चरक संहिता हिन्दी भाष्य — पृष्ठ 801–810
चरक संहिता हिन्दी भाष्य · Chaukhamba · पृष्ठ 801–810
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७१२ मूत्रवहस्रोतस की दुष्टि के लक्षण चरकसंहिता मूत्रवह स्रोतों का मूल वस्ति और वंक्षण है, इन स्रोन के दुष्ट होने पर ये विशेष लक्षण होते है । मूत्र का अधिक होना, रुक - रुक के आना, विकृत मूत्र आना, थोड़ा - थोड़ा बार - बार शूल के साथ गाढ़ा मूत्र निकलते देख मूत्रवह स्रोत दूषित हो गए हैं ऐसा जानना चाहिए । # पुरीषवहानां स्रोतसां पक्वाशयो मूलं स्थूलंगुदं च, प्रदुष्टानां तु खत्वेषामिदं विशेष-विज्ञानं भवति; तद्यथा - कृच्छ्रेणाल्पाल्पं सशब्दशूल मतिद्रवमतिप्रथितमतिबहु चोपवि शन्तं दृष्ट्वा पुरीषवहान्यस्य स्रोतांसि प्रदुष्टानीति विद्यात् । पुरीषवह स्रोत की दुष्टि के लक्षण – • पुरीषवह स्रोतों का मूल पक्वाशय और बड़ी आन्त्र है । इनके दुष्ट होने पर ये विशेष लक्षण होते हैं । जैसे - कठिनता से, थोड़ा - थोड़ा, शब्द एवं शूल के साथ, अत्यन्त पतला, गांठदार, अत्यधिक मल त्याग करते हुए पुरुष को देख कर इस का नवह स्रोत दुष्ट हो गया है ऐसा जानना चाहिए । * स्वेदवहानां स्रोतसां मेदो मूलं लोमकूपाश्च प्रदुष्टानां तु खल्वेषामिदं विशेषविज्ञानं भवति; तद्यथा — अस्वेदनमतिस्वेदनं पारुष्यमतिश्लक्ष्णतामङ्गस्य परिदाहं लोमहर्षं च दृष्ट्वा स्वेदवहान्यस्य स्रोतांसि प्रदुष्टानीति विद्यात् ॥ ८ ॥
स्वहस्रोतस की दुष्टि के लक्षण - स्वेद्रवह स्रोतों का मूल मैदा और रोमकूप हैं, इनके दुष्ट होने के ये विशेष लक्षण होते है! जैसे स्वेद का न आना या अधिक आना, शरीर में अधिक कठिनता, अधिक चिकनापन, त्वचा में दाह और रोमांच, यह देख कर इसके स्वेदवड स्रोत दृट हो गए हैं ऐसा जानना चाहिए ॥ ८ ॥
स्रोतांसि सिराः, धमन्यः, रसायन्यः; रसवाहिन्यः, नाट्यः, पन्थानः, मार्गाः, शरीर-च्छिद्राणि, संवृता संवृतानि, स्थानानि, आशयाः, निकेताश्चेति शरीरधात्ववकानां लच्या-लक्ष्याणां नामानि भवन्ति । तेषां प्रकोपात् स्थानस्थाश्चैव मार्गगाश्च शरीरधातवः प्रकोप-मापद्यन्ते, इतरेषां प्रकोपादितराणि च । स्रोतांसि स्रोतांस्येव, धातवश्च धातूनेव प्रदूष यन्ति । तेषां सर्वेषामेव वातपित्तश्लेप्माणः प्रदुष्टा दूषयितारो भवन्ति, दोषस्वभावा प्रदुष्टाः दिति ॥ ९ ॥
दोनो के पर्याय - • लोत, सिरा, धमनी, रसायनी, नाडी, पंथा, मार्ग, शरीर के छिद्र, शरीर के मूल में बन्द और अन्तिम भाग खुला या उभय भाग खुले हुए, स्थान, आशर, निकेत, यह शरीर की धातुओं के अवकाशों ( शूत्यस्थान ) के दिखाई पड़ने वालों अथवा नहीं दिखाई पड़ने वालों का नाम है । उन स्रोन, सिरा आदि के कुपित होने से अपने स्थान में रहने वाली या नार्ग में चलने वाली शरीर की धातुएँ कुपित हो जाती है और स्रोत और धातुओं के प्रकोप ने दूसरे स्रोत और धातु प्रकुपित हो जाते हैं, अर्थात् एक धातु कुपित होकर अपने स्रोत को दूषित करती हुई अन्य धातु और स्रोत को भी दूषित कर देती हैं | स्रोत दूषित होकर दूसरे स्रोनों को और धातु दूषित होकर दूसरी धातुओं को दूषित करते हैं । इन सभी स्रोत और धातुओं को दृषित करने वाले दुष्ट दात, वित्त, कफ ही होते है क्योंकि दूषित करना इन्हीं का स्वभाव है ॥ भवन्ति चात्र-क्षयात् संधारणाद्वौ च्याद्व्यायामात् चुधितस्य च । प्राणवाहीनि दुप्यन्ति स्रोतांस्यन्यैश्च दारुणैः ॥ १. ' पक्वाशयो नाभेरधः, स्थूलगुदं त्रिवलिरूपं गङ्गाधरः; ' स्थूलान्त्रं गुदं च ' इति पा ० । २. ' सशूलम् ' इति पा ० ।
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स्रोत विमानाव्ययः ५ ] विमानस्थानम् ७१३ प्राणवहस्रोतस की दुष्टि के हेतु I • धातुओं के क्षय से, मल - मूत्र आदि के वेगों को रोकने से, रूक्ष वस्तु के सेवन से, भूख लगने पर व्यायाम करने से और भी अन्य कठोर कार्य जो अपनी शक्ति से बाहर के हों उन्हें करने से प्राणवाही स्रोत दुष्ट हो जाते हैं ॥ १० ॥
औप्यादामाद्भयात् पानादतिशुष्कान्नसेवनात् । अम्बुवाहीनि दुष्यन्ति तृष्णायाश्चातिपीडनात् ॥ रसवहस्रोतस की दुष्टि के हेतु - उष्ण आहार - विहार ने, आम दोष से भय से, मदिरा आदि के पीने से, अधिक सूखे अन्न के सेवन से और प्यास के अधिक रोकने से जलवाही स्रोत दुष्ट होते हैं ॥ ११ ॥
अतिमात्रस्य चाकाले चाहितस्य च भोजनात् । अन्नवाहीनि दुष्यन्ति वैगुण्यात् पावकस्य च ॥ अन्नवह स्रोतस् की दुष्टि के हेतु - अकाल में अधिक भोजन करने से, अहित भोजन करने से, जठराग्नि के विकृत होने से अन्नवह स्रोत दुष्ट होते हैं ॥ १२ ॥
गुरुशीतमतिस्निग्धमतिमात्रं समश्नताम् । रसवाहीनि दुष्यन्ति चिन्त्यानां चातिचिन्तनात् ॥ रसवहस्रोतस की दुष्टि के हेतु - अत्यन्त भारी, अधिक शीत, अनि स्निग्ध, अधिक मात्रा में भोजन करने से और विचार करने योग्य विषयों का अधिक विचार करने से रसवाही स्रोत दुष्ट होते हैं ॥ १३ ॥
विदाहीन्यन्नपानानि स्निग्धोष्णानि द्रवाणि च । रक्तवाहीनि दुष्यन्ति भजतां चातपानलौ ॥ रक्तवह स्रोतस् की दृष्टि के हेतु दाह पैदा करने वाले, स्निग्ध, उष्ण और द्रव भोजन से तथा अधिक धूप एवं ' वायु के सेवन करने से रक्तवाही स्रोत दूषित होते हैं ॥ १४ ॥
अभिष्यन्दीनि भोज्यानि स्थूलानि च गुरूणि च ।
मांसवाहीनि दुष्यन्ति भुक्त्वा च स्वपतां दिवा ॥ १५ ॥
मांसह स्रोत की दृष्टि के हेतु - अभिष्यन्दी, स्थूल, गुरु भोज्य पदार्थों के सेवन से और भोजन करने के बाद तत्काल दिन में शयन करने से मांसवह स्रोत दुष्ट होते हैं ॥ १५ ॥
अव्यायामादिवास्वप्नान्मेद्यानां चातिभक्षणात् । मेदोवाहीनि दुप्यन्ति वारुण्याश्चातिसेवनात् ॥ मैदो स्रोतस की दृष्टि के हेतु - व्यायाम न करने से, दिन में सोने से, चर्बी वाले मांस को अधिक खाने से और अधिक मदिरा पीने से नेदोवह स्रोत दुष्ट होते हैं ॥ १६ ॥
व्यायामादतिसंक्षोभादस्नामतिविघट्टनात् । अस्थिवाहीनि दुष्यन्ति वातलानां च सेवनात् ॥ अस्थिवह स्रोतस् की दृष्टि के हेतु '- व्यायाम से अधिक क्षोभ होने से, हड्डियों में अधिक टक्कर या आघात से और वातल आहार - विहार करने से, अस्थिवह स्रोत दुष्ट होते हैं ॥ १७ ॥
उत्पादत्यभिप्यन्दादभिवातात् प्रपीडनात् । मजवाहीनि दुष्यन्ति विरुद्वानां च सेवनात् ॥ मज्जवहस्रोतस की दृष्टि के हेतु - • कुचल जाने से, कफ के भर जाने से, चोट लग जाने से, द्रव जाने से और विरुद्ध आहार - विहार के सेवन करने से मज्जवादी स्रोत दूषित होते है ॥ १८ ॥
अकालयोनिगमनान्निग्रहादतिमैथुनात् । शुक्रवाहीनि दुष्यन्ति शस्त्रक्षाराग्निभिस्तथा || १ ९ || शुक्रवाही स्रोतस की दृष्टि के हेतु — शुक्र का वेग रोकने स, अकाल मे और अयोनि में मैथुन से अधिक मैथुन से और शुक्रवाही स्रोत पर शस्त्र, क्षार या अग्नि के लग जाने से शुक्रवाही स्रोत दुष्ट होते हैं ॥ १ ९ ॥ " मूत्रितोदकभच्य स्त्रीसेवनान्मूत्रनिग्रहात् । मूत्रवाहीनि दुयन्ति क्षीणस्याभिक्षतस्य च ॥ १. ' मूत्रितस्य मूत्रवेगवत उवकभक्ष्यस्त्रीणां सेवनात् ' गङ्गाधरः ।
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७१४ चरकसंहिता मूत्रवहस्रोतस की दृष्टि के हेतु - मूत्र के वेग को रोक कर जल पीने से, भोजन करने से, मैथुन करने से, वार - बार मूत्र के वेगों को रोकने से शरीर के अधिक क्षीण होने से और मूत्र-ही पर आघात लगने या कट जाने से नूनाही स्रोत दुष्ट होते है ॥ २० ॥
संधारणादत्यशनादजीर्णाध्यशनात्तथा । चर्चेवाहीनि दुष्यन्ति दुर्बलाग्नेः कृशस्य च ॥२१ ॥
मलवहस्रोतस की दृष्टि के हेतु - मल के वेग को रोकने से, अधिक भोजन से, अजीर्ण होने से, भोजन के बाद शीघ्र ही पुनः भोजन करने से, अग्नि के मन्द होने से, शरीर में कृशता आने से मलवह स्रोत दुष्ट होते है ॥ २१ ॥
व्यायामादतिसंतापाच्छीतोष्णाक्रमसेवनात् । स्वेदवाहीनि दुष्यन्ति क्रोधशोकभयैस्तथा ॥ स्वेद्रवह स्रोतस् की दृष्टि के हेतु: - व्यायाम से, अधिक प के सेवन करने से, अनुचित रूप में दीन और गर्म आहार - विहार सेवन करने से, क्रोध, शोक और भय से स्वेदवह स्रोतदुष्ट होते हैं । आहारश्च विहारश्च यः स्यादोषगुणैः समः । धातुभिर्विगुणश्चापि स्रोतसां स प्रदूषकः ॥२३ ॥
त्रोतों की दृष्टि के सामान्यहेतु - जो आहार विहार दोषों के गुणों के समान हों अर्थात् उन्हें बढ़ाने वाले हों और धातुओं के विगुण अर्थात् विरोध करने वाले हों, वे सभी आहार - विहार स्रोतों को दूषित करने वाले होते है ॥ २३ ॥
* अतिप्रवृत्तिः सङ्गो वा सिराणां ग्रन्थयोऽपि वा । विमार्गगमनं चापि स्रोतसां दुष्टिलक्षणम् ॥ दोनों कीदृष्टि के लक्षण — • धातुओं का अधिक निकलना या बिलकुल रुक जाना, तिराओं ग्रन्थि का पड़ जाना या धातुओं का विमार्ग - गमन हो जाना, ये सामान्यतः सभी स्रोतों की दृष्टि के लक्षण हैं ॥ २४ ॥
* स्वधातुसमवर्णानि वृत्तस्थूलान्यणूनि च । स्रोतांसि दीर्घाण्याकृत्या प्रतानसदृशानि च ॥ स्रोतों का स्वरूप - जिम धातु के जो स्रोत होते हैं वे उस धातु के समान वर्ण वाले, गोल, मोटे, सूक्ष्म और आकृति में लम्बे लता के समान होते हैं ॥ २५ ॥
विमर्श - अर्थात् लनायें चारो तरफ फैल कर अपनी शाखा प्रशाखायों से व्याप्त रहती है । उसी प्रकार स्रोत भी अपनी शाखा एवं प्रशाखाओं से सारे शरीर में व्याप्त है । * प्राणोदकान्नवाहानां दुष्टानां श्वासिकी क्रिया । कार्या तृष्णोपशमनी तथैवामप्रदोषिकी ॥ चिकित्सासूत्र - प्राणवहस्रोत में दुष्टि होने से रोग उत्पन्न होने पर श्वास रोग में बताई गई चिकित्सा, उदकवह स्रोत में विकार होने पर तृष्णा रोग नाशक चिकित्सा और अन्नवह स्रोत मैं विकृति होने पर आमदोष नाशक ( अर्थात् दीपन पाचन - ) चिकित्सा की जाती है ॥ २६ । विविधाशितपीतीये रसादीनां यदौषधम् । रसादिस्रोतसां कुर्यात्तद्यथास्वमुपक्रमम् || २७ || रस आदि स्रोतों की चिकित्सा - • विविधाशीतपीताय नामक २८ वें अध्याय में जो औषध है वह रस आदि स्रोतों की विकृति में अपने - अपने लक्षणों के अनुसार करनी चाहिए ॥ २७ ॥
मूत्रविस्वेदवाहानां चिकित्सा मौत्रकृच्छ्रिकी । तथाऽतिसारिकी कार्या तथाज्वरचिकित्सकी ॥ निवह स्रोत को चिकित्सा वहीं की जाती है, जो चिकित्सा मूत्रकृच्छ्र में विहित है । मनवह स्रोत के दूषित होने पर अतिसार की चिकित्मा और स्वेदवह स्रोत के दूषित होने पर स्वर की किन्या की जाती है ॥ २८ ॥
नत्र श्लोका त्रयं दशानां मूलानि स्रोतसां दुष्टिलक्षणम् । सामान्यं नामपर्यायाः कोपनानि परस्परम् || देः पहेतुः पृथक्त्वेन भेषजोद्देश एव च । स्रोतोविमाने निर्दिष्टस्तथा चादौ विनिश्रयः ॥ ३० ॥
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रोगानीकविमानाध्याय: ६ ] विमानस्थानम् ७१५
केवलं विदितं यस्य शरीरं सर्वभावतः । शारीराः सर्वरोगाश्च स कर्मसु न मुह्यति ॥३१ ॥
इत्यनिवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते विमानस्थाने स्रोतोविमानं नाम पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥
- ake आध्याय उपसंहार - तेरह प्रकार के स्रोतों का मूलस्थान, उनके दूषित होने का स्वरूप, सामान्य रूप से उन स्रोतों के नाम पर्याय, परस्पर में कुपित होने के कारण, अलग - अलग दृषित होने के कारण, संक्षेप में इन दुष्ट स्रोतों की चिकित्सा के सूत्र, अध्याय के प्रारम्भ में पुष है, इस सिद्धान्त का निश्चय आदि बातें स्रोतोविमान अध्याय में कही गई है । जिसको सभी प्रकार से सम्पूर्ण शरीर का ज्ञान होता है, वह व्यक्ति सभी प्रकार के शारीरिक रोगों की चिकित्सा में मोह नहीं प्राप्त करता ॥ २ ९ -३१ ॥ विमर्श - आजकल स्रोतों को Capillaries माना जा रहा है । परन्तु स्रोत विमान अध्याय के विभिन्न स्रोतों के दुष्टिहेतु, लक्षण, चिकित्सा इत्यादि के प्रसंग को देखते हुये इस निष्कर्ष पर पहुँचने की तरफ अधिक इच्छा होती है कि यह वर्णन आधुनिकों के System's ( Respiratory, Alimentary ete ) के समान ही प्रतीत होता है । परन्तु इस पक्ष को आयुर्वेदीय दृष्टया रोगी की परीक्षा में जितना स्थान पाना चाहिये उतना अभी तक भी प्राप्त नहीं हो सका है । इस दिशा में प्रयास आवश्यक है । इस प्रकार चरक के द्वारा प्रतिसंस्कृत अग्निवेशकृततन्त्र ( चरकसंहिता ) के विमानस्थान में स्रोतविमान नामक पाँचवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ ५ ॥
अथ षष्ठोऽध्यायः अथातो रोगानीकं विमानं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्माह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
अब इसके बाद रोगानीक विमान नामक अध्याय की व्याख्या की जायगी । जैसा कि भगवान्
आत्रेय ने कहा था ॥। १-२ ॥
द्वे रोगानीके भवतः प्रभावभेदेन - साध्यम्, असाध्यं च द्वे रोगानीके बलभेदन - मृदु, दारुगं च द्वे रोगानीके अधिष्ठानभेदेन - मनोऽधिष्ठानं, शरीराधिष्ठानं च द्वे रोगानीके निमित्तभेदेन - स्वधातुवैषम्यनिमित्तम, आगन्तुनिमित्तं च द्वे रोगानीके आशयभेदेन - आमा-शयसमुत्थं, पक्वाशयसमुत्थं चेति । एवमेतत् प्रभाव बलाधिष्ठाननिमित्ताशयभेदाद्वैधं सद्भेदे प्रकृत्यन्तरेण भिद्यमानमथवाऽपि सन्धीयमानं स्यादेकत्वं बहुत्वं वा । एकत्वं तावदेक-मे रोगानीकं दुःसामान्यात्; बहुत्वं तु दश रोगानीकानि प्रभावभेदादिना भवन्ति; बहुत्वमपि संख्येयं स्यादसंख्येयं वा । तत्र संख्येयं तावद्यथोक्तमष्टोदरीये, अपरिसंख्येयं पुनर्यथा - महारोगाध्याये सवर्णसमुत्थानादीनामसंवेद्यत्वात् ॥ ३ ॥
१. ' नेदप्रकृत्यन्तरेति मेदकारणान्तरेण ' चक्रः । २. ' एक्सामान्यात् ' ग.!
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७१६ चरकसंहिता ( १ ) रोगभेद - प्रकरण ( Classification of Diseases ) रोग समुदाय के भेद - १. प्रभाव भेद से रोगों के दो समूह होते हैं- साध्य और असाध्य | २. बल भेद से रोगों के दो समूह होते हैं, मृदु और दारुण, ३. आश्रयभेद से दो रोग - समूह होते हैं, मन के आश्रित ( मानस रोग - राजस, तामस ) और शरीर के आश्रित ( दोषज रोग ) ४. निमित्तभेद से दो रोग समूह होते हैं, अपनी धातुओं की विषमता से ( निज ), और आगन्तुक कारण से, ५. आशयभेद से दो रोग समूह होते हैं, आमाशय से उत्पन्न होने वाले और पक्वाशय से उत्पन्न होने वाले रोग । इस प्रकार ये रोग समूह प्रभाव, बल, अधिष्ठान ( आश्रय ), निमित्त ( कारण ) और आशय भेद से दो - दो प्रकार के होते हुए, भेद करने के दूसरे - दूसरे कारणों से रोगों के भेद करने पर अथवा सभी कारणों का एकीकरण करने पर उनका एकत्व या बहुत्व होता है | दुःख सामान्य से तो रोग एक ही होता है यह एकत्व है । प्रभावभेद आदि भेद से रोगसमूह दस होते हैं, यह बहुत्व हैं । बहुत्व भी संख्येव ( गिनने योग्य ) अथवा असंख्येय ( न गिननेयोग्य ) होता है । इनमें संख्येय रोगों ( जिनकी संख्या नियन है ) का वर्णन अष्टोदरीय ( सूत्र स्थान के १ ९ वें अध्याय ) में किया गया है । अपरिसंख्येय ( जिनकी संख्या गिनी नहीं जा सकती ) रोगों का वर्णन महारोगाध्याय ( सूत्र स्थान के २० वें अध्याय ) में किया गया है । क्योंकि रुजा ( वेदना ) वर्ण, ( लक्षण ), समुत्थान ( कारण ) आदि के अपरिसंस्थेय होने के कारण रोग भी अपरिसंख्येय होते हैं ॥ ३ ॥
ने च संख्येयाग्रेषु भेदप्रकृत्यन्तरीयेषु विगीतिरित्यतो दोषवती स्यादत्र काचित् प्रतिज्ञा, न चाविगीतिरित्यतः स्याददोषवती । भेत्ता हि भेद्यमन्यथा भिनत्ति, अन्यथा पुरस्ताद्भिन्नं भेदप्रकृत्यन्तरेण भिन्दन् भेदसंख्याविशेषमापादयत्यनेकधा, न च पूर्वं भेदाग्र-सुपहन्ति । समानायामपि खलु भेदप्रकृतौ प्रकृतीनुप्रयोगान्तरमपेक्ष्यम् । सन्ति ह्यर्थान्त-राणि समानशब्दाभिहितानि सन्ति चानर्थान्तराणि पर्यायशब्दाभिहितानि । समानो हि रोगशब्दो दोषेषु च व्याधिषु च दोषा ह्यपि रोगशब्द मातङ्कशब्दं यक्ष्मशब्दं दोष-प्रकृतिशब्दं विकारशब्दं च लभन्ते, व्याधयश्व रोगशब्दमातङ्कशब्दं यमशब्द दोप-१. ' ननु, संख्येयत्वमसंख्येयत्वं च विरुद्धावेतौ धर्मों, कत्वमनेकत्वं चेति, तत् कथं विरुद्धत्वेन ख्यानौ धर्मावेकस्मिन् रोग घटेनामित्यत आह - न चेत्यादि । संख्येयाग्रेध्विति संख्येयरोगपरिमाणेषु अत्राग्रशब्दः परिमाणे वर्ततेः भेदप्रकृत्यन्तरीयेषु भेदकारणान्तरभवेषु, विगीतिः विरुद्धभाषणमित्यर्थः । विगतौ दोपाभावं दर्शयित्वा दकारणान्तरकृतायामविगीतावपि दोपो भवतीति दर्शयन्नाह -न चाविगीतिरित्यादि । यदि ह्येकं रोगानीकं रुजासामान्यादित्यभिधाय पुनरेक रोगानीकं प्रभावमे-ढादित्यविरुद्धा एकताख्यायिकाऽविगीतिः क्रियते तथाऽपि सा विरुद्वैव स्यात् यतो न प्रभावभेदेन रोगाणामेकत्वमुपपन्नं किंतु धमेवेति भावः । विगीतौ दोपाभावे हेतुमाह मेत्ता हीत्यादि । एवं मन्यते -- यद्धर्मयोगविवक्षयेकत्वमुक्तं नर्मयोगविवक्षयैव यदि बहुत्वमप्युच्यते ततो विरोधो भवति, नहि तदेवैकं चानेकं चेन्युपपन्नं यदा तु धर्मान्तरयविवक्षया बहुत्वमुच्यते तदा न विरोधः, दुत्वाभिधानका बहूनानेत्र रोगधर्माणां विवक्षितात् रोगाणामेकत्वमेकधनविपयं, बहुत्वं च बहुधर्मविषयमिति न विरोधः ' इति चक्रः । २. ‘ प्रकृतस्य समानशब्देनाभिहितस्य यद्भेदस्यापकं पथात्प्रयोगान्तरं तदपेक्षणीयं चक्रः । ' प्रकृत्यनुप्रयोगान्तरं ' ग. ।
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रोगानीकविमानाव्याय: ६ विमानस्थानम् ७१७ प्रकृतिशब्दं विकारशब्दं च लभन्ते । तत्र दोषेषु चैव व्याधिषु च रोगशब्दः समानः, शेषेषु तु विशेषवान् ॥ ४ ॥
विभिन्न वर्गीकरण [ Classification ) के आवार - नानाभेदक कारणों से उत्पन्न, संख्या करने योग्य परिगणित रोगों को असंख्य कहना, विरुद्ध कथन है । इतने से ही पहले कही संख्या दोषयुक्त नहीं होती क्योंकि यह कथन विरुद्ध नहीं है । इसलिए पहले कही हुई संख्या में कोई दोष भी नहीं आता । क्योंकि रोगों के इन भेदों को करने वाला पुरुष, भेद करने योग्य रोगों का भेद भिन्न - भिन्न दृष्टि या कारणों या प्रकारों से करता है । विद्वान् पुरुष किसी अन्य प्रकार से पहले भेद किए हुए रोग को भेद के भिन्न ( अन्य ) कारण के अनुसार रोग का भेद करके यदि भेदों की विशेष संख्या का प्रतिपादन करता है और उन भेदों को भी वह अनेक प्रकार से कहा है तो वह पहले किए गए भेदों का खण्डन नहीं करता । और यदि भेद के कारण समान संख्या के हैं, तो भी कारणविशेष के अनुसार भेद होगा । ऐसा भी देखा जाता है कि एक समान एक ही शब्द से अनेक अर्थ निकलते हैं और ऐसा भी देखा जाता है कि अनेक पर्याय शब्दों से एक ही अर्थ कहा जाता है । दोषों और व्याधियों में रोग शब्द समान रूप से प्रयुक्त होता है और दोष शब्द भी रोग, आनङ्क, यक्ष्म, दोषप्रकृति और विकार शब्दों ( नामों ) को प्राप्त करता है । व्याचियाँ भी रोग, आतङ्क, यक्ष्न, दोपप्रकृति और विकार शब्दों ( नामों ) को प्राप्त करती है । इस प्रकार दोनों और व्याधियों में रोग शब्द समान है और दूसरे अर्थों में भिन्न भी होता है ॥ ४ । विमर्श - जार के उद्धरणों में यह स्पष्ट किया गया है कि अनगिन और गणनायुक्त रोग कहना विरुद्ध वचन नहीं है क्योंकि जिन कारणों से रोगों की संख्या नियत की गई है उन्हों कारणों से संख्या अगणित नहीं कही गयी है । यहाँ पर भी प्रभाव, बल, अधिष्ठान, निमित्त और आशय भेद से दो - दो रोग माने है जो सब मिलकर १० भेद होते है । लेकिन सभी एकत्र नहीं किये जा सकने क्योंकि जो व्याधि प्रभाव - भेद से साध्य और असाध्य होगी वहीं व्याधि बरु भेद से मृदु और दारुण भी हो सकती है या अधिष्ठान भेद से शारीरिक एवं मानसिक भी हो सकती हैं अतः ऊपर बनाए हुए पाँच कारणों को लेकर १० कहना संगत नहीं है, जैसे- किसी व्यक्ति से पूछा जाय कि रोग कितने प्रकार के होते हैं तो उत्तर देगा शारीरिक एवं मानसिक ये दो, दूसरा व्यक्ति निज और आगन्तुक, तीसरा व्यक्ति दोषज, कर्मज, दोपकर्मज ये तीन, चौथा व्यक्ति शारीरिक, मानसिक, आगन्तुक और स्वाभाविक ये चार होते है - तो इन चारों के वचनों में विरुद्ध बचन की आशंका नहीं होती क्योकि कहने वाला व्यक्ति स्वतंत्र होता है, वह चाहे जिस भेद करने वाले प्रकृति से भिन्न कर सकता है जिन कारणों से रोग दो कहते है । उन्हीं कारणों से यदि एक कहा जाय अथवा जिन कारणों से तीन कहते हैं उन्हीं कारणों से दो कहा जाय तो विरुद्ध वचन हो सकता है । यहाँ भिन्न - भिन्न कारणों से दो माने गये है अतः विरुद्ध वचन नहीं है । * तत्र व्याधयोऽपरिसंख्येया भवन्ति, अतिबहुत्वात्; दोषास्तु खलु परिसंख्येया भवन्ति, अनतिबहुत्वात् । तस्माद्यथाचित्रं विकारानुदाहरणार्थम्, अनवशेषेण च दोषान् व्याख्या-स्यामः । रजस्तमश्च मानसौ दोषौ । तयोर्विकाराः कामक्रोधलोभमोहेयमानमदशोकचित्तो ( तो ) भयहर्षादयः । वातपित्तश्लेप्माणस्तु खलु शारीरा दोषाः । तेषामपि च विकारा
ज्वरातीसारशोफशोषश्वास मेहकुष्टादयः । इति दोषाः केवला व्याख्याता विकारैकदेशश्च ॥
१. ' तस्माद्यथोचितं ' ग. ।
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७१८ चरकसंहिता ( २ ) दोष - विमर्श मानस और शारीर दोष - उनमें बहुत अधिक होने से व्याधियाँ अगणित होती हैं और बहुत अधिक न होने से दोष संख्यायुक्त है इसलिए यथाचित्र अर्थात् जैसा आचार्यों ने कहा है तदनुसार रोगों की और सम्पूर्ण रूप से दोषों की उदाहरण के लिए व्याख्या की जाती है । रज और तम मानस दोष हैं इनके रोग काम, क्रोध, लोभ, मोह, ईर्ष्या, मान, मद, शोक, चिन्ता, उद्वेग, भय और हर्ष आदि होते हैं । बा पित्त - कफ ये शारीरिक दोष हैं इनके भी रोग ज्वर, अतिसार, शोथ, शोष, श्वास, प्रमेह, कुष्ठ आदि होते हैं । इस प्रकार सम्पूर्ण रूप से यहाँ दोष की व्याख्या की गई है और रोग समूह के एक देश की व्याख्या की गई हैं ॥ ५ ॥
* तत्र खल्वेषां द्वयानामपि दोषाणां त्रिविधं प्रकोपणं; तद्यथा - असात्म्येन्द्रियार्थ -संयोगः, प्रज्ञापराधः परिणामश्चेति ॥ ६ ॥
और भी - उसमें इन शारीरिक एवं मानसिक दोनों दोषों के कुपित होने का कारण तीन माने गये हैं जैसे -- असात्म्येन्द्रियार्थसंयोग, प्रज्ञापराध और परिणाम ॥ ६ ॥
प्रकुपितास्तु खलु ते प्रकोपणविशेषाद् दूष्यविशेषाच्च विकारविशेषानभिनिर्वर्तय-न्त्यपरिसंख्येयान् ॥ ७ ॥
दोषत्रय से सभी रोग - जब दोष संख्येय है तो इनसे रोग असंख्येय कैसे होते हैं इस शंका का समाधान इस गद्य से किया गया है - प्रकुपित दोष, प्रकोपक कारणों के भेद से और दृष्यों ( रस, रक्त, मांस आदि ) की विभिन्नता से असंख्येय रोगों के भेदों को उत्पन्न करते हैं || ७ || * ते च विकाराः परस्परमनुवर्तमानाः कदाचिदनुवघ्नन्ति कामादयो ज्वरादयश्च ॥ ८ ॥
और भी - ये जरादि शारीरिक एवं कामादि मानसिक रोग परस्पर अनुवर्तन करने हुए कभी - कभी सम्बन्ध करते हैं, अर्थात् साथ में मिल जाते हैं ॥ ८ ॥
नियतस्त्वनुबन्धो रजस्तमसोः परस्परं, न ह्यरजस्कं तमः प्रवर्तते ॥ ९ ॥
और भी - पर रजोगुण और तमोगुण का परस्पर सम्बन्ध निश्चित होता है- क्योंकि रजो-गुण के बिना तमोगुण प्रवृत्त नहीं होता ॥ ९ ॥
( प्रायः ) शारीरदोषाणामेकाधिष्टानीयानां सन्निपातः संसर्गे वा समानगुणत्वात्; दोषा हि दूषणैः समानाः ॥ १० ॥
और भी - प्रायः एक ही स्थान में रहने वाले शरीर के दोष ( वात, पित्त, कफ ) तुल्य गुग होने के कारण उनका सन्निपान या संसर्ग होता है । क्योंकि दोष दूषित करने वाले कारणों के समान गुण वाले होते है ॥ १० ॥
* तत्रानुबन्ध्यानुबन्धकृतो विशेषः - स्वतन्त्रो व्यक्तलिङ्गो यथोक्तसमुत्थानप्रशमो भव-त्यनुवन्ध्यः, तद्विपरीतलक्षणस्त्वनुबन्धः । अनुबन्ध्यलक्षणसमन्वितास्तत्र यदि दोषा भवन्ति तत्रिकं सन्निपातमाचक्षते, द्वयं वा संसर्गम् । अनुबन्ध्यानुबन्धविशेषकृतस्तु बहुविधो दोष-दः । एवमेष संज्ञाप्रकृतो भिषजां दोपेषु व्याधिषु च नानाप्रकृतिविशेपव्यूहः ॥ ११ ॥
दोषों के अनुबन्ध्य और अनुबन्ध मंद - उन सन्निपात एवं संसर्गजन्य रोगों में अनुवन्ध्य एवं अनुवन्ध यह दो विशेषतायें रहती हैं । स्वतंत्र, स्पष्ट लक्षग वाले उन दोषों एवं रोगों के उत्पन्न होने के जितने कारण शास्त्रों में बताए गये हैं उन्हीं कारणों से उत्पन्न होने वाला और उन दोषों या रोगों की शान्ति करने का जो उपाय बताया गया है उसीसे शान्त होने वाला अनुबन्ध्य होता १. ' अनुबन्ध्यानुबन्धलक्षणसमन्विताः ' इति पा ० । २. ‘ ० विशेषाद्व्य’ग. ।
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रोगानीकविमानाध्यायः ६ ] विमानस्थानम् ७१६ है, इससे विपरीत लक्षण वाला अनुबन्ध होता है । इनमें यदि दोष अनुवन्ध्य लक्षणयुक्त हो तो उस दोषत्रय के सम्मेलन को सन्निपात अथवा दो दोषों के सम्मेलन को संसर्ग कहा जाता है । अनुबन्ध्य और अनुबन्ध के भेद से दोषों के भेद बहुत प्रकार के होते हैं । इस प्रकार दोष और रोग में ये अनेक कारण, दोषों के भेद से उत्पन्न रोग और दोषों का समूह वैद्यों की संज्ञा द्वारा
किया गया है ॥। ११ ॥
विमर्श - - अनुबन्ध्य को प्रधान, अनुबन्ध को अप्रधान कहा जाता है, इसमें चिकित्सा प्रधान की होती है क्योंकि प्रधान की चिकित्सा से अप्रधान स्वयं शान्त हो जाता है । इसका सुन्दर विवे चन चक्रपाणि ने इस प्रकार किया है - शरद ऋतु में जल के अम्ल विपाक होने से वह पित्त का कोपक प्रधान रूप से होता है पर अप्रधान रूप से अम्ल विपाक कफ का भी कोपक होता है । प्रधान रूप से पित्त के कुपित होने का कारण यह है कि उस समय सूर्य - सन्ताप तीव्र होता है अतः अम्लविपाक और बाह्य सूर्य सन्ताप ये दोनों पित्त के समान गुण होने से प्रबल रूप से पित्त को कुपित करते हैं, अतः प्रधान होता है और अम्लविपाक के अन्तःकारण होने पर भी बाह्य कारण सूर्य - सन्ताप करु के विपरीत होता है अतः कुछ अंश में कफ भी कुपित होता है तो इसे अप्रधान माना जाता है । इसमें प्रवाननः पित्त की चिकन्सा तिक्त घृत से की जाती है । इससे अप्रधान कफ स्वयं शान्त हो जाता है । अग्निषु तु शारीरेषु चतुर्विधो विशेषो वलभेदेन भवति । तद्यथा - तीदगो, मन्दः, समो, विश्मश्चेति । तत्र तीक्ष्णोऽग्निः सर्वापचार सहः, तद्विपरीतलक्षणस्तु मन्दः, समस्तु वचारतो विकृतिमापद्यतेऽनपचारतस्तु प्रकृताववतिष्ठते, समरक्षणविपरीत लक्षमस्तु विप इति । एते चतुर्विधा भवन्त्यनयश्चतुर्विधानामेव पुरुषाणाम् । तत्र समवातपित्त-लेप्मणां प्रकृतिस्थानां समा भवन्त्यग्नयः, वातलानां तु वाताभिभूतेऽन्यधिष्ठाने विषमा भवन्त्यग्नयः पित्तलानां तु पित्ताभिभूते ह्यग्न्यधिष्टाने तीक्ष्णा भवन्त्यग्नयः श्ले मलानां श्लेष्माभिभूतेऽग्न्यधिष्ठाने मन्दा भवन्त्यग्नयः ॥ १२ ॥
( ३ ) अग्नि तथा प्रकृति - प्रकरण चतुर्विध अग्नि - शरीर में अग्नि तो बल भेद से चार प्रकार की होती है । जैसे-१. तीक्ष्ण, २. मन्द, ३. सम, ४. विषम । इनमें दीक्ष्ण अनि सभी प्रकार के अपचारयुक्त भोजन जैसे मात्रागुरु, द्रव्यगुरु, विरुद्ध, विषम आदि को शीघ्र ही पचा देती है । इनसे विपरीत लक्षण वाली अनि मन्द होती है । सम अनि अपचार अर्थात् मिथ्याहार - विहार से विकृत हो जाती है । उचित रूप में आहार - विहार करने से अपनी प्रकृति में रहती है । सन के लक्षण से विपरीत लक्षण बाली अनि को विषम कहते हैं । इस प्रकार ये चार तरह की अनियाँ चा प्रकार के पुरुषों में होती हैं । इनमें जिन पुरुषों में वात, पित्त, कफ प्रकृतिस्थ होकर सम नात्रा में रहते हैं उनकी अग्नि सम होती है । जो व्यक्ति वातप्रधान होते है उनकी अनिका स्थान वायु से अभिभूत रहना है इसलिए उनको अन्नि विषम हो जाती है । वित्तप्रधान पुरुषों के शरीर में अग्नि का स्थान पित्त से आक्रान्त होने के कारण उनकी अग्नि तीक्ष्ण होती है, कफप्रधानपुरुषों में अग्नि का स्थान कफ से आक्रान्त होता है अतः उनको अनि मन्द होती है ॥ १२ ॥
तत्र केचिदाहुः - न समवातपित्तश्ले - माणो जन्तवः सन्ति, विषमाहारोपयोगित्वान्म-नुष्याणां; तस्माच्च वातप्रकृतयः केचित् केचित् पित्तप्रकृतयः केचित् पुनः श्लेष्मप्रकृतयः
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७२० चरकसंहिता भवन्तीति । तच्चानुपपन्नं, कस्मात् कारणात्? समवातपित्तश्लेप्माणं ह्यरोगमिच्छन्ति भिषजः, यतः प्रकृतिश्चारोग्यम्, आरोग्यार्था च भेषजप्रवृत्तिः, सा चेष्टरूपा, तस्मात् सन्ति समवातपित्तश्लेष्माणः; न खलु सन्ति वातप्रकृतयः पित्तप्रकृतयः श्लेष्मप्रकृतो वा । तम्य तस्य किल दोषस्याधिक्यात् सा सा दोषप्रकृतिरुच्यते मनुष्याणां न च विकृतेषु दोषेषु प्रकृतिस्थत्वमुपपद्यते, तस्मान्नैताः प्रकृतयः सन्तिः सन्ति तु खलु वातलाः पित्तलाः श्लेष्मलाश्च, अप्रकृतिस्थास्तु ते ज्ञेयाः ॥ १३ ॥
प्रकृति विचार – यहाँ पर कुछ आचार्य लोगों का कहना है कि कोई भी प्राणी सम वान, पित्त, कफ वाले नहीं होते क्योंकि मनुष्यों का आहार - विहार भिन्न - भिन्न रूप में होता है इसलिए कुछ लोग वात प्रकृति के कुछ पित्त प्रकृति के और कुछ कफ प्रकृति के होते हैं । यह उचित नहीं है । इसका करण यह है कि वात, पित्त और कफ के सम रहने पर जिसकी प्रकृति बनती है उस पुरुष को वैद्य लोग रोग रहित मानते हैं । क्योंकि प्रकृति को आरोग्य कहते हैं । आरोग्य होने के लिए औषधि का प्रयोग किया जाता है और यही इष्ट है । इसलिए समवात - पित्त - इलेष्मा वाले मनुष्य होते हैं । कोई भी व्यक्ति वातप्रकृति, पित्तप्रकृति अथवा कफप्रकृति का नहीं होता । उन - उन दोषों की अधिकता के कारण मनुष्यों की वह दोष प्रकृति कही जाती है । दोषों के विकृत रहने पर प्रकृतिस्थत्व नहीं बन सकता है इसलिए सिद्धान्त में इनको प्रकृति नहीं माना जाता । किन्तु वातल, पित्तल, इलेष्मल मनुष्य होते हैं । उनको तो अप्रकृतिस्थ जानना चाहिए ॥ १३ ॥
तेषां तु खलु चतुर्विधानां पुरुषाणां चत्वार्यनुप्रणिधानानि श्रेयस्कराणि भवन्ति । तत्र समसर्वधातूनां सर्वाकारसमम्, अधिकदोषाणां तु त्रयाणां यथास्वं दोषाधिक्यमभिस-मी दोषैप्रतिकूलयोगीनि त्रीण्यनु ( न्न ) प्रणिधानानि श्रेयस्कराणि भवन्ति यावदग्नेः सभी-भावात्, समे तु सममेव कार्यमः एवं चेष्टा भेषजप्रयोगाश्चापरे । तान् विस्तरेणानुव्याख्या-स्यामः ॥ १४ ॥
और भी — उन समदोषप्रकृति, वातप्रकृति, पित्तप्रकृति, और कफप्रकृति बाले चार प्रकार के पुरुषों के लिए चार अनुप्रणिधान ( कर्तव्यपालन ) कल्याणकारक होते है । उन कर्तव्य पालनों में जिम पुरुष की सभी धातु ( वात, पित्त, कफ ) सम हैं उन्हें सभी आहार - विहार आदि अपने कर्तव्यों को समरूप में सेवन करना चाहिए । क्योंकि सभी वातादि दोष सम हैं ऐसी दशा में यदि किसी एक रस, गुण, वीर्य विपाक, आदि का सेवन किया जाय तो रस, गुण आदि अपने समान दोप यो कुपित कर स्वास्थ्य नष्ट कर देंगे और सम रस, गुण, वीर्य आदि का सेवन अधिक दोष वाले तीनों को तो अपने - अपने लक्षणों के अनुसार दोष की अधिकता को देखकर जब तक अग्नि की ममता न हो जाय तब तक दोष से विपरीत गुण वाले तीन प्रयोग कल्याणकारक होते हैं । अग्नि के सम होने पर समान प्रयोग करना चाहिए । इसी प्रकार दूसरे शारीरिक चेष्टा और औषध आदि का प्रयोग भी इन प्रकृतियों को ध्यान में रख कर करना चाहिए । इनकी विस्तार से व्याख्या करेंगे ॥ १४ ॥
ॐ त्रयस्तु पुरुषा भवन्त्यातुराः, ते त्वनातुरास्तन्त्रान्तरीयाणां भिषजाम् । तद्यथा-१. ' समवातपित्तश्लेष्मप्रकृतयः ' ग. । २. ‘ अनु उत्तरकालं प्रकर्षेण प्रकृतिरूपेण निधीयन्ते वाताद्याधिक्यसामान्यानि यैस्तान्यनुप्रणि-धानानि ' गङ्गाधरः । ' अन्नप्रणिधानानि ' इति पा ० । ३. ' दोषप्रकृतिप्रतिकूलयोगीनि ' यो । ४. ' तानि ' ग. ।
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रोगानीकविमानाव्याय: ६ ] विमानस्थानम् ७२१ वातलः, पित्तलः, श्ले - मलश्चेति । तेषामिदं विशेषविज्ञानं - वातलस्य वातनिमित्ताः, पित्त-लस्य पित्तनिमित्ताः, श्लेय्मलस्य श्लेप्मनिमित्ता व्याधयः प्रायेण बलवन्तश्च भवन्ति ॥ एकदोषज प्रकृति वाले रोगी है । - तीन पुरुष तो सदा ही रोगी होते है दूसरे तन्त्र को मानने वाले वैद्य - समुदाय वातल ( वातप्रधान ), पित्तल ( पित्तप्रधान ), इलेष्मल ( कफप्रधान ) प्रकृति वाले को अनातुर ( रोगरहित - स्वस्थ ) मानते हैं । उन्हें आतुर समझने के लिए ये विशेष लक्षण हैं जैसे बातल पुरुषों को वातजन्य रोग, पित्तल मनुष्यों को पित्तजन्य रोग, कफ प्रकृति वालों को कफजन्य रोग प्रायः वलवान् होते हैं ॥ १५ ॥
वातलस्य वार्तप्रकोपणान्यासेवमानस्य क्षिप्रं वातः प्रकोपमापद्यते, न तथेतरौ दोषौ; स तस्य प्रकोपमापन्नो यथोक्तर्विकारैः शरीरमुपतपति बलवर्णसुखायुपामुपघाताय । तस्यावजयनं -- स्नेहस्वेदौ विधियुक्तौ, मृदूनि च संशोधनानि स्नेहोष्णमधुराम्ललवण-युक्तानि तद्वदभ्यवहार्याणि, अभ्यङ्गोपनाहनोद्वेष्टनोन्मर्दन परिषेकावगाहनसंवाहनावपी-नवित्रासनविस्मापनविस्मारणानि, सुरासवविधानं, स्नेहाश्चानेकयोनयो दीपनीयपाच-नीयवात हरविरेचनीयोपहितास्तथा शतपाकाः सहस्रपाकाः सर्वशश्च प्रयोगार्थाः, बस्तयः, वस्तिनियमः सुखशीलता चेति ॥ १६ ॥
वातप्रधान पुरुष के रोग और चिकित्सा --- जब वान को कुपित करने वाले हेतुओं का सेवन वह करता है तो शीघ्र ही वात कुपित हो जाता है । जितने शीघ्र वेग से वात कुपित होता है उतने शीघ्र वेग से पित्त और कफ नहीं कुपित होते, वह कुपित वात, वातप्रकृति वाले उस मनुष्य के शरीर में बल, वर्ण, सुख और आयु नाश के लिए होता है और वह वातजन्य विभिन्न रोगों से ताप ( दुःख ) उत्पन्न करता है । उस बात को जीतने के लिए ( यह उपाय है ) - विधिपूर्वक स्नेहन और स्वेदन का प्रयोग, स्नेह, उष्ण, मथुर, अन्त और लवण युक्त मृदु संशोधनों का प्रयोग, इसी प्रकार - स्नेह उष्णादि गुण युक्त आहार का प्रयोग और इन्ही गुणोंयुक्त द्रव्यों से अभ्यङ्ग, उपनाह ( Poultice ) बाँधना, उद्वेष्टन, उन्मईन ( मालिश करना ), परिषेक ( गरम - गरम वातघ्न क्वाथ को ऊपर से अङ्गों पर गिराना ), अवगाह ( सारे शरीर को वातघ्न काथ में डुबाना, या जो अङ्ग वात से पीडित हो उसे ही काथ में डुवाना या टब ( Tub ) में बैठाना, संवाहन ( देह मिजवाना ) अवन ( देह दवाना ), वित्रासन ( भय उत्पन्न कराना ), विस्मापन ( सहसा आश्चर्य में लाना ), विस्मरण ( जिस बात को बार - बार स्मरण कर रोगी रोगग्रस्त होता है उसे अन्य मनोहर बानों का प्रसङ्ग लकर भुला देना ), सुरा, आसव आदि मदिरा का पान कराना, अनेक प्रकार के स्नेह को दीपनीय, पाचनीय, वातहर और विरेचनकारक द्रव्यों से संस्कार कर प्रयोग कराना और वातहर द्रव्यों से सौ बार या हजार बार पकाये स्नेह का सभी प्रकार से प्रयोग करना चाहिए । बस्ति का प्रयोग, बस्ति देने के समय में बताए हुए नियमों का पालन और रोगी को पूर्ण विश्राम देना चाहिए ॥ १६ ॥
पित्तलस्यापि पित्तप्रकोपणान्यासेवमानस्य क्षिप्रं पित्तं प्रकोपमापद्यते, न तथेतरौ दोषी; तदस्य प्रकोपमापनं यथोक्तैर्विकारैः शरीरमुपतपति बलवर्णसुखायुषामुपघाताय । तस्यावजयनं - सर्पिप्पानं, सर्पिषा च स्नेहनम्, अधश्च दोपहरणं, मधुरतिक्तकषायशीतानां चौपधाभ्यवहार्याणामुपयोगः, मृदुमधुरसुरभिशीत हृद्यानां गन्धानां चोपसेवा, मुक्तामणि-१. ' स्युर्वलवन्तश्च ' ग. । २. ' वातप्रकोपणोक्तान्यासेवमानस्य ' ग. | ३. ' पिप्रकोपणोक्तान्या सेवमानस्य ' ग. । ४६ च ० सं ०