चरक संहिता हिन्दी भाष्य — पृष्ठ 781–790

चरक संहिता हिन्दी भाष्य · Chaukhamba · पृष्ठ 781–790

पृष्ठ 781

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६६२ चरकसंहिता दृश्यन्ते हि खलु सौम्य! नक्षत्रग्रहगणचन्द्रसूर्यानिलानलानां दिशां चाप्रकृतिभूता-नामृतुवैकारिका भावाः, अचिरादितो भूरपि च न यथावद्रसवीर्यविपाकप्रभावमोषधीनां प्रतिविधास्यति, तद्वियोगाच्चातङ्कप्रायता नियता । तस्मात् प्रागुद्धंसात् प्राक् च भूमेर्विर-सीभावादुद्धरध्वं सौम्य! भैषज्यानि यावन्नोपहतरसवीर्यविपाकप्रभावाणि भवन्ति । वयं चैषां रसवीर्यविपाकप्रभावानुपयोदयामहे ये चास्माननुकाङ्क्षन्ति, यांश्च वयमनुकाङ्क्षामः । न हि सम्यगुद्धृतेषु सौम्य! भैषज्येषु सम्यग्विहितेषु सम्यक् चावचारितेषु जनपदोद्भवंस-कराणां विकाराणां किंचित् प्रतीकारगौरवं भवति ॥ ४ ॥

( १ ) जनपदोदध्वंस ( Epidemis ) प्रकरण जनपदध्वंस का पूर्वरूप -- हे सौम्य! अस्वाभाविक रूप में रहने वाले नक्षत्र, ग्रहगण, चन्द्रमा, सूर्य, वायु, अग्नि और दिशाओं के तथा ऋतु विकार को उत्पन्न करने वाले भाव दिखाई पड़ रहे है । इससे बहुत ही शीघ्र भूमि भी ठीक - ठीक रस, वीर्य, विपाक, प्रभावों को औषधियों में उत्पन्न नहीं करेगी । ओषधियों में रस, वीर्य आदि के अभाव होने से रोग का होना भी निश्चित ही है । इसलिये हे सौम्य! विनाश होने के पहले और भूमि के रस रहित होने के पहले एवं औषधियाँ जब तक रस, वीर्य, विपाक, प्रभावहीन नहीं होती हैं, तब तक औषधियों को उखाड़ लो । हम लोग इन रस, वीर्य, विपाक, प्रभाव का प्रयोग उन लोगों के विषय में करेंगे जो हम लोगों से इन औषधियों के द्वारा चिकित्सा कराना चाहेंगे अथवा जिनकी चिकित्सा हम लोग स्वयं करना चाहेंगे । हे सौम्य! औपवियों के उचित प्रकार से उखाड़ लेने पर, उचित रूप से बना लेने पर और उचित रूप से उनके रस, वीर्य, विपाक, प्रभाव का विचार कर प्रयोग किये जाने पर जनपदोदध्वंस करने वाले रोगों की चिकित्सा में कुछ भी कठिनाई नहीं होती ॥ ४ ॥

एवंवादिनं भगवन्तमात्रेयमग्निवेश उवाच - उद्धृतानि खलु भगवन्! भैषज्यानि, सम्यग्विहितानि सम्यगवचारितानि च; अपि तु खलु जनपदो सनमेकेनैव व्याधिना युगपदसमानप्रकृत्याहारदेहवलसात्म्यसत्ववयसां मनुष्याणां कस्माद्भवतीति ॥ ५ ॥

जनपदोद्ध्वंस [ Epidemic ] के कारण के विषय में अग्निवेश का प्रश्न - इस प्रकार कहने वाले भगवान् आत्रेय से अग्निवेश ने कहा कि हे भगवन्! औषध उखाड़ ली गई, ठीक रूप में बनाई गई और ठीक तरह सोच - विचार कर प्रयोग में भी लाई गई, परन्तु एक ही समय में भिन्न - भिन्न प्रकृति, आहार, देह, बल, सात्म्य, मन और आयु के मनुष्यों का जनपदोद्-ध्वंस ( नाश ) एक ही व्याधि से कैसे होता है? ॥ ५ ॥

तमुवाच भगवानात्रेयः -- एवमसामान्यवतामध्येभिरग्निवेश! प्रकृत्यादिभिर्भावैर्म-नुप्याणां येऽन्ये भावाः सामान्यास्तद्वैगुण्यात् समानकालाः समानलिङ्गाश्च व्याधयोऽभिनि · वर्तमाना जनपदमु सयन्ति । ते खल्विमे भावाः सामान्या जनपदेषु भवन्ति; तद्यथा-वायुः, उदकं, देशः, काल इति ॥ ६ ॥

उपर्युक्त विषयक भगवान् आत्रेय का उत्तर - भगवान आत्रेय ने अग्निवेश से कहा कि हे अग्निवेश! इस प्रकार प्रकृति आदि भावों के भिन्न होते हुए भी मनुष्यों के जो अन्य भाव - सामान्य हैं उनके विकृत होने से एक ही समय में, एक ही समान लक्षण वाले रोग उत्पन्न होकर जनपद १. ' च प्रकृतिभूतानां ' ग । २. ' उद्धरध्वमिति बहुवचनं बह्वन्तेवासियुक्ताग्निवेशाभिप्रायेण ' चक्रः । ३. ' सम्यग्विचारचारितेषु ' इति पा ० । ५. ' एवमसामान्यानामेभि ० ' ग. । ४. ' सम्यग्विचारचारितानि ' इति पा ० ।

पृष्ठ 782

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जनपदोद्ध्वंसनीयविमानाध्यायः ३ ] विमानस्थानम् ६६३ को नष्ट कर देते हैं । वे ये भाव जनपद में सामान्य होते हैं । जैसे - वायु, जल, देश और काल || ६ || * तत्र वातमेवंविधमनारोग्यकरं विद्यात्; तद्यथा - यथर्तुविषममतिस्तिमितमतिच-लमतिपरुषम तिशीतमत्युष्णम तिरूत्तमत्यभिष्यन्दिनमतिभैरवारावमतिप्रतिहतपरस्परगति-मतिकुण्डलिनम सात्म्यगन्धबाष्प सिकतापांशुधूमोपहतमिति ( १ ); ( १ ) विकृत वायु के लक्षण - इस प्रकार की वायु को रोग पैदा करने वाली जानना चाहिये, जैसे — ऋतु के विपरीत बहने वाली, अतिनिश्चल, अत्यन्त वेग वाली, अत्यन्त कर्कश, अतिशीत, अति उष्ण, अत्यन्त रूक्ष, अत्यन्त अभिष्यन्दी, अत्यन्त भयंकर शब्द करने वाली, आपस में टक्कर खाती हुई, अति कुण्डली युक्त ( अधिक बवण्डर युक्त ), बुरे गन्ध, वाष्प, बालू, धूलि और धूम से दूषित हुई || * उदकं तु खल्वत्यर्थविकृतगन्धवर्णरसस्पर्श क्लेदबहुलमपक्रान्तजलचरविहङ्गमुपंक्षीण-जलेशयमप्रीतिकरमपगतगुणं विद्यात् ( २ ); ( २ ) विकृत जल के लक्षण - जो अत्यन्त विकृत गन्ध, वर्ण, रस, स्पर्श वाला एवं क्लेदयुक्त हो, जिसे छोड़कर जलचर ( मगर, मछली, आदि ) और जलचर पक्षी चले गये हों, जो सूख कर जलाशयों में थोडा रह गया हो, जो पीने में स्वादयुक्त न हो, पीने में अप्रिय हो, उसे दृषित अर्थात् नष्ट गुणों वाला जल समझना चाहिये । * देशं पुनः प्रकृतिविकृतवर्णगन्धरसस्पर्शं क्लेदबहुलमुपसृष्टं सरीसृपन्यालमशकशलभ-मक्षिकामूषकोलूकश्माशानिकशकुनिजम्बूकादिभिस्तृणो लूपोपवनवन्तं प्रतानादिबहुलम -पूर्ववदवपतितशुष्कनष्टशस्यं धूम्रपवनं प्रध्मातपतत्रिगण मुत्कुष्टश्वगणमुद्रान्त व्यथितविविध-मृगपक्षिसङ्घमुत्सृष्टनष्टधर्मसत्य लज्जाचारशीलगुणजनपदं शश्वत्तुभितोदीर्णसलिलाशयं प्रततोल्कापातनिर्घातभूमिकम्पमतिभयारावरूपं रूक्षताम्रारुणसिताभ्रजालसंवृतार्कचन्द्र-तारकमभीक्ष्णं ससंभ्रमोद्वेगमिव सत्रासरुदितमिव सतमस्त्रमिव गुह्यकाचरितमिवाक्रन्दित-शदबहुलं चाहितं विद्यात् ( ३ ); ( ३ ) विकृत देश के लक्षण - जिस देश के स्वाभाविक वर्ग, गन्ध, रस, स्पर्श विकृत हो गए हों, अधिक क्लेदयुक्त, साँप, हिंसक जन्तु, मच्छड़, टिड्डी, मक्खियाँ, चूहा, उल्लू, गोध, सियार आदि जन्तुओं से व्याप्त, तृण और फूस से युक्त उपवन वाले, विस्तृत लता आदि से युक्त, जैसा पहले कभी नहीं हुआ हो ऐसे गिरे हुये, सूखे हुये, और नष्ट हुए शस्यवाले, धूम युक्त वायु वाले, लगातार शब्द करते हुए पक्षियों के समूह और जहाँ जोर से कुत्ते चिल्लाते हों, अनेक प्रकार के मृग, पक्षी, घबड़ा कर और दुःखित होकर इधर - उधर दौड़ते हों, छोड़ दिए हैं और नष्ट हो गए हैं धर्म, सत्य, लज्जा, आचार, स्वभाव और गुण जिनमें ऐसे जनपद वाले, जहाँ के जलाशय क्षुब्ध हों और उसमें बड़ी लहरें उठती हों, जहाँ लगातार आकाश से उल्कापात होता हो, बिजली गिरती हो, भूकम्प होता हो और भयंकर शब्द सुनाई पड़ते हों, रूखे, ताम्र की. तरह - अरुण, सफेद, मेघ जाल से घिरे हुए सूर्य, चन्द्रमा और तारा आदि दिखाई पड़ते हों, बार - बार निरन्तर घबड़ाये हुए भ्रम के साथ हरे हुए की तरह, रोते हुए की तरह, अन्धकार से १. ' उपक्षी जलाशयम् ' इति पा ० । ३. तृणोलूपोपवनलनाप्रतानादिबहुलं ' ह. । २. ' विकृत ० ' इति पा. ४. ' प्रतिभयावाररूपं ' ग. । ' प्रतिभयं भयङ्करमध्यवारं रूपं मूर्तिर्यत्र तं तथा ' गङ्गाधरः ।

पृष्ठ 783

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६६४ चरकसंहिता घिरे हुए की तरह, गुह्यक ( देवादिग्रह ) द्वारा आकान्त देश की तरह और रुलाई का शब्द जहाँ अधिक सुनाई पड़ता हो वह देश दूषित है, ऐसा समझना चाहिए । 8 कालं तु खलु यथर्तुलिङ्गाद्विपरीत लिङ्गमतिलिङ्गं हीनलिङ्गं चाहितं व्यवस्येत् ( ४ ); ( ४ ) विकृत काल के लक्षण - ऋतु के स्वाभाविक लक्षणों से विपरीत लक्षणों वाले और कम लक्षणों वाले काल को अस्वास्थ्यकर ( अहित ) जानना चाहिए । इमानेवदोषयुक्तांश्चतुरो भावाञ्जनपदोंसकरान् वदन्ति कुशलाः; अतोऽन्यथाभूतांस्तु हितानाचक्षते ॥ ७ ॥

जनपदोदध्वंस के कारण - इस प्रकार इन चारों भावों का दोपयुक्त होना जनपद को उद्ध्वंस करने वाला होता है, ऐसा चतुर चिकित्सक कहते है । इससे विपरीत अर्थात् अपने स्वाभाविक लक्षण वाले ये चार -वात, जल, देश और काल - हितकारी होते है ॥ ७ ॥

विगुणेपि खत्वेतेषु जनपदोंसकरेषु भावेषु भेषजेनोपपाद्यमानानामभयं भवति रोगेभ्य इति ॥ ८ ॥

जनपदोदूध्वंस की सामान्य चिकित्सा - जनपद उद्ध्वंस करने वाले इन भावों के विगुण होने पर भी यदि उचित औषध का प्रयोग किया जाता है तो रोगों से भय नहीं होता ॥ ८ ॥

भवन्ति चात्र-वैगुण्यमुपपन्नानां देशकालानिलाम्भसाम् । गरीयस्त्वं विशेषेण हेतुमत् संप्रवक्ष्यते ॥ ९ ॥

वाताज्जलं जलाद्देशं देशात् कालं स्वभावतः । विद्यदुष्परिहार्यत्वाद्गरीयस्तरमर्थवित् ॥१० ॥

देश आदि का सकारण प्रधानता - • विकृत हुए देश, काल, वायु और जल इनमें से जिसकी जिससे विशेष रूप से प्रधानना है, उसे हेतुओं के साथ कहा जाता है । तत्त्वों को समझने वाला वैद्य स्वभाव से दुष्परिहार्य होने से वायु से जल, जल से देश, देश से काल को अधिक मुख्य समझे ॥ वाय्वादिषु यथोक्तानां दोषाणां तु विशेषवित् । प्रतीकारस्य सौकर्ये विद्याल्लाघवलक्षणम् ॥ प्रधानता का प्रयोजन — विशेषज्ञ वैद्य इन वायु आदि चारों में पूर्वोक्त दोषों की चिकित्सा की सुगमता के लिये लावव के लक्षण को समझे ॥ ११ ॥

& चतुर्ध्वपि तु दृष्टेषु कालान्तेषु यदा नराः । भेषजेनोपपाद्यन्ते न भवन्त्यातुरास्तदा ॥१२ ॥

जनपदोदध्वंस की सामान्य चिकित्सा कालपर्यन्त इन चारों के दुष्ट होने पर भी जब मनुष्य की उचित औधों द्वारा चिकित्सा की जाती है, तो वे रोगी नहीं होते है ॥ १२ ॥

येषां न मृत्युसामान्यं सामान्यं न च कर्मणाम् । कर्म पञ्चविधं तेषां भेषजं परमुच्यते ॥१३ ॥

और भी - रोग उत्पन्न होने पर जिन मनुष्यों में मृत्युजनक देव की समानता नहीं है और न मृत्युजनक कर्म की ही समानता है तो उन लोगों के लिये पंचवित्र कर्म ( वमन, विरेचन, आस्थापन, अनुवासन और शिरोविरेचन ) उत्तम औपनि कही जाती है ॥ १३ ॥

रसायनानां विधिवच्चोपयोगः प्रशस्यते । शस्यते देहवृत्तिश्च भेषजैः पूर्वमुद्धृतैः ॥ १४ ॥

सत्यं भूते दया दानं बलयो देवतार्चनम् । सद्वृत्तस्यानुवृत्तिश्च प्रशमो गुप्तिरात्मनः ॥ १५ ॥

हितं जनपदानां च शिवानामुपसेवनम् । सेवनं ब्रह्मचर्यस्य तथैव ब्रह्मचारिणाम् ॥ १६ ॥

संकथा धर्मशास्त्राणां महर्षीणां जितात्मनाम् । धार्मिकैः सात्त्विकै नित्यं सहास्या वृद्धसंमत. ॥ इत्येतद्वेषजं प्रोक्तमायुषः परिपालनम् । येषामनियतो मृत्युस्तस्मिन् काले सुदारुणे ॥ १८ ॥

१. ' विद्यादपरिहार्यत्वाद्गरीयः परमर्थवित् ' ग. । २. स्नेहस्वेदपूर्वकवमन विरेचनास्थापनानुवासन शिरोविरेचनानीति पञ्चविधम् । ३. ' सकस्था ' ग. ।

पृष्ठ 784

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जनपदोद्ध्वंसनीय विमानाध्याय: ३ ] विमानस्थानम् ६६५ और भी — उस समय विधिपूर्वक रसायनों का प्रयोग करना भी अच्छा होता है । जन-पदोद्ध्वंस के कारण भूत वातादि चारों भावों के दूषित होने पर पहले से उखाड़ी हुई औषधियों का प्रयोग शरीर - रक्षा के लिये उत्तम होता है । सत्य बोलना, जीव मात्र पर दया, दान, बलि और देवताओं की पूजा, सत्त का पालन, शान्ति रखना, और अपने शरीर की रक्षा, कल्याणकारी गाँवों और नगरों का सेवन, ब्रह्मचर्य का पालन, ब्रह्मचारियों की सेवा करना, धर्मशास्त्र की कथा, और जितेन्द्रिय महर्षियों की सेवा, सात्त्विक, धार्मिक और वृद्धों द्वारा प्रशंसित पुरुषों के साथ सदा बैठना, इस प्रकार ये सब उस भयंकर काल में जिन मनुष्यों का मृत्युकाल अनिश्चित है, उनकी आयु की रक्षा करने वाली औषधियाँ कही गई है ॥ १४-१८ ॥ इति श्रुत्वा जनपदसने कारणानि पुनरपि भगवन्तमात्रेयमग्निवेश उवाच - अथ खलु भगवन्! कुतोमूलमेषां वाय्वादीनां वैगुण्यमुत्पद्यते? येनोपपन्ना जनपदमु-सयन्तीति ॥ १ ९ ॥ वातादि के विकृत होने में कारण इस प्रकार भगवान् आत्रेय से कहे हुए जनपदोद्-ध्वंस के कारणों को सुनकर अग्निवेश ने फिर भी भगवन् आत्रेय से कहा - हे भगवन्! इन वायु आदि की विकृति किस कारण से उत्पन्न होती है जिससे विकृत होकर वे जनपद का नाश करते हैं ॥ १ ९ ॥ ॐ तमुवाच भगवानात्रेयः - सर्वेषामप्यग्निवेश! वाय्वादीनां यद्वैगुण्यमुत्पद्यते तस्य॒ मूलमधर्मः, तन्मूलं वाऽसत्कर्म पूर्वकृतं; तयोर्योनिः प्रज्ञापराध एव । तद्यथा - यदा वै देशनगर निगम जनपदप्रधाना धर्ममुत्कम्याधर्मेण प्रजां वर्तयन्ति तदाश्रितोपाश्रिताः पौरजानपदा व्यवहारोपजीविनश्च तमधर्ममभिवर्धयन्ति, ततः सोऽधर्मः प्रसभं धर्ममन्तर्ध-त्ते, ततस्तेऽन्तर्हितधर्माणो देवताभिरपि त्यज्यन्ते; तेषां तथाऽन्तर्हितधर्माणामधर्मप्रधाना-नामपक्रान्तदेवतानामृतवो व्यापद्यन्ते; तेन नापो यथाकालं देवो वर्षति न वा वर्षति विकृतं वा वर्षति, वाता न सम्यगभिवान्ति, चितिर्व्यापद्यते, सलिलान्युपशुप्यन्ति, ओषधयः स्वभावं परिहायापद्यन्ते विकृतिं; तत उद्ध्वंसन्ते जनपदाः स्पृश्याभ्यवहार्य-दोषात् ॥ २० ॥

वातादि की विकृति का मूल कारण अधर्म - भगवान् आत्रेय ने अग्निवेश से कहा कि हे अभि-वेश! वायु आदि सबकी जो विकृति होती है उसका मूल अधर्म होता है, या उसका मूल पूर्व जन्म में किए हुए दुरे कर्म है । उन दोनों का उत्पत्ति कारण प्रज्ञापराध ही होता है । जैसे- जब देश, नगर निगम और जनपद के प्रधान धर्म का त्याग कर अधर्म से प्रजाओं के साथ व्यवहार करते है, तब उस प्रधान के आश्रित और उपाश्रित ( कर्मचारी और नौकर ), नगर और गाँव के लोग या व्यापार के द्वारा जीवन निर्वाह करने वाले, उस अधर्म को अधिक बढ़ाते है और तब वह अधर्म बढ़कर सहसा धर्म को तिरोहित कर देता है । उसके बाद लुप्त धर्म वाले वे देवताओं से भी छोड़ दिये जाते है । उनी प्रकार लुप्त धर्म वाले, अधर्म की प्रधानता वाले, देवताओं का त्याग करने वाले, उन ग्राम - नगरों में ऋतुयें विगड़ जाती है जिससे इन्द्र उचित समय से जल नहीं बरसाते, या विल्कुल जल नहीं बरसाते या विकृत रूप में बरसाते हैं, वायु उचित रूप से नहीं ' बहती; पृथ्वी विकृत हो जाती है, जल सूख जाता है, औषधियाँ अपने स्वाभाविक गुणों को छोड़ कर बिगड़ जाती हैं । इसके बाद स्पृश्य और खाद्य पदार्थों के दोष से जनपद नष्ट हो जाते है || २० ॥ १. ' तथाविधान्तर्हितधर्माणां ग. । २. ' स्पर्शाभ्यवहार्य दोषात् ' इति पा. 1

पृष्ठ 785

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६६६ चरकसंहिता तथा शस्त्रप्रभवस्यापि जनपदोद्ध्वंसस्याधर्म एव हेतुर्भवति । येऽतिप्रवृद्धलोभक्रोध-मोहमानास्ते दुर्बलानवमत्यात्मस्वजनपरोपघाताय शस्त्रेण परस्परमभिक्रामन्ति, परान् वाऽभिक्रामन्ति, परैर्वाऽभिक्राम्यन्ते ॥ २१ ॥

-युद्ध में मृत्यु भी अधर्ममूलक है. उसी प्रकार युद्धों में शस्त्र और अस्त्र से होने वाले जन-पदोद्ध्वंस का भी कारण अधर्म ही है, जैसे -- जिन व्यक्तियों में अधिक रूप से लोभ, क्रोध, मोह और अहंकार बढ़ गया है वे दुर्बल व्यक्तियों को दबाकर अपने भाई - बन्धु और दूसरों के नाश के लिये शस्त्रों से परस्पर लड़ते हैं, या दूसरों पर आक्रमण करते हैं या दूसरे लोग उन पर आक्रमण करते हैं ॥ २१ ॥

रक्षोगणादिभिर्वा विविधैर्भूतसङ्गैस्तमधर्ममन्यद्वाऽप्यपचारान्तरमुपलभ्याभिहन्यन्ते ॥ भूनादि आक्रमण भी अधर्ममूलक है -- उस अधर्म या अन्य किसी अपवित्रता आदि अपचार को प्राप्त कर, राक्षस आदि से, या नानाप्रकार के भूत - प्रेतों के समूह से वे ( जनपद आदि ) मारे जाते हैं ॥ २२ ॥

तथाऽभिशापप्रभवस्याप्यधर्म एव हेतुर्भवति । ये लुप्तधर्माणो धर्मादपेतास्ते गुरुवृद्ध-मिर्षिपूज्यानवमत्याहितान्याचरन्ति; ततस्ताः प्रजान्गुर्वादिभिरभिशप्ता भस्मतामुपयान्ति प्रागेवानेकपुरुष कुलविनाशाय नियतप्रत्ययोपलम्भादनियताश्चापरे ॥ २३ ॥

शाप भी अधर्ममूलक है - इस प्रकार अभिशाप से उत्पन्न होने वाले जनपदोद्धवंस का भी कारण अधर्म ही होता है । जिनका धर्म लुप्त हो गया है, जो धर्म से हीन हो गये हैं, वे गुरु, वृद्ध, सिद्ध, ऋषि और पूज्यों का तिरस्कार कर अहित आचरण करते हैं । उससे अनेक पुरुषों के कुल के विनाश के लिए गुरु, वृद्ध आदि से शाप दिये जाने पर वे प्रजायें शीघ्र ही भस्म हो जाती हैं । और दूसरे नियत पुरुष प्रत्यय ( शापरूपी कारण ) को प्राप्त कर अनियन नाश को प्राप्त होते हैं ॥ २३ ॥

• प्रागपि चाधर्मादृते नाशुभोत्पत्तिरन्यतोऽभूत्! आदिकाले ह्यदितिसुतसमौजसोऽति-विमलविपुलप्रभावाः प्रत्यक्ष देवदेवर्षिधर्मयज्ञ विधिविधानाः शैलसारसंहतस्थिरशरीराः प्रस-वर्णेन्द्रियाः पवनसमबलजवपराक्रमाश्चारुस्फिचोऽभिरूपप्रमाणाकृति प्रसादोपचयवन्तः सत्यार्जवानृशंस्यदानदमनियमत पउपवासब्रह्मचर्यव्रतपरा व्यपगतभयरागद्वेषमोह लोभको-धशोकमानरोगनिद्वातन्द्राश्रमकुमालस्यपरिग्रहाश्च पुरुषा वभूवुरमितायुषः । तेषामुदारस-वगुणकर्मणामचिन्त्यरसवीर्यविपाकप्रभावगुणसमुदितानि प्रादुर्बभूवुः शस्यानि सर्वगुण-समुदितत्वात् पृथिव्यादीनां कृतयुगस्यादौ । भ्रश्यति तु कृतयुगे केषांचिदत्यादानात् सांन्निकानां सत्त्वानां शरीर गौरवमासीत्, शरीरगौरवाच्छ्रमः, श्रमादालस्यम्, आलस्यात् संचयः, संचयात् परिग्रह, परिग्रहालोभः प्रादुरासीत् कृते । आदियुग में अधर्ममूलक लोभ की उत्पत्ति I प्राचीन काल में अधर्म के बिना रोग की उत्पत्ति किसी दूसरे कारण नहीं होती थी । कृतयुग में मनुष्य देवताओं के समान ओज वाले; अतिनिर्मल, १. ' प्रागेवेति झटिति, अनेक पुरुषकुलविनाशायाभिशप्ता भस्मतां यान्तीत्यर्थः ' चक्रः । २. ‘ नियतप्रत्ययोपलम्भात् प्रतिनियतपुरुषाभिपाशात् अनियता अमिलिता एवं भस्मतां यान्ति न सर्वे जना इत्यर्थः ' चक्रः । ३. ' ० ऽतिवलविपुल प्रभावाः ' इति पा ० । ४. ' विधिर्यज्ञविधायको वेद: विधानं यज्ञकर्म ' चक्रः । ५. ' तेषामुदारसत्त्वगुणैः कर्मणां धर्मागां चाचिन्त्यत्वात् ' । ६. ' सत्त्वानां गौरवात् ' ग. ।

पृष्ठ 786

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जनपदोद्ध्वंसनीयविमानाष्यायः ३ ] विमानस्थानम् ६६७ प्रभावशाली एवं देव, देवर्षि, धर्म, यज्ञ, विधि एवं विधान को प्रत्यक्ष रखने वाले, पर्वत की तरह संघटित एवं दृढ़ शरीर वाले; प्रसन्न वर्ण एवं इन्द्रिय वाले; वायु की तरह बल, वेग एवं पराक्रम वाले; सुन्दर नितम्ब वाले; सुन्दर आकृति, शारीरिक गठन, प्रसन्नता और पुष्टि वाले; सत्य, सरलता, अक्रूरता ( दया ), दान, दम, नियम, तप, उपवास, ब्रह्मचर्यव्रत परायण, भय, राग, द्वेष, मोह, लोभ, क्रोध, शोक, मान, रोग, निद्रा, तन्द्रा, श्रम, क्लम, आलस्य एवं परिग्रह से रहित तथा लम्बी आयु वाले होते थे । कृतयुग के आरम्भ में पृथ्वी आदि के सर्व गुण युक्त होने के कारण उदार मन, गुण और कर्म वाले पुरुषों के लिए अचिन्त्य, रस, वीर्य, विपाक, प्रभाव एवं गुण, युक्त शस्य ( धान्य, जौ, गेहूँ आदि ) उत्पन्न होते थे । कृतयुग के कुछ समय बीतने पर कुछ धनी लोग अधिक भोजन करने लगे । उससे शरीर में भारीपन आ गया । शरीर में भारीपन होने से थकावट आई और थकावट से आलस्य, आलस्य से संचय ( धन आदि का ), संचय से परिग्रह ( धन, सामग्री, परिवार आदि का ) और परिग्रह से लोभ उत्पन्न हुआ । ततस्त्रेतायां लोभादभिद्रोह:, अभिद्रोहादनृतवचनम्, अनृतवचनात् कामक्रोधमानद्वेष. पारुण्याभिघातभयतापशोक चिन्तोद्वेगादयः प्रवृत्ताः । ततस्त्रेतायां धर्मपादोऽन्तर्धानमग--मत् । तस्यान्तर्धानाद् युगवर्षप्रमाणस्य पादहासः, पृथिव्यादेश्व गुणपादप्रणाशोऽभूत् । तत्प्रणाशकृतश्च शस्यानां स्नेहवैमल्यरसवीर्यविपाकप्रभावगुणपादभ्रंशः । ततस्तानि प्रजाशरीराणि हीयमानगुर्णपादैराहार विहारैरयथा पूर्वमुपष्टभ्यमानान्यग्निमारुतपरीतानि प्राग्व्याधिभिर्ज्वरादिभिराक्रान्तानि । अतः प्राणिनो हासमवापुरायुषः क्रमश इति ॥ २४ ॥

त्रेता युगों में क्रमशः धर्म का हास इसके बाद त्रेता युग में लोभ से द्रोह, द्रोह से झूठ बोलना, झूठ बोलने से काम, क्रोध, अहंकार, द्वेष, कठोरता, अभिघात ( दूसरे को या अपने शरीर पर चोट पहुँचाना ), भय, ताप ( शारीरिक एवं मानसिक कष्ट ), शोक, चिन्ता और उद्वेग आदि की प्रवृत्ति हुई । उससे त्रेता में धर्म का एक पाद ( चतुर्थांश ) लुप्त हो गया । उसके नष्ट होने से कृतयुग की जो आयु थी उतने वर्षों में से चौथाई वर्ष त्रेता की आयु कम हो गई और पृथ्वी आदि पंचमहाभूतों के भी गुणों का चौथाई अंश नष्ट हो गया । उन पंचमहाभूतों के गुणों के नष्ट होने से शस्यों ( धान्य ) में से स्निग्धता, निर्मलता, रस, वीर्य, विपाक और प्रभाव में भी चौथाई रूप से कमी हो गई । तब वे कम हुए चतुर्थाश गुण वाले आहार - विहारों से पहले की तरह पालित न होती हुई अग्नि और वायु से युक्त हुई प्रजा के शरीर पहले ज्वर आदि व्याधियों से आक्रान्त हो गये और प्राणियों की आयु में क्रमशः हास होने लगा ॥ २४ ॥

भवतश्वात्र-* युगे युगे धर्मपादः क्रमेणानेन हीयते । गुणपादश्च भूतानामेवं लोकः प्रलीयते ॥ २५ ॥

संवत्सरशते पूर्ण याति संवत्सरः क्षयम् । देहिनामायुषः काले यत्र यन्मानमिप्यते ॥ २६ ॥

इति विकाराणां प्रागुत्पत्तिहेतुरुक्तो भवति ॥ २७ ॥

युगानुसार धर्म और आयु में क्रमशः ह्रास - • युग - युग ( प्रत्येक ) में इसी क्रम से धर्म का एक-एक पाद कम होता जाता है और पंचमहाभूतों के गुणों में से भी एक - एक पाद न्यून होता जाता है । धीरे - धीरे एक - एक पाद के नष्ट होने से संसार का प्रलय हो जाता है । जिस युग में मनुष्यों की १. ' हीयमानानि हीयमान गुणपादैहीँयमानगुणैश्चाहारविहारै रयथापूर्वमुपष्टभ्यमानाग्निमारुतपरी-तानि ' यो । २. ' संवत्सराणां शते शतकृत्वो विभक्तानामेकैकभागे संपूर्णे जाते तद्युगोत्पन्नानां देहिनां तत्तत्परिमितस्यायुष एकैकः संवत्सरः क्षयं याति ' गङ्गाधरः ।

पृष्ठ 787

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६६८ चरकसंहिता या प्राणिमात्र की जितनी आयु बनाई गई है, उसमें उस युग का सौवाँ हिस्सा समाप्त होने पर मनुष्य की आयु एक वर्ष कम हो जाती है । इस प्रकार रोगों की प्रथम उत्पत्ति का कारण बताया गया है ॥ २५-२७ ॥ विमर्श - जिस युग में मनुष्य का जितना आयुमान माना गया है, उसमें १ वर्ष की कमी तब होती है जब उस युग के आयुमान का सौवां भाग समाप्त होता है, इस प्रकार एक - एक सौवें भाग के समाप्त होते - होते युग की आयु समाप्त होने पर सौ वर्ष मनुष्यों की आयु कम हो जाती है । तात्पर्य यह है कि कृतयुग में मनुष्यों की आयु ४०० वर्ष की होती थी । जब कृतयुग समाप्त हुआ तब मनुष्यों की आयु ३०० वर्ष की हो गई । पुनः त्रेतायुग का सौवां भाग समाप्त होने पर १ वर्ष आयु कम हो गई और नेता के समाप्त होने पर द्वापर में २०० वर्ष की आयु हो गई, फिर उसी क्रम से द्वापर के सौवां भाग समाप्त होने पर मनुष्य की आयु १ वर्ष कम होकर द्वापर के समाप्त होने पर कलि में सौ वर्ष की आयु हो गई । कलियुग की आयु ४ लाख ३२ हजार वर्षं है । अतएव कलि के मान का सौवाँ भाग अर्थात् ४ हजार ३२० वर्ष समाप्त होने पर मनुष्य की आयु ९९ वर्ष हो जायगी । इस प्रकार कलि के अन्त में आयु के अभाव में प्रलय हो जायगा । • एवंवादिनं भगवन्तमग्निवेश उवाच - किन्नु खलु भगवन्! नियतकालप्रमाणमायुः सर्वं न वेति ॥ २८ ॥

( २ ) नियत तथा अनियतआयु प्रकरण आयु - विषयक प्रश्न - इस तरह कहने वाले भगवान आत्रेय से अग्निवेश ने पूछा कि भगवन्! सभी जीवधारियों की आयु नियत काल तक होती है या नहीं ॥ २८ ॥

तं भगवानुवाच -* इहाग्निवेश! भूतानामायुर्युक्तिमपेक्षते । दैवे पुरुषकारे च स्थितं ह्यस्य बलात्रलम् ॥२ ९ ॥ निश्चित और अनिश्चित आयु में युक्ति - भगवान आत्रेय ने कहा कि हे अग्निवेश! इस लोक में प्राणिमात्र की आयु युक्ति की अपेक्षा करती है । इस आयु का बलावल ( अधिक होना या कम होना ) देव ( भाग्य ) और पुरुषकार ( कर्त्तव्य ) पर आधारित है ॥ २ ९ ॥ देवमात्मकृतं विद्यात् कर्म यत् पौर्वदैहिकम् । स्मृतः पुरुषकारस्तु क्रियते यदिहापरम् ॥३० ॥

देव और पुरुषकार की परिभाषा पूर्व में स्वयं किया गया कर्म देव समझना चाहिए । और दूसरा ' जो इस जन्म में किया जाता है उसे पुरुषकार ( पुरुषार्थ ) माना जाता है ॥ ३० ॥

बालविशेषोऽस्ति तयोरपि च कर्मणोः । दृष्टं हि त्रिविधं कर्म हीनं मध्यममुत्तमम् ॥३३ ॥

विविध कर्म - उन दोनों देव और पुरुषार्थ कर्मों में प्रधानता ( बल ) और अप्रधानता ( अवल ) की विशेषता होती है । कर्म तीन प्रकार के देखे जाते है, हीन, मध्य और उत्तम ॥३१ ॥

विमर्श - प्रायः देखा जाता है कभी भाग्य बलवान, कभी कर्म बलवान, कभी भाग्य और कर्म दोनो बलवान होते हैं, जैसे बनाया है कि - ' जितेन्द्रियं नानुपतन्ति रोगास्तत्कालयुक्तं यदि नास्ति दैवन् । ' ( शा. अ. २।४४ ) अर्थात् जितेन्द्रिय होकर नियमित रूप से स्वास्थ्य के नियमों का पालन करने पर तब रोग नहीं होते हैं जब उस समय उस व्यक्ति का दैव ( पूर्वजन्मकृत दुष्कर्म ) प्रधान न हो । इसी प्रकार देव के होते हुए यदि पुरुषकार प्रधान होता है तब देव दब जाता है और पुरुषार्थ से कार्य होता है । तयोरुदारयोर्युक्तिर्दीर्घस्य च सुखस्य च । नियतस्यायुषो हेतुर्विपरीतस्य चेतरा ॥ ३२ ॥

मध्यमा मध्यमस्येष्टा कारणं शृणु चापरम् । दैवं पुरुषकारेण दुर्बलं ह्युपहन्यते ॥ ३३ ॥

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जनपदोद्ध्वंसनीय विमानाव्याय: ३ ] विमानस्थानम् ६६६ * देवेन चेतरत् कर्म विशिष्टेनोपहन्यते । दृष्ट्वा यदेके मन्यन्ते नियतं मानमायुषः ॥ ३४ ॥

कर्मानुसार आयु - देव और पुरुषायें इन दोनों की उत्तमता का योग ( संयोग ) हो तो निचित रूप से सुखपूर्वक दीर्घ आयु की प्राप्ति होती है और इतर विपरीत ( होन संयोग ) अर्थात् अनियत रूप से दुःखपूर्वक अल्प आयु का कारण होता है । दोनों का मध्य रूप से संयोग मध्यम रूप से सुख एवं दुःखपूर्वक मध्यम आयु का कारण है । नियत अनियत आयु में युक्ति । - इस नियत एवं अनियत आयु का एक दूसरा भी कारण है, उसे सुनो । दुर्बल भाग्य को बलवान पुरुषार्थं नष्ट कर देता है । इसी तरह दुर्बल पुरुषार्थ को वलवान भाग्य नष्ट कर देता है । इस बात को देखकर कई लोग आयु को नियत मानते हैं ॥ ३२-३४ ॥ विमर्श - जय देव बलवान होता है और उसके समान पुरुषार्थं बलवान नहीं किया जाता तब पुरुषार्थं दुर्बल ही रहता है अतः दुर्बल होने के कारण पुरुषार्थ का कोई भी फल नहीं होता है । इसी आयु का मान नियत माना जाता है । कर्म किंचित् क्वचित् काले विपाके नियतं महत् । किंचित्वकालनियतं प्रत्ययैः प्रतिबोध्यते ॥ कर्म फल के नियत और अनियत होने में युक्ति. w किसी प्रवल कर्म का विपाक काल ( फल देने का समय ) निश्चित होना है और किसी का विपाक काल अनिश्चित होता है किन्तु कारणों से फलोन्मुख किया जाता है ॥ ३५ ॥

तस्मादुभयदृष्टत्वादेकान्तग्रहणमसाधु । निदर्शनमपि चात्रोदाहरिष्यामः -- यदि हि नियतकालप्रमाणमायुः सर्वं स्यात्, तदाऽऽयुष्कामाणां न मन्त्रौषधिमणिमङ्गलवल्युपहार-होम नियमप्रायश्चित्तोपवासस्वस्त्ययनप्रणिपातगमनाद्याः क्रिया इष्टयश्च प्रयोज्येरन्; नोन्द्रा-न्तचण्डचपलगोगजोष्ट्रखरतुरगमहिषादयः पवनादयश्च दुष्टाः परिहार्याः स्युः, न प्रपात-गिरिविषमदुर्गाम्बुवेगाः, तथा न प्रमत्तोन्मत्तोद्धान्त चण्डचपलमोहलो भाकुलमतयः, नारयः, प्रवृद्धोऽग्निः नच विविधविषाश्रयाः सरीसृपोरगादयः, न साहसं नादेशकालचर्या, न नरेन्द्रप्रकोप इति एवमादयो हि भावा नाभावकराः स्युः, आयुषः सर्वस्य नियतकाल-प्रमाणत्वात् । न चानभ्यस्ताकालमरणभय निवारकाणामकालमरणभयमागच्छेत् प्राणिनां व्यर्थाश्वारम्भकथाप्रयोगबुद्धयः स्युर्महर्षीणां रसायनाधिकारे, नापीन्द्रो नियतायुषं शत्रु वज्रेणाभिहन्यात्, नाश्विनावात भेपजेनोपपादयेतां, न महर्षयो यथेष्टप्रायुस्तपसा प्राप्नुयुः, नच विदितवेदितव्या महर्षयः ससुरेशाः सम्यक् पश्येयुरुपदिशेयुराचरेयुर्वा । अपि च सर्वच पामेतत् परं यदेन्द्र चतुः, इदं चाप्यस्माकं तेन प्रत्यक्षं; यथा - पुरुषसहस्राणामु-त्थायोत्थाय हवं कुर्वतामकुर्वतां चातुल्यायुङ्कं तथा जातमात्राणामप्रतीकारात् प्रतीकाराच्च, विषविषप्राशिनां चाप्यतुल्यायुष्ट्वमेव, न च तुल्यो योगक्षेम उदपानघटानां चित्रघटानां चोत्सीदतां; तस्माद्वितोपचारमूलं जीवितम्, अतो विपर्ययान्मृत्युः । अपि च देशका लान्मविपरीतानां कर्मणामाहारविकाराणां च क्रमोपयोगः सम्यकू, त्यागः सर्वस्य चानियोगायोग मिथ्यायोगानां सर्वातियोगसंधारणम्, असंधारणमुदीर्णानां च गति-मतां, साहसानां च वर्जनम्, आरोग्यानुवृत्तौ हेतुमुपलभामहे सम्यगुपदिशामः सम्यक् पश्यामश्चेति ॥ ३६ ॥

१. ' दैवेन पुरुषकारं पराभूतं दृष्ट्वा ' चक्रः । ३. ' भेषजेनोपचरेतान् ' इति पा ० । ५. ' आहारम् ' इति पा ० । २. ' दृष्टकारणैमुद्रिक्तं क्रियते ' चक्रः । ४. ' यद्दिव्यं चक्षुः ' ग. । ६. ' क्रियोपयोगः ' इति पा ० ।

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७०० चरकसंहिता आयु के नियत और अनियत होने में उदाहरण - दुर्बल दैव- पुरुषार्थं से तथा दुर्बल पुरुषार्थ देव ( भाग्य ) से नष्ट किया जाता है । इन दोनों प्रकार के दृष्टान्त के मिलने से एक ही पक्ष का ग्रहण करना ठीक नहीं । इस विषय में उदाहरण भी दिया जाता है । यदि सभी प्राणी नियतकाल तक आयु वाले हों तो आयु - वृद्धि की इच्छा से मन्त्र, औषध सेवन, मणिमुक्तादि रनों का धारण, मङ्गलपाठ, बलि आदि का प्रयोग, होम, किसी विशेष नियम का पालन, किसी पाप कर्म से उत्पन्न आयु प्रत्यवाय में प्रायश्चित्त का प्रयोग, उपवास, स्वस्त्ययन पाठ, समय पर नम्रता प्रकाशन, इतस्ततः तीर्थादि में गमन क्रिया और आयु वृद्धि के लिए यागादि क्रिया का प्रयोग कोई भी न करे । घबराये हुए, क्रोधी, चचल साँड़, हाथ, ऊँट, गदहा, घोड़ा, भैंसा आदि और आँधी, अग्नि आदि से भी अपनी रक्षा न की जाय । इसी प्रकार जल प्रपात, नीच ऊँच, ऊबड़ खाबड़ पर्वत तथा जल के तीन वेग तथा नशेबाज, प्रमत्त, विकृत स्वभाव वाले, क्रोधी चन्चल और मोह - लोम से व्याकुल मनि वाले लोगों से न बचा जाय; शत्रुओं से बचने का प्रयल न किया जाय इसी प्रकार बड़ी प्रचण्ड अनि विषैले पदार्थ, विषधर सर्प, बिच्छू आदि से भी न बचा जाताः साहस पूर्वक शक्ति से अधिक काम करना, स्थान और अवसर के विपरीत आचरण, राजा के कोप से प्राप्त केंद्र व संपन आदि भी मनुष्यों का नाश न कर पाती यदि उनकी आयु नियत होती । जत्र किसी की भी मृत्यु अकाल में न होगी तब तो अकाल में मरने में अनभ्यस्त प्राणियों में या अकाल मृत्यु को दूर करने वाले उशयों का जो अभ्यास नहीं किये हैं उनमें अकाल मृत्यु का भाव न आता और ऋषियों ने रसायन प्रकरण में आयु - वर्द्धन की कथा, प्रयोग और आयु के लिए जो बुद्धि ( मत ) प्रगट किए हैं वे सब व्यर्थं हो जाते । नियत आयु वाले शत्रु को इन्द्र भी वज्र से न मार सकते । रोगाक्रान्त को औषध से अश्विनीकुमार भी अच्छे करने में प्रवृत्त न होने, महर्षि लोग तपस्या के द्वारा अपनी इच्छा-नुसार आयु को नहीं प्राप्त करते, भविष्य को जानने वाले महर्षि लोग देवताओं के साथ रसायन औषधों को न देखते अर्थात् उसका विचार न करते तथा न जानने का प्रयास, न उपदेश आदि करते और न स्वयं आचरण करते । और भी सभी चक्षुओं ( ज्ञान ) में जो यह श्रेष्ठ इन्द्र चक्षु ( दिव्य ज्ञान ) है उससे यह सब भी हम लोगों को प्रत्यक्ष है । जैसे कि - युद्ध करने वाले और न करने वालों में अतुल्य आयु देखी जाती है, रोगों को उत्पत्ति होते ही चिकित्सा करने और न करने में, विष से हीन भोजन और विषयुक्त भोजन करने में भिन्न - भिन्न आयु दीख पड़ती है, समान रूप से जल पीने का बड़ा और चित्र में बने घड़े का समान योग क्षेत्र ( नहीं प्राप्त वस्तु को प्राप्त करना योग, और प्राप्त वस्तु की रक्षा करना क्षेम कहा जाता है ) नहीं होता है, क्योंकि जल को लाना, उठाना, रखना आदि के कारण से घड़ा शीघ्र फूट जाना है, चित्र स्थित घड़ा एक स्थान पर स्थिर रहने के कारण बहुत दिनों तक बना रहता है । इसलिए हित उपचार ( आहार-बिहार ) करने से जीवन और अहित आहार - विहार से मृत्यु होती है और देश, काल, आत्मगुण से विपरीत कर्म और आहार विहार का ठीक - ठीक प्रयोग, सभी अतियोग अयोग और मिथ्यायोगों का त्याग, सभी प्रकार के वेगों के अतियोगों का धारण, निकलते हुए और गतिशील वेगों को न रोकना, अति साहस न करना आदि आरोग्य होने में कारण है ऐसा हम लोग जानते है, उपदेश करते हैं और देखते भी हैं ॥ ३३ ॥

अतः परमनिवेश उवाच एवं सत्यनियतकाप्रमाणायुर्षा भगवन्! कथं कालर कालमृत्युर्वा भवतीति ॥ ३७ ॥

काल और अकाल मृत्यु -इसके बाद अनिवेश ने कहा कि हे भगवन्! इस प्रकार

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जनपदोद्ध्वंसनीयविमानाध्याय: ३ ] विमानस्थानम् ७०१ अनिश्चितकाल तक स्थिर आयु वाले पुरुषों की काल मृत्यु और अकाल मृत्यु ये दोनों कैसे होती है? ॥ ३७ ॥

तमुवाच भगवानात्रेयः - श्रूयतामग्निवेश! यथा यानसमायुक्तोऽक्षः प्रकृत्यैवाक्षगुणैरुपेतः स च सर्वगुणोपपन्नो वाह्यमानो यथाकालं स्वप्रमागतया देवावसानं गच्छेत्, तथाऽयुः शरीरोपगतं बलवत्प्रकृत्या यथावदुपचर्यमाणं स्वप्रमाणक्षयादेवावसानं गच्छति; स मृत्युः काले । यथा च स एवाक्षोऽतिभाराधिष्ठितत्वाद्विषमपथादपथादक्षचक्रभङ्गाद्वाह्यवाहक दोषा दणिमोक्षादनुपाङ्गात् पर्यसनाच्चान्तराऽवसानमापद्यते, तथाऽऽयुरप्ययथाबलमारम्भादय-थाग्न्यभ्यवहरणाद्विपमाभ्यवहरणाद्विषमशरीरन्यासादतिमैथुनादसत्संश्रयादुदीर्णवेगविनि-ग्रहाद्विधार्यवेगाविधारणाद्भूतविषवाय्वग्न्युपतापादभिघातादाहारप्रतीकारविवर्जनाच्चान्त-रावसानमापद्यते स मृत्युरकाले; तथा ज्वरादीनप्यातङ्कान्मिथ्योपचरितानकालमृत्यून् पश्याम इति ॥ ३८ ॥

काल और अकाल मृत्यु होने में युक्ति - इस प्रकार कहने वाले अग्निवेश से भगवान् आत्रेय ने कहा- सुनो अग्निवेश! जैसे गाड़ी में लगा हुआ धुरा ( Axis ) स्वभाव से ही अपने गुणों से युक्त और सर्वगुण सम्पन्न होते हुए धिस जाने के कारण यथासमय नष्ट हो जाता है इसी प्रकार शरीर से सम्बन्ध रखने वाली प्रकृति से बलवान् आयु, जब नियमतः दिनचर्या, रात्रिचर्या, ऋतुचर्या का पालन तथा हित वस्तुओं का ही सेवन करने पर धीरे - धीरे अपने प्रमाण से क्षय होती है तो उसे काल मृत्यु कहते हैं । जिस प्रकार उत्तम धुरा गाड़ी के ऊपर अत्यन्त भार लादने से विषम ( टेढ़े ) रास्ता से, बिना रास्ते ले चलने से, गाड़ी के चलते समय धुरा और चक्के के अलग हो जाने से, गाड़ीवान की असावधानी से, बैलों की उद्दण्डता से, अणि ( धुरे के अन्तभाग में चक्का न निकले इसलिए लगाई हुई कील ) के निकल जाने से, नेल आदि स्नेह का सर्वथा अभाव होने से, उलटने या गिर जाने से, पूरे समय तक न चल बीच में ही नष्ट हो जाता है उसी प्रकार शरीर में स्थित आयु भी वल या शक्ति से अधिक अनुचित साहसपूर्वक कार्य का आरम्भ करने से, अग्नि केबल को बिना विचारे भोजन करने से, विषम भोजन से, अपने शरीर को विषम रूप से रखने से या विषम व्यायाम से, अतिमैथुन से, असज्जनों के साथ से, आये हुए मलमूत्र के वेगों को रोकने से, धारण करने योग्य काम - क्रोधादि के वेगों को न रोकने से, प्रेत, विष, दुष्ट वायु और अग्नि के ताप से, चोट लगने से, भोजन और उत्पन्न रोगों की चिकित्सा न करने से बीच में ही जो समाप्त हो जाती है उसे अकाल मृत्यु कहते हैं । ज्वर आदि व्याधियों के प्रभाव से और उत्पन्न रोगों की उत्तम रीति से चिकित्सा न करने पर भी अकाल मृत्यु होती है, यह स्पष्ट देखा जाता है ॥ * अथाग्निवेशः पप्रच्छ - किन्नु खलु भगवन्! ज्वरितेभ्यः पानीयमुष्णं प्रयच्छन्ति भिषजो भूयिष्ठं न तथा शीतम्, अस्ति च शीतसाध्योऽपि धातुर्ज्वरकर इति ॥ ३ ९ ॥ उष्ण जल हितकर क्यों? - इसके बाद अग्निवेश ने पूछा कि हे भगवन्! वैद्य लोग ज्वर-पीड़ित व्यक्तियों को अधिक रूप में गरम जल क्यों देते हैं और उसी प्रकार शीतल जल क्यों नहीं देते, क्योंकि ज्वर उत्पन्न करने वाली पित्तधातु शीतल क्रिया से साध्य होती है ॥ ३ ९ ॥ ॐ तमुवाच भगवानात्रेयः - अरितस्य कायसमुत्थान देशकालानभिसमीच्य पाचनार्थ पानीयमुष्णं प्रयच्छन्ति भिषजः । ज्वरो ह्यामाशयसमुत्थः, प्रायो भेषजानि चामाशय-१. ' पर्यसनं परिक्षेपः, अनुपाङ्गादिति स्नेहादानात् ' चक्रः । २- ३. ' व्यसनमापद्यते ' इति पा ० ।