्ष्मं सूक्ष्मस्रोतो नुसारि ' चक्रः । ५. ' विचरणं विचारो गतिः ' चक्रः । २. ' प्रह्लादः शरीरेन्द्रियतर्पणम् ' चक्रः । ४. ' प्रभा वर्णप्रकाशिनी दीप्तिः ' चक्रः ।

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आत्रेय भद्रकाप्पीयाध्यायः २६ ] सूत्रस्थानम् ४६१ है और उसको ईषत्कषाय और प्रायः मधुर माना है । - असीम द्रव्यों के लक्षण में सुनने द्रव को नहीं माना है और स्तिमित गुरु यह दो गुण अधिक माना है और उसे ईषत् कषाय, अम्ल, लवण और प्रायः मधुर: माना है । तैजस द्रव्य के लक्षण में सुश्रुत ने खर को अधिक माना है, ईषत् अम्ल, लवण और प्रायः कटु रस वाला और विशेषकर ऊपर गमन स्वभाव वाला होता है, ऐसा माना है । वायव्य द्रव्य में सुश्रुत ने चरक के सभी गुण स्वीकार किये हैं और उसे और प्रायः कषाय माना है । वाग्भट ने व्याप्य इज्यों में विकासी, व्यवायी यह दो गुण अधिक माने हैं । आकाशीय द्रच्यों में वाग्भट और तने व्यवायी विशद विविक्त गुण और अव्यक्त रस माना है और चरक के लघु गुणों को स्वीकार नहीं किया है । अन्त में चरक के अनुसार पार्थिवादिपद्मभौतिक द्रज्यों के गुण कर्मों - का संघ निम्नलिखित रूप में किया जा रहा है. पार्थिव गुणकर्मानुसार पार्थिवादि द्रव्य - विवरण ( चरकाशित ) आप्य आकाशात्मक आग्नेय वायव्य 1 1 1 गुंण कर्म गुण कर्म गुण कर्म गुण गुरु उपचय द्रव उपकेंद्र उष्ण द्रोह लघु कर्म गुण रौक्ष्य मृदु J 4-4-f.... -1 1 खर सङ्घानं स्निग्धं स्नेह मीण पार्क शौन 1 F 1 T ग्लानि लघु 1--1 - सौषिर्य ----कर्म कठिन गौरव शीत --बन्ध सूक्ष्म प्रभा रूक्ष विचार सूक्ष्म लाघव 1 मन्द स्थैर्य मन्द विन्द 4: ---- 1-.. 1 1 T ३ बु प्रकाश खर वंशलक्ष्ण 1 1 1 1 स्थिर मृदु मार्दव रूक्ष 1 1 वर्ण विशद 1 1 लाघव शब्दगुणबहुल t ५ विशद पिच्छिल प्रह्लाद विशद सूक्ष्म 1 ६ 1 1 सान्द्र रसगुणबहुल रूपगुणबहल स्पर्शगुण बहुल 1 ७ ७ ७ स्थूल गन्धगुणबहुल अनुसन्धान की दृष्टि से यह आवश्यक है कि प्रत्येक द्रव्य के पाञ्चभौतिक स्वरूप को स्थिर् करने के लिए कोई न कोई आयुर्वेदीय सिद्धान्त का प्रयोग किया जाय इस सम्बन्ध में का रसानुसार वर्गीकरण सम्भवतः कुछ सहायक हो, अतएव उसका संग्रह निम्नलिखित रूप में किया जा रहा -रसानुसार पार्थिवादि द्रव्य वर्गीकरण पार्थिव आप्य आग्नेय वातव्य नाभस 1 1 1 ईषाकपाय 1 पायाल 1 ईषदम्ललवण 1 पतिक अव्यक्त रम 1 प्रायशो मधुर प्रायशो मधुर प्रायशः कटु प्रायशः कषाय