चरक संहिता हिन्दी भाष्य — पृष्ठ 611–620
चरक संहिता हिन्दी भाष्य · Chaukhamba · पृष्ठ 611–620
पृष्ठ 611
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
५२२ आहार - औषत्र जाना है ॥ ९ १ ॥ चरकसंहिता और कर्म का सर्वदा अभ्यास अर्थात् सेवन करना वातादि दोष के विरुद्ध कहा
एरण्डसीसकासक्तं शिखिमांसं यथैव हि ।
संस्कारतो विरुद्धं तद्यद्भोज्यं विषवद्भवेत् ॥ ९ २ ॥
जैसे रेड़ की लकड़ी में छेद कर भुना हुआ मोर का मांस विष के ( ७ ) संस्कार विरुद्ध-समान हो जाता है वैसे ही जो आहार द्रव्य संस्कार से विष के समान हो जाते हैं वे आहार द्रव्य संस्कार विरुद्ध होने हैं ॥ ९ २ ॥ विरुद्धं वीर्यतो ज्ञेयं वीर्यतः शीतलात्मकम् ॥ ९ ३ ॥ वीर्य में शीतल द्रव्यों को उष्ण वीर्य वाले द्रव्यों के साथ मिलाकर जो
तत् संयोज्योष्णवीर्येण द्रव्येण सह सेव्यते ।
( ८ ) वीर्य विरुद्ध ' -लिया जाता है उसे वीर्य विरुद्ध समझना चाहिए ॥ ९ ३ ॥
क्रूरकोष्ठस्य चात्यल्पं मन्दवीर्यमभेदनम् ॥ ९ ४ ॥
। एतत् कोष्टविरुद्धं तु-मृदुकोष्टस्य गुरु च भेदनीयं तथा बहु ( ९ ) कोष्ठ विरुद्ध - जिस पुरुष का कोष्ठ क्रूर होता है उसके लिये मन्द्र वीर्य और मल को नहीं लाने वाला, जिसका मृदुकोष्ठ है ऐसे व्यक्ति को गुरु और जो मल लाने वाला है ऐसे अन्न को अधिक मात्रा में देना कोष्ठ विरुद्ध मात्रा में बहुत कम,
मात्रा - गुरु या द्रव्य-कहा जाता है ।
- विरुद्धं स्यादवस्थया ॥ ९ ५ ॥
श्रमव्यवायव्यायामसक्तस्यानिलकोपनम् । निद्रालसस्यालसस्य भोजनं श्लेप्मकोपनम् ॥
( १० ) अवस्था विरुद्ध — परिश्रम, मैथुन, व्यायाम इन कार्यों में लगे हुए व्यक्तियों द्वारा तक आहार का सेवन करना या जो व्यक्ति अधिक सोते हैं या आलसी हैं ऐसे व्यक्ति को कवर्धक आहार देना अवस्था विरुद्ध कहा जाता है ॥ ९ ५ - ९ ६ ॥ यच्चानुत्सृज्य विण्मूत्रं भुङ्क्ते यश्चाबुभुक्षितः । तच्च क्रमविरुद्धं स्याद्यच्चातिक्षुद्वशानुगः ॥ ९ ७ ॥ ( ११ ) क्रम विरुद्ध - जो व्यक्ति मलमूत्र का बिना त्याग किये हुये और बिना भूख लगे अथवा अधिक भूख मालूम होने पर भोजन करता है उसे क्रम विरुद्ध कहते है ॥ ९ ७ ॥ विमर्श - भोजन करने का क्रम सुश्रुत ने इस प्रकार बताया है, यथा- ' विसृष्टे विण्मूत्रे विशदकरणे हेच मुल्यौ, विशुद्धे चोद्वारे हृदि सुविमले वाने च सरति । तथान्नश्रद्धायां कुमपरि-गमे कुक्षौ च शिथिले, प्रदेयस्त्वाहा भवति भिषजां कालः स तु मतः ॥ ' ( सु. उ. अ. ६४ ) परिहारविरुद्धं तु वराहादीन्निपेव्य यत् । सेवेतोष्णं घृतादींश्व पोवा शीतं निषेवते ॥ ९ ८ ॥ ( १२ ) परिहार विरुद्ध — जो व्यक्ति सूअर आदि के मांस को खाकर उष्ण वस्तुओं का सेवन करता है तो उसे परिहार विरुद्ध कहा जाता है । ( १३ ) उपचार विरुद्ध - जो व्यक्ति घृत आदि स्नेहों को पीकर शीतल आहार - औषध और जल को पीना है तो वह उपचार विरुद्ध कहा जाता है ॥ ९ ८ ॥ विरुद्धं पाकतश्चापि दुष्टदुर्दारुसाधितम् । अपक्व तण्डुलात्यर्थपक्कदग्धं च यद्भवेत् । ( १४ ) पाक विरुद्ध ' दूषित एवं अनुचित लकड़ी से आहार को पकाना या चावलों को बिना पूर्ण पकाये ( अधकच्चा ) या अधिक पका हुआ या जला हुआ अन्न का सेवन एक
विरुद्ध होता है ।
संयोगतो विरुद्धं तद्यथाऽम्लं पयसा सह ॥ ९९ ॥
अमनोरुचितं यच हृद्विरुद्धं तदुच्यते ।
पृष्ठ 612
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
आत्रेयभद्रकाप्यीयाध्यायः २६ ] सूत्रस्थानम् ५२३ ( १५ ) संयोग विरुद्ध - जो अम्ल रस को दूध के साथ सेवन करते हैं उसे संयोग विरुद्ध कहते हैं | ( १६ ) हृदय विरुद्ध — जो आहार अपने मनोनुकूल न हो उसका सेवन करना हृदय विरुद्ध कहा जाता है ॥ ९९ ॥
विमर्श - आहार के पचने में मन का बहुत बड़ा सम्बन्ध होता है । शरीर एवं अग्नि में कोई भी विकृति न हो, फिर भी आहार मन के अनकुल न हो तो उसका पाक ठीक नहीं होता है । बतलाया भी है, यथा - ' ईर्ष्याभयक्रोधपरिप्लुतेन लुब्धेन रुग्दैन्यनिपीडितेन । सेव्यमानमन्नं न सम्यक् परिपाकमेति ॥ ' ( माध. नि. अग्निमाद्य ) संपद्विरुद्धं तद्विद्यादसंजातरसं त यत् ॥ १०० ॥
अतिक्रान्तरसं वाऽपि विपन्नरसमेव वा । विद्वेषयुक्तेन च ( १७ ) संपत् विरुद्ध - जिस आहार या औषधि द्रव्य में उचित रूप में रस उत्पन्न न हुये हैं, अथवा जो अतिक्रान्त रस हो, अथवा जिसका रस प्रारम्भिक अवस्था में ही विकृत हो गया हो, उसका सेवन करना संपत् विरुद्ध माना जाता है ॥ १०० ॥
ज्ञेयं विधिविरुद्धं तु भुज्यते निभृते न यत् । तदेवंविधमन्नं स्याद्विरुद्वमुपयोजितम् ॥१०१ ॥
( १८ ) विधि विरुद्ध एकान्त में जो भोजन नहीं किया जाता है उसे विधि विरुद्ध समझना चाहिए । इस प्रकार इन उपर्युक्त १८ प्रकार के नियमों के अनुसार खाया गया अन्न विरुद्ध कहा जाता है । और इनका सेवन शरीर के लिये अहितकर होता है ॥ १०१ ॥
विमर्श - आहार विधि का वर्णन विमान स्थान के दूसरे अध्याय में किया गया है जैसे प्रकृति करण, संयोग राशि, देश, काल आदि और आहार - विधि - विधान उष्ण, स्निग्ध आदि उन नियमों के अनुसार भोजन न करना विधि विरुद्ध है ।
पाण्ड्यान्ध्यवीसर्पदकोदराणां विस्फोटकोन्मादभगन्दराणाम् ।
मूर्च्छामदाध्मान गलेग्रहाणां पाण्ड्वामयस्यामविषस्य चैव ॥ १०२ ॥
किलासकुष्टग्रहणीगदानां शोथोम्लपित्तज्वरपीनसानाम् ।
संतान दोषस्य तथैव मृत्योर्विरुद्धमन्नं प्रवदन्ति हेतुम् ॥ १०३ ॥
सामान्यतः विरुद्ध अन्न के खाने से उत्पन्न होनेवाले रोग 1 • नपुंसकता, अन्धापन, विसर्प, जलोदर, विस्फोट, पागलपन, भगन्दर, मूर्च्छा, मद, आध्मान ( पेट का फूलना ) गलग्रह, पाण्डु रोग, आमविष ( अर्थात् विसूचिका, अलसक, विलंबिका ) किलास ( श्वेतकुष्ठ ) कुष्ठ रोग, ग्रहणी रोग, शोथ, अम्लपित्त, ज्वर, पीनस और सन्तानों में दोष, इन रोगों के होने में विरुद्ध अन्न का सेवन कारण होता है और विरुद्ध अन्न का सेवन मृत्यु का भी कारण होता है ॥ १०२ - १०३ ॥ विमर्श - विरुद्ध अन्न के सेवन से कुछ और अधिक रोगों की उत्पत्ति वृद्ध वाग्भट्ट ने माना है - ' विस्फोटशोकम, विद्रधिगुल्मयक्ष्म तेजोबल स्मृतिमतीन्द्रियचित्तनाशान् । कुर्याद्विरुद्धमशनं ज्वरम-म्लपित्तमष्टौ गदांश्च महतो विषबच्च मृत्युम् ॥ ' ( अ. स. सु. अ. ९ ) । आठ महारोग कौन हैं इस विषय में मुश्रुत ने बताया हैं यथा - ' वातव्याधिः प्रमेहश्च कुष्ठमर्शो भगन्दरः । अश्मरी मूढगर्भश्च तथैवोदरमष्टमम् ॥ अष्टावेते प्रकृत्यैव दुश्चिकित्स्या महागदाः । ( सु. सू. अ. ३३ ) * एषां खल्वपरेषां च वैरोधिकनिमित्तानां व्याधिनामिमे भावाः प्रतिकारा भवन्ति । १. ' गलामयानाम् ' इति पा । ३. ' संतानदोषो मृतवत्सत्वादिः ' चक्रः । २. ' शोफास्रपित्त ' इति पा. । ४. ' प्रतीघातकरा भवन्ति ' ग. ।
पृष्ठ 613
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
५२४ चरकसंहिता तद्यथा - वमनंं विरेचनं च, तद्विरोधिनां च द्रव्याणां संशमनार्थमुपयोगः, तथाविधैश्च द्रव्यैः पूर्वमभिसंस्कोरः शरीरस्येति ॥ १०४ ॥
विरुद्ध आहार जन्य रोगों की चिकित्सा -- ऊपर बतलाये गये रोगों में और इनसे अतिरिक्त विरुद्ध भोजन से उत्पन्न होनेवाले रोगों के प्रतिकार अर्थात् नाश करनेवाले ये भाव होते है । जैसे वमन और विरेचन तथा विरोधी अन्न सेवन करने पर उससे उत्पन्न उपद्रवों को शान्ति के लिये उस विरुद्ध आहार के विपरीत द्रव्यों का सेवन लाभकारी होता है । अथवा प्रथम ही विरुद्ध आहार के समान द्रव्यों से शरीर का संस्कार करना हितकारी होता है ॥ १०४ ॥
विमर्श - - वमन और विरेचन के द्वारा विरुद्ध अन्न का प्रभाव नष्ट हो जाता है । विरुद्ध अन्न विष के समान होता है जब तक वह आमाशय में रहता है तब तक वमन कराने से लाभ होता है । जब पक्काशय में चला जाता है तब विरेचन से लाभ होता है । जब वह कालान्तर में अनेक रोग उत्पन्न करता तो ऐसी दशा में उस विरुद्ध आहार के प्रभाव को नष्ट करनेवाले उसके विपरीत गुणवाले द्रव्यों का सेवन करने से उन रोगों की शान्ति हो जाती है । भवतश्चात्र-विरुद्धाशनजान् रोगान् प्रतिहन्ति विरेचनम् । वमनं शमनं चैव पूर्वं वा हितसेवनम् ॥ साम्यतोऽल्पतया वाऽपि दीप्ताग्ने स्तरुणस्य च । स्निग्धव्यायामवलिनां विरुद्धं वितथं भवेत् ॥ विरुद्ध भोजन करने से उत्पन्न होनेवाले रोगों को विरेचन, वमन और संशमन नष्ट कर ढेना है और यदि पूर्व से ही हिनकर आहार का सेवन किया जाता हैं तो विरुद्ध आहार सेवन से रोग उत्पन्न ही नहीं होते हैं । विरुद्ध अन्न लगातार सेवन करने से वह प्रकृति के अनुकूल हो गया हो, उसकी मात्रा अल्प हो, पुरुष की अग्नि तेज हो और वह जवान हो, सदा घी खाता हो, कसरत करता हो और बलिष्ट हो, ऐसे पुरुषों द्वारा खाया हुआ विरुद्ध अन्न व्यर्थ हो जाता है ॥ तत्र श्लोकाः-मतिरासीन्महर्षीणां या या रसविनिश्चये । द्रव्याणि गुणकर्मभ्यां द्रव्यसंख्या रसाश्रया ॥
कारणं रससंख्याया रसानुरसलक्षणम् । परादीनां गुणानां च लक्षणानि पृथक - पृथक ॥१०८ ॥
पञ्चात्मकानां पत्वं च रसानां येन हेतुना । ऊर्ध्वानुलोमभाजश्च यद्गुणातिशयाइमाः ॥
पण रसानां च सविभक्ता विभक्तयः । उद्देशश्चापवादश्च द्रव्याणां गुणकर्मणि ॥
प्रवरावरमध्यत्वं रसानां गौरवादिषु । पाकप्रभावयोर्लिङ्गं वीर्यसंख्याविनिश्चयः ॥ १११ ॥
मास्वाद्यमानानां रसानां यत् स्वलक्षगम् । यद्यद्विध्यते यस्माद्येन यत्कारि चैव यत् ॥
वेरोधिकनिमित्तानां व्याधीनामौषधं च यत् । आत्रेयभट्टकाप्यीये तत् सर्वमवदन्मुनिः ॥
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते सूत्रस्थानेऽन्नपानचतुष्के आत्रेयकाप्ययो नाम पविशतितमोऽध्यायः ॥ २६ ॥
अध्याय गत विषयों का उपसंहार • रसों के निश्चय में महर्षियों के जो - जो मन है । द्रव्य, गुग, कर्म, द्रव्य की संख्या, रस के आश्रयभूत द्रव्य इनके संख्या का कारण, रस और अनुरस के लक्षण, १. ' द्विरोविनामिनि पाण्ड्याविहाणां; तथाविधैरिति विरुद्धाहारजन्यव्याविविरुद्वैः । चक्रः | २. ' अभिसंस्कार इति सत्ताभ्यासेन शरीरभावानाम् ' चक्रः । ' शुद्धिरत्रैष्टा शनो वा तद्विरो-धिभिः । द्रव्यैस्तैरेव वा पूर्व शरीरस्याभिसंस्कृति; ' इति वाग्भटः ।
पृष्ठ 614
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अन्नपानविध्यध्यायः २७ ] सूत्रस्थानम् ५२५ परदि गुणों का अलग - अलग लक्षण, रसों के पंचमहाभूत से उत्पन्न होने पर भी जिस कारण से वे रस ६ हो जाते है, जिन गुणों के कारण रस उर्ध्वगामी तथा अधोगामी होते हैं. ६ रसों के गुण और कर्म द्वारा विभाग और एक - एक रस के अधिक सेवन से अलग - अलग दोषों का विभाग, द्रव्यों के गुण, कर्म बतलाने के लिये उनका उद्देश्य अर्थात् सामान्य नियम और अपवाद, रसों की गुरुता, लघुता, आदि में श्रेष्ठता, मध्यता और न्यूनता, विपाक और प्रभाव का लक्षण, वीर्य और इनकी संख्या का निर्णय, रसों का स्वाद लेते समय जो अलग - अलग रसों के लक्षण होते हैं, जो द्रव्य जिस कारण से जिस - जिस द्रव्यों के साथ विरोधी होते हैं, विरुद्ध द्रव्यों के सेवन से जो रोग पैदा होते है उनकी चिकित्सा, यह सब बात आत्रेय मुनि ने इस आत्रेय भद्र काप्यीय अध्याय में स्पष्ट कह दिया है ॥ १०७-११३ ॥ चरक के द्वारा प्रतिसंस्कृत अग्निवेशकृतनन्त्र ( चरकसंहिता ) के सूत्रस्थान में अन्नपानचतुष्क-विषयक आत्रेयभद्रकाप्यीय नामक छब्बीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ २६ ॥
अथ सप्तविंशोऽध्यायः अथातोऽन्नपानविधिमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति छ स्माह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
अब अन्न - पान विधि नामक अध्याय की व्याख्या की जायगी । जैसा कि भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥ १-२ ॥ विमर्श - इस अध्याय में अन्न और पान की विधियों ( गुण - कर्म चक्र ० ) का अलग - अलग वर्णन किया गया है । जिसको देखकर यह निश्चय किया जाता है कि अमुक द्रव्य का यह गुण है, ऐसा कर्म है, अतः यह द्रव्य इस व्यक्ति के लिये हितकर, और इस व्यक्ति के लिये अहितकर होगा । यद्यपि ‘ आह्नियते अन्ननलिकया इति आहारः ' अर्थात् अन्ननली के द्वारा जो कुछ लिया जाता है उन सभी को ' आहार ' कहा जाता है, फिर भी सामान्यतः अन्न को ही आहार कहा जाता है । पर यहाँ पर अन्न से ठोस द्रव्य ( Solids ) और पान से द्रव द्रव्य ( Liquids ) का ग्रहण किया गया है । इन दोनों का अलग - अलग वर्णन इस अध्याय में किया जायगा । यह विमर्श चक्रपाणि सम्मत है । * इष्टवर्णगन्धरसस्पर्श विधिविहितमन्नपानं प्राणिनां प्राणिसंज्ञकानां प्राणमाचक्षते कुशलाः, प्रत्यक्षफलदर्शनात्; तदिन्धना ह्यन्तरग्नेः स्थितिः; तत् सत्त्वमूर्जयति, तच्छरीर-धातुव्यूहबलवर्णेन्द्रियप्रसादकरं यथोक्तमुपसेव्यमानं, विपरीतम हिताय संपद्यते ॥ ३ ॥
( क ) अन्नपान विषयक सामान्य प्रकरण ( General Consideration Regarding Diets ) अन्नपान की प्राण से तुलना - वर्ण, गन्ध, रस तथा स्पर्श जिस आहार का मनोनुकूल हो और जो आहार विधिपूर्वक बनाया भी गया हो, वह अन्नपान प्राणिसंज्ञक जीवधारियों का प्राण है, ऐसा कुशल लोग कहते है । क्योंकि अन्नपान का प्रत्यक्ष फल प्राणधारक होता है यह देखा जाता है । अन्न रूपी लकड़ी के रहने पर ही अन्तरग्नि की स्थिति रहती हैं । वह अन्नपान १. ' प्राणिनामित्यनेनैव लब्धेऽपि प्राणिसंज्ञकानामिति वचनं स्थावरप्राणिप्रतिषेधार्थम् ' चक्रः ।
पृष्ठ 615
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
५२६ चरकसंहिता मन को वलप्रदान करता है, शरीर की सम्पूर्ण धातुओं के समुदाय, बल, वर्ण एवं इन्द्रियों में प्रसन्नता लाने वाला है इससे विपरीत रूप में किया गया अन्नपान अहितकर होता है । इसलिये. हे अग्निवेश हित तथा अहित समझने के लिये अन्नपान की विधि का उपदेश कर रहा हूँ || ३ || तस्माद्धिताहितावबोधनार्थमन्नपानविधिमखिलेनोपदेच्यामोऽग्निवेश! । तंत् स्वभावा-दुदकं क्लेदयति, लवणं विष्यन्दयति, क्षारः पाचयति, मधु संदेधाति, सर्पिः स्नेहयति, क्षीरं जीवयति, मांसं बृंहयति, रसः प्रीणयति, सुरा जर्जरीकरोति, शीधुरवधमति, द्राक्षासव दीपयति, फाणितमार्चिनोति, दधि शोफं जनयति, पिण्याकशाकं ग्लपयति, प्रभूतान्तर्मलो मासूपः, दृष्टिशुक्रमः क्षारः, प्रायः पित्तलमम्लमन्यत्र दाडिमामलकात् प्रायः श्लेष्मलं मधुरमन्यत्र मधुनः पुराणाच्च शालिषष्टिकयवगोधूमात् प्रायस्तिक्तं वातलमवृष्यं चान्यत्र वेत्राग्रामृता पटोलपत्रात् 2 प्रायः कटुकं वातलमवृष्यं चान्यत्र पिप्पलीविश्वभेषजात् ॥ ४ ॥
हितकर तथा अहितकर आहार - ( १ ) जल स्वभाव से अन्न को किन्न करता है, या शारीरिक धातुओं में क्लेद उत्पन्न करता है, ( २ ) लवणरस - कफ आदि के संघात को पतला करता है, ( ३ ) क्षार - पाचन करता हैं, ( ४ ) मधु - टूटे हुये स्थान को जोड़ता है, ( ५ ) घृत-स्नेहन करता है, ( ६ ) दूध - जीवनीय होता है, ( ७ ) मांस- शरीर को मोटा करता है, ( ८ ) मांस-रस- तृप्ति उत्पन्न करता है, ( ९ ) मदिरा - मांसादि को शिथिल करती है, ( १० ) सीधु ( मदिरा का भेद ) - मांस तथा मैदा आदि धातुओं में लेखन क्रिया करता ( ११ ) द्राक्षासव - अग्नि को तेज करता है, ( १२ ) फाणित ( राव ) - दोषों को एकत्र करता है, ( १३ ) दधि - शोथ उत्पन्न करता है, ( १४ ) पिण्याक ( तिल की खली ) शरीर में ग्लानि उत्पन्न करता है, ( १५ ) उड़द की दाल-मल, मूत्र को अधिक पैदा करती है, ( १६ ) क्षार - दृष्टि तथा शुक्र को नष्ट करता है, ( १७ ) अम्ल — खट्टा अनार तथा आँवले को छोड़ कर प्रायः सभी अम्ल द्रव्य पित्त को उत्पन्न करते हैं, ( १८ ) मधु, पुराने शाली ( चावल ), जौ, गेहूं को छोड़ कर सभी मधुर द्रव्य कफ को बढ़ाने वाले होते हैं, ( १ ९ ) वेत का अग्र भाग, गुडूची तथा परवर की पत्ती को छोड़ कर सभी तिक्त द्रव्य चातवर्धक और अवृष्य होते हैं, ( २० ) पीपल और सोंठ को छोड़ कर प्रायः सभी कटु द्रव्य वातवर्धक और अवृष्य होते हैं ॥ ४ ॥
परमतो वर्गसंग्रहेणाहारद्रव्याण्यनुव्याख्यास्यामः ॥ ५ ॥
अब इसके बाद वर्गों के संग्रहस्वरूप आहार द्रव्यों की व्याख्या कर रहा हूँ ॥ ५ ॥
शूकधान्यशमीधान्यमांसशाकफलाश्रयान् । वर्गान् हरितमद्याम्बुगोर से क्षुविकारिकान् ॥६ ॥
दश द्वौ चाप वर्गों कृतान्नाहारयोगिनाम् । रसवीर्यविपाकैश्च प्रभावैश्च प्रचक्ष्महे ॥ ७ ॥
( १ ) शूक धान्य वर्ग, ( २ ) शमीधान्य वर्ग, ( ३ ) मांसवर्ग, ( ४ ) शाक वर्ग, ( ५ ) फल चर्ग, ( ६ ) हरित वर्ग, ( ७ ) मद्य वर्ग, ( ८ ) जल वर्ग, ( ९ ) गोरस वर्ग, ( १० ) इक्षुविकार वर्ग, ( ११ ) कृतान्न वर्ग और ( १२ ) आहारोपयोगी वर्ग । इन १२ वर्गों में आए हुए द्रव्यों के रस, वीर्य, विपाक और प्रभाव का उपदेश इस अध्याय में किया जायगा ॥ ६-७ ॥ १. ' तदित्युदाहरणं, किंवा स स्वभावो यस्य स तत्स्वभावस्तस्मात् क्लेदनस्वभावादित्यर्थः ' चक्रः । २. ' संदधाति विशिष्टानि मांसादीनि संक्षेपयति ' चक्रः । ३. ' रसो मांसरसः ' चक्रः । ४. ' जर्जरीकरोति मांसादि शिथिलीकरोति ' शिवदाससेनः । ५. ' अवधमति कृशीकरोति ' शिवदाससेनः । ६. ' आचिनोति ' उ ' षान् ' इति शेषः ' चक्रः ।
पृष्ठ 616
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अन्नपानविध्यध्यायः २७ ] अथ शूकधान्यवर्गः— सूत्रस्थानम् ( ख ) अन्नपान - विषयक वर्ग संग्रह ( Classification of Diets ) ५२७ रक्तशालिर्महाशालिः कलमः शकुनाहृतः । तूर्णको दीर्घशूकश्च गौरः पाण्डुकलाङ्गुलौ ॥ ८ ॥
सुगन्धेको लोहवालः सारिवाख्यः प्रमोदकः । पतङ्गस्तपनीयश्च ये चान्ये शालयः शुभाः ॥
शीता र विपाके च मधुराश्चाल्पमारुताः । बद्धाल्पवर्चसः स्निग्धा बृंहणाः शुक्रमुत्रलाः ॥ १. शूकधान्य वर्ग ( Class of Corns or Mono - Cotledons ) शुकधान्य वर्ग के सामान्य गुण - १. रक्तशालि ( जो छिलका सहित लाल धान होता है ), २. महाशालि, ३. कलम ( उत्खात, प्रतिरोपित - जो उखाड़ कर पुनः लगाया गया है ), ४. शकुनाहृत ( ' द्वीपान्तरात् समानीतो गरुडेन महात्मना । शकुनाहृतः स शालिः स्याद्गरुडापरनामकः । ' यह धान्य विशेष उज्जैन में होता है इसे तक्कीधान कहते हैं ) । ५. तूर्णक, ६. दीर्घशुक ( जिसके बड़े - बड़े शूक ( टूग ) होते हैं ) । ७. गौरधान्य ( सफेद धान ), ८. पाण्डुवर्ण का धान्य, ९. लाङ्गुल, १०. सुगन्धिक ( बासमती ), ११ लोहवाल, १२. सारिवा, १३. प्रमोदक, १४. पनङ्ग, १५. तपनीय ( पीलाधान ) और जो अन्य श्रेष्ठ धान्य होते हैं ये सभी धान्य वीर्य में शीतल, रस और विपाक में मधुर होते हैं । ये अल्प वातवर्धक होते हैं, बँधे हुए अल्प मात्रा में मल को निकालते हैं । स्निग्ध, बृंहण, शुक्र और मूत्र को लाने वाले होते हैं ॥ ८-१० ॥ विमर्श - ये सभी धान्य भिन्न - भिन्न देशों में अपने - अपने नाम से ग्रन्थकर्ता के समय में प्रसिद्ध थे, उन्होंने तत्कालीन नामों को लेकर गुणों का वर्णन किया है, ' सारे देश में होने वाले सभी धान्यों का नाम जानना बहुत ही कठिन है अतः ' ये चान्ये शालयः शुभाः ' से अवशिष्ट सभी धान मात्र के गुर्गों का वर्णन संक्षेप में कर दिया गया है । जिन धानों में शुक ( टूण- कांटा ) होता है उसे ' शूकधान्य ' कहा जाता है । रक्तशालिर्वरस्तेषां तृष्णाघ्नस्त्रिमलापहः । महांस्तस्यानु कलमस्तस्याप्यनु ततः परे ॥ ११ ॥
और भी — इन सभी धान्यों में, लाल धान सबसे श्रेष्ठ होता हैं, यह प्यास को दूर करता और त्रिदोष का शामक है । इससे न्यून गुण ' महाशालि ' का और इससे न्यून गुण ' कलम ' धान का होता है इसके बाद बचे सभी धानों का गुण इन धानों की अपेक्षा अल्प होता है ॥ ११ ॥
यत्रका हायनाः पांसुवाप्यनैषधकादयः । शालीनां शालयः कुर्वन्त्यनुकारं गुणागुणैः ॥१२ ॥
और भी -- यवक ( ' हस्त्रो यवो यवकः ' छोटे यव को ' यवक ' कहते है ), हायन, पांसु, वाप्य, नैषधक आदि शालिधान्य, रक्तशालि के गुण के विपरीत गुणका अनुकरण करने वाले होते हैं ॥ १२ ॥
विमर्श - चक्रपाणि ने ' गुणागुणैः ' का अर्थ इस प्रकार किया है यथा - ' तेषाम् ( रक्तशाली-नाम् ) अगुणैस्तद्गुणविपरीतैः दोषैर्यवकादयोऽनुकारं कुर्वन्ति ततश्च यवकादयस्तृष्णात्रिमलादिकराः स्युः । ' अर्थात् यवकादि धान्य रक्तशालि के विपरीत गुणवाले होते है अतः प्यास और त्रिदोष को बढ़ाने वाले होते हैं | आचार्य गङ्गाधर और योगीन्द्रनाथ सेन ने - ' यवकादि धान्य रक्तशालि के क्रमशः गुण और अगुण ( दोष ) का अनुकरण न्यून मात्रामें करते है ' ऐसा अर्थ किया है । १. ' सुगन्धका लोहबालाः शारिवाख्याः प्रमोदकाः । पतङ्गास्तपनीयाश्च ' ग. । २. ' पांशुवाप्या नैषधकादयः ' इति प । ३. ' गुणागुणैरिति शालीनां रक्तशाल्यादीनां ये गुणास्तृष्णाम्नत्वत्रिमलापहत्वादय:, तेषामगुणै-स्वद्गुणविपरीतैर्दोषैर्यवकादयोऽनुकारं कुर्वन्ति, ततश्च यवकादयस्तृष्णा त्रिमलादिकराः स्युः ' चक्रः ।
पृष्ठ 617
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
५२८ चरकसंहिता & शीतः स्निग्धोऽगुरुः स्वादुखिदोषघ्नः स्थिरात्मकः । पष्टिकः प्रवरो गौरः कृष्ण गौरस्ततोऽनु च ॥ षष्टिकधान्य के गुण - यह शीतवीर्य, स्निग्ध, हल्का, मधुर और त्रिदोषशामक है । शरीर में स्थिरता को पैदा करता है इनमें श्वेतवर्ण का साठी का चावल सबसे श्रेष्ठ होता है । काले और श्वेतवर्ण वाला अर्थात् श्याम वर्ण वाला साठी धान्य उसकी अपेक्षा कम गुणवाला होता है ॥ १३ ॥
विमर्श - यह धान्य ग्रीष्म और वर्षा ऋतु में होता है और करीब ६० दिन में पक जाता है । ' पष्टिकाः पष्टिरात्रेण पच्यन्ते ' इस सिद्धान्त से ही इसका नाम षष्टिक ( साठी ), रखा गया है । अन्य तंत्रों में ' मैष्मिकाः षष्टिका: ', भावप्रकाश में ' गर्भस्था एव ये पार्क यान्ति ते षष्टिका मताः ' से साठी का पाक डन्ठल के भीतर ही होता है । जैसे धान का बाल बाहर लटक जाता है वैसे उसका बाल नहीं लटकता है । ग्रीष्म में इसे बोया जाता है और वरसात में यह तैयार हो जाता है इसी तात्पर्य से ' ग्रैष्मिकाः षष्टिकाः ' कहा गया है । वरकोद्दालकौ चीनशारदोज्ज्वलदर्दुराः । गन्धनाः कुरुविन्दाश्च पष्टिकाल्पान्तरा गुणैः ॥ १४ ॥
और भी - वरक ( कंगुनी ), उद्दालक ( बनकोदो ), चीन ( चीना ), शारद, उज्ज्वल ( धान्य विशेष ), दर्दुर, गन्धन, कुरुविन्द नामक धान्य, षष्टिक धान्य के गुणों से कुछ अल्प गुण वाले होते हैं ॥ १४ ॥
विमर्श -- ये धान्य ग्रीष्म से लेकर वर्षा ऋतु के अन्त तक होते हैं । ये सभी लगभग ६० दिन में तैयार हो जाते हैं इसलिये इन्हें भी षष्टिक कहा जाता है । परन्तु प्रधान षष्टिक से इनके गुण अल्प होते हैं । मधुरश्वाम्लपाकश्च व्रीहिः पित्तकरो गुरुः । बहुमूत्रपुरीषोप्मा त्रिदोषस्त्वेव पाटलः ॥ १५ ॥
- ये धान्य मधुर, अम्लविपाक, पित्तजनक और गुरु होते हैं । पाटलधान्य- यह मूत्र, पुरीष और ऊष्मा को बढ़ाने वाला एवं त्रिदोष को कुपित करने वाला होता है ॥ १५ ॥
सकोरदूषः श्यामाकः कषायमधुरो लघुः । वातलः कफपित्तघ्नः शीतः संग्राहिशोषणः ॥१६॥५
हस्तिश्यामाकनीवारतोयपर्णीगवेधुकाः । प्रशार्तिकाम्भःश्यामाकलौहित्याणुप्रियङ्गवः ॥१७ ॥
मुकुन्दो झिण्टिंगर्मूटी वरुका वरकास्तथा । शिबिरोत्कटजूर्णाह्वाः श्यामाकसदृशा गुणैः ॥ कौरदूष ( कोदो ), श्यामाक ( साँवा ) के गुण - - ये दोनों कषाय और मधुर रस युक्त तथा लघु होते हैं और वान को बढ़ाते हैं । कफ, पित्त को नष्ट करते हैं । वीर्य में शीत हैं, ग्राही और धातुओं के शोषक होते है । हस्तिश्यामा ( बड़ा साँवा ), निवार ( निन्नी का चावल ), तोयपर्णी, गवेधूक, प्रशातिका, अम्भःश्यामा ( जल में पैदा होने वाला साँवा विशेष ), लोहिताणु, प्रियंगु, मुकुन्द, झिण्टी, गर्मूटी, वरुक ( सन का बीज ), वरक, शिविर, उत्कट, जूर्गह ये सभी धान्य साँवा के गुण की भाँति गुण वाले होते हैं ॥ १६-१८ ॥ विमर्श - ये सभी तृण धान्य हैं सुश्रुत ने इसे ' कुधान्य ' कहा है । इनके गुण के विषय में सुश्रुत ने कहा है यथा- ' उष्णाः कषायमधुरा रूक्षाः कटुविपाकिनः । श्लेष्मन्ना बद्धनिष्यन्दा वात-पित्तप्रकोपणाः ॥ कषायमधुरस्तेषां शीतः पित्तापहः स्मृतः । कोद्रवश्च सनीवारः श्यामाकश्च सशा-न्तनुः ॥ कृष्णा रक्ताश्च पीताश्च श्वेताश्चैव प्रियङ्गवः । यथोत्तरं प्रधानाः स्यू रूक्षाः कफहराः स्मृताः ॥ धूली मथुरा शीता स्निग्धा नन्दीमुखी तथा । विशोषी तत्र भूयिष्ठं वरकः समुकुन्दकः ॥ ' इति । ( सु. सू. अ. ४६ ) । १. ' लघुः' यो । २. ' प्रशातिका ' इति पा ० । ३. लौहित्याभ्यः प्रियङ्गवः ' यो । ४. ' मुकुन्दो झिण्टिमुखो वरुका ' ग. ।
पृष्ठ 618
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अन्नपानविध्यव्यायः २७ ] सूत्रस्थानम् ५२६ रूत्तः शीतोऽगुरुः स्वादुर्ब्रहुवातशकृद्यवः । स्थैर्यकृत् सकषायश्च बल्यः श्लेष्मविकारनुत् ॥ रूक्षः कषायानुरसो मधुरः कफपित्तहा । मेदः क्रिमिविषघ्नश्च बल्यो वेणुयवो मतः ॥ २० ॥
जौ -के गुण • जौ रूक्ष शीतल, लघु, मधुर, वायु और मल को अधिक बढ़ाने वाला है । शरीर में स्थिरता पैदा करता है । कषाय होता है । बलवर्धक है । कफजन्य विकार को दूर करता है । बांस से उत्पन्न जौ के गुण - यह रूक्ष, रस में कषायानुरस और मधुर, कफ और पित्त का नाशक, मेढा, कृमि और विष को दूर करने वाला तथा बल्य होता है । १ ९ -२० ॥ विमर्श - जौ गुरु होते हुये भी रूक्ष गुण प्रधान होने से वानवर्धक होता है । यह स्रोतों को शुद्ध करता है इसलिये बल बढ़ाता है । यद्यपि चरक ने जौ को पित्तशामक नहीं लिखा है पर यह मधुर और कपाय रस होने के कारण पित्तशामक होता है । सुश्रुत में जौ को लघु बताया है इसलिये मूल पाठ में ' गुरु ' के स्थान पर ' अगुरु ' पाठ ही उचित है । यह चक्रपाणि का मत है । सुश्रुत में जौ का गुण बताया है, यथा- ' यवः कषायो मधुरो हिमश्च कटुविपाके कफपित्तहारी । व्रणेषुपथ्यस्तिलवच्च नित्यं प्रबद्धसूत्रो बहुवातवर्चाः ॥ स्थैर्याग्निमेवास्वरवर्णकृच्च सपिच्छिलः स्थूल-विलेखनश्च । मेदोमरुत्तहरणोऽतिरूक्षः प्रसादनः शोणितपित्तयोश्च ॥ ' ( सु. सू. अ. ४६ ) । सन्धानक्रुद्वातहरो गोधूनः स्वादुशीतलः । जीवनो बृंहणो वृष्यः स्निग्धः स्थैर्यकरो गुरुः ॥
नान्दीमुखी मधूलीच मधुरखिग्धशीतले । इत्ययं शूकधान्यानां पूर्वो वर्गः समाप्यते ॥
गेहूँके गुण - टूटे हुए स्थानों को जोड़ने वाला, वातशामक, रस में मधुर, वीर्य में शीत, जीवनीय, बृंहण, वृष्य, स्निग्ध और शरीर में स्थिरता पैदा करता है, एवं भारी होता है । ' नान्दी मुख ' और ' मधूली ' ये दोनों मधुर, स्निग्ध और वीर्य में शीतल होते हैं । इस प्रकार शूक धान्य नामक पहला वर्ग समाप्त हुआ ॥ २१-२२ ॥ विमर्श - सुश्रुत में गोधूम का गुण इस प्रकार कहा है, यथा - ' गोधूम उक्तो मधुरो गुरुश्च बल्यः स्थिरः शुक्ररुचिप्रदश्च । स्निग्धोऽतिशीतोऽनिलपित्तहन्ता संधान कृच्छ्रलेष्मकरः सरश्च ॥ ' ( सु. सू. अ. ४६ ) नान्दीमुखी और मधूली इन दोनों को सुश्रुत ने कुधान्य में गिना है । चरक ने इन्हें गेहूं का ही भेद माना हैं 1 अथ शमीधान्यवर्गः-कषायमधुरो रूक्षः शीतः पाके कटुर्लघुः । विशेदः श्लेष्मपित्तघ्नो मुद्गः सूप्योत्तमो मतः ॥२३ ॥
२. शमीधान्य वर्ग ( Class af Pulses or Di - cotyledons ) गुण - मूँग, कषाय, मधुर, रूक्ष, शीतवीर्य, विपाक में कटु, हल्का, विशद, कफ, पित्त नाशक और दालों में सबसे उत्तम होता है ॥ २३ ॥
* वृष्यः परं वातहरः खिग्धोष्णो मधुरो गुरुः । बल्यो बहुमलः पुंस्त्वं माषः शीघ्रं ददाति च ॥ उड़द के गुण – उड़द उत्तम, शुक्रवर्धक, वातनाशक, स्निग्ध, उष्णवीर्य, मधुर रस, गुरु, बलवर्धक, मल - मूत्र अधिक उत्पन्न करने वाला और पुंस्त्व शक्ति को शीघ्र ही बढ़ाने वाला होता है ॥ २४ ॥
विमर्श - ' माषो गुरुभिन्नपुरीषमूत्रः स्निग्धोष्णवृष्यो मधुरोऽनिलघ्नः । सन्तर्पणः स्तन्यकरो विशे-षाद्बलप्रदः शुक्रकफावहश्च ॥ ' ( सु. सू. अ. ४६ ) के अनुसार भी उड़द वृष्य होता है । वृष्य तीन प्रकार का माना गया है - ' शुक्रस्रुतिकरं किञ्चित् किञ्चिच्छुकविवर्धनम् । स्रुतिवृद्धिकरं किञ्चित् त्रिविधं वृष्य-मुच्यते ॥ ' यहाँ पर ' परं वृष्यः ' कहने का तात्पर्य यह है कि उड़द शुक्र को निकालता तथा बढ़ाता १. ' इत्येवं ' ग. । २. श्लेष्मपित्तप्रशमनः " ग. । ३४ च ० सं ०
पृष्ठ 619
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
५३० चरकसंहिता है । इसी तरह स्निग्ध, उष्ण, मधुर गुण वाला उड़द वातशामक स्वभाव से ही होगा, पर वातहर कहने का मतलब यह है कि उड़द विशेष रूप से वायु को दूर करता है । राजमाषः सरो रुच्यः कफशुक्राम्लपित्तनुत् । तत्स्वादुर्वातलो रूक्षः कषायो विशदो गुरुः ॥ राजमाष के गुण - यह सर ( विरेचक ), भोजन में रुचि पैदा करने वाला, कफ शुक्र-हर और अम्लपित्त रोग का नाशक होता है । यह मधुर, वातवर्धक, रूक्ष, कषाय, विशद और गुरु होता है || २५ | उष्णाः कषायाः पाकेऽम्लाः कफशुक्रानिलापहाः । कुलत्था ग्राहिणः कासहिक्काश्वासार्शसां हिताः ॥ कुल्थी के गुण - यह वीर्य में उष्ण, रस में कषाय, विपाक में अम्ल, कफ, शुक्रहर और वातनाशक एवं संग्राहक है । कास, हिचकी, श्वास और बवासीर के रोगियों के लिये हितकारी होता है || २६ ॥ मथुरा मधुराः पाके ग्राहिणो रूक्षशीतलाः । मकुष्ठकाः प्रशस्यन्ते रक्तपित्तज्वरादिषु ॥ २७ ॥
कुष्ठ ( मोठ ) के गुण यह रस और विपाक में मधुर, संग्राहो, गुण में रूक्ष और वीर्य में शीत होता है । रक्तपित्त और ज्वर आदि रोगों में पथ्य के लिये मकुष्ठ श्रेष्ठ होता है ॥ २७ ॥
चणकाश्च मसूराश्च खण्डिकाः सहरेणवः । लघवः शीतमधुराः सकषाया विरूक्षणाः ॥२८ ॥
पित्तश्लेष्मणि शस्यन्ते सूपेप्वालेपनेषु च । तेषां मसूरः संग्राही कलायो वातलः परम् ॥२ ९ ॥ चना आदि के गुण – चना, मसूर, खंडिका ( खेसारी लतरी ), हरेणु ( मटर ) दाल लघु, दीर्य में शीत, रस में मधुर और कषाय सेवन करने पर शरीर में रूक्षता उत्पन्न करने वाला, पित्त, कफ, जन्य रोगों में सूप के लिये या शरीर में लेप करने के लिये उत्तम होती है । इनमें
मसूर की दाल संग्राही होती है । और मटर की दाल वातवर्धक होती है ॥ २८-२२ ॥
त्रिग्धोष्णो मधुरस्तिक्तः कषायः कटुकस्तिलः । त्वच्यः केश्यश्च बल्यश्च वातघ्नः कफपित्तकृत् ॥ तिल के गुण - तिल स्निग्ध, उग, मधुर, तिक्त, कषाय, कटुरस वाला है | त्वचा और केश के लिये लाभकारी, बलवर्धक, वातनाशक, कफ एवं पित्त को बढ़ाने वाला होता है ॥ ३० ॥
मधुराः शीतला गुन्यों बलघ्न्यो रूक्षणात्मिकाः । सस्नेहा बलिभिर्भोज्या विविधाः शिम्विजातयः ॥ अनेक प्रकार के शिम्बीधान्यों के गुण - अनेक प्रकार के शिम्बी धान्य जिनका नामतः यहाँ वर्णन नहीं है वे सभी धान्य मधुर, शीतल गुरु, बलनाशक और शरीर में रूक्षता पैदा करने वाले होते हैं । बलवान पुरुष को इन अनेक जातियों के शिम्बी धान्यों को घी के साथ खाना चाहिये || ३१ ॥ शिम्बी रूक्षा कषाया च कोष्ठे वातप्रकोपिनी । न च वृष्या न चचुष्या विष्टभ्य च चिपच्यते ॥ शिम्बी धान्य के गुण - • रूक्ष, रस में कषाय, कोष्ठ में वात को कुपित करने वाला होता है | यह वृष्य नहीं होता और न नेत्र के लिये लाभकारी होता है । कब्जियत करके पचने वाला होता है ॥ ३२ ॥
आढकी कफपित्तघ्नी वातला, कफवातनुत् । अवल्गुजः सैडगजो, निष्पावा वातपित्तलाः ॥
अरहर के गुण – अरहर की दाल कफ और पित्त को दूर करती है । वातकारक है । वकुची कफबात नाशक है । चकवड़ के वीज और सेम के बीज, वात, पित्त को बढ़ाने वाले होते हैं || ३३ || विमर्श - यद्यपि वकुची और चकवड़ धान्य वर्ग में नहीं आते हैं फिर भी इनकी छोमी होती है । यहाँ इसी सादृश्य से इनके गुण का निर्देश किया गया है । १. ' रूक्षश्चैव कषायश्च वातलः ष्मपित्तहा । विष्टम्भी चाप्यवृष्यश्च राजमाषः । ' इति पाठान्तरम् । २. ' कफशुक्राम्लपित्तकृत् ' ग.
पृष्ठ 620
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अन्नपानविध्यध्यायः २७ ] सूत्रस्थानम्
काकाण्डोमा ( ला ) त्मगुप्तानां माषवत् फलमादिशेत् ।
द्वितीयोऽयं शमीधान्यवर्गः प्रोक्तो महर्षिणा ॥ ३४ ॥
काकाण्डोल ( सुअर सेम जो काली, लम्बी और ( सामान्य कैवाच का फल ) इन दोनों का गुण उड़द के धान्य का दूसरा वर्ग समाप्त हुआ ॥ ३४ ॥
अथ मांसवर्गः— ५३१ चौड़ी रोम वाली होती है ), आत्मगुप्ता समान ही होता हैं इस प्रकार यह शमी गोखराश्वतरोष्ट्राश्वद्वीपिसिंहर्त्तवानराः । वृको व्याघ्रस्तरतुश्च बभ्रुमार्जारमूषिकाः ॥ ३५ ॥
लोपाको जम्बुकः श्येनो वान्तादश्वाषवायसौ । शशघ्नी मधुहा भासो गृधोलूककुलिङ्गकाः ॥
धूमिका कुररचेति प्रसहा मृगपक्षिणः । ३. मांस वर्ग ( Class of Fleshes ) प्रसह पशु - पक्षी गण गौ, गदहां, खच्चर, ऊँट, घोड़ा, चित्ता, सिंह, भालू, वानर, भेड़िया, वाघ, तर, बनू ( अधिक बाल वाले पहाड़ी कुत्ते या नेवला ), बिल्ली, चूहा, लोमड़ी, गीदड़, बाज, वान्ताद ( सामान्य कुत्ता ), चाष ( नीलकण्ठ ), कौवा, शशनी ( यह चोल के आकार का बड़े बड़े पैर और नख वाली होती है और अपने प्रहार से खरहे को उठा ले जाती है ), मधुहा ( यह भी एक पक्षी का भेद है ), भास ( यह श्वेत शिखा वाला गिद्ध का भेद है जो गौ के झुण्ड के पास विशेष रूप से रहना है ), गिद्ध, उल्लू, कुलिंग ( घर में रहने वाली गौरैया ), धूमिका ( जंगल में रहने वाली गौरैया ), कुरर ये मृग और पक्षीगण प्रसह कहे जाते हैं अर्थात् अपने भोजन को दूसरे से छीन कर खाते हैं ॥ ३५-३६ ॥ श्वेतः श्यामश्चित्रपृष्ठः कोलकः काकुलीमृगः ॥ ३७ ॥
कूर्चिकाचिलो भेको गोधा शल्लकगण्डकौ । कदली नकुलः श्वाविदिति भूमिशयाः स्मृताः ॥
भूमिशय ( विल में रहनेवाले ) जीव - सफेद, साँवले रंग के, जिसके पीठ पर चित्रित रेखायें रहती है तथा काले इस प्रकार चार प्रकार के काकुली मृग ( यह एक सांप का भेद है ), कृचिका ( अन्धा सर्प ) चिलट, भेक ( मेढक ) गोह, साही, गण्डक ( पीले रंग का गोह ), कदली ( बनबिलार ), नेवला, श्वाविद ( साही का भेद ) ये सब भूमिशय कहे जाते हैं ॥ ३७-३८ ॥ सृमरश्चमरः खड्गो महिषो गवयो गजः । न्यङ्कुर्वराहश्वानूपा मृगाः सर्वे रुरुस्तथा ॥ ३ ९ ॥ वर्ग सुमर ( वनैले बड़े सूकर ), चमरी गौ, गेडा, भैंस, गवय, हाथी, न्यङ्कु आनूप ( हरिण ), वराह ( सामान्य सूअर ), और रुरु ( एक प्रकार का मृग है जो शरद्काल में अपने भृंग को छोड़ देता है ), ये सभी मृग आनूप वर्ग के कहे जाते है ॥ ३ ९ ॥ विमर्श - रुरु का लक्षण - ' विकटबहुविषाणः शम्बराकारदेहः, सलिलतटचरत्वाच्छानरेभ्यो विचित्रः । त्यजति शरदि गाणीत्यतोऽसौ रुहः स्यात् पृथुलमृगविशेषः प्रायशश्चेदिदेशे ॥ ' इति ( चरकोपस्कार ) | कूर्मः कर्कटको मत्स्यः शिशुमारस्तिमिङ्गिलः । शुक्तिशङ्खोद्रकुम्भीरचुलुकीम करादयः ॥४० ॥
इति वारिशयाः प्रोक्ता-वारिशय वर्ग कछुवा, केकड़ा, मछली, शुशमार, तिमिङ्गिल नामक समुद्री बड़ी मछली, शीप, शंख, उद्र ( जल विलाव ), कुम्भीर ( मछली भेद ), चुलुकी ( बड़ी सूंस ), मगर आदि वारिशय कहे जाते हैं ॥ ४० ॥
१. ' धूमीका ' इति पा. । २. ' काकल: ' इति पा ० ।