चरक संहिता हिन्दी भाष्य — पृष्ठ 591–600

चरक संहिता हिन्दी भाष्य · Chaukhamba · पृष्ठ 591–600

पृष्ठ 591

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५०२ चरकसंहिता विमर्श - आयुर्वेदीय वचनों के तात्पर्य को जानने के लिए प्रकृत ( प्रकरण ), देश, काल आदि का ज्ञान न किया जाय तो शब्दबोध नहीं हो सकता है । प्रकृत ( प्रकरण ) जैसे--' साध्येषु भेषजं सर्वमीरितं तत्त्ववेदिना । असाध्येष्वपि दातव्यों रसोऽतः श्रेष्ठ उच्यते ॥ ' ( रसेन्द्र-सारसंग्रह ) यहाँ प्रकरणवश रस से पारद का ग्रहण किया जाता है न कि पड् रसों का । देश - इससे भूमि और आतुर का ग्रहण होता है । जैसे- ' तीव्रातिरपि नाजीर्णी पिवेच्छूलघ्नमौषधम् । आमसन्नोऽनलो नालं पक्तुं दोषौषधाशनम् ॥ ' इस श्लोक में अजीर्ग होने पर यदि शूल हो तो शूलघ्न औषध नहीं लेने का विधान है, पर शूल का स्थान नियन नहीं किया, परन्तु ' आमसन्न -' अनल ' से यहाँ उदर प्रदेश का शूल लिया जाता है, न कि सिर का शूल या शरीर के इतर प्रदेश का शूल | काल - विरेचन के लिए समान्यतः त्रिवृत उत्तम औषधि है, पर किस काल में, किस. प्रकार इसका प्रयोग करना चाहिए, यह विचार काल के अनुसार होता है । यथा - ' त्रिवृतां कौटजं बीजं पिप्पलीं विश्वभेषजम् । क्षौद्रद्राक्षारसोपेतं वर्षास्वेतद् विरेचनम् ॥ शर्करा त्रिवृता तुल्या ग्रीष्मकाले विरेचनम् । ' ( च. क. अ. ७ ) । षड् विभक्तीः प्रवच्यामि रसानामत उत्तरम् । षट् पञ्चभूतप्रभवाः संख्याताश्च यथा रसाः ॥ ( ४ ) षड् रस - प्रकरण ( कर्म ) ( Topic of Six Rasas and Their Karmas ) षड् - सोत्पत्ति 1- अब इसके बाद पंचमहाभूत से उत्पन्न होने वाले रसों की जिस प्रकार । ६ संख्या हो जाती है उस प्रकार उपदेश करेंगे ॥ ३८ ॥

* सौम्याः खल्वापोऽन्तरिक्षप्रभवाः प्रकृतिशीता लध्ध्यश्चाव्यक्तरसाश्च; तास्त्वन्तरि-क्षाश्यमाना भ्रष्टाश्च पञ्चमहाभूतगुणसमन्विता जङ्गमस्थावराणां भूतानां मूर्तीरभि-प्रीणयन्ति, तासु मूर्तिषु पडभिर्मूर्च्छन्ति रसाः ॥ ३ ९ ॥ आकाशीय जल और रस - आकाश से उत्पन्न होने वाला जल सौम्य होता है । उसकी प्रकृति शीतल, लघु और अव्यक्त रस की होती है । इस प्रकार का जल जब आकाश से नीचे गिरता है तो गिर कर पंचमहाभूतों के विकारों के गुण से युक्त होकर जंगम - स्थावर प्राणियों को तृप्त करता है । तब उन उन मूर्तिमान् शरीरों में छ रस व्यक्त हो जाते हैं ॥ ३ ९ ॥ * तेषां षण्णां रसानां सोमँगुणातिरेकान्मधुरो रसः, पृथिव्यग्निभूयिष्ठत्वादम्लः, सलि-लाग्निभूयिष्टत्वाल्लवणः वाय्वग्निभूयिष्ठत्वात्कटुकः, वाय्वाकाशातिरिक्तत्वात्तिक्तः, पवन-पृथिवीव्यतिरेकात् कषाय इति । एवमेषां रसानां पट्त्वमुपपन्नं न्यूनातिरेकविशेषान्म-हाभूतानां भूतानामिव स्थावरजङ्गमानां नानावर्णाकृतिविशेषाः पडूनुकत्याच कालस्यो -पपन्नो महाभूतानां न्यूनातिरेकविशेषः ॥ ४० ॥

रसों के पाञ्चभौतिक संगठन इन छ रसों में सोन गुग की प्रधानता से मधुर रस की १. ‘ परं चानः प्रवक्ष्यामि रसानां षड् विभक्तयः ' इति पा ० । २. ' श्यमाना इति वदता भूमिसंबन्धव्यतिरेकेणान्तरिक्षेरितैः पृथिव्यादिपरमाण्वादिभिः संध को भवतीति दर्शत ' चक्रः । ३. ' अभिमूर्च्छन्ति रसा इति व्यक्ति यान्ति ' चक्रः । ४. ' अत्र सोमशब्देन पृथिवीजलयोर्ग्रहणं, उभयोः सौम्यत्वात् ' शिवदासः । ' पृथ्वीसोमगुणा-तिरेकात् ' ग. ।

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आत्रेय भद्रकाप्यीयाध्यायः २६ ] सूत्रस्थानम् ५०३ उत्पत्ति होती है । पृथिवी और अग्नि की अधिकता से अम्ल रस, जल और अनि गुण की प्रधानता से लवण रस, वायु और अनि गुण की प्रधानता से कटु रस, वायु और आकाश की प्रधानता से तिक्त रस, बाबु और पृथिवी की प्रधानता से कपाय रस की उत्पत्ति होती है । इन प्रकार रसों के छ त्रिभाग होते हैं । इनकी उत्पत्ति में पंच महाभूतों की न्यूनता और प्रधानता कारण होती हैं । जिस प्रकार स्थावर और जंगम प्राणियों में पंचमहाभूत के गुणों की न्यूनता और प्रधानता से गौर, कृष्ण आदि वर्ण, एवं आकृति विशेष की उत्पत्ति होती है, उसी प्रकार रसों की उत्पत्ति होती है । काल की छ ऋतुयें होती हैं । उसके अनुसार पंचमहाभूतों की न्यूनता और प्रधानता होना स्वाभाविक ही हैं ॥ ४० ॥

विमर्श - विभिन्न आचायों के मत से षड् रसों का जो पाञ्चभौतिक संगठन है उसका निम्न-लिखित रूप में संग्रह किया जा रहा है । १. मधुर - जल + पृथ्वी २. अम्ल - पृथ्वी + अग्नि ( चरक, वृद्धवाग्भट और वाग्भट ) जल + अग्नि ( सुश्रुत ) ३. लवण - जल + अग्नि ( चरक, वाग्भट ) पृथ्वी + अनि ( सुश्रुत ) अग्नि + जल ( नागार्जुन ) ४. कटु - वायु + अग्नि ५. तिक्त - वायु + आकाश ६. कषाय - वायु + पृथ्वी तत्राग्निमारुतात्मका रसाः प्रायेणोर्ध्वभाजः, लाघवादुत्प्लवनत्वाच्च वायोरूर्ध्वज्वलन • त्वाच्च वह्नेः; सलिलपृथिव्यात्मकास्तु प्रायेणाधो भाजः, पृथिव्या गुरुत्वानिम्नगत्वाञ्चोदकस्य; व्यामिश्रात्मकाः पुनरुभयतोभाजः ॥ ४१ ॥

पंचमहाभौतिक संगठन और रसों की गति ( कार्य ) - • जिन रसों में अग्नि और वायु प्रधान होते हैं वे प्रायः ऊपर चलनेवाले होते हैं, क्योंकि वायु हल्की होती है पर गतिशील होती है और अनि जलती हुई ऊपर गति करनेवाली होती है । जो रस जल और पृथ्वी महाभूत प्रधान होता है वह अधो भाग में चलनेवाला होता है, क्योंकि पृथ्वी गुरु होनी है । जल नीचे की तरफ गतिशील स्वभाववाला होता है और जो रस दोनों प्रकार के पंचमहाभूतों से मिश्रित होते हैं वे ऊर्ध्व और अधः भाग में चलनेवाले होते हैं ॥ ४१ ॥

* तेषां षण्णां रसानामेकैकस्य यथाद्रव्यं गुणकर्माण्यनुव्याख्यास्यामः ॥ ४२ ॥

प्रत्येक रस के शुभ कर्म - इन ६ रसों मे एक - एक के द्रश्य के अनुसार गुण और कर्म की व्याख्या कर रहा हूं ॥ ४२ ॥

दिनर्श - रस गुण है अतएव इसमें गुगकर्म का रहना असम्भव है, क्योंकि कहा गया है । यथा— ' गुणागुणाश्रया नोकाः । तथापि रसाधार द्रव्य की व्याख्या करना ही आचार्य का तात्पर्य है ॥ ४२ ॥

तत्र मधुरो रसः शरीरखात्म्यास रुधिरमांसमेदो स्थिमज्जौजः शुकाभिवर्धन आयुष्यः पडिन्द्रियप्रसादनो बलवर्गकरः पित्तविषमारुतघ्नस्तृष्णादाहप्रशमनस्त्वच्यः केश्यः कण्ठ्यो १. ' उत्प्लवनत्वात्तिर्यगूर्ध्वगतिमत्त्वात् ' शिवदासः । २. ‘ यथाद्रव्यमिति यद्यस्य रसस्य द्रव्यमाधारस्तदनतिक्रमेण, एतेन रसानां गुणकर्मणी रसाधार-द्रव्ये बोद्धव्ये इति दर्शयति ' चक्रः ।

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५०४ चरकसंहिता बल्यः प्रीणनो जीवनस्तर्पणो बृंहणः स्थैर्यकरः क्षीणक्षतसंधानकरो घ्राणमुखकण्ठौष्ठजिह्वा-प्रह्लादनो दाहमूर्च्छाप्रशमनः षट्पदपिपीलिकानामिष्टतमः स्निग्धः शीतो गुरुश्च । ( १ ) मधुर रस के गुण - कर्म - इन ६ रसों के मध्य मे मधुर रसवाला द्रव्य शरीर को सात्म्य होने से रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि मज्जा, ओज और शुक्र को बढ़ानेवाला होता है । आयु के लिए सुखकर होता है, मन के साथ पाँचो ज्ञानेन्द्रिय ( श्रोत्र, प्राण, रसन, चक्षु और स्पर्शन ) को प्रसन्न रखता है, शारीरिक बल को बढ़ाना और रूप को निखारना है, बढ़े हुए पित्त को, शरीरगत विष को और बढ़ी हुई वायु को शान्त करता है, तृष्णा को दूर करना है, त्वचा, केश और कण्ठ के लिए लाभकारी होता है, शरीर को प्रसन्न करता है, जीवनीय शक्ति को बढ़ाता है, शरीर एवं मन को तृप्त करता है, शरीर को स्थूल बनाता है, स्थिरता उत्पन्न करता है, शारीरिक धातुओं की क्षीणता को नष्ट करता हैं, कटे हुए स्थानों का सन्धान करता है, नासिका, मुख, गला, ओष्ठ और जिह्वा को साफ रखता है, दाह और मूर्च्छा को दूर करता है, भौरों और चीटियों को अधिक प्रिय होता है । ये मधुर रस के कर्म होते हैं और मधुर रस का गुण स्निग्ध, शीत और गुरु होता है । स एवंगुणोऽप्येक एवात्यर्थमुपयुज्यमानः स्थौल्यं मार्दवमालस्यमतिस्वनं गौरवमन-न्नाभिलाषमग्नेदौर्बल्यमास्यकण्ठयोर्मांसाभिवृद्धिं श्वासकासप्रतिश्यायालसकशीतज्वराना-हास्यमाधुर्यवमथुसंज्ञास्वरप्रणाशगलगण्डगण्डमालाश्लीपद्गलशोफबस्तिधमनीगलोपलेपा-च्यामयाभिष्यन्दानित्येवंप्रभृतीन् कफजान् विकारानुपजनयति ॥ ( १ ) मधुर रस के अधिक सेवन से दोष - इन उपर्युक्त गुणों से युक्त होने पर भी यदि केवल एक मधुर रस का ही अधिक सेवन किया गया तो शरीर में अधिक स्थूलता, कोमलता, आलस्य, निद्राधिक्य, गुरुता, अन्न खाने की इच्छा का अभाव, अग्नि की मन्दता, मुख और गले में मांस का बढ़ना, दमा, खाँसी, सर्दी, अलसक, जाड़े के साथ ज्वर का होना, आनाह, मुख में मीठापन का होना, वमन का होना, ज्ञान का नाश और स्वर - भेद, गलगण्ड, कण्ठमाला, श्रीपद ( Filaria ), गले में सूजन, मूत्राशय और धमनी, गले में लेप करने की तरह प्रतीत होना, नेत्र के प्रायः सभी रोगों का होना और अभिष्यन्द आदि कफ जन्य अनेक रोग होते हैं । ( १ ) ' अम्लो रसो भक्तं रोचयति, अग्निं दीपयति, देहं बृंहयति, ऊर्जयति, मनो बोधयति, इन्द्रियाणि दृढीकरोति, वलं वर्धयति, वातमनुलोमयति, हृदयं तर्पयति, आस्यमात्राव-यति, भुक्तमपकर्षयति, क्लेदयत, जरयति, प्रीणयति, लघुरुष्णः स्निग्धश्च । ( २ ) अम्लरस के गुण कर्म - खट्टा रस भोजन में रुचि उत्पन्न करता है, जठराग्नि को दीप्त करता है, शरीर को मोटा करता है, शारीरिक शक्ति को बढ़ाता है, मन को उबुद्ध करता है, इन्द्रियों को बलवान् बनाता है, बल की वृद्धि करता है, वायु को अनुलोम करता है, हृदय को तृप्त रखता है, मुख से जल का स्राव कराता है, भोजन किए हुए अन्न को मुख से खींच कर आमाशय में पहुँचाता है, भोजन को गीला करता है, उसे पकाता है, शारीरिक धातुओं को तृप्त करना है ये अम्लरस के कर्म होते हैं और उसके गुण, लघु, उष्ण और स्निग्ध होते हैं । स एवंगुणोऽप्येक एवात्यर्थमुपयुज्यमानो दन्तान् हर्षयति तर्षयति, संमीलयत्यक्षिणी, संवेजयति लोमानि, कफं विलापयति, पित्तमभिवर्धयति, रक्तं दूषयति, मांसं विदहति, कायं शिथिलीकरोति, क्षीणक्षत कृशदुर्बलानां श्वयथुमापादयति, अपि च क्षताभिहतदष्टद-१. ' विलालयति ' ग. ।

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आत्रेयभद्रकाप्यीयाध्यायः २६ ] सूत्रस्थानम् स्वभावात् परिदहति कण्ठमुरो हृदयं च । ( २ ) १. ' विष्टिविद्धोत्पष्टादीन् ' इनि पा. । २. अवस्रंसी ' यो । ५०५ पाचयत्याग्नेय-३. ' वर्धयति ' ग. । ग्धभग्नशूनप्रच्युतावमूत्रितपरिसर्पितमर्दितच्छिन्नभिन्नविश्लिष्टोद्विद्धोत्पिष्टादीन् अम्ल रस के अधिक सेवन से दोष - इन उपर्युक्त गुणों से युक्त होने पर भी यदि केवल एक अम्ल रस का ही अत्यधिक सेवन किया गया तो वह दाँतों में हर्ष ( दाँतों का खट्टा होना ) उत्पन्न करता है, प्यास को उत्पन्न करता है, खाने पर शीघ्र ही नेत्रों को बन्द कराता है, रोमों में संवेजन अर्थात् रोमाञ्च उत्पन्न करता है, सूखे कफ को गीलाकर गलाता है, पित्त को बढ़ाता है, रुधिर को दूषित करता है, मांसपेशियों में दाह उत्पन्न करता है, शरीर के सन्धि बन्धनों को ढीला करता है, क्षीण, क्षत, कृश और वलरहित पुरुषों में शोध उत्पन्न करता है । और भी, क्षत ( कटे हुए ), अभिहत ( चोट लगे हुए ), दानों से कटे हुए, जले हुए भग्न ( टूटे हुए ), शून ( शोथ युक्त हुए ) च्युत ( सन्धि भग्न ), अवमूत्रित ( किसी जहरीले जन्तु विशेष जैसे मकड़ी आदि के द्वारा शरीर पर मूत्र किए हुए ), परिसर्पित ( किसी विषैले जन्तु विशेष से शरीर पर स्पर्श किए हुए ), मर्दित, छिन्न ( खड्गादि शस्त्रों से द्विधा विभक्त हुए ), भिन्न ( आशयों का विदार ), विश्लिष्ट ( अभिघात से कटे हुए ), विद्ध ( किसी काँटे या लोहे आदि से विद्ध हुए ), उत्पष्ट ( प्रहार आदि से चूर्ण हुए ) इत्यादि को, आग्नेय गुण भूयिष्ठ होने से पका देता है और आग्नेय स्वभाव होने से ही अधिक सेवन किया गया अम्ल रस कण्ठ, छाती, और हृदय में जलन उत्पन्न करता है ( २ ) लवणो रसः पाचनः क्लेदनो दीपनश्च्यवनश्छेदनो भेदनस्तीचगः सरो विकास्य: -tr वकाशकरो वातहरः स्तम्भबन्धसंघातविधमनः सर्वरसप्रत्यनीकभूतः, आस्यमात्राव यति, कफं विष्यन्दयति, मार्गान् विशोधयति, सर्वशरीरावयवान्मृदूकरोति, रोचयत्याहा-रमाहारयोगी, नात्यर्थं गुरुः स्निग्ध उष्णश्च । ( ३ ) लवण रस के गुण कर्म - लवण रस अन्न को पकाता है, अन्न के संघान को गीला करता है, जठराग्नि को दीप्त करता है, प्रत्येक अवयवों को अपने स्थान से पृथक करता है, छेदन, भेदन, तीक्ष्ण ( तेज ), सर ( अस्थिर ), विकासी ( सन्धि बन्धनों का मोक्ष करते हुए उसमें शिथिलता उत्पन्न कर धातुओं से ओज को पृथक् करने वाला ) अधस्रंसी ( नीचे बहनेवाला स्वभाव ), अवकाशकर ( स्थान को रिक्त करनेवाला ), वातशामक, स्तम्भ ( शरीर की जकड़ाहट ), बन्ध ( मलविबन्ध ), संघात ( दोष दूष्यों का एकत्र होना इनका नाश करना है, सभी रसों के विपरीत अर्थात् उनका नाशक होता है, मुख से लाला का स्राव कराता है, कफ को पतला करना है, ऊर्ध्वं एवं अधोत्राही स्रोतों को शुद्ध करता है, सम्पूर्ण शरीर के अवयवों को कोमल करता है, आहार में रोचकता लाता है, आहार में अत्यन्त उपकारक है । ये लबग रस के कर्म कहे गए हैं । लवण रस का गुण अधिक गुरु नहीं है, स्निग्ध है और उष्ण है । स एवंगुणोऽप्येक एवात्यर्थमुपयुज्यमानः पित्तं कोपयति, रक्तं वर्धयति, तर्षयति, मूर्च्छति, तापयति, दारयति, कुष्णाति मांसानि प्रगालयति कुष्ठानि, विषं वर्धयति, शोफान् स्फोटयति, दन्तांश्च्यावयति, पुंस्त्वमुपहन्ति, इन्द्रियाण्युपरुणद्धि, वलिपलित-खालित्यमापादयति, अपि च लोहितपित्ताम्लपित्तवीसर्पवातरक्तविचर्चिकेन्द्रलुप्तप्रभृतीन् विकारानुपजनयति । ( ३ ) लवण रस के अधिक सेवन से दोष - इन उपर्युक्त गुणों के रहते हुए भी यदि केवल एक लवण रस का अधिक सेवन किया जाय तो वह पित्त को कुपित करता है, रुधिर की वृद्धि करता

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५०६ चरकसंहिता है, विपासा उत्पन्न करता है, मूर्च्छा उत्पन्न करता है, शरीर में ताप की वृद्धि करता है, त्वचा में विचार करता है, मांस - पेशियों को विकृत करता है, कुष्ठ रोग में मांसपेशियों को गलाना है, विषको बढ़ाता शोथ को फाड़ देता है, दाँतों को गिरा देता है, पुंस्त्वशक्ति को नष्ट करता है, इन्द्रियों की शक्ति को अवरुद्ध कर देता है, अकाल में ही बलि ( झुर्रियाँ पड़ना ), पलिन ( बाल पकना ), खालिन्य ( बालों का गिरना ) उत्पन्न करता है और रक्तपित्त, अम्लपित्त, विसर्प, वातरक्त, विचर्चिका, इन्द्रलुप्त आदि विकारों को उत्पन्न करता है ( ३ ) । कटुको रसो वक्रं शोधयति, अग्नि दीपयति, भुक्तं शोषयति, घ्राणमात्रावयति, चतु-विरेचयति, स्फुटीकरोतीन्द्रियाणि, अलसकश्वयधूपचयोदर्दाभिप्यन्दस्नेह स्वेदकेदमलानु-पहन्ति, रोचयत्यशनं, कण्डूविनाशयति, व्रणानवसादयति, क्रिमीन् हिनस्ति, मांसं विलि-खति, शोणितसंघातं भिनत्ति, बन्धांश्छिनत्ति, मार्गान् विवृणोति, श्लेष्माणं शमयति, लघुरुष्णो रूक्षश्च । ( ४ ) कटु रस के गुण कर्म - कटुरस मुख का शोधन करता है, अग्नि को तेज करता है, भोजन किए हुए आहार द्रव्यों का शोषण करता है, नासिका से कफ का स्राव कराता है, नेत्रों से जल का स्त्राव कराता है, ज्ञानेन्द्रियों को अपने - अपने कार्य करने में उत्तेजित करता है अलसक ( आमदोष ), शोथ, उपचय ( मोटापन ), उदर्द ( अंगों पर चकत्ते निकलना ), अभिष्यन्द, स्नेह ( शरीर का चिकनापन ), स्वेद, क्लेद और दूषित एवं वृद्ध मलों को नष्ट करता है, भोजन में रुचि उत्पन्न करता है, खुजलाहट को दूर करना है, व्रणों को नष्ट करता है कृमियों का नाश करता है, दूषित मांस का लेखन करता है, रक्त के संघात का भेदन करता है, सन्धिवन्धनों को अलग करता है, स्रोतों को विस्तृत करता है और बढ़े हुए कफ को शान्त करता है । इसका गुण लघु, उष्ण और रूक्ष होता है । स एवंगुणोऽप्येक एवात्यर्थमुपयुज्यमानो विपाकप्रभावात् पुंस्त्वमुपहन्ति, रसवीर्यप्र-भावान्मोहयति, ग्लापयति, सादयति, कर्षयति, मूर्च्छयति, नमयति, तमयति, भ्रमयति, कण्ठं परिदहति, शरीरतापमुपजनयति, वलं क्षिणोति, तृष्णां जनयति, अपि च वाय्वग्नि-गुणबाहुल्यान्द्रमदवेथुकम्पतोदभेदैश्वरण भुजपोर्श्वपृष्ठप्रभृतिषु मारुतजान् विकारानुप-जनयति । ( ४ ) कटुरस के अधिक सेवन से दोष – इन उपर्युक्त गुणों के होने पर भी यदि केवल एक कटु रसका ही अधिक सेवन किया जाय तो अपने विपाक प्रभाव से पुंस्त्व शक्ति को नष्ट करता है, अपने रस और वीर्य के प्रभाव से मोह, शरीर में ग्लानि तथा अवसाद उत्पन्न करता है, शारीरिक धातुओं को शिथिल करता है, मूर्च्छा उत्पन्न करता है, शरीर को टेढ़ा करता है, बेचैनी तथा चक्कर उत्पन्न करता है, गले में दाह एवं शरीर में ताप उत्पन्न करना है, बल का नाश करता है, और विपासा को उत्पन्न करनेवाला होता है और कटुस में वायु और अनि गुग की अधिकता होती है । इसलिए कटुरस के अधिक सेवन से भ्रम, दाद, शरीर में कम्प, सूई चुभोने के समान पीड़ा, भेट ( फाड़ने की तरह शरीर में पीड़ा ) यदि लक्षणों से युक्त पैर, हाथ, पार्श्व, पीठ आदि अवयवों में वातजन्य रोगों को उत्पन्न करता है । ( ४ ) तिको रसः स्वयमरोचिष्णुरप्यरोचकनो विपन्नः कृमिघ्नो मूर्च्छादाहकण्डू कुष्ठतृष्णाम-शमनस्त्वमांसयोः स्थिरीकरणो ज्वरन्नो दीपनः पाचनः स्तन्यशोधनो लेखनः क्लेदमेदोव-सामजलसीकापूयस्त्रेदमूत्रपुरीषपित्तश्लेोपशोपगो रूक्षः शीतो लघुश्च । १. ' कण्डूं विलालयति ' ग. । २. ' मधु ' यो । ३. ' पीलुहस्ततलम् ' इति गङ्गाधरः ।

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आत्रेयभद्रकाप्यीयाध्यायः २६ ] सूत्रस्थानम् ५०७ तिक्त रस के गुण कर्म - स्वयं तिक्त रस अरोचक होता है किन्तु यदि खाया जाय तो अरुचि को दूर करता है, विप प्रभाव को दूर करता है, कृमियों को नष्ट करता है, मूच्छां ( संज्ञानाश ), दाद, खुजली, कोड़ और पिपासा को नष्ट करता है, चमड़े और मांसपेशियों में स्थिरता उत्पन्न करता है, ज्वरशामक, अग्निदीपक आहारपाचक, दुग्ध का शोधक और लेखन है, शरीर का क्लेद्र, मेद, चर्चा, मज्जा, लसीका, पूय, पसीना, मूत्र, मल, पित्त और कफ को सुखाता है । तिक्तरस के गुण रुक्ष, शीत और लघु हैं । स एवंगुणो s येक एवात्यर्थमुपयुज्यमानो रौदयात् खरविशदस्वभावाच्च रसरुधिरमां-समेदोस्थिमज्जशुक्राण्युच्छोपयति, स्रोतसां खरत्वमुपपादयति, बलमादत्ते, कर्शयति, ग्लपयति, मोहयति, भ्रमयति, बदनमुपशोषयति, अपरांश्च वातविकारानुपजनयति ॥ ( ५ ) ॥ तिक्तरस के अधिक सेवन से दोष -- इस प्रकार उपर्युक्त गुणों के रहने पर भी यदि केवल एक तिक्तरस का ही अधिक सेवन किया गया तो, तिक्तरस में स्वभावतः रहनेवाले रूक्ष, खर और विशद गुण, अपने प्रभाव से रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि मज्जा और शुक्र का शोषण करनेवाला होता है, स्रोतों में खरता उत्पन्न करना है, शारीरिक बल घटाता है, शरीर को कृश करता है, मन में ग्लानि लाता है, मोह उत्पन्न करता है, भ्रम रोग उत्पन्न करता है, मुख का शोषण करता है, इनसे अतिरिक्त अन्य वात रोगों को उत्पन्न करता है ( ५ ) । कषायो रसः संशमनः संग्राही संधानकरः पीडेनो रोपणः शोषणः स्तम्भनः श्लेष्मरक्त-पित्तशमनः, शरीरक्केदस्योपयोक्ता, रूक्षः शीतोऽलघुश्च । ( ६ ) कपाय रस के गुण कर्म - कषाय रस संशमन होता है, संग्राही होता है, संन्वान करने वाला है, पीडन, रोपण ( व्रणों में मांस आदि की पूर्ति करना ), शोपण ( क्लेद का ), स्तम्भक है । कफ, पित्त, और रक्त में आए हुए दोपों की शान्ति करता है । शरीर में उत्पन्न हुए केंद्र को चूषित कर लेता है ये कषाय रस के कर्म बताये गए हैं । कषाय रस के गुण रूक्ष, शीत और गुरु हैं । स एवंगुणोऽयेक एवात्यर्थमुपयुज्यमान आस्थं शोपयति, हृदयं पीडयति, उदरमा-ध्मापयति, वाचं निगृह्णाति, स्रोतांस्यवबध्नाति श्यावत्वमापादयति, पुंस्त्वमुपहन्ति, विष्टभ्य जरां गच्छति, वातमूत्रपुरीपरेतांस्यवगृह्णाति, कर्शयति, ग्लपयति, तर्षयति, स्तम्भयति, खरविशदरूतत्वात् पक्षवधग्रहापतानकादितप्रभृतींश्च वातविकारानुपजन-यति ॥ ४३ ॥

कपाय रस के अधिक सेवन से दोष - इन उपर्युक्त गुणों के रहने पर भी यदि केवल एक कपायरस का अधिक मात्रा में उपयोग किया जाय तो वह मुख का शोषण करता है, हृदय में पीडा उत्पन्न करता है, उदर में आध्मान करता है, वचन शक्ति को कम करता है, स्रोतों को अवरुद्ध कर देता है, शरीर का वर्ण श्याव कर देता है । पुंस्त्व शक्ति को नष्ट कर देता है । उदर में कब्ज करने के बाद अन्न को पकाता है । वायु, मूत्र, शुक्र और पुती को रोक देता है, शहर को कृश करता है । ग्लानि उत्पन्न करता है । प्यास उत्पन्न करता है । जकड़ाहट उत्पन्न करता है । कषायरस खर, विशद और रूक्ष होता है, इसलिए पक्षाघात, हनुग्रह, अपतानक, अदित आदिवान विकारों को उत्पन्न करता है । ४३ ॥ इत्येवमेते पडुसाः पृथक्त्वेनैकत्वेन वा मात्रशः सम्यगुपयुज्यमाना उपकाराय भवन्त्य-१. ' संधारण ' ग. | २. ' पीडनो व्रणपीडन: ' चक्रः, ' आकृष्य संकोचकरः ' गङ्गाधरः । ३. ' शरीर कुंदस्योपयोक्तेति आचूपकः ' चक्रः । ४. ' विष्टभ्य जरयति ' ग. । ५. ' उपकारकाः ' ग; ' उपकाराय ' यो ।

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५०८ चरकसंहिता ध्यात्मलोकस्य, अपकारकराः पुनरतोऽन्यथा भवन्त्युपयुज्यमानाः, तान् विद्वानुपकारार्थ-मेवमात्रशः सम्यगुपयोजयेदिति ॥ ४४ ॥

रस के गुण - कर्मों का उपसंहार - इस प्रकार ये बनाये गए छ रसों को अलग - अलग या एक में मिलाकर मात्रापूर्वक ठीक नियमानुसार प्रयोग करने पर अध्यात्मलोक ( सर्वप्राणिजन चक्र ० ) का उपकार करने वाला होता है । इससे विपरीत अर्थात् अमात्रा से सेवन किए गए, पृथक् - पृथक् या स्कत्रित रूप में ये रस प्राणिमात्र के लिए अपकारक होते हैं । इन रसों को विद्वान् वैद्य लाभ के लिए मात्रा के अनुसार उचित रूप में प्रयोग करें ॥ ४४ ॥

भवन्ति चात्र-* शीतं वीर्येण यद्द्द्द्रव्यं मधुरं रसपाकयोः । तयोरम्लं यदुष्णं च यद्द्रव्यं कटुकं तयोः ॥४५ ॥

द्रव्य के रस - विपाक तथा वीर्य का परस्पर सम्बन्ध - जो द्रव्य, रस एवं विपाक में मधुर होते हैं उनका वीर्य शीत होना है । जो द्रव्य रस एवं विपाक में अम्ल होते हैं, उनका वीर्य उष्ण होता है । और जो द्रव्य रस एवं विपाक में कटु होते हैं, उनका वीर्य उष्ण होता है ॥ ४५ ॥

* तेपां रसोपदेशेन निर्देश्यो गुणसंग्रहः । वीर्यतोऽविपरीतानां पाकतश्चोपदेच्यते ॥ ४६ ॥

और भी - वीर्य और विपाक से अविपरीत मधुरादि विपाक वाले द्रव्यों के गुणों का संग्रह, उनके रस के ही उपदेश से जान लेना चाहिए । और जो द्रव्य वीर्य और विपाक में विरुद्ध होते हैं उनके गुणों का उपदेश किया जाएगा ॥ ४६ ॥

विमर्श - जो द्रव्य वीर्य में शीत होता है उसका रस और विपाक प्रायः मधुर होता है, इस लिए ऐसे द्रव्यों का मधुर रस से उपदेश किया जाता है । अर्थात् मधुर रस में जो - जो गुग पाए जाते हैं वे सभी गुण शीतवीर्य वाले द्रव्य में पाए जाते हैं । इसी प्रकार आगे भी समझना चाहिए । यहाँ पर ' वीर्यतोऽविपरीतानाम् ' का तात्पर्य यह है कि उपदिष्ट नियम के अनुसार जिस द्रव्य का वीर्य विरुद्ध नहीं है उन्हीं द्रव्यों का रस के द्वारा वीर्य का ज्ञान होता है । पर जिन द्रव्यों में रस से विरुद्ध वीर्य पाया जाता है उनका रसोपदेश से ज्ञान नहीं होता है अतः विपाकतः भी द्रव्यों का गुण निर्देश किया जाता है । इसी प्रकार विपाक से अविरुद्ध रस है । जिन द्रव्य में, उनका ज्ञान रसोपदेश से होता है, पर विपाक विरुद्ध रस वाले द्रव्यों का रसोपदेश से ज्ञान नहीं होता है अतः वीर्यतः भी उपदेश किया जाता है । जैसे पिप्पली कटुस है, पर विपाक में मथुर होती है अतः कटु होने से उष्ण न होकर, मधुर विपाक होने से अनुष्ण होती है । जैसे- ' पिप्पली दीपनी वृष्या स्वादुपाका रसायनी । अनुष्णा कटुका स्निग्धा वातश्लेष्महरी लघुः । ( भा. प्र. ) । * था पयो यथा सर्पिर्यथा वा चव्य चित्रकौ । एवमादीनि चान्यानि निर्दिशेद्रसतो भिषक् ॥ अविरुद्ध वीर्य और विपाक वाले द्रयों के उदाहरण - जैसे दूध और वृत रस में मधुर, विपाक में मधुर और वीर्य में शीत होते हैं तथा चत्र्य चित्रक रस में कटु, विपाक में कटु और वीर्य में उष्ण होते हैं । इन द्रव्यों का और अन्य द्रव्य जो इसी प्रकार वीर्य और विपाक में विरुद्ध नहीं है उनका रसों के उपदेश से ही गुण का संग्रह कर लिया जाना है ॥ ४७ ॥

विमर्श - भी रसोप-- मद्य रस में अम्ल, विपाक में अम्ल और वीर्य में उष्ण होता है इसका देश से ही ज्ञान किया जाता है । इस प्रकार क्रमशः मधुर, कटु और अम्ल रस वाले द्रव्यों का अविरुद्ध वीर्य विपाक के अनुसार उदाहरण बताया गया है । १. ' अध्यात्मलोकस्येति सर्वप्राणिजनस्य ' चक्रः । २. ' यच्चोष्णम् ' इति पा. । ३. ' वीर्यतो विपरीतानां ' ग. ।

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आत्रेयभद्रकाप्यीयाध्यायः २६ ] सूत्रस्थानम् ५०६ * मधुरं किंचिदुष्णं स्यात् कषायं तितमेव च । यथा महत्पञ्चमूलं यथाऽब्जानूपमामिषम् ॥४८ ॥

लवणं सैन्धवं नोष्णमम्लमामलकं तथा । अर्कागुरुगुडूचीनां तिक्तानामुष्णंमुच्यते ॥ ४ ९ ॥ विरुद्ध वीर्य वाले द्रव्यों का निर्देश - कुछ मधुर रस वाले द्रव्य वीर्य में उष्ण होते हैं । वस्तुतः उन्हें शीत वीर्य होना चाहिए पर शीत होते नहीं हैं, उदाहरण के लिए जैसे जलीय जीव और आनूप जीव के मांस ये दोनों रस में मधुर है पर इनका वीर्य उष्ण होता है इसीलिए ये रस में मधुर होते हुए भी पित्त को शान्त नहीं करते हैं, अपितु पित्त को बढ़ाते हैं । इसी प्रकार कुछ कषाय और तिक्त रस वाले द्रव्य वीर्य में उष्ण होते हैं, जैसे - महत्पञ्चमूल | सैंधानमक का वीर्य सामान्य लवणों की तरह उष्ण नहीं होता है । आँवला अम्ल होते हुए भी उष्ण नहीं होता हैं, अर्क ( मदार ) अगर, गुडूची आदि द्रव्य निक्त रस युक्त होते हुए भी इनका वीर्य उष्ण होता है || किंचिदम्लं हि संग्राहि किंचिदम्लं भिनत्ति च । यथा कपित्थं संग्राहि भेदि चामलकं तथा ॥

पिप्पली नागरं वृण्यं कटु चावृज्यमुच्यते । कपायः स्तम्भनः शीतः सोऽभयायामतोन्यथा ॥

तस्माद्वसोपदेशेन न सर्वं द्रव्यमादिशेत् । दृष्टं तुल्यरसेऽप्येवं द्रव्ये द्रव्ये गुणान्तरम् ॥५२ ॥

और भी - • कुछ अम्ल रस वाले द्रव्य संग्राही होते है, और कुछ अम्ल रस वाले द्रव्य मल का भेदन करते हैं, जसे- कैंथ संग्राही हैं और आँवला भेदक होता है । कटु रस वाले द्रव्य अवृष्य कहे जाते हैं, पर पिप्पली और सोंठ वृष्य होते हैं । कषाय रस वाले द्रव्य स्तम्भक और शीतल होने हैं पर हर्रे में इससे विपरीत गुग है । इसलिये रस के उपदेश से सभी द्रव्यों के गुणों को नहीं समझना चाहिए । इसी प्रकार समान रस वाले भिन्न - भिन्न द्रव्यों में गुणों की भिन्नता देखी जाती है ॥ ५०-५२ ॥ रौदयात् कषायो रूक्षाणामुत्तमो मध्यमः कटुः । तिक्तोऽवरस्तथेोष्णानामुग्णत्वाल्लवणः परः ॥ मध्योऽम्लः कटुकश्वान्त्यः, स्निग्धानां मधुरः पुरः । मध्योऽम्लो लवणश्चान्त्यो रसः स्नेहान्निरुच्यते ॥ मध्योत्कृष्टावराः शैत्यात् कषायस्वादुतिक्तकाः । स्वादुर्गुरुत्वादधिकः कपायाल्लवणोऽवरः ॥ अम्लात् कटुस्ततस्तिक्तो लघुत्वादुत्तमोत्तमः । केचिल्लघूनामवरमिच्छन्ति लवणं रसम् ॥५६ ॥

गौरवे लाधवे चैत्र सोऽवरँस्तूभयोरपि । मधुरादिरसों में गुणविषयक न्यून, मध्य, अधिकता का निर्देश - रूक्षता में कषाय रस सभी रसों में प्रधान होता है, कटुरस मध्यम होता है और तिक्त रस न्यून रूक्ष होता है । उष्णता में लवण रस उत्तम उष्ण होता है, अम्लरस मध्यम होता है और कटुरस न्यून होता है । स्निग्धता में मधुर रस उत्तम होता है, अम्लरस मध्यम होता है और लवणरस न्यून होता है । शीतवीर्य में मधुररस उत्तम, कषायरस मध्यम और तिक्तरस न्यून होता है । गुरुता में उत्तम मधुररस, कपायरस मध्यम और लवणरस न्यून होता है । कटुता में तिक्तरस उत्तम होता है, कटुरस मध्यम होता है और अम्लरस न्यून होता है । कुछ आचार्य लवणरस को न्यून लघु मानते है । इस प्रकार मतान्तर में लवणरस लघुना में हीन होता है परन्तु अग्निवेश के मत में लघुता तथा गुरुता दोनों में लवण रस अवर ( हीन ) होता है ॥ ५३-५६ ॥ १. ' यथा वाऽनूप मामिषम् ' ग. । २. ' मौष्ण्यमुच्यते ' ग. । ' मौष्ण्यमिष्यते ' यो । ३. ' तिक्तात्कषायो मधुरः शीताच्छीततरः परः ' ग. । ४. ' उभयोरपीति मतद्वयेऽपि स लवणोऽवरः; अग्निवेशमते गौरवेऽवरः, मतान्तरे लाघवेऽवरः ' शिवदाससेनः ।

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५१० १. शीत तिक्त २. उष्ण कटु ३. गुरु लवण ४. लघु अम्ल ५. रूक्ष तित ६. स्निग्ध लवण चरकसंहिता शीननर शीततम कषाय मधुर उष्णतम उष्णतर अम्ल लवण गुरुनर गुरुतम कषाय मधुर् लघुतर लघुनम तिक्त कटु रूक्षनर रुक्षतम कटु कषाय स्निग्धतर स्निग्धतन अम्ल मधुर परं चातो विपाकानां लक्षणं संप्रवच्यते ॥ ५७ ॥

( Topic of Vipaka ) विपाक लक्षण - अब रस के बाद विपाक का लक्षण कहा जाता है । कटुतिक्तकषायरस वाले द्रव्यों का विपाक प्रायः कटु होता है । अम्लरस वाले द्रव्यों का प्रायः अम्ल होता है । मधुररस वाले द्रव्यों का और लवणरस वाले द्रव्यों का विपाक प्रायः मधुर होता है ॥ ५७-५८ ॥ विमर्श - विपाक के सम्बन्ध में दो मत पाये जाते हैं, एक चरक का दूसरा सुश्रुत का । वाग्भट ने विपाक की परिभाषा इस प्रकार बतायी है यथा- ' जाठरेणाग्निना योग्गाद्यदुदेति रसान्तरम् । आहारपरिणामान्ते स विपाक इति स्मृतः ॥ ' ( वा. सू. अ. ९ ) अर्थात् खाये हुए मधुरादिरस वाले द्रव्यों का महास्रोत में जठराग्नि द्वारा परिपाक होकर अन्त में जिस रस विशेष की उत्पत्ति होती है उसको विपाक कहते हैं । यह लक्षण चरकमतानुसार वाग्भट ने लिखा है | आयुर्वेद में भुक्त द्रव्यों का दो प्रकार से विपाक माना है । पहला अवस्थापार्क, दूमरा निष्ठापाक ( या विपाक ) होता है । पाक का शाब्दिक अर्थ पकना है, पककर द्रव्यों का स्वरूपान्तर ५. ' कटुकादिशब्देन तदाधारं द्रव्यमुच्यते, यतो न रसाः पच्यन्ते किंतु द्रव्यमेव; लवणस्तथेति लवणोऽपि मधुरविपाक इत्यर्थः । विपाकलक्षणं तु जठराग्नियोगादाहारस्य निष्ठाकाले यो गुण उत्पद्यते स विपाकः, वचनं हि - ' जाठरेणाभिना योगाद्यदुदेति रसान्तरम् । रसानां परिणामान्ते स विपाक इति स्मृतः ' चक्रः । चरके मधुरोऽम्लो लवणश्चेति विपाकत्रयमुक्तं, सुश्रुते तु मधुरः कटुकश्चेति विपाकद्वयमुक्तं, एतद्विरोधपरिहारार्थं गङ्गाधरेणैवं समाधानमुक्तं - ' रसपाकाभिप्रायेण त्रिधा विपाक उक्तश्चरकेण, सुश्रुते - भूतगुणपाकाभिप्रायेण द्विवा विपाक उक्तो गुरुर्लघुश्चेनि क्रमेण मधुरसंज्ञः कटु-संज्ञश्च ' इति । विस्तरस्तु जल्पकल्पतरौ द्रष्टव्यः । विमर्श - उपर्युक्त गुणों के तारतम्य विषयक सारणी नीचे प्रस्तुत की जा रही है-सुश्रुत ने अम्लरस को मध्य गुरु और कपायरस को उत्तनलबु माना है । कटुतिक्तकपायाणां विपाकः प्रायशः कटुः । अग्लोऽम्लं पच्यते, स्वादुर्मधुरं लवणस्तथा ॥ ( ५ ) विपाक प्रकरण

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आत्रेयभद्रकाप्पीयाध्यायः २६ ] सूत्रस्थानम् ५११ या रसान्तर में परिवर्तित होना इसका परिणाम है खाए हुए आहार द्रव्य का महास्त्रोनों के भिन्न - भिन्न स्थानों में जो भावस्थिकपाक होता है उसको अवस्थापाक कहा जाता है । अन्न - मार्ग के भिन्न स्थानों में आहार में भिन्न - भिन्न परिवर्तन होते हैं इन आवस्थिक परिवर्तनों आहार से किट्ट के रूप में कफ, पित्त, वात, मूत्र, पूरीष आदि का पृथक्करण होता है । इन परिवर्तनों के अन्त में सार ( प्रसाद रूप ) रसधातु की उत्पत्ति होती है । इसके पश्चात् शरीर के पोषकतत्त्व वात, पित्त, कफ, रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा, शुक्र आदि की उत्पत्ति होती हैं, जिससे शारीरिक अवयवों की पुष्टि होती है । आहार पाक के अन्तिम परिणाम ( निष्ठारूप ) रस धातु में खाये हुए आहार के रसों का मथुर, अम्ल और कटु रूप में जो अन्तिम परिवर्तन होता है उसको आयुर्वेदीय परिभाषा में विपाक या निछापाक कहा जाता है । इसका विस्तृत वर्णन चिकित्सास्थान के पन्द्रहवें अध्याय में किया गया है, यथा- ' अन्नस्य मुक्तमात्रस्य परसस्य विपावतः इसे वहीं देखना चाहिये । विपाक के सम्बन्ध में अनेक मत शास्त्रों में पाये जाते हैं, जैसे- ' पराशरः पाकास्त्रो रसानामम्लोऽम्लं पच्यते । कटुः कटुकं चत्वारोऽन्ये मधुरं च ॥ ' अर्थात् अम्ल का अम्ल, कटु का कटु और मधुर - ल - तित - कषाय रस का मधुर विपाक होता है । इस मग में निक और कषाय का मधुर विपाक होता है । क्योंकि तिक्तकषाय का यदि कटुविपाक माना जाए, तो उसे पितको ज्ञान नहीं करना चाहिये । इसका खण्डन दूसरे आचार्य करते हैं । तिलकषाय का कटुविपाक होने पर भी शोनदी होने के कारण वह पित्त को शान्त करता है । जैसे -- नमक मधुर-विपाकी होने पर भी उष्णवीर्य होने के कारण पित्तजनक होता है । कुछ आचार्य - ' प्रनिग्म विपाकः ' मानकर परसों का पूछ विपाक मानते हैं इनका कहना यह है कि जैसे कड़ाही में दूध वकर पकाया जाय और उसका कितना भी पाक करें पर वह मधुर का मधुर ही रहता है या शालि जौ, मुद्र आदि को खेत में बोया जाय तो उससे अपने आप ही अंकुर उत्पन्न होते हैं न कि विपरीत अंकुर इसी प्रकार खाये हुए बसों का पाक होने पर भी इसके स्वभाव में परिवर्तन नहीं होता है । 2 इसका खण्डन दूसरे आचार्य इस प्रकार करते है प्रत्यक्षतः और शास्त्रः मधुर आदि का अम्ल विपाक अम्ल आमले का मधुर विपाक, मधुर तेल का कटुविपाक लवण रस वाले सॉवर लवण का कटुविपाक, तिक्त पटोल ( परवल ) का मधुर विपाक देखा जाता है । इस प्रकार प्रत्यक्ष एवं शास्त्र विरोध से प्रतिरस विपाक मानना उचिन नहीं है । मुश्रुत ने मधुर और कटु वे दो ही विपाक माने हैं । वह प्रसंग सु. सू. अ. ४० में द्रष्टव्य है । इस प्रकार सुश्रुत के मत में अम्ल विपाक नहीं होता, आग्नेय पित्त जब विदग्ध हो जाता है तो वहीं अम्ल होता है । सुश्रुत ने पृथिवीजल के गुण की प्रधानता से उत्पन्न होने वाले विपाक को मधुर और अग्नि, वायु, आकाश के गुण की प्रधानता से कटु विपाक माना है । जो क्रमशः महाभूतों के गुरु, लघु होने के कारण गुरु - लघु होते हैं । सुश्रुत दो ही विपाक के पक्ष में हैं । चरक ने अम्ल विपाक को भी माना है । इस प्रकार चरक और सुश्रुत में मतभेद पाया जाता है । वस्तुतः विचार से दोनों का मत विरोधात्मक नहीं है । अम्ल रस, मधुर विपाक होते हुए ' उष्णवीर्य होने के कारण पित्त का जनक होता है । चरक के मत में अम्लपाक स्वीकार करें या न करें, पित्त स्वभाव से ही अम्ल और कटु होता है । सुश्रुत ने पित्त को केवल कटु रस माना है । पित्त में जो अम्लता पाई जाती है वह उसकी विदग्धावस्था का परिणाम है । उन्होंने प्राकृतिक पिस को अम्ल न स्वीकार करते हुए अलवा को अम्ल मानते हैं इसलिए और वान पिस को नहीं स्वीकार किया है परन्तु नरक पि कफ तीन दोष • होते हैं उनके अनुसार तीन विपाक