चरक संहिता हिन्दी भाष्य — पृष्ठ 701–710

चरक संहिता हिन्दी भाष्य · Chaukhamba · पृष्ठ 701–710

पृष्ठ 701

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६१२ चरकसंहिता को बाहर निकाल कर पीड़ा उत्पन्न करते हुये सारे शरीर में फैल जाता है तब ज्वर उत्पन्न करता है || २३ ॥ तस्येमानि लिङ्गानि भवन्ति; तद्यथा - युगपदेव केवले शरीरे ज्वरस्याभ्यागमनमभि-वृद्धिर्वा भुक्तस्य विदाहकाले मध्यन्दिनेऽर्धरात्रे शरदि वा विशेषेण, कटुकास्यता, प्राणमुख-कण्ठौष्ठतालुपाकः, तृष्णा, मदो, भ्रमो, मूर्च्छा पित्तच्छर्दनम्, अतीसारः, अन्नद्वेषः, सदनं, खेदः, प्रलापः, रक्तकोठाभिनिर्वृत्तिः शरीरे, हरितहारिद्रत्वं नखनयनवदनमूत्रपुरीषत्वचाम्, अत्यर्थमूष्मणस्तीव्रभावः, अतिमात्रं दाहः, शीताभिप्रायता, निदानोक्तानुपश्य विपरीतो-पशयश्चेति पित्तज्वरलिङ्गानि भवन्ति ॥ २४ ॥

पित्तज्वर के लक्षण - उस पित्त ज्वर के ये लक्षण होते हैं जैसे-- एक साथ ही सारे शरीर में ज्वर का होना और बढ़ना, विशेष रूप से भोजन के पचने के समय, मध्याह्न में, आधीरात में और शरद ऋतु में उत्पन्न होना या बढ़ना, मुख के स्वाद का कटु होना, नाक, मुख, कण्ठ, ओठ और तालु का पक जाना, अधिक प्यास, नट, चक्कर आना, मूर्च्छा, पित्त का वमन, अनितार, अन्न खाने की इच्छा न होना, देह में पीड़ा, पसीना का आना, प्रलाप शरीर में रक्त वर्ण के चकत्ते का निकलना, हरे रंग या हल्दी के रंग की तरह नव, नयन, बदन, सूत्र, मल और त्वच का हो जाना, ताप का अधिक बढ जाना और दाद का अधिक अनुभव होना, शीतल पदार्थों की अधिक इच्छा, निदान में बताए हुये पित्त ज्वर एवं पित्त को उत्पन्न करने वाले पदार्थ का हानि कारक होना और निदानविपरीत पित्तज्वर एवं पित्तनाशक पदार्थ का लाभ दायक होना, ये पित्तञ्चर के लक्षण है ॥ २४ ॥

त्रिग्धगुरुमधुरपिच्छिलशी ताम्ललवणदिवास्वप्नपव्यायामेभ्योऽतिसेवितेभ्यः श्लेष्मा प्रकोपमापद्यते ॥ २५ ॥

कफज्वर का निदान - अधिक स्निग्ध, गुरु, मधुर, पिच्छिल, शीतल, खट्टा और नमकीन इस प्रकार के अन्न को अधिक खाने से, दिन में शयन, अति प्रसन्नता, परिश्रम न करना, आदि कारणों से कफ कुपित हो जाता है ॥ २५ ॥

स यदा प्रकुपितः प्रविश्यामाशयमूष्मणा सह मिश्रीभूयाद्यमाहारपरिणामधातुं रसना-मानमन्ववेत्य रसस्वेदवहानि स्रोतांसि पिधायानिमुपहत्य पत्तिस्थानादूष्माणं वहिर्निरस्य प्रपीडयन् केवलं शरीरमनुप्रपद्यते, तदा ज्वरमभिनिर्वर्तयति ॥ २६ ॥

कफज्वर की सम्प्राप्ति — उपर्युक्त कारणों से कुपित हुआ करू जब आभाशय में जाकर ऊष्मा गर्मी के साथ मिलकर आहार - परिणाम स्वरूप पहला रसनामक धातु से मिल कर रसवह एवं स्वेदवह स्रोतों को बन्द कर अग्नि को नष्ट ( मन्द ) कर पक्तिस्थान से अग्नि को बाहर कर पीड़ा उत्पन्न करते हुए सारे शरीर में फैलता है तब ज्वर को उत्पन्न करता है ॥ २६ ॥

तस्मानि लिङ्गानि भवन्ति तद्यथा - युगपदेव केवले शरीरे ज्वरस्याभ्यागमनमभिवृ-द्धिर्वा भुक्तमात्रे पूर्वा पूर्वरात्रे वसन्तकाले वा विशेषेण, गुरुगात्रत्वम्, अनन्नाभिलाषः, श्लेप्प्रसेकः, मुखमाधुर्य, हल्लासः, हृदयोपलेपः, सिमितत्वं, छदिः, मृद्वग्निता, निद्रा-धिक्यं, स्तम्भः, तन्द्रा, कासः, श्वासः, प्रतिश्यायः, शैत्यं, वैत्यं च नखनयनवदनमूत्रपुरी-पत्वचाम्, अत्यर्थं च शीतपिडका भृशमङ्गेभ्य उत्तिष्ठन्ति, उष्णाभिप्रायता, निदानोक्तानु-पायो विपरीतोपशयश्च; इति ( श्लेप्मज्वरलिङ्गानि भवन्ति ) ॥ २७ ॥

१. ' अङ्गे भृशमुत्तिष्ठन्ति ' यो ।

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ज्वदनिदानाध्यायः १ निदानस्थानम् ६१३ कफज्वर का लक्षण — उस कफ ज्वर के ये लक्षण होते हैं जैसे- एक साथ सारे शरीर में ज्वर का होना या बढ़ जाना, विशेष कर भोजन करते ही, प्रातः काल में, रात्रि के प्रथम प्रहर में, वसन्त ऋतु में ज्वर की उत्पत्ति या वृद्धि हो, शरीर में भारीपन, भोजन करने की इच्छा का न होना, मुख से कफ का निकलना, मुख का मीठा बना रहना, मिचली आना, हृदय के उपर कोई वस्तु लेप कर दिया गया हो ऐसा अनुभव होना गीले कपड़े से शरीर ढांक दिया गया हो ऐसा अनुभव होना, वमन होना, अग्नि की मन्दता, निद्रा का अधिक रूप में आना, शरीर में जकड़ाहट, तन्द्रा, कास - श्वास, सर्दी का होना, नख, नेत्र, मुखमण्डल, मूत्र, मल और त्वचा का शीतल एवं श्वेन हो जाना, शरीर में अधिक शीत पिडकायें हो जाना गरम वस्तुओं को अधिक चाहना, श्लेष्मज्वर के कारणों के सेवन से हानि और श्लेष्म या इलेष्मज्वर नाशक वस्तुओं से लाभ का होना, कफ ज्वर का लक्षण है ॥ २७ ॥

विषमाशनादनशनादन्न परिवर्तादृतुव्यापत्तेरसात्म्यगन्धोपघ्राणाद्विषोपहतस्य चोदक-स्योपयोगानरेभ्यो गिरीणां चोपश्लेषात् स्नेहस्वेदवमनविरेचनास्थापनानुवासनशिरोविरेच-नानामयथावत्प्रयोगाद् मिथ्यासंसर्जनाद्वा खीणां च विषमप्रजननात् प्रजातानां च मिथ्योपचाराद्यथोक्तानां च हेतूनां मिश्रीभावाद्यथानिदानं द्वन्द्वानामन्यतमः सर्वे वा यो दोषा युगपत् प्रकोपमापद्यन्ते, ते प्रकुपितास्तयैवानुपूर्व्या ज्वरमभिनिर्वर्तयन्ति ॥२८ ॥

इन्द्रज और सन्निपात ज्वर के निदान - विषम भोजन से, उपवास से, भोजन के परिवर्तन से, ऋतुओं के विकार से ( अतियोग, अयोग, मिथ्यायोग से ), प्रकृति के विपरीत गन्ध का नाक में प्रवेश करने से, विषदूषित जल के पीने से, कृत्रिम विष के प्रयोग से, पर्वतों के पास रहने से, नियमविपरीत सहन, स्वेदन, वमन, विरेचन, आस्थापनवस्ति, अनुवासनवस्ति, शिरोविरेचन ( नस्य ) के प्रयोग से, या मिथ्या संसर्जन से ( विधिपूर्वक बताए हुए पञ्चकर्म के बाद पेया, विपी आदि संसर्जन क्रम का उचित पालन न करने से ), स्त्रियों में उचित रूप से प्रसव के न होने से, प्रसव के बाद अनुचित आहार - विहार के सेवन करने से, और पूर्वोक्त कारणों के मिश्रित होने से, निदान के अनुसार द्वन्द्वों में से कोई एक या दो दोष, या तीनों दोषों के कुपित होने की समग्री हो तो दोषत्रय एक साथ ही कुपित हो जाते हैं । और वे कुपित दोष उसी प्रकार सम्प्राप्ति के द्वारा ज्वर को उत्पन्न करते है ॥ २८ ॥

तत्र तथोक्तानां ज्वरलिङ्गानां मिश्रीभावविशेषदर्शनाद्द्द्वान्द्विकमन्यतमं ज्वरं सान्निपा-किंवा विद्यात् ॥ २ ९ ॥ इनमें पूत्र में बनाए हुए ज्वर - लक्षण के मिलित होने के प्रकार को देखकर इन्द्रज ज्वर या सन्निपान ज्वर में किसी एक को समझे ॥ २ ९ ॥ अभिवाताभिषङ्गाभिचाराभिशापेभ्य आगन्तुर्हि व्यथापूर्वोऽष्टमो ज्वरो भवति । स किंचित्कालमागन्तुः केवलो भूत्वा पश्चाद्दोषैरनुवध्यते । तत्राभिघातजो वायुना दुष्टशोणि-ताधिष्ठानेन, अभिषङ्गजः पुनर्वातपित्ताभ्याम्, अभिचाराभिशापजौ तु सन्निपातेनानु-वध्येते ॥ ३० ॥

आगन्तुज ज्वर - १. अभिघात ( किसी भी प्रकार से चोट लगना ) २. अभिषङ्ग ( काम, क्रोध, लोभ, मोह, शोक आदि के संसर्ग ) ३. अभिचार ( वैदिक या तान्त्रिक मंत्रों द्वारा मारण, मोहन, उच्चाटन आदि क्रियाओं का प्रयोग ४. अभिशाप ( ब्राह्मण, गुरु, वृद्ध, सिद्ध, या अतिदर्शन या अधिक सताए हुए की अन्तरात्मा से निकला अनिष्ट शाप या कथन ) इन ४ कारणों से शरीर में पहले व्यथा उत्पन्न कर आठवां आगन्तुक ज्वर उत्पन्न हो जाता है । वह कुछ काल

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६१४ चरकसंहिता अपनी अवस्था में ही आगन्तुक स्वरूप का होकर बाद में अपनी प्रकृति के अनुसार भिन्न भिन्न वातादि दोषों से युक्त होता है । इनमें अभिवातज ज्वर दुष्ट रक्त में आश्रित वायु से अभिषङ्गज-वात - पित्त के संसर्ग से, अभिचारज्वर और अभिशापज्वर सनिदान से होता है | ॥ ३० ॥

सप्तविधाज्ज्वराद्विशिष्टलिङ्गोपक्रमसमुत्थानत्वाद्विशिष्टो वेदितव्यः कर्मणा साधार-न चोपचर्यते । इत्यष्टविधा ज्वरप्रकृतिरुक्ता ॥ ३१ ॥

यह आगन्तुज ज्वर विशिष्ट लक्षण, चिकित्सा एवं निदान ( कारण ) के होने से ७ प्रकार के बनाए निज ज्वर से विशेष होता है, साधारण क्रम से इसकी चिकित्सा की जाती है, इस प्रकार ज्वर की आठ प्रकृति बताई गयी है ॥ ३१ ॥

विमर्श - निज तथा आगन्तुज ज्वर में भेद -निज १. मिथ्याहार - विहार से । २. शरीर में दोष पहले कुपित होते हैं, बाद में लक्षण उत्पन्न होता है ३. दोष - भेद से ७ प्रकार का होता है । ४. चिकित्सा दोषानुसार होती है आगन्तुज १. अभिघात, अभिषङ्ग आदि कारणों से । २. शरीर में पहले लक्षण उत्पन्न होता है । तब बाद में दोषों का कोप होता है । ३. कारण भेद से अनेक प्रकार का होता है ४. चिकित्सा कारणानुसार होती है ज्वरस्त्वेक एव संतापलक्षणः । तमेवाभिप्राय विशेषाद्विविधमाचज्ञते, निजागन्तुविशे-पाञ्च । तत्र निजं द्विविधं त्रिविधं चतुर्विधं सप्तविधं चाहुर्भिषजो वातादिविकल्पात् ॥ ३२ ॥

ज्वर का प्रकार - भेद — ' संताप लक्षण वाला तो एक प्रकार का ही होता है, उसी एक ज्वर को अभिप्राय नेद से १. निज, और २. आगन्तुज की भिन्नता से दो प्रकार का कहते है । उसमें निज रोग दो प्रकार का ( जैसे सौम्य और आग्नेय ), तीन प्रकार का ( वातज, पित्तज, कफज ) ४ प्रकार का ( वानज, पित्तज, कफज और आगन्तुज ) और सात प्रकार का ( पृथक् दोष से ३, द्वन्द्व ३, सन्निपात १, इस प्रकार सात ) वातादि दोप भेद से होता है ॥ ३२ ॥

निम्नांकित सारणी में ज्वर के भेद अंकित हैं । उवर 1 आगन्तुज निज एक दोष द्विदोष सन्निपात १३ वानज पित्तज कफज ( च. सू. अ. १७ ) 1 विषमज्वर वातपित्तज वातकफज कफपित्तज सन्तत सतत अभिघात अभिपंग अभिचार अभिशाप अन्येद्युष्क तृतीयक चतुर्थक तस्येमानि पूर्वरूपाणि भवन्ति तद्यथा —- मुखवैरस्थं, गुरुगात्रत्वम्, अनन्नाभिलाषः, चक्षुषोराकुलत्वम्, अश्वागमनं निद्राधिक्यम्, अरतिः, जृम्भा, विनामः, वेपथुः, श्रमश्रम-१. ' वा जगुर्भिषजः ' यो ।

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ज्वरनिदानाध्यायः १ ] निदानस्थानम् ६१५ प्रलापजागरणरोमहर्षदन्तहर्षाः, शब्दशीतवातातपसहत्वासहत्वम्, अरोचकाविपाकी, दौर्बल्यम्, अङ्गमर्दः, सदनम्, अल्पप्राणता, दीर्घसूत्रता, आलस्यम्, उचितस्य कर्मणो हानिः प्रतीपता स्वकार्येषु, गुरूणां वाक्येष्वभ्यसूया, बालेभ्यः प्रद्वेषः, स्वधर्मेष्वचिन्ता, माल्यानुलेपनभोजनपरिक्लेशनं, मधुरेभ्यश्च भक्षेभ्यः प्रद्वेषः, अम्ललवणकटुकप्रियता च, इति ज्वरस्य पूर्वरूपाणि भवन्ति प्राक्संतापात्; अपि चैनं संतापार्तमनुबध्नन्ति ॥ ३३ ॥

ज्वर के सामान्य पूर्वरूप - उस ज्वर के ये सब पूर्वरूप हैं- जैसे मुख के स्वाद में फीका-पन का अनुभव शरीर में भारीपन, आहार की इच्छा न होना, नेत्र का व्याकुल रहना, आँसू का निकलना, निद्रा का अधिक रूप में आना, बेचैनी, जम्भाई का आना, अङ्गों में झुकाव का होना या आक्षेप का आना, कम्प, थकावट, चक्कर, प्रलाप करना, निद्रा का न आना, रोमांच, ढाँन का हर्ष, शब्द, शांत, वात, धूप, इनको सहन न करना, भोजन का अच्छा न लगना, अन्न का न पचना, दुर्बलता, अङ्गमर्द, सदन ( अवसाद ), मानसिक दुर्बलता, दीर्घसूत्री होना, आलस्य, उचित अर्थात् अभ्यस्त कार्यों का ठीक न करना, अपने प्रत्येक कार्यों को उलटा करना, अपने से श्रेष्ठ व्यक्तियों के उचित वाक्यों में दोष देखना या न मानना, बालकों से द्वेष करना, अपने नित्य नैमित्तिक धार्मिक कार्यों के विषय में न शोचना, पुष्प की मालाओं का धारण, चन्दन और उत्तम भोजन का क्लेशदायक होना, स्वादु भोजन से द्वेष रखना, खट्टा, नमकीन और कटु वस्तुओं से प्रेम रखना ये सब ज्वर के ( सामान्य ) पूर्वरूप हैं । ये पूर्वरूप सन्ताप से पहले होते हैं, और सन्ताप ( ज्वर ) से पीडित होने पर भी होते हैं ॥ ३३ ॥

इत्येतान्येकैकशो ज्वरलिङ्गानि व्याख्यातानि भवन्ति विस्तारसमासाभ्याम् ॥ ३४ ॥

इस प्रकार एक एक ज्वर अर्थात् वातज, पित्तज, कफज, वातपित्तज, वातकफज, पित्तकफज, सन्निपातज और आगन्तुज ज्वरों का लिङ्ग अर्थात् निदान, पूर्वरूप, लक्षण, उपशय सम्प्राप्ति का वर्णन वातज, कफज, पित्तज का विस्तार से और द्वन्द्वज और सन्निपातज्वर का संक्षेप में वर्णन कर दिया गया है ॥ ३४ ॥

* ज्वरस्तु खलु महेश्वरकोपप्रभवः, सर्वप्राणभृतां प्राणहरो, देहेन्द्रियमनस्तापकरः, प्रज्ञा-बलवर्णहपत्साहहासकरः, श्रमक्कममोहाहारोपरोधसंजननः; ज्वरयति शरीराणीति ज्वरः, नान्ये व्याधयस्तथा दारुणा बहूपड़वा दुश्चिकित्स्याश्च यथाऽयम् । स सर्वरोगाधिपतिः, नानातिर्यग्योनिषु च बहुविधैः शब्दैरभिधीयते । सर्वे प्राणभृतः सज्वरा एव जायन्ते सज्वरा एव म्रियन्ते च स महामोहः तेनाभिभूताः प्राग्दैहिकं देहिनः कर्म किंचिदपि न स्मरन्ति, सर्वप्राणभृतां च ज्वर एवान्ते प्राणानादत्ते ॥ ३५ ॥

ज्वर की महत्ता - ज्वर तो निश्चित रूप से शंकर जो के कोप से ही उत्पन्न हुआ है । सभी जीवधारियों के प्राण का नाश करने वाला है | शरीर, इन्द्रिय और मन में ताप उत्पन्न करने वाला है: बुद्धि, बल, वर्ण, हर्ष और उत्साह को कम करनेवाला है. श्रम, कुम ( बिना परिश्रम के थकावट ) और मोह ( बेहोशी ) को उत्पन्न करने वाला और भोजन में अरुचि करने वाला है एवं शरीर में ताप उत्पन्न करने वाला है, अतः ज्वर कहते है । दूसरे रोग ऐसे कठिन नहीं होते हैं जैसा ज्वर है । यह बहुत उपद्रव वाला और चिकित्सा करने में कठिन है । उवर रोगों का राजा है, अनेक प्रकार के तिर्यक् योनियों ( पशु, पक्षी, वृक्ष, पहाड़ भूमि आदि ) में भी होता है और भिन्न नाम से कहा जाता है । सभी प्राणि ज्वर के साथ ही उत्पन्न होते हैं और ज्वर के साथ ही मृत्यु प्राप्त १. ' उष्णाम्ललवणकटुकप्रियता ' ग. २. ' हर्षोत्साहसादनः ' इति पा. ।

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६१६ चरकसंहिता करते हैं । वह ज्वर महामोह स्वरूप वाला है । इसी महामोह से युक्त होने के कारण प्राणिमात्र अपने पूर्व जन्म के किए हुए कार्यों को कुछ भी स्मरण नहीं करते हैं । सभी स्थावर एवं जङ्गम जीवधारियों का प्राण मृत्यु के समय में स्वर के होने पर ही जाता है ॥ ३५ ॥

विमर्श - ज्वर सभी रोगों में कठिन है । क्योंकि जब शरीर में किसी प्रकार का दुःख होता है तो संताप अवश्य होता हैं चाहे वह शारीरिक हो या मानसिक, और शरीर एवं मन में ताप होने को ही ज्वर कहा जाता है जैसे -- ' देहेन्द्रिय मनस्तापी सर्वरोगाग्रजो वली । ' ( च.चि. अ. ३ ) । मानसिक ताप का भी लक्षण चरक में ही बताया है यथा - ' वैचित्यमरनिग्लानिर्मनः सन्तापलक्षणम् । ' ( चि. अ. ३ ) - चित्त का न लगना, बेचैनी, ग्लानि का अनुभव होना यह लक्षण मन में संताप होने पर होना है! यही कारण है कि जन्म के प्रारम्भ और मृत्यु के समय ज्वर का होना बताया है । जब गर्भाशय से अपत्यपथ के द्वारा गर्भ को निकलना पड़ता है तो मार्ग संकुचित होने पर उसे कष्ट होता है । और उसके मन में ताप हो जाता । इसी प्रकार मृत्यु के समय जब यह शरीर छूटने लगता है । नो जीव को माया से आवृत रहने से मोह एवं मानसिक ताप हो जाता है । शरीर की गर्मी बढ़ जाती है, यहाँ ताप का अर्थ यह नहीं है, यद्यपि ताप का बढ़ना भी मृत्युमूचक हैं पर देखा जाता है कि शीत लगने से, बर्फ से आक्रान्त होने पर मृत्यु सहसा होती है पर गर्मी की वृद्धि बिलकुल नहीं होती है । नाड़ी से मृत्यु की परीक्षा करने का उपदेश में – ' अतिक्षीणा च शीना च जीवितं हन्त्यशेषतः । " से शीत होने पर मृत्यु तथा - कामं प्राणहरा रोगा बहवो न तु ते तथा । यथा हिक्का च श्वासश्च हरतः प्रागमाशु वे ॥ ' ( च. चि. अ. १७ ) से हिचकी एवं श्वास से मृत्यु बनायी गयी है इस में नाप होता ही नहीं, अतः यहां मानसिक नाप ( ज्वर ) ही समझना चाहिए । ज्वर मोहमय होता है और वह पूर्वकालिक क्रिया का अवरोधक होता हैं अतः जन्म के बाद पूर्व जन्म तथा गर्भकालिक स्थिति का स्मरण नहीं करता है और मानसिक ताप होने पर भी कर्त्तव्या कर्त्तव्य का ज्ञान नष्ट हो जाता है । भिन्न - भिन्न जीवधारी एवं अजीवधारी को भी ज्वर होना है यह वात पालकाव्य - संहिता में बनाई गई है, यथा — ' पाकलः स तु नागानामभितापस्तु वाजिनान् । गवामीश्वरसंज्ञश्च मानवानां ज्वरो मतः ॥ अजावीनां प्रलापाख्यं करने चालतो भवे । हारिद्रो महिषाणां तु गरोगो मृगेषु च । पक्षिणमभिघातस्तु मत्स्येष्विन्द्रमो मतः । नातः पतङ्गानां व्यालेश्वक्षिकसंज्ञकः ॥ ' तथा ' जलस्थ नीलिका भूमेरूषरी वृक्षस्य कोटर: । ' अर्थात् हाथियों में पाकल, घोड़ों में अभिताप, नौवों में ईश्वर, मनुष्यों में ज्वर, भेड़ - बकरियों में प्रलाप ऊँटों में अलम, भैंसों में हारिद्र, मृगों में मृगरोग, पक्षियों में अभियान, मछलियों में इन्द्रमद कीट - पतङ्गों में पक्षपात, सर्पों में अक्षिक, जल में नौटिका ( जल का नील हो जाना ), भूमि में उपर और वृक्षों में कोटर आदि को ज्वर कहा जाता है, इस प्रकार सभी स्थावर एवं जङ्गमें में यह पाया जाता है । यदि यर का आक्रमण देवता एवं मनुष्यों में होता है तो चिकित्सा करने पर लाभ भी हो जाता है पर अन्यों ने ज्वर का आक्रमण हो तो उसका नाश ही हो जाता है, जैसे- ' ऋते देवमनुष्येभ्यो नान्यो विपते तु नन् । ' ( मु. उ. अ. ३ ९, ) । ३ तत्र पूर्वरूपदर्शने ज्वरादौ वा हितं लध्वशनमपतर्पणं वा, ज्वरस्यामाशयसमुत्थ-त्वात्; ततः कषायपानाभ्यङ्ग स्नेहस्वेदप्रदेहपरिषेकानुलेपनवमनविरेचनास्थापनानुवासनोप-शमननस्तःकर्मधूपधूमपानाञ्जनक्षीर भोजनविधानं च यथास्वं युक्तया प्रयोज्यम् ॥ ३६ ॥

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ज्वरनिदानाध्यायः १ ] भवन्ति चात्र-तत्र लोकाः-निदानस्थानम् ६१७ नाम प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥

-चिकित्सासूत्र - ज्वर के पूर्वरूप में हल्का भोजन और उपवास करना चाहिए । क्योंकि ज्वर आमाशय से ही उत्पन्न होता हैं । इसके बाद दोषों के अनुसार कषायपान, अभ्यङ्ग स्नेह, स्वेद्र, प्रदेह, परिषेक, अनुलेप, वमन, विरेचन, स्थापनवस्ति, अनुवासन वस्ति, शमन औषध, नस्य, धूप, धूम्रपान, अञ्जन, दुग्ध और भोजन की व्यवस्था युक्तिपूर्वक करनी चाहिए || ३६ || जीर्णज्वरेषु तु सर्वेष्वेव सर्पिषः पानं प्रशस्यते यथास्वौपधसिद्धस्य; सर्पिर्हि स्नेहाद्वातं ` शमयति, संस्कारात् कफं, शैत्यात् पित्तमूष्माणं च; तस्माज्जीर्णज्वरेषु सर्वेष्वेव सपिहित-मुदकमिवाभिप्लुष्टेषु द्रव्येष्विति ॥ ३७ ॥

जीर्ण ज्वर में घृत का महत्व - • दोषों के अनुसार औषध से पकाये घृत का प्रयोग सभी जीर्ण ज्वर में करना चाहिए, क्योंकि घृत स्नेह होने के कारण वानदोष को, संस्कार से कफ को, शीत होने के कारण पित्त एवं ऊष्मा को शान्त करता है । इसलिए जैसे अग्नि से जले हुए, द्रव्यों को जल - सेचन से लाभ होता है वैसे सभी जीर्ण ज्वर में घृत से लाभ होता है ॥ ३७ ॥

यथा प्रज्वलितं वेश्म परिषिञ्चन्ति वारिणा । नराः शान्तिमभिप्रेत्य तथा जीर्णज्वरे घृतम् ॥ और भी -- जिस प्रकार मनुष्य शान्त करने के लिए जलने हुए घर का जल से सेचन करने हैं वैसे ही जीर्ण ज्वर की शान्ति के लिए घृत का प्रयोग करते हैं ॥ ३८ ॥

* स्नेहाद्वातं शमयति, शैत्यात् पित्तं नियच्छति । घृतं तुल्यगुणं दोषं संस्कारात्त जयेत् कफम् ॥ नान्यः स्नेहस्तथा कश्चित् संस्कारमनुवर्तते । यथा सर्पिरतः सर्पिः सर्वस्नेहोत्तमं मतम् ॥ घृत, स्नेह होने के कारण वात को शान्त करता है, शीत वीर्य होने से पित्त को नष्ट करता है, अपने तुल्य गुण वाले कफदोष को संस्कार के द्वारा नष्ट करना है । जैसा घृत संस्कार का अनुवर्तन करना है वैसा कोई भी स्नेह संस्कार का अनुवर्तन नहीं करता है । अतः सभी स्नेहों में घुन को उत्तम माना गया है ॥ ३ ९ -४० ॥ गद्योक्तो यः पुनः श्लोकैरर्थः समनुगीयते । तद्व्यक्तिव्यवसायार्थं द्विरुक्तं तन्न गर्ह्यते ॥ ४१ ॥

गद्य में बनाए हुए विषय को फिर से इलोकों द्वारा जो कहा जाता है वह स्पष्ट करने के लिए. है । इसलिए दो बार कहना निन्दनीय नहीं है ॥ ४१ ॥

विमर्श - गद्य में जो विषय एक बार आ गया है उसे हो पद्यों में दुबारा कहना पुनरुक्ति दोष-युक्त वाक्य कहा जाता है । ऐसा वाक्योपयुक्त होने से प्रामाणिक नहीं माना जाता है, और वहाँ घृत का गुन गद्य में बनाकर पुनः पद्यों में कहते हैं, उपर्युक्त लोक से अतः इस दोष का निराकरण स्वयं किया है । त्रिविधा नामपर्यायैर्हेतुं पञ्चविधं गदम् । गदलक्षणपर्याचान् व्याधेः पञ्चविधं ग्रहम् ॥४२ ॥

ज्वरमष्टविधं तस्य प्रकृष्टासन्नकारणम् । पूर्वरूपं च रूपं च भेषजं संग्रहेण च ॥ ४३ ॥

व्याजहार ज्वरस्याग्रे निदाने विगतज्वरः । भगवानग्निवेशाय प्रणताय पुनर्वसुः ॥ ४४ ॥

इत्यग्निवेशने तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते निदानस्थाने ज्वरनिदानं

पृष्ठ 707

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६१८ चरकसंहिता अध्याय- उपसंहार - नाम के पर्यायों के साथ तीन प्रकार के रोग, पाँच प्रकार के रोग. रोगों के लक्षण, रोग के पर्याय, रोग जानने के लिए पाँच उपायों का वर्णन, आठ प्रकार के ज्वरों का वर्णन, ज्वर का मन्निकृष्ट और विप्रकृष्ट कारण, ज्वर का पूर्वरूप, लक्षण और औषद, संक्षेप रूप में विगतज्वर ( सभी आध्यात्मिक, आधिदैविक, आधिभौतिक ताप से रहित ) भगवान् पुनर्वसु ने अतिनम्र अग्निवेश नामक शिष्य से ज्वर के प्रथम निदान स्थान में बताया है ॥४२-४४ ॥ इस प्रकार चरक के द्वारा प्रतिसंस्कृत अग्निवेशकृततन्त्र ( चरकसंहिता ) के निदानस्थान में ज्वरनिदान नामक पहला अध्याय समाप्त हुआ ॥ १ ॥

अथ द्वितीयोऽध्यायः अथातो रक्तपित्तनिदानं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥

इति ह स्माह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥

अब इसके बाद रक्तपित्त निदान की व्याख्या की जायगी जैसा कि भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥ १-२ ॥ विमर्श - प्रथम अध्याय में रोगों में प्रधान होने के कारण ज्वर का वर्णन किया गया है उसके बाद रक्तपित्त का ही वर्गन क्यों किया गया इसका उत्तर यही है कि उवर के बाद रक्तपित्त होता है यथा— ' ज्वरसन्तापाद् रक्तपित्तमुदीर्यत । जनः ज्वर के बाद ही इसका वर्णन अभीष्ट हुआ । और दूसरी बात यह है कि ज्वर की तब तक उत्पत्ति नहीं होती जब तक पित्त का प्रकोप नहीं होता है, और बढ़ा हुआ पित्त ही शरीर में जम्मा लाता है । वैसे ही जब बढ़ा हुआ रिक्त रक्त को दूषित करता है तव रक्तपित्त नामक रोग होता है । अर्थात् पित्त कोप से ज्वर

औरत दोनों रोग होते है अतः ज्वर के बाद वित्त का वर्णन किया गया है ।

पित्तं यथाभूतं लोहितपित्तमिति संज्ञां लभते, तद् व्याख्यास्यामः ॥ ३ ॥

जिस प्रकार दूषित पिनको नक्ति इस नाम से कहा जाता है उनकी व्याख्या की जाती है ॥

यदा जन्तुर्यवको दालककोरपनायाण्यन्नानि भुङ्क्ते, भृशोष्णतीक्ष्णमपि चान्यदन्नजातं निष्पावमाषकुलत्थसूपक्षारोपसंहितं दधिदधिमण्डोदश्वित्कवटराम्लकाञ्जिकोपसेकं वा, वाराह माहिपाविकमात्स्यगण्यपिशितं, पिण्याकपिण्डालुशुप्कशाको पहिनं, सलकसर्पपलशुन-कर शिमशिग्र ( खडयूप ) भूस्तृणमुमुखसुरस कुटेर कगण्डीर काळमालकपर्णान्तवकफपि झोपदेश, सुरासौवीरनुपोदक मैरेयमेदकमधूलकशुक्तकुबलबदराम्लप्रायानुपानं वा, पिष्टान्नोत्तर भूयिष्ठम; उष्णाभितप्तो वाऽतिमात्रमतिवेलं वाऽऽमं पयः पिवति, पयसा सम-नाति रौहिणी, काकपोतं वा सर्पपतैलतारसिद्धं, कुलत्थपिण्याकजाम्बवलकुचपक्कैः शौक्तिकैर्वा सहक्षीरं पिवत्युष्णाभितप्तः; तस्यैवमाचरतः पित्तं प्रकोपमापद्यते, लोहितं च स्वप्रमाणमतिवर्तते । तस्मिन् प्रमाणातिवृत्ते पित्तं प्रकुपितं शरीरमनुसर्पद्य देव यकृत प्लीह-प्रभवाणां लोहितवहानां च स्रोतसां लोहिताभिष्यन्दगुरूणि मुखान्यासाद्य प्रतिरुध्यात् तदेव लोहितं दूषयति ॥ ४ ॥

१. ' वा पयसा समश्नाति ' इति पा । ३. ' चाशु प्रमाणमतिवर्तते ' ग. । २. ' क्षीरमाननतिमात्रमथवा ' इति पा. । ४. ' प्रतिपद्यते ' इति पा ० ।

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रक्तपित्तनिदानाध्यायः २ ] निदानस्थानम् ६१६ रक्तपित्त रोग के कारण - जब मनुष्य यवक ( जई ), उद्दालक ( बन कोदो ) और कोदो प्रधान अन्न को और अधिक गर्न एवं तीक्ष्ण दूसरे अन्न समूह का एवं सेम, उर्द, कुल्थी की दाल और क्षार एक में मिला कर खाता है । दही, दही का पानी, मट्ठा, कट्वर ( खट्टी दही ) और खट्टी काञ्जी के साथ भोजन करता है । सूकर, भैस, भेड़, मछली और गौ का मांस, खली, आलू और म्खा शाक के साथ, मूली, सरिसों, लहसुन, करअ, सहिजन, मीठा सहिजन, कढ़ी, यूष, गन्धतृण, काली तुलसी, तुलसी, वनतुलसी, गण्डीर, कालमालक ( मारिष का शाक ), पर्णाश ( पुदीना ), क्षवक और फणिज्झक ( मरुवा ) की चटनी या कढ़ी या शाक बना कर अधिक खाता है । सुरा ( मदिरा ), सौवीर, तुषोदक, मैरेय, मैदक, मधूलक, शुक्त ( सिरका ), बड़ी बेर, खट्टी बेर, आदि को भोजन के बाद अनुपान के रूप में खाता है । विशेषकर चावल के आटे से बनी हुई वस्तु को खाकर ऊपर से सुरा आदि का अनुपान करता है । या गर्मी से पीड़ित होकर सहसा बार बार अधिक मात्रा में दूध पीता है! या रोहिणी का शाक दूध के साथ खाता है, या तरिसों के तेल और क्षार के साथ बनाया हुआ जंगली कपोत का मांस खाना है । कुल्थी, खली, जामुन, और बढ़हर से पकाया हुआ बेर के माथ गर्मी से पीड़ित व्यक्ति दूध अधिक पीता है तो उस व्यक्ति के इस प्रकार आचरण करने पर पित्त कुपित हो जाता है, साथ ही रक्त भी अपनी उचित मात्रा से अधिक हो जाता है । शरीर में रक्त अधिक मात्रा में हो जाने पर कुपित हुआ पित्त सारे शरीर में फैल कर यकृत एवं प्लीहा से उत्पन्न होने वाले रक्त को बहाने वाले स्रोतों, जो रक्त के प्रवाह करने से भारी हो गये हैं जिनके उनके मुख को प्राप्त कर रोक देता है, तब वहीं पित्त रक्त को दूषित कर देता है ॥ ४ ॥

संसर्गाल्लोहितप्रदूपणाल्लोहितगन्धवर्णानुविधानाच्च पित्तं लोहितपित्तमित्याचक्षते ॥ ५ ॥

रक्तपित्त की निरुक्ति - उस पित्त को संसर्ग के कारण, रक्त को दूषित करने के कारण, रक्त के साथ गन्ध और वर्ण को धारण करने के कारण रक्तपित्त कहा जाता है ॥ ५ ॥

तस्येमानि पूर्वरूपाणि भवन्ति तद्यथा - अनन्नाभिलाषः, भुक्तस्य विदाहः, शुक्ताम्ल-गन्धरसउद्वारः छर्देरभीचा सागमनं, बुर्दितस्य वीभत्सता, स्वरभेदो, गात्राणां सदनं परि-दाहः, मुखाडूमागम इब, लोहलोहित मत्स्यामगन्धिमिवं चास्य॒स्य, रक्तहरितहारिद्रत्व-मङ्गावयवशकृन्मूत्रस्वेदलाला सिङ्घाणका स्य कर्णमलापेडकोलिका पिडकानाम्, अङ्गवेदना, लोहित नीलपीतश्यावानामचिष्मतां च रूपाणां स्वप्ने दर्शनमभीक्ष्णमिति ( लोहितपित्त-पूर्वरूपाणि भवन्ति ) ॥ ६ ॥

रक्तपित्त के पूर्वरूप - - ये रक्तपित्त के पूर्वरूप होने है, जैसे - भोजन की इच्छा न होना, भोजन के बाद गले में दाह पड़ना, भोजन के बाद पाकावस्था में खट्टी शुक्त की तरह गन्ध एवं रस वाला डकार, वमन का वेग बार बार आना, वमन का घृणित होना, स्वरभेद, अह्नों में शिथिलता, दाह, मुख से धूम की तरह बाप निकलना और मुख से लोइ, रक्त, मछली और आम की गन्ध की तरह गन्ध निकलना, शरीर के विभिन्न अङ्ग, मल, मूत्र, स्वेद, लार, शिङ्खाणक ( नाक का मल ), मुख एवं कान का मल, नेत्र मल और पिडकायों का रक्त, हरा और पीला हो जाना, अङ्गी में वेदना, बार बार स्वप्न में लाल, नीला, पीला, श्वामवर्ण के तेजस्वी प्रकाश वाले वस्तु को देखना ये सब रक्तपित रोग के पूर्वरूप हैं ॥ ६ ॥

उपवस्तु खलु दौर्बल्यारोचका विपाकश्वासकासज्वरातीसारशोफशोषपाण्डुरोगाः स्वरभेदश्च ॥ ७ ॥

१. ' मपि ' इति पा । २. ' पिडकोलिका नेत्रमल: ' चक्रः । ' पिच्चडिका ' ग. ।

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६२० चरकसंहिता रक्तपित्त के उपद्रव --- बल की कमी, भोजन में अरुचि खाये हुए अन्न का ठीक न पचना, श्वास, कास, उदर अतिसार, शोष, शोष, पाण्डुरोग एवं स्वरमेद हैं ॥ ७ ॥

विमर्श - रोग को असाध्य सूचित करने के लिए उपद्रव का प्रसङ्ग यहाँ आया हुआ है । उपद्रव उसे कहते हैं जो एक व्याधि होने के बाद दूसरी व्यावि हो, पर वह दूसरी व्यावि प्रथम व्याधि की चिकित्सा करने में रुकावट न उत्पन्न करता हो यथा- ' ध्यापरि यो व्याविर्भरतर कालजः । उपक्रमाविरोधी च स उपद्रव उच्यते ॥ ' चरक ने केवल उन्हीं उपद्रवों को अपने यहाँ लिखा जो रक्तपित्त होने पर अवश्य होते हैं । कुछ अधिक उपद्रव ऐसे भी हैं जो कभी किसी के शरीर में प्रकट होते हैं और कभी नहीं भी प्रगट होते है यथा - दौर्बल्यश्वासकासश्वर मनमदास्तन्द्रिता दाह, मुझे चाग्ने विदाहस्वप्रेरपि सदा तुझ्या चातु ` कोष्ठस्य ( कण्टस्य ) भेदः शिरसि च दवनं पूतिनिष्ठीवन, द्वेषो भक्तेऽविपाको विरनिरपि रते रक्तपित्तोपसर्गाः ॥ ' ( सु. उ. अ. ४५ ) अर्थात् दुर्बलता, श्वास, कास, ज्वर, वमन, नशा की तरह मालूम पड़ना, तन्द्रा, दाह मूर्च्छा, भोजन के बाद अन्न ठीक न पचना, अधीरता, हृदय ने घट बढ कर वार - बार पीड़ा, प्यास, पतले मल का निकलना, शिर में सन्ताप, थूक में दुर्गन्ध का होना, भोजन में द्वेष रहना, अपचन वना रहना, रति ( मैथुन ) से विरत रहना ( उत्साह का न होना ) ये सब रक्तपित के उपद्रव है । उपद्रवों का भी ज्ञान आवश्यक होता है 1 रोगों में दोषों के प्रबल होने पर ही उपद्रव होते हैं यदि इन सभी लक्षणों को समझने वाला वैद्य है तो वह उपद्रवों को जानकर चिकित्सा करते समय या निदान करते समय मोह को प्राप्त न होगा । ऊपर गद्य में पाण्डुरोग के बाद ' स्वरभेदश्च ' ऐसा पाठ कर स्वरभेद को अलग कर आचार्य ने स्पष्ट सूचित किया है कि रमेद सभी रक्तास रोग में अवश्य ही रहता है । मार्गों पुनरस्य द्वौ चाधश्र तहुश्लेष्मणि शरीरे श्लेप्मसंसर्गादूर्ध्व प्रतिपद्यमानं कर्णनासिकानेत्रास्येभ्यः प्रत्ययते, बहुवाते तु शरीरे वातसंसर्गाः प्रति पद्यमानं मूत्रपुरीषमार्गाभ्यां प्रत्ययते, बहुलेप्मवाते तु शरीरे श्लेष्मवातसंसर्गाद्वावपि मार्गों प्रतिपद्यते, ती माग प्रतिपद्यमानं सर्वेभ्य एव यथोकेभ्यः खेभ्यः प्रत्यवने शरीरस्य ॥ ८ ॥

रक्तपित्त के दो मार्ग - र रोग के श्री मार्ग है । एक ऊपर से दूसरा नीचे से वह पित्त, अधिक कफ वालेशरीर में कफ के संसर्ग से ऊपर जाता हुआ कान, नाक, नेत्र और से निकलना है | अधिक बाबु वाले शरीर में वान के संसर्ग से नीचे आकर और गुदा मार्ग से निकलता है | अधिक कफ और वान प्रधान शरीर में कफवात के संसर्ग से ऊपर एवं नीचे दोनों मार्ग में वह पहुंचता है और दोनों मार्गों में पहुंच कर वह शरीर के कहे हुए सभी छिद्रों से निकलता है ॥ ८ ॥

विमर्श - यहाँ रक्तपित्त रोग का दो ही वर्ग बनाया है पर तीसरा मार्ग सम्पूर्ण रोमकूप भी होता है, - नासाक्षिकर्णास्यमेदयनिर्दग्धः पिते रोमकूपैश्च समवर्त ( अ. ह. नि. अ. २ ) । ' आमाशयाद् व्रजेदृर्ध्वमधः पक्वाशयाद् व्रजेत् । ' ( सु. उ. अ. ४५ ) से ऊर्ध्वग रक्तपित्त, कफ स्थान आमाशय के ऊर्ध्व प्रदेश ( मुख ) से निकलता है वायु का मुख्ध स्थान पक्काशय, कटि और वस्ति है जब इन स्थानों में रक्तस्राव होने लगता है तो रक्त मूत्र, योनि मल मार्ग से बाहर आना है । जब बालक दोनों ही प्रधान होने हैं तो उमय स्थानों में रक्तस्राव होकर उभय मार्ग से रक्त बाहर आता है ।

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रक्तपित्तनिदानाध्यायः २ भवन्ति चात्र-१. ‘ यदधोमार्गम् ' ग. । ३. ' रुद्रकोपामिना ' यो । निदानस्थानम् ६२१ २. ' यदुभय मार्गन् ' ग. | ४. ' तत्रानुग ' इति पा. । * तत्र यदूर्ध्वभागं तत् साध्यं, विरेचनोपक्रमणीयत्वाद्वह्रौपधत्वाच्च यदधोभागं तद्याप्यं, वमनोपक्रमणीयत्वादल्पौषधत्वाच्च यदुभयभागं तदसाध्यं, वमनविरेचनायोगि-त्वादनौषधत्वाच्चेति ॥ ९ ॥

साध्यासाध्यता — इन मार्गों में जो रक्तपित्त ऊपर के मार्गों से निकलता है वह साध्य है । क्योंकि बढ़े हुए पित्त को निकालने के लिये विरेचन अच्छी औषधि है और ऊर्ध्वग रक्तपित्त की बहुत सी औपवियाँ है । जो अधोभाग से निकलना है वह रक्तपित्त याप्य है । क्योंकि वह बमन साध्य है और इसकी औषधियाँ बहुत ही कम है । जो उभय भाग से रक्त जाता है वह रक्त-पित्त अमान्य है । क्योंकि दोनों मार्ग से रक्तपित्त जाने पर वमन और विरेचन दिया नहीं जा सकता और ऐसा कोई औषध नहीं है जो दोनों मार्गों को ठीक कर सके ॥ ९ ॥

विमर्श - ऊपर से आने वाले रक्तपित्त को साध्य नाना है क्योंकि उसमें कफ प्रधान होता है, ' प्रतिमार्ग च हरणं रक्तपित्ते विधीयते । " के अनुसार ऊर्ध्वग में विरेचन, अधोग में वमन देना उचित है । विरेचन साध्य होते ते ही ऊर्ध्वग साध्य है क्योंकि विरेचन, पित्तनाशक और ऊर्ध्वग में जो कफ साथ में होता है उसे भी नाश करने में सहायक होता है, विरेचन-कारक औपवियाँ भी अधिक मिलती हैं और कम के शुद्ध हो जाने पर कषाय, स्वादु दिक्क रस का प्रयोग भी पित्त एवं कफ दोनों को नष्ट करते है । अयोग याप्य होता है क्योंकि वह वमन साध्य है, दमन दित्त - हास के लिए उत्तम चिकित्मा नहीं है, कपाय तिक्त रस जो पित्त नाशक है वह वात को बढ़ाने वाले है अतः याप्य है । उभवमागत रक्तपित्त असाध्य होता है । क्योंकि इसमें किसी एक वमन या विरेचन का प्रयोग सम्भव नहीं है । और तीनों दोषों को हरने वाली औषधियाँ भी नहीं के बराबर है । अतएव उभयमाज रक्तपित्त असाध्य होता है । रक्तपित्तप्रकोपस्तु खलु पुरा दक्षयज्ञोंसे रुद्रकोपामर्वाग्निना प्राणिनां परिगतशरीर--प्राणानामभवज्ज्वरमनु ॥ १० ॥

रक्तपित्त का विप्रकृष्ट कारण - रक्तपित्त का प्रकोप तो प्राचीन काल में दक्षप्रजापति के यज्ञ के नष्ट होने पर रुद्र के कोप और अमर्षरूपी अग्नि से संतप्त शरीर और प्राण वाले प्राणियों में ज्वर के बाद हुआ ॥ १० ॥

* तस्याशुकारिणो दावाग्नेरिवापति तस्यात्ययिकस्याशु प्रशान्त्यै प्रयतितव्यं मात्रां देशं कालं चाभिसमीच्य संतर्पणेनापतर्पणेन वा मृदुमधुर शिशिर तिक्तक पायैरभ्यवहार्यैः प्रदेहप--रिषेकात्रगाहसंस्पर्शनैर्वमनाद्यैर्वा तत्रावहितेनेति ॥ ११ ॥

चिकित्सा सूत्र - सावधानीपूर्वक वैद्य को उचित है कि शीघ्र ही नाशक दावाग्नि की तरह यदि रक्तपित्त रोग आपतित हो जाय तो आत्यधिक इस रोग की शान्ति का प्रयत्न मात्रा, देश, काल का विचार कर संतर्पण के द्वारा या अपतर्पण के द्वारा तथा मृदु, मधुर, शीत, तिक्त और कपाय प्रधान भोज्न के द्वारा और बाहरी शरीर पर लेन, परिषेक ( स्नान ॥ ऊपर ११ ॥ से जल गिरा कर ), अवगाह ( टब मे बैठना ), स्पर्श और वन्न द्वारा शीघ्र ही कराना चाहिए 1 * साध्यं लोहितपित्तं तद्यदूर्ध्वं प्रतिपद्यते । विरेचनस्य योगित्वाद्वहुत्वाद्भेषजस्य च ॥ १२ ॥

विरेचनं तु पित्तस्य जयार्थे परमौषधम् । यश्च तंत्रान्वयः श्लेष्मा तस्य चानघमं स्मृतम् ॥