चरक संहिता हिन्दी भाष्य — पृष्ठ 601–610
चरक संहिता हिन्दी भाष्य · Chaukhamba · पृष्ठ 601–610
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५१२ चरकसंहिता मानना भी उचित प्रतीत होता है । इनका प्रयोजन क्रमशः इस प्रकार बताया है यथा- ' शुक्रहा बद्धविण्मूत्रो विपाको वातलः कटुः । मधुरः सृष्टविण्मूत्री विपाकः कफशुक्रलः ॥ पित्तकृत् सृष्टवि-मूत्रः पाकोऽम्लः शुक्रनाशनः । ' ( श्लोक - ६१-६२ ) । इस प्रकार विपाक का अलग - अलग प्रयोजन देखकर तीन विपाक माना जाता है । दोनों आचार्यों में मतभेद का कारण केवल पित्त के प्राकृतिक गुण को स्वीकार करना या न स्वीकार करना इन दोनों बातों पर ही है । & मधुरो लवणाम्लौ च स्निग्धभावात्र यो रसाः । वातमूत्रपुरीषाणां प्रायो मोक्षे सुखा मताः ॥ कटुतिक्तकषायास्तु रूक्षभावात्र यो रसाः । दुःखाय मोक्षे दृश्यन्ते वातविण्मूत्ररेतसाम् ॥६० ॥
स्निग्ध तथा रूक्ष रस - स्निग्ध होने के कारण मधुर, लक्षण और अम्ल ये तीनों रस, वात, मूत्र और पुरीष को निकालने में प्रायः सुखकर होते हैं । रूक्ष होने के कारण कटु, तिक्त और कषाय ये तीनों रस वान मूत्र मल और शुक्र को निकालने में दुःखकर होते हैं ॥ ५ ९ -६० ॥ शुक्रहा वद्धविण्मूत्र विपाको वातलः कटुः । मधुरः सृष्टविण्मूत्रो विपाकः कफशुक्रलः ॥ ६१ ॥
पित्तकृत् सृष्टविण्मूत्रः पाकोऽम्लः शुक्रनाशनः । तेषां गुरुः स्यान्मधुरः कटुकाम्लावतोऽन्यथा ॥ विपाक का अलग - अलग कार्य - १. कटु विपाक वाले द्रव्य शुक्र को नष्ट करते हैं, मल मूत्र को बाँधते ( रोकते ) हैं, और वात को बढ़ाने वाले होते हैं । २. मधुर विपाक वाले द्रव्य मल और मूत्र को निकालते हैं । कफ और शुक्र को बढ़ाने वाले होते हैं । ३. अम्ल विपाक वाले द्रव्य पित्त को बढ़ाते हैं, मल, मूत्र को निकालते हैं, और शुक्र को नष्ट करते हैं । इनमें मधुर विपाक - गुरु और कटु, एवं अम्ल विपाक लघु होता है ॥ ६१-६२ ॥ विमर्श - मधुर विपाक गुरु, कटु और अम्ल विपाक लघु होता है । यह बात सुश्रुत ने भी अनुमान से निश्चित किया है, यथा-- ' गुरुपाकः सृष्टविण्मूत्रतया कफोत्क्लेशेन । लघुर्वद्धविण्मूत्रतया मारुतकोपेन च ॥ ' ( सु. सू. अ. ४० ) । इस प्रकार सुश्रुत का द्विविध विपाक गुरु और लघु चरक मत से भी सिद्ध हो जाता है । * विपाकलक्षणस्याल्पमध्यभूयिष्ठतां प्रति । द्रव्याणां गुणवैशेष्यात्तत्र तत्रोपलक्षयेत् ॥६३ ॥
और भी - द्रव्यों में गुणों की विशेषता से अर्थात् गुणों के तारतम्य से उन उन द्रव्य गुणों के अनुसार होने वाले विपाक के लक्षणों में अल्पता, मध्यता और अधिकता का ज्ञान कर लेना चाहिए । विमर्श - - द्रव्यों में गुणों की विशेषता का तात्पर्य यह है कि रस के ही अनुसार विपाक प्रायः होता है । जितनी मात्रा में गुण, द्रव्य में पाया जाता है, उतनी ही मात्रा में, विपाक में भी पाया जाता है । यथा जो द्रव्य क्रमशः मथुर, मधुतर, मधुरतम होगा उससे बनने वाला विपाक भी मधुर, मधुरतर, मधुरतम अर्थात् क्रमशः अल्प, मध्य और अधिक रूप में उसमें मधुर गुण होगा और उसके रहने से ' मधुर: सृष्टविण्मूत्र: ' - आदि जो विपाक का लक्षण या प्रभाव बताया गया हैं उन लक्षणों में अल्पता, मध्यता और उत्तमता को समझ लेना चाहिए । इसी प्रकार आगे भी समझना चाहिए । * मृदुतीचगगुरुलघुस्निग्धरूक्षोष्णशीतलैम् । वीर्यमेंष्टविधं केचित् केचिद्विविधमास्थिताः ॥ १. ' भूयस्त्वमेव च ' यो । ' विपाकलक्षणस्याल्पमध्यभूयिष्ठतामुपलक्षयेत्, प्रति प्रति द्रव्याणां गुणवैशेष्याद्धेतोरित्यर्थः । एतेन द्रव्येषु यथा वैशेष्यं मधुरत्वमधुरतरत्वमधुरतमत्वादि, ततो हेतोर्विपा-कानामयत्वादयो विशेषा भवन्तीत्युक्तं भवति ' चक्रः । २. तीक्ष्णं रूक्षं मृदु स्निग्धं लघूष्णं गुरु शीतलम् ' इति पा. । ३. ' एतचैकीयमतद्वयं पारिभाषिकीं वीर्यसंज्ञां पुरस्कृत्य प्रवृत्तं; वैद्यके हि रसविपाकप्रभावव्यति -रिक्ते प्रभूतकार्यकारिणि गुणे वीर्यमिति संज्ञा ' चक्रः ।
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आत्रेयभद्रकाप्यीयाध्यायः २६ ] सूत्रस्थानम् ५१३ शीतोष्णमिति वीर्य तु क्रियते येन या क्रिया । नावीर्यं कुरुते किंचित् सर्वा वीर्यकृता क्रिया ॥ वीर्य के भेद - १. मृदु, २. ये वीर्य के आठ प्रकार होते हैं । ( ६ ) वीर्य प्रकरण ( Topic of Vipal a ) तीक्ष्ण, ३. गुरु, ४. लघु, ५. स्निग्ध, ६. रुक्ष, ७. उष्ण, ८. शीत ऐसा कुछ आचार्यों का मत है । और कुछ आचार्य १. शीत और २. उष्ण ये दो प्रकार के वीर्य मानते हैं । वीर्य का लक्षण - जो क्रिया ( कर्म ) जिसके द्वारा निष्पन्न होती है, उसे वीर्यं कहा जाता हैं, कोई भी द्रव्य विना वीर्य के कुछ भी कर्म नहीं करना है, सारी क्रियायें वीर्य से हो निष्पन्न होती है ॥ ६४-६५ ॥ विमर्श - यहाँ आठ प्रकार और दो प्रकार का वीर्य माना गया है । यह दोनों मत दो आचार्यों का है, । चरक ने वीर्य के विषय में अपना मत निर्दिष्ट नहीं किया है, किन्तु ' अप्रतिषिद्ध मनुमतं भवति ' इस नियम से दोनों मतों को चरक ने स्वीकार किया है । अतः दोनों मत चरक का भी है । सुश्रुत ने शीत और उष्ण ये दो ही वीर्य माना है, यथा- ' तच्च वीर्ये द्विविधमुष्णं शीत-ञ्चाग्नीषोमीयत्वाज्जगतः । ' ( सू. अ. ४० ) । इस मत के समर्थन में वाग्भट ने भी संसार को पञ्चमहा-भूतात्मक स्वीकार करते हुए उनमें अग्नि और सोम ( जल ) को ही प्रधान माना है यथा-' नानात्मकमपि द्रव्यमनीषोमौ महाबलौ । व्यक्ताव्यक्तं जगदिव नातिक्रामति जातुचित् ॥ ' ( अ. हृ. सू.अ. ९ ) अष्टविध वीर्य को भी चरक, सुश्रुत, वाग्भट तीनों ने स्वीकार किया है । यथा सुश्रुत में बताया है - ' एतानि खलु वीर्यागि स्वबलगुणोत्कर्षाद्रसमभिभूयात्मकर्म कुर्वन्ति । ” ( सू. अ. ४० ) । जैसे महत्पञ्चमूल कषाय और तिक्तानुरस होते हुए उष्ण वीर्य होने के कारण, और कुलथी कषाय रस, प्याज कटु रस, स्निग्ध होने के कारण, वायु का शमन करते हैं । सुश्रुत में इसका संक्षेप में प्रतिपादन है, यथा- ' ये रसा वातशमना भवन्ति यदि ते वै । रौक्ष्यलाघव शैत्यानि न ते हन्युः समीरणम् ॥ ये रसाः पित्तशमना भवन्ति यदि तेषु वै । तैक्ष्ण्यौष्ण्यलघुताश्चैव न ते तत्कर्मकारिणः ॥ ये रसाः श्लेष्मशमना भवन्ति यदि तेषु वै । स्नेहगौरवशैत्यानि न ते तत्कर्मकारिणः ॥ ' ( सु. सू. अ. अ. ४० ) यद्यपि a ने भी मन को स्वीकार किया है और अपना मत नहीं बताया है पर उनके वर्गन शैली से स्पष्ट होता है कि वह भी दो वीर्य के ही विशेष समर्थक है, क्योंकि शोत और उष्ण इन दोनों वीर्य के ही गुणों का वर्णन किया है तथा - ' व्यक्ताव्यक्तं जगदिव नाति-क्रामति जातुचित् | ' से स्पष्ट दो ही वीर्य को माना है । ' गुर्बादि आठ प्रकार के वीर्यों को अन्वर्थं ( कार्यानुसार ) माना है । यथा - ' गुर्वादिष्वेव वीर्याख्या तेनान्वर्थेति वर्ण्यते ॥ समग्रगुणसारेषु शक्त्युत्कर्षविवर्तिषु । व्यवहाराय मुख्यत्वाद्वह्वग्रग्रहणादपि । अतश्च विपरीतत्वात्सम्भवत्यपि नैव
सा । विवक्ष्यते रसाद्येषु, वीर्य गुर्वादयो ह्यतः ॥ ' ( वा. सू. अ. ९ ) ।
रसोनिपतेद्रव्याणां विपाकः कर्मनिष्टया । वीर्यं यावदधीवासान्निपाताच्चोपलभ्यते ॥
रस, विपाक, तथा वीर्य के जानने के साधन - द्रव्यों का जब जिह्वा पर निपात ( स्पर्श ) १. ‘ पारिभाषिकवीर्य संज्ञापरित्यागेन शक्तिपर्यायस्य वीर्यस्य लक्षणमाह-- वीर्ये त्वित्यादि ' चक्रः । २. ' सर्वा वीर्यकृता हि सा ' ग. । ३. ‘ निपाते इति रसनायोगे, कर्मनिष्ठयेति कर्मणो निष्ठा निष्पत्तिः कर्मनिष्ठा क्रियापरिसमाप्तिः, ' अधीवासः सहावस्थानं, यावदधीवासात् यावच्छरीरनिवासात् ' चक्रः । ३३ च ० सं ०
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५१४ चरकसंहिता होता है, तब मधुरादिरसों का ज्ञान होता हैं । कर्म की समाप्ति से विपाक का ज्ञान होता है, जिह्वा पर जब द्रव्यों का निपात ( स्पर्श ) होता है तभी से लेकर जब तक द्रव्यों का शरीर में अधिवास ( स्थिति ) रहता है, तब तक वीर्य का ज्ञान होता है ॥ ६६ ॥
विमर्श - -इस प्रकार रस का ज्ञान जिह्वेन्द्रिय द्वारा प्रत्यक्ष प्रमाण से ज्ञात होता है । विपाक का ज्ञान सदा परोक्ष रहता है, अतः अनुमान द्वारा ज्ञात होता है । वीर्य का ज्ञान भी अनुमान द्वारा होता है यह वीर्य सहज और कृत्रिम भेद से दो प्रकार से पाया जाता है, जैसे सहजवीर्य - उड़द में गुरुता, मुद्ग में लघुता, कृत्रिम वीर्य - धान के लावा में लघुता आदि । अधिवास का तात्पर्य सहावस्थान है, निपात का तात्पर्य संयोग से है, वीर्य का ज्ञान अधिवास से होता है जैसे भैंस के मांस की उष्णता, निपात से भी वीर्य का ज्ञान होता है, जैसे भिलावें की उष्णता और अधिवास एवं निपात से भी भिलावे की उष्णता का ज्ञान होता है, वीर्य का ज्ञान तीनों प्रकार से होता है । रसवीर्यविपाकानां सामान्यं यत्र लक्ष्यते । विशेषः कर्मणां चैव प्रभावस्तस्य स स्मृतः ॥६७ ॥
( ७ ) प्रभाव प्रकरण ( Topic of Prabhava ) प्रभाव का लक्षण - जिन द्रव्यों में रस, वीर्य, विपाक के समान रहने पर कर्म में जो विशेषता पाई जाती है वह विशेष कर्म प्रभाव कहा जाता है ॥ ६७ ॥
विमर्श -- तात्पर्य यह है कि जिन - जिन द्रव्यो में रस, वीर्य और विपाक एक समान हों और कर्म में विभिन्नता हो तो वह प्रभाव से प्रभावित कर्म कहा जाता है । प्रभाव विचार शक्ति के परे होता है । * कटुकः कटुकः पाके वीर्योष्णश्चित्रको मतः । तद्वद्दन्ती प्रभावात्तु विरेचयति मानवम् ॥ विषं विषघ्नमुक्तं यत् प्रभावस्तत्र कारणम् । ऊर्ध्वानुलोमिकं यच्च तत् प्रभावप्रभावितम् ॥ मणीनां धारणीयानां कर्म यद्विविधात्मकम् । तत् प्रभावकृतं तेषां प्रभावोऽचिन्त्य उच्यते ॥ * सम्यग्विपाकवीर्याणि प्रभावश्वाप्युदाहृतः । और भी: - कटुरस वाला चित्रक, विपाक में कटु और वीर्य में उष्ण होता है । इसी प्रकार दन्ती भी है, पर प्रभाव से यह मनुष्यों को विरेचन कराती है । विष जो विषघ्न होता है, यह कहा गया है, उसमें प्रभाव कारण है । जो द्रव्य उपरि भाग के दोषों को नष्ट करता है, तथा अधो भांग में वर्तमान दोषों को नष्ट करता है, वह भी प्रभाव से ही प्रभावित होता है । धारण करने योग्य मणियों का जो अनेक प्रकार का कर्म है, वह प्रभाव से ही होता है । प्रभाव अचिन्त्य कहा जाता है । इस प्रकार विपाक, वीर्य, प्रभाव का उदाहरण बता दिया गया है ॥ ६८-७० ॥ विमर्श -- चित्रक और दन्ती दोनों रस में कटु, विपाक में कटु, वीर्य में उष्ण होते है । पर अपने विशेष प्रभाव के कारण दन्दी विरेचन करने वाली होती है ( चित्रक विरेचन कारक नहीं होता है ) । जो वस्तु वीर्य में उष्ण होती है, वह मल को बाँधने वाली होती है यथा- ' आग्नेय-गुणभूयिष्ठं नोयांशं परिशोषयेत् । ' इस विचार धारा से चित्रक मल का संग्रह करना है यह उचित ही है । पर उष्ण होते हुए भी दन्ती विरेचन करती है यह उसका प्रभाव है । विष विषघ्न होता है यह जो बनाया गया है वह भी प्रभाव से प्रभावित होता है । जंगम विष का नाशक स्थावर विष होता है और स्थावर विष का नाशक जंगम विष होता है । १. ' सा नरम् ' यो ।
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आत्रेयभद्रकाप्यीयाध्यायः २६ ] सूत्रस्थानम् ५१५ इसमें कारण यह होता है कि जंगम विष की गति ऊपर की ओर होती है और स्थावर विष को गति अधोभाग में होती है. विपरीत गति होने के कारण स्थावर विष, जंगम विष का और जंगम विष स्थावर विष का नाश करता है । इसमें गति विपरीत होना प्रभाव से प्रभावित होता है तथा मदनफल की गति ऊ होती है, त्रिवृत की गति नीचे की ओर होती है, यह गति प्रभाव से प्रभावित होती है । धारण करने योग्य अनेक प्रकार के मगियों का कर्म प्रभाव से प्रभावित होता है । यह पीटा शान्ति के लिए मणियों का धारण किया जाता । जैसे-चन्द्रमा की दशा दुष्ट होने पर मोती का धारण किया जाना है या चन्द्रकान्तमणि के संयोग से अग्नि की दाहकता शक्ति का न होना । ये सभी प्रभाव से प्रभावित माने जाते हैं । इन द्रयों का प्रभाव अचिनय होना है अर्थात् अनिवार्य होता है । इस प्रकार प्रभाव के द्वारा द्रव्य कार्यकर होते हैं । ' वीर्ये तु क्रियते येन या क्रिया ' अर्थात् द्रव्य जिस विशेष शक्ति के द्वारा कर्म करता है उसे वीर्य कहा जाता है, तब तो प्रभाव भी इस लक्षण के आधार पर वीर्य ही है । परन्तु आचार्यों ने वीर्य का दो भेद माना है १. चिन्त्यवीर्य, २. अचिन्त्यवीर्य । जिसके गुण धर्म का विवेचन बुद्धिगम्य है उसे ' चिन्य ' वीर्य या केवल वीर्य कहा जाता है । जिसके गुणधर्म का विवेचन बुद्धिगम्य न हो उसे ' अभिनय ' वीर्य या केवल प्रभाव कहा जाता है इस बात का संकेत
' प्रभावोऽचिनय उच्यते ' से आचार्य ने किया है ।
किंचिद्रसेन कुरुते कर्म वीर्येण चापरम् ॥ ७१ ॥
द्रव्यं गुणेन पाकेन प्रभावेण च किंचन । द्रव्यगत पदार्थों की कार्यप्रणाली [ Mode of Actions of Drugs ] - सामान्य वर्णन-कुछ द्रव्य अपना कार्य रस के द्वारा कुछ द्रव्य अपना कार्य वीर्य के द्वारा; कुछ द्रव्य गुण के द्वारा; कुछ द्रव्य विपाक के द्वारा और कुछ द्रव्य प्रभाव के द्वारा अपना कार्य करते हैं अथवा द्रव्य अपना कुछ कर्म रस से, कुछ कर्म वीर्य से कुछ कर्म गुण से, कुछ कर्म विपाक से और कुछ कर्म प्रभाव के द्वारा करते हैं ॥ ७१ ॥
विमर्श - जैसे १. मिश्री मधुर होने के कारण कफ को बढ़ाती और पित्त को शान्त करती है । यहाँ केवल रस के द्वारा कर्म होता है । २. महत्पञ्चमूल कषाय, तिक्त रमयुक्त होता है, इसे नियमतः बात को बृद्ध करना चाहिये पर उष्ण वीर्य होने के कारण वात को शान्त करता है वा कषायतिक्तरस होने से पित्त को नष्ट करना चाहिए, पर उष्ण वीर्य होने से पित्त का शामक नहीं होता । ३. मधु का गुण रूक्ष होता है, मधुर होते हुए कफ की वृद्धि न करते हुए रूक्षता के कारण कफ को नष्ट करता है । ४. सेंट रस में कटु होती है और विपाक में मधुर होती है, यद्यपि कटु रस होने के कारण वान को वृद्ध करना चाहिए पर मधुर विपाक होने से वात को शान्त करती है । ५. दन्ती कटु रस, उष्ण वीर्य होते हुए प्रभाव से विरेचक होती है । सुश्रुत में इसी बात की पुष्टि की गई है । यथा द्रव्यमात्मना किञ्चित् किडि योर्येण सेवितम् । किशिद रसविपाकाभ्यां दोषं हन्ति करोति वा ॥ गुण, विपाक और प्रभाव एक ही साथ रहते हैं ( सु. मू. अ. ४० ) । स्यपि द्रव्यों में रस, वीर्य, पर जब जिस द्रव्य में जिसकी प्रधानता होती है तब वह अपना कार्य करने में समर्थ होता है । यथा - ' यद्यद्रव्ये रसादीनां वलवत्त्वेन वर्तते । अभिभूतस्तत्तर कारणापते ( अष्टाङ्ग सं. सू. अ. १० ) रविपाकस्ती वीयं प्रभावस्तानपोहति ॥ ७२ ॥
वेलसाम्ये रसादीनामिति नैसर्गिकं बलम् । १. ' गुणसाम्ये ' ग. |
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५१६ चरकसंहिता विशेष वर्णन - • द्रव्यों में रहने वाले रस को विपाक नष्ट कर देता है । रस और विपाक को वीर्य नष्ट कर देता है और रस विपाक वीर्य को प्रभाव नष्ट कर देता है! द्रव्यों में रहने वाले रस, विपाक, वीर्य, प्रभाव इन चारों के बल की समानता होने पर यह स्वाभाविक ( कर्म ) होता है || ७२ || विमर्श - द्रव्यों में तुल्य बल वाले रस, विपाक, वीर्य प्रभावों में यह नियम बनाया गया है I यदि रस की अधिकता हो तो रस ही तीनों को पराजित कर कार्य कर लेना है इसी प्रकार इन चारों में जिसकी अधिकता होगी वह अन्य तीनों को दबा कर अपना कार्य कर लेता है । पर यदि समान बल वाले ये चारों रहें तो रस से बलवान् विपाक, विपाक से बलवान् वीर्य और वीर्य से बलवान् प्रभाव होता है, जैसे १ मधु का रस मधुर होता है, नियमतः इसे कफ की वृद्धि करनी चाहिए पर इसका विपाक कटु होता है इसलिए मधु कफ नाशक होता है अर्थात् कटुविपाक से मधुर रस दुर्बल होने के कारण दब जाता है और अपना कार्य नहीं कर पाता है । २. अनूप और जलीप मांस, रस में मधुर और विपाक में भी मधुर होते हैं, इनका वीर्य उष्ण होता है । नियमतः मधुर रस और विपाक को पित्त को शान्त करना चाहिए, पर उष्ण वीर्य होने के कारण ये पित्त को प्रकुपित करते हैं अर्थात् उष्ण वीर्य, मधुर रस - विपाक को दबाकर अथना कार्य कर लेता है । ३. उन्नी कटु रस, कटु विपाक और उष्ण वीर्य होते हुए प्रभाव से विरेचन करने
वाली होती है अर्थात् प्रभाव रस, विपाक, वीर्य को दबाकर अपना कार्य करती है ।
ari रसानां विज्ञानमुपदेक्ष्याम्यतः परम् ॥ ७३ ॥
स्नेहनप्रीणनाह्लादमार्दवैरुपलभ्यते । मुखस्थो मधुरश्वास्यं व्याप्नुवंल्लिम्पतीव च ॥ ७४ ॥
( ८ ) षड्रस विज्ञान ( लक्षण ) ( Definition of Six Rasas ) ( १ ) मधुर रस की परिभाषा - इसके बाद षड् रसों के जानने की विधि का उपदेश कर रहा हू । स्नेहन, प्रीणन, ( तृप्ति करना ) आह्लाद, ( आनन्द उत्पन्न करना ) शरीर में मृदुना उत्पन्न करना, आदि क्रियाओं से मधुर रस का ज्ञान किया जाता है । मधुर रस जब मुख में रहता
है तो शीघ्र ही फैल जाता है । और लेप की तरह प्रतीत होता है ॥ ७३-७४ ॥
दन्तहर्षान्मुखास्रावात्स्वेदनान्मुखबोधनात् । विदाहाञ्चास्य कण्ठस्य प्राश्यैवाम्लं रसं वदेत् ॥ ( २ ) अम्ल रस की परिभाषा - खाने पर दाँतों को खट्टा करता है; मुख से लालास्राव कराता है । स्वेद को लाता है । मुख में बोध करता है अर्थात् पहले के खाये हुए रसों को लालास्राव क्रिया से प्रच्छालन कर अन्य रस के स्वाद का ज्ञान कराना है । मुख और कण्ठ में दाह उत्पन्न करता है । इन क्रियाओं के द्वारा अम्ल रस का ज्ञान किया जाता है || ७५ ॥ प्रलीयन् क्लेदविप्यन्दमार्दवं कुरुते मुखे । यः शीघ्रं लवणो ज्ञेयः स विदाहान्मुखस्य च ॥ ( ३ ) लवण रस की परिभाषा - खाने के बाद शीघ्र ही जो रस मुख में गीलापन उत्पन्न करता है, लालाम्राव कराता है, मुख में मृदुता उत्पन्न करता है और मुख और कण्ठ में दाह उत्पन्न करता है, इन क्रियाओं के द्वारा लवण रसका ज्ञान किया जाता है ॥ ७६ ॥
संवेजयेद्यो रसानां निपाते तुदतीव च । विदहन्मुखनासाक्षिसंस्रावी स कटुः स्मृतः ॥ ७७ ॥
( ४ ) कटु रस की परिभाषा - जो रस जिह्वा का स्पर्श करते ही जिहा में उद्विग्नता उत्पन्न कर दे, शरीर में सुई चुभने सी वेदना उत्पन्न कर दे, मुख नासिका और नेत्र में दाह उत्पन्न करते हुए जल का स्राव कराना है, उसे कटु रस कहा जाता है ॥ ७७ ॥
१. ' प्रीणयन् ' ग. ।
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आत्रेय भद्रकाप्पीयाध्यायः २६ ] सूत्रस्थानम् ५१७ प्रतिहन्ति निपाते यो रसनं स्वदते न च । स तिक्तको मुखवैशद्यशोपप्रह्लादकारकः ॥ ७८ ॥
( ५ ) तिक्त रस की परिभाषा - जो रस जिड़ा से संयुक्त होने ही जिड़ा की शक्ति को नष्ट कर देता है, जो जिड़ा के लिए प्रिय नहीं होता है, जो मुख में विशता, शोष, प्रहार करने वाला होता है. उसे तिक्तरस कहा जाता है । ७८ ॥
वैशद्यस्तम्भजाड्यै रतनं योजयेद्रसः । बध्नातीव च यः कण्ठं कषायः स विकास्यपि ॥
( ६ ) कषाय रस की परिभाषा जो रस जिल्हा से संयुक्त होने पर जिहा में विशदना, स्तम्भ और जड़ना उत्पन्न करता है, जिसके सेवन से गला बँधने की तरह प्रतीत होता है, और जो र विकास गुण वाला होता है उसे कषाय रस कहा जाता है ॥ ७ ९ ॥ ऐवन्तं भगवन्तमात्रेयमग्निवेश उवाच - भगवन्! श्रुतमेतदवितथमर्थसंपद्युक्तं भगवतगुणकर्माधिकारे वचः परं त्वाहारविकाराणां वैरोधिकानां लक्षण-मनतिसंक्षेपेगोपदिश्यमानं शुश्रूषामह इति ॥ ८० ॥
( ६ ) वैरोधिक आहार ( Dietetic Incompatibilities ) अग्निवेश का वैरोधिक आहार विषयक प्रश्न - इस प्रकार उपदेश करते हुए भगवान् आत्रेय के प्रति अग्निवेश ने फिर से कहा कि हे भगवन् द्रव्य गुण कर्म के प्रकरण में उचित रूप में कहे गए अर्थ की सम्पत्ति से युक्त और सत्य आपके वचनों को मैंने सुन लिया है । परन्तु अव वैगैविक आहार - विकारों के आप से उपदिष्ट लक्षणों को विस्तार से सुनना चाहता हूँ ॥ ८० ॥
* तमुवाच भगवानात्रेयः - देहधातुप्रत्यनीकभूतानि द्रव्याणि देहधातुभिर्विरोधमा-पद्यन्ते परस्परगुणविरुद्धानि कानिचित् कानिचित् संयोगात्, संस्कारादपराणि, देशकाल-मात्रादिभिश्चापराणि, तथा स्वभावादपराणि ॥ ८१ ॥
वैरोविक आहार की परिभाषा - अग्निवेश से भगवान् आत्रेय ने कहा कि देह की धातुओं के विपरीत गुण वाले द्रव्य शरीर की धातुओं के विरुद्ध हो जाते हैं । इन द्रव्यों में कुछ द्रव्य परस्पर गुग बिरुद्ध, कुछ द्रव्य संयोगविरुद्ध कुछ द्रव्य संस्कारविरुद्ध, कुछ द्रव्य देश, काल, मात्रा आदि से विरुद्ध और कुछ द्रव्य स्वभाव से विरुद्ध होते हैं ॥ ८१ ॥
विमर्श - १. गुणनिरुद्ध, जैसे- मधुर मछली और मधुर दूध ये दोनों मधुर होने से कफ की वृद्धि करने वाले होते हैं । २. संयोगविद्ध, जैसे- गुड़ से मकोव, गुड़ या मधु से नूली का प्रयोग । ३. संस्कार विरुद्र जैसे- परण्ड की लकड़ी के अनि ले या एरण्ड तेल से बने हुए गौरैया, नो, लवा, तित्तिर का मांस या दशरात्रि तक कांसे के पात्र में रखे हुए घृत का सेवन । ४. देशविरुद्ध जैसे - अनूप देश में स्निग्ध, शीत, औषध या अन्न का प्रयोग । ४. कालविरुद्ध जैसे - शीतकाल में शीत और रूक्ष वस्तुओं का सेवन या रात्रि में सत्तू का सेवन ६ मात्रा विरुद्ध जैसे -- सममात्रा में मधु और जल, मधु और घृत का प्रयोग । यहाँ मात्रादि कहा गया है, उससे शेष प्रकृति, सात्म्य, सत्त्व आदि का ग्रहण किया जाता है । कुछ द्रव्य स्वभाव से ही विरुद्ध होते हैं जैसे शमीधान्यों में शाकों में रूप शाक, दुग्धों में भेड़ का दूध आदि । तत्र यान्याहारमधिकृत्य भूयिष्ठमुपयुज्यन्ते तेषामेकदेशं वैरोधिकमधिकृत्योपदे-१. ' एवं वादिनम् ' इति पा ० । २. ' विरोधश्च विरुद्धगुणत्वे सत्यपि क्वचिदेव द्रव्यप्रभावात् स्यात् तेन षडूसाहारोपयोगे मधुरा-म्लयोर्विरुद्धशीतोष्णवीर्ययोर्विरोधो न भावनीयः ' चकः ।
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५१८ चरकसंहिता च्यामः — न मत्स्यान् पयसा सहाभ्यवहरेत्, उभयं ह्येतन्मधुरं मधुरविपाकं महाभिष्यन्दि शीतोष्णत्वाद्विरुद्धवीर्यविरुद्धवीर्यत्वाच्छोणितप्रदूषणाय महाभिष्यन्दित्वान्मार्गोपरोधाय च ॥ उदाहरण - इन द्रव्यों में जिनका आहार में अधिक रूप से प्रयोग होता है, उन द्रव्यों के एक देश को लेकर उपदेश करेगें । दूध के साथ मछलियों को नहीं खाना चाहिए, क्योंकि ये दोनों मधुर रस, मधुर विपाक, और महा अभिष्यन्दी है । दोनों क्रमशः शीत और उष्ण वीर्य होने से विरुद्ध वीर्य हैं । विरुद्ध वीर्य होने से रक्त को दूषित करने वाले होते हैं, और महा अभिष्यन्दी होने के कारण दोष धातु और मल के स्रोतों के मार्ग को अवरुद्ध करने वाले होते हैं ॥ ८२ ॥
तन्निशम्यात्रेयवचनमनु भद्रकाप्योऽग्निवेशमुवाच - सर्वानेव मत्स्यान् पयसा सहा-भ्यवहरेदन्यत्रैकस्माच्चिलिचिमात्; स पुनः शकली लोहितनयनः सर्वतो लोहितराजी रोहिताकारः प्रायो भूमौ चरति, तं चेत् पयसा सहाभ्यवहरेन्निःसंशयं शोणितजानां विबन्धजानां च व्याधीनामन्यतममथवा मरणं प्राप्नुयादिति ॥ ८३ ॥
चिलचिम मछली विषयक भद्रकाप्य का विचार • इसके बाद आत्रेय के वचनों को सुनकर भद्रकाप्य ऋषि ने अग्निवेश से कहा कि सभी मछलियों को दूध के साथ खाना चाहिए, किन्तु एक चिलिचिम नामक मछली को छोड़कर । वह चिलिचिम नामक मछली शकली अर्थात् बड़े - बड़े चोइयाँ वाली होती है, नेत्र रक्त और सारे शरीर में लाल रंग की रेखाएँ रहती हैं । रोहू मछली के समान उसका आकार होता है और वह प्रायः भूमि पर चलने वाली होती है । उस मछली को यदिदूध से खाया जाय तो वह निश्चित रूप से रक्तज रोग और मल - मूत्रादि मार्गों को अवरुद्ध कर विबन्ध जन्य व्याधियों में किसी एक व्याधि को अथवा मृत्यु को प्राप्त करानी है ॥ ८३ ॥
नेति भगवानात्रेयः । सर्वानेव मत्स्यान्न पयसा सहाभ्यवहरेद्विशेषतस्तु चिलिचिमं, स हि महाभिष्यन्दित्वात् स्थूललक्षणतरांनेतान् व्याधीनुपजनयत्यामविषमुदीरयति च । इस प्रकार भद्रवाप्य के वचनों को सुनकर भगवान् आत्रेय का उत्तर- तुम ठीक नहीं कह रहे हो । सामान्यतः सभी मछलियों को दूध के साथ सेवन नहीं करना चाहिए, विशेष कर चिलिचिम नामक मछली को, क्योंकि वह चिलचिम महाअभिष्यन्दी होने के कारण अधिक स्पष्ट लक्षण वाले रक्त दुष्टि जन्य और विबन्ध जन्य रोग को उत्पन्न करती है और आम विष को भी उत्पन्न करती है | ग्राम्यानूपौदकपिशितानि च मधुतिलगुडपयो मामूलकवि सैर्विरुडधान्यैर्वा नैकध्य-मद्यात्, तन्मूलं हि वाधिर्यान्ध्यवेपथुजाड्य कैलमूकतामैण्मिण्यमथवा मरणमाप्नोति । और उदाहरण - • ग्राम्यमांस, आनूपमांस और जलीय मांस को मधु, तिल, गुड़, दूध, उड़द, मूली, कमलडंडी और अंकुरित धान्यों के साथ न खाय, क्योंकि इस प्रकार के संयोग विरुद्ध द्रव्यों के सेवन से बाधिर्य, अन्वापन, शरीर में कम्प, जड़ता, अस्पष्ट बोलना, मिनमिनापन ( नाक के सहारे अधिक शब्दों का उच्चारण करना ) अथवा मृत्यु को प्राप्त होता है ॥ न पौष्करं रोहिणीकं शाकं कपोतान् वा सर्वपतैलभ्रष्टान्मधुपयोभ्यां सहाभ्यवहरेत्, तन्मूलं हि शोणिताभिष्यन्दधमनीप्रवि ( ति ) चयापस्मारशङ्खक गलगण्डरोहिणीनामन्यतमं प्राप्नोत्यथवा मरणमिति । और भी - सरसों के तेल में भुने हुए पौष्कर ( कमल का मूल या पोहकर मूल ) और रोहिणी ( गम्भार या नाड़ी शाक ) एवं कपोत मांस को मधु और दुग्ध के साथ नहीं खाना चाहिए | इनको १. ' मधुरविपाकान्महाभिष्यन्दि ' इति पा. । २. ' विरुद्धजानाम् ' ग. । ३. ‘ स्थूललक्षणभवानेतान् ' ग. । ४. ' मारिषै ' ग. । ५. ' वैकल्यमूकता ' इति पा. ।
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आत्रेयभद्रकाप्यीयाध्यायः २६ ] सूत्रस्थानम् ५१६ एक साथ खाने से रक्त में अभिष्यन्द, धमनी प्रविचय अर्थात् धमनियों का विस्तृत होना अपस्मार, शंखक, गलगण्ड, रोहिणी इन रोगों में एक रोग को अथवा वह व्यक्ति मृत्यु को प्राप्त करता है । न मूलकलशुनकृष्णगन्धार्जकसुमुखसुरसादीनि भक्षयित्वा पयः सेव्यं, कुष्टा-बाधभयात् । और भी - मूली, लशुन, सहिजन, अर्जक, सुमुख, सुरमा आदि ( ये तीनों तुलसी के भेद हैं ) को खाकर दूध नहीं पीना चाहिए, क्योंकि इसके सेवन से कुष्ठ होने का भय रहता है । न जातुकशाकं न च निकुचं पक्कं मधुपयोभ्यां सहोपयोज्यम्, एतद्धि मरणायाथवा बलवर्णतेजोवीर्योपरोधायालघुव्याधये षाण्ड्याय चेति । और भी - मधु और दूध के साथ जातुशाक ( नाडीशाक या वंशपत्री शाक ) और पके हुये बड़हर को नहीं खाना चाहिये; क्योंकि इनके खाने से मृत्यु का भय रहता है अथवा बल, रूप, कान्ति एवं वीर्य को नष्ट करने वाला होता है या बहुत बड़ी व्याधि होती है या खाने वाला व्यक्ति नपुंसक हो जाता है । तदेव निकुचं पक्कं न माषसूपगुडसर्पिभिः सहोपयोज्यं, वैरोधिकत्वात्; और भी - उसी पके हुये वड़हल को उड़द की दाल, गुड़ और घृत के साथ नहीं खाना चाहिए, क्योंकि ये धातुओं के विरोधी होते हैं । विमर्श - सुश्रुत ने दूध, दही और उड़द के दाल से पके हुये बड़हल का खाना निषेध किया है । दूध बड़हल के साथ या खाने के पहले या खाने के पश्चात् सभी अवस्था में हानिकर बतलाया है, यथा — ‘ लकुचफलं पयसा दध्ना माषसूपेन वा प्राक् पयसः पयसोऽन्ते वा । ' ( सु. सू. अ. २० ) तथाऽऽम्राम्रातकमातुलुङ्गनिकुचकरमर्द मोचदन्तशटबदर कोशाम्रभव्यजाम्बवक पित्थति-न्तिडीकपारावताक्षोडपनसनारिकेर दाडिमामलकान्येवंप्रकाराणि चान्यानि द्रव्याणि सर्व चाम्लं द्रवमद्रवं च पयसा सह विरुद्धम् । तथा कङ्गुवनकमकुष्टककुलत्थमाषनिष्पावाः पयसा सह विरुद्धाः । और भी - दूध के साथ आम, आमड़ा, बिजौरा नीबू, बड़हल, करौंदा, मोच ( केला ) दन्त शठ ( गागला नीबू ) वदर ( बड़ी बेर ) कोशात्र ( छोटा आम, लेटि आम ) भव्य ( कमरख ) जामुन, कैंथ, इमली, पारावत अखरोट, कटहल, नारियल, खट्टा अनार, अवलाँ इसी प्रकार के और अन्य पदार्थ, सभी अम्ल द्रव्य वह द्रवरूप हों या सूखे रूप हों तो ये विरूद्ध होते हैं और कंगुनी ( टांगुन ) वनक ( वन कोदों ) मकुष्ठ ( मोठ ) कुलथी, उड़द और सेम को भी दूध के साथ लेने पर विरुद्ध होता है । पद्मोत्तरकाशाकं शार्करो मैरेयो मधु च सहोपयुक्तं विरुद्धं वातं चातिकोपयति । हारिद्रः सपतैलभृष्टो विरुद्धः पित्तं चातिकोपयति । पायसो मन्धानुपानो विरुद्धः श्लेष्माणं चातिकोपयति । उपोदिका तिलकल्कसिद्धा हेतुरतीसारस्य । बलाका वारुण्या सह कुल्माषैरपि विरुद्वा, सैव शूकरवसापरिभृष्टा सद्यो व्यापादयति । मयूरमांसमेरण्डसीसंका-वसक्तमेरण्डाग्निप्लुष्टमेरण्डतैलयुक्तं सो व्यापादयति । हारिद्रकमांसं हारिद्रसीसकावसक्तं हारिद्राग्निप्लुष्टं सद्यो व्यापादयति, तदेव भस्मपांशुपरिध्वस्तं सक्षौद्रं सद्यो मरणाय । मत्स्यनिस्तालनसिद्धाः पिप्पल्यस्तथा काक्रमाची मधु च मरणाय । संयोग विरुद्ध द्रव्यों के उदाहरण - ( १ ) पद्मोत्तरिका ( कुसुम्भ, बर्रे का शाक ) चीनी से १. ' सीसको हि भटित्रकरणकाष्ठमुच्यते ' चक्रः ।
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५२० चरकसंहिता बनाया हुआ मदिरा, मैरेव और मधु एक साथ खाने से विरूद्ध होता हैं और अधिक रूप से वात को कुपित करता है । ( २ ) हारिल पक्षी का मांस सरसों के तेल में भुन कर खाने से विरुद्ध होता है और पित्त को अधिक बढ़ाता है ( यह संस्कार विरुद्ध होता है ) । ( ३ ) खीर खाने के बाद तत्तू को जल में घोल कर पीने से विरूद्ध होता है और कफ को अधिक कुपित करना है । ( ४ ) तिल के कल्क में पकाया हुआ पोई का शाक विरूद्ध होता है और इसके सेवन से अतिसार ( दस्त ) रोग होता है । ( यह भी संस्कार विरूद्ध का उदाहरण है ) ( ५ ) कुले का मांस मदिरा के साथ या कुल्माप ( मटर की बुधनी ) के साथ विरुद्ध होता है । उसी वकुले के मांस को सूअर की चर्बी में भुन कर खाने से सद्यः मारक होता है । ( ६ ) मयूर के मांस को रेड़ की लकड़ी में लेकर रेड़ की लकड़ी की आग में पकाकर उसमें रेड़ का तेल मिलाकर खाया जाय तो जल्दी ही मारने वाला होता है । ( ७ ) हारिल पक्षी के मांस को सेवन करने से सद्यः मारक होता है । वहीं अर्थात् पक जाने के बाद धुल या राख से किया जाय तो सद्यः मारक होता है । हल्दी के लकड़ी में पिरोकर, हल्दी के आग में पका कर हारिल पक्षी का मांस राख या धुली में गिर गया हो ओत - प्रोत हो गया हो और उसे नधु के साथ सेवन ( ८ ) जिस तैल में मछली बनायी गयी हो उसी तेल में पिप्पली और नकोय को सिद्ध कर खाया जाय तो वह सद्यः मारक होता है । विमर्श - इन उपर्युक्त पंक्तियों में संयोग विरुद्ध तथा संस्कार विरुद्ध द्रव्यों का वर्णन किया गया है । मधु चोष्णमुष्णार्तस्य च मधु मरणाय । मधुसर्पिषी समटते, मधु वारि चान्तरिक्षं समटतं, मधुपुष्करवीजं, मधु पीत्वोष्णोदकं, भल्लातकोष्णोदकं तत्रसिद्धः कम्पिल्लकः, पर्युषिता काकमाची, अङ्गारशुल्यो भासश्चेनि विरुद्वानि । इत्येतद्यथाप्रश्नमभिनिर्दिष्टं भवतीति ॥ ८४ ॥
और भी - गरम किया हुआ मधुर होता है और गर्मी से पीड़ित मनुष्य जब मधु का सेवन करना है तो वह उसके मृत्यु का कारण होता है । मधु और घी समान मात्रा में, मधु और आकाश का जल समान मात्रा में, मधु और कमलगट्टा समान मात्रा में मधु पीकर गर्म जल पीना, मिलावा और गरम जल एक साथ लेना, मट्ठा में पकाया हुआ कवीय, वासी मकोय, लोहे के किल में गोंडकर, अंगार के ऊपर पकाया हुआ भाग नामक पक्षी का मांस हानिकर होना है । इस तरह से आत्रेय ने कहा कि विरुद्ध आहार विहारों के विषय में जिस प्रकार तुमने प्रश्न किया उन सत्रका निर्देश कर दिया गया है ॥ ८४ ॥
विमर्श - मधु स्वभावतः शांत होता है यदि उसका किसी प्रकार के उष्ण द्रव्यों से संयोग हो जाता है तो वह वीर्य विरुद्ध हो जाता है । यह बात सुश्रुत ने भी बतलाया है, यथा- ' उष्णीवि-क्ष्यते सर्वे विषान्वयतया मधु । उष्णार्तमुष्णैरुणैर्वा तन्निहन्ति यथा विषम् ॥ ' ( सु. सू. अ. ४५ ) सन्निपातज्जर में मधु का देना सर्वथा वर्जित किया गया है क्योंकि वह शीतल होता है और सन्निपातज ज्वर में उष्ण क्रिया लाभकारी होती है यदि उष्ण द्रव्यों के साथ मधु का संयोग किया . जाय तो वह अवश्य ही हानिकारी होगा इसीलिये बतलाया है यथा-- ' सर्वेषु सन्निपातेषु न क्षौद्रं समुपाचरेत् । शीतोपचारि क्षौद्रं स्याच्छीतं चात्र निषिध्यते ॥ ' ( भा. प्र. ज्वर. चि. )
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आत्रेय भद्रकाप्यीयाध्यायः २६ ] सूत्रस्थानम् भवन्ति चात्र श्लोकाः — ५२१
येत् किञ्चिद्दोपमास्राव्य न निर्हरति कायतः । आहारजातं तत् सर्वमहितायोपपद्यते ॥
( १० ) वैरोधिक आहार के घटक ( Factors Responsible for Dietetic Incompatibilities ) वैधिक आहार की परिभाषा - जो कोई आहार द्रव्य या औषधि दोषों को अपने स्थान से उभार दे पर उसे शरीर से बाहर न निकाले, वे सभी आहार द्रव्य अहितकर होते हैं ॥ ८५ ॥
यच्चापि देशकालाग्निमात्रासात्म्यानिलादिभिः । संस्कारतो वीर्यतश्च कोष्टावस्थामैरपि ॥ परिहारोपचाराभ्यां पाकात् संयोगतोऽपि च । विरुद्धं तच्च न हितं हृत्संपद्विधिभिश्च यत् ॥ वैरोधिक आहार के घटक --- जो १. देश, २. काल, ३. अनि, ४ नात्रा, ५. साम्य, ६. वायु आदि दोष, ७. संस्कार, ८. वीर्य, ९. कोड, १०. अवस्था, ११. क्रम, १२. परिहार, १३. उपचार, १४. पाक, १५. संयोग विरुद्ध, १६. हृदय विरुद्ध १७. संपत् विरुद्ध और १८. विधि विरुद्ध होते हैं वह भी हितकर नहीं होते हैं । ८६-८७ ॥ विमर्श- - यह दोनों लोक कुछ चरक के पुस्तकों में नहीं पाये जाते है और आगे बतलाये हुये इन अठ्ठारह प्रकार के विरुद्रों का उदाहरण भी नहीं पाया जाता है । पर चक्रपाणि ने इन
श्लोकों को मूलग्रन्थ का पाठ माना है, पर गंगाधर और योगीन्द्र नाथ तेन ने इन इलोकों को मूल
में सम्मिलित नहीं किया है । विरुद्धं देशतस्तावद्रूक्षतीच्णादि धन्वनि । आनूपे स्निग्धशीतादि भेषजं यन्निषेव्यते ॥८८ ॥
( १ ) देश विरुद्ध — धन्वन देश अर्थात् जंगली देश या मरूभूमि में रूक्ष और तीक्ष्ण आदि द्रव्यों का सेवन करना, आनूपदेश में स्निग्ध और शीतल गुण युक्त औषधों का सेवन देश के विरुद्ध बनलावा जाता है ॥ ८८ ॥
कालतोऽपि विरुद्धं यच्छीतरूतादिसेवनम् । शीते काले, तथोष्णे च कटुकोष्णादिसेवनम् ॥
( २ ) काल विरुद्ध - जाड़े के दिनों में शीतल, रुक्ष आदि आहार एवं औषध द्रव्यों का सेवन करना, गर्मी के दिनों में कटु और उष्ण आदि आहार एवं औषध द्रव्यों का सेवन करन काल के विरु होता है । ८ ९ ॥ विरुद्वसनले तद्वदन्नपानं चतुर्विधे । मधुसर्पिः समधृतं मात्रया तद्विरुध्यते ॥ ९ ० ॥ ( ३ ) अनि विरुद्ध चार प्रकार के जठराग्नि के रहने हुए उसके अनुसार आहार न मिले तो उसे अनि विरुद्ध कहा जाता है । ( ४ ) मात्रा विरुद्ध - मधु औधी सम भाग में मिलाकर खाया जाय तो वह मात्रा विरुद्ध होता है ॥ ९ ० ॥ कटुकोष्णादिसात्म्यस्य स्वादुशीतादिसेवनम् । यत्तत् सात्म्य विरुद्धं तु — ( ५ ) साम्य विरुद्ध - • जिस पुरुष को कटुरस और उष्ण वीर्य आहार, प्रकृति के अनुकूल हो गया है ऐसे व्यक्ति के लिए नथुर रस और शीत वीर्य का आहार साम्य विरुद्ध होता है । - विरुद्धं त्वनिलादिभिः ॥ ९ १ ॥ या समान गुणाभ्यासविरुद्धान्नौषध क्रिया । ( ६ ) दोष विरुद्ध: - वान, वित्त, कफ इन दोषों के समान गुण वाले और अभ्यास विरुद्ध १. ' यत्किचिदोषमुत्क्लेश्य ' इति पा ० ।