चरक संहिता हिन्दी भाष्य — पृष्ठ 581–590

चरक संहिता हिन्दी भाष्य · Chaukhamba · पृष्ठ 581–590

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४६२ चरकसंहिता * अनेनोपदेशेन नानौषधिभूतं जगति किंचिद्द्रव्यमुपलभ्यते तां तां युक्तिमथं च तं तमभिप्रेत्य ॥ १२ ॥

सभी द्रव्य पाञ्चभौतिक - इस प्रकार पांचभौतिक द्रव्यों के गुणों के अनुसार लक्षण के उपदेश से यह सिद्ध हो जाता है कि संसार में ऐसा कोई भी द्रव्य नहीं है जो औषधि नहीं है वे औषध भिन्न - भिन्न युक्ति के अनुसार और भिन्न २ प्रयोजन के अनुसार प्रयोग में लाये जाते हैं । विमर्श - तात्पर्य यह है कि संसार में जितने भी द्रव्य हैं वे सभी इन बताये हुये पांचभौतिक द्रव्यों के गुणों से युक्त होते हैं । जिस द्रव्य के लक्षण जिसमें पाया जायगा वह उस नाम से व्यवहृत होगा और उसका प्रयोग युक्ति एवं प्रयोजन के अनुसार किया जायगा । कोई द्रव्य किसी उपाय से किसी रोग में और कोई द्रव्य किसी उपाय से किसी रोग में प्रयुक्त होता है । वाग्भट औरत ने भी यही बात स्पष्ट की है, यथा- ' जगत्येवमनौषधम् । न किंचिद्विद्यते द्रव्यं वशान्ना-नार्थयोगयोः ॥ ' ( सू. अ. ९ ) तथा ' अनेन निदर्शनेन नानौषधीभूतं जगति किंचिद्द्द्रव्यमस्तीति कृत्वा तं तं युक्तिविशेषमर्थं चाभिसमीक्ष्य स्ववीर्यगुणयुक्तानि द्रव्याणि कार्मुकाणि भवन्ति । ' ( सू.अ.४ १ ) इसके अनुसार जब सभी द्रव्यों को औषध स्वीकार कर लिया जाता है तो कुछ लोग तृण, धूलि आदि को औषध रूप में स्वीकार नहीं करते हैं । परन्तु तृण और धूलि ये भी स्वेदन कार्य में प्रयुक्त होते हैं । इनके प्रयोग करने की युक्ति भिन्न भिन्न होती है । * न तु केवलं गुणप्रभावादेव द्रव्याणि कार्मुकाणि भवन्ति; द्रव्याणि हि द्रव्यप्रभावाद-गुणप्रभावाद्द्द्द्रव्यगुणप्रभावाच्च तस्मिंस्तस्मिन् काले तत्तदधिकरणमासाद्य तो तां च युक्ति-मर्थं च तं तमभिप्रेत्य यत् कुर्वन्ति तत् कर्म येन कुर्वन्ति तद्वीयं, यत्र कुर्वन्ति तदधि-करणं, यदा कुर्वन्ति स कालः, यथा कुर्वन्ति स उपायः, यत् साधयन्ति तत् फलम् ॥१३ ॥

द्रव्यों की कार्य प्रणाली - द्रव्य केवल गुण प्रभाव से ही कार्य करने वाले नहीं होते हैं 1 किन्तु द्रव्य प्रभाव से, गुण प्रभाव से और द्रव्य - गुण प्रभाव से वे कार्य करने वाले होते हैं । द्रव्य भिन्न - भिन्न काल में भिन्न - भिन्न अधिकरण को प्राप्त होकर भिन्न - भिन्न युक्ति एवं प्रयोजन के अनुसार जो कार्य करते हैं उन्हें कर्म, जिसके द्वारा करते हैं उसे वीर्य, जहाँ कार्य करते हैं उसे अधिकरण, जब कार्य करते हैं उसे काल, जिस प्रकार कार्य करते हैं उसे उपाय और वह जिस कार्य को सिद्ध करते हैं उसे फल कहा जाता है ॥ १३ ॥

विमर्श - द्रव्यों का लक्षण गुण के अनुसार बताया गया है पर इसका तात्पर्य यह नहीं है कि द्रव्य केवल गुण प्रभाव से ही कार्य करते हैं । किन्तु द्रव्य स्वतः द्रव्य प्रभाव से भी कार्य करते हैं । जैसे दन्ती अपने द्रव्य प्रभाव से विरेचन करती है । मणियों में विष आदि के नाश की शक्ति द्रव्य प्रभाव से ही रहती है । द्रव्य कहीं गुण प्रभाव से भी कार्य करते हैं जैसे ज्वर में तिक्त रस, जाड़ा लगने पर अग्नि का सेवन । द्रव्य - गुण- प्रभाव - जैसे काले मृगचर्म के ऊपर बैठकर ' कार्य करना यहाँ पर कृष्ण ( काला ) गुण है और अजिन द्रव्य है ( मृगचर्म ) । गुग से युक्त अजिन कार्यकारी होता है । द्रव्य यह कार्य कैसे करता हैं यह बात आचार्य ने स्वयं स्पष्ट की है । द्रव्य जो कार्य करता है उसे कर्म कहते हैं जैसे शिरोविरेचन द्रव्य १. ' अनेनेति प्रतिनियतद्रव्योपदेशेन यत्पार्थिवादिद्रव्यं यद्गुणं तद्गुणे देहे संपाद्यं भेषजं भवती-त्यर्थः; युक्तिमित्युपायम्, अर्थमिति प्रयोजनम्, अभिप्रेत्येत्यधिकृत्य; तेन केनचिदुपायेन क्वचित् प्रयो-जने किञ्चिद्रव्यमौषधं स्यान्न सर्वत्र ' चक्रः । २. ' तां तां युक्तिमासाद्येति तां तां योजनां प्राप्य ' इति चक्रः ।

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आत्रेयभद्रकाप्यीयाध्यायः २६ सूत्रस्थानम् ४६३ जो शिर का विरेचन करता है, यही शिरोविरेचन करना उस द्रव्य का कर्म है । और अपने उष्ण गुण आदि के कारण वे शिरोविरेचक औषधियाँ शिर का विरेचन करती है तो उसमें उष्ण आदि वीर्य हैं । वह द्रव्य या गुण जहाँ कार्य करते हैं उसे अधिकरण कहते हैं जैसे शिरोविरेचन में झिर अधिकरण है । शिरोविरेचक औषधि से शिरोगौरवयुक्त होने पर या वसन्त के आदि में शिरोविरेचन करना चाहिये, यहाँ वसन्तादि काल है । औषधि का प्रयोग किया जाता है उसे उपाय कहते हैं, जैसे नस्य देने के लिये प्रथमन और पीडन, मर्श, प्रतिमर्श आदि ये उपाय हैं । और इन द्रव्यों द्वारा जो सिद्ध किया जाता है फल माना जाता है, जैसे शिरोगौरव और शूल की शान्ति यदि नस्य देने से हो गई तो यह उसका

फल होना है । उपर्युक्त विमर्श का अधिकांश भाग चक्रपाणि - सम्मत है ।

5 मेषां त्रिषष्टिविधविकल्पो म्यदेशकालप्रभावाद्भवति, तमुपदेष्यामः ॥ १४ ॥

द्रव्यों के रसानुसार ६३ भेद - इन ६ रसों के विधि - विकल्प द्रव्य देश और काल प्रभाव से ६३ तरह के होते हैं उसका उपदेश कर रहा हूँ ॥ १४ ॥

विमर्श - १. द्रव्य प्रभाव से रस में विशेषता आ जाती है यथा - द्रव्य गत सौम्य या आग्नेय प्रकृति के प्रभाव से द्रव्यों में मधुर या कटु रस होते हैं । २. देश प्रभाव से भी रस विकल्प होते हैं, जैसे एक ही आम एक स्थान पर मीठा, दूसरे स्थान पर लगाने पर किंचित अम्ल हो जाता है । अंगूर, अनार आदि जो पश्चिमोत्तर प्रदेश में होते हैं यदि उन्हें विहार, उत्तरप्रदेश आदि पूर्वी प्रदेशों में लगाया जाय तो उनमें अम्लता आ जाती है । ३. द्रव्य गत रस के संगठन पर काल का भी प्रभाव होता है, जैसे नियत समय पर परिपक्व फल उचित रसों से युक्त होते हैं । और विपरीत काल में वे पूर्ण रस वाले नहीं रहते हैं । स्वादुरम्लादिभिर्योगं शेषैरम्हादयः पृथक् । यान्ति पञ्चदशैतानि इम्याणि द्विरसानि तु ॥ दो रसों के १५ संयोग - मधुर रस शेष अम्ल, लवण आदि पाँच रसों के साथ; और अम्ल आदि अर्थात् अम्ल रस शेष लवण आदि चार रसों के साथ लवण रस शेष कटु आदि तीन रसों के साथ; कटु रस, तिक्त कषाय दो रसों के साथ, और तिक्त रस कषाय रस के साथ संयुक्त होने पर दो - दो रसों के संयोग से १५ विकल्प होते हैं ॥ १५ ॥

विमर्श - वाग्भट ने भी दो रसों का संयोग होने पर १५ रस विकल्प माना है यथा- ' एकैक -हीनास्तान् पंचदश यान्ति रसा द्विके । ' ( अ.हृ. १० ) तथा ' स्वादुद्विकेषु पञ्चाम्लश्चतुरो लवणस्त्रयम् । द्वौ तिक्तः कटुकचैकं याति पञ्चदशेति ते ॥ ' ( अ.सं. सू. १८ ) अर्थात् मधुर रस से एक - एक रस से संयोग करते हुये और १, १ को छोड़ते हुये यदि दो रसों का संयोग किया जाय तो १५ रस होते हैं । मधुर रस का संयोग यदि एक दूसरे से किया जाय तो ५ रस होते हैं । यथा १. मधुर अम्ल २. मधुर लवण ३. मधुर कटु ४. मधुरतिक्त ५. मधुरकषाय । अम्ल का यदि ४ रसों से अलग - अलग संयोग करते हैं तो चार रस होते हैं यथा १. अम्ललवण, २. अम्लक, २. अम्लतिक्त, ४. अम्ल-कषाय । लवण का दो रसों से संयोग तीन होता है यथा १. लवणकटु, २. लवणतिक्त ३. लवणकषाय । तिक्त रस का दो रसों से संयोग करने से दो रस होते हैं यथा १. तिक्तकटु २. तिक्तकषाय और कटु रस से कषाय रस का संयोग करने पर एक रस होता है । इस प्रकार ५ + ४ + ३ + २ + १ =

१५ प्रकार के द्रव्य दो रसों के संयोग से होते हैं ।

पृथगम्हादियुक्तस्य योगः शेषैः पृथग्भवेत् । मधुरस्य तथाऽम्लस्य लवणस्य कटोस्तथा ॥

त्रिरसानि यथासंख्यं द्रव्याण्युक्तानि विंशतिः । १. ' त्रिपचिविधरसविकल्पः ग

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É चरकसंहिता तीन रसों के बीस संयोग - जैसे अलग - अलग अम्लादि रसों से युक्त मधुर रस का शेष लवण आदि चार रसों के साथ अलग - अलग योग होता है । उसी तरह लवण से युक्त अम्लरस का अलग - अलग शेष कटु आदि के साथ अलग - अलग योग होना है । कटु रस से युक्त लवण रस शेष दो रसों के साथ योग होता है । निरस से युक्त कटु रस का शेष कषाय रस के साथ संयोग होता है । इस प्रकार संख्या के अनुसार तीन रसों के संयोग वाले द्रव्य वीस होते हैं ॥ १६ ॥

--विमर्श - वाग्भट ने भी तीन रसों का संयोग होने पर २० रस बताया है । यथा- ' त्रिके स्वादुर्दशाम्लः षट् त्रीन् पटुस्तिक्त एककम् | ' ( वाग्भट सू. अ. १० ) अर्थात् तीन रसों का संयोग होने पर मथुर का संयोग १० होता है । यथा -१ मधुर अम्ललवण, २. मधुरकंड ३. मधुर अम्लतिक्त, ४. मधुर अम्लक पाय, ५. मधुरलवणकटु, ६. मधुरलवणतिक्त, ७. मधुरलवण-कपाय, ८. मधुरकडुनिक, १ मधुररूपाय १०. मधुरनिया इस प्रकार मधुराम्ल का शेष रसों से अलग - अलग रसों का संयोग करने पर चार, मधुरलवण का तीन, मधुरकटु का दो, मधुरनिक का एक कुल संयोग १० होता है । अम्ललवण रसों से तीन रसों का अम्ल कटु, अम्लतिक्त से संयोग करने पर ६ रस होते हैं । यथा --- १. अम्ललवणकडु, २. अम्ललवण-निक्त, ३. अम्ललवणकषाय, ४. अम्लक दुनिक्त, ५. अम्लरुटुकषाय, ६. अम्लतिक्तकषाय इस प्रकार होते 1 से तीन रसों का संयोग होने पर दोन होते १. कटुतिक्त २. लवणकटुकषाय, ३. लवणतिक्तकपाय और कटुतिक्तकषाय एक होता है । इस प्रकार मथुर का १०, अम्ल का ६, लवण का ३, कटु का १, इस प्रकार तीन रसों के संयोग करने पर

रत के विकल्प २० होने है ।

वच्यन्ते तु चतुष्केण द्रव्याणि दश पञ्च च ॥ १७ ॥

स्वामी सहिती योगं लवणाद्यैः पृथभाती योगं शेषैः पृथग्यातञ्चतुष्करससंख्यया ॥

सहिती स्वावणी तत् कट्वादिभिः पृथक् । युक्ती शेषैः पृथग्योगं यातः स्वादूषणौ तथा ॥

कट्यारम्ललवणी संयुक्तौ सहितौ पृथक् यातः शेषः पृथग्योगं शेपैरम्हक तथा ॥२० ॥

समूह से तो द्रव्य १५ कड़े जायेंगे, मधुर और से अलग - अलग संयोग को प्राप्त कर, तथा शेष प्राप्त कर चार रस के समूह की गणना से एक साथ मिलकर कटु आदि भीन रखों के साथ चार रसों के १५ संयोग - चार रसों के अम्ल रस साथ होकर लवण आदि चार रसों तिक्त, कटु, कषाय रस से अलग - अलग संयोग को युक्त होते हैं । इसी प्रकार मधुर और लवण रस अलग - अलग संयोग को प्राप्त होकर शेष तिक्त और कषाय रस के साथ अलग - अलग संयोग को प्राप्त करते हैं । इसी तरह मधुर और कटुरस शेष तिक्त और कषाय रस के साथ संयोग को प्राप्त करते हैं । अम्ल और लवण रस एक साथ मिलकर कटु, तिक्त और कषाय रंस के साथ अलग - अलग संयोग को प्राप्त कर शेष तिक्त, कटु और कषाय रस के साथ अलग - अलग संयोग प्राप्त करते हैं । इसी तरह अम्ल और कद्र रस दोष तिक और कषाय रस से संयोग को प्राप्त करते है । लवण और कटुरस एक साथ मिलकर तिक्त रस के साथ मिलकर कषाय रस के साथ संयोग को प्राप्त करते हैं ॥ १७२० ॥

विमर्श - चार रसों का संयोग होने पर १५ भेद होते है परस्पर संयुक्त मधुर अम्ल लवण आदि से अलग अलग संयुक्त होकर कटु निक्त काय रसों से मिलकर चार रसों की संख्या प्राप्त होती है । अर्थात् मधुराम्लरस लवण से मिलकर कटुतिक्त एवं कपाय से पृथक् - पृथक् संयुक्त

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आत्रेयभद्रकाप्यीयाध्यायः २६ } सूत्रस्थानम् ४६५ होते हैं । जैसे - १. मथुराम्ललवणकटु, २. मधुराम्ललवणतिक्त, ३. मधुराम्ललवणकषाय । पुनः मधुराम्ल रस व ते संयुक्त होकर शेष ( निक्तकषाय ) रसों से संयुक्त होते हैं । जैसे— १. मधुरान्लकटुतिक्त २ मधुराम्लकटुकषाय । इसी प्रकार नथुराम्लतिक्त से संयुक्त होकर शेष कषाय रस से मिलते हैं । जैसे- १. मधुराम्लतिक्तकषाय इस प्रकार ३ + २ + १ = ६ चार न्स वाले द्रव्य होते हैं । उसी प्रकार मधुर लवंग पृथक्पृथक् कटु आदि ( कटुतिक्त ) के साथ शेष ( तिक्तकषाय ) रसों से पृथक् - पृथक् संयुक्त होते है । यथा - १. मधुवणकटुतिक्त, २. मधुलवणकटुकषाय ३. मधुरलवणतिक्तकषाय । मधुरकटुतिक्न के साथ कषाय रन से मिलते हैं । यथा - १. मधुरकटुतिक्तकषाय । अम्ललवण पृथक् - पृथक् कटुतिक्त रसों के साथ पृथक् - पृथक् संयुक्त होकर शेष रसों ( तिक्तकषाय ) के साथ संयक्त होता है । यथा -- १. अम्ललवणकटुनिक, २. अम्ललवणकटुकषाय, ३. अम्ललवणतिक्तकपाय । इत्ती प्रकार अम्ल - कटु संयुक्त होकर तिक्त के साथ कषाय रम से संयुक्त होते हैं । जैसे -१. अम्लकटुतिक्तकषाय । लवण व कटु परस्पर मिलकर ति के साथ कषायरस से संयुक्त होते हैं । यक्ष – १. लवणकटुतिक्तकपाय । इस प्रकार चार रस वाले द्रव्य ६ + ३ + १ + ३ + १ + १ = १५ होते हैं । वाग्भट ने भी ' चतुष्केषु दश स्वादुश्च-तरोऽम्लः पटुः मक्कन् । ' ( अ. ह्. सू. अ. १० ) से चार रसों के विकल्प वाले रस पन्द्रह होते हैं, ऐसा माना है । अर्थात् मधुर का १० अम्ल का ४ और लवण का १ कुल १५ होते हैं ।

युज्येते तु कषायेण संतितौ लक्ष्णोषणौ ।

पट् तु पञ्चरसान्याहुरेकैकस्यापवर्जनात् ॥ २१ ॥

पाँच रसों के ६ संयोग — एक - एक रस को हटा करके पाँच रस वाले द्रव्य ६ होते है ॥ २१ ॥

विमर्श - १. मधुराम्ललवणकटुतिक्त, २ मधुराम्ललवणकटुकषाय, ३. मधुराम्ललवणतिक्त-कषाय, ४. मधुराम्लकटुतिक्तकषाय ५. मधुरलवणकटुतिक्तकषाय, ६. अम्ललवणकटुतिक्तकषाय । वाग्भट ने ' पञ्चकेष्वेकमैवाम्लो मथुरः पञ्च सेवते । ' ( अ.हृ.सू. अ. १ ) अर्थात् पाँच रसों का संयोग होने पर मधुर का संयोग पाँच और अम्ल का संयोग एक होता है । इस प्रकार चार रसों के विकल्प कुल ६ होते हैं । पट् चैवैकरसानि स्युरेकं षडूसमेव तु ।

एक रस वाले द्रव्य ६ हैं । और ६ रस वाला द्रव्य १ है ।

इति त्रिपष्टिर्द्रव्याणां निर्दिष्टा रससंख्यया ॥ २२ ॥

* त्रिषष्टिः स्यादसंख्येया रसानुरसकल्पनात् । रसास्तरतमाभ्यां तां संख्यामतिपतन्ति हि ॥ उपसंहार इस प्रकार रस की संख्या के अनुसार द्रव्यों की संख्या ६३ बताई गई है । पर इन्हीं द्रव्यों में रस और अनुरस की कल्पना की जाय तो ६३ की संख्या असंख्य हो जाती है क्योंकि रस में तारतम्य अर्थात् मधुर, मधुरतर, मधुरतम की कल्पना की जाय तो ये संख्या की गणना का अतिक्रमण कर जाते हैं ॥ २२-२३ ॥ विमर्श - ६३ रस विकल्प के अनुसार द्रव्यों के ६३ भेदों को समझने के लिये वाग्भट ने सुन्दर संक्षेप में वर्णन किया है - ' षट्पञ्चकः पट् च पृथग् रसाः स्युश्चतुर्दिकौ पञ्चदशप्रकारौ । नेदास्त्रिका विशतिरेकमेव द्रव्यं षडास्वादमिति त्रिपष्टिः ॥ ( अ. हृ. सू. अ. १० ) १. ' रसास्तरतमान्यस्ताः ' इति पा ० ।

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II दोरस वाले द्रय मधुराम्ल मधुरलवण मधुरकटु मधुरतिक मधुरकषाय अम्ललवण अम्ल कटु अम्लतिक्त अम्ल कषाय लवण कटु लवण तिक्त लवण कषाय कटुतिक्त कटु कषाय तिक्त कषाय १५ पाँच रस वाले द्रव्य मधुराम्ल लवण कटु तिक्त मधुराम्ल लवण कटु कषाय मधुराम्ल लवण तिक्त कषाय मधुराम्ल कटु तिक्त कषाय मधुर लवण कटुतिक्त कषाय अम्ल लवण कटुतिक्त कषाय ६ चरकसंहिता तीन रस वाले द्रव्य मधुराम्ललवण मधुराम्लकटु मधुराम्ल तिक मधुराम्ल कषाय मधुरलवण कटु मधुर लवण तिक्त मधुर लवण कषाय मधुर कटुतिक मधुर कटु कषाय मधुर तिक्तकषाय अम्ल लवण कटु अम्ललवणतिक्त अम्ल लवण कषाय अम्ल कटुतिक्त अम्ल कटु कषाय अम्ल तिक्त कषाय लवणकटुतिक्त लवण कटुकषाय लवण तिक्त कषाय कटुतिक्तकषाय २० एक रस वाले द्रव्य मधुर अम्ल लवण कटु तिक्त कषाय ६ चार रस वाले इम्य मधुराम्ल लवण कटु मधुराम्ल लवण तिक्त मधुराम्ल लवण कषाय मधुराम्ल कटुतिक्त मधुराम्ल कटु कषाय मधुराम्लतिक्तकषाय मधुरलवण कटुतिक्त मधुर लवण कटु कषाय मधुर लवण तिक्त कषाय मधुर कटुतिक्तकषाय अम्ल लवण कटुतिक्त अम्ल लवण कटु कषाय अम्ल लवण तिक्तकषाय अम्ल कटुतिक्तकषाय लवण कटुतिक्तकषाय १५ छः रस वाले द्रव्य इतिकरूपान मथुरा १ 6 संयोगाः सप्तपञ्चाशत् कल्पना तु त्रिपष्टिधा रसानां तंत्र योग्यत्वात् कल्पिता रसचिन्तकैः ॥ और भी -- रसों के संयोग ५७ होते हैं । पर इसके विचारक चिकित्सकों ने स्वस्थ एवं रोगी श्री चिकित्सा के प्रयोगों में योग्य ( हितकर ) होने के कारण रस की कल्पना तिरसठ कल्पित कोहै ॥ २४ ॥

विमर्श- यदि इन रसों में तरन्तम की कल्पना कर जैसे मधुर मधुरतर, मधुरतम ) सूक्ष्म विचार किया जाय तो रसों का अनन्त भेद हो जायगा । इसलिये यह ६३ भेद स्थूल रूप से १. ' तत्र स्वस्थातुरहितचिकित्साप्रयोगेऽनतिसंक्षेपविस्तररूपतया हितत्वादित्यर्थः चकः । सुखस्मरणार्थ रसानुसार द्रव्यों के ६३ विकल्प निम्नतालिका में वर्णित है-

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आत्रेयभद्रकाप्यीयाध्यायः २६ ] सूत्रस्थानम् ४६७ चिकित्सा में सौकर्य के लिए किया गया है । इसमें ६२ रसों का भेद कुपित दोनों के भेद को शान्त करता है, और ६३ वाँ भेद दोषों को प्राकृतावस्था में बनाये रखता है । इसका वर्णन वाग्भट ने निम्न रूप से किया है- ' ते रसानुरसतो रसभेदास्तारतम्यपरिकल्पनया च । सम्भवन्ति गणनां समतीता दोषमेपजवशादुपयोज्यम् ॥ ' ( अ. हृ. सू. अ. १० ) ।

क्वचिदेको रसः कल्प्यः संयुक्ताश्च रसाः क्वचित् ।

दोपपधादीन् संचिन्त्य भिषजा सिद्धिमिच्छता ॥ २५ ॥

द्रव्याणि द्विरसादीनि संयुक्तांश्च रसान् बुधाः । रसानेकैकशो वाऽपि कल्पयन्ति गदान् प्रति । और भी - चिकित्सा क्षेत्र में सिद्धि ( सफलता ) की इच्छा रखने वाले वैद्य के लिए यह उचित है कि दोष और औषध आदि का पूर्ण विचार कर कहीं एक रस की और कहीं संयुक्त रस की कल्पना करें । विद्वान् वैद्य भिन्न रोगों में ( तथा स्वस्थावस्था में भी ) दो रस वाले इत्यादि, संयुक्त रम वाले द्रव्यों की कल्पना और एक - एक रसों की अलग - अलग कल्पना करते हैं ॥२५ २६ || विमर्श - दोषविकल्प ६३ ( वाग्भट ) माने जाते हैं उसी की चिकित्सा के अनुसार ६३ रसों को कल्पना की गयी है । कहीं पर आवश्यकतानुसार एक रस वाले द्रव्य का प्रयोग ( कल्पना ) किया जाता हैं, जैसे - एक मधुर रस वाले घृत, दुग्ध आदि द्रव्य । कहीं पर दो रस वाले जैसे - ( कषायमधुरो मुद्रः ) मूंग, मधु, कषाय मधुररस संयुक्त है । कहीं पर तीन रस वाले, जैसे एरण्ड तैल या कमरख यथा - ' मधुराम्लकपायं च विष्टम्भि गुरु शीतलम् । पित्तश्लेष्महरं भव्यम् ॥ ' ( सू. अ. २७ ) । कहीं चार रस वाले जैसे तिल - ' स्निग्बोष्णमधुरस्तिक्तः कषायः कटुकस्तिलः । ' ( सू. अ. २७ ) | कहीं पाँच रस वाले जैसे — इर्रे - ' अलवणा तुवरा परम् ' - तथा रसोन ( लहसुन ) और मद्य; कहीं छ रस वाले द्रयों की कल्पना की जाती है, जैसे काले एण ( मृग ) का मांस जैसा कि हारीत ने बताया है -- ' कानिचिद्विदरसादीनि द्रव्याणि स्युः स्वभावतः । यथैणः षट्सः कृष्णो यथा पञ्चरसाऽभया ॥ मद्यं पञ्चरसं यद्वत् तिलो यद्वच्चतूरसः । एरण्डतैलं त्रिरसं माक्षिकं द्विरसं तथा ॥ घृतमेकस्वादुरसं मधुरादिविभागतः । ’ यः स्याद्रसविकल्पज्ञः स्याच्च दोषविकल्पवित् । न स मुह्येद्विकाराणां हेतुलिङ्गोपशान्तिषु ॥ रस तथा दोष के ज्ञान का महत्त्व - जो चिकित्सक रसविकल्पों को भली प्रकार जानता है और दोषविकल्पों को भी जानता है वह चिकित्सक रोगों के कारण ( निदान ), लिङ्ग ( लक्षण ) और चिकित्सा में कभी भी मोह ( असफलता ) को नहीं प्राप्त करता है ॥ २७ ॥

विमर्श - नार्थ यह है कि रस - विकल्प ज्ञान से व्याधि के कारणभूत द्रव्य का ज्ञान हो जाता है । क्योंकि रसज्ञान के हो द्वारा सम्पूर्ण द्रव्यों का गुण आयुर्वेद शास्त्र में बताया गया है । तथा दोषविकल्प - ज्ञान से सम्पूर्ण रोगों के लक्षण ज्ञात होते हैं । क्योंकि रोगों के सम्पूर्ण लक्षण दोष विकल्प के ही अनुसार होते हैं । और रसविकल्प एवं दोपविकल्प के ज्ञान से औषध का ज्ञान हो जाता है अर्थात् रसविकल्पज्ञान से औषध द्रव्य के स्वरूप का ज्ञान हो जायगा और दोषविकल्प ज्ञान से औषध का प्रयोग कहाँ किस मात्रा में किया जाय यह ज्ञान हो जायगा । इस प्रकार इन दोनों के ज्ञान से चिकित्सक चिकित्सा क्षेत्र में कहीं भी भ्रान्त नहीं होगा और उसकी सफलता निश्चित होती हैं । 1 * व्यंक्तः शुष्कस्य चादौ च रसो द्रव्यस्य लक्ष्यते । विपययेणानुरसो रसो नास्तीह सप्तमः ॥ १. ' शुकस्य चेति चकारादार्द्रस्य च आदौ चेति चकारादन्ते च; तेन शुष्कस्य वा आर्द्रस्य वा प्रथमजिह्वासंबन्धे आदावास्वादान्ते वा यो व्यक्तत्वेन मधुरोऽयमम्लोऽयमित्यादिना विकल्पेन ३२ च ० सं ०

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४६८ चरकसंहिता रस और अनुरस के लक्षण - सूखे हुए द्रव्यों का जिल्हा संयोग होने पर जो रस स्पष्ट ज्ञात होता है वह रस ही उस द्रव्य का मुख्य रस होता है । इससे जो विपरीत होता है अर्थात् आर्द्र द्रव्य का जिह्वा से संयोग होने पर जिन रस की अन्त में कुछ व्यक्तता होती है उस रस का नाम अनुरर्स कहा जाता है । रस केवल छ होते हैं सातवाँ कोई भी रस नहीं होना है || २८ ॥ विमर्श - तात्पर्य यह है कि सूखे द्रव्यों का स्वाद लेने पर जो रस स्पष्ट प्रतीत हो उसे रस कहा जाता है । और आर्द्र द्रव्यों का भी स्वाद लेने पर जो रस स्पष्ट प्रतीत हो उसे भी रस कहा जाता है । संक्षेप में किसी भी प्रकार के द्रव्यों का जिह्वा से संयोग होते ही स्पष्ट रूप से जो रस व्यक्त होता है, उसे रस कहते हैं । और जिस द्रव्य का जिह्वा से संयोग होने पर प्रथम दूसरे रस की प्रतीति होकर बाद में अन्य रस की प्रतीति हो, तो बाद में प्रतीत होने वाले रस को अनुरस कहा जाता है । यहाँ शुष्क द्रव्य कहने का तात्पर्य यह है कि बहुत से द्रव्य आर्द्रावस्था में दूसरे रसों से युक्त होते हैं और वे ही द्रव्य जब सूख जाते हैं तब उसमें दूसरे रस हो जाते हैं । जैसे पिप्पली आर्द्रावस्था में मधुर होती है और शुष्कावस्था में कटु होती है । ऐसे द्रव्यों में शुष्का-वस्था में व्यक्त होने वाला रस, और आर्द्रावस्था में व्यक्त होने वाला अनुरस कहा जाता है । जो द्रव्य आर्द्रावस्था में तथा शुष्कावस्था में भी मधुर हो उसको मधुर रस वाला ही माना जाता है जैसे मुनक्का | परन्तु जिन द्रव्यों का प्रयोग सर्वदा आर्द्रावस्था में ही होता है उनका उसी अवस्था में जिड़ा से संयोग होने पर जो रस व्यक्त होता है उसे रस और जो अन्त में व्यक्त होता है उसे अनु-रस कहा जाता है जैसे — काजी, तक्र आदि । उपर्युक्त विमर्श चक्रपाणि के द्वारा अनुमोदित है । परापरत्वे युक्तिश्व संख्या संयोग एव च । विभागश्च पृथक्त्वं च परिमाणमथापि च ॥२ ९ ॥ संस्कारोऽभ्यास इत्येते गुणा ज्ञेयाः परादयः । सिद्धयुपायाश्चिकित्साया लक्षणैस्तान् प्रचक्ष्महे ॥ ( ३ ) गुण प्रकरण ( Topic of Guna ) परादि गुण की संख्या - १. पर, २. अपर, ३. युक्ति, ४. संख्या, ५. संयोग, ६. विभाग, ७. पृथक्त्व, ८. परिमाण, ९. संस्कार और १०. अभ्यास ये परादि दस होते हैं । ये परादि गुण चिकित्सा की सिद्धि के उपाय हैं इन्हें आगे लक्षणों द्वारा स्पष्ट किया जा रहा है ॥ २ ९ -३० ॥

देशकालवयोमानपाकवीर्यरसादिषु । परापरत्वे, युक्तिश्च योजना या तु युज्यते ॥ ३१ ॥

परत्वापरत्व तथा युक्ति के लक्षण - परत्व और अपरत्व का व्यवहार देश, काल, अवस्था ( आयु ) मान, विपाक, वीर्य और रस आदि में किया जाता है । जिस वस्तु की जहाँ योजना उचित हो उस वस्तु को वहाँ योजित करना ही युक्ति है ॥ ३१ ॥

विमर्श - ( क ) पर से प्रधान, अपर से अप्रधान लिया जाता है । पर और अपर अपेक्षाकृत होते है जैसे इससे यह पर है ( आगे हैं ), यह इससे अपर है ( पीछे है ) । विश्वनाथ ने पर अपर का देश और काल के अनुसार दो भेद माना है - ' परत्वं चापरत्वं च द्विविधं परिकीर्तितम् । दैशिकं कालिकं चापि मूर्त एव तु दैशिकम् ॥ ' पर चरक ने देश, काल, आयु, मान, पाक, वीर्य, रस आदि भेद से पर अपर का अनेक भेद किया है । कणाद ने पर अपर को इस प्रकार बताया है - ' एकदिका -भ्यामेककालाभ्यां सन्निकृष्टविप्रकृष्टाभ्यां परमपरं च । ( २- ७ ) । जिन गुणों के द्वारा आगे - पीछे का ज्ञान होता है उनको परत्व- अपरत्व कहते हैं । आगे के ज्ञान का कारण अपरत्व है और गृह्यते स व्यक्तः; यस्तूक्तावस्थाचतुष्टयेऽपि व्यक्तो नोपलभ्यते, किं नहि अव्यपदेश्यतया छायामात्रेण कार्यमात्रेण वा मीयते सोऽनुरस इति वाक्यार्थः ' चक्रः ।

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आत्रेय भद्रकाप्यीयाध्यायः २६ ] सूत्रस्थानम् ४६६ पोछे के ज्ञान का कारण परत्व है । ये गुण पृथिवी, जल, वायु तथा तेज द्रव्यों में रहते हैं, क्योंकि ये द्रव्य परिमित प्रदेश में रहते हैं । नित्य, विभु द्रव्यों में आगे - पीछे का भेद सम्भव नहीं है । ( ख ) युक्ति - जिस वस्तु का जहाँ संयोग करना उचित हो वहाँ उसका योग करना ही युक्ति है । यद्यपि संयोग भी दो या दो से अधिक द्रव्यों के मिलने से होता है । और युक्ति भी दो या दो से अधिक वस्तु के संयोग को कहते हैं । फिर भी जो यौगिक द्रयों की कल्पना होती है उसे युक्ति और जो अयौगिक द्रव्यों की कल्पना होती है उसे संयोग कहते हैं । जैसे दोष के अनुसार की गई औषध कल्पना को युक्ति, दोषों का विना विचार किए हुए औषध कल्पना को संयोग कहा जाता है । कुछ लोग समवाय में युक्ति का अन्तर्भाव करते हैं पर वह उचित नहीं है क्योंकि अपृथक् भाव सम्बन्ध को समवाय कहा जाता है । युक्ति पृथक - पृथक रहने वाले पदों का या वस्तुओं के योग को ही कहा जाता है । संख्या स्याद्द्वगितं, योगेः सह संयोग उच्यते । द्रव्याणां द्वन्द्वसर्वैककर्मजोऽनित्य एव च ॥ संख्या तथा योग के लक्षण - गणना करने को संख्या कहते हैं । द्रयों का एक साथ मिलने को संयोग कहा जाता है । ये द्वन्द्वकर्मज, सर्वकर्मज और एककर्मज तीन प्रकार के होते हैं और अनित्य होता है ॥ ३२ ॥

विमर्श - विश्वनाथ पञ्चानन भट्ट ने अपनी कारिकावली में गणना व्यवहार में विशेष कारण को संख्या माना है । यथा - ' गणनाव्यवहारे तु हेतुः संख्याभिधीयते । ' ' गणनाव्यवहारासाधारणं कारणं संख्या ॥ ' ( का. २०६ मुक्तावली ), ' एकत्वादिव्यवहारहेतुः संख्या तथा ( तर्कसंग्रह ) अर्थात् एक, दो, तीन इत्यादि व्यवहार जिसके द्वारा होता है उस गुण को संख्या कहते हैं । संयोग-द्रव्यों के एक साथ मिलने को संयोग कहा जाता है - ' संयुक्तव्यवहारहेतुः संयोगः । ' ( तर्क ० ) तथा ' अप्राप्तयोस्तु या प्राप्तिः सैव संयोग ईरितः । कीर्तितस्त्रिविधस्त्वेष आद्योऽन्यतरकर्मजः ॥ तथोभयक्रियाजन्यो भवेत्संयोगजोऽपरः । आदिमः श्येनशैलादिसंयोगः परिकीर्तितः ॥ मैषयोः संनिपातो यः स द्वितीय उदाहृतः । कपालतरुसंयोगात्संयोगस्तरुकुम्भयोः ॥ तृतीयः स्यात्कर्मजोऽपि द्विधैव परिकीर्तितः ॥ ' ( कारिकावली ११५ - ११८ ) । अर्थात् अप्राप्त वस्तुओं की प्राप्ति को संयोग कहा जाता है । चरक ने - १. द्वन्द्वकर्मज, २. सर्वकर्मज, ३. एककर्मज ये तीन भेद संयोग के किए हैं । उपरि निर्दिष्ट कारिकावली की कारिका से सष्ट है कि न्याय वाले १. अन्यतरकर्मज, २. उभय-कर्मज, ३. संयोगजकर्म ये तीन भेद मानते हैं । १. एककर्मज और अन्यतर कर्मज ये दोनों एक ही हैं, न्याय वाले बाज का पर्वत पर बैठना रूपी संयोग को अन्यतर कर्मज मानते हैं, तो चक्रपाणि ने पक्षी का बैठना माना है दोनों उदाहरण समान ही हैं । २. द्वन्द्वकर्मज और उभयकर्मज, ये दोनों एक हैं क्योंकि भेडों का परस्पर लड़ना ( चक्र ० ) और उड़ते हुए दो पक्षियों का परस्पर मिलना, इन दोनों उदाहरणों में क्रिया पायी जाती है अतः दोनों एक हैं । ३. सर्व-कर्मज चरक का और न्याय वालों का संयोगज संयोग परस्पर भिन्न हैं, जैसे पेड़ की एक डाली पर १. ' द्रव्याणां योगः संबन्ध इत्युक्ते अवयवात्रयविसंबन्धस्यापि संयोगत्वं स्यादत आह - सहेति, साहित्यरूपो योगः, स च पृथक्सिद्धयोरेव भवतीति भावः ' शिवदासः । ' सहेत्यनेनेहाकिञ्चित्करं परस्परसंयोगं निराकरोति, नद्भेदानाह – इन्द्रेत्यादि । तत्र द्वन्द्वकर्मजो यथा - युध्यमानयोर्मेषयोः, सर्वकर्मजो यथा - भाण्डे प्रक्षिप्यमाणानां माषाणां बहुलमाषक्रियायोगजः, एककर्मजो यथा - वृक्षवा. ययोः, अनित्य इति संयोगस्य कर्मत्वेनानित्यत्वं दर्शयति ' चक्रः । २. ' सः ' यो ।

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५०० चरकसंहिता कौवा बैठा है ( चक्र ० ) तो वृक्ष से कौवा का संयोग है ऐसा माना जाता है अर्थात् अवयव संयुक्त होने पर वह अवयवी से भी संयुक्त है इस प्रकार के संयोगन ज्ञान को संयोगज संयोग कहते हैं, और यहाँ सर्वकर्मज तेल निकलने में सम्पूर्ण तिलों का योग होना है ( चक्र ० ) । यद्यपि सर्वकर्मज संयोग और संयोगज संयोग परस्पर भिन्न प्रतीत होते हैं पर वस्तुतः दोनों एक ही है अन्तर केवल इतना है कि सर्वकर्मज संयोग एक काल में ही होता है और संयोगज संयोग उत्तर काल में सभी से संयुक्त होता है । वे सभी संयोग अनित्य होते हैं । पाणिनीय ने भी इसी का समर्थन किया है, जैसे-' हलोऽनन्तराः संयोगः अथ से अदवदिन हन को संयोग कहते है । पृथकत्व विभागस्तु विभक्तिः स्याद्वियोगो भागशो ग्रहः । पृथक्त्वं स्यादसंयोगो वैलक्षण्यमनेकता ॥ विभाग तथा पृथक के लक्षण विभाग भलग करने को कहते हैं, विभाग का पर्याय वियोग भी है पर भाग के रूप में अलग होने को वियोग कहा जाता है । ' यह इससे अलग है ' इस ज्ञान को पृथक्त्व कहा जाता है अर्थात् यह इससे नहीं मिला है, इस प्रकार संयोग से अलग विभाग और विभाग से अलग संयोग होता है ॥ ३३ ॥

विमर्श - मंयुक्त वस्तु का अलग होना विभाग कहा जाता है । और वियोग में भागशः ग्रह होता है जैसे किसी संयुक्त औषधि में नियत मात्रा का ज्ञान किया जाय कि यह औषधि कितनी मात्रा में है । पृथक्त्व — यह भी अलग करने का ही सूचक हैं पर इसमें संयोग नहीं रहता जैसे दो भेड़े परस्पर लड़ रहे हैं दोनों को अलग - अलग कर दिया जाय । जिसमें नियत मात्रा का ज्ञान होता है उसे वियोग कहा जाता है जैसा कि मूल में ' भागशी ग्रहः ' अर्थात् ' भागं भागं प्रति ग्रहः इनि भागशः ग्रह बताया है । विभाग भी तीन प्रकार का बताया है १ ज २. सर्वकर्मज ३. एककमंज, इनके उदाहरण क्रमशः वे ही हैं जो संयोग के हैं । २. वैलक्षण्य मठ और घट इन दोनों में एक से दूसरे में विलक्षण है अतः विभिन्न लक्षणों के रहने पर इसे विलक्षण कहा जाता है । अनेकता - जैसे गौ - या भैंस आदि पशुओं में गोत्व आदि के समान होते हुए भी तथा भिन्न - भिन्न गौओं में विभिन्न लक्षण जैसे चेन, रक्त, काली आदि में गोल सामान्य धर्म के रहते हुए और रूप आदि की समानता रहते हुए भी अनेकता रहती है । परिमाणं पुनर्मानं, संस्कारः करणं मतम् । भावाभ्यसनमभ्यासः शीलनं सततक्रिया || ३४ || परिमाण, संस्कार तथा अभ्यास के लक्षण जिस गुण के द्वारा नाप होना है उसे परिमाण कहते हैं । क्रिया द्वारा गुणाधान करने को संस्कार कहा जाता है । किसी भी भावपदार्थ का बार-बार पालन करने को अभ्यास कहा जाता है । शीलन और सत्तक्रिया ये दो अभ्यास के पर्यायवाची शब्द है ॥ ३४ ॥

विमर्श - परिमाण वह गुण है जिसके द्वारा सभी वस्तु का माप या मानदण्ड नियत किया जाता है । यह सभी द्रव्यों में पाया जाता है, इसके चार भेद होते है - १. अणु, २. महत् ३. ४. दीर्घ संस्कार - सायक प्रकारेण क्रियते इति संस्कारः गया- ' संस्कारी हि गुणान् राधानमुच्यते ' ( च. वि. अ. १ ) जिन द्रव्यों में जो गुण स्वभावतः नहीं पाये जाते हैं, उन गुणों को उन इल्यों में संस्कार के द्वारा लाया जाता है । यह संस्कार जल, अग्नि का संसर्ग, मन्दन, देश, काल, भावना, कालप्रकर्ष और पात्र में रखने से होता है । यह संस्कार तीन प्रकार का माना गया है- १. वेग, २. भावना, १ स्थितिस्थापक १. वेग - यह पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि इन मूर्त्त द्रव्यों में और अमूर्त मन में पाया जाता है । इससे द्रव्यों के संयोग और वियोग का नाश होता है । २. भावना - अनुभव प्रत्यक्ष आदि होने के बाद उन अनुभवों का जो कुछ अंश मन में रह जाता है, उसी के द्वारा उन अनुभूत वस्तुओं का स्मरण होता है और वे

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आत्रेय भद्रकाप्यीयाध्यायः २६ ] सूत्रस्थानम् ५०१ पुनः पहचाने जाते हैं । वासना इसका दूसरा नाम है । यह संस्कार केवल आत्मा में रहता है | बार - बार जिस वस्तु का अनुभव होता है उससे उस वस्तु की भावना चित्त में बनी रहती है । इस अनुभव का चित्त पर बहुत बड़ा प्रभाव पड़ता है । ३. स्थितिस्थापक — यह उस संस्कार को कहा जाता है जिसमें लचक होती है जिसके द्वारा रबर का टुकड़ा खींचे जाने के बाद फिर पुराने स्वरूप पर आ जाता है । यह पृथ्वी, जल, वायु तथा अग्नि में पाया जाता है । अभ्यास - किसी भी वस्तु को बार - बार लगन के साथ करने को अभ्यास कहा जाता है, लगातार कार्य करना, अभ्यास का नामान्तर बनाया है, यथा - ' सततक्रिया । ' तात्पर्य यह है कि जब तक लगातार कार्य नहीं किया जाता तब तक उसका अभ्यास ही नहीं होता है । इति स्वलक्षणैरुक्ता गुणाः सर्वे परादयः । चिकित्सा यैरविदितैर्न यथावत् प्रवर्तते ॥३५ ॥

गुगविषयक उपसंहार - इस प्रकार अपने - अपने गुणों के अनुसार पर और अपर आदि गुणों का वर्णन कर दिया गया । इन गुणों को यदि चिकित्सक वर्ग नहीं जानता है तो उचित रूप से उससे चिकित्सा नहीं हो पाती है ॥ ३५ ॥

विमर्श - कणाद ने परत्वादि केवल सात ही गुण माने हैं । युक्ति, संस्कार और अभ्यास इनको नहीं माना है । कारण यह है कि वे केवल कारण गुणों का ही वर्णन किये हैं, कार्यं गुणों का नहीं । चरक ने द्रव्य, गुण, कर्म में रहने वाले कार्य गुणों का वर्णन किया है, इसीलिए दस परादि गुग मानते हैं । ऋगुणा गुणाश्रया नोक्तास्तस्माद्रसगुणान् भिषक् । विद्याद्द्द्रव्यगुणान् कर्तुरभिप्रायाः पृथग्विधाः ॥ गुण के आश्रय द्रव्य, रस नहीं - गुण, गुण के आश्रयभूत नहीं रहते हैं । इसलिए वैद्य को जहाँ रस के गुणों का उपदेश है उसे द्रव्य का गुण ममझना चाहिए । अलग - अलग आचार्यों ने रस के गुणों का जो निर्देश किया है वहाँ उन उन आचार्यों का अभिप्राय द्रव्य के गुण बताना ही है । क्योंकि तन्त्रकर्त्ता के अभिप्राय अलग - अलग हो सकते हैं ॥ ३६ ॥

विमर्श - पहले रसों के परस्पर संयोग - रूप गुण की व्याख्या की गई है । अब रस में रहने वाले स्निग्ध, रूक्ष आदि गुणों का आगे वर्णन करना अभीष्ट है । द्रव्य, गुण, कर्म आदि में द्रव्य की ही प्रधानता रहती है । सभी रस द्रव्य के अधीन रहते है । अतः रसों में गुग का अस्तित्व स्वतंत्र नहीं माना जाता है किन्तु वे गुण द्रव्य के ही माने जाते हैं । जैसे मधुर रस गुरु और स्निग्ध होता है तो गुरु और स्निग्ध इन गुणों का उपदेश रस में ही किया गया है | पर यहाँ पर तंत्रकर्त्ता का अभिप्राय द्रव्य के गुण से है । यद्यपि रस में गौण रूप से वे रहते हैं फिर भी द्रव्याधीन होने के कारण वे रस के गुण नहीं माने जाते हैं । इसलिए ' गुणा गुणाश्रया नोक्ताः ' कहा है । * अतश्च प्रकृतं बुद्ध्वा देशकालान्तराणि च । तन्त्रकर्तुरभिप्रायानुपायांश्चार्थमादिशेत् ॥ प्रकरणानुसार अभिप्राय - इस लिए वैद्य के लिए यह उचित है कि वह वचनों को सुनकर या रोगों को देखकर प्रकरण, देश, काल के भेदों को समझ कर और ग्रन्थकर्त्ता के अभिप्रायों एवं उपायों को जानकर तात्पर्य समझे ॥ ३७ ॥।

१. ' ननु, यदि द्रव्यगुणा एव ते ततः किमिति रसगुणत्वेनोच्यन्त इत्याह- कर्तुरिति । तन्त्रकर्तुः, अभिप्राया इति तत्र तत्रोपचारेण तथा सामान्यशब्दादिप्रयोगेण तन्त्रकरणबुद्धयः ' चक्रः । २. ' प्रकृतं प्रकरणम् ' शिवदासः; ' प्रकृतिम् ' ग. । ३. ‘ उपायानिति शास्त्रोपायान् तन्त्रयुक्तिरूपान्, अर्थंम् अभिधेयम् ' चक्रः ।