चरक संहिता हिन्दी भाष्य — पृष्ठ 691–700

चरक संहिता हिन्दी भाष्य · Chaukhamba · पृष्ठ 691–700

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६०२ चरकसंहिता जब दो रोग के कारण एक ही होता है, तब एक ही कारण से कौन रोग होगा यह कहना कठिन हो जायगा, यथा- ' एको हेतुरनेकस्य नथैकस्यैक एव हि । व्याधेरेकस्य बहुवो बहूनां वह-वस्तथा ॥ ' ( च.नि. अ. ८ ) अर्थात् अनेक रोगों का एक हेतुहोता है, जैसे एक बात ८० प्रकार के रोगों का कारण या वर, अनिसार आदि अनेकों के कारण होते हैं । एक रोग का एक कारण-जैसे मट्टी खाना केवल पाण्डु रोग का कारण होना है, एक रोग का बहुत कारण जैसे -- एक अनिसार का गुरु, अतिखिग्ध, रूक्ष, उष्ण भोजन, शोक, अशुद्ध जलपान, मद्यपान, जल में तैरना, क्रिमि आदि अनेक कारण होते है । बहुत रोगों का बहुत कारण जैसे -- विरुद्ध भोजन, अध्यशन, अजीर्ण, विषम भोजनादि अतिसार, प्रवाहिका, ग्रहणी, मन्दाग्नि, विसूचिका आदि रोगों के कारण होते हैं । ऐसी दशा में केवल निदान से कार्य नहीं चल सकता । अतः पूर्वरूप की भी आवश्यकता है और निदान का कहना अनावश्यक है यह भी नहीं कहा जा सकता क्योंकि चिकित्सा के लिए उसका ज्ञान परमावश्यक है यथा- ' संक्षेपतः क्रियायोगो निदानपरिवर्तनम् अनएव मिहान ( कारण ) का त्याग करना संक्षेप में चिकित्सा है, तो यदि निदान का ज्ञान न होगा, तो उसका त्याग कैसे किया जायगा । अतः इसका भी ज्ञान आवश्यक है । पूर्वरूप - रोगों में साध्यासाध्य निर्णय के लिए इसकी आवश्यकता पड़ती है । जब किसी भी रोग में उसका सम्पूर्ण पूर्व रूप मिल जाता है तो वह रोग असाध्य माना जाता है । यथा-' अन्यस्वापि च रोगस्य पूर्वरूपाणि यं नरम् विशन्यनेन कल्पेन तस्यापि मरणं भुवम् III ( अ. ५ ) जिस प्रकार सम्पूर्ण पूर्वरूप के होने पर उतर असाध्य माना गया है उसी प्रकार अन्य रोगों का भी सम्पूर्ण पूर्वरूप जिस मनुष्य में प्रविष्ट करता है उसका मरण निश्चित होता है! तथा पूर्वरूप का रोगों में सापेक्ष निश्चय के लिए भी प्रयोग होता है, क्योंकि मूत्र से रक्त का और हारिद्र वर्ण के सूत्र का आना पिशन प्रमेह में रखनेह और अयोग रक्तपित का सूचक है पर दोनों में फोन सा रोग है इसका निश्चायक पूर्वरूप हो होता है, यथा- ' हारिद्रवमू विना प्रमेहस्य हि पूर्वरूपेः यो मूत्रयेतं न प्रमेहं रतस्य पित्तस्य हि स प्रकोपः ॥ ( च.वि. अ. ४ ) अर्थात् विना प्रमेह के पूर्वरूप उत्पन्न हुए ही हल्दी के वर्ग का और रक्तवर्ण का मूत्र त्याग हो तो, प्रमेह न समझ कर रक्तपित्त रोग का प्रकोप समझना चाहिए । चिकित्सा - भेदज्ञानार्थ भी पूर्वरूप का ज्ञान आवश्यक है जैसे — ज्वर के पूर्वरूप में लघु भोजन या उपवास और मानव के पूर्वरूप में घृतपान का उपदेश मिलना है । इन सभी वस्तुओं का त्याग या सेवन पूर्वरूप के पूर्णरूप से ज्ञान होने पर ही सम्भव है । अतः पूर्वरूप का वर्णन अवश्यक है । रूप ( लिङ्ग या लक्षण ) - लक्षणों के आधार पर रोग का पूर्ण रूप से ज्ञान होता है और लक्षण के आधार पर हो रोगों की साध्यासाध्यता का भी ज्ञान होता है, यथा- ' देवः पूर्णरूपाणि रूपाण्यल्पानि यस्य वै । न च तुल्यगुणो दृष्यो न दोषः प्रकृतिर्भवेत् ॥ ' ( च. सू. अ. १० ) अर्थात् हेतु, पूर्वरूप, रूप ( लक्षण ) अल्प हो, दोष ( वातादि ), दृष्य ( रस रक्तादि - ) तुल्य गुण वाले न 9 प्रकुपित दोष मनुष्य की प्रकृति का न हो तो रोग साध्य होता है तथा निमित मत्पाणां रूपाणां मध्वने वले । ( च. सू. अ. १० ) अर्थात् हेतु पूर्वरूप और लक्षण मध्यम श्रेणी के हो तो रोग साध्य होता है और सम्पूर्ण लक्षणों के होने पर सन्निपान पर असाध्य होता है, यथा — ' दोपे विवर्द्धनंऽग्नौ सर्वसम्पूर्णलक्षणः सन्निपातज्वरो: साध्य: ( च.चि. अ. ३ ) इस प्रकार यदि लिङ्ग ( लक्षण ) न बताया जाय तो चिकित्सा में साध्यासाध्यता का ज्ञान ही न होगा और बिना लक्षण ( स्वरूप ) जाने व्याधियों की चिकित्सा उचित रूप से नहीं हो सकती, अतः यह भी आवश्यक ही है ।

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ज्वरनिदानाच्यायः १ ] + उपशय गूढ -निदानस्थानम् ६०३ व्याचमुपायानुपशवाभ्यां परीक्षेत अर्थात् जिस व्याधि का लक्षण छिपा हो, उसकी परीक्षा उपशय और अनुपश्य के द्वारा करनी चाहिए आज कल रोग का ठीक पता नहीं चलना है तो रक्त, थूक, मूत्र मल, आदि की परीक्षा कर रोग का निश्चय किया जाना है । प्राचीनकाल में तथा आजकल भी चिकित्सक वर्ग उपशय एवं अनुपशय द्वारा व्याधियों का निदान कर चिकित्सा में सफल होते हैं । उदहरणार्थं मलेरिया रोग में कुनैन का प्रयोग करने पर लाभ न होने पर अन्य ज्वर का सन्देह होना, यदि लाभ हो गया तो मलेरिया निदान होता है । यह ज्ञान उपशय एवं अनुशय द्वारा होता है, अतः उपशय का ज्ञान भी आवश्यक है । सम्प्राप्ति - निदानादि चतुविध उपायों से रोग का निर्णय हो जाने पर चिकित्सार्थ दोष के अंशांश की कल्पना करना परम आवश्यक होता है । सम्प्राप्ति से ही यह ज्ञान सम्भव है कि अमुक रोग में यह दोष और यह दूष्य है । या इस रोग में कौन संस्थान दूषित है अर्थात् यह रोग, पाचनसंस्थान का है या नाडीसंस्थान या रक्तवहसंस्थान इत्यादि का है । अथवा किसस्थान विशेष का रोग है । जैसे सन्धि शोय, आमवात, उपदंश, पाषाणगर्दभ, इत्यादि । अतः सम्प्राप्ति का वर्णन भी परमावश्यक ही है । इस प्रकार रोग ज्ञान में ये पाँचो अपना - अपना विशेष महत्त्व रखते हैं और दिना पाँचों के रोगों का पूर्णतया ज्ञान नहीं हो सकता अतः पाँचों का वर्णन आवाद

को दृष्ट है ।

8 तत्र निदानं कारणमित्युक्तम ॥ ७ ॥

निदान - इन पाँचों में से निदान कारण को कहते हैं, यह पहले ( इसी स्थान के के गद्य में ) कह चुके हैं ॥ ७ ॥

विमर्श -यहाँ निदान शब्द से निमित्त कारण लिया गया है । यह निशन दो प्रकार का माना गया हैं एक सन्निकृष्ट दूसरा विप्रकृष्ट, ( देखें विमर्श पृ ० ६०० ) होता है । अन्यत्र अधर्म भी रोग का कारण माना गया है । यथा ' प्रानपि चाधर्माने न रोगोत्पत्तिरभूत् । ( च. वि. अ. ३ ) निदान के अन्य प्रकार १. आभ्यन्तर और २. बाह्य भी माने गए हैं । दोषों को प्रकुपित करने से ' निदान ' रोगों के निमित्त कारण होते हैं । दोषों का कुपित होना रोग का समवायी कारण माना जाता है वे निवान दो प्रकार के रोगों को उत्पन्न करते हैं । जैसे, १. भाषद-जन्य ( निज रोगों में ), २. साक्षात् ( आगन्तुक रोगों में ) पुनः इस निदान के ३ भेद होते हैं - १. असात्म्येन्द्रियार्थ संयोग २ प्रज्ञापराध, २ परिणाम ( च. सू. अ. २० ) दोष एवं दृष्य आभ्यन्तर निदान हैं । जब दोषों के द्वारा दृष्य ( रसादिधातुएँ और मल ), विक्रम होकर रोग उत्पन्न करते है तो वे रोग के समवायिक रण बनते है । यही तथ्य चरक निदान ४ अध्याय में कहा है जैसे - इह खलु निदानदोषदृष्यविशेषेभ्यो विकारविधा भावाभावप्रतिविशेषा भवन्तीति । इस गद्य में दोष ( वातादि ), दूष्य ( रसादि ) से पृथक् निदान शब्द को रोगोत्पादक बनाया है । अतः निदान शब्द से वाद्य कारण असाम्येन्द्रिया संयोग आदि लिया जाता है । अतएव निदान बाह्य कारण है, आभ्यन्तर नहीं और इसको निमित्त कारण को कोटि में रखा जाना है । बहसेन ने इसे और भी स्पष्ट कर दिया है । जैसे — ' येनाहार विहारेण रोगाणामुद्भवो भवेत् । क्षयो वृद्धिश्च दोषाणां निदानं हि तदुच्यते ॥ ' इसी आर्प सिद्धान्त को ' भारकरोदय ' नामक रोग विज्ञान में श्री महावर सेन ने भी स्पष्ट किया है कि ' त्रिविधान्येतानि विकारस्य धातुवैषम्यस्व वाह्यानि कारणानि न सन्त्याभ्यन्तराणि कारणानीति ॥ ” तथा ' सर्वेषामेव रोगाणां निदानं कुरिता मला तत्प्रकोपस्य तु प्रोकं विविपादितसेवनम् ॥ ( अ. हृ. नि. अ. १ ) । यहाँ ' निदान ' शब्द से आभ्यन्तर कारण ( कुपित दोष ) और वाह्य

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६०४ चरकसंहिता कारणों का निर्देश ' विविधाहितसेवनम् ' से स्पष्ट किया है । दोषों का प्रकोप जब तक वाह्य कारण ( आसात्म्येन्द्रियार्थं आदि ) का सेवन न होगा तब तक न होगा, इस प्रकार वाग्भट ने भी दोनों कारणों को स्वीकार किया है । तथा - ' सर्वेषां व्याधीनां वातपित्तश्लेष्माण एव मूलम् । ' ( सु. सू. अ. २४ ) । इसी बात को स्पष्ट बनाने के लिए ही आचार्य सुश्रुत ने निदान

शब्द का प्रयोग न कर ' मूल ' शब्द का प्रयोग किया है ।

& पूर्वरूपं प्रागुत्पत्ति लक्षणं व्याधेः ॥ ८ ॥

पूर्वरूप का लक्षण - व्याधि की उत्पत्ति के पूर्व जो लक्षण होते हैं उन्हें पूर्वरूप कहा जाता है || विमर्श -- भावि व्याधि को बतानेवाले लक्षण को पूर्व रूप कहते हैं । पूर्वरूप रोगावस्था में पूर्णरूप से व्यक्त नहीं होते हैं । कुछ स्पष्ट होते हैं और कुछ स्पष्ट नहीं होते हैं । यह तथ्य, दोषों की प्रबलता या दुर्बलता पर निर्भर रहता है । जब अधिक या सभी पूर्वरूप रोगावस्था में व्यक्त हो जाते हैं तो रोग असाध्य होता है । कहा भी है-- पूर्वरूपाणि सर्वाणि ज्वरोक्तान्यति-मात्रया । यं विशन्ति विशत्येनं मृत्युर्ज्वरपुरःसरः ॥ ' ( च. इ. अ. ५ ) । ' अन्यस्यापि च रोगस्य पूर्वरूपाणि यं नरम् । विशत्यनेन कल्पेन तस्यापि मरणं ध्रुवम् ॥ ' ( च. इ. अ. १ ) इसी पूर्वरू के सामान्य और विशिष्ट, ये दो भेद माने गये हैं । दोषज या अदोषज, जो भी रोग की उत्पत्ति के पहले लक्षण होते है वे पूर्वरूप कहे जाते हैं । इसी वान को वाग्भट ने ' येन प्राग्र्यं लक्ष्यते, उत्पसुरामयो दोषविशेषेणाधिष्ठितः ॥ ' ( वा. नि. अ. १ ) से बताया है । ' स्त्री नांस - मय-प्रियाप्रियता चावगुण्ठने । ' तथा ' मक्षिकावुणकेशानां तृणानां पतनानि च । ( च. चि. अ. ८ श्लो. ३५ ) —इसमें पहला दोषज और दूसरा अदोषज है । जब निदान से कुपित हुए दोष फैलकर स्थानसंश्रयी ( स्थान विशेष में आश्रित ) होकर रोग को प्रारम्भ करने में प्रवृत्त होते हैं तब जो अव्यक्त रूप दिखाई देते है उन व्यावि - बीज लक्षणों को ' पूर्वरूप ' कहते है | यथा -- ' स्थानसंश्रयिणः कुद्धा भाविव्याधिप्रबोधकम् । दोषाः कुर्वन्ति यलिङ्गं पूर्वरूपं तदुच्यते । ' ( मधुकोष ) सामान्य पूर्वरूप - वह है जिसमें भावि ज्वर आदि रोगमात्र की ही प्रतीति होती है । परन्तु यह नहीं ज्ञात होता है कि ज्वर आदि रोग कौन से दोष से उत्पन्न होंगे । विशिष्ट पूर्वरूप - इसमें दोष के बार्तिक पैत्तिक आदि भेद स्पष्ट होने लगते है । जैसे ज्वर प्रकरण में वातज्वर के पूर्वसूचक विशिष्ट पूर्वरूप बताया है । यथा- ' जृम्भात्यर्थ सनीरणात् ', ( सू. उ. अ. ३ ९ ) । क्षक्षण और वातव्याधि में रूप के अव्यक्त भाव को ही पूर्वरूप माना है यथा- ' अव्यक्तं लक्षणं तस्य पूर्वरूपमिति स्मृतम् । ( च. चि. अ. ११ ) तथा - ' अव्यक्तं लक्षणं तपः पूर्वरूपमिति स्मृतम् । आत्मरूपं तु यद्वयक्तमपायो लघुतापुनः ( च. चि. अ. २८ ) । प्रादुर्भूतलक्षणं पुनर्लिङ्गम् । तत्र लिङ्गमाकृतिर्लक्षणं चिह्नं संस्थानं व्यञ्जनं रूपमित्य-नर्थान्तरम् ॥ ९ ॥

रूप का लक्षण — उत्पन्न हुए रोगों के लक्षण को लिङ्ग कहते है । लिङ्ग, आकृति, लक्षण चिह्न, संस्थान, व्यञ्जन, रूप ये सब शब्द इस अर्थ में पर्याय हैं ॥ ९ ॥।

विमर्श - लिङ्ग, आकृति, आदि पर्याय है । पर आचार्य ने इसके द्वारा व्याधि का लक्षण सूचित किया है । क्यों कि इन शब्दों का अर्थ भिन्न भिन्न है । पर इस अर्थ में पर्याय भी है । अर्थात् ये शब्द पर्याय बनकर जिस एक अर्थ के बोधक होते हैं उसे व्याधि का लक्षण माना गया १. ' पूर्वरूपं प्रागुत्पत्तिलक्षणं व्याधेरिति व्याधेरुत्पत्तेः पूर्वं यलक्षणं तत् पूर्वरूपं व्याधेः ' गङ्गाधरः ।

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ज्वरनिदानाध्यायः १ ] निदानस्थानम् ६०५ है । जैसे १. लिङ्ग शब्द - लक्षण और मेहन अर्थ में यथा - ' बली लिङ्गं समर्थयेत् । ' ( च. चि. अ. २ ) । २. आकृति शब्द- लक्षण और शरीर अर्थ में - ' संस्थानमाकृतिर्ज्ञेया सुषमा विषमा च या ' । ३. लक्षण - लक्षण और चिह्न अर्थ में । ४. चिह्न - लक्षण और पताका अर्थ में । ५. संस्थान--लक्षण और आकृति अर्थ में । ६. व्यञ्जन - लक्षण और शाक अर्थ में यथा — ' तैल — सर्पिभ्य व्यञ्जनान्युपकल्पयेत् ' । ७. रूप - लक्षण और शरीर अर्थ में प्रयुक्त होता है, यथा— ' रूपस्य सवस्य च सन्ततिर्या ' । ( च शा. अ २ ) । ' रूप्यते इति रूपं भौतिकं शरीरमिति चक्रपाणिः । इस प्रकार रोग की व्यक्तावस्था को ही लक्षण कहा जाता है और ये लक्षण निश्चय रूप से व्याधि का ज्ञान कराते है । उपशयः पुनर्हेतुव्याधिविपरीतानां विपरीतार्थकारिणां चौषधाहारविहाराणामुपयोगः सुखानुवन्धः ॥ १० ॥

उपशय का लक्षण I हेतुविपरीत, व्याधिविपरीत, हेतुव्याधिविपरीत, और हेतुविपरीतार्थंकारी, व्याधिविपरीतार्थकारी, हेतुत्र्याधिविपरीतार्थकारी औषध, अन्न, और विहार का सुखावह उपयोग को उपशय कहते हैं ॥ १० ॥

विमर्श - औषध, अन्न, विहार सुखावह ( रोग दूर हो जाय और आगे भी कष्ट न हो तो उसे मुखावह कहा जाता है ) उपयोग को ' उपशय ' कहते हैं । यद्यपि दाह और प्यास से युक्त नये ज्वर में शीत जल पीने से तत्काल दाह और प्यास की शान्ति होती है, तथापि बाद में वह ज्वर को दढ़ाते हुए दाह एवं ध्याम को अधिक उग्ररूप से उत्पन्न करना है, अतः उसे उपशय नहीं माना जाता है | यहाँ औषध अन्न विहार कहना उपलक्षण मात्र है अतः देश काल का भी उसमें ग्रहण कर लिया जाता है । यथा - ' सुखानुबन्धो यो हेतुव्याध्यादिविपरीतकः । देशादिकःश्चोपशयो ज्ञेयोऽनुपशयोऽन्यथा ॥ ' चक्रपाणि ने उपशय १८ प्रकार का बताया है, जैसे— १, हेतु विपरीत औषध जैसे — शीत लगकर आने वाले ज्वर में सोंठ आदि उष्ण औषध का प्रयोग । विमान स्थान में चिकित्सा सिद्धान्त का प्रतिपादन करते हुए यही बताया है । यथा - ' शीतेनोष्णकृतान् रोगाञ् शमयन्ति भिषग्विदः । ये च शीतकृता रोगास्तेषामुष्णं भिषग्जितम् ॥ ' ( च.वि. अ. ३ ) २. हेतु विपरीत अन्न जैसे - परिश्रम करने से उत्पन्न वातज्वर में श्रम एवं वातनाशक मांस रस के साथ भात का भोजन । ३. हेतु विपरीत विहार जैसे - दिन में सोने से कफ की वृद्धि होने पर रात्रि में जागना, या शीतल स्थान में उठने - बैठने सोने से वात की वृद्धि हो जाने पर उष्णस्थान में उठना - बैठना, सोना, आदि ४. व्याधि, विपरीत औषध, जैसे- अतिसार रोग में मल को रोकने के लिए स्तम्भन औषध का प्रयोग, १. पाठा, इन्द्रजौ, सोनापाठा, अतीस आदि अपने प्रभाव से अतिसार को बन्द कर देते हैं । इसी प्रकार शिरीष विष को दूर करता है, खदिर कुष्ठ को, एवं हरिद्रा प्रमेह को दूर करती है ये सभी व्याधि - विपरीत औषध दोषों की अपेक्षा किए बिना ही प्रभाव से व्याधि को दूर करते हैं । ५. व्याधिविपरीत अन्न, जैसे- अतिसार रोग में मल को रोकने वाली मसूर की दाल या दही, प्रमेह रोग में जौ का प्रयोग: ६. व्याधि विपरीत विहार जैसे --उदावर्त रोग में प्रवाहण करना । ७. हेतु व्याधिविपरीत औषध - जैसे वातशोथ में दशमूल का काथ वातहर एवं शोथहर दोनों होता है । ८. हेतुव्याधिविपरीत अन्न जैसे वातकफज ग्रहणी में तक्र १. ' हेतुना, तथा व्याविना तथा हेतुव्याधिभ्यां च विपरीता हेतुव्याधिविपरीताः, तेषां तथा हेतुव्याधिविपरीतार्थकारिणामौषधान्नविहाराणां सुखरूपोऽनुबन्ध उपशयः । तत्र विपरीतार्थकारि तदेवोच्यते यदविपरीततया आपाततः प्रतीयमानं विपरीतस्यार्थे प्रशमलक्षणं करोति ' चक्रः ।

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P ६०६ चरकसंहिता का प्रयोग यह दीपन ग्राहो और लघु होने से ग्रहणी रोग नाशक, कषाय उष्ण विकाशि और होने से कफ नाशक, स्वादु अम्ल और सान्द्र होने से वातशामक है । इस प्रकार तक एक साथ ही व्यापि ग्रहणी और हेतुवात कफ के विपरीत होने से शामक है । इसी प्रकार वातज उर में पा का प्रयोग उष्ण वीर्य होने से वानहेतु को और प्रभाव से ज्वर को दूर करती है । ९. हेतुत्र्याधि-विपरीत विहार - दिन में शयन शरीर में स्निग्धता लाता है, स्निग्धता बढ़ जाने से कफ बढ़ कर नन्द्रा उत्पन्न कर देता है, ऐसी दशा में रात्रि में जागरण कराया जाता है । इससे शरीर में रूक्षता • बढ़ जाती है और कफ का नाश होकर तन्द्रा दूर हो जाती है । १०. हेतुविपरीतार्थकारी औषध-( विपरीतार्थंकारी उसे कहते हैं जो प्रत्यक्ष में विपरीत हो पर उसका फल ( अर्थ ) अनुकूल हो ) जैसे - पित्त प्रधान व्रणशोय में पित्त को वृद्ध करने वाला उष्ण उपनाह । ११. हेतुविपरीतार्थकारी अन्न --- पच्यमान व्रण शोथ में विवाह करने वाला अन्न जैसे तेल में पकायी कचौड़ी ( चक्षुस्तेजो हरी चोष्णा पाके वा विनाशिनी ) ( भावप्रकाश ) १२. हेतुविपरीतार्थकारी विहार - वान उन्माद रोग में भय को उत्पन्न करना इससे उन्माद नष्ट हो जाता है -- ' देहदुःखभयेभ्यो हि परं प्राणभयं महत् । तेन याति शर्मा तस्य सर्वतो विप्लुतं मनः । ( च.चि. अ. ९. ) १३. व्या विपरीतार्थकारी औषध - मन रोग में वमन कारक मदनफल का प्रयोग १४. व्याविविपरीतार्थ कारी अन्न- पित्तज अतिसार रोग में विरेचन के लिए दुग्ध का प्रयोग - ' बहुदोषस्य दीप्ताग्नं: सप्राणस्य न तिष्ठति । पैत्तिको यद्यतीसारः पयसा तं विरेचयेत् ॥ ' ( च. चि. अ. १ ९ ) । १५. व्यावि-विपरीतार्थकारी विहार - वमन साध्य छर्दिरोग में प्रवाहण कराना । १६. हेतुव्याधिविपरीतार्थंकारी औषध - अभिप्लुष्ट में उय अगुरु का लेप करना, या - प्लुष्टस्तपनं कार्यमुष्णं च भेषजम् । शरीरे स्त्रिन्नभूयिष्ठे स्विन्नं भवति शोणितम् ॥ प्रकृत्या ह्युदकं शीतं स्कन्दयत्यतिशोणितम् । तस्मात्सुख-यति न तु शीतं कथंचन ' ( सू. सु. अ. १२ ) वा विषपान जन्य विकार में विष का सेवन विशेषकर स्थावर विष में जङ्गम विष और जङ्गमविष में स्वावर विष का प्रयोग लाभदायी होता है, यथा- ' विषस्य विषमोषयम् । १७. हेतुव्याधिविपरीतार्थकारी अन्न अतिथि मद्यपान से उत्पन्न मदात्यय रोग में सविधि मदकारक मदिरापान यथा - ' ताक्ष्णोष्णेनातिमात्रेण पातेनाम्लविदाहिना । नरसोक्दो विदग्धः क्षारतां गतः ॥ अन्तदहं ज्वरं तृष्णां प्रमोहं विभ्रमं मदम् । जनयत्याशु तच्छान्त्यै मद्यमेव प्रदापयेत् ॥ क्षारो हि याति माधुर्य शीघ्रमम्लोपसंहितः । श्रेष्ठमम्लेपु मद्य च ॥ ' ( च.वि. अ. २४ ) । १८. हेतुव्याधिविपरीतार्थकारी विहार - व्यायाम करने से बात विकृत होने पर जल में तैराना रूपी व्यायाम कराना, ऐसा उरुस्तम्भ में कराया जाता है । जल में तैरने से बाहर शीत लगता है तब शरीर की उष्णता बाहर न जाकर अन्दर चली जाती है । इससे पिण्ट रूप में रहने वाला मैदा और कफ द्रव हो जाते है फिर व्यायाम कर्म से उनका शोषण हो जाता है । फलस्वरूप वात का आवरण ( रुकावट ) दूर हो जाता है और रोग नष्ट हो जाता है । अनुपशय भी रोग परीक्षा में सहायक माना है यथा - " गूढलिङ्गं व्याधिमुपशयानुपशयाभ्यां परीक्षेत ' ( च. वि. अ. ४ ) के अनुसार होता है । पर यहाँ आचार्य ने उसका वर्णन नहीं किया है । परन्तु वाग्भट ने - ' विपरीतोऽनुपशयः ' वा. नि. अ. १ ) से अनुपश्य बताया है । इसका कारण यह है कि अनुपशय का निदान में ही अन्तर्भाव कर लेते हैं । अतः यहाँ अलग नहीं कहा है, यथा- ' निदानोक्तानुपशयो विपरीनोपशायिता । ( वा. नि. अ. १ ) उपर्युक्त प्रकरण को ही विजयरक्षित ने अपनी मधुकोश टीका में इसे ' पउत्त्वापत्ति ' के रूप में प्रस्तुत किया है । अर्थात् अनुपशव को अलग मानने पर रोग के शान के साधन ५ न होकर ६ हो जायेंगे । अतएव अनुपशय का अन्नभव निदान में कर लेने पर ५ की संख्या में कोई वाधा नहीं पहुँचती है ।

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ज्वरनिदानाव्यायः १ ] निदानस्थानम् ६८७ चक्राणि के अनुसार उपशय के १८ भेदों का संग्रह निम्नलिखित रूप में किया जा रहा हूँ-उपयोग औषध अन्न विहार शोतकफज्वर में गुण्ठी श्रम तथा वातजन्य ज्वरदिवास्वाप से उत्पन्न १ हेतुविपरीत २ व्याधिविपरीत आदि उष्ण औषध अतिसार में स्तम्भनार्थं पाठा वा कुटज, कुष्ठ में खदिर, प्रमेह में हरिद्रा में मांसरस एवं भान कफ में रात्रि जागरण अतिसार में स्तम्भनार्थं उदावर्त में प्रवाहण ३ उभयविपरीत वातिक शोध में वात-हर तथा शोथहर दश-दुग्ध, शीतजन्य वात से ४ हेतुविपरीतार्थकारी मूल का काथ पित्तप्रधान फोड़े पर उष्ण उपनाह का प्रयोग ५ व्याधिविपरीता-र्थकारी ६ उभयविपरीता-र्थकारी छर्दि रोग में वमन-कारक मदन फल का प्रयोग अग्नि से जल जाने पर | अगुरु सदृश उष्णपदार्थों का लेप, विषजन्य रोग विष, ( जंगम विष पर मौल तथा मौल पर जंगम मसूर वातकफजन्य ग्रहणी तक तथा पित्तज में उत्पन्न ज्वर में पेया पैत्तिक फोड़े में विदाही अन्न अतिसार में विरे । चना क्षीरका प्रयोग मद्यपानजन्य मदात्यय में मद के उत्पादक मद्य का सेवन स्निग्ध पदार्थों के सेवन और दिवास्वाप से उत्पन्ना तन्द्रा में रूक्ष रात्रि-जागरण वातजन्य उन्माद में भयदर्शन छर्दि में वमन कराने के लिये प्रवाहण व्यायाम से उत्पन्न संमूढ़ वात ( ऊरुस्तम्भ ) जल में तैरने का व्यायाम विष का प्रयोग ) * संप्राप्तिर्जातिरागतिरित्यनर्थान्तरं व्याधेः ॥ ११ ॥

सम्प्राप्ति का लक्षण - सम्प्राप्ति, जाति और आगति ये पर्याय वाचक अर्थात् एकार्थवाची हैं | विमर्श - सम्प्राप्ति, जाति और आगति ये शब्द आपस में पर्य्याय बनकर जिस एक अर्थ का प्रतिपादन करते हैं उसे सम्प्राप्ति कहते हैं । इस प्रकार यह लक्षण और पर्याय दोनों ही का निर्देशक है । सम्प्राप्ति आदि का भिन्न - भिन्न अर्थ भी है, जैसे सम्प्राप्ति, सम्यकू प्रकार से किसी वस्तु की प्राप्ति जाति ( जन्म ), चमेली का पुष्प और प्रकुपित दोष का रोगोत्पादक व्यापार ' आगति ', आसमन्तात् गतिः प्राप्तिः ) ज्ञान, मोक्ष है । अतः दोषों का रोगोत्पादक व्यापार ही सम्प्राप्ति है । जैसे- ' व्याविजनक व्यापारविशेषयुक्तं व्याविजन्मेह सम्प्राप्तिशब्देन वाच्यम् । ' ( चक्रपाणि ) । व्याथिको उत्पन्न करने वाले दोषों के व्यापार के साथ जो रोग की उत्पत्ति होती है उसे ' सम्प्राप्ति ' कहते हैं । इसका तात्पर्य यह है कि विभिन्न कारणों से दूषित दोष प्रसरणशील

होकर जो - जो व्यापार कर रोग उत्पन्न करते है, उसे सम्पाप्ति कहा जाता है ।

सा संख्याप्राधान्यविधिविकल्पबलकालविशेषैभिद्यते ॥ ( १ ) ॥

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६०८ चरकसंहिता यह सम्प्राप्ति - १. संख्या, २. प्राधान्य, ३. विधि, ४. विकल्प, ५. बल, ६. काल भेद से ६ प्रकार की होती है ॥ ( १ ) ॥ * संख्या तावद्यथा - अष्टौ ज्वराः, पञ्च गुल्माः सप्त कुष्ठान्येवमादिः ॥ ( २ ) ॥ संख्या संप्राप्ति - १. संख्या जैसे आठ ज्वर पाँच गुल्म सात कुठ आदि इसी प्रकार है । ( २ ) || विमर्श - संख्या केवल भेद को ही बनाती है - " संख्या भेदमात्रं बोधिका भवति, निरन्वयो भेदः ' अर्थात् संख्या केवल भेद मात्र को बनाती है, जो अन्वयरहित हो उसे भेद कहते हैं । प्राधान्यं पुनर्दोषाणां तरर्तमाभ्यामुपलभ्यते । तत्र द्वयोस्तरः, त्रिषु तम इति ॥ ( ३ ) ॥ प्राधान्य सम्प्राप्ति - दोषों में तर तम अर्थात् बृद्धतर और वृद्धतम का होना प्राधान्य माना जाता है । उमके द्वन्द्वज में तर और सन्निपात में तम का प्राचान्य माना जाता है || ३ || विमर्श - दोषों या रोगों की स्वतन्त्रता को प्राधान्य समझा जाता है । जैसे सर्व प्रथम बात कुपित हुआ बाद में कफ या पित्त कुपित हुए तो स्वतन्त्र होने से वातप्राधान्य माना जाता है, या अपने सभी कारणों से प्रवल रूप में जो दोष कुपित होते हैं उसको प्राधान्य माना जाता है, या जो रोग सर्वप्रथम उत्पन्न हो उसे प्राधान्य माना जाता है । जैसे — ज्वर प्रथम हुआ बाद में कास हुआ तो स्वतन्त्र होने से ज्वर प्राधान्य और परतन्त्र होने से कास अप्राधान्य होता है । इसका लाभ चिकित्सा में यह होता है कि प्राधान्य की चिकित्सा से अप्राधान्य की चिकित्सा स्वयं हो जाती है । जैसे -- ' स्वातन्त्र्यपारतन्त्र्याभ्यां व्याः प्राधान्यमादिशेत् ' । ( वा. नि. अ. १ ) । ॐ विधिर्नाम - द्विविधा व्याधयो निजागन्तुभेदेन, त्रिविधाखिदोषभेदेन चतुर्विधाः साध्यासाध्यमृदुदारुणभेदेन ॥ ( ४ ) ॥ विवि सम्प्राप्ति - • विधि ( प्रकार ) भेद से दो प्रकार की व्याधियाँ निज, आगन्तुज, त्रिदोष भेद से तीन प्रकार की ( वातिक, पैत्तिक, श्लैष्मिक ), साध्य, असाध्य, मृदु, दारुण भेद से ४ प्रकार की होती है यह विधि सम्प्राप्ति है ॥ ४ ॥

विमर्श - ' समानेन धर्मेण परिग्रहो भेदानां यत्र क्रियते स विधिः ', जहाँ भेदों का समान धर्म से ग्रहण होता है उसे विधि कहते हैं । यहाँ विधि का प्रकार अर्थ है । प्रकार उसे कहते हैं जो अन्वय वाला होता है । ( अन्वयवान् प्रकार: ) जैसे रक्त पित्त दो प्रकार का है, ऊर्ध्वग और अधोग, अम्ल पित्त दो प्रकार का ऊर्ध्वम और अघोग, यक्ष्मा दो प्रकार का अनुलोम, और प्रतिलोम, रोग दो प्रकार के निज और आगन्तुज या शारीर और मानस, चिकित्सा दो प्रकार की होती है ।

लङ्घन और बृंहण आदि ।

* समवेतानां पुनर्दोषाणामंशांशबलविकल्पो विकल्पोऽस्मिन्नर्थे ॥ ( ५ ॥

विकल्प सम्प्राप्ति - एकत्रीभूत दोषों की पुनः कल्पना एवं अंश अंश के बल की कल्पना को इस अर्थ में विकल्प कहते हैं ॥ ( ५ ) ॥ १. ' तरतमाभ्यां योगेनोपलभ्यते ' इति पा । २. ' यद्यपि च संख्याप्राधान्यादिकृतोऽपि व्याधेविविभेदो भवत्येव, तथाऽपि संख्यादिभेदानां स्वसंज्ञयैव गृहीतत्वाद् गोबलीवर्दन्यायात् संख्याद्यगृहीते व्याधिप्रकारे विधिशब्दो वर्तनीयः ” चक्रः । ३. ' पृथक समवेतानां च ' इति पा ० । ४. ' समवेतानां सर्वेषां तेन एकशो द्विशो मिलितानां च दोषाणां ग्रहणम्; अंशं अंशं प्रति बल-मंशांशबल; तस्य विकल्प उत्कर्षापकर्षरूपोऽशांशवलविकल्पः एवंभूतो दोषाणामंशांश बलविकल्पोऽ-स्मिन्नर्थेऽस्मिन् प्रकरणे विकल्प उच्यते, प्रकरणान्तरे तु विकल्पशब्देन भेदमात्रमुच्यते ' चक्रः ।

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ज्वरनिदानाध्यायः १ ] निदानस्थानम् ६०६ विमर्श - सन्निपात रोगों में तर एवं तम भेद से कौन दोष कितना है । या कुपित वातादि दोषों में यह कल्पना करना कि कौन दोप अपने कुपित होने वाले कारणों में से एक अंश, या कुछ अंश या सभा अंशों से कुपित है, जैसे बताया है कि वान ' रौक्ष्य लाघव शैत्य वैश्द्य ' गुण से युक्त है इसी गुग वाला कषाय रस और मटर है तो यह बात को सभी अंशों से कुपित करता है, रौक्ष्य शैत्य, लाघवयुग से चौराई का शाक, तथा रौक्ष्य लायव से ईख ( गन्ना ) रौक्ष्य गुण से सीधु वात को कुपित करते है । पित्त को सर्व भाव से कटु रस और नदिरा, हिंगु कटु, तीक्ष्ण, उष्ण गुण से, जवाइन तीक्ष्ण एवं उष्ण गुण से, तिल केवल उष्ण गुण से बढ़ाने वाला है । कफ को सर्व भाव से मधुर रस और भैंस का दूध, खोरनी स्नेह गौरव माधुर्य्यं गुण से, कशेरू शैत्य, गौरव गुण से खीरी वृक्ष का फल शैत्य गुण से युक्त होकर प्रकोप करते है । इसमें कितने गुणों से किसका प्रकोप हुआ यह कलना विकल्प कहा जाता है । यथा - ' सर्वैर्भावैस्त्रिभिर्वापि द्वाभ्यामेकेन वा पुनः ।

संसर्गे कुपितः क दोषं दोषोऽनुधावति ॥ ' ( मु. सृ.अ. २१ ) ।

* वलकालविशेषःपुनर्व्याधीनामृत्वहोरात्राहारकालविधिविनियेतो भवति ॥ १२ ॥

वल और काल सम्प्राप्ति - • पुनः बल एवं काल भेद से व्याधियाँ ऋतु, अहोरात्र, आहार और काल विधि में नियत होती है ॥ १२ ॥

विमर्श - जब हेतु, पूर्वरूप और लक्षण सभी पूर्णरूप में ही तब उसे बल सम्प्राप्ति अर्थात् रोग को बलवान कहा जाता है । जैसे दिन में प्रातः रात्रि के प्रथम भाग, भोजन करते समय, वसन्त ऋतु में कफ बढ़ता है और अपने काल में कफज रोगों को बढ़ाता भी है, इसी प्रकार वान एवं पित्त का स्वभाव मे बने का जो समय होता है वही समय तज्जन्य रोगों का भी मानाजाता है । इसे

काल सम्प्राप्ति कहा जाता है ।

तस्माद्व्याधीन् भिपगनुपहत सत्त्वबुद्धिर्हेत्वादिभिर्भावैर्यथावदनुबुद्धयेत ॥ १३ ॥

निदान - पक का प्रयोजन - - इसलिए अधिकृत मन एवं बुद्धियुक्त वैद्य हेतु पूर्वरूप, लक्षण, उपशय एवं सम्प्राप्ति के द्वारा रोग को ठीक ठीक समझे ॥ १३ ॥

इत्यर्थसंग्रहो निदानस्थानस्योद्दिष्टो भवति । तं विस्तरेणोपदिशन्तो भूयस्तरमतोऽनु-व्याख्यास्यामः ॥ १४ ॥

इस प्रकार निदान स्थान के प्रयोजन को संक्षेप में बता दिया गया है । विस्तार से उपदेश करते हुए इसकी व्याख्या यथास्थान ( अर्थात् प्रत्येक रोगों के वर्णन अवसर पर जैसे इस रोग का क्या कारण, क्या पूर्वरूप, क्या लक्षण, क्या उपशय और क्या सम्प्राप्ति है ) किया जायगा || १४ || तत्र प्रथमत एव तावदाद्याँल्लोभाभिद्रोहकोपप्रभवानष्टौ व्याधीन्निदानपूर्वेण क्रमेण व्याख्यास्यामः, तथा सूत्रसंग्रहमात्रं चिकित्सायाः । चिकित्सितेषु चोत्तरकालं यथोपचित-विकाराननुव्याख्यास्यामः ॥ १५ ॥

आठ रोगों का क्रमिकत्व - सर्वप्रथम यहाँ लोभ, अभिद्रोह, और कोप से उत्पन्न मुख्य आठ रोगों का नित्रानपूर्वक क्रम से व्याख्या करेंगे । और संक्षेप में चिकित्सा सूत्र भी बतायेगे । चिकित्सा स्थान ने इन आठों रोगों को कहने के बाद अन्य उपचित रोगों की क्रम से व्याख्या करेंगे ॥ १५ ॥

१. ' बलकालविशेषः ऋतवो वसन्तादयः अहोरात्र आहारच तेषा कालविधिना विनियतोऽव-धरितो भवति । यस्य दोषस्य यो बलकालविशेषः ऋत्वादिभित्रवधार्यते तद्दोषजव्याधेरपि नैर्ऋत्वा-दिभिर्बलकालविशेषोऽवधार्यते ' गङ्गाधरः । २. ' तं विस्तरेण भूयस्तरनिति, पा. । ३. ' योगीन्द्रनाथसेनस्तु चिकित्सितं चोत्तरकालं यथोद्दिष्टं विकाराणाम् ' इति पठति । ३६ च ० सं ०

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६१० चरकसंहिता इह खलु ज्वर एवादी विकाराणामुपदिश्यते, तत्प्रथमत्वाच्छारीराणाम् ॥ १६ ॥

( २ ) ज्वर प्रकरण ज्वर का प्राधान्य - यहाँ पर शारीरिक रोगों में ज्वर प्रथम हुआ है इसलिए रोगों में पहले ज्वर का ही उपदेश ( वर्णन ) करेंगे ॥ १६ ॥

* अथ खल्वष्टाभ्यः कारणेभ्यो ज्वरः संजायते मनुष्याणां तद्यथा - वातात् पित्तात्, कफात्, वातपित्ताभ्यां वातकफाभ्यां पित्तकफाभ्यां वातपित्तकफेभ्यः, आगन्तोरष्टमात् कारणात् ॥ १७ ॥।

ज्वर के ८ भेट - मनुष्यों के शरीर में आठ कारणों से ज्वर होता है, जैसे- १. वात, २. पित्त, ३. कफ, ४. वातपित्त, ५. वातकफ, ६. पित्तकफ, ७. वातपित्तकफ से और ८. आगन्तु कारण से ॥ १७ ॥

तस्य निदान पूर्वरूपलिङ्गोपशय विशेषाननुव्याख्यास्यामः ॥ १८ ॥

उस ज्वर के निदान, पूर्वरूप, लिङ्ग, उपशय और सम्प्राप्ति का व्याख्यान करेंगे ॥ १८ ॥

रूक्षलघुशीत वमन विरेचनास्थापन शिरोविरेचनाति योगव्यायामवेगसंधारणानशनाभि-घातव्यवायोद्वेगशोकशोणितातिषेकजागरण विषमशरीरन्यासेभ्योऽतिसेवितेभ्यो वायुः प्रकोपमापद्यते ॥ १ ९ ॥ वातज्वर का निदान रूक्ष, लघु, शीत, ( आहार - विहार ) वमन, विरेचन, आस्थापन ( वस्ति ), शिरोविरेचन ( नस्य ) इनके अतियोग, व्यायाम, वेतसन्धारण ( मलमूत्रादि के वेगों को रोकना ), अनशन ( उपवास ), अभिघात ( चोट लगना ), व्यवाय, ( मैथुन ), उद्वेग ( चित्त में व्याकुलता बड़ जाना ), शोक, अधिक रक्तमोक्षण, रात्रि में जागना, शरीर को विधन रूप में रखना आदि का अतिसेवन किया जाय तो वात कुपित हो जाता है ॥ १ ९ ॥ स यदा प्रकुपितः प्रविश्यामाशयमूप्मणा सह मिश्रीभूयाद्यमाहारपरिणामधातुं रस-नामानमन्ववेत्य रसस्वेदवहानि स्रोतांसि पिधायाग्निमुपहत्य पत्तिस्थानादूष्माणं बहिनि -रस्य केवलं शरीरमनुप्रपद्यते, तदा ज्वरमभिनिर्वर्तयति ॥ २० ॥

ज्वर वायु जब आमाशय में जाकर ऊष्मा की सम्प्राप्ति - ऊपर के कारणों से प्रकुपित से मिलकर और आहार के पक जाने पर बना हुआ पहला रसनामक धातु से मिलकर रसवह् एवं स्वेदवह स्रोतों को बन्द कर और अग्नि की शक्ति को नष्ट कर एवं पक्तिस्थान से अग्नि को बाहर निकाल कर सम्पूर्ण शरीर में फैल जाता है तब ज्वर की उत्पत्ति होती है ॥ २० ॥

तस्येमानि लिङ्गानि भवन्ति तद्यथा - विषमारम्भविसर्गित्वम्, ऊष्मणो वैषम्यं, तीव्र-तनुभावानवस्थानानि ज्वरस्य, जरणान्ते दिवसान्ते निशान्ते धर्मान्ते वा ज्वरस्याभ्याग-मनमभिवृद्धिर्वाविशेषेण परुषारुण वर्णत्वं नखनयनवदनमूत्रपुरीषत्वचामत्यर्थ क्लुप्तीभावश्च; अनेकविधोपमाश्चलाचलाश्च वेदनास्तेषां तेषामङ्गावयवानां; तद्यथा - पादयोः सुप्तता, पिण्डि -कयोरुद्वेष्टनं, जानुनोः केवलानां च सन्धीनां विश्लेषणम्, ऊर्वोः सादः, कटीपार्श्वपृस्कन्धवा-ह्वंसोरसां च भग्नरुग्णमृदितमथितचटिताव पाटितावनुन्नत्वमिव, हन्वोश्चाप्रसिद्धिः, स्वनश्च १. ' प्रविश्यामाशय मूष्मणः स्थानमूष्मणा सह ' इति पा. । २. ' अन्विति यथोक्तक्रमेण, अवेत्य गत्वा ' चक्रः । ३. ‘ क्लृप्तीभावोऽप्रवृत्तिः, सा च योग्यनया मूत्रपुरीषयोरेव ' चक्रः । ४. ‘ अवनुन्नं प्रेरितं ’ चक्रः | योगीन्द्रनाथस्तु ' अवतुन्नत्वमित्र ' इति पठति, ' अवतुन्नत्वं प्राजने-नेव तोद: ' इति च व्याख्यानयति ।

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ज्वरनिदानाध्यायः १ ] निदानस्थानम् ६११ कर्णयोः, शङ्खयोर्निस्तोदः, वषायास्यता आस्यवैरस्थं वा, मुखतालुकण्ठशोषः, पिपासा, हृदयग्रहः, शुल्कच्छर्दिः, शुल्ककासः, तवथूहारविनिग्रहः, अन्नरसंखेदः, प्रसेकारोचकावि-पाकाः विषादजृम्भाविनामवेपथुश्रमभ्रमप्रलापप्रजागर रोमहर्षदन्तहर्षाः, उष्णाभिप्रायता, निदानोकानामो विपरीतोपशयश्चेति वार्तज्वरस्य लिङ्गानि भवन्ति ॥ २१ ॥

वातज्वर का लक्षण उस वातज्वर के ये लक्षण होते हैं, जैसे- विषनारम्भ- विसर्गी ( प्रारम्भ और विसर्ग करते समय अनियत वेग ) का होना, ताप का घटते - बढ़ते रहना, ज्वर का कभी तीव्र होना कभी इलका होना, भोजन पचने के बाद, दिन के अन्त में, रात्रि के अन्त में, वर्षा ऋतु में ज्वर के वेग का आना या बढ़ जाना, विशेषकर नख, नेत्र, मुखमंडल, सूत्र, मल और त्वचा में रूखापन और अरुण ( रक्त ) वर्ण का होना, मल मूत्र का रुक जाना, भिन्न - भिन्न अङ्गों में अनेक प्रकार को चल व अचल वेदना का होना, जैसे- दोनों पैरों में शून्यता, निण्डिकाओं में ऐठन जानु की सन्धि में या सारे शरीर की सन्धि में विश्लेषण ( अर्थात् सन्धियाँ खुल नई है ऐसा अनुभव होना ). जमओं में शिथिलता, कटि, पार्श्व, पीठ, कन्धा, बाहू, अंस और छाती में टूटने की तरह वेदना का होना, मृदित ( मसल देने की तरह ), मथने की तरह वेदना का होना, दुखाने की तरह वेदना, दवाने की तरह वेदना, ढकेलने की तरह वेदना का होना, दोनों हनु अपने कार्य में असमर्थ से प्रतीत हों, कान में झनझनाहट, शंख प्रदेश में सुई चुभोने की पीड़ा, नुख ने कसैलापन या विरसता का होना, मुख, तालु और कण्ठ का सूखना, प्यास की अधिकता, हृदय की जकड़न, शुष्क छर्दि, सूखी खाँसी, छींक और डकार का न आना, अन्नरस ( भोजन ) में इच्छा का न होना, मुख से पानी का निकलना, अरुचि और अपचन, विषाद, जम्भाई, शरीर में आक्षेप जैसे टेढ़ापन, कम्प, थकावट, चक्कर, प्रलाप नींद न आना, रोनांच का होना. दाँतों का खट्टा हो जाना, उष्णता ( ताप ) की इच्छा, ज्वर के या वातदोष के बताए हुए कारणों से रोग की वृद्धि रूप अनुपशय का होना, और ज्वर-नाशक एवं वातनाशक भावों से लाभ होना, यह सब वात ज्वर के लक्षण होते हैं ॥ २१ ॥

उष्णाम्ललवणक्षारकटुकाजीर्णभोजनेभ्यो ऽति सेवितेभ्यस्तथा तीच्णातपाग्निसंतापश्रम-क्रोधविषमाहारेभ्यश्च पित्तं प्रकोपमापद्यते ॥ २२ ॥

पित्तज्वर का निदान उष्ण, खट्टा, लवण, खार, कटु आदि द्रव्यों के अधिक खाने से, अजीर्ण में भी भोजन करने से और तीक्ष्ण धूप, अग्नि का अधिक तापना, श्रम, क्रोध और विषम भोजन से पित्त का कोप हो जाता है ॥ २२ ॥

तद्यदा प्रकुपितमामाशयादूष्माणमुपसृज्याद्यमाहारपरिणामधातुं रसनामानमन्ववेत्य-रसस्वेदवहानि स्रोतांसि पिधाय द्रवत्वादग्निमुपहत्य पक्तिस्थानादूष्माणं वहिनिरस्य प्रपीड-यत् केवलं शरीरमनुप्रपद्यते, तदा ज्वरमभिनिर्वर्तयति ॥ २३ ॥

पित्तज्वर की सम्प्राप्ति - इस प्रकार प्रकुपित पित्त आमाशय से ऊष्मा को साथ लेकर ( अर्थात् उससे मिलकर ) आहार के परिणाम स्वरूप आद्य रस नामक धातु से मिलकर रस एवं स्वेदवह स्रोतों को बन्द कर द्रव होने के कारण अग्नि को नष्ट कर फिर पाकस्थली से अग्नि १. ' अन्नरसे मधुरादी खेदः सर्वग्सेध्वनिच्छेत्यर्थः ' चक्रः । २. ' योगीन्द्रनाथस्तु ' वातज्वरस्य लिङ्गानि भवन्ति ' इति न पठति । ३. ' आमाशयं प्रविशदेवो माणमुपसृजदाद्यम् ' यो । ४. ' वहिर्द्वारं निरस्य ' यो । ' बहिर्वा संप्रपीडयत् ' ह. ।