चरक संहिता हिन्दी भाष्य — पृष्ठ 791–800
चरक संहिता हिन्दी भाष्य · Chaukhamba · पृष्ठ 791–800
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७०२ चरकसंहिता समुत्थानां विकाराणां पाचनमनापतर्पणसमर्थानि भवन्तिः पाचनार्थं च पानीयमुष्णं, तस्मादेतज्ज्यरितेभ्यः प्रयच्छन्ति भिषजो भूयिष्ठम् । तद्वि तेषां पीतं वातमनुलोमयति, असोदर्यमुदीरयति, क्षिप्रं जरां गच्छनि, श्ले मार्ग परिशोषयति, स्वल्पमपि पीतं तृष्णाप्रशमनायोपकल्पते; तथायुक्तमपि चैतन्नात्यर्थोत्पन्नपित्ते उबरे सदाहभ्रमप्रलापाति-सारे वा प्रदेयम, उन्येन हि दाहनालापानिसारा सूयोऽभिवर्धन्ते, शीतेन चोपशाम्य-न्तीति ॥ ४० ॥
उष्ण जल के कार्य - उस अग्निवेश से आत्रेय ने कहा कि वैध समुदाय ज्वर से पीडित - रोगियों के शरीर, निदान, देश, काल का विचार कर दोषों के पाचन के लिए उष्ण जल देते हैं । ज्वर आमाशय से उत्पन्न होता है और प्रायः आमाशय से उत्पन्न होने वाले रोगों को दूर करने में पाचन, वमन, अपतर्पण औषध समर्थ होती है । इसलिए दोषों के पाचन के लिए ही वैद्य, ज्वर से पीडित रोगियों को उष्ण जल देते हैं । यह पीया हुआ उष्ण जल वायु का अनुलोमन करता है, पेट की अभि को तीव्र करता है, शीघ्र ही पच जाता है, कफ का शोषण करता है, थोडा भी पीने से प्यास को शान्त करता है । इस प्रकार के गुणयुक्त होने पर भी उष्ण जल अन्यन्त बढ़े हुए पित्त ज्वर में या दाह, भ्रम, प्रलाप से युक्त अतिसार में नहीं दिया जाता है | क्योंकि उष्ण द्रव्यों के प्रयोग से पुनः दाह, भ्रम, प्रलाप, अतिसार अधिक बढ़ जाते है और शीतल द्रव्यों के प्रयोग से शान्त होने है ॥। ४० ॥ भवति चात्र-शीतेोष्णकृतान् रोगान्दमयन्ति भिषग्विदः । ये तु शीतकृता रोगास्तेषामुष्णं भिषग्जितम् ॥ निदान विपरीत औषध का निर्देश - आयुर्वेदशास्त्र को जानने वाले उत्तम वैद्य उष्ण द्रव्यों के प्रयोग से उत्पन्न होने वाले रोगों की चिकित्सा शीतल द्रव्यों से करते हैं और जो शीतल द्रव्यों के प्रयोग से रोग उत्पन्न होते है उनमें उष्ण द्रव्यों के प्रयोग से लाभ पहुँचाते है ॥ ४१ ॥
* एवमितरेषामपि व्याधीनां निदानविपरीतं भेषजं भवति; यथा - अपतर्पणनि-मित्तानां व्याधीनां नान्तरेण पूरणमस्ति शान्तिः, तथा पूरणनिमित्तानां व्याधीनां नान्तरे-णापतर्पणम् ॥ ४२ ॥
और भी - इसी प्रकार निदान से विपरीत अन्य रोगों की औषध की जाती है, जैसे अपतर्पण से उत्पन्न रोगों की चिकित्सा बिना संतर्पण के नहीं होती और सन्तर्पण से उत्पन्न होने वाले रोगों की चिकित्सा बिना अपतर्पण के नहीं होती ॥ ४२ ॥
विमर्श -- इसी आधार पर सुश्रुत ने - ' संक्षेपतः क्रियायोगो निदानपरिवर्जनम् । वातादीनां प्रतीकारः प्रोक्तो विस्तरतो मया ॥ ' से सभी प्रकार के रोगों में कारण का त्याग और विपरीत का सेवन यह संक्षेप में चिकित्सा बताई है और विस्तार से वानादि दोषों की एवं व्याधियों की अलग - अलग चिकित्सा की जाती है । अतर्पण और संतर्पण से उत्पन्न रोगों की चिकित्सा सूत्रस्थान
के २२-२३ वें अध्याय में बताई गई है, वहीं देखना चाहिए ।
* अपतर्पणमपि च त्रिविधं - लङ्घनं, लङ्घनपाचनं, दोषावसेचनं चेति ॥ ४३ ॥
अपतर्पण का भेद - अपतर्पण के तीन भेद होते हैं - १. लंघन, २. लंघनाचन, ३. दोषा-वसेचन ( दोषों को निकालना ) आदि || ४३ ॥ तत्र लङ्घन मल्पबलदोषाणां लङ्घनेन ह्यग्निमारुतवृद्धया वातातपपरीतमिवाल्पमुद-१. विरेचनवमनापतर्पणसंशमान्येव ' ग. । २. ‘ अग्निं चानुदीर्णमुदीरयति ' ग. |
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जनपदोद्ध्वंसनीय विमानाध्याय: ३ ] विमानस्थानम् ७०३ कमरूपो दोषः प्रशोनमापद्यते; लङ्घनपाचने तु मध्यबलदोषाणां लङ्घनपाचनाभ्यां हि सूर्य-संताप मारुताभ्यां पांशुभस्माव किरणैरिव चाननिवहूदकं मध्यवलो दोषः प्रशोपमापद्यते; बहुदोषाणां पुनर्दोषावसेचनमेत्र कार्य, न ह्यभिने केदारसेवी पल्वलामसेकोऽस्ति तद्वद्दो-पावसेचनम् ॥ ४४ ॥
लन, पाचन और दोपावसेचन से लाभ - दोषों का बल जब थोड़ा होना है नव लंघन किया जाता है । लंघन से अग्नि और वायु इन दोनों की साथ ही वृद्धि हो जाती है । इससे जिस प्रकार वायु और धूप की प्रबलता से थोड़े जल वाले तालाब सूख जाते हैं, उसी प्रकार अल्प दोष अनि और वायु के बढ़ने से सूख जाते हैं । दोषों का मध्यवल होता है तो लंघन पाचन किया जाता है । जिस प्रकार सूर्य का ताप और वायु की वृद्धि इनके साथ - साथ धूलि को मध्यम स्तर के तालाब में छोड़ देने से उसका जल सूख जाता है, उसी प्रकार लंबन पाचन से मध्य डोप नष्ट हो जाते हैं । तात्पर्य यह है कि लंघन से दोष सूख जाते हैं, जैसे धूप और वाचु से जल सूखता है । पाचन ढोच का शोषण करता है जैसे धूल से जल का शोषण होता है । यदि दोष अधिक वृद्ध होते हैं तो उनकी चिकित्सा दोषावसेवन होती है । जैसे बिना खेत का मोड़ तोड़े उसमें इकट्ठा हुआ पानी नहीं सुखाया जा सकता उसी तरह दोषों का अवसेचन ( वमन, विरेचन आदि द्वारा निकालना ) भी समझना चाहिए ॥ ४४ ॥
ॐ दोषावसेचनमन्यद्वा भेषजं प्राप्तकालमप्यातुरस्य नैवंविधस्य कुर्यात् । तद्यथा - अन-पवादप्रतीकारस्याधनस्यापरिचारकस्य वैद्यमानिनचण्डस्यासूयकस्य तीव्राधर्मारुचेरतिक्षी-वलमांसशोणितस्यासाध्यरोगोपहतस्य मुमूर्षुलिङ्गान्वितस्य चेति । एवंविधं ह्यातुरमु-पचरन् भिषक पापीयसाऽयशसा योगमृच्छतीति ॥ ४५ ॥
अचिकित्स्य पुरुष — आवश्यक होने पर भी निम्नाकित प्रकार के पुरुषों में दोषों का वमन विरेचन द्वारा निकालना या अन्य प्रकार की औषध का प्रयोग करना, यह दोनों कार्य नहीं करना चाहिए । हितकर वचनों को न मानने वाला, धनहीन, सेवकरहित, अपने को वैद्य समझने वाला, क्रोधी, दूसरों की निन्दा करनेवाला, अधर्म में अधिक लिप्त रहने वाला, अधिक रूप में बल, मांस, रक्त जिसका क्षीण हो गया है, असाध्य रोग के लक्षणों वाला और अरिष्ट के पूर्ण लक्षणों से युक्त, इनकी चिकित्सा नहीं करनी चाहिए । इस प्रकार के रोगियों की चिकित्सा करने से वैद्य को पाप लगता है और यश न मिलकर भयंकर निन्दा होती है ॥ ४५ ॥
भवति चात्र-तदात्वे चानुबन्धे वा यस्य स्यादशुभं फलम् । कर्मणस्तन्न कर्तव्यमेतद् बुद्धिमतां मतम् ॥ ( अल्पोदकद्रुमो यस्तु प्रवातः प्रचुरातपः । ज्ञेयः स जाङ्गलो देशः स्वल्परोगतमोऽपि च ॥ प्ररोदकवृक्षो यो निवातो दुर्लभातपः । अनूपो बहुदोषश्च समः साधारणो मतः ॥४८ ॥ )
वैद्य का कर्त्तव्य कार्य करते समय तत्काल या भविष्य में जिसका फल अशुभ अर्थात् हानिकर तो उस कार्य को नहीं करना चाहिए, यह बुद्धिमानों का सिद्धान्त है । देश भेद 1 • देश तीन प्रकार के माने गये हैं, जांगल, अनूप, साधारण । जहाँ थोड़ा जल, थोड़े वृक्ष हों, हवा अधिक चलती हो, धूप अधिक लगती हो, रोग कम होते हों, ऐसे देश को जांगल कहा जाता है । जहाँ अधिक जल और वृक्ष हों, हवा वेग से न बहती हो, धूप कम १. ' अल्पवादप्रतीकारस्य ' ग. । २. ' अपचारिकस्य ' ह. ।
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७०४ चरकसंहिता लगती हो, दोषों की वृद्धि अधिक होकर प्रायः रोग अधिक होते हों उसे अनूप कहा जाता है । और जहाँ इन दोनों देशों के लक्षण परस्पर मिलते हों उसे साधारण देश कहा जाता है ॥ ४६-४८ || तत्र श्लोकाः-पूर्वरूपाणि सामान्या हेतवः सस्वलक्षणाः । देशोद्धुंसस्य भैषज्यं हेतूनां मूलमेव च ॥४ ९ ॥ प्राविकारसमुत्पत्तिरायुषश्च क्षयक्रमः । मरणं प्रति भूतानां कालाकालविनिश्चयः ॥ ५० ॥
यथा चाकालमरणं यथायुक्तं च भेषजम् । सिद्धिं यात्योपधं येषां न कुर्याद्येन हेतुना ॥ ५१ ॥
तदात्रेयोऽग्निवेशाय निखिलं सर्वमुक्तवान् । देशोद्ध्वंसनिमित्तीये विमाने मुनिसत्तमः ॥५२ ॥
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते विमानस्थाने जनपदोद्-ध्वंसनीयविमानं नाम तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥
अध्याय - उपसंहार - जनपदोदध्वंस होने का पूर्वरूप, सामान्य कारण और उनके लक्षण, चिकित्सा और जनपदोदध्वंस के कारण भूत बात, जल, देश, काल आदि के मूल ( अधर्म ), रोगों की प्रारम्भिक उत्पत्ति, आयु का विचार, आयु के क्षय का क्रम, प्राणियों की काल में या अकाल में मृत्यु होने का निश्चय जैसे अकाल - मृत्यु या काल - मृत्यु होती है उसका विचार, जिस प्रकार औषधि प्रयोग होने पर काम करती है उसका विचार, जिन व्यक्तियों की चिकित्सा नहीं करनी चाहिए, चिकित्सा न करने में कारण और देशों का विचार, ये सभी बातें आत्रेय ने विमान - स्थान के इस जनपदोदध्वंस नामक तीसरे अध्याय में बतायी हैं ॥ ४ ९ -५२ ॥ इस प्रकार चरक के द्वारा प्रतिसंस्कृत अग्निवेशकृततन्त्र ( चरकसंहिता ) के विमानस्थान में जनपदोद्ध्वंसनीय नामक तृतीय अध्याय समाप्त हुआ ॥ ३ ॥
अथ चतुर्थोऽध्यायः अथातस्त्रिविध रोगविशेषविज्ञानीयं विमानं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्माह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
अब त्रिविधरोगविशेषविज्ञानीय विमान की व्याख्या की जायगी जैसा कि भगवान आत्रेय ने कहा था ॥ १-२ ॥ विमर्श - इसके पहले जनपदध्वंस नामक अध्याय में व्याधियों की उत्पत्ति वताई गई है । उनका उचित रूप में ज्ञान कराने के लिए इस अध्याय में तीन प्रकार से रोगों की विशेष जानकारी हो इसलिए तीन प्रमाणों का निर्देश किया गया है । * त्रिविधं खलु रोग विशेषविज्ञानं भवति; तद्यथा - आप्तोपदेशः, प्रत्यक्षम्, अनुमानं चेति ॥ त्रिविध रोग विज्ञान - रोग विशेष का ज्ञान तीन प्रकार से होता हैं । जैसे आप्तोपदेश, प्रत्यक्ष और अनुमान ॥ ३ ॥
विमर्श - II लिए विभिन्न कारण माने गये हैं । जैसे- ' निदानं पूर्वरूपाणि रूपा-रोग जानने के युनयस्तथा । सम्प्राप्तिश्चेति विज्ञानं रोगाणां पञ्चधा स्मृतम् ॥ ' और ' दर्शनस्पर्शनप्रश्नैः परीक्षेताथ रोगिणम् ' । अथवा ' पञ्चभिर्ज्ञानेन्द्रियैः परिप्रश्नेन च ॥ ' इन उपायों के द्वारा रोग और रोगी की परीक्षा बताई गई है । पर इनके लिए इन तीनों प्रमाणों की आवश्यकता होती है । अर्थात् ये तीन उन उपायों को जानने के लिए साधन हैं ।
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त्रिविधरोगविशेषविज्ञानीय ० ४ ] विमानस्थानम् ७०५ * तत्राप्तोपो नाम आप्तवचनम् । आप्ता वितर्कस्मृति विभागविदो निष्प्रीत्युपता-पदर्शिनश्च । तेषामेवंगुणयोगाद्यद्वचनं तत् प्रमाणम् । अप्रमाणं पुनर्मत्तोन्मत्तमूर्खरक्तदुष्टा-दुष्टवचनमिनि; ( १ ) आप्तोपदेश - आप्त के वचनों को आप्तोपदेश कहा जाता है । आप्त पुरुष तर्क से रहित अर्थात् निश्चित ज्ञान वाले, स्मरण - शक्ति उत्पन्न तथा कार्य और अकार्य के विभाग को जानने वाले होते हैं, जो किसी भी प्राणी के प्रति प्रीति उपताप अर्थात् राग - द्वेष से रहित हैं इस प्रकार के व्यक्तियों को आप्त माना जाता है । वे इन गुणों से युक्त होने के कारण जो वचन कहते हैं वह प्रमाण माना जाता है और मतवाले, पागल, मूर्ख का वचन वह चाहे दुष्ट हो अथवा अदुष्ट हो तो भी अप्रमाण माना जाता है ॥ ४ ॥
* प्रत्यक्षं तु खलु तद्यत् स्वयमिन्द्रियैर्मनसा चोपलभ्यते । ( २ ) प्रत्यक्ष का लक्षण -प्रत्यक्ष ज्ञान कहा जाता है । जो वस्तु स्वयं इन्द्रियों और मन के द्वारा जानी जाती है उसे अनुमानं खलु तर्कों युक्त्यपेक्षः ॥ ४ ॥
( ३ ) अनमान का लक्षण - • युक्ति की अपेक्षा रखनेवाले तर्क का नाम अनुमान है ॥ ४ ॥
२. त्रिविधेन ग्वल्वनेन ज्ञानसमुदायेन पूर्व परीक्ष्य रोगं सर्वथा सर्वमथोत्तरकालमध्य-वसानमदोषं भवति, न हि ज्ञानावयवेन कृत्स्ने ज्ञेये ज्ञानमुत्पद्यते । निदान में प्रमाणत्रय की आवश्यकता - यदि इन तीन प्रकार के रोग- ज्ञान करनेवाले उपायों से सावधानतापूर्वक पहिले सभी तरह से रोग की परीक्षा कर निश्चय किया जाता है तो fe में चिकित्सा करते समय कभी भी असफलता नहीं होती और उसका ज्ञान सत्य होता है । परीक्षा करने की बताई हुई इन तीन विधियों में से यदि किसी एक से परीक्षा की जाए और विषय तीनों परीक्षा से जानने योग्य हो तो एक से उचित ज्ञान नहीं होता है । विमर्श - चरक ने सूत्र स्थान में युक्ति एक अलग प्रमाण मानकर चार और विमान स्थान के आठवें अध्याय में उपमान मानकर चार और यहाँ केवल तीन प्रमाण माने हैं । अन्य दर्शन वाले सम्भव, अनुपलब्धि, अर्थापत्ति, ऐतिह्य आदि अनेक प्रमाण मानते हैं । इन सभी को सिद्धान्त में चरक ने तीन में ही समावेश कर लिया, जैसे प्रत्यक्ष में अनुपलब्धि को क्योंकि इसे अभाव कहा जाता है । जिन इन्द्रियों से भाव पदार्थ का ज्ञान होता है उन्हीं इन्द्रियों से अभाव का भी ज्ञान होता है । अनुमान में युक्ति, उपमान, अर्थापत्ति, सम्भव इनका समावेश कर लिया है । जैसे— ' जलकर्षणवीज संयोगात् सस्यसम्भवः ' से इन चारो का योग होने पर सस्य की उत्पत्ति होती हैं, इसे ही युक्ति प्रमाण माना है । अच्छे लहलहाते धान्य के खेतों को देखकर यह हो तो अनुमान चारों किया जाता है कि इसमें चारों का उत्तम संयोग किया गया है, यदि उत्तम धान्य न का उत्तम संयोग नहीं है ऐसा कहा जाता है । उपमान- उपमा के द्वारा वस्तु को समझ कर बाद में ज्ञान किया जाता है । जैसे गाय के आकार की ही वन में एक गवय जाति होती हैं, ग्राम के गौ का ज्ञान कर वन में गवय को देखने पर उसका ज्ञान किया जाता है, यह भी अनुमान से ज्ञात होता है । दूसरे की उपमा से समझाए हुए पदार्थ को कर्ण से प्रत्यक्ष होने के पश्चात् गवय को देखने पर शब्दों के आधार पर अनुमान से ज्ञान किया जाता है । अर्थापत्ति - जिसके बिना १. ‘ पुनर्मत्तोन्मत्तमूर्खवक्तृदृष्टादृष्टवचनमिति ' इति पा ० । ३. ‘ सर्वमेवोत्तरकालम् ' इति पा ० । ४५ च ० सं ० २. ' ० आत्मना ' ग.
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७०६ चरकसंहिता जो न बन सके उसे अर्थापत्ति कहते हैं । जैसे – मोटा देवदत्त दिन में नहीं खाता है - इस वाक्य से यह निकाला जाता है कि यह व्यक्ति रात में अवश्य खाता होगा क्योंकि बिना खाए मोटा होना दुर्लभ है । इसे भी अनुमान ही माना जाएगा क्योंकि जो खाता है वह मोटा होता है जो नहीं खाता वह मोटा नहीं होता, इस प्रकार की व्याप्ति सभी को ज्ञान ही है । सम्भव - जिससे जिसका सम्भव होता है जैसे दूध से दही का होना सम्भव है, या गेहूं के बीज से गेहूँ का पौधा ही सम्भव है, इसे भी अनुमान के द्वारा सिद्ध किया जाता है । ऐतिह्य - ' ऐतिह्यं नाम वेदादि ' । वेद आदि को ऐतिह्य माना गया है । वह स्पष्ट ही आप्तोपदेश है इसलिए सभी को तीन में समन्वय कर तीन ही प्रमाण चरक ने माने हैं । * त्रिविधे त्वस्मिन् ज्ञानसमुदये पूर्वमाप्तोपदेशाज्ज्ञानं, ततः प्रत्यक्षानुमानाभ्यां परी-क्षोपपद्यते । किं ह्यनुपदिष्टं पूर्वं यत्तत् प्रत्यक्षानुमानाभ्यां परीक्षमाणो विद्यात् । तस्माद् द्विविधा परीक्षा ज्ञानवतां प्रत्यक्षम्, अनुमानं च; त्रिविधा वा सहोपदेशेनं ॥ ५ ॥
प्रमाण दो या तीन - इन तीन परीक्षाओं में सबसे पहले आप्तोपदेश से ज्ञान होता है । उसके बाद प्रत्यक्ष और अनुमान से ज्ञान होता है । यदि पहले किसी का उपदेश न किया जाय तो किसकी प्रत्यक्ष और अनुमान के द्वारा परीक्षा की जायगी । इसलिये ज्ञान सम्पन्न वैद्य के लिये प्रत्यक्ष और अनुमान ये दो प्रकार की परीक्षायें हैं । अथवा आप्तोपदेश को लेकर तीन परीक्षायें हैं ॥ ५ ॥
तंत्रेदमुपदिशन्ति बुद्धिमन्तः - रोग मेकैकमेवंप्रकोपणमेवयोनिमेवमुत्थानमेवमात्मान-मेवमधिष्ठानमेवंवेदन में संस्थानमेवंशब्दस्पर्शरूपरसगन्धमेवमुपद्रवमेवंवृद्धिस्थानक्षयस-मन्त्रितमेवमुदर्कमेवं नामानमेवंयोगं विद्यात्; तस्मिन्नियं प्रतीकारार्था प्रवृत्तिरथवा निवृ-त्तिरित्युपदेशाज्ज्ञायते ॥ ६ ॥
( १ ) आप्तोपदेश से शेय - बुद्धिमान् वैद्य रोगों की परीक्षा करने के लिए इस प्रकार उपदेश करते हैं । एक - एक रोग को ऐसे प्रकोपणों वाला, ऐसी प्रकृति वाला, ऐसे कारणों वाला, ऐसे स्वरूप बाला, ऐसे स्थान वाला, ऐसी वेदना वाला, ऐसे लक्षण वाला, ऐसे शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध वाला, ऐसे उपद्रवों वाला, ऐसे वृद्धि, स्थान और क्षय वाला, ऐसे भविष्य वाला, ऐसे नाम वाला और ऐसे योग वाला है, इस प्रकार जानना चाहिए । इस रोग में इसे दूर करने के लिये इस प्रकार की चिकित्सा होगी या इस रोग में यह विकृति है ये सभी बातें उपदेश से जानी जाती हैं ॥ ६ ॥
प्रत्यक्षतस्तु खलु रोगतवं बुभुत्सुः सर्वैरिन्द्रियैः सर्वानिन्द्रियार्थानातुरशरीरगतान्, परीक्षेत, अन्यत्र रसज्ञानात् तद्यथा - अन्त्रकूजनं, सन्धिस्फुटनमङ्गुलीपर्वणां च स्वर-विशेषांश्च, ये चान्येऽपि केचिच्छरीरोपगताः शब्दाः स्युस्ताञ्छ्रोत्रेण परीक्षेत वर्णसंस्थान-प्रमाणच्छायाः, शरीरप्रकृतिविकारौ, चतुर्वेपयिकाणि यानि चान्यान्यनुक्तानि तानि चक्षुषा परीक्षेत रसं तु खल्वातुरशरीरगतमिन्द्रियवैषयिकमप्यनुमानादवगच्छेत्, न ह्यस्य प्रत्यक्षेण ग्रहणमुपपद्यते, तस्मादातुरपरिप्रश्नेनैवातुरमुखरसं विद्यात्, यूकापसर्पणेन त्वस्य शरीरवैरस्यं, मक्षिकोपसर्पणेन शरीरमाधुर्यं, लोहितपित्तसंदेहे तु किं धारिलोहितं लोहितपित्तं वेति श्वकाकभक्षणाद्वारि लोहितमभक्षणाल्लोहितपित्तमित्यनुमातव्यम्, एवम-१. ' त्रिविधां वा सहोपदेशेनेच्छन्ति बुद्धिमन्तः ग. | २. अयं पाठो गङ्गाधरासंमतः । ३. ' एवं नामानम् ' इति पा. ।
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त्रिविधरोगविशेषविज्ञानीय ० ४ ] विमानस्थानम् ७०७ न्यानप्यातुरशरीरगतान् रसाननुमिमोत; गन्धांस्तु खलु सर्वशरीरगतानातुरस्य प्रकृति-वैकःरिकान् घ्राणेन परीक्षेत; स्पर्शं च पाणिना प्रकृतिविकृतियुक्तम् । इति प्रत्यक्षतोऽनुमी-नादुपदेशतश्च परीक्षणमुक्तम् ॥ ७ ॥
( २ ) प्रत्यक्ष के द्वारा परीक्षा प्रत्यक्ष के द्वारा रोग की परीक्षा करने की इच्छा वाले को तो सभी इन्द्रियों से रसज्ञान को छोड़कर रोगी के शरीर में रहने वाले सभी इन्द्रियार्थों की परीक्षा करनी चाहिये । श्रोत्र द्वारा परीक्ष्य विषय और अन्य भी जो इस शरीर में चक्षु द्वारा परीक्ष्य विषय — अवस्था या विकृत अवस्था जो परीक्षा नेत्र से करनी चाहिए । - आँतों का बोलना, संधि और अंगुली पर्वों का फूटना, स्वरभेद ये होने वाले शब्द हों उन सभी की परीक्षा कान से करनी चाहिए । वर्ण, आकार, प्रमाग, छाया, इनकी शरीर में स्वाभाविक भी कोई नेत्र के विषय हों या जो यहाँ नहीं कहा है उन सबकी रसना द्वारा परीक्ष्य विषय ( अनुमान द्वारा परीक्षा ) - रोगी के इन्द्रिय के विषय रस का ज्ञान अनुमान से समझें क्योंकि इसका ज्ञान शरीर में उत्पन्न जिह्वा प्रत्यक्ष रूप से नहीं होता है । इसलिये रोगी से पूछ कर यह जानना चाहिये कि रोगी के मुख का स्वाद कैसा है । जूंर्वे, लीख आदि जन्तु शरीर से अलग हो जाँय तो शरीर का रस विकृत हो गया है । मक्खियों के शरीर पर अधिक बैठने से शरीर का रस मीठा हो गया है । रक्तपित्त के संदेह होने पर तो क्या यह शुद्ध रक्त है या रक्तपित्त का रक्त है, इस पर उसे अन्न में मिलाकर कुत्ता या कौवा को वाने के लिये दे दें । यदि खा जाय तो शुद्ध रक्त, यदि न खाय तो रक्तपित्त ऐसा अनुमान करना चाहिये । इसी प्रकार रोगी के शरीर में अन्य रसों की परीक्षा अनुमान द्वारा की जानी चाहिये । भाग द्वारा परीक्षा - रोगी के सम्पूर्ण शरीर में व्याप्त हुए स्वाभाविक या विकृत गन्धों की परीक्षा नाक से करनी चाहिये । स्पर्श द्वारा परीक्षा - • प्रकृति और विकृति युक्त स्पर्श की परीक्षा हाथ से करनी चाहिये । इस प्रकार अनुमान और आप्तोपदेश के द्वारा परीक्षा कही गई ॥ ७ । इमे तु खल्वन्येऽप्येवमेव भूयोऽनुमानज्ञेया भवन्ति भावाः । तद्यथा - अग्निं जरणश-क्त्या परीक्षेत, बलं व्यायामशक्त्या, श्रोत्रादीनि शब्दाद्यर्थग्रहणेन, मनोऽर्थाव्यभिचरणेन, विज्ञानं व्यवसायेन, रजः सङ्गेन, मोहमविज्ञानेन, क्रोधमभिद्रोहेण, शोकं दैन्येन, हर्षमा-मोन, प्रीतिं तोषेण, भयं विषादेन धैर्यमविषादेन, वीर्यमुत्थानेन, अवस्थानमविभ्रमेण, श्रद्धामभिप्रायेण मेघां ग्रहणेन, सज्ञां नामग्रहणेन, स्मृतिं स्मरणेन, हियमपत्रपणेन, शील-मनुशीलनेन, द्वेषं प्रतिषेधेन, उपधिमनुबन्धेनं, धृतिमलौल्येन वश्यतां विधेयतया, वयो-भक्तिसात्म्यव्याधिसमुत्थानानि कालदेशोपशय वेदनाविशेषेण, गूढलिङ्गं व्याधिसुपशयानु-पशयाभ्यां दोषप्रमाणविशेषमपचारविशेषेण, आयुषः क्षयमरिष्टैः, उपस्थितश्रेयस्त्वं कल्यागाभिनिवेशेन, जमलं सत्त्वमविकारेण, ग्रहण्यास्तु मृदुदारुणत्वं स्वप्नदर्शनमभिप्रायं द्विष्टेष्टसुखदुःखानि चातुरपरिप्रश्नेनैव विद्यादिति ॥ ८ ॥
१. ' अनुमानैकदेशत ' शते पा ० । २. ' खल्वन्यतमा ये ' इति पा ० । ३. ' वीर्यमुत्साहेन ' इति पा ० । ' वीर्यमारब्धदुष्कर कार्येष्वव्यावृत्तिर्मनसः, उत्थानेनेति किया-४. ' अवस्थानं स्थिरमतित्वं ' चक्रः । रम्भेण ' चक्रः । ५. ' उपेत्य धीयत इति उपवि: छद्मेत्यर्थः, अनुबन्धेनेत्युत्तरकालं हि भ्रात्रादिवर्धन फलेन ज्ञायते' चक्रः । ६. ' द्विष्टेष्टेषु सुखासुखानि ' यो ।
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७०८ चरकसंहिता ( ३ ) अनुमान द्वारा परीक्षा और अन्य भाव भी इसी प्रकार अनुमान से जानने योग्य होते है । जैसे - पाचन शक्ति से अग्नि की, व्यायाम करने की शक्ति से बल की, शब्दादि विषयों के समुचित ग्रहण से कर्ण आदि इन्द्रियों की, मन के अर्थ चिन्त्य विचार आदि के ठीक-ठीक ग्रहण से मन की, व्यवसाय से विज्ञान की, आसक्ति से रजोगुण की, और अज्ञान से मोह की, द्रोह करने से क्रोध की, दीनता से शोक की, आमोद - प्रमोद से हर्ष की, सन्तोष से प्रीति की, विषाद से भय की, अविषाद से धीरता की, उत्साह से वीर्य की, भ्रम न होने से मन की स्थिरता की, किसी वस्तु की इच्छा से श्रद्धा की, विषय ग्रहण से मेघा की, नाम ग्रहण से संज्ञा की, स्मरण शक्ति से स्मृति की, लज्जा करने से लज्जा की, लगातार अभ्यास करने से स्वभाव की, मना करने से द्वेष की, परिणाम से कपट की, लालच न करने से धृति की, आज्ञा मानने से वयता की, वय ( अवस्था ), प्रेम, सात्म्य, रोग, रोग के कारण इनकी परीक्षा काल, देश, उपशय, लक्षण और वेदना के द्वारा की जाती है । जिन व्याधियों का लक्षण गुप्त है, उनकी परीक्षा उपशय और अनुपशय से की जाती है, अपचार के अनुसार दोष की मात्रा जानी आती है । अरिष्टों के द्वारा आयुःक्षय की परीक्षा की जाती है । कल्याणकारी मार्ग पर चलने से कल्याण-युक्त होने की, विकार से मन की शुद्धता की परीक्षा की जाती है । ग्रहणी की मृदुता या कठिनता, स्वप्न का देखना, किसी विषय में इच्छा रखना, किसी विषय में द्वेष करना तथा सुख और दुःखों को तो रोगी से प्रश्न कर जानना चाहिए ॥ ८ ॥
भवन्ति चात्र-आप्ततश्चोपदेशेन प्रत्यक्षकरणेन च । अनुमानेन च व्याधीन् सम्यग्विद्याद्विचक्षणः ॥ ९ ॥
सर्वथा सर्वमालोच्य यथासंभवमर्थवित् । अथाध्यवस्येत्तत्त्वे च कार्ये च तदनन्तरम् ॥१० ॥
कार्यतत्त्वविशेषज्ञः प्रतिपत्तौ न मुह्यति । अमूढः फलमाहोति यदमोहनिमित्तजम् ॥ ११ ॥
ज्ञानबुद्धिप्रदीपेन यो नाविशति तवदित् । आतुरस्यान्तरात्मानं न स रोगांश्चिकित्सति ॥ परीक्षा का फल – • विद्वान पुरुष को आप्तोपदेश, प्रत्यक्ष और अनुमान के द्वारा रोगी की ठीक - ठीक परीक्षा करनी चाहिये अर्थ को ठीक समझने वाले विद्वान् वैद्य सबके सभी प्रकार से जितना सम्भव हो सके विचार कर रोग निश्चय करने में और उसके बाद चिकित्सा करने में अपनी बुद्धि निश्चित करें । कार्य के तत्व ( निश्चय ) को जानने वाला पुरुष किसी विषय को निश्चय करने में असफल नहीं होता और वह मोहरहित पुरुष अमोह से उत्पन्न होने वाले फल को नही प्राप्त करता । जो तत्त्व को जानने वाला विद्वान् ज्ञान और बुद्धिरूपी दीपक को लेकर अपने कार्यक्षेत्र में या रोगी की आत्मा में प्रवेश नहीं करता, वह चिकित्सा करने में सफल नहीं होना ॥ ९ -१२ ॥ तत्र श्लोकौ -सर्वरोगविशेषाणां त्रिविधं ज्ञानसंग्रहम् । यथा चोपदिशन्त्याप्ताः प्रत्यक्षं गृह्यते यथा ॥१३ ॥
ये यथा चानुमानेन ज्ञेयास्तांश्चाप्युदारधीः । भावांस्त्रिरोगविज्ञाने विमाने मुनिरुक्तवान् ॥ इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते विमानस्थाने त्रिविधविशेष-विज्ञानीयं विमानं नाम चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥
१. ' योगवित् ' इति पा ० । - * -
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स्रोतोविमानाध्याय: ५ ] विमानस्थानम् ७०६ सभी रोगों के विशेष ज्ञान के लिये तीन प्रकार के ( आप्तोपदेश, प्रत्यक्ष, अनुमान ) ज्ञान का संग्रह, जिस प्रकार आप्तपुरुष उपदेश करते हैं, जैसे- प्रत्यक्ष से ज्ञान होता है, जैसे- अनुमान के द्वारा ज्ञान होना है, ये सभी विषय उदार बुद्धि वाले आत्रेय मुनि ने इस विमानस्थान के त्रिविधरोगविशेषविज्ञानी पाध्याय में कहे हैं ॥ १३-१४ ॥ इस प्रकार चरक के द्वारा प्रतिसंस्कृत अग्निवेशकृततन्त्र ( चरकसंहिता ) के विमानस्थान में त्रिविधरोगविशेषविज्ञानीय नामक चतुर्थ अध्याय समाप्त हुआ ॥ ४ ॥
अथ पञ्चमोऽध्यायः अथातः स्रोतसां विमानं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्माह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
इसके बाद स्त्रोतविमान नामक अध्याय की व्याख्या की जायगी जैसा कि भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥ १-२ ॥ * यावन्तः पुरुषे मूर्तिमन्तो भावविशेषास्तावन्त एवास्मिन् स्रोतसां प्रकारविशेषाः । सर्वे हि भावाः पुरुषे नान्तरेग स्रोतांस्यभिनिर्वर्तन्ते, क्षयं वाऽप्यभिगच्छन्ति । स्रोतांसि खलु परिणाममापद्यमानानां धातूनामभिवाहीनि भवन्त्ययनार्थेन ॥ ३ ॥
स्त्रोतो का प्रकरण पुरुष में जितने नूर्ति वाले भावविशेष ( वस्तु ) हैं | उतने ही इस पुरुष में स्रोनों के प्रकार भेद है । पुरुष में सभी भाव बिना स्रोतो के उत्पन्न नहीं होते या न क्षीण होते हैं क्योंकि स्रोत, परिणाम प्राप्त धातुओं को अन्यत्र ले जाने के लिए वहन करने वाले होने है ॥ ३ ॥
अपि चैके स्रोतसामेत्र समुदयं पुरुषमिच्छन्ति, सर्वगतत्वात् सर्वसरत्वाच्च दोषप्रको-पण प्रशमनानाम् । न खेतदेवं यस्त्रे हि स्रोतांसि यच्च वहन्ति, यञ्चावहन्ति, यत्र चार्वेस्थि-तानि, सर्वं तदन्यत्तेभ्यः ॥। ४ ॥ स्रोतों का समुदाय ही पुरुष हैं क्या? - कई एक विद्वान् सर्वत्र व्याप्त होने के कारण, दोपों के प्रकोपक और शामक आहारों के सर्व शरीर में गमन करने के कारण स्रोतों के समुदाय को ही पुरुष मानते हैं । किन्तु यह ऐसा नहीं है- क्योंकि जिससे यह स्रोत निर्मित है, जिसे ये वहन करते हैं, जिसका आवहन करते हैं और जहाँ ये स्थित हैं यह ( पुरुष ) उन स्रोतों से भिन्न है ॥ अतित्रहुत्वात् खलु केचिदपरिसङ्ख्येयान्याचक्षते स्रोतांसि परिसङ्घयेयानि पुनरन्ये ॥ कुछ आचार्य - खोनों के बहुत अधिक होने से उन्हें असंख्य मानते हैं और दूसरे आचार्य संख्येय ( विनने योग्य ) मानते है ॥ ५ ॥
विमर्श - आचार्य का तात्पर्य है कि जैसे अंगों के समुदाय को ही पुरुष कहा जाता है, अर्थात् शरीर में जितने अङ्ग है उन्हें शरीर से अलग कर दिया जाय तो शरीर किसे कहा जायगा या सूनों के समुदाय को वस्त्र कहते हैं, यदि सभी सूनों को अलग - अलग कर दिया जाय तो वस्त्र किसे कहा जायगा, उसी प्रकार धातुओं को वहन करने वाले जो स्रोत अलग - अलग हैं उनके १. ' स्रोत विमानम् ' इति पा ० । २. ‘ यस्य हि स्रोतांसि यद्घटितानीत्यर्थः । यच्च वहन्तीति यच्च पुष्यन्तीत्यर्थः ॥ ३. ' यथा वहन्ति ' ग. । यच्च रसरक्तादि, आवहन्ति नयन्ति । ४. यत्र चावस्थितानीति यत्र मांसादौ संबद्धानीत्यर्थः ' चक्रः ।
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७१० चरकसंहिता समुदाय को ही पुरुष कहा जाता है, यह पूर्वपक्ष का आशय है, उत्तरपक्ष का आशय यह है-जिस धातु से जो स्रोत बने हैं और उनमें जो वहन होता है वह भिन्न - भिन्न है, जैसे — अन्नवह स्रोतों में खाया हुआ अन्न गमन करता हैं तो वह अन्न और स्रोत दोनों दो वस्तु है । इसी प्रकार रक्त और रक्तवह स्रोत, मांस, मांसवह स्रोत, ये प्रत्यक्ष में भिन्न - भिन्न है, इस प्रकार स्रोतों की रचना, जो उसमें रस - रन्तादि का वहन है, जिन वातुओं को वे पुष्ट करते हैं और जहाँ मांस आदि धातुओं में वे स्रोत वर्तमान है, इनमें विभिन्नता होने से स्रोतों के समुदाय को पुरुष नहीं माना जाता । तेषां तु खलु स्रोतसां यथास्थूलं कतिचित्प्रकारान्मूलतश्च प्रकोपविज्ञानतश्चानुव्या-ख्यास्यामः; ये भविष्यन्त्यलमनुक्तार्थज्ञानाय ज्ञानवतां विज्ञानाय चाज्ञानवताम् । तद्यथा - प्राणोदकान्नर सरुधिरमांसमेदो स्थिमज्जशुक्रमूत्रपुरीषस्वेदवहानीति; वातपित्तश्ले-मणां पुनः सर्वशरीरचराणां सर्वाणि स्त्रोतांस्ययनभूतानि तदतीन्द्रियाणां पुनः सवा-दीनां केवलं चेतनावच्छरीरमयनभूतमधिष्ठानभूतं च । तदेतत् स्रोतसां प्रकृतिभूतत्वान्न विकारैरुपसृज्यते शरीरम् ॥ ६ ॥
स्रोतों के भेद - उन स्रोतों के यथास्थूल ( अर्थात् प्रधान रूप से ) कुछ भेदों की मूल द्वारा और प्रकोपक लक्षणों द्वारा व्याख्या कर रहा हूं, जो ज्ञान - सम्पन्न उत्तम वैद्यों के लिए नहीं कहे गए स्रोनोविषयक ज्ञान के लिए पर्याप्त होगी और अल्पच वैद्य के लिए निर्दिष्ट स्रोतों के ज्ञान के लिए भी पर्याप्त होगी । जैसे - १. प्राणवह, २. उदकवह, ३. अन्नवह, ४. रसत्रह ५. रुधिरव्ह, ६. मांसवह, ७. मेदोवह, ८. अस्थिर, ९ मज्जाह १०. शुक्रवह, ११. मूत्रवह, १२. पुरीपवह, १३. स्वेद्रवह ये स्रोत हैं । सम्पूर्ण शरीर में चलने वाले वात, पित्त, कफ के लिए सभी स्रोत अयनभूत अर्थात् चलने के मार्ग हैं । उसी प्रकार जिनका इन्द्रियों से प्रत्यक्ष नहीं होता ऐसे मन आदि का सम्पूर्ण चेतना से युक्त शरीर मार्ग और आश्रय है । इस प्रकार जब ये स्रोत अपने प्राकृतिक रूप में रहते हैं तो कोई भी रोग शरीर में नहीं होने पाता ॥ ६ ॥
विमर्श - चरक संहिता में कुल १३ स्रोत माने गए है । आगे गर्भ प्रकरण में एक आर्त्तवदह स्रोत भी बताया है । इस तरह १४ माने है । सुश्रुत ने ११ माने है और एक - एक स्रोत के दो - दो भेद कर २२ संख्या दी हैं । तत्र प्राणवहानां स्त्रोतसां हृदयं मूलं महास्रोतश्च प्रदुष्टानां तु खल्वेषामिदं विशेष-विज्ञानं भवति तद्यथा - अतिसृष्टमतिबद्धं कुपितमल्पाल्पमभीक्ष्णं वा सशब्दशूलमुच्छ-सन्तं दृष्ट्वा प्राणवहान्यस्य स्रोतांसि प्रदुष्टानीति विद्यात् ॥ ७ ॥
प्राणवहस्रोतस् की दुष्टि के लक्षण - इनमें प्राणवह स्रोतो का मूल हृदय और महान्त्रोतस् है । इनकेदुष्टहोने पर ये विशेष विज्ञान ( लक्षण ) होते है । जैसे - अधिक निकलना, अधिक बंबा हुआ, कुपिन, थोड़े - थोड़े, बार - बार शब्द और शूल के साथ श्वास लेते हुए मनुष्य को देखकर इस मनुष्य के प्राणवह स्रोत दुष्ट हो गये हैं ऐसा समझें ॥ ७ ॥
उदकवहानां स्रोतसां तालुमूलं क्लोम च, प्रदुष्टानां तु खल्वेषामिदं विशेषविज्ञानं भवतिः तद्यथा - जिह्वातात्वोष्ठकण्ठक्लोमशोषं पिपासां चातिप्रवृद्धां वोदकान्यस्य स्रोतांसि दुष्टनीति विद्यात् । उदकवह खोज की दृष्टि के लक्षण - उदकवह स्रोतों का मूल तालु और लोम है । इनके दुष्ट होने पर चे लक्षण होते है जैसे- जिहा, तालु, ओम, कण्ठ और क्लोम नलिका का सूखना और कोपा हुआ देखकर इस मनुष्य के है ना समझें । स्रोत हो नहीं समझना चाहिए, विमर्श - ' उदकवह स्रोगम् ' से पीये हुए जल को बदन करने वाला है किन्तु शरीर में रहने वाले जल को वहन करने वाला श्रीन्स् समझना चाहिए । यही जल जलोदर रोग
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स्रोतोविमानाध्याय: ५ ] विमानस्थानम् ७११ में औदर्या कला में एकत्र होता है । प्रायः जहां - जहां उदर रोग का प्रसंग है वहां पर जलवह स्रोत की दृष्टि बताई है यथा - ' रुद्ध्वा स्वेदाम्बुवाहीनि दोषाः स्रोतांसि संचिताः । प्राणाग्न्यपानान् संदृष्य जनयन्त्युदरं नृणाम् ॥ ' उदकवह स्रोतों का सम्बन्ध सम्पूर्ण शरीर में स्थित जल के साथ होना है, और तृष्णा का सम्बन्ध भी शरीयत जल के साथ ही है । इसीलिए उदकबाड़ी स्रोतों के दुष्ट होने पर विपासा की वृद्धि होती है । जब इन स्रोतों के दुष्ट होने पर उदर में जल इकट्ठा होता है तो प्यास की वृद्धि अधिक हो जाती है । इन स्रोतों का मूल गला और तालु माना है । इसका तात्पर्य यह है कि जलवह स्रोतों के विकृत होने पर गला और तालु में तृष्णा की अनुभूति होती है । अर्थात् उदकवह स्रोतों का सम्बन्ध जल से जल का सम्बन्ध तृष्णा से, और तृष्णा का सम्बन्ध गला और तालु से होता है, इसी बात को तृष्णा चिकित्मा में चरक ने इस प्रकार कहा है-' पित्तानि प्रवृद्धौ सौम्यान् धातूंव शोपयतः । रसवादिनीव नाडीजिंद्दामू लगलनालुकोम्नः ॥ संशोष्य नृगां देहे कुरुनस्तृष्णां महावलावेतौ । पीतं पीतं हि जलं शोषयतस्तावतो न याति शमम् ॥ ' इससे यह स्पष्ट है कि उदकवह स्रोत के विकृत होने पर तालु और गला में शुष्कता होती है । जब जल से तालु और गला आर्द्र हो जाते हैं तो उदकवह विकृतिजन्य उपद्रव शान्त हो जाते हैं । इसलिए प्राचीन तन्त्रकारों ने तालु को मूल माना है, यद्यपि आधुनिक दृष्टि से नालु और उदकवह स्रोत से कोई साक्षात् सम्बन्ध नहीं है । * अन्नवहानां स्रोतसामामाशयो मूलं वानं च पार्श्व, प्रदुष्टानां तु खल्वेषामिदं विशेष-विज्ञानं भवति; तथा - अनन्नाभिलषणमरोचका विपाकौ छर्दि च दृष्ट्वाऽन्नवहान्यस्य स्रोतांसि प्रदुष्टानीति विद्यात् । अन्नवह स्रोतस् की दुष्टि के लक्षण – अन्नवह स्रोतों का मूल आमाशय और वाम पार्श्व है । इनके दुष्ट होने पर चे विशेष लक्षण होते हैं, जैसे- अन्न खाने की इच्छा न होना, अरुचि, अन्न का ठीक न पचना और वमन का होना, देखकर अन्नवह स्रोत दुष्ट हो गए हैं ऐसा जानना चाहिए । * रसवहानां स्रोतसां हृदयं मूलं दश च धमन्यः । शोणितवहानां स्रोतसां यकृन्मूलं प्लीहा च । मांसवहानां च स्रोतसां स्नायुर्मूलं त्वक्च । मेदोवहानां स्रोतसां वृक्कौ मूलं वपावहनं च । अस्थिवहानां स्रोतसां मेदो मूलं जघनं च । मजवहानां स्रोतसामस्थीनि मूलं सन्धयश्च । शुक्रवहानां स्रोतसां वृषणौ मूलं शेफश्च । प्रदुष्टानां तु खल्वेषां रसादिवह-स्रोतसां विज्ञानान्युक्तानि विविधाशितपीतीये; यान्येव हि धातूनां प्रदोषविज्ञानानि तान्येव यथास्वं प्रदुष्टानां धातुस्रोतसाम् । रसादि सप्त धातुवह स्रोतों की दृष्टि के लक्षग - रसवह स्रोतों का मूल हृदय और दश धर्मनियाँ हैं । रक्तवह स्रोतों का मूल यकृत और प्हा है । मांसवह स्रोतों का मूल स्नायु और त्वचा है | नेदोवह स्रोतों का मूल वृक्क और वसा ( चवीं ) है । अस्थिवह स्रोतों मूल मैदा और जवन नाग है | मज्जावह स्रोतों का मूल अस्थि और सन्धियां है । शुक्रवह स्रोतों का मूल दोनों अण्ड और नूत्रेन्द्रिय है । इन रसादिवह सभी स्रोतों के दुष्ट होने पर जो लक्षण उत्पन्न होते है वे सूत्रस्थान के विविधाशितपीतीय अध्याय २८ मे वर्णित है । जो धातुओं के प्रदुट होने के लक्षण बताये गये है, वे हो उन धातुओं के स्रोतों के विकृत होने पर अपने - अपने लक्षण होते है । ॐ मूत्रवहानां स्रोतसां बस्तिर्मूलं बङ्खजी प्रदुष्टानां तुखत्वेषामिदं विशेषविज्ञानं भवति; तद्यथा - जतिसृष्टमनेित्रद्धं प्रकुपितमल्पाल्पमभीच्णं वा वहलं सशूलं मूत्रयन्तं दृष्ट्वा सूत्रवहान्यस्य सत्तांसि प्रदुष्टानीति विद्यात् ।