चरक संहिता हिन्दी भाष्य — पृष्ठ 681–690
चरक संहिता हिन्दी भाष्य · Chaukhamba · पृष्ठ 681–690
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५६२ चरकसंहिता दशप्राणायतनिकस्तथाऽर्थेदशमूलिकः । द्वावेतौ प्राणदेहार्थों प्रोक्तौ वैद्यगुणाश्रयौ ॥ ४३ ॥
औषधस्वस्थनिर्देशकल्पनारोगयोजनाः । चतुष्काः षट् क्रमेगोक्ताः सप्तमश्चान्नपानिकः || ४४ || चाय संग्रहाध्यायाविति त्रिंशकमर्थवत् । श्लोकस्थानं समुद्दिष्टं तन्त्रस्यास्य शिरः शुभम् ॥ सूत्र स्थान के अध्याओं का संग्रह १. दीर्घञ्जीवितीय, २. अपामार्गतण्डुलीय, ३. आरग्ब-धीय, ४. विरेचनशताश्रितीय ये चार अध्याय औषध से संबंध रखते हैं । ५. मात्राशितीय, ६. तस्याशितीय, ७. नवेगान्धारणीय, ८ इन्द्रियोपक्रमणीव ये ४ अध्याय स्वस्थ मनुष्यों के पालन करने योग्य नियमों का उपदेश देते हैं । ९. खुड्डाकचतुष्पाद, १०. महाचतुष्पाद, ११. तिषीय, १२. वातकलाकलीव ये चार अध्याय चिकित्सा में कर्त्तव्यों का निर्देश करते हैं । १३. स्नेहाध्याय, १४. स्वेदाध्याय, १५. उपकल्पनीय, १६. चिकित्सा - प्राभृतीय, ये ४ अध्याय औषध - कल्पना सम्बन्धी नियमों का निर्देश करते हैं । १७. कियन्तः शिरसीय, १८. त्रिशोफीय, १ ९. अष्टोदरीय, २०. महारोगाध्याय ये ४ अध्याय रोग के विषय में संख्या आदि का निर्देश करते हैं । २१. अष्टौनिन्दितीय, २२. लङ्घनबृंहणीय, २३ मन्तर्पणीय, २४. विविशोणितिक इन ४ अध्याओं में विभिन्न योजनायों की व्याख्या की गई है । २५. यज्जःपुरुषीय, २६. आत्रेय-भद्रकाप्यीय, २७. अन्नपानविधि, २८. विविधाशितपीतीय, इन अध्यायों में अन्नपान सम्बन्धी नियम बताये गये है । २ ९. दशप्राणायतनिक, ३०. अर्थेदशनहामूलीय ये दो अध्याय प्राण और शरीर के विषय में और वैद्य के गुण के संबंध में कहे गये हैं । औषध, स्वस्थ, निर्देश, कल्पना, रोग, योजना ये ६ वर्ग चार - चार अध्यायों के क्रम से बताये गये हैं । ७ वां वर्ग जो ४ अध्यायों का है वह अन्नपान संबंधी है । अन्त के दो अध्याय संग्रह अध्याय हैं जिनमें विभिन्न विषयों का संग्रह किया गया है । इस प्रकार ३० अध्याय वाला सूत्रस्थान कह दिया गया है । यह सूत्रस्थान इस संहिना का शिर ( उत्तम ) स्थान है अर्थात् जिस प्रकार शरीर में शिर ज्ञान और इन्द्रियों का केन्द्र है उसी प्रकार इस संहिता में यह स्थान चिकित्सासंबन्धी सभी प्रकार के ज्ञान, क्रिया, अभ्यास के लिये उत्तम माना गया है ॥ ३६-४५ ॥ चतुष्काणां महार्थानां स्थानेऽस्मिन् संग्रहः कृतः ।
श्लोकार्थः संग्रहार्थश्व
श्लोकस्थानमतः स्मृतम् ॥ ४६ ॥
सूत्रस्थान की निरुक्ति - - इस सूत्रस्थान मे बड़े - बड़े अर्थों वाले चार चार अध्यायों में ७ वर्गों का संग्रह किया गया है | श्लोकार्थ अर्थात् श्लोक का अर्थ वही है जो संग्रह का अर्थ है अर्थात् इस स्थान में विभिन्न विषयों का संग्रह किया गया है अतः इस स्थान का नाम सूत्रस्थान है ॥ ४६ ॥
ज्वराणां रक्तपित्तस्य गुल्मानां मेहकुष्ठयोः । शोषोन्मादनिदाने च स्यादपस्मारिणां च यत् ॥ इत्यध्यायाष्टकमिदं निदानस्थानमुच्यते । निदान स्थान के अध्यायों का संग्रह - १. ज्वर निदान, २. रक्तपित्त निदान, ३. गुल्म निदान, ४. प्रमेह निदान, ५. कुष्ठ निदान, ६. शोष निदान, ७. उन्माद निदान और, ८. अपस्मार निदान इन ८ अध्यायों से युक्त निदानस्थान कहा गया है ॥ ४७ ॥
रसेषु त्रिविधे कुक्षौ ध्वंसे जनपदस्य च ॥ ४८ ॥
त्रिविधे रोगविज्ञाने स्रोतः स्वपि च वर्तने । रोगानीके व्याधिरूपे रोगाणां च भिषग्जिते ॥ अष्टौ विमानान्युक्तानि मानार्थानि महर्षिणा । विमान स्थानों के अध्यायों का संग्रह - १. रस विमान, २. त्रिविक्कुक्षीय, ३. जनपदोद्ध्वंस-नीय, ४. त्रिविधरोगविशेषविज्ञानीय, ५. स्रोतोविमान, ६. रोगानीकविमान, ७ व्याधितरूपीय, १. ' त्रिंशत्कमर्थवत् ' इति पा ० ।
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अर्थदशमहामूलीय ध्याय: ३० ] सूत्रस्थानम् ५६३ ८. रोगभिषग्जितीय ये आठ अध्याय मानज्ञान के लिए महर्षि आत्रेय ने विमान स्थान में बताये हैं || ४८-४९ ॥ कतिधापुरुषीयं च गोत्रेणातुल्यमेव च ॥ ५० ॥
खुड्डिका महती चैव गर्भावक्रान्तिरुच्यते । पुरुषस्य शरीरस्य विचयौ द्वौ विनिश्चितौ ॥५१ ॥
शरीर संख्या सूत्रं च जातेरष्टममुच्यते । इत्युद्दिष्टानि मुनिना शारीराग्यत्रिसूनुना ॥ ५२ ॥
शारीर स्थान के अध्यायों का संग्रह - १. कतिधापुरुषीय, २. अतुल्यगोत्रीय, ३. खुड्डिका-गर्भावक्रान्ति, ४. महती गर्भावक्रान्ति ५ पुरुषविचय ६. शरीरविचय, ७. शरीरसंख्या, ८. जातिसूत्रीय ये आत्रेय मुनि ने ८ अध्याय शरीर स्थान में बताये हैं ॥ ५०–५२ ॥ वर्णस्वरीयः पुष्पाख्यस्तृतीयः परिमर्शनः । चतुर्थ इन्द्रियानीकः पञ्चमः पूर्वरूपिकः ॥। ५३ ॥
कतमानिशरीरीयः पन्नरूपोऽप्यवाक्शिराः । यस्यश्यावनिमित्तश्च सद्योमरण एव च ॥ ५४ ॥
ज्योतिरिति ख्यातस्तथा गोमय चूर्णवान् । द्वादशाध्यायकं स्थानमिन्द्रियाणामिति स्मृतम् ॥ इन्द्रिय स्थान के अध्यायों का संग्रह - १. वर्णस्वरीय, २. पुष्पितक, ३. परिमर्शनीय, ४. इन्द्रियानीक ५. पूर्वरूपीय, ६. कऩमानिशरीरीय, ७. पन्नरूपीय, ८. अवाक्शिरसीय, ९. यस्य-श्याचनिमित्तीय, १०. सथोमरणीय, ११. अणुज्योतीय, १२. गोमयचूर्णीय ये १२ अध्याय इन्द्रिय स्थान में कहे गये है ॥ ५३-५५ ॥
अभयामलकीयं च प्राणकामीयमेव च । करप्रचितकं वेदसमुत्थानं रसायनम् ॥ ५६ ॥
संयोगशरमूलीय मासिक्ततीरकं तथा । माषपर्णभृतीयं च पुमाञ्जातबलादिकम् ॥ ५७ ॥
चतुष्कद्वयमप्येतदध्यायद्वयमुच्यते । रसायनमिति ज्ञेयं वाजीकरणमेव च ॥ ५८ ॥
ज्वराणां रक्तपित्तस्य गुल्मानां मेहकुष्ठयोः । शोषान्मादेऽप्यपस्मारे क्षतशोथादरार्शसाम् ॥ ग्रहणीपाण्डुरोगाणां श्वासकासातिसारिणाम् । छर्दिवी सपतृष्णानां विषमद्यविकारयोः || ६० || द्विवणीयं त्रिममयमूरुस्तम्भिकमेव च । वातरोगे वातरक्ते योनिव्यापत्सु चैव यत् ॥ ६१ ॥
त्रिंशचिकित्सितान्युक्तानि -चिकित्सा स्थान के अध्यायों का संग्रह I • चिकित्सा स्थान में सर्वप्रथम, १. रसायन प्रकरण का एक अध्याय है, जिसमें ४ पाद हैं - १. अभयामलकीय रसायन, २. प्राणकामीय रसायन, ३. करप्रचितीय रसायन, ४. आयुर्वेद समुत्थानीय रसायन । २. दूसरा अध्याय वाजीकरण का है इसमें भी ४ पाद हैं - १. संयोगशरमूलोय वाजीकरण, २. आसक्तक्षीरीय वाजीकरण, ३. माषपर्ण-_भृतीय वाजीकरण, ४. पुमाञ्जातबलादिक वाजीकरण ये ४ पाद हैं । ३. ज्वर, ४. रक्तपित्त, ५. गुल्म, ६. प्रमेह, ७. कुष्ठ, ८. शोष, ९. उन्माद, १०. अपस्मार, ११. क्षतक्षीण, १२. शोफ, १३. उदर, १४. अर्श, १५. ग्रहणी, १६. पाण्डु रोग, १७. हिक्का श्वास, १८. कास, १ ९. अनिसार, २० छर्दि, २१. वीसर्प, २२. तृष्णा, २३. विष, २४. मद्यविकार ( मदात्यय ), २५ द्वित्रगीय, २६. त्रिममय, २७. ऊरुस्तम्भ, २८. वातव्याधि, २ ९. वातरक्त, ३०. योनिव्यापद् | ये ३० अध्याय चिकित्सा स्थान में कहे गये है ॥ ५६ - ६१ ॥
अतः कल्पान् प्रचेचमहे । फलजीमूतकेचवाकुकल्पो धामार्गवस्य च ॥ ६२ ॥
पञ्चमो वत्सकस्योक्तः षष्ठश्च कृतवेधने । श्यामात्रिवृतयोः कल्पस्तथैव चतुरङ्गुले ॥ ६३ ॥
तिल्वकस्य सुधायाश्च सप्तलाशङ्खिनीषु च । दन्तीद्रवन्त्योः कल्पश्च द्वादशोऽयं समाप्यते ॥ १. ‘ तथैव चेन्द्रियानीकः पूर्वरूपिक एव च ' इति पा. । २. ' परं शृणु ' ग. । ३६ च ० सं ०
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५६४ चरकसंहिता कल्पस्थान के अध्यायों का संग्रह • इसके बाद कल्पस्थान के अध्यायों को कहते हैं – १. फल ( मदन फल ), २. जीमूतक ( देवदाली ), ३. इक्ष्वाकु ( कडुई तरोई ), ४. धामार्गव ( बड़ी तरोई ), ५. वत्सक ( इन्द्रजौ ) ६. कृतवेधन ( कोशातकी ), ७. श्यामा ( काली निशोध और सफेद निशोध ), ८. चतुरंगुल ( अमलतास ), ९. तिश्वक, १०. सुधा ( सेहुँड़ ), ११. सप्तला, और शंखिनी, १२. दन्नी और द्रवन्ती इन औषधों के विभिन्न कल्पनाओं को बताने वाले ये १२ अध्याय कल्पस्थान में कहे गये हैं ॥ ६२-६४ ॥
कल्पना पञ्चकर्माख्या बस्तिसूत्री तथैव च ।
स्नेहव्यापदिकी सिद्धिनैत्रव्यापदिकी तथा ॥ ६५ ॥
सिद्धिः शोधनयोश्चैव बस्तिसिद्विस्तथैव च ।
प्रासृती मर्मसंख्याता सिद्धिर्ब्रस्त्याश्रया च या ॥ ६६ ॥
फलमात्रा तथा सिद्धिः सिद्धिश्चोत्तरसंज्ञिता ।
सिद्धयो द्वादशैवैतास्तन्त्रं चासु समाप्यते ॥ ६७ ॥
सिद्धिस्थान के अध्य यों का संग्रह - १. कलनाध्याय, २. पंचकर्मीयाध्याय, ३. बस्तिसूत्रीय, ४. स्नेहव्यापदिकी, ५. नेत्रवस्तिव्यापदिकी, ६. वमनविरेचनव्यापदिकी, ७ बस्तिव्यापदिकी, ८. प्रासृतयौगिकी, ९. त्रिमर्मीय, १० बस्तिसम्बन्धी, ११. फलमात्राबस्ति, १२. उत्तरबस्ति ये १२ अध्याय सिद्धि स्थान में बताये गये हैं और यहीं पर संहिता की समाप्ति हो जाती है ॥६६-६७ ॥ स्वे स्वे स्थाने तथाऽध्याये चाध्यायार्थः प्रवच्यते । तं यात्सर्वतः सर्वं यथास्वं ह्यर्थसंग्रहात् ॥ ६८ ॥
अध्यायार्थ - अपने - अपने स्थान के विषयों और अध्यायों के विषयों का निर्देश अपने - अपने अध्याय के अन्त में किया जायगा । सभी स्थानों में अध्यायों के विषयों का संग्रह कर और अध्यायों के विषयों को उन्हीं के अनुसार संक्षिप्त कर कहे हैं ॥ ६८ ॥
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पृच्छा तन्त्राद्यथाम्नायं विधिना प्रश्न उच्यते ।
प्रश्नार्थी युक्तिमांस्तस्य तन्त्रेणैवार्थनिश्चयः ॥ ६ ९ ॥
प्रश्न का लक्षण - शास्त्र में जहाँ जिस स्थान पर जिस रूप उसी रूप में प्रश्नकर्त्ताओं का पूछना प्रश्न कहा जाता है । में विषय कहा गया हो उसे प्रश्नार्थ है का लक्षण - युक्तिपूर्वक प्रश्न के अर्थों का, शास्त्र के द्वारा ही जो निश्चित होता उसे प्रश्नार्थ कहते हैं अर्थात् उचित प्रश्न को शास्त्रयुक्ति से निर्णय करना ही प्रश्नार्थ कहा जाता है ॥ १. ' चकागेऽत्र अध्यायार्थ इत्यनन्तरं योज्यः तेन स्थानार्थ इति समुच्चीयते, ततश्च स्थानान्ते स्थानार्थसंग्रहमध्यायान्तेऽध्यायार्थसंग्रहं यथाक्रमेण वक्ष्यतीत्यर्थः ' शिवदाससेनः । २. ' तं सर्वमिति तन्त्रार्थ स्थानार्थमध्यायार्थं च; अर्थसंग्रहादिति ल्यब्लोपे पञ्चमी, तन्त्रादीना-मर्थं संगृह्य संक्षिप्येत्यर्थः सर्वतोऽनवशेषतः यथास्वमित्यनेन यो यस्यार्थस्तस्य संग्रहं कृत्वा तन्त्रार्थं स्थानार्थमध्यायार्थं चाशेषतो ब्रूयादित्यर्थः ' शिवदाससेनः । ३. ' यथार्थाद्ध यनु संग्रहात् ' इति पा. । ४. ' तन्त्रादिति तन्त्रमारभ्य यथाम्नायं यथाक्रमं विधिना सामान्यविशेषप्रकारेण पूर्वापरविरो धादिदोषशून्येन वा पृच्छा प्रश्न उच्यत इत्यर्थः । प्रश्नार्थं विवृणोति - प्रश्नार्थ इत्यादि । तस्य प्रश्नस्य तन्त्रेण शास्त्रेणार्थनिश्चयो यः स प्रश्नार्थः प्रश्नप्रयोजनमुच्यते । युक्तिमानिति उपपत्तिमानित्यर्थः ' शविदाससेनः ।
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अर्धेदशमहामुनीयाध्यायः ३० ] सूत्रस्थानम्
निरुक्तं तन्त्रणात्तन्त्रं, स्थानमर्थप्रतिष्ठया ।
अधिकृत्यार्थमध्यायनामसंज्ञा प्रतिष्ठिता ॥ ७० ॥
इति सर्वं यथाप्रश्नमष्टकं संप्रकाशितम् ।
कारुर्येन चोक्तस्तन्त्रस्य संग्रहः सुविनिश्चितः ॥ ७१ ॥
५६५ तंत्रादि शब्दों की निरुक्ति - १. तंत्रण ( नियमन ) करने के कारण ही तंत्र कहा जाता है । २. विषयों को उचित स्थान पर जहाँ रखा जाता है उसे स्थान कहते हैं । किसी विशेष विषय को लेकर अध्यायों का नामकरण किया जाता है । इस तरह पहले ३० के गद्य में जो ८ प्रश्न किये गये हैं उनका भाव प्रकाशित कर दिया है और इस विषय में जो शास्त्रों का निश्चित संग्रह है वह भी सम्पूर्ण रूप से कह दिये गये हैं ॥ ७०-७१ ॥
सन्ति पाल विकत्पाताः संक्षोभं जनयन्ति ये ।
वर्तकानामिवोत्पाताः सहसैवाविभाविताः ॥ ७२ ॥
तस्मात्तान् पूर्वसंजल्पे सर्वत्राष्टकमादिशेत् ।
परावर परीक्षार्थं तत्र शास्त्रविदां बलम् ॥ ७३ ॥
शब्दमात्रेण तन्त्रस्य केवलस्यैकदेशिकाः ।
भ्रमन्त्यल्पचलास्तन्त्रे ज्याशब्देनेव वर्तकाः ॥ ७४ ॥
उत्तम, हीन वैद्य की परीक्षा - ऐसे भी वैद्य होते हैं जो पाल्लविक होते हैं अर्थात् कुछ - कुछ शास्त्रों का ज्ञान रखते हुये सहसा सम्भावना न होने पर भी जिस प्रकार बटेर पक्षी पेड़ पर बैठे हुए हों और वे सहसा एक साथ उड़ जायँ तो उससे जो सहसा शब्द उत्पन्न होता है उससे भव हो जाता है । उसी प्रकार ये पलग्ग्राही वैद्य जनता में भय उत्पन्न करनेवाले होते हैं या साधु सच्चरित्र वैद्य को वादविवाद के समय सहसा भय पैदा कर देते हैं । ऐसे कपटी वैद्यों के साथ वादविवाद करने में सर्वप्रथम सभी जगहों पर इन बतलाये हुये ८ प्रश्नों के द्वारा इन्हें दबा देना चाहिए और कौन चिकित्सक श्रेष्ठ है, कौन चिकित्सक श्रेष्ठ नहीं हैं इसकी परीक्षा के लिये भी इन ८ प्रश्नों का प्रयोग किया जाता है । जिस चिकित्सक के पास शास्त्र का बल रहता है वह इन ८ प्रश्नों के उत्तरों के देने में बलवान् होता है । जो चिकित्सक शास्त्र के किसी एक भाग को जानकर चिकित्सा करते हैं वे शास्त्र ज्ञान में और चिकित्सा कर्म में अल्प वल होते हैं । ऐसे चिकित्सक जिस प्रकार धनुष का टंकार सुन कर बटेर पक्षी भाग जाते हैं उसी भाँति शब्द का आडम्बर सुनकर वे अल्पज्ञ चिकित्सक भाग जाते है ॥ ७२-७४ ॥ १. ' निबन्ध ' ग. । २. ' तन्त्रणादिति व्युत्पादनात् अर्थप्रतिष्ठयेति प्रधानभूतार्थावस्थानातुः एतेन तन्त्र्यते व्युत्पा-द्यनेऽनेनेति तन्त्रम्, अर्थाः प्रतिष्ठन्त्यस्मिन्निति स्थानमिति निरुक्तिर्दशिता भवति ' शिवदासः । ' एताश्च योगरूढाः संज्ञाः तेन अतिप्रसंगो न वाच्यः ' चक्रः । ३. ' अधिकृत्येति अधिकारिणं कृत्वा, अर्थ दीर्घजीवितादिकम्, अध्यायनामसंज्ञा अध्यायरूपनाम-संज्ञा, नामसंज्ञा च योगरूडा संशोच्यते, चक्रः । ४. ' अध्यायो नाम संज्ञा प्रकीतिता ' यो । ५. ' पालविकोपेताः ' ग. | ' तन्त्रस्यैकदेशविदः सन्तो निखिलशास्त्रपण्डितमानिनो दम्भनः प्रौढोक्तिकारिणः वृक्षपलववदतिविस्तरयावाद्यपेताः ' गङ्गाधरः । ६. ' तस्मात्तु पूर्वकं जल्पे ' ग. । ७. ' नत्र शास्त्रविदां वलमिति शास्त्रविद एव प्रश्नाष्टकं जानन्ति न पालविका: ' चक्रः; ' शास्त्रविदां वरः ' ग. । समग्रस्य । ८. केवलस्य
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५६६ चरकसंहिता
पशुः पशूनां दौर्बल्यात् कश्चिन्मध्ये वृकायते ।
सत्यं वृकमासाद्य प्रकृतिं भजते पशुः ॥ ७५ ॥
तद्वदज्ञोऽज्ञमध्यस्थः कश्चिन्मौखर्यसाधनः ।
स्थापयत्याप्तमात्मानमाप्तं त्वासाद्य भिद्यते ॥ ७६ ॥
और भी - कोई धूर्त पशु पशुओं की दुर्बलता से उनके बीच में भेड़िये की भाँति उद्दण्ड होकर घूमता - फिरता है । परन्तु जब सच्चा भेड़िया सामने आ जाता है तो अपने स्वाभाविक रूप में हो जाता है और अपने समान पशुओं की भाँति बन जाता है । उसी भाँति अल्पज्ञ वैद्य मूर्खों के बीच में बैठा हुआ अपने वागाडम्बर द्वारा अपने को आप्त सिद्ध करता है पर यदि सच्चा आप्त वैद्य आ जाता है तो शीघ्र ही उसका भेद खुल जाना है और वह भाग जाता है ॥ ७५-७६ ॥
वर्णाभिरबुद्धिरबहुश्रुतः ।
किं वै वच्यति संजल्पे कुण्डैभेदी जडो यथा ॥ ७७ ॥
और भी - जिस प्रकार बुड्ढा नेवला ऊन से चारों ओर से लिपटा हुआ हो तो उसे जनता नेवला नहीं समझती है । पर यदि वह बोल दे तो यह प्रत्यक्ष हो जाता है कि भेड़ नहीं है बल्कि नेवला हैं, उसी भाँति बुद्धिहीन शास्त्रों को अच्छी प्रकार न जाननेवाला मूर्ख चिकित्सक नीच कुल में उत्पन्न मूर्ख के समान ज्ञानवान् वैद्य के समक्ष क्या कर सकता है अर्थात् कुछ नहीं कह सकता और यदि बोलता है तो उसकी मूर्खता का प्रकाशन हो जाता है ॥ ७७ ॥
सद्वृत्तैर्न
विगृह्णीयाद्भिपगल्पश्रुतैरपि ।
हन्यात् प्रश्नाष्टके नादावितरांस्त्वाप्तमानिनः ॥ ७८ ॥
वृत्त अर्थात् इससे भिन्न अर्थात् अल्प सज्जन वैद्य का अपमान न करें । - शास्त्र ज्ञान में पूर्ण न होते हुये भी जो वैद्य सचरित्र है ऐसे सचरित्र वैद्यों के साथ विवाद नहीं करना चाहिये और ज्ञानी हो, अथवा अधिक शास्त्र ज्ञाता हो, अपने को उत्तम वैद्य होने का उसे सर्वप्रथम इन ८ प्रश्नों द्वारा पराजित कर देना चाहिये ॥ ७८ ॥
दम्भिनो मुखरा ह्यज्ञाः प्रभूताबद्ध भाषिणः । अभिमान रखता हो तो प्रायः, प्रायेण सुमुखाः सन्तो युक्तात्पभाषिणः ॥ ७ ९ ॥
तत्त्वज्ञानप्रकाशार्थमहङ्कारमनाश्रितः ।
स्वल्पौधाराज्ञमुखरान्मर्षयेन्न विवादिनः ॥ ८० ॥
मूर्ख उदण्ड वैद्य को परास्त करें । जो चिकित्सक मूर्ख होता है वह मुखर ( अधिक वक्ता ) दम्भी ( आडम्बर रचने वाला ) और प्रायः विना प्रकरण के बोलने वाला होता है । जो सज्जन होते हैं वह प्रायः कम बोलते हैं, प्रसन्न रहते हैं, यदि बोलते हैं तो युक्तियुक्त वचन कहते हैं और वे सच्चा ज्ञान प्राप्त करने के लिए या सच्चे ज्ञान का प्रकाश हो इसलिये शास्त्रज्ञान में पूर्ण होते हुये भी घमण्ड नहीं करते । यदि विवाद करने वाला अल्पज्ञ भी हो, अज्ञानी हो पर विवाद करने में वाचाल, चंचल अभिमानी हो तो उनकी बात को सहन नहीं करना चाहिए ॥ ७ ९ -८० ॥ १. प्रकृति स्वभावम् । २. ' वभ्रुर्बुद्धन कुल ऊर्णारा शिमध्यगो यथा न किंत्प्रितिपद्यते तथाऽबुद्धिरपि संजल्पे वादिप्रति-वादिकथायाम् ' चक्रः | ' बभ्रुर्मूढः ' इति पा । ३. ' कुण्डभेदीति निन्दितजातिरित्यर्थः ' शिवदाससेनः! ४. ' स्वल्पाधाराः स्वल्पश्रुताः, न मर्षयेदिति नोपेक्षेत ' चक्रः ।
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अर्थदशमहामूलीयाध्याय: ३० ] सूत्रस्थानम्
परो भूतेष्वनुक्रोशस्तत्त्वज्ञानं ( ने ) परा दया ।
येषां तेषामसद्वादनिग्रहे निरंता मतिः ॥। ८१ ॥
५६७ वादी को परास्त करने वाला वैद्य - जो चिकित्सक प्राणियों पर अधिक दया रखता है और सच्चा ज्ञान देने में अच्छी तरह अपनी दया को प्रकट करता है ऐसे ही विद्वान की बुद्धि व्यर्थ बक-वाद करने वाले मूर्खों को पराजित करने में सदा तत्पर रहती हैं ॥ ८१ ॥
असत्पक्षाक्षणित्वार्तिदम्भपारुष्य सार्धेनाः ।
भवन्त्यनाप्ताः स्वे तन्त्रे प्रायः परविकत्थकाः ॥ ८२ ॥
मूर्ख वैद्य के बहाने - जो मूर्ख वैद्य होते हैं वे असत् पक्ष का आश्रय करते हैं । २. अक्ष-णित्व प्रदर्शित करते हैं ( अर्थात् वाद - विवाद करने के लिए मेरे पास समय नहीं है, अमुक रोगी मर रहा है, अमुक रोगी बहुत कष्ट में है, मुझे शीघ्र उन्हें देखने जाना है, आदि-आदि बहाना कर भाग जाते हैं । ) ३. अर्ति, ( मेरे शिर पेट आदि अङ्ग में भयंकर शूल हो रहा है, अतः मैं उत्तर देने में असमर्थ हूँ ), ४. दम्भ व्यर्थ के आडम्बरों द्वारा, ५. और पारुष्य - कठोर वचनों द्वारा अपने मनोरथ को सिद्ध करते हैं । ऐसे मूर्ख वैद्य अपने शास्त्र में अनाप्त ( पूर्ण ज्ञान से शून्य ) होते हैं ॥ ८२ ॥
तान् कालपाशसदृशान् वर्जयेच्छाखदूषकान् ।
प्रशमज्ञानविज्ञानपूर्णाः सेव्या भिषक्तमाः ॥ ८३ ॥
त्याज्य और व्य वैद्य - • शास्त्रों को दूषित करने वाले इस प्रकार के मूर्ख वैद्यों को यमराज के पाश के समान जान कर त्याग कर देना चाहिए । जो वैद्य शान्ति, ज्ञान और विज्ञान से परि-पूर्ण है ऐसे उत्तम वैद्य की सेवा करनी चाहिए अर्थात् चिकित्सा के लिए आदर से बुलाना चाहिए || सर्मंग्रं दुःखमायत्तमविज्ञाने द्वयाश्रयम् । सुखं समग्रं विज्ञाने विमले च प्रतिष्टितम् ॥ ८४ ॥
ज्ञान, अज्ञान में गुण दोष - शास्त्रज्ञान से शून्य होने पर शरीर और मन इन दोनों के आश्रयभूत सभी शारीरिक और मानसिक रोग होते हैं । विमल ( शङ्कारहित ) शास्त्रज्ञान होने पर अर्थात् शास्त्रज्ञान से अन्तःकरण के शुद्ध होने पर सभी शारीरिक और मानसिक सुख की प्रतिष्ठा है, अर्थात् प्राप्ति होती है ॥ ८४ ॥
इदमेवमुदारार्थमज्ञानां न प्रकाशकम् । शास्त्रं दृष्टिप्रणष्टानां यथैवादित्यमण्डलम् ॥८५ ॥
अन्धों की दृष्टि शास्त्र - उदार अर्थ ( प्रयोजन ) है जिसका, ऐसा यह शास्त्र, नहीं जाने हुए विषयों को भी प्रकाशित करता है । जिस प्रकार सूर्यमण्डल अन्धकार को दूर कर आकाश मण्डल को प्रकाशित करना है, उसी प्रकार यह शास्त्र जिन लोगों की दृष्टि नष्ट हो गई है अर्थात् अज्ञान रूपीतम से अन्तर्दृष्टि आच्छादित हो गई है उन लोगों के तमरूपी अन्धकार को दूर कर प्रकाश ( ज्ञान ) को देने वाला है ॥ ८५ ॥
१. ' तत्वज्ञानपरा ' यो । २. निरता तत्परा । ३. ' असत्पक्षादि साधनं येषां ते तथा, असत्पक्षो s नागमसिद्धः पक्षः, अक्षणित्वं पृच्छार्थमनुयु-तस्य ' संप्रति वक्तुं क्षणो नास्ति ' इति भाषणम्; अर्तिः पृच्छार्थमनुयुक्तस्य शिरोव्यथादिकमुच्चार्य श्लाघमानं भाषणं; दम्भः- पुस्तक वैद्यभाण्डादिभिः स्वार्थोत्कर्ष प्रतिप्रदानं पारुष्यं कृच्छ्रतोऽपि नवाच्य-त्वादिपरुषभाषणम्; अनाप्ताः स्वे तन्त्रे इति स्वतन्त्रानभिज्ञत्वात्, परविकत्थकाः परदूषकाः ' चक्रः । ४. ' असत्पक्षाः क्षणित्वाद्धि दम्भपारुष्यसाधनाः ' ग. । ५. ' सेवेन शमविज्ञानज्ञानपूर्वान् भिषक्तमान् ' यो. । ६. ' समग्रमिति शारीरं मानसं च ' चक्रः ।
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५६८ तत्र श्लोकाः-चरकसंहिता
अर्थे दशमहामूलाः संज्ञा चासां यथा कृता ।
अयनान्ताः षडग्रथाश्च रूपं वेदविदां च यत् ॥ ८६ ॥
सप्तकश्चाष्टकश्चैव परिप्रश्नाः सनिर्णयाः ।
यथा वाच्यं यदर्थं च षड्विधाश्चैकदेशिकाः ॥ ८७ ॥
अर्थदशमहामूले सर्वमेतत् प्रकाशितम् ।
संग्रहश्चायमध्यायस्तन्त्रस्यास्यैव केवलः ॥ ८८ ॥
अध्याय - उपसंहार हृदय के आश्रयभूत दश वाहिनियाँ, हृदय के अर्थ और महत् नामकरण का कारण तथा सिरा, धर्मनी और स्रोतों के नामकरण का कारण, अहिंसा से लेकर ब्रह्मचर्य तक अयनों का वर्णन, ६ श्रेष्ठ वस्तुओं का संग्रह जैसे - ' एकं प्राणवर्धनानाम् ' इत्यादि, वैद्यों का स्वरूप जैसे --- प्राणाभिसर सिद्धसाधित, और छद्मचर स्वरूपों का वर्णन, सप्तक जैसे - १. कंवेदमुपदिश-न्त्यायुर्वेदविदः, २. किमायुः, ३. कस्मादायुर्वेदः, ४. किमर्थमायुर्वेदः, ५. अयमायुर्वेदः शाश्वतोऽ-शाश्वतो वा, ६. कैश्वायमध्येतव्यः, ७. किमर्थञ्च ), अष्टक ( जैसे - १. तन्त्र, २. तन्त्रार्थ, ३. स्थान, ४. स्थानार्थं, ५. अध्याय, ६. अध्यायार्थ, ७. प्रश्न, ८. प्रश्नार्थ ), ये दोनों प्रश्न और इनका निर्णय, ( उत्तर ) तथा इनके उत्तरों को किस प्रकार कहना चाहिए ( जैसे वाक्यशः, वाक्यार्थशः, अर्थावय-वशः ) जिस उद्देश्य से उत्तर करना चाहिए, ६ प्रकार के एकदेशिकों का वर्णन जैसे – १. पाल-विकोत्पात, २. प्रमादी, ३. दम्भी, ४. मुखर, ५. अज्ञ, ६. और प्रभूत ( बहु ) भाषी, इस अदश-महामूलीय अध्याय में आत्रेय ने प्रकाशित किया है । इस शास्त्र ( संहिता ). का यह अध्याय
पूर्ण रूप से संग्रह है । ८६-८८ ॥
यथा सुमनसां सूत्रं संग्रहार्थं विधीयते । संग्रहार्थं यथाऽर्थानामृपिणा संग्रहः कृतः ॥ ८ ९ ॥ सूत्र स्थान की निरुक्ति - जिस प्रकार फूलों के एकत्रित करने में सूत्र ( डोरा ) की आवश्य-कता होती है, अर्थात् डोरे में फूल संगठित हो जाते हैं, उसी प्रकार विभिन्न विषयों के एकत्र करने के लिए सूत्रस्थान की रचना महर्षि ने की है । अर्थात् माला के समान यह स्थान विभिन्न विषय का संग्रह है ॥ ८ ९ ॥ अग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते । इयताऽवधिना सर्वं सूत्रस्थानं समाप्यते ॥ ९ ० ॥ इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते सूत्रस्थाने अर्थदशमहा-मूलीयो नाम त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३० ॥
इति सूत्रस्थानम् ॥ १ ॥
महर्षि अनिवेश से रचित और चरक से प्रतिसंस्कृत इस संहिता में यहाँ तक के सभी विषयों के साथ सूत्र स्थान समाप्त हुआ ॥ ९ ० ॥ चरक के द्वारा प्रतिसंस्कृत अग्निवेशकृततन्त्र ( चरकसंहिता ) के सूत्रस्थान में अश महामूलीय नामक तीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ ३० ॥
इस प्रकार सूत्रस्थान समाप्त हुआ ॥ १ ॥
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निदानस्थानम् अथ प्रथमोऽध्यायः अथातो ज्वरनिदानं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्माह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
अब इसके बाद ज्वर - निदान की व्याख्या की जायगी जैसा कि भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥ विमर्श - सर्वप्रथम ज्वर- निदान की ही विवेचना इसलिए की गई कि ज्वर सभी रोगों में प्रधान ( राजा ) माना गया है । जैसा कि आचार्यों के वर्णन से ज्ञात होता है -- ' देहेन्द्रियमनस्तापी सर्वरोगाग्रजो बली । ज्वरः प्रधानो रोगाणामुक्तो भगवता पुरा ॥ ' ( च. चि. अ. ३ ), ' जन्मादौ निधने चैव प्रायो विशति देहिनम् । अतः सर्वविकाराणामयं राजा प्रकीर्तितः ॥ ' ( सु. उ. अ. ३ ९ ), ' ज्वरो रोगपतिः पाप्मा । ' आदि ( अ. हृ. नि. अ. २१ ) । यद्यपि ' पुरा गुल्मोत्परित्तभूत् । ' ( च. नि. अ. ८ ) इस वचन से सर्वप्रथम गुल्म की ही उत्पत्ति प्रतीत होती है परन्तु ज्वरग्रस्त प्राणियों में प्रथम गुल्म की उत्पत्ति हुई यह उस वचन का तात्पर्य है । यथा - ' दक्षाध्वरध्वंसे हि नरपरिगृहीतानां प्राणिनां दिक्षु विद्रावणादिना गुल्मोत्पत्तिरभूत् । ' ( चक्रपाणि ) * इह खलु हेतुर्निमित्तमायतनं कर्ता कारणं प्रत्ययः समुत्थानं निदानमित्यनर्थान्तर में | तत्रिविधम् --- असात्म्येन्द्रियार्थसंयोगः, प्रज्ञापराधः, परिणामश्चेति ॥ ३ ॥
( १ ) सर्वरोग निदान - प्रकरण ( निदान - पञ्चक ) निदान का लक्षण - यहाँ पर हेतु, निमित्त, आयतन, कर्ता, कारण, प्रत्यय, समुत्थान, निदान ये सब एक ही अर्थ के बोधक है । वह हेतु ( निदान ) नीन प्रकार का होता है —१. असात्म्ये-न्द्रियार्थसंयोग, २. प्रज्ञापराध और ३. परिणाम ॥ ३ ॥
विमर्श - पर्याय शब्दों द्वारा पारिभाषिक शब्दों के लक्षणों को कहने की परम्परा प्राचीन साहित्य में बहुधा देखी जाती है । अतः यहाँ भी उसी परम्परा से निदान का लक्षण बताया गया है । इन उपर्युक्त हेतु आदि शब्दों का प्रयोग भिन्न - भिन्न अर्थ में भी होता है जैसे - १. हेतु शब्द, कर्ता के प्रयोजक के अर्थ में प्रयुक्त होता है यथा- ' तत्प्रयोजको हेतुश्च । २. निमित्त शब्द अर्थमें प्रयुक्त होता है । ३. आयतन शब्द का स्थान अर्थ में प्रयोग होता है यथा- ' दशै-शकुन वायतनानि स्युः ॥ ' ( च. सू. अ. २ ९ ) । ४. कर्ता शब्द का प्रयोग क्रिया की स्वतन्त्रता में ( स्वतन्त्रः कर्ता ) और ' कर्ता मन्ता वेदिता बोद्धा ' । ( च. शा. अ. ४ ) आदि अर्थों में, ५. कारण शब्द का प्रयोग कार्य ( रोग ), नियतपूर्ववृत्ति शरीर में या कार्य ( शरीर ) के नियत १. ' हेत्वादिभृरिपर्यायकथनं शास्त्रे व्यवहारार्थं तथा हेत्वादिशब्दानामर्थान्तरेऽपि वर्तमानत्वे पर्यायान्तरेण ममं सामानाधिकरण्यात कारण एवं वृत्तिनियम्यते, तेनैकस्मिन्नर्थे यस्मिंस्ते शब्दाः प्रवर्तन्ते तत् कारणमितर हेत्वाद्यर्थेभ्यो व्यवच्छिद्यते, तेन लक्षणार्थं च पर्यायाभिवानं भवति, एव-मन्यत्रापि व्याध्यादिपर्यायाभिधानेऽपि व्याख्येयम् ' चक्रः ।
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६०० चरकसंहिता पूर्ववृत्ति माता - पिता में, ६. प्रत्यय, शब्द का प्रयोग, लट्, तिप् सुप् आदि के विषय में और विश्वास में, ७ समुत्थान शब्द का प्रयोग उन्नति, उद्गमन, उत्सर्ग अर्थ में, ८. निदान शब्द का निश्चय अर्थ में ( यथा - अद्य ते निदानं ( निश्चयं ) करिष्यामीति ) प्रयोग पाया जाता है । इसलिए हेतु, निमित्त आदि शब्द पर्याय बनकर जिस एक अर्थ का प्रतिपादन करते हैं उसे निदान कहा जाता है ( एतेः शब्दैर्योऽर्थोऽभिधीयते तन्निदानमिति मधुकोष ) । क्योंकि - ' एकार्थवाचकाः शब्दा एव पर्याया भवन्ति ' कहा गया है । ( १ ) उपर्युक्त हेतु चार प्रकार के भी माने गये हैं, यथा - १. सन्निकृष्ट, २. विप्रकृष्ट, ३. व्यभिचारी, ४. प्राधानिक । १. सन्निकृष्ट दोष प्रकोपक कारणों के सेवन से सद्यः व्याधियों कि उत्पत्ति होती है । २. विप्रकृष्ट - हेमन्त ऋतु में संचित कफ वसन्त में कफजन्य रोग कारक होता है । ३. व्यभिचारी — कुपित दोष सभी रोगों का कारण होता है, यह आयुर्वेद का सिद्धान्त है पर अल्प आहार - विहार से दोष का कोप अन हुआ तो वह दुर्बलता केकारण रोग उत्पन्न करने में असमर्थ होता है ऐसी दशा में सिद्धान्त का व्यभिचार होने से इस प्रकार के कारण को व्यभिचारी कारण माना जाता है । ४. प्राधानिक - विष, अर्थात् विष सेवन से सभी की मृत्यु होती है अतः यह प्राधानिक कारण माना जाता है । ( २ ) १. दोष हेतु, २. व्याधि हेतु, ३. उभय ( दोप- व्याधि ) हेतु भेद से उपर्युक्त हेतु ३ प्रकार का माना गया है । १. दोष हेतु - जैसे ऋतु के अनुसार वातादि दोषों का संचय प्रकोप होना, रोगों का हेतु होता है । २. व्याधि हेतु - जैसे मट्टी खाना पाण्डुरोग का हेतु होता है । ३. दोष-व्याधि ( उभय ) हेतु जैसे हाथी, ऊँट पर चलना और विदाही अन्न खाना दोष प्रकोप पूर्वक वान-रक्त रोग का हेतु होता है । ( ३ ) उत्पादक, व्यञ्जक भेद से वही हेतु दो प्रकार का होता है । १. उत्पादक जैसे- हेमन्त में मधुर रस का सेवन कफ का उत्पादक है । २. व्यञ्जक - जैसे संचित कफ का व्यञ्जक वसन्त ऋतु में सूर्य का नार होता है । ( ४ ) वाह्य, आभ्यन्तर भेद से वही हेतु २ प्रकार का होता है – १. वाह्य - जैसे आहार - आचार, काल, दोषों का प्रकोपक होता है, २. आभ्यन्तर —- जैसे दोष एवं दृष्यों की विकृति रोगों में, हेतु होती है । इस प्रकार अनेक हेतु होते हुए भी चरक ने तीन ही को प्रधान माना है । क्योंकि इन तीनों के अन्दर ही सबका समावेश हो जाता है! * अतस्त्रिविधो व्याधयः प्रादुर्भवैन्ति - आग्नेयाः, सौन्याः, वायव्याश्च; द्विविधाश्चापरे -राजसाः, तामसा ॥ ४ ॥
रोगों के विविध और द्विविध प्रकार इन तीन हेतुओं से तीन प्रकार की व्यावियां उत्पन्न होती है, १. आग्नेय ( पित्तज ), २. सौम्य ( कफज ), ३. वायव्य ( वातज ) । दो प्रकार के और अन्य रोग होते हैं- राजस और नामस ॥ ४ ॥
विमर्श - यद्यपि वातज, पित्तज, कफज इसी क्रम से रोगों का वर्णन आचार्यों को अभीष्ट है और सभा स्थान पर इसी क्रम का प्रायः अवलम्बन किया गया है । पर यहाँ उवर प्रकरण में पित्त की ही प्रधानता मानी जाती है, क्यों कि विना पित्त के प्रधान हुए ताप की सम्भावना नहीं हो १. ' अतस्त्रिविधविकल्पाः ' इति पा. । २. ‘ प्रादुर्भवन्त्याग्नेयसौम्य वायव्याः ' इति पा | ' आग्नेयाः पैत्तिकाः, सौम्याः कफजाः, वायव्या वानजाः; यद्यपि प्रधानत्वेन वायव्या एव प्रथमं निर्देष्टुं युज्यन्ते तथाऽपीह ज्वरे पित्तस्य प्रधानत्वा-दाग्नेयाभिधानम् ' चक्रः ।
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ज्वरनिदानाध्यायः १ ] निदानस्थानम् ६०१ सकती है और ज्वर में संताप ही प्रधान है । यथा -- ' ऊष्मा पित्तादृते नास्ति ज्वरो नास्त्यूष्मणा विना । तस्मात्पित्तविरुद्धानि त्यजेत्पित्ताधिकेऽधिकम् ॥ ' ( अ. हृ. चि. अ. १ ) । इस लिए ज्वर में पित्त की प्रधानता बताने के लिए ही आग्नेय ( पित्तज ) एवं सभी ज्वर आमाशय की ही विकृति के कारण होते हैं और आमाशय कफ का स्थान है अतः सौम्य ( कफज ) तथा अन्त में वायव्य ( वातज ) रोगों की उत्पत्ति यहाँ बताई गई है । राजस एवं तामस ये रोग भी मन के दोष रज एवं
तम से होते हैं । अतः यह भी दोषज ही माने जाते हैं ।
* तत्र व्याधिरामयो गद आतङ्को यक्ष्मा ज्वरो विकारो रोग इत्यनर्थान्तरम् ॥ ५ ॥
व्याधि यक्ष्मा, ज्वर, विकार और रोग ये सभी का लक्षण - व्याधि, आमय, गद, आतङ्क, एक ही अर्थ को बतलाने वाले है ॥ ५ ॥
विमर्श - यद्यपि व्याधि आदि सभी शब्द आपस में एकार्थ वाची होने से पर्याय हैं परन्तु अपनी परम्परा के अनुसार आचार्य ने इन्हें रोग का लक्षण माना है । यथा - व्याधि- ' विविधं दुःखमादधातीति व्याधिः । ' तथा ' विगतः आधिः यस्मात् स व्याधिः ' से योगी ( आप्त ) अर्थ भी लिया जा सकता है । आमय - रोग और कूठऔषधविशेष के अर्थ में प्रयुक्त होता है । गइ— रोग, स्पष्ट भाषण करना और विष, अर्थ में प्रयुक्त होता है । आतङ्क - रोग, भय, शङ्का एवं सन्ताप अर्थ में प्रयुक्त होता है, यक्ष्मा - रोग और राजयक्ष्मारोगविशेष के अर्थ में प्रयुक्त होता है । ज्वर -- रोग, और ज्वररोगविशेष के अर्थ में प्रयुक्त होना है । विकार - रोग प्रकृति की विकृति और षोडश विकार ( ११ इन्द्रियाँ + ५ महाभूत ), अर्थ में प्रयुक्त होता है । रोग - रोग अलक्तक और कूठ के अर्थ में प्रयुक्त होता है । अतः वे व्याधि, आमय आदि शब्द परस्पर पर्य्याय बन कर जिस एक अर्थ का प्रति पादन करें उसे ' ब्यावि ' कहा जाता है । इस प्रकार यह व्याधि
का लक्षण एवं पर्याय भी है ।
* तस्योपलब्धिर्निदान पूर्वरूपलिङ्गोपशय संप्राप्तितः ॥ ६ ॥
निदान पञ्चक — इस प्रकार बताए हुए रोग का ज्ञान -- निदान, पूर्वरूप, लिङ्ग, उपशय एवं सम्प्राप्ति से होता है ॥ ६ ॥
विमर्श - रोग ज्ञान के लिए निदान पञ्चक का ज्ञान परमावश्यक है । ये पांचों अलग - अलग तथा मिलकर भी रोग का ज्ञान कराते हैं । अब यह प्रश्न उठना है कि जब ये पृथक् - पृथक् रूप से भी रोग का ज्ञान कराते है तो पाँचों के कहने की क्या नावश्यकता पड़ी । इसका उत्तर यह है कि ' दिर्द सुबद्धं भवति ' इस न्याय से किसी एक प्रभाग से सिद्ध वस्तु को दूसरे या तीसरे प्रमाण से सिद्ध करने से उसकी और अधिक पुष्टि हो जाती है । जैसे— ' पर्वतो वह्निमान् धूमात् ' इस अनुमान से पर्वत में अग्नि सिद्ध हो जाने पर भी प्रत्यक्ष और आगम के द्वारा उसका ज्ञान होता ही है । उसी प्रकार एक निदान या पूर्वरूप आदि से व्याधि का ज्ञान हो जाने पर भी अन्य चारों से उसकी विशेष पुष्टि होती है । वस्तुतः विना पाँचों के रोग का उत्तम ज्ञान नहीं होता, जैसे मट्टी खाने से, या मक्षिका भक्षण रूप निदान से क्रमशः पाण्डु रोग और वमन रोग का ज्ञान होता है नथापि सभी जगह केवल निदान से सभी रोगों का ज्ञान नहीं होता । क्योंकि १. ' व्याध्यादिशब्दानां व्युत्पत्त्या रोगधर्मा लक्षगीयाः तथा च विविधं दुःखमादधातीति व्याधिः; प्रायेणामसमुत्यत्वेनामय उच्यते; आतङ्क इति दुःखयुक्तत्वेन कृच्छ्रजीवनं करोति, वचनं हि — ‘ आतङ्कः कृच्छ्रजीवने '; यक्ष्मशब्देन च राजयक्ष्मवदने करोगयुक्तत्वं विकाराणां दर्शयति; ज्वर-शब्देन च देहमनःसन्तापकरत्वं; विकारशब्देन च शरीरमनसोरन्यथाकरणत्वं व्याधेर्दर्शयति, रोग-ट्रेन च रुजाकर्तृत्वम् ' चक्रः ।