चरक संहिता हिन्दी भाष्य — पृष्ठ 711–720

चरक संहिता हिन्दी भाष्य · Chaukhamba · पृष्ठ 711–720

पृष्ठ 711

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६२२ चरकसंहिता भवेद्योगावहं तत्र मधुरं चैव जेषजम् । तस्मात् साध्यं मैतं रक्तं यदूर्ध्वं प्रतिपद्यते ॥ १४ ॥

साध्यासाध्यता में कारण - जो उर्ध्वभाग से निकलता है वह रक्तपित्त साध्य होता है । क्योंकि उसमें विरेचन दिया जाता है और उसकी औषध बहुत सी है । विरेचन पित्त को विजय करने के लिए उत्तम औषध है और उसमें जो कफ का सम्बन्ध होता है उसके लिए भी विरेचन मध्यम है ऊर्ध्वग रक्तपित्त में नर औषधि उपयोगी होती है इसलिए ऊर्ध्वगरक्तपित्त साध्य होता है । ॐ रक्तं तु यदधोभागं तद्याप्यमिति निश्चितम् । वमनस्यात्पयोगित्वादल्पत्वाद्द्वेषजस्य च ॥ मनं हि न पित्तस्य हरणे श्रेष्ठमुच्यते । यश्च तत्रान्वयो वायुस्तच्छान्तौ चावरं स्मृतम् ॥

तच्चायोगाहं तत्र कषायं तिक्तकानि च । तस्माद्याप्यं समाख्यातं यदुक्तमनुलोमगम् ॥

अधोग रक्तपित्त की याप्यता - जो रक्त पित्त अधो भाग से निकलता है, वह वमन के अल्प लाभ करने से तथा औषधियों के अल्प होने से याप्य होता है, यह निश्चित है । वमन पित्त को निकालने में उत्तम नहीं होना और अबीन में जो बात का सम्बन्ध रहता है उसे दूर करने में वमन हीन होता है । इसलिए कषाय एवं तिक रस इसमें लाभदायी नहीं होते । इसलिए जो रक्तपित्त अनुलोमन ( अधोभाग से जाता है ) है वह चाप्य कहा गया है ॥ १५-१७ ॥ * रक्तपित्तं तु यन्मार्गों द्वावपि प्रतिपद्यते । असाध्यमिति तज्ज्ञेयं पूर्वोक्तादेव कारणात् ॥१८ ॥

नहि संशोधनं किंचिदस्त्यस्य प्रतिमार्गगम् । प्रतिमार्ग च हरणं रक्तपिते विधीयते ॥ १ ९ ॥

एवमेवोपदामनं सर्वशो नास्य विद्यते । संसृष्टेषु च दोषेषु सर्वजिच्छमनं मतम् ॥ २० ॥

इत्युक्तं त्रिविधोदकं रक्तं मार्गविशेषतः । रक्तपित्त को असाध्यता -जो रक्तपित्त दोनों मार्गों को प्राप्त करता है उसे ऊपर बताए हुए कारणों से ही असाध्य समझना चाहिए । रक्तपित्त में विरुद्ध मार्ग से दोषों के निकालने का विधान है | किन्तु उभव मार्ग रक्तपित्त के लिए विरुद्ध मार्गगामी कोई औषध नहीं है । इसी प्रकार इसकी शान्ति भी किसी प्रकार नहीं होती है, क्योंकि संसृष्ट दोषों में सभी दोषों को जानने वाला औषध देना ही उचित माना है । इस प्रकार मार्ग - भेद से तीन प्रकार के परिणाम वाला रक्तपित्त कहा गया है ॥ १८-२० ॥ एभ्वस्तु खलु हेतुभ्यः किंचित्साध्यं न सिध्यति ॥ २१ ॥

प्रेप्योपकरणाभावाद्दौरात्म्याद्वंद्यदोषतः । अकर्मतश्च साध्यत्वं कश्चिद्रोगोऽतिवर्तते ॥ २२ ॥

असाध्यता का कारण - इन नीचे बताए हुए कारणों से कुछ साध्य रोग भी अमाध्य हो जाते हैं । परिचारक और उपकरण के अभाव से, रोगी के अधीर होने से, वैद्य के दोष से और उचित चिकित्सा न करने से, कोई - कोई रोग साध्यता का अतिक्रमण कर जाता है ॥ २१-२२ ॥ * तत्रासाध्यत्वमेकं स्यात् साध्ययाप्यपरिक्रमात् । रक्तपित्तस्य विज्ञानमिदं तस्योपदिश्यते ॥ असाध्य का लक्षण - यहाँ साध्य और याप्य रक्तपित्त रोग के क्रमशः याप्य और असाध्य हो जाने के कारण असाध्यता ही होती है । इस लिए रक्तपित्त का यह विज्ञान बताया जाता है | विमर्श - १. कभी ऊर्ध्वगामी रक्तपित्त, अयोगामी हो जाता है, २. कभी पहले अधोगामी होता है बाद में उर्ध्वगामी, ३. कभी मार्गान्तर होने पर एक उर्ध्व या अधः रक्त - मार्ग बन्द हो १. कषायं निक्तमेव च ' ग । ' मधुरं च भेषजमित्यत्र एवशब्दोऽप्यर्थः तेन कषायतिक्ते ताव-द्वेषजे भवत एव पित्तकफप्रत्यनीकत्वान्; मधुरमपि लङ्घनादिना कफे जिते भेषजं भवतीत्यर्थः ' च । २. ' साध्यतमं ' ग. ३. ' जयार्थे श्रेष्ठमुच्यते ' यो । ४. ‘ तत्रानुगः ' ह. । ६. ' पूर्वोक्तादपि ' इति पा. । ५. ' स्याच्च योगावहं तत्र मधुरं चैव भेषजम् ' ग. । ७. ' त्रिविधोदर्कमिति त्रिविधजातीय फलम् ' चक्रः ।

पृष्ठ 712

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रक्तपित्तनिदानाध्यायः २ ] निदानस्थानम् ६२३ जाता है, ४. और कभी एकमार्गगामी होकर दूसरे मार्ग से भी रक्त का स्राव कराता है और अपना प्रधान मार्ग भी नहीं छोड़ना । इस उभयमार्गगामी रक्तपित्त के मार्ग के अनुसार ४ नेत्र होते हैं । यत् कृष्णमथवा नीलं यवा शक्रधनुष्प्रभम् । रक्तपित्तमसाध्यं तद्वाससो रञ्जनं च यत् ॥२४ ॥

भृशं त्यतिमात्रं च सर्वोपद्रववच्च यत् । बलमांसज्ञये यच्च तच्च रक्तमसिद्धिमत् ॥ २५ ॥

येन चोपहतो रक्तं रक्तपित्तेन मानवः । पश्येद्दृश्यं वियच्चापि तच्चासाध्यं न संशयः ॥ २६ ॥

तत्रासाध्यं परित्याज्यं वाप्यं यत्नेन यापयेत् । साध्यं चावहितः सिद्धैर्भषजैः साधयेद्भिषक् ॥ और भी - जब रक्तपित्त रोग में गिरने वाले रक्त का वर्ण काले या नीले या आकाश में दिखाई पड़ने वाले इन्द्रधनुष की तरह लाल, हरा, पीला हो और उम रक्त में सफेद कपड़ा रंग जाय अर्थात् उसका रंग धोने पर भी न छुटे तो रक्तपित्त रोग असाध्य होता है । गिरने वाले रक्त में दुर्गन्ध अधिक हो, रक्त मात्रा में अधिक गिरता हो, सभी उपद्रव एक साथ हों और बल एवं मास के क्षय होने पर यदि यह रोग हो जाय तो अमाध्य होता है । जिस रक्तपित्त रोग से पीड़ित मनुष्य सभी दिखाई देने वाली वस्तुओं को और आकाश को रक्तवर्ण का देखता है तो वह भी रक्तपित्त असाध्य होता है । ऐसे असाध्य रक्तपित्त के रोगी को त्याग देना चाहिए, याप्य रक्तपित्त के रोगी को पथ्य आहार विहार की सुविधा प्रदान कर यत्न से रोग का यापन करना चाहिए और साध्य रक्तपित्त की चिकित्सा सावधान होकर सिद्ध, अनुभूत, औपनों से करनी चाहिए ॥ २४-२७ ॥ तत्र श्लोकौ -कारणं नामनिर्वृत्तिं पर्वरुपाण्डवान् । साग दोषानुबन्धं च साध्यत्वं न च हेतुमत् ॥२८ ॥

निदाने रक्तपित्तस्य व्याजहार पुनर्वसुः । वीतमोहरजोदोषलोभमानमदस्पृहः ॥ २ ९ ॥

इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते निदानस्थाने रक्तपित्तनिदानं नाम द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥

D & G अध्याय- उपसंहार: - निदान स्थान के इस अध्याय में मोह, रजोगुण, रूप, दोष, लोभ, मान, मद, स्पृहा से रहित पुनर्वसु ने रक्तपित्त रोग के कारण, नामकरण के कारण, हेतुओं के साथ पूर्वरूप, उपद्रव, मार्ग ( ऊर्ध्वमार्ग, अधःमार्ग ) दोषों का सम्बन्ध और इसकी साध्यता, असाध्यता बनायी है ॥ २८-२९ ॥ इस प्रकार चरक के द्वारा प्रतिसंस्कृत अग्निवेशकृततन्त्र ( चरकसंहिता ) के निदान -स्थान में रक्तपित्त निदान नामक दूसरा अध्याय समाप्त हुआ ॥ २ ॥

१. ' वाससोऽरञ्जनन् ' इति प ।

पृष्ठ 713

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६२४ चरकसंहिता अथ तृतीयोऽध्यायः अथातो गुल्मनिदानं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥

इति ह स्माह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥

अव गुल्म निदान की व्याख्या की जायगी जैसा कि भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥ १-२ ॥ विमर्श - दक्षप्रजापति के यद्यविध्वंस होने के समय ज्वर के बाद में रक्तपित्त और उसके बाद गुल्म रोग की उत्पत्ति हुई थी । अतः ज्वर और रक्तपित्त के बाद गुल्म रोग का विवरण बताना अभीष्ट है । ' गुड् वेष्टने ' धातु से मक् प्रत्यव कर ' डलयोरैक्यम् ' से गुल्म शब्द बनता है, जिसका शाब्दिक अर्थ बाँधना होता है । अर्थात् उद प्रदेश में एक ग्रन्थि रूप का हो जाना, यथा -- ' हृन्नाभ्योरन्तरे ग्रन्थिः संचारी यदि वा चलः । वृत्तश्चयापचयवान् स गुल्म इति कीर्तितः ॥ ' ( सु.उ. अ. ४५ ) ३ इह खलु पञ्च गुल्मा भवन्ति, तद्यथा - वातगुल्मः, पित्तगुल्मः, श्लेष्मगुरुमो, निचय-गुल्मः शोणितगुल्म इति ॥ ३ ॥

गुल्म की संख्या सम्प्राप्ति - II यहाँ गुल्म पाँच प्रकार के होते है । वह जैसे -- १. बातगुल्म, २. पित्तगुल्म, ३. कफगुल्म, ४. सन्निपातगुल्म और ५. रक्तगुल्म ॥ ३ ॥

विमर्श - यहाँ पाँच प्रकार के हो गुल्न का वगन किया गया है । यद्यपि चिकित्सा में इन्ह गुल्मों का भी वर्णन आता है, जैसे -- त्रानादिशेदौपवकल्पनार्थम् । ' पर आचार्यों की यह परम्परा है कि द्वन्द्वज या सन्निपातज रोग जहाँ पर दोष प्रकृतिसमसनवेत होकर रोग उत्पन्न करने हैं, वहाँ पर अलग - अलग, इन्द्रज एवं सन्निपान का वर्णन नहीं करते है । क्योंकि इस प्रकार के सयोग में कुछ विशेषता नहीं होती है । अतः क्क् रूप मे बताए हुए दोपज रोगों की चिकित्सा को ही संयुक्त कर द्वन्द्वज में या सन्निधतज में प्रयोग किया जाता है । और जहाँ दोष विकृति विषम-समवेत होकर रोग उत्पन्न करते हैं, वहाँ दोप के कार्यों में विशेषता एवं भिन्नता आ जाती है । अतः अलग - अलग द्वन्द्रज एवं सन्निपातज रोग बनाये जाते है । यह गुल्म रोग दोपा के प्रकृति सम-समवेत होने से होता है सन्निपातज गुल्म, विकृतिविषमसमवेत से होता है अतः इसके द्वन्द्वज नेद्र का वर्णन नहीं किया है । अतएव अलग पढ़ा गया है । * एवंवादिनं भगवन्तमात्रेयमग्निवेश उवाच - कथमिह भगवन् पञ्चानां गुल्मानां विशे-पमभिजानीमहे; नह्यविशेषविद्रोगाणामौषधविदपि भिषक् प्रशमनसमर्थो भवतीति ॥ ४ ॥

गुल्मों की विशेषता समझने के लिए अग्निवेश का प्रश्न - इस प्रकार कहते हुए भगवान् आत्रेय से अग्निवेश ने पूछा कि हे भगवन्! पाँचों गुल्मों की विशेषता को हम कैसे जानें | क्योकि औषध को जानने पर भी जो वैद्य रोगों की विशेषता को न जाने तो वह चिकित्सा करने में समर्थ नहीं होता है ॥ ४ ॥

ऋ तमुवाच भगवानात्रेयः - समुत्थान पूर्व रूप लिङ्गवेदनोपशयविशेपेभ्यो विशेषविज्ञानं गुल्मानां भवत्यन्येषां च रोगाणामग्निवेश! तत्तु खलु गुल्मेपूच्यमानं निबोध ॥ ५ ॥

निदान पञ्चक से गुलन के मेद - भगवान् आत्रेय ने अग्निवेश से कहा कि ह अग्निवेश! समुल्यान ( कारण ), पूर्वरूप, लिङ्ग ( लक्षण ) वंदना, उपशय आदि की विशेषता से गुल्मों और

अन्य रोगो का ज्ञान हो जाता है । गुल्न में कहे गये इस ज्ञान को सुनो ॥ ५ ॥

१. ' तत्र तावत् ' ग. ।

पृष्ठ 714

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गुल्मनिदानाव्याय: ३ ] निदानस्थानम् ६२५ यदा पुरुषो वातलो विशेषेण ज्वरवमनविरेचनातीसाराणामन्यतमेन कर्शनेन कशितो वातलमाहारमाहरति, शीतं वा विशेषेणातिमात्रम्, अस्नेहपूर्वे वा वमनविरेचने पिबति, अनुदी या छादमुदीरयति, उदीर्णान् वातमूत्रपुरीषवेगान्निरुणद्धि, अत्यशितो वा पिवति नवोदकमनिमात्रम्, अतिसंक्षोभिगा वा यानेन याति, अतिव्यवायव्यायाममद्य शोकरुचिर्वा, अभिघातमृच्छति वा विषमासनशयनस्थान चङ्क्रमणसेवी वा भवति, अन्यद्वा किंचिदेवंविधं विषममतिमात्रं व्यायामजातमारभते, तस्यापचाराद्वातः प्रकोपमापद्यते ॥ ६ ॥

वात गुल्न का निदान -- जब वातप्रधान पुरुष विशेषकर ज्वर, वमन, विरेचन और अतिसार इन किसी भी एक रोग से पीड़ित होकर क्षीण हो जाता है और वातकारक आहार द्रव्यों का अधिक सेवन करता है या अतिशीत आहार एवं विहार का सेवन करता है या स्नेहन और स्वेन क्रिया के विनाही विरेचन द्रयों का सेवन करता है । या वमन का वेग आ नहीं रहा हो पर बलात् वमन करने के लिए प्रयास करता है, या अपान वायु के वेग, मूत्र के वेग और मल के आए हुए वेगों को रोकता है, या अत्यन्त भोजन करने के बाद नूतन जल ( बरसात का जल ) अधिक पीता है, अथवा शरीर में क्षोभ उत्पन्न करने वाले सवारी ( जैसे - तेज घोड़े, ऊँट, हाथी ) ने चलता है । अथवा अति मैथुन, अतिव्यायाम, अधिक मद्यपान और अधिक शोक किया करता है, या अधिक आघात ( चोड ) खा जाता है, या विषम भोजन, विषम शयन, विषम स्थान और विपरीत क्रम से अधिक भ्रमण करता है । या इस प्रकार किसी दूसरी भी क्रिया को विषमता से अधिक रूप में सेवन करता है तो उस मनुष्य के शरीर में उपर्युक्त अपथ्य सेवन से वायु कुपित हो जाती है ॥ ६ ॥

प्रकुपितो वायुर्महात्रतोऽनुप्रविश्य रौदयात् कठिनीभूर्तमाप्लुत्य पिण्डितोऽवस्थानं करोति हृदि बस्तौ पार्श्वयोर्नाभ्यां वा; स शूलमुपजनयति ग्रन्थींश्चानेकविधान्, पिण्डित-श्रावतिष्ठेते, सपिण्डितत्वाद् ' गुल्म ' इत्यभिधीयते । गुल्म की सम्प्राप्ति. - इस प्रकार कुपित हुआ वायु महास्रोत अर्थात् आमाशय, पक्काशय आदि स्थानों में जाकर रूक्ष होने के कारण कठिन होकर और व्याप्त होकर पिण्ड के रूप में बन कर अपना स्थान हृदय, वस्ति दोनों पार्श्वेों और नाभि को बनाता है । वह पिण्डाकार गुल्म शूल उत्पन्न करता है | अनेक तरह की लम्बी चौड़ी एवं गोली ग्रन्थियाँ उत्पन्न करता है और स्वयं पिण्डाकार होता है । पिण्डाकृत होने से, इसे गुल्म कहते हैं । स मुहुराधमदि, मुहुरल्पत्वमापद्यते; अनियतविपुलाणुवेदनश्च भवति चलत्वाद्वायोः, मुहुः पिपीलिका संप्रचार इवाङ्गेषु, तोदभेदस्फुरणायामसङ्कोच सुप्तिहर्षप्रलयोदयबहुलः; तदातुरः सूच्येव शङ्कुनेव चाभिसंविद्धमात्मानं मन्यते, अपि च दिवसान्ते ज्वर्यते, शुष्यति चास्यास्थम्, उच्छ्वासश्चोपरुध्यते, हृष्यन्ति चास्य रोमाणि वेदनायाः प्रादुर्भावे; प्लीहाटो-पान्त्रकूजनाविपाकोदावर्ताङ्गमर्दमन्याशिरः शङ्खशूलब्रघ्नरोगाश्चैनमुपद्रवन्ति;, विपरीतानि परुषत्वङ्गन्वनयनवदनमूत्रपुरीषश्च भवति, निदानोक्तानि चास्य नोपशेरते चोपशेरत इति वातगुल्मः ॥ ७ ॥

१. ' कठिनीभूत आप्लुत्य ' यो । कृष्णारुण-२. ' पिण्डिन इति कुण्डलीभूतः । पिण्डितश्चेति द्वितीयपिण्डितशब्देन मांसाद्युत्तुण्डनेन पौनरुक्त्यम् गुल्म- ' प्रदेशस्यापि पिण्डितत्वमुच्यते; पूर्वेण पिण्डितशब्देन तु वायोः पिण्डितत्वमिति न इति चक्रः । ३. ' अणुत्वमापद्यते ' यो । ४० च ० सं ०

पृष्ठ 715

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६२६ चरकसंहिता बात गुल्न के लक्षण -- यह वायु वार - बार पिण्डाकार गुल्म को विस्तृत और संकुचित करता है । और अनियत रूप से कभी अधिक और कभी कम वेदना उत्पन्न करता है । यह विषमता वायु में चल गुण के कारण होती है । बारबार जैसे अह्नों पर चींटी चले ऐसा ज्ञान होना है । अंग - प्रत्यङ्गों नें नोद ( सूई चुभोने सी पीड़ा ) नेद ( विदारण सी पीड़ा ) स्फुरण आयाम ( तनाव ) संकोच, सुप्ति ( शुन्यता ) हर्ष ( रोमांच ) इन सद भावों का क्षय में होना और क्षण में नाश हो जाना, वेदना उत्पन्न होने पर गुल्म से पीड़ित रोगी अपने को सुई या अंकुश से विंधा हुआ समझता है और सायंकाल में ज्वर हो जाता है, मुख सून्वने लगता है । श्वास रुकने का सा प्रतीत होता है । रोमांच अधिक होना है । प्लीहा बढ़ जाती है । पेट में गुड़गुड़ाहट होती है । ाँतों में शब्द होते हैं, अन्न नहीं पचना, उदावर्त ( वायु का प्रतिलोम होना ), अंगमई, मन्या, सिर और शंख प्रदेश में झूल और त्रघ्न, रोग आदि गुल्म रोग में उपद्रव होने हैं । त्वचा, नख, नेत्र, मुख, मूत्र और मल काले, लाल एवं परुष हो जाते हैं, बात गुल्म के बनाये हुए कारणों से हानि और उसके विपरीत सेवन से लाभ का होना यह वातगुल्म का लक्षण है ॥ ७ ॥

विमर्श - सभी प्रकार के गुल्म बान की प्रधानता से ही होता है । यथा - ' गुल्मिनामनिल-शान्तिरुपायैः सर्वशो विधिवदाचरितव्या । मामते ह्यजितेऽन्यमुदीर्णे दोषमल्पमनि कर्म निहन्यात् ॥ ' ( च. चि. अ. ५ ) । यद्यपि यह अपने रूक्ष आदि गुणों के कारण पिण्ड रूप में बन जाता है, पर अपने चञ्चल होने के कारण कभी - कभी लक्षण स्पष्ट नहीं करता है तब प्रकोप काल में ही इसका प्रत्यक्ष होता है । इसके स्थान प्राचीन आचार्यों ने पाँच माने हैं । हृदय, नाभि, दोनों पार्श्व और वस्ति । ये पाँचों स्थान उदर प्रदेश में ही पड़ते है । अतः उदर के ऊर्ध्व, मध्य, अधः और दोनों आस - पास के स्थान भी माने जाने चाहिए । तैरेव तु कर्शनैः कर्शितस्याम्ललवणकटुकक्षारोष्णतीच्णशुक्त व्यापन्नमद्यहरितकफला-म्लानां विदाहिनां च शाकधान्यमांसादीनामुपयोगादजीर्णाध्यशनाद्रौच्यानुगते चामाशये वमनमतिवेलं संधारणं वातातपौ चातिसेवमानस्य पित्तं सह मारुतेन प्रकोपमापद्यते ॥ ८ ॥

पैत्तिक गुल्म के निदान - पहले बनाए हुए ज्वर, वमन, विरेचन आदि कारणों से जब शरीर कृश हो जाता है तब यदि पुरुष अत्यन्त अम्ल, लवण, कटु, क्षार, उष्ण, तीक्ष्ण, सिरका, दूषित मद्य, हरे शाक या खट्टे फलों और दाह उत्पन्न करने वाले शाक, अन्न और मांस आदि का सेवन करता है, या अजीर्ण में भोजन या अध्यशन करता है, और आमाशय के रूक्ष होने पर बार - बार वमन का सेवन या आये हुये वेगों को रोकता है । और तेज हवा एवं तेज धूप का अत्यधिक सेवन करता है तो इससे उस पुरुष के शरीर में वायु के साथ पित्त कुपित हो जाता है ॥ ८ ॥

तत् प्रकुपितं मारुत आमाशयैकदेशे संवर्त्य तानेव वेदनाप्रकारानुपजनयति, य उक्ता वातगुल्मे; पित्तं त्वेनं विदहति कुक्षौ हृद्यरसि कण्ठे च स विदह्यमानः सधूममिवोद्वार-मुद्रित्यग्लान्वितं गुल्मावकाशश्चास्य दह्यते दूयते धूप्यते ऊष्मायते स्विद्यति fut शिथिल इव स्पर्शासहोऽल्परोमाञ्चश्च भवति; ज्वरभ्रमदवथुपिपासागल तालुमुखशोप-प्रमोहविड्भेदाश्चैनमुपद्रवन्ति; हरितहारिद्र्त्वङ्गखनयनवदन मूत्रपुरीषश्च भवति निदानो-तानि चास्य नोपशेरते, विपरीतान्युपशेरत इति पित्तगुल्मः ॥ ९ ॥

पैत्तिक गुल्म की सम्प्राप्ति और लक्षण - इस प्रकार प्रकुपित हुए पित्त को वायु आमाशय के एक भाग में एकत्रित कर ( फेर कर ) जो बातगुल्म में कह आए हैं उन्हीं भिन्न भिन्न प्रकार की २. ' अल्लगेमाञ्चः ' १. ' मृदुशिमला: ग. । इति पा. ।

पृष्ठ 716

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गुल्मनिदानाध्याय: ३ । निदानस्थानम् ६२७ वेदनाओं को उत्पन्न करता है । और पित्त पेट, हृदय, छाती और कण्ठ में दाइ उत्पन्न करता है । और विदाहयक होने पर वह रोगी धूओं के सनान खट्टा डकार लेना है । उसके गुल्म स्थान में जलने हुए, दुखते हुए हुआ निकलते हुए की तरह एवं बाष्प निकलने की तरह, ज्ञात होना है । और उस स्थान पर स्वेद आता है, गोला प्रतीत होता है । शिविल मालून होता है । स्पर्श सहन नहीं होता है । क्रुद्र गेनांच भी होता है । ज्वर, चक्का, दवथु ( हृदय में धक - धक होना गुल्म ) के, अधिक प्यास लगन, गला हु और तालु का सूखना, मूर्च्छा और अतिसार ये सब पित्त उपद्रव होते हैं । त्वचा, नव, नेत्र, मुख, नून, और मल हरे रंग या हल्दी की तरह हो जाते होता हैं । पित्त गुल्न के बरा! ये हुए कारणों से सेन की वृद्धि और उससे भिन्न कारणों के सेवन से लाभ है । इसे पैत्तिक ुल्न कहते है ॥ २ ॥

विमर्श -- यह गुल्म वम्नि स्थान को छोड़कर होता है । क्योंकि सम्प्राप्ति कहते समय ' आनाशयैकदेशे ' बनाकर आनाशय में ही होने की सूचना दी है । और आमाशय ' नाभिस्तनान्तरं जन्तोरानाशय इति स्मृतः ' से नाभि और हृदय के वांच में बनाया है । वातगुल्म को महास्रोत में होना बताया है । अन्ः बागुल्न वस्ति आदि सभी स्थानों में होता है और आगे कफज नहीं गुल्म होते का भी आमाशयैकदेश ही स्थान माना है । अतः कफज, वित्तज गुल्म वस्ति में ऐसा जानना चाहिए । यह विमर्श चक्रपाणि सम्मत है । तैरेव तु कर्शनैः कशित स्यात्यशनादतिस्निग्धगुरुमधुरशीताशनात् पिष्ठेक्षुक्षीर तिल-मापगुडविकृतिसेवनान्मन्दकमद्यातिपानाद्धरितका तिप्रणयनादानू पौदकग्राम्यमांसातिभक्ष- श्लेष्मा सह मारु-णात् संधारणादवुभुक्षस्य चातिप्रगाढमुदपानात् संक्षोभणाद्वा शरीरस्य तेन प्रकोपमापद्यते ॥ १० ॥

से कृश कफज गुल्म के निदान - पूर्वोक्त उन्हीं कृश करने वाले ज्वर, वमन आदि कारणों से, चावल का होने पर अधिक भोजन, अधिक स्निग्ध, गुरु, मधुर, अत्यन्त शीतल भोजन ( जो दही अच्छी न जमी आटा, ईख, दूध, तिल, उड़द और गुड़ के विकार के सेवन से, मन्दक से, आनूप, औदक हो ) और मद्य का अधिक सेवन करने से, हरे शाकों के अधिक सेवन करने रोकने से, अतिमात्र में और ग्राम्य पशु - पक्षियों के माँस को अधिक खाने से, मल, मूत्र के शरीर वेगों में को क्षोभ उत्पन्न होने वाले भोजन करने के बाद अधिक पानी पीने से, या और भी कोई कार्यों के करने से, वायु के साथ कक कुपित हो जाता है ॥ १० ॥

तं प्रकुपितं मारुत आमाशयैकदेशे संवर्त्य तानेव वेदनाप्रकारानुपजनयति य उक्ता वातगुल्मे; श्लेष्मा त्वस्य शीतज्वरारोचका विपाकाङ्गमर्दहर्षहृद्रोगच्छर्दिनिद्रालस्यस्तैमित्य- , तथा गौरवशिरोभितापानुपजनयति, अपि च गुल्मस्य स्थैर्यगौरव काठिन्यावगाढसुप्तताः कासश्वासप्रतिश्यायान् राजयक्ष्माणं चानिप्रवृद्धः, वैत्यं त्वङ्नखनयनवदनमूत्रपुरीषेषूपज- ॥११ ॥

नयति, निदानोक्तानि चास्य नोपशेरते, विपरीतानि चोपशेरत इति श्लेष्मगुल्मः और लक्षण: - इस प्रकार प्रकुपित हुए कफ को वायु आमाशय के ककज गुल्म की सम्माप्ति है जो वान गुल्म एक भाग में एकत्रित का ( फेर कर ) उसी प्रकार की वेदनाओं को उत्पन्न करती में बनाई गई है । रोगी के शरीर में रोचक रोमांच, हृदयरोग, बनन निद्राधिक्य, पालस्य, मिल, भारीपन, का ठीक न पचना, अंगमर्द, शिरःशूल को उत्पन्न करना जबगाड सून्यता को और है । और गुल्न के स्थान में स्थिरता, भावन, कठोरता और नख, नेत्र, मूत्र एवं मल में बढ़ा हुआ कफ कास, धान और प्रतिश्याय, राजयक्ष्मा तथा त्वचा,

पृष्ठ 717

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६२८ चरकसंहिता श्वतता उत्पन्न करता है । निदान में कहे हुए आहार - विहार से हानि और उससे विपरीत वस्तु का सेवन लाभकर हो तो उसे कफज गुल्म समझना चाहिये ॥ ११ ॥

* त्रिदोषहेतुलिङ्गसन्निपाते तु सान्निपातिकं गुल्ममुपदिशन्ति कुशलाः । स विप्रतिषि-वोपक्रमत्वादसाध्यो निचयगुल्मः ॥ १२ ॥

त्रिदोषज गुल्म - कुशल वैद्य तीनों दोषों के हेतु और लक्षण के मिश्रित होने पर सन्निपानज गुल्म मानते हैं । यह सन्निपातज गुल्म वातादिदोषों के परस्पर विरुद्ध चिकित्सा होने से असाध्य है | * शोणितगुल्मस्तु खलु स्त्रिया एव भवति न पुरुषस्य, गर्भकोष्ठार्तचागमनवैशेष्यात् । रक्तज गुल्म - रक्तजगुल्म तो गर्भाशय में आर्तव के आने की विशेषता से स्त्रियों को ही होता है, पुरुष को नहीं । विमर्श - आर्तवजन्य गुल्म स्त्रियों को ही होता है । पर सामान्यतः रक्त कुपित होने के कारण रक्त गुल्म पुरुष - स्त्री दोनों को हो सकता है । क्योंकि वात, पित्त, कक, रक्त की चिकित्सा करने पर भी यदि गुल्म की शान्ति न हो तो आदि अन्न और मध्य में वायु की रक्षा करते हुए चिकित्सा करनी चाहिए | यथा - ' कको बाते जितप्राये पित्तं शोणितमेव च । यदि कुप्यति वातस्य क्रियमाणे चिकित्सिते ॥ ' ( च.चि. अ. ५ ) यहाँ पर रक्त से सामान्य रक्तज गुल्म का ज्ञान होता है और ' गुल्मो-पकुशवीसर्प इत्यादयो रक्तजा गदाः । ' ( सू. अ. २४ ) से गुल्म को रक्तज रोग माना है, जिसका तात्पर्य भी सामान्य रक्तज गुल्म से ही है । एवं ' स्त्रीणामार्त्तवजो गुल्मो न पुंसामुपजायते । अन्य-स्वसृग्भवो गुल्नः स्त्रांणां पुंसाञ्च जायते ॥ ' ( क्षारपाणि ) । इस प्रकार एक सामान्य रक्तदृष्टि से भी गुल्म होता है जो स्त्री - पुरुष दोनों में संभव है और स्त्रियों को आर्तव गुल्म अलग ही होता है जो पुरुषों में नहीं पाया जाता । * पारतन्त्र्यादवैशारद्यात् सततमुपचारानुरोधाद्वः वेगानुदीर्णानुपरुन्धत्या आमगर्भे वाऽप्यचिरपतितेऽथवाऽप्यचिरप्रजाताया ऋतौ वा वातप्रकोपणान्यासेवमानायाः क्षिप्रं वातः प्रकोपमापद्यते ॥ १३ ॥

रक्तज गुल्म का निदान और सम्प्राप्ति - परतंत्र होने एवं शिक्षित न होने के कारण, सदा पनि सेवा और गृहकार्यों में लगी रहने से आये हुए मल - मूत्रों के वेगों को रोकती हुई अथवा आम गर्भ के शीघ्र स्राव ( Abortion ) होने से, अथवा वच्चा होने के तुरन्त बाद या ऋतु काल में वान प्रकोपक आहार - विहार करती हुई स्त्री की वायु शीघ्र प्रकुपित हो जाती है ॥ १३ ॥

प्रकुपितो योनिमुखमनुप्रविश्यार्तवमुपरुणद्धि, मासि मासि तदार्तवमुपरुध्यमानं कुक्षिमभिवर्धयति । और भी - प्रकुपित होकर वह वायु योनिमुख में जाकर आर्तव को रोक देती है । प्रत्येक मास में रुका हुआ वह आर्तव उदर को बढ़ा देता है । तस्याः शूलकासातीसारच्छर्धरोचकाविपाकाङ्गमर्दनिद्रालस्यस्तैमित्य कफप्रसेकाः समुपजायन्ते, स्तनयोश्व स्तन्यम्, ओष्ठयोः स्तनमण्डलयोश्च कार्यम्, अत्यर्थं ग्लानि श्चक्षुषोः, मूर्च्छा, हृल्लासः, दोहदः, श्वयथुश्च पादयोः, ईषच्च गमो रोमराज्याः, योन्याश्राटा-लत्वम्, अपि च योन्या दौर्गन्ध्यमात्रावश्चोपजायते, केवलश्रास्य गुल्मः पिण्डित एव स्पन्दते, तामगभां गर्भिणीमित्याहुर्मूढाः ॥ १४ ॥

इसके बाद उसके उदर में शूल, कास, अनिसार, वमन अरुचि, अपचन, अङ्गमर्द, निद्राधिक्य, आलस्य, स्तैमित्य और मुखप्रसेक उत्पन्न हो जाता है । स्तनों में दूध, ओठ तथा स्तन - मण्डल में १. ' विरुद्धोपक्रमत्वात् ' ग. ।

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गुल्मनिदानाध्याय: ३ ] निदानस्थानम् ६२६ कालापन, नेत्रों में अधिक ग्लानि, मूर्च्छा, हल्लास ( जी मचलाना ), दोहद ( विशेष इच्छाएँ जैसे गर्भवती को हुआ करती है ), पैरों में शोथ, कुछ रोमराज का उद्गम, योनि का विस्तार और योनि में दुर्गन्ध और स्राव, उत्पन्न हो जाता है । इसका सम्पूर्ण गुल्म पिण्ड की तरह फड़कता है, ऐसी दशा देखकर अनुभवशून्य वैद्य, स्त्री के गर्भवती नहीं रहने पर भी उसे गर्भिणी कहता है ॥१४ ॥

एषां तु खलु पञ्चानां गुल्मानां प्रागभिनिर्वृत्तेरिमानि पूर्वरूपाणि भवन्ति; तद्यथा— अनन्नाभिलषणम्, अरोचकाविपाकौ, अग्निवैषम्यं, विदाहो भुक्तस्य, पाककाले चायुक्त्या द्वारो, वातमूत्रपुरीषवेगानां चाप्रादुर्भावः, प्रादुर्भूतानां चाप्रवृत्तिरीषदागमनं वा, वातशूलाटोपान्त्रकूजनापरिहर्षणा तिवृत्तपुरीषताः, अबुभुक्षा, दौर्बल्यं, सौहित्यस्य चासत्वमिति ॥ १५ ॥

गुल्म के पूर्वरूप -इन पांच प्रकार के गुल्मों के उत्पन्न होने के पहले ये ( निम्नाङ्कित ) पूर्वरूप होते हैं, जैसे- अन्न खाने की इच्छा का अभाव, भोजन में अरुचि, अपचन, अग्नि में विषमता, खाने के बाद गले में जलन होना, भोजन की पाकावस्था में वमन और डकार का अनिय मित रूप से आना, अपान वायु, मूत्र और मल के वेगों का उत्पन्न न होना या इनके आये हुए वेगों का न निकलना या कम निकलना, वातजन्य शूल, आटोप, आतों में गड़गड़ाहट, रोमांच, उदावर्त, भूख का न लगना, दुर्बलता, पूर्ण तृप्तियुक्त भोजन का सहन न होना ॥ १५ ॥

सर्वेष्वपि खल्वेतेषु गुल्मेषु न कश्चिद्वाताहते संभवति गुल्मः । सभी गुल्मों में वात की प्रधानता - इन सभी प्रकार के गुल्मों में बिना वात के कोई भी गुल्म नहीं होता । तेषां सान्निपातिकमसाध्यं ज्ञात्वा नैवोपक्रमेत्, एकदोषजे तु यथास्वमारम्भं प्रणयेत्, संसृष्टांस्तु साधारणेन कर्मणोपचरेत् । यच्चान्यदध्यविरुद्धं मन्येत तदप्यवचारयेद्विभज्य गुरुलाघवमुपद्रवागां, गुरूनुपद्रवांस्त्वरमाणश्चिकित्सेजघन्यमितरान् । त्वरमाणस्तु विशेष-मनुपलभमानो गुल्मेध्वात्ययिके कर्मणि वातचिकित्सितं प्रणयेत्, स्नेहस्वेदौ वातरौ स्नेहोपसंहितं च मृदु विरेचनं वस्तींश्व; अम्ललवणमधुरांश्च रसान् युक्त्याऽवचारयेत् । मारुते ह्युपशान्ते स्वल्पेनापि प्रयत्नेन शक्योऽन्योऽपि दोषो नियन्तुं गुल्मेग्विति ॥ १६ ॥

साध्यासाध्य विचार और चिकित्सा सूत्र - इन गुल्मों में सन्निपातज गुल्म को असाध्य जानकर चिकित्सा न करें । एकदोषज गुल्म में दोष के अनुसार चिकित्सा प्रारम्भ करें । द्वन्द्व गुल्म में साधारण कर्म से चिकित्सा करें । और अन्य जो कुछ भी अविरुद्ध चिकित्सा समझे उसे भी उपद्रयों की गुरुता और लघुता का विभाग कर करें । भारी उपद्रवों की चिकित्सा शीघ्र करें और लघु उपद्रवों की चिकित्मा बाद में करें । चिकित्सा शीघ्रतापूर्वक करते हुए गुल्मों में विशेष भेद का ज्ञान न हो सके तो आवश्यक कार्य में वात की चिकित्सा करें । वातनाशक स्नेह और स्वेद, स्नेह मिला हुआ मृदु विरेचन, वस्तियों और अम्ल, लवण एवं मधुर रसों का प्रयोग युक्तिपूर्वक करें | क्योंकि वायु की शान्ति हो जाने पर गुल्मों में दूसरा दोष थोड़े प्रयास से ही रोका जा सकता है || १६ ||

भवति चात्र-ॐ गुल्मिनामनिलशान्तिरुपायैः सर्वशो विधिवदाचरितव्या ।

मारुते ह्यवजितेऽन्यमुदीर्णं दोषमल्पमपि कर्म निहन्यात् ॥ १७ ॥

उपायों के द्वारा गुल्म- रोगियों में वायु की शान्ति सम्पूर्ण विधि के अनुसार करनी चाहिए, क्योंकि बात को जीत लेने पर दूसरे बढ़े हुए दोष को अल्प कर्म भी दूर कर सकता है ॥ १७ ॥

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६३० तत्र श्लोकः-चरकसंहिता संख्या निमित्तं रूपाणि पूर्वरूपमथापि च । दिष्टं निदाने गुल्मानामेकदेशश्च कर्मणाम् ॥१८ ॥

इत्यनिवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते निदानस्थाने अध्यायार्थ - संग्रह गुल्मनिदानं नाम तृतीयोऽध्यायः ॥ ६ ॥

इस गुल्म निदान में गुल्मों की संख्या, कारण, स्वरूप, पूर्वरूप और कर्म ( चिकित्सा ) का एक देश अर्थात् कुछ चिकित्सा सूत्र भी कहा गया है ॥ १८ ॥

इस प्रकार चरक के द्वारा प्रतिसंस्कृत अग्निवेशकृततन्त्र ( चरक संहिता ) के निदान स्थान में गुल्मनिदान नामक तीसरा अध्याय समाप्त हुआ ॥ ३ ॥

अथ चतुर्थोऽध्यायः अथातः प्रमेहनिदानं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥

इति ह स्माह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥

अब इसके बाद प्रमेह रोग की व्याख्या की जायगी जैसा कि भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥१-२ || त्रिदोषकोपनिमित्ताविंशतिः प्रमेहा भवन्ति विकाराश्चापरेऽपरिसंख्येयाः । तत्र यथा त्रिदोषप्रकोपः प्रमेहानभिनिर्वर्तयति तथाऽनुव्याख्यास्यामः ॥ ३ ॥

प्रमेह के भेद - त्रिदोष के कोप के कारण २० प्रकार के प्रमेह रोग होते हैं, और भी अन्य रोग त्रिदोष के ही कारण असंख्य होते हैं । जिस प्रकार त्रिदोष ( वात, पित्त, कफ ) का प्रकोन प्रमेहों को उत्पन्न करता है उस प्रकार से व्याख्या करेंगे ॥ ३ ॥

* इह खलु निदानदोपदूष्यविशेषेभ्यो विकारविघात भावाभावप्रतिविशेषा भवन्ति । ( १ ) निदानदोषदृष्य विमर्श रोगों की उत्पत्ति में निदानादि का योग - इस शरीर में निदान ( कारण ), दोष ( वात, वित्त, कफ ), दृष्य ( रसासृक्मांसमेदोस्थिमज्जशुक्रमलमूत्रस्वेदादि ) की विशेषता से ( अर्थात् न्यूनता या अधिकता से ) विकारविघातभाव ( विकाराणां रोगाणां विधानस्य उत्पत्तिप्रतिबन्धस्थ, भाव उत्पत्तिकारणाभाव इति विकारविघातभावः- रोगों की उत्पत्ति न होने में ) - और विकारविधाता-भाव ( विकाराणां रोगाणां विघातस्य उत्पत्तिप्रतिबन्धस्य अभावः - रोगों की उत्पत्ति होने में ) भिन्न - भिन्न विशेषतायें होती हैं । विमर्श - इस प्रकार निदान, दोष, दृष्य की न्यूनता से ४ प्रकार की विशेषता होती है, जैसे १. विकाराजननं - रोगों का सर्वथा न होना २. चिरेण च विकारजननं - देर से रोगों की उत्पत्ति १. ' विकाराणां भावाभावप्रतिविशेषा भवन्ति ' यो । ' विकाराणां सर्वेषामेव रोगाणां विघातस्य भावो विकाराणामनुत्पत्तिः, विघातस्याभावो विकाराणां जननं, तयोः विघातस्य भावाभावयोः प्रतिविशेषाः प्रत्येकं विशेषाः विकारविघातभावाभावप्रतिविशेषाः ' गङ्गाधरः ।

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प्रमेहनिदानाध्यायः ४ ] निदानस्थानम् ६३१ होना, ३. अणुविकारजननम् - सूक्ष्म रूप में रोग का प्रादुर्भाव होना, ४. असर्वलिङ्गविकारजननम्, रोगों के कुछ लक्षण प्रगट हो कुछ न प्रकट हो । यदा ह्येते त्रयो निदानादिविशेषाः परस्परं नानुवैभन्स्यथवा कालप्रकर्षादबलीयां-सोऽथवाऽनुनन्ति न तदा विकाराभिनिर्वृत्तिः, चिराद्वाऽप्यभिनिर्वर्तन्ते, तनवो वा भव-न्त्ययथोक्तसर्वलिङ्गा वा; विपर्यये विपरीताः; इति सर्वविकारविघातभावाभावप्रतिविशेषा-भिनिर्वृत्तिहेतुर्भवत्युक्तः ॥ ४ ॥

रोगोत्पत्ति क्रम - १. जब ये तीन निदान, दोष, दूष्य आपस में अनुसरण नहीं करते है २. अथवा देर से ३ अथवा दुर्बल दोष आपस में सम्बन्ध करते हैं तब क्रमशः विकार ( रोग ) की उत्पत्ति नहीं होती है, अथवा देर से रोगों की उत्पत्ति होती है, अथवा तनु ( हलके ) रूप में रोग की उत्पत्ति होती है अथवा सभी लक्षण न होकर कुछ लक्षणों से रोग की उत्पत्ति होती है । ' विपर्यये विपरीताः ' - अर्थात् इससे विपरीत दशा में विपरीत होने हैं । इस प्रकार ये सभी विकारों को अनुत्पत्ति और सत्र रोगों की उत्पत्ति की भिन्न-भिन्न विशेषताओं में उत्पत्ति स्वरूप कारण कहे गये हैं || ४ || विमर्श - इस गद्य की व्याख्या करते हुए चक्रपाणि ने बनाया है - परस्परं नानुबध्नन्ति, परस्परं प्रतिकूला भवन्ति, अनुबन्धोऽनुकूलेऽभिप्रेतः ( आपस में सम्बन्ध न रखते हों अर्थात् प्रतिकूल हों ), इस प्रकार व्याख्या कर प्रस्तुत किया है यथा - १. तदेव निदानं दोपमनुत्रघ्नाति, यद्भूयः सामान्यादविरोधेन दोषं दूषयति, २. दोषस्य दूष्यानुबन्धित्वं यद् दृष्यं व्याधिकारणं सामान्यगुणत्वादिधर्मयोगादविशेधेन दूपयति । ३. दूष्यस्य च दोषानुवन्धित्वं यद् दोपस्य दूषणं प्रति शिथिलत्वं समानगुणादिनाऽऽनुकूल्येनावस्थानम् । १. अर्थात् किसी भी रोग का हेतु ( निदान ) जब दोषों को दूषित करता है तो वह सामान्य गुणयुक्त होता है क्योंकि ' सर्वदा सर्वभावानां सामान्यं वृद्धिकारणम् ' के अनुसार वह अविरोध ( अनुकूल ) होता है अतः दोष को दूषित करता है । जैसे - रुक्ष, ज्वार, बाजरा का सेवन सामान्य गुण वात के रूक्ष आदि से अविरोधी है अतः ज्वार, बाजरा बा को दूषित करते हैं । २. दोष - दृष्यों से अपने सामान्य गुण - धर्म के अनुसार सम्बन्ध करके भी रोगों को उत्पन्न करता है । ३. दूष्य ( रसासृक्मांसमेदोस्थिमज्जाशुक्रमलमुत्रस्वेद ) भी व्याधि का कारण होता है । जब तक दोष किसी भी दृष्य को दूषित नहीं करते हैं तब तक रोग नहीं होते है, दूष्यों के दूषित होने के अनुसार ही भिन्न रोगों की उत्पत्ति होती है । इस प्रकार दोपानुबन्धि - दृष्य रोग का कारण माना जाता है, पर कारणों के अनुकूल ही दोष कुपित होगे है और कारणों के अनुकूल ही दृष्य भी १. चक्रसं मनोऽयं पाठः | योगीन्द्रनाथसेनस्तु ' परस्परं नानुवनन्ति न तदा विकाराभिनिर्वृत्ति-र्भवनि, अयाप्रकर्षादबलीयांसोऽनुबध्नन्ति न तदा विकाराभिनिर्वृत्तिर्भ ति चिराद्वाऽप्यभिनिर्वर्तन्ते विकाराः, तनवो वा भवन्ति, अयथोक्तसर्वलिङ्गा वा ' इति पठति । ' परस्परं नानुवघ्नन्ति परस्परं प्रतिकूला भवन्ति, अनुबन्धो ह्यनुकूलेऽभिप्रेतः; अथवा कालप्रकर्षादिति अनुबध्नन्तीत्यनेन संवन्ध, कालप्रकर्षादनुवन्नन्तीति कालप्रकर्षात् परस्परं निदानादयोऽनुगुणा भवन्तिः तनवोऽल्पमात्राः; अयथोक्तसर्वलिङ्गा इति येन प्रकारेण लिङ्गान्युक्तानि न तेन प्रकारेणापि सर्वलिङ्गानि भवन्तीत्यर्थः । अत्र यदा निदानादिविशेषाः परस्परं नानुबध्नन्ति न तदा विकाराभिनिर्वृत्तिः, कालप्रकर्णादनु-बघ्नन्ति तदा चिरादभिविनिर्वर्तन्ते विकाराः, अवलीयांसोऽनुवन्नन्ति तदा तनवोऽयथोक्तसर्वलिङ्गा वा विकारा अभिनिर्वर्तन्ते ' इति चक्रः । २. ‘ सर्वत्रिकारभावाभावप्रतिविशेषाभिनिर्वृत्तिहेतुर्भवत्युक्तः ' यो. ।