चरक संहिता हिन्दी भाष्य — पृष्ठ 771–780
चरक संहिता हिन्दी भाष्य · Chaukhamba · पृष्ठ 771–780
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६८२ चरकसंहिता ( ५ ) देश [ Habitat ] • देश पुनः स्थान को कहते है । द्रव्यों की उत्पत्ति और उसका प्रादेशमात्म्य को बतलाने वाला होता है । ( ५ ) विमर्श - यह द्रव्य किस देश में उत्पन्न हुआ और वहाँ से कहाँ गया, इसको देश कहते हैं उसमें देश के अनुसार भिन्न - भिन्न गुण होते हैं । जो व्यक्ति जिस देश में उत्पन्न होता है उसके लिए उसी देश में उत्पन्न होने वाले द्रव्य ( अन्न - औषधि ) उसे सात्म्यकर होते है । प्रचार का मतलब अन्यत्र जाने से अर्थात् जो धान्य रंगून में उत्पन्न होता है यदि वह भारत में आये तो वह भारतीयों के अनुकूल नहीं होता । यदि भारतीय उसे व्यवहार करते हैं तो उनके लिए लाभकर नहीं होता । इसलिये भोजन करते समय द्रव्यों की उत्पत्ति पर विशेष ध्यान देना चाहिये । एक ही द्रव्य जैसे गेहू ऊषर क्षेत्र में उत्पन्न हुआ और उर्वरा भूमि में उत्पन्न हुआ भित्र दोना है । ॐ कालो हि नित्यगश्चावस्थिकश्च; तत्रावस्थिको विकारमपेक्षते, नित्यगस्तु ऋतुसा-त्यापेक्षः ॥ ( ६ ) ॥ ( ६ ) काल [ Time ] – काल १. नित्यग और २. आवस्थिक होता है । आवस्थिक काल की अपेक्षा करता है । और नित्यग काल ऋतु सात्म्य की अपेक्षा करता है । ( ६ ) विमर्श - आवस्थिक काल में जिस रोग से जो व्यक्ति पीडित होता है उसे उस रोगानुसार आहार सेवन करना पड़ता है जैसे- ' न खारेच्चालुकं गुल्मी मधुराणि फलानि च ' इत्यादि से गुल्म रोग में आहार का निषेध किया है । तथा ज्वर में ' रक्तशास्यादयः शस्ताः पुराणाः षष्टिकैः सह इत्यादि बतलाया है । नित्यकाल में जिस ऋतु मे जो आहार सात्म्य होता है वह खाया जाता है जैसे हेमन्त ऋतु में अग्नि प्रबल रहती है । उस समय मात्रागुरु या द्रव्यगुरु आहार का सेवन करना उचित होता है । अतः भोजन करते समय इन दोनों कालों का विचार
करना आवश्यक होता है ।
* उपयोगसंस्था तूपयोगनियमः स जीर्णलक्षणापेक्षः ॥ ( ७ ) ॥
( ७ ) उपयोग संस्था [ Rules of use ]. - • यह भोजन करने का नियम है । यह पचे हुए आहार के लक्षणों की अपेक्षा करता है । ( ७ ) विमर्श - अन्यत्र भी सदवृत्त के प्रकरण में बतलाया है - ' जीर्णेऽश्नीयान् । ' भोजन पचने का लक्षण – इस प्रकार बताया है यथा- ' उद्वारशुद्धिरुत्साहो वेगोत्सर्गो यथोचितः । लघुता क्षुत्-पिपामा व जीर्णाहारस्य लक्षणम् ॥ ' तथा ' क्षुत् सम्भवति पक्वैषु रसदोपमलेषु च । काले वा यदि वाड्काले सोऽन्नकाल उदाहृतः ॥ ' इस प्रकार नित्यग और आवस्थिक कालानुसार स्वस्थ्य एवं रोगी के भोजन करने का नियम बनाया गया है । इसके अलावा उष्ण स्निग्ध आदि जो आहार के विधि विधान बनाये गये है उसका भी विचार करना उपयोग संस्था के अन्तर्गत आता है । & उपयोक्ता पुनर्यस्तमाहारमुपयुक्त, यदायत्तमोकसात्म्यम् । इत्यष्टावाहारविधिविशेषा-यतनानि व्याख्यातानि भवन्ति ॥ २२ ॥
( ८ ) उपयोक्ता [ User ] — - उपयोक्ता उसे कहा जाता है जो स्वयं आहार द्रव्यों का उपयोग करता है एवं जिसके आधीन ओकसात्म्य अर्थात् शरीरसाम्य है ॥ २२ ॥
विमर्श - इस प्रकार आठ आहार विधि - विशेषायतन का वर्णन कर दिया गया है । एषां विशेषाः शुभाशुभफलाः परस्परोपकारका भवन्ति तान् वुभुत्सेत, बुद्धा च हिते सुरेव स्यात् न च मोहात् प्रमादाद्वा प्रियमहितमसुखोदर्कमुप से व्यमाहारजातमन्यद्वा किंचित् ॥ २३ ॥
उपर्युक्त अष्टविधि विशेष आयतन से लाभ - ये आठ प्रकृति आदि के विशेष ( भेद ) शुभा-
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रसविमानाध्यायः १ ] सम्यक् ॥ २४ ॥
१. ' चाग्निमनुदीर्णमुदीरयति ' ग. । विमानस्थानम् ६८३ २. ‘ चानुदीर्णमग्निमुदीरयति ' ग. । शुभ फल को देने वाले और आपस में एक दूसरे के उपकार करने वाले होते है । अतएव उनको जानने की इच्छा करनी चाहिए, और जानकर हित की ही इच्छा वाला होना चाहिये । मोह से या प्रमाद से प्रिय होने पर भी अहितकर एवं परिणाम ने असुखकर आहार समूह को या दूसरी किसी वस्तु का सेवन नहीं करना चाहिए ॥ २३ ॥
विमर्श - प्रकृति, करण आदि अष्टविविविशेष आयतन स्वस्थवृत्त विषय की परीक्षा में प्रायः प्रय है । क्योंकि प्रतिदिन के व्यावहारिक जीवन के लिए इनका ज्ञान आवश्यक सा प्रतीत होता है । तत्रेदमाहारविधिविधानमरोगाणामातुराणां चापि पांचित् काले प्रकृत्यैव हिततमं भुञ्जानानां भवति । आहार - विधिविधान - यहाँ यह आहारविधि का विधान समय पर स्वभाव से ही हिनतम आहार करने वाले स्वस्थ व्यक्तियों के लिए और कई रोगी व्यक्तियों के लिए भी है । विमर्श - रक्तपित्त के आतुरों के लिये शोत अन्न और कफ के रोगियों के लिये रूक्ष अन्न लाभकारी होता है । इस बात को देख कर यहाँ पर ' केषाञ्चित् आतुराणाम् ' कहा गया है । तात्पर्य यह है कि यह आहार विधि - विधान प्रत्येक स्वस्थ पुरुष के लिये लाभकारी हैं, पर रोगियों में कुछ के लिये ही हितकारी होता है सामान्यतः सभी रोगियों के लिये नहीं । * उष्णं, स्निग्धं, मात्रावत्, जीर्णे, वीर्याविरुद्धम्, इष्टे देशे, इष्टसर्वोपकरणं, नातिद्रुनं, नातिविलम्बितम्, अजल्पन्, अहसन्, तन्मना भुञ्जीत, आत्मानमभिसमीक्ष्य आहार विधि - विधान - उष्ण, स्निग्ध, मात्रापूर्वक, भोजन के पच जाने पर, वीर्य के अविरुद्ध, अपने मन के अनुकूल स्थान पर, अनुकूल सामग्रियों के सहिन आहार को न अधिक जल्दी, न अधिक देर से, न बोलते हुए, न हँसते हुए, अपनी आत्मा का विचार कर आहार द्रव्य में मन लगा कर भोजन करना चाहिए ॥ २४ ॥
तस्य साद्गुण्यमुपदेक्ष्यामः - उष्णमश्नीयात्; उष्णं हि भुज्यमानं स्वदते, भुक्तं चग्नि-मोदीरयति, क्षिप्रं जरां गच्छति, वातमनुलोमयति, श्ले माणं च परिहासयतिः तस्मा-दुष्णमश्नीयात् ॥ ( १ ) ॥ ( १ ) उष्ण आहार से लाभ -- इसके उत्तम गुनकारक होने का उपदेश करेंगे । गर्म भोजन करना चाहिये, क्योंकि गर्म भोजन करने से भोजन में स्वाद मालूम होता है, खाने पर उदर की अग्नि तीव्र होती है, शीघ्र ही भोजन पच जाता है, वायु का अनुलोम होता है, कफ का शोपण हो जाता है, इसलिये गर्म भोजन करना चाहिये ॥ ( १ ) । स्निग्धमश्नीयात्; स्निग्धं हि भुज्यमानं स्वदते, भुक्तं चानुदीर्णमग्निमुदीरयति, क्षिप्रं जरां गच्छति, वातमनुलोमयति, शरीरमुपचिनाति, दृढीकरोतीन्द्रियाणि बलाभिवृद्धिमुप-जनयति, वर्णप्रसादं चाभिनिर्वर्तयति; तस्मात् स्निग्धमश्नीयात् ॥ ( २ ) ॥ ( २ ) स्निग्ध आहार से लाभ - स्निग्ध भोजन करना चाहिये क्योंकि लिग्ध खाया हुआ अन्न स्वादु लगता है । खा लेने पर अदीप्त उदर की अग्नि को तीव्र करता है, उसका पाक शत्र हो जाता है, वायु का अनुलोमन करता है, शरीर का उपचय ( वृद्धि ) करता है । इन्द्रियों को दृढ करना है, वल को बढ़ाता है, वर्ण में स्वच्छता उत्पन्न करता है । अतः स्निग्ध भोजन करना चाहिये । मात्रावदश्नीयात्; मात्रावद्धि भुक्तं वातपित्तकफानपीडयदायुरेव विवर्धयति केवलं,
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६८४ चरकसंहिता सुखं गुदमनुपर्येति, न चोष्माणमुपहन्ति, अव्यथं च परिपाकमेति; तस्मान्मात्राव-दश्नीयात् ॥ ( ३ ) ॥ ( ३ ) मात्रापूर्वक आहार से लाभ – नावापूर्वक भोजन करना चाहिये, क्योंकि मात्रापूर्वक खाया हुआ भोजन वान पित्त कफ को पीड़ित न करते हुये, पूर्णरूप से आयु को ही बढ़ाता है, गुदा तक आसानी से पहुँच जाता है, अनि को नष्ट नहीं करता, विना किसी प्रकार को व्यथा ( उपद्रव ) किये हुये पच जाता है । इसलिये मात्रापूर्वक भोजन करना चाहिये ॥ ( ३ )!! जीर्णेऽश्नीयात्; अजीर्णे हि भुञ्जानस्याभ्यवहृतमाहारजातं पूर्वस्याहारस्य रसमपरि-जनमुत्तरेणाहाररसेनोपसृजत् सर्वान् दोषान् प्रकोपयत्याशु, जीर्णे तु भुञ्जानस्य स्वस्थान-स्थेषु दोषेप्वग्नौ चोदीर्णे जातायां च बुभुक्षायां विवृतेषु च स्रोतसां मुखेषु विशुद्ध चोद्वारे हृदये विशुद्धे वातानुलोम्ये विसृष्टेषु च वातमूत्रपुरीषयेगेष्वभ्यवहृतमाहारजातं सर्वशरीर-धातूनप्रदूषयदायुरेवाभिवर्धयति केवलं; तस्माज्जीर्णेऽश्नीयात् ॥ ( ४ ) ॥ ( ४ ) आहार जीर्ण होने पर भोजन करने से लाभ - पच जाने पर खाना चाहिए । क्योंकि अजीर्ण में भोजन करनेवाले का खाया हुआ आहार समूह, पहले आहार के न पचे हुए रस को बाद के आहार के रस के साथ मिश्रित करने हुए सभी दोषों को शोत्र नकुचित करना है । भोजन के पच जाने पर खाते हुए दोषों के अपने स्थान में रहने पर, अग्नि के प्रदीप्त रहने पर, भोजन की इच्छा उत्पन्न होने पर, स्रोतों के मुख खुल जाने पर, डकार के शुद्ध रूप में आने पर, हृदय के शुद्ध होने पर, वायु का अनुलोमन होने पर, वात मूत्र और मल के वेगों का त्याग करने पर, खाया हुआ आहारसमूह सभी शरीर की धातुओं को न दूषित करते हुए आयु को ही
सम्पूर्ण रूप से बढ़ाता है । इसलिए आहार के पच जाने पर खाना चाहिए ॥ ( ४ ) ॥
वीर्याविरुद्धमश्नीयात्; अविरुद्धवीर्यमनन् हि विरुद्धवीर्याहार जैर्विकारै नौं पसृज्यते; तस्माद्वीर्याविरुद्धमश्नीयात् ॥ ( ५ ) ॥ ( ५ ) अविरुद्ध वीर्य वाले आहार से लाभ - जो आहार वीर्य में खाना चाहिये । जो परस्पर वीर्य में विरुद्ध नहीं हैं ऐसे आहार का आहार सेवन से जो रोग उत्पन्न होते हैं वे नहीं होते हैं, इसलिये करना चाहिये ॥ ( ५ ) ॥ परस्पर विरुद्ध न हो उसे सेवन करने से वीर्य विरुद्ध वीर्य के अविरुद्ध भोजन विमर्श - ऐसा भोजन कभी नहीं करना चाहिये जो दो अथवा दो से अधिक परस्पर में विरुद्ध वीर्य होते हों जैसे मछली और दूध | मछली और दूध ये दोनों रत ने नधुर होते हैं मधुर होने से महाअभिष्यन्द्री है । ये स्रोतों को बन्द कर अनेक प्रकार के यात्रिको उत्पन्न करते हैं और मछली वीर्य में उष्ण, दूध वीर्य में शांत होता है यदि इनका सेवन किया जाता है । तो रक्तविकृति, कुष्ठ, नपुंसकता आदि रोग होते हैं । इष्टे देशे इष्ट सर्वोपकरणं चाश्नीयात्; इष्टे हि देशे भुञ्जानो नानिष्टदेशजैर्मनो विघातकरै-र्भावैर्मनविघातं प्राप्नोति, यथैवेष्टैः सर्वोपकरणैः; तस्मादिष्टे देशे तथेष्ट सर्वोपकरणं चाश्नीयात् ॥ ( ६ ) ॥ ( ६ ) इष्ट देश में आहार से लाभ - अनुकूल स्थान पर और सभी मन के अनुकूल सामग्रियों के साथ भोजन करना चाहिये । मन के अनुकूल स्थान पर भोजन करने से अप्रिय स्थान में मन को विधान करनेवाले भावों के द्वारा होने वाले मानसिक विकार प्राप्त नहीं होते हैं । इसी प्रकार मन के अनुकूल सभी भोजन की सामग्रियों के होने पर मन में विकार प्राप्त नहीं होते हैं इसलिये अपने मन के अनुकूल स्थान पर और अपने मन के अनुकूल सभी सामग्रियों के चुत होने पर भोजन करना चाहिये ॥ ( ६ ) ॥
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रसविमानाव्याय: १ ] विमानस्थानम् ६८५ नातिनीयात् अतितं हि भुञ्जानस्योत्स्नेहनमवसादनं भोजनस्याप्रतिष्ठानं च, भोज्य दोपसाद्गुण्योपलब्धिश्च न नियता; तस्मान्नातिद्रुतमश्नीयात् ॥ ( ७ ) ॥ ( ७ ) अनिन भोजन से हानि - अतिशीघ्रता से भोजन नहीं करना चाहिए । क्योंकि बहुत जल्दी भोजन करनेवाले व्यक्तियों का आहार उन्मार्ग में चला जाता है । भोजन का अवसाद ( शिथिलता ) होता है और भोजन का अप्रतिष्ठान अर्थात् उचित रूप में वह अपने स्थान ( आमाशय ) में नहीं ठहरता है । आहार द्रव्य का दोष या उत्तम गुग इन दोनों की प्राप्ति निश्चित रूप से नहीं होने पानी है । इसलिये अति शीघ्रता से भोजन नहीं करना चाहिए । ( ७ ) नातिविलम्बितमश्नीयात्; अतिविलम्बितं हि भुञ्जानो न तृप्तिमधिगच्छति, बहु मुङ्क्ते, शीतीभवत्याहारजातं, विषमं च पच्यते; तस्मान्नातिविलम्बितमश्नीयात् ॥ ( ८ ) ॥ ( 2 ) अतिविलम्बित आहार से हानि भोजन अधिक धीरे - धीरे नहीं करना चाहिये । क्योंकि अधिक देर तक भोजन करने से तृप्ति नहीं हो पाती है । आहार अधिक मात्रा में हो जाता है | आहार द्रव्य शीतल हो जाता है । आहार का पाक विषम होता हैं इसलिये अधिक धीरे - धीरे भोजन नहीं करना चाहिये ॥ ८ ॥
अजल्पन्नहसन् तन्मना भुञ्जीत; जल्पतो हसतोऽन्यमनसो वा भुञ्जानस्य त एव हि दोषा भवन्ति य एवातिद्रुतमश्नतः; तस्मादजल्पन्नह संस्तन्मना भुञ्जीत ॥ ( ९ ) ॥ ( ९ ) नन्मना आहार लेने से लाभ - वार्तालाप न करते हुए, और न हँसते हुए, भोजन में मन लगाकर भोजन करना चाहिये । बात चीत करते हुए, हूँमते हुए या अनमनस्क होकर भोजन करने से वे ही दोष होते हैं, जो दोप अनि शीघ्रतापूर्वक भोजन करने से होते हैं । इसलिये न बात करने हुए और न हँसते हुए और भोजन करने में मन लगाकर भोजन करना चाहिये ॥ ९ ॥
आत्मानमभिसमीक्ष्य भुञ्जीत सम्यक; इदं ममोपशेते इदं नोपशेत इत्येवं विदितं ह्यस्यात्मन आत्मसात्म्यं भवति; तस्मादात्मानमभिसमीच्य भुञ्जीत सम्यगिति ॥ २५ ॥
( १० ) आत्मशक्ति के अनुसार आहार लेने से लाभ - अपनी आत्मा को भली प्रकार समझ कर भोजन करना चाहिये । यह आहार द्रव्य मेरे लिये लाभकारी हैं, यह आहारद्रव्य मेरे लिये हानिकर है इस प्रकार से अपनी आत्मा का सात्म्य अपने आत्मा से विदित होता है इसलिये अपनी आत्मा को भली प्रकार समझ कर भोजन करना चाहिये ॥ २५ ॥
भवति चात्र-* रसान् द्रव्याणि दोषांश्च विकारांश्च प्रभावतः । वेद यो देशकालौ च शरीरं च स नो भिषक् ॥ रसादि ज्ञान आवश्यक - • जो रस, द्रव्य, दोष, विकार, देश, काल और शरीर को प्रभाव से जानता है वही हमारे मत से चिकित्सक है ॥ २६ ॥
तत्र श्लोकौ -विमानार्थी रसद्रव्यदोषरोगाः प्रभावतः । द्रव्याणि नातिसेव्यानि त्रिविधं सात्म्यमेव च ॥
आहारायतनान्यष्टौ भोज्यसाद्गुण्यमेव च । विमाने रससंख्याते सर्वमेतत् प्रकाशितम् ॥
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते विमानस्थाने रसविमानं नाम प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥
१. ' तत्स्नेहस्वादन भोजनस्याप्रतिष्ठानं ' ग. । २. ' सनो भिषमिति नोऽस्माकं संमत इत्यर्थः ' चक्रः । ' सना ' ग. ।
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६८६ चरकसंहिता अध्यायगत विषयों का उपसंहार - विमान स्थान का प्रयोजन, प्रभाव द्वारा रस, द्रव्य, दोष और रोगों का वर्णन, कौन - कौन से द्रव्य अधिक रूप में नहीं सेवन करना चाहिए । ३ प्रकार के १. प्रवर, २. मध्य, ३ अवर सात्म्यों का वर्णन, ८ आहारायतन, भोजन का साद्गुण्य ये सभी बातें समान नामक अध्याय में बताई गई हैं ॥ २७-२८ ॥ इस प्रकार के द्वारा प्रतिसंस्कृत अनिदेशकृततन्त्र ( चरक संहिता ) के विमान स्थान में सविनान नामक प्रथम अध्याय समाप्त हुआ ॥ १ ॥
अथ द्वितीयोऽध्यायः अथातस्त्रिविधकुक्षीयं विमानं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्माह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
अब त्रिविधकुक्षीय नामक विमान की व्याख्या की जायगी । जैसा कि भगवान आत्रेय ने कहा था ॥ त्रिविधं कुक्षौ स्थापयेदवकाशांशमाहारस्याहार मुपयुञ्जानः; तद्यथा - एकमवकाशांशं मूर्तीनामाहारविकाराणाम्, एकं द्रवाणाम्, एकं पुनर्वातपित्तश्लेप्मणामः एतावती ह्याहार-मात्रानुपयुञ्जानो नामात्राहारजं किंचिदशुभं प्राप्नोति ॥ ३ ॥
( १ ) त्रिविधकुक्षि विभाग कुक्षि के तीन विभाग -- आहार का सेवन करने वाले व्यक्तियों के लिए उचित है कि वह अपने उदर में आहार के लिए ३ प्रकार का अवकाश ( स्थान रखें । जैसे- एक अवकाश ( स्थान ) मूर्त ( Solids ) आहार - विकारों के लिये, एक अवकाश द्रव ( Liquids ) आहार - विकारों के लिये और एक अवकाश वात - पित्त - कफ इन दोषों के लिए रखें । इतनी मात्रा में आहार का सेवन करने वाला व्यक्ति अमात्रा आहार सेवन से होने वाले दुर्गुणों को प्राप्त नहीं करना है ॥ ३ ॥
न च केवलं मात्रावत्त्वादेवाहारस्य कृस्तमाहारफलसौष्टवमवाप्तुं शक्यं, प्रकृत्यादीनाम-टानामाहारविधिविशेषायतनानां प्रविभक्तफलत्वात् ॥ ४ ॥
अष्ट आहारविधि - विशेष आयतन भी आवश्यक - प्रकृति आदि ८ आहारविवि विशेषतायतन का अलग - अलग फल बतलाये जाने के कारण केवल मात्रापूर्वक आहार सेवन करने से हो सम्पूर्ण आहार के उत्तम फलों को प्राप्त नहीं किया जा सकता ॥ ४ ॥
तत्रयं तावदाहार राशिमधिकृत्य मात्रामात्राफलविनिश्चयार्थः प्रकृतः । एतावानेव ह्याहारराशिविधिविकल्पो यावन्मात्रावत्त्वममात्रावत्त्वं च ॥ ५ ॥
मात्रा अमात्रा का विचार - यहाँ पर आहार राशि को लेकर यह मात्रा तथा अमात्रा के फल के निश्चय स्वरूप प्रयोजन का प्रसङ्ग हैं और कुछ मात्रापूर्वक और अमात्रापूर्वक भोजन करना यही आहाराराधि की विधि का भेट है ॥ ५ ॥
नत्र मात्रात्त्वं पूर्वमुद्दिष्टं कुचयंशविभागेन, तद्भूयो विस्तरेणानुव्याख्यास्यामः । तद्यथा -- कुनेरप्रपीडनमाहारेण, हृदयस्यानवरोधः पाश्र्श्वयोरविपाटनम् अनतिगौरवमुद-रस्य, प्रीणन मन्द्रियाणां चुत्पिपासोपरमः, स्थानासनशयनगमनोच्छ्वासप्रश्वासहास्यमं-कथासु सुखानुवृत्तिः; सायं प्रातश्च सुखेन परिणमनं, बलवर्गोपचयकरत्वं चः इति मात्रात लक्षणमाहारस्य भवति ॥ ६ ॥
१. ' परिणामगमनं ' यो. ।
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त्रिविधकुक्षीयविमानाध्यायः २ ] विमानस्थानम् ६८७ मात्रापूर्वक आहार के लक्षण - • इनमें उदर में अंश विभाग ने मात्रापूर्वक भोजन करने का विधान ऊपर कहा गया है । उसकी फिर मे विस्तारपूर्वक व्याख्या करेंगे, जैसे- आहार के द्वारा उदर में दाव न पड़े, हृदय की गति में रुकावट न पड़े, पार्श्व में कटने जैसी पीड़ा न हो, उदर में अधिक गुन्हा न हो, इन्द्रियाँ नप्त रहें, सवप्यास की शान्ति हो जाय, सान, अमन ( वैना ), शयन, गमन, श्रास - प्रश्वान, हंसने और बातचीत करने में सुख हो, सावत्र
और प्रात: काल सुखपूर्वक आहा का परिपाक हो जाय, बट, वर्ग और की वृद्धि हो ।
मात्रापूर्वक आहार का लक्षण है ॥ ६ ॥
विमर्श - यही तथ्य सू ० स्था ० के ५ वें अ ० में बताई गई है यथा- ' यावाच्यस्वाशननशितमनु-पहत्य प्रकृति यथाकालं जरां गच्छति तावदस्य मात्राप्रमाणं वेदितव्यं भवति । " मात्रात्वं पुनर्द्वविधमाचक्षते - हीनम्, अधिकं च । तत्र हीनमात्रमाहारराशि वल-वर्णोपचयक्षयकरमतृप्तिकर मुदावर्त कर मनायुष्यवृष्यमनौजस्यं शरीरमनोबुद्धीन्द्रियोपधा-तकरं सारविधमनमलक्ष्म्यावहमशीतेश्च वातविकाराणामायतनमाचक्षते, हीन मात्रा पूर्वक आहार से हानि अमात्रा पुनः दो प्रकार की कही है - हीन और अधिक । इननें होन मात्रा में किये हुए आहारराशि को बल, वर्ष और शरीर वृद्धि का क्षय करने वाला, तृप्ति न करने वाला, उदावर्त रोग को करने वाला, आयु के लिये हानिकर, वीर्य का क्षय करने वाला, ओज की वृद्धि न करने वाला, शरीर, मन, बुद्धि और इन्द्रियों को नष्ट करने वाला, ८ प्रकार के बताये हुये त्वचा आदि सारों को नष्ट करने वाला, शरीर में अशोभा ( उदासीनता ) उत्पन्न करने वाला और ८० प्रकार के वात रोगों का कारण कहते हैं । अतिमात्रं पुनः सर्वदोषप्रकोपणमिच्छन्ति कुशलाः । यो हि मूर्तानामाहारजातानां सौहित्यं गया वैस्तृप्तसाद्यते सूर्यस्तस्यामाशयगता वातपित्तरले माणोऽभ्यवहारेणा-तिमात्रेणातिप्रपीड्यमानाः सर्वे युगपत् प्रकोपमापद्यन्ते, ते प्रकुपितास्तमेवाहारराशिम-परिणतमाविश्य कुच्येकदेशमन्नाश्रिता विष्टम्भयन्तः सहसा वाऽप्युत्तराधराभ्यां मार्गाभ्यां प्रच्यावयन्तः पृथक् पृथगिमान् विकारानभिनिर्वर्तयन्त्यतिमात्र भोक्तुः । तत्र वातः शूला-नाहाङ्गमर्दमुखशोपमूर्च्छाभ्र माग्निवैषम्य पार्श्वपृष्टक टिग्रह सिराकुञ्चनस्तम्भनानि करोति, पित्तं पुनर्व्वरातीसारान्तदहितृष्णामदभ्रमप्रलपनानि, श्लेष्मा तु च्छर्धरोचकाविपाकशीतज्वराल-स्यगात्रगौरवाणि ॥ ७ ॥
अतिमात्रा में आहार से हानि - कुशल वैद्य अधिक मात्रा में किये हुए भोजन को सभी दोषों का प्रकोषक मानते है जो व्यक्ति मूर्त ( Solids ) आहार द्रव्यों को तृप्तिपूर्वक खाकर पुन: जलॉय पदार्थ ( Liquids ) को भी तृप्तिपूर्वक पी लेना है, उस पुरुष के आमाशय में स्थित वात, पित्त, कफ ये सभी दोष मात्रा से अधिक भोजन किये हुये जहार से अधिक पीड़ित ( प्रकुपित ) होकर एक ही साथ कुपित हो जाते है । कुपित हुए ये दोप कुक्षि ( आमाशय ) के एक भाग में जाकर अन्न में आश्रित होकर, अपक उमी आहार राशि को विटम्भित करते ( रोकते हुए या सहसा मुख और गुड़ा मार्ग से उस आहार राशिको निकालते हुए अधिक मात्रा में भोजन करने वाले व्यक्ति में अलग - अलग इन रोगों को उत्पन्न करते हैं । इनमें वायु - शूल, आनाह, अङ्ग, सुख का सूखना, मूर्च्छा, चक्क का आना, झिकी विषमता, पार्श्व, पृष्ठ और कटि नें ग्रह ( जबडाइट ), सिराओं ने आकुञ्चन और सितओं में जकड़ाहट उत्पन्न करती है । वित्त व अतिसार, अदह, प्यास, मद, भ्रम ( चक्कर का आना ) और प्रलापपन्न करता है । कफन भोजन में ि अपचन, शीतज्वर, आलस्य और शरीर में गुप्ता ( भारीपन ) उत्पन्न करता है ॥ ७ ॥
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६८८ चरकसंहिता न च खलु केवलमतिमात्रमेवाहारराशिमामप्रदोषकर मिच्छन्ति, अपि तु खलु गुरुरूक्ष-शीतशुद्विष्टविष्टम्भिविदाह्यशुचिविरुद्धानामकाले चान्नपानानामुपसेवनं, कामक्रोध लोभ-मोहे शोकमानोद्वेगभयोपतप्तमनसा वा यदन्नपानमुपयुज्यते, प्रदूषयति ॥ ८ ॥
आमोत्पत्ति में अन्य कारण -- केवल मात्रा से अधिक परिमाग में किया हुआ भोजन ही नहीं अपितु गुरु ( भारी ) रूक्ष, शीत, शुष्क, द्विष्ट ( अप्रिय ), कब्ज करने वाला, विदाही, अपवित्र, विरुद्ध अन्न पान का अकाल में सेवन भी आम दोष को उत्पन्न करता है, ऐसा मानते हैं । अथवा काम, क्रोध, लोभ, मोह, ईर्ष्या, लज्जा, शोक, अभिमान, उद्वेग औरभय से मन के उपनम्त ( दुःखी ) होने पर जो अन्न पान का प्रयोग किया जाता है, वह भी अन्न पान आम दोप को ही दूषित करता है ॥ ८ ॥
भवति चात्र-मात्रयाऽप्यभ्यवहृतं पथ्यं चान्नं न जीर्यति । चिन्ताशोकभयक्रोधदुःखशय्याप्रजागरैः ॥९ १ चिन्ता, शोक, भय, क्रोध, दुःख, शय्या और जागरण के कारण मात्रा से भी खाया हुआ पथ्य-- अन्न का ठीक पाक नहीं होता है ॥ ९ ॥
* तं द्विविधमामप्रदोषमाचक्षते भिषजः - विसूचिकाम्, अलसकं च ॥ १० ॥
( २ ) विसूचिका - अलसक ( दो आमदोष ) दो तरह के आम दोप -और अलक ॥ १० ॥
- चिकित्सक उस आम दोष को दो प्रकार का कहते है - विनूचिका विसूचिकामूर्ध्वं चाधश्च प्रवृत्तामदोषां यथोक्तरूपां विद्यात् ॥ ११ ॥
विसूचिका का रूप - उनमें से ऊपर मुख और नीचे गुदा मार्ग द्वारा प्रवृत्त आम दोष तथा ऊपर बताए हुए बात, पित्त एवं कफ के लक्षणों से युक्त जो रोग हो उसे विसूचिका जाननी चाहिए || विमर्श - ' यथोक्तरूपा ' का तात्पर्य - शूल, आनाह अङ्गम मूर्च्छा आदि त्रिदोषजन्य लक्षणों से है । सुश्रुत ने इसे विशेष स्पष्ट रूप से बताया है जैसे - ' सूचीभिरिव गात्राणि तुदन् संतिष्ठतेऽनिलः । यत्राजीर्णेन सा वैद्यैर्विसूचीति निगद्यते ॥ मूर्च्छातिसारो वमथुः पिपासा शूलो भ्रमोद्वेष्टनजृम्भदाहाः, कम्प हृदये रुजश्च भवन्ति तस्यां शिरसश्च भेदः । ' * अलसकमुपदेच्यामः - दुर्बलस्याल्पाग्नेर्बहुलेप्मणो वातमूत्रपुरीषवेगविधारिणः स्थिरगुरुबहु रूक्षशीत शुष्कान्नसे विनस्तदन्नपानमनिलप्रपीडितं श्लेष्मणा च विबद्धमार्गमति-मात्र प्रलीनमलसत्वाच्च बहिर्मुखीभवति, ततश्छर्धतीसारवर्ज्यान्यामप्रदोषलिङ्गान्यभिदर्श-यत्यतिमात्राणि । अतिमात्रप्रदुष्टाश्च दोषाः प्रदुष्टामबद्धमार्गास्तिर्यग्गच्छन्तः कदाचिदेव कंचलमस्य शरीरं दण्डवत् स्तम्भयन्ति, ततस्तं दण्डालसक्रमसाध्यं ब्रुवते । अलसक तथा दण्डालसक के रूप - अलसक का उपदेश करेंगे । दुर्बल, अल्प जाठराग्नि वाले,. अधिक कफ वाले, वात - मूत्र और मल के वेगों को धारण करने वाले और स्थिर, गुरु, अधिक रूक्ष, शीतल ( वासी ), सूखा अन्न का होकर एवं कफ से विवद्ध मार्ग होकर, सेवन करने वाले पुरुष का अन्नपान वाचु से पीड़ित अतिमात्रा में लीन होकर, अलसीभूत हो जाने से उस दुष्ट आहार की गति बाहर की ओर नहीं होती है । इसके बाद वमन और अतिसार को छोड़कर उसनें सभी आमविष के लक्षण अधिक रूप में दिखाई देते हैं । अधिक मात्रा में दूषित दोष अधिक १. ' आमप्रदोषकारगन् ' इति पा ० । २. ' आमप्रदशेषरूपाणि यथोक्तान्यभिदर्शयति ' इ. । ३. ' तमलसकन् ' यो ।
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त्रिविधकुक्षीय विमानाध्यायः २ ] विमानस्थानम् ६८६ दुष्ट आमदोष से मार्ग के रुक जाने से, शरीर में तिर्यक् चलते हुए उस पुरुष के कभी सम्पूर्ण शरीर को दण्डे के समान जकड़ देते हैं । तो उसे असाध्य दण्डालसक कहते हैं । विरुद्धाध्यशनाजीर्णाशनशीलिनः पुनरामेदोपमामविषमित्याचक्षते भिषजः, विषस शलिङ्गत्वात्; तत् परमसाध्यम्, आशुकारित्वाद्विरुद्वोपक्रमत्वाच्चेति ॥ १२ ॥
आमदिष की भयंकरता विरुद्ध भोजन करने वाले, अध्यशन करने वाले और अजीर्णाशन करने वाले पुरुष के आमदोष को, विष के समान लक्षणों को उत्पन्न करने से चिकित्सक - समुदाय आम कहता है । वह आशुकारी ( शीघ्रमारक ) और चिकित्सा में विरुद्ध होने के कारण अत्यन्त असाध्य होता है ॥ १२ ॥
विमर्श - अध्यशन उसे कहते हैं जो खाने के बाद पुनः शीघ्र ही भोजन किया जाता है । यद्यपि इसमें भी भोजन का पाक नहीं हुआ रहता है, अतः इसे भी अजीर्णाशन कहा जा सकता है, पर यह अजीर्णाशन से भिन्न है । अजीर्णाशन उसे कहते हैं जिसमें भोजन न पचने पर भोजन किया जाय, जैसे प्रातःकाल का भोजन शाम तक न पचा या शाम का भोजन प्रातःकाल तक न पचा अर्थात् प्रथम काल में खाया अन्न, द्वितीय अन्न काल तक न पचा हो और पुनः भोजन कर लिया जाय । यह आमविष विरुद्धोपक्रम होता है, इसका तात्पर्य यह है कि सामान्यतः आमदोष को दूर करने की औषधि उष्ण दी जाती है जो विष वेग को बढ़ाती है, और विष को शान्त करने की औषधि शीतल होती है जो आमदोष को बढ़ाती है अतः उसकी उचित चिकित्सा नहीं हो पाती । यह आमदोष विष के समान होता है, यह आमदोष का प्रभाव है, जैसे मधु, घृत समान मान में संयुक्त होने पर प्रभाव में विष होता है । ॐ तत्र साध्यमामं प्रदुष्टमलसीभूत मुल्लेखयेदादौ पाययित्वा सलवणमुष्णं वारि, ततः स्वेदनवर्तिप्रणिधानाभ्यामुपाचरेदुपवासयेच्चैनम् । अलक की चिकित्सा - - इनमें दूषित और अलसीभूत, साध्य आमविष को सर्वप्रथम सैंधा नमक और गर्म जल पिलाकर वमन करावें । इसके बाद स्वेदन और गुदा में बत्ती लगाकर ( मल प्रवृत्त कराकर ) चिकित्सा करें और आमदोष से पीडित रोगी को उपवास करावें । विमर्श - इस रोग में आमदोष से दोषों का मार्ग अवरुद्ध हो जाता है । वमन तथा गुदति के द्वारा उभय मार्ग से अलसीभूत अन्नराशि का निष्कासन हो जाता है । अतएव यह चिकित्सा - सिद्धान्त उचित प्रतीत होता है । इस रोग में मुख से वामक औषधि को छोड़कर अन्य दूसरी औषधि का प्रयोग नहीं किया जाता है, यथा- ' तीव्रातिरपि नाजीर्णी पिबेच्छूलन्नमौषधम् । आमच्छन्नोऽनलो नालं पक्तुं दोषौषधाशनम् ॥ ' वामक औषधि अपक अवस्था में ही दोषों को बाहर निकालती है अतः वामक औषधि देने में हानि नहीं होती है । * विसूचिकायां तु लङ्घनमेवाग्रे विरिक्तवच्चानुपूर्वी । विसूचिका की चिकित्सा - विसूचिका में सर्वप्रथम लङ्घन कराना चाहिए । बाद में विरेचन हो जाने पर जो पथ्य आनुपूर्वी जैसे पेया, विलेपी आदि क्रम से चलाया जाता है उसी प्रकार इस रोग में भी चलावें । आमप्रदोषेषु त्वन्नकाले जीर्णाहारं पुनर्दोषावलिप्तामाशयं स्तिमितगुरुकोष्ठमनन्नाभिला-पिणमभिसमीक्ष्य पाययेद्दोषशेषपाचनार्थमौषधमग्निसंधुणार्थं च नत्वेवाजीर्णाशनम्; १. एवं दोषमामविषमित्याचक्षते ' ग. । २. ' छेदन ० ' ग. श्लेष्मच्छेदनीयरसकट्वादिना श्लेष्मच्छेदनम् ' गङ्गाधरः । ४४ च ० सं ०
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६६० चरकसंहिता आमप्रदोषदुर्बलो ह्यग्निर्न युगपद्दोषमौषधमाहारजातं च शक्तः पतम् । अपि चामप्रदोषाहा-रौघविभ्रमोऽतिबलत्वादुपरत कौयानं सहसेवातुरमबलमतिपातयेत् । आमदोष में आहार की व्यवस्था - आन दोष जन्य में जब पहले का आहा " पच गया हो, दूसरा अन्य काल उपस्थित हो, तब यदि रोगी का आमाशय फिर भी दोषों से लिप्स हो; अर्थात् युक्त है और कोष्ठ, आमाशय लिति एवं भारी हो; भोजन करने की इच्छा न हो; तो ऐसे रोगियों का विचार कर बचे हुये दोनों के पाचन के लिये और अग्नि संयुक्षण के लिये औषध को पिलायें । यदि दूसरे अन्न काल तक भोजन का पाक न हुआ हो तो औषधि कथमपि नहीं देनी चाहिये क्योंकि आम दोष से दुर्बल अनि एक साथ दोष, औपव और आहार को पकाने में सर्वथा असमर्थ होती है और आम दोष, आहार और औषध का विभ्रम अत्यंत बलवान होने के कारण जिन मनुष्य की जउरानि शान्त हो गई रहती है, ऐसे दुर्बल रोगी को वह सहसा मृत्युकारक होता है । आमप्रदोषजानां पुनर्विकाराणामपतर्पणेनैवोपरमो भवति सति त्वनुबन्धे कृता-णानां व्याधीनां निग्रहे निमित्तविपरीतमपास्योपधमातङ्कविपरीतमेवावचारयेद्यथास्वम् । सर्वविकाराणामपि च निग्रहे हेतुव्याधिविपरीत मौषधमिच्छन्ति कुशलाः, तदर्थकारि वा । आम दोष की चिकित्सा - • पुनः आम दोष से होने वाले रोगों की शान्ति अपतर्पण से कराने के बाद भी रोग का सम्बन्ध बना रहता है । उसे दूर करने के लिये हेतु - विपरीत चिकित्सा को छोड़कर रोग विपरीत औषध का सेवन कराना चाहिये । सामान्यतः सभी रोगों को दूर करने के लिये कुशल चिकित्सक हेतु विपरीत, व्याधि - विपरीत, हेतुव्याधि - विपरीत अथवा हेतुविपरीतार्थकारी, व्याधिविपरीतार्थंकारी, हेतुव्याधिविपरीतार्थकारी औषध का प्रयोग करते हैं । विमुक्कामप्रदोषस्य पुनः परिपक्कदोपस्य दीप्ते चाग्नावभ्यङ्गास्थापनानुवासनं विधिव स्नेहपानं च युक्तया प्रयोज्यं प्रसमीच्य दोषभेषजदेशकालबलशरीराहार साम्य सवप्रकृति-वयसामवस्थान्तराणि विकारांश्च सम्यगिति ॥ १३ ॥
आमदोष से विमुक्त व्यक्ति की चिकित्सा - आम दोष से विमुक्त हो जाने पर, दोषों का पाचन हो जाने पर और अग्नि के दीप्त हो जाने पर विधिपूर्वक दोष, औषध, देश, काल, बल, शरीर, आहार, सात्म्य, सत्व, प्रकृति और वय ( उम्र ) इनके अवस्था -भेदों को एवं रोगों को ठीक - ठीक पहले विचारकर अभ्यंग, निरूहवस्ति, अनुवासन बस्ति और स्नेहपान इनका विधिवत् प्रयोग करना चाहिये ॥ १३ ॥
भवति चात्र-आहारविध्यायतनानि चाष्टौ सम्यक परीचयात्महितं विदध्यात् ।
अन्यश्च यः कश्चिदिहास्ति मार्गों हितोपयोगेषु भजेत तं च ॥ १४ ॥
आठ प्रकार के कहे गये आहार - विधिविशेषायतन की उचित रूप में परीक्षा कर अपना हित कार्य करे और भी जो कोई हिनकारी मार्ग इस संहिता में बनाया गया है उन सबका पालन उचित प्रकार से करना चाहिये ॥ १४ ॥
अशितं खादितं पीतं लीढं च क्व विपच्यते । एतच्त्वां धीर! पृच्छामस्तन्न आचचव बुद्धिमन् ॥ इत्यग्निवेशप्रमुखैः शिष्यैः पृष्टः पुनर्वसुः । आचचक्षे ततस्तेभ्यो यत्राहारो विपच्यते ॥ १६ ॥
नाभिस्तनान्तरं जन्तोरामाशय इति स्मृतः । अशितं खादितं पीतं लीढं चात्र विपच्यते ॥
१. ' उपहत्य ' ग. । कायाग्निम् ' इति पा ० । २. ' अनुदिक्कामप्रदोषस्य
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जनपदोद्ध्वंसनीय विमानाध्याय: ३ ] विमानस्थानम् ६६१ आमाशयगतः पाक्रमाहारः प्राप्य केवलम् । पक्कः सर्वाशयं पश्वाद्धमनीभिः प्रपद्यते || १८ || आमाशय वर्णन! अशिन यादित, पीत, लीढ आहार का पाक कहाँ होता है? यह मैं आपसे पूछ रहा हूँ । हे बुद्धिमान्! यह बात हमसे कहिये । इस प्रकार अग्निवेश - प्रमुख विश्यों से पूछे जाने पर अत्रेय पुनर्बनु ने उन शिष्यों से, जहाँ आहार का पाचन होता है, ने बताया | मनुष्यों के शरीर में नाभि व स्तन के बीच में आमाशय होता है । यहीं पर अशित, वादित, पीन, लीड इन चार प्रकार के आहारों का पाक होता है । जब आमाशय में गया हुआ आहार पूर्ण रूप से पच जाता है तब सम्पूर्ण शरीर में पका हुआ वह आहार रस धमनी द्वारा प्राप्त होता है! ' ५-१८ ॥ विमर्श - यहाँ आमाशय का अर्थ किसी भी अवस्था में अपक रहने वाले अन्न के रहने के स्थान से है । आयुर्वेदीय दृष्टिकोण से अन्न का शुद्ध रन उण्डुक में रहने वाली मलधरा कला से विभक्त होता है । जब तक यह विशुद्ध रम प्राप्त नहीं होता, तब तक अन्न को आम ही कहा जाता है । अतः आमा-शय ( Stomach ) से लेकर उण्डक ( Caecum ) के पहले के भाग को आमाशय माना जा रहा है । तत्र श्लोकः-तस्य मात्रावतो लिङ्गं फलं चोक्तं यथायथम् | अमात्रस्य तथा लिङ्गं फलं चोक्तं विभागशः ॥ इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते विमानस्थाने त्रिविध-कुक्षीयविमानं नाम द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥
-PNG-इस अध्याय में मात्रा पूर्वक आहार का लक्षण और उसका फल ठीक - ठीक बताया गया है । इसी प्रकार मात्रा से हीन आहार का लक्षण और फल भी अलग - अलग कह दिया गया है ॥ १ ९ ॥ इस प्रकार चरकद्वारा प्रतिसंस्कृत अग्निवेशकृततन्त्र ( चरकसंहिता ) के विमानस्थान में त्रिविध-कुक्षीय विमान नामक दूसरा अध्याय समाप्त हुआ || २ || अथ तृतीयोऽध्यायः अथातो जनपदोद्ध्वंसनीयं विमानं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्माह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
अब इसके बाद जनपद - उद्ध्वंसनीय [ विमान की व्याख्या की जायगी । जैसा कि भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥ १-२ ॥ जनपदमण्डले पञ्चालक्षेत्रे द्विजातिवराध्युषिते काम्पिल्यराजधान्यां भगवान् पुनर्व-सुरात्रेयोऽन्तेवासिगणपरिवृतः पश्चिमे धर्ममासे गङ्गातीरे वनविचारमनुविचरञ्च्छिष्यमग्नि-वेशमब्रवीत् ॥ ३ ॥
विषय - प्रवेश - पंजाब प्रान्त के जनपद - मंडल की श्रेष्ठ, द्विजाति वर्गों से सुशोभित, काम्पिल्य नामक राजधानी में, आषाढ के महीने में गंगा नदी के तटपर जंगलों में घूमते हुए शिष्य समुदाय से घिरे हुये, भगवान् पुनर्वसु आत्रेय ने शिष्य अग्निवेश से कहा ॥ ३ ॥
१. ' सर्वाश्रयम् ' इति पा. 1 २. ' द्विजातिवराध्युषितायां काम्पिल्यराजधान्याम् ' इनि पा. | ३. ' वनविचारमनुविचरन्निति वनं विचर्य विचर्यानुविचरन्नित्यर्थः ' चक्रः । ' वनविचारं वन-विहारं, विचरन् विहरन् ' गङ्गाधरः '