चरक संहिता हिन्दी भाष्य — पृष्ठ 811–820
चरक संहिता हिन्दी भाष्य · Chaukhamba · पृष्ठ 811–820
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७२२ चरकसंहिता हारावलीनां च परमशिशिरवारिसंस्थितानां धारणमुरसा, क्षणे क्षणेऽग्रथ चन्दनप्रियङ्गुका-लीयमृणालशीतवातवारिभिरुत्पलकुमुद को कनदसौगन्धिकपद्मानुगतैश्च वारिभिरभिप्रोक्षणं; श्रुतिसुखमृदुमधुरमनोऽनुगानां च गीतवादित्राणां श्रवणं, श्रवणं चाभ्युदयानां, सुहृद्भिः संयोगः, संयोगश्रेष्टाभिः खीभिः शीतोपहितांशुकस्रग्धारिणीभिः, निशाकरांशुशीतलप्रवा-तहर्म्यवासः, शैलान्तर पुलिन शिशिर सदनवसनव्यजनपवनसेवनं रम्याणां चोपवनानां सुखशिशिरसुरभिमारुतोपहितानामुपसेवनं, सेवनं च पद्मोत्पलनलिनकुमुदसौगन्धिक-पुण्डरीकशतपत्र हस्तानां, सौम्यानां च सर्वभावानामिति ॥ १७ ॥
पित्तप्रधान पुरुष के रोग और चिकित्सा - - जब अधिक रूप में पित्त को कुपित करने वाले कारणों का सेवन करता है तो शीघ्र ही पित्त प्रकुपित हो जाता है । उसी तरह बात और कफ उतने अधिक प्रकुपित नहीं होते है । पित्तल पुरुष के शरीर में कुपित पित्त बल, वर्ण, सुख और आयु को नष्ट करने के लिए पित्तजन्य सभी उपद्रवों से शरीर में ताप उत्पन्न करता है! उस कुपित पित्त को जीतने के लिए ये उपाय होते हैं ' घृतपान, घृत से संहन, अधो भाग से विरेचन द्वारा दोषों को निकालना, मधुर, तिक्त, कषाय, शीतल औषध एवं खाद्य पदार्थों का उपयोग ( प्रयोग ) करना, मृदु, मधुर, सुगन्धित शीतल, और हृदय के लिये हितकारी गन्धों का सेवन करना, अधिक शीतल जल में रखने के बाद मुक्ता, मणि और हारों को या मोती या मणि से बने हारों को छाती पर धारण करना, क्षण - क्षण में श्रेष्ठ चन्दन, प्रियङ्गु, कालीयक ( पीन चन्दन ), मृणाल ( चन्द्रन आदि को पीस कर छाती पर या जिस अङ्ग में पित्त कुपित हो उस स्थान पर लेप लगाना ), शीत वायु और जल से उत्पल ( नील कमल ), कुमुद ( कोंई, ) कमल ) को वासित कर उसी बोकनद ( रक्तकमल ), सौगन्धिक ( सुगन्धित कमल ), पद्म ( छोटा जल से शरीर को बार - बार धोना या कपड़ा भिगोकर बार - बार शरीर को पोंछना, कान को मुख देने वाले कोमल, मधुर और मनोहर गाना तथा बाजा का सुनना, उन्नति या कल्याण करने वाले वचनों को सुनना, मित्रों का संयोग होना, शीतल द्रव्यों से युक्त साड़ी, और हार धारण करने वाली प्रिय स्त्री का संयोग, चन्द्रमा के किरणों से शीतल पूर्वी हवा जहाँ निराबाध लगती हो ऐसे खुले घरों में रहना, पर्वत की गुफा, पुलिन, शीतल घर, शीतल वस्त्र, शीत पंखे की वायु का सेवन, सुखदायक, शीत एवं सुगन्धित, वात से युक्त सुन्दर बगीचे का सेवन, उत्पल ( नीलकमल ), पद्म ( कमल ) नलिन, सौगन्धिक ( सुगन्धित कमल ), पुण्डरीक ( श्वेत कमल ), शतपत्र ( गुलाब ) के फूलों के गुलदस्तों का सेवन और सभी प्रकार के सौम्य भावों का सेवन पित्त विकारों को शान्त करता है ॥ १७ ॥
श्लेप्मलस्यापि श्लेष्मप्रकोपणान्या सेवमानस्य क्षिप्रं श्लेष्मा प्रकोपमापद्यते, न तथेतरौ दोषौ; स तस्य प्रकोपमापन्नो यथोक्तर्विकारैः शरीरमुपतपति बलवर्णसुखायुषामुपघाताय । कफप्रधान पुरुष के रोग और चिकित्सा - जब कफ को कुपित करने वाले हेतुओं का सेवन करते हैं तो शीघ्र कफ कुपित हो जाता है, शेष पित्त और वात उतने कुपित नहीं होते । वह कुपित कफ उस कफ प्रकृति वाले पुरुष के शरीर में बल, वर्ण, सुख और आयु के नाश के लिए कफजन्य सभी उपद्रवों को उत्पन्न कर शरीर में ताप ( दुःख ) उत्पन्न करना है । १ ' शतपत्रहदानाम् ' यो । २. श्लेष्म प्रकोपणोक्तान्या सेवमानस्य ' इति पा ० ।
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रोगानक विमानाध्याय: ६ ] विमानस्थानम् ७२३ तस्यावजयनं - विधियुक्तानि नीचगोष्णानि संशोधनानि, रूक्षप्रायाणि चाभ्यवहार्याणि कटुतिक्तकषायोपहितानि तथैव धावनलङ्घनप्लवनपरिसरणजागरणनियुद्धव्यवायव्याया-मोन्मनस्त्रानोत्सादनानि विशेषतस्तीक्ष्णानां दीर्घकालस्थितानां च मद्यानामुपयोगः सधूमपानः सर्वशश्चोपवासः, तथोष्णं दासः, सुखप्रतिषेधश्च सुखार्थमेवेति ॥ १८ ॥
और भी - उस कफ को जीतने के लिए विधिपूर्वक सेवन किए गए तीक्ष्ण और उष्ण, संशोधन ( वमन ), कटु, तिक्त, कषाय रस वाले रूक्ष पदार्थों का भोजन, दौड़ना, उपवास, तैरना, घूमना - फिरना, जागना, कुश्ती लड़ना, मैथुन, व्यायाम, मर्दन कराना, स्नान करना, उबटन लगाना, विशेष दीक्ष्ण और बहुत दिनों से रखी हुई पुरानी मदिरा का पीना, धूमपान, सर्वथा भोजन न करना, गर्म स्थानों में रहना या गर्म कपड़ा पहनना और सुख प्राप्ति के लिए ही सुख ( आरामदेह का ) को त्याग देना ॥ १८ ॥
भवति चात्र-* सर्वरोगविशेषज्ञः सर्वकार्यविशेषवित् । सर्वभेषजतत्त्वज्ञो राज्ञः प्राणपतिर्भवेत् । इति ॥ राजवैद्य के गुण - सम्पूर्ण रोगों की विशेषता को जानने वाला, सभी चिकित्सा के कार्यों की विशेषता को जानने वाला, सभी प्रकार से औषयों के तत्वों को जानने वाला वैद्य राजा का प्राणपति ( प्राणरक्षक ) होता है । तत्र श्लोकाः-प्रकृत्यन्तरभेदेन रोगानीकविकल्पनम् । परस्पराविरोधथ सामान्यं रोगदोपयोः ॥ २० ॥
दोपसंख्या विकाराणामेकदेशः प्रकोपणम् । जरणं प्रति चिन्ता च कायाग्नेक्षणनि च ॥२१ ॥
नराणां वातलादीनां प्रकृतिस्थापनानि च । रोगानीके विमानेऽस्मिन् व्याहृतानि महर्षिणा ॥ इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते विमानस्थाने रोगानीकविमानं नाम षष्टोऽध्यायः ॥ ६ ॥
अध्याय उपसंहार -- प्रकृति ( कारण ) के भेद से रोग - समूहों का विचार, परस्पर रोग समूहों का विरोध न होना, रोग और दोषों में समानता, दोषों की संख्या, विकारों ( रोगों ) का एक देश कथन, दोषों का प्रकोपक हेतु, जठराग्नि के विषय में विचार, शरीर की शनि - रक्षा का उपाय, बाल आदि पुरुषों को प्रकृति में रखने वाली औषधियाँ, इन सबका वर्णन महर्षि ने इस रोगानीक विमान में कहा है ॥ २०-२२ ॥ इस प्रकार चरक के द्वारा प्रतिसंस्कृत अनिवेशकृततन्त्र ( चरक संहिता ) के विमानस्थान में रोगानीक विमान नामक छठाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ ६ ॥
१. ' देहाने रक्षणानि च ' इति पा ० ।
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७२४ चरकसंहिता अथ सप्तमोऽध्यायः अथातो व्याधितरुपीयं विमानं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्माह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
अब इसके बाद व्याक्तिरूपीयनामक विमान की व्याख्या की जायगी जैसा भगवान आय ने कहा था ॥ १-२ ॥ विमर्श - पहले के अध्याय में रोग भेद बताकर चिकित्सा के उपयुक्त रोगी पुरुषों का भेद बनाने के लिए और प्रसवश क्रिमियों को बनाने के लिए व्याक्तिरूपीय अध्याय प्रारम्भ किया जाता है । दृह खलु द्वौ पुरुषौ व्याधितरूपौ भवतः - गुरुख्याधितः, लघुव्याधितश्च । तत्र - गुरु-व्याधिन एकः सत्त्ववलशरीरसंपदुपेतत्वाल्लघुव्याधित इव दृश्यते, लघुव्याधितोऽपरः सत्त्वा-दीनामघमत्वाद्गुरुव्याधित इव दृश्यते । तयोरकुशलाः केवलं चक्षुषैत्र रूपं दृष्ट्वाऽध्यवस्यन्तो व्याधिगुरुलाघवे विप्रतिपद्यन्ते ॥ ३ ॥
( १ ) गुरु तथा लघु व्याधित पुरुष ( Patients of Severe and Mild Diseases ) यहाँ पर रोगी मनुष्य दो प्रकार के होते है गुरुत्र्यावित और लघुत्र्यावित - अर्थात् एक ही प्रकार के रोग से ग्रस्त दो प्रकार के मनुष्य होते हैं, एक वे होते हैं जो बहुत बडी व्याधि से युक्त होते हैं पर सत्त्व, वल, शरीर के ठीक रहने से छोटे रोग से ग्रस्त से प्रतांत होने हैं, दूसरे छोटे रोग से ग्रस्त होते है पर सत्त्व, वल, शरीर के हीन बल होने से बहुत बड़ी व्यावि से युक्त प्रतीत होते हैं, इन दोनों प्रकार के रोगियों को देखते हुए अलश वैद्य केवल नेत्र से ही रूप मात्र देखकर रोग - निश्चय करते समय छोटे और बड़े रोगों में धोखा खा जाते है ॥ ३ ॥
नहि ज्ञानावयवेन कृत्रे ज्ञेये विज्ञानमुत्पद्यते । विप्रतिपन्नास्तु खलु रोगज्ञाने उप-कम्युनिज्ञाने चापि विप्रतिपद्यन्ते । ते यदा गुहायामितं लघुव्याधितरूपमासादयन्ति तदा तमल्पदोष मश्वा संशोधनकालेऽस्मै मृदु संशोधनं प्रयच्छन्नो भूय एवास्य दोषानुदीरयन्ति यदा तु लघुव्याधितं गुरुव्याधितरूपमासादयन्ति तदा तं महादोषं मत्वा संशोधनका-लेन्स तीचणं संशोधनं प्रयच्छन्तो दोषानतिनिर्हृत्य शरीरनस्य क्षिण्वन्ति । एवमवयवेन ज्ञानस्य कृत्स्ने ज्ञेये ज्ञानमभिमन्यमानाः परिम्बलन्ति । विदितवेदितव्यास्तु भिषजः सर्वं सर्वथा यथासम्भवं परीचयं परीचयाध्यवस्यन्तो न क्वचिदपि विप्रतिपद्यन्ते, यथेष्टमर्थमभि-निर्वर्तयन्ति चेति ॥ ४ ॥
सम्पूर्ण रूप से जानने योग्य विषयों का विज्ञान - यह ज्ञान के किसी एक अंश से नहीं होता । रोगविज्ञान में धोखा खाये हुए वैद्य चिकित्सा के युक्तिज्ञान में भी धोखा खा जाते है । जब वे वैद्य गुरु ( बड़ी ) व्याधि से युक्त रोगी को अपने ज्ञान के आधार पर लघु ( छोटे ) व्यावि युक्त है ऐसा विषय कर लेते हैं नव रोगों को अल्प दीप बाला समझ कर संशोधन ( वमन या विरेचन ) के समय मृदु संशोधन देते हुए फिर उसके दो को अधिक रूप में कुपित कर देते हैं । जब हल्के रोग से युक्त रोगी को गुरुव्याधि से युक्त निश्चय करते हैं नव उसे अधिक दोष से युक्त समझ कर संशोधन के समय तीक्ष्ण संशोधन देकर दोपों को अधिक मात्रा में निकाल कर रोगी के शरीर को क्षीण कर देते हैं । इस प्रकार रोग ज्ञान के किसी एक ही अंश से पूर्ण ज्ञान हो जाता है ऐसा मानने वाला वैद्य अपने कार्यों में धोखा खा जाता है, अर्थात् रोग निश्चय और चिकित्सा
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ध्याधितरूपीयविमानाध्यायः ७ ] विमानस्थानम् ७२५ करने में सन्देहयुक्त ही रहता है । जो वैद्य ज्ञान करने योग्य लभी बातों को भली प्रकार जानता है वह वैद्य सभी परीक्षा करने योग्य विषयों को यथासम्भव सभी प्रकार से परीक्षा करके निश्चय करते हुए कहीं भी अपने कार्य में धोखा नहीं खाता और मन के अनुकूल विषयों को पूरा करता है ॥ ४ ॥
विमर्श - पहले निदान स्थान के प्रथम अध्याय में बताया जा चुका है कि रोगों का ज्ञान निदान, पूर्वरूप, रूप, उपशय एवं सम्प्राप्ति इन पाँचों के समुदाय से या आप्तोपदेश, प्रत्यक्ष, अनुमान इन तीनों से रोगों का ज्ञान होता है । केवल प्रत्यक्ष से ज्ञान करना ज्ञान का अंश या ज्ञानावयव कहा जाता है | अतः निदान आदि ५ का न विचार करना, या आप्तोपदेश अनुमान का न विचार कर केवल लक्षण, जो प्रत्यक्ष देखे जाते हैं, उन्हीं का विचार करना उचित नहीं है । भवन्ति चात्र-सत्वादीनां विकल्पेन व्यधिरूपमथातुरे । दृष्ट्वा विप्रतिपद्यन्ते वाला व्याधिबलाबले ॥ ५ ॥
ते भेषजमयोगेन कुर्वन्त्यज्ञानमोहिताः । व्याधितानां विनाशाय क्लेशाय महतेऽपि वा ॥६ ॥
प्राज्ञास्तु सर्वमाज्ञाय परीचयमिह सर्वथा । न स्खलन्ति प्रयोगेषु भेषजानां कदाचन ॥ ७ ॥
मूर्ख और विद्वान् वैद्य में अन्तर - अल्पज्ञ वैय रोगी में सत्त्व ( मन ) आदि ( वल, शरीर ) की भिन्नता से व्याधि के रूपों को देख कर रोग के वलावल में धोखा खा जाते है । वे अल्पज्ञ वैद्य अज्ञान से मोहित होकर, रोगियों के नाश के लिए या बहुत बड़े कष्ट के लिए अयोग से औषध ( चिकित्सा ) करते हैं । बुद्धिमान् वैद्य परीक्षा करने योग्य सभी भावों की सभी तरह से परीक्षा करके औषधों के प्रयोग में कभी भी धोखा नहीं खाते ॥ ५-७ ॥ व्यापारे व्याधितरूपसंख्याग्रे सम्भवं व्याधितरूप हेतुविप्रतिपत्तौ कारणं सापवादं संप्रतिपत्तिकारण चानपवादं निशम्य, भगवन्नमात्रेयमग्निवेशोऽतः परं सर्वक्रि-मीणां पुरीषसंश्रयाणां समुत्थानस्थानसंस्थानवर्णनामप्रभावचिकित्सितविशेषान् पप्रच्छोप-संगृह्य पादौ ॥ ८ ॥
( २ ) बीस कृमिरोग प्रकरण ( Twenty Helminthic Diseases ) ( २० ) कृमिरोग - इस प्रकार व्याविरूप के विषय में व्याधितरूप की संख्या अर्थात् एक गुरुव्यावित और दूसरा लघुव्याक्ति यह संख्या, व्याधितरूप में कारण परिणाम की शक्यतासे उत्पन्न हुए विपरीत ज्ञान में अपवाद सहित कारण और दोषरहित उचित रूप से ज्ञान के कारण को सुनकर उसके बाद अग्निवेश ने भगवान् आत्रेय के चरणों का स्पर्श कर पुरीप में होने वाले सभी प्रकार के कृमियों का निदान, स्थान, लक्षण, वर्ण, नाम, प्रभाव और चिकित्सा की विशेषता को पूछा || ८ || विमर्श - इस गद्य में पुरीप में होने वाले कृमियों का ही वर्णन किया गया है । इसका तात्पर्य यह स्पष्ट है कि इससे अलग भी कृमि होते हैं, जिनका वर्णन आगे किया गया है । अथःस्मै प्रोवाच भगवानात्रेयः - इह खल्वग्निवेश! विंशतिविधाः क्रिमयः पूर्वमुद्दिष्टा नानाविधेन प्रविभागेनान्यत्र सहजेभ्य; ते पुनः प्रकृतिभिर्विभज्यमानाश्चतुर्विधा भवन्ति; तद्यथा - पुरीषजाः, श्लेष्मजा, शोणितजाः, मलजाश्चेति ॥ ९ ॥
सहज और वैकारिक कृमि -अग्निवेश से भगवान् आत्रेय ने कहा कि हे अग्निवेश! सहज १. ' व्याधीनां रूपमातुरे ' इति पा ० । २. ' संख्याग्रसंभवमिति संख्याप्रमाणसंभवमित्यर्थः ' चक्रः ।
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७२६ चरकसंहिता कृमियों को छोड़ कर अनेक प्रकार के विभागों से बीस प्रकार के कृमियों का वर्णन सूत्रस्थान के अष्टोदरीय अध्याय में किया गया है । वे कृमि कारणों के अनुसार विभक्त होकर चार प्रकार के होते हैं, जैसे – १. पुरीषज, २. श्लेष्मज, ३. शोणितज और ४. मलज ॥ ९ ॥
विमर्श - उक्त सूत्र में ' अन्यत्र सहजेभ्यः ' इस पद द्वारा यह स्पष्ट किया गया है कि शरीर के अन्दर सहज कृमि होते हैं, जो रोगोत्पादक नहीं होते किन्तु लाभकारक होते है । यह बात आधुनिक विज्ञान भी मानना है कि कृमि रोगोत्पादक, एवं शरीरधारक दो प्रकार के होते हैं | आचार्य चक्रपाणि ने भी — ' शरीरसहजास्त्ववैकारिकाः क्रिमयः ' से शरीरधारक कृमि हो माना है । इससे यह स्पष्ट है कि प्राचीन काल से ही Pathogenic और Non - Pathogenie कृमियों का ज्ञान भारतीयों को था । * तत्र मलो बाह्यश्वाभ्यन्तरश्च । तत्र बाह्यमलजातान् मलजान् संचचमहे । तेषां समु स्थानं सृजावर्जनं; स्थानं - केशश्मश्रुलोमपचमवासांसि संस्थानम् - अणवस्तिलाकृतयो बहुपादाश्च वर्णः - कृष्णः, शुक्लश्च नानानि - यूकाः, पिपीलिकाश्च प्रभावः कण्डूजनन कोट-पिडकाभिनिर्वर्तनं च; चिकित्सितं तु खल्वेषामपकर्षण, मलोपघातः, मलकराणां च भावा-नामनुपसेवनमिति ॥ १० ॥
बाह्य और आभ्यन्तर कृमि - बाह्य और आभ्यन्तर भेद से नल दो प्रकार के होते है । उनमें बाहरी मल में उत्पन्न होने वाले कृमियों को मलज कृमि कहते हैं । सृजावर्जन ( शुद्धता से न रहना ) इन कृमियों की उत्पत्ति का कारण ( निदान ) है । केश, इश्रु, लोन, पक्ष्म और गन्दे कपड़े इन कृमियों के स्थान है । इनकी आकृति अणु ( बहुत छोटी ), मिल के आकार की, बहुत पैर वाली होती है । इनके वर्ण, कृष्ण ( काले ) और हवेत होते हैं । इनके नाम यूका और पिपीलिका है । इनका प्रभाव कण्डू ( खुजली ) उत्पन्न करना, कोठ ( चकत्ता ) और पिडका ( फुन्सियाँ ) उत्पन्न करना है । इनकी चिकित्सा खींच कर निकालना, मलों का नाश करना और मल उत्पादक भावों का सेवन न करना है ॥ १० ॥
ॐ शोणितजानां तु खलु कुष्ठैः समानं समुत्थानं; स्थान- रक्तवाहिन्यो धमन्यः; संस्थानम्— अणवो वृत्ताश्चापादाश्च, सूक्ष्मत्वाच्चै के भवन्त्यदृश्याः वर्णः - ताम्रः; नामानि - केशादाः, लोमादाः, लोमद्वीपाः, सौरसाः, औदुम्बराः, जन्तुमातरश्चेति; प्रभावः -- केशश्मश्रुनखलोमप-चमापध्वंसः, व्रणगतानां च हर्षकण्डूतोदसंसर्पणानि, अतिवृद्धानां च त्वक्रास्नायुमां-सतरुणास्थिभक्षणमिति; चिकित्सितमध्येषां कुष्ठैः समानं, तदुत्तरकालमुपदेच्यामः ॥ ११ ॥
रक्तज कृमि के निदान - रक्तज कृमियों का तो समुत्थान ( उत्पन्न होने का कारण ) कुष्ठ के समान है । इनका स्थान रक्तवह धमनियाँ हैं । आकार -- सूक्ष्म, गोल, पैररहिन है । कुछ आचार्य रक्तज कमियों को अत्यन्त सूक्ष्म होने के कारण अदृश्य मानते है । वर्ण ( रंग ) ताम्र की तरह रक्त होता है । नाम - केशाद, लोनार, लोमद्वीप, सौरस, औदुम्बर और जन्नुमातृ है । प्रभाव - केश, श्मश्रु, नख, लोम और पलक के बालों को गिराना है | जब ये कृमि व्रण में अपना स्थान बनाते हैं तो रोमहर्ष, खुजली, मूई चुभोने सी पीड़ा और रेंगने का अनुभव होता है । जब ये कृमि अधिक रूप में बढ़ जाते है तो त्वचा, सिरा, स्नायु, मांस और तरुणास्थियों ( Cartilage ) को खा जाते है । इन कमियों की चिकित्सा भी कुष्ठ रोग के ही समान है । उसे आगे कुष्ठ चिकित्सा प्रकरण में कहेंगे ॥ * श्लेष्मजाः चीरगुडतिलमत्स्यानूपमांसपिष्टान्न परमान्न कुसुम्भस्नेहाजीर्णपूनि किन्न संकीर्ण-विरुद्धासात्म्य भोजन समुत्थानाः; तेषामामाशयः स्थानं, ते प्रवर्धमानास्तूमधो वा विसर्प-न्त्युभयतो वा; संस्थानवर्णं विशेषास्तु - श्वेताः पृथुब्रध्नसंस्थानाः केचित् केचिदवृत्तपरि
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व्याधितरूपीय विमानाध्याय: ७ ] विमानस्थानम् ७२७ णाहा गण्डूपदाकृतयः श्वेतास्ताम्राव भामाश्च केचिदणवो दीर्घास्तस्वाकृतयः श्वेताः; तेष त्रिविधानां श्लेष्मनिमित्तानां किमीगां नामानि अन्त्रादाः, उदरादाः, हृदयचराः, चुरवः, दर्भपुष्पाः, सौगन्धिकाः, महागुद्दाश्चेति; प्रभावो - हल्लासः, आस्यसंस्रवणम्. अरोचकावि-पाकी, ज्वरः, मूर्च्छा, जृम्भा, क्षवथुः, आनाहः, अङ्गमर्दः, छर्दिः काश्यं, पारुष्यं चेति ॥१२ ॥
श्लेष्म क्रिमियों के निदान - कफज क्रिमि दूध, गुड, तिल, मछली, आनूप मांस, मिष्टान्न, परमान्न ( खीर ), बरें का तेल और अजीर्ण भोजन, पूतिक्किन्न ( जो सड़कर गीला हो गया हो ), संकीर्ण ( कूड़ा, कंकड़, मल आदि के मिलने से घृणित ), विरुद्ध और असात्म्य भोजन करने से उत्पन्न होते हैं । उनका स्थान - आमाशय है । ये कृमि बढ़कर आमाशय से ऊपर या नीचे या ऊपर और नीचे दोनों भागों में चलते हैं । इनकी आकृति, वर्ण और भेद तो कोई श्वत, पृथु ( गोले और मोटे ), ब्रध्न ( चपटे चमड़े के फीते ) के आकार के, कुछ क्रिमि गोल और चौड़े, गण्डपद ( केचुआ ) के समान, सफेद या ताम्र की तरह रक्त होते हैं । कमि सुक्ष्म ( पतले ), लम्बे डोरे की तरह सफेद होते हैं । इन तीनों प्रकार के कफज कुछ कृमियों के नाम - अन्त्राद, उदराद, हृदयचर, चुम, दर्भपुष्प, सौगन्धिक और महागु हैं । इनका प्रभाव —— जी मचलना और मुख से जल निकलना, अरुचि, अपच, ज्वर, मूर्च्छा, जम्भाई, छींक का अधिक आना, आनाह ( अफरन ), अङ्गों में जकड़ाहट, वमन, कृशता और कठोरता का शरीर में होना है ॥ १२ ॥
पुरीषजास्तुल्यसमुत्थानाः श्लेष्मजै; तेषां स्थानं पक्वाशयः, ते प्रवर्धमानाव विसर्पन्ति, यस्य पुनरामाशयाभिमुखाः स्युर्यदन्तर तदन्तरं तस्योद्वारनिःश्वासाः पुरीष-गन्धिनः स्युः; संस्थानवर्णविशेषास्तु - सूक्ष्मवृत्तपरोणाहाः श्वेता दीर्घा ऊर्जाशुसंकाशाः केचित् केचित् पुनः स्थूलवृत्तपरीणाहाः श्यावनीलहरित पीताः; तेषां नामानि ककेरुकाः, मकेरुकाः, लेलिहाः; सशूलकाः, सौसुरादाश्चेति; प्रभावः -- पुरीषभेदः, काश्यं, पारुष्यं, लोमहर्षाभिनिवर्तनं च न एव चास्य गुदमुखं परितुदन्तः कण्डं चोपजनयन्तो गुदमुखं पर्या म त एव जातहर्षा गुदनिष्क्रमणमतिवेलं कुर्वन्ति; इत्येष श्लेष्मजानां पुरीषजानां च क्रिमीणां समुत्थानादिविशेषः ॥ १३ ॥
पुरीषज क्रिमियों के निदान इनका निदान कफज क्रिमियों के समान | स्थान - पक्काशय है! ( अपथ्य सेवन से ) अधिक बढ़े हुए वे अधोभाग में चलते हैं । जिस समय जिस पुरुष के शरीर में ये क्रिमि आमाशय की ओर होते हैं उस समय उसके उद्गार ( डकार ) और श्वास मल के गन्ध वाले होते है । इनका आकार और वर्ण भेद -- कुछ क्रिमि सूक्ष्म, गोलाकार, सफेद, ऊर्णाशु - संकाश ( भेड़ के बाल की तरह ) होते हैं और कुछ क्रिमि मोटे गोला-कार. काले, नीले, हरे और पीले होते हैं । इनके नाम - ककेरुक, मकेरुक, लेलिह, शूलक और सौसुराद हैं । इनका प्रभाव - मल का पतला होना, शरीर में कृशता, कठोरना और रोमाञ्च उत्पन्न करना है । ये ही क्रिमि रोगी की गुदा के मुख में सुई चुभोने सी पीड़ा और खुजली उत्पन्न करने हुए गुदा के मुख में स्थित हो जाते है । जब उनमें हर्ष उत्पन्न होता है तब वे बार - बार गुदा से बाहर निकलते है । इस प्रकार यह कफज एवं पुरीषज क्रिमियों के निदान आदि का विशेष वर्णन किया गया है ॥ १३ ॥
चिकित्सितं तु खल्वेषां समासेनोपदिश्य पचाद्विस्तरेणोप देदयामः । तत्र सर्वक्रि-मीणामपकर्षण मेवादितः कार्यं ततः प्रकृतिविधातः, अनन्तरं निदानोक्तानां भावानामनुप • सेवनमिति ॥ १४ ॥
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७२८ चरकसंहिता संक्षेप में कृनिरोग की चिकित्सा - इन कृमियों की चिकित्सा संक्षेप में यहाँ बताकर विस्तार से आगे चिकित्सा स्थान में कहेंगे । इन सभा कृमियों का आरम्भ में अपकर्षण ( निकालने का ( आय ) करना चाहिए । उसके बाद उत्पत्ति के कारणों का नाश करना चाहिए, उसके बाद निदान में बताए गए कारणों का त्याग करना चाहिए ॥ १४ ॥
* तत्रापकर्पणं - हस्तेनाभिगृह्य विमृश्योपकरणवताऽपनयनमनुपकरणेन वा; स्थान-गतानां तु क्रिमाणां भेषजेनापकषण न्यायतः, तच्चतुर्विधः तद्यथा - शिरोविरेचन, वमन, विरेचनम्, आस्थापनं च; इत्यपकर्षणविधिः । ( १ ) अपकर्षण - विचारपूर्वक यन्त्रों से सुसज्जित वैद्य यन्त्रों से या यन्त्र से रहित वैद्य हाथ से हा उन्हें खांच कर अपकर्षण करें ( निकाल लें ) । अपने स्थान ( आमाशय पक्काशय ) में स्थित कृभियों के निकालने के लिए औषध प्रयोग द्वारा विधिपूर्वक अपकर्षण किया जाता है । यह भेषज - प्रयोग का आकर्षण ४ प्रकार का होता है जैसे १. शिरोविरेचन, २. वमन, ३. विरेचन और ४. आस्थापन । यह कृमियों की अपकर्षण विधि है । प्रकृतिविघातस्त्वेषां कटुतिक्तकषायक्षारोपणानां द्रव्याणामुपयोगः यच्चान्यदपि किंचिच्छ् लेष्मपुरीषप्रत्यनीकभूतं तत् स्यात्; इति प्रकृतिविघातः । ( २ ) प्रकृतिविधात - इन कृभियों की प्रकृति ( उत्पादक कारण ) का विधान ( नाश ) कटु, तिक्त, कपाय, क्षार और उष्ण द्रव्यों के प्रयोग से होता है । और भी अन्य द्रव्य जो कफ और पुरीष के गुणों के विपरीत होते हैं उनके सेवन से कृमियों का प्रकृतिविधान होता है । यह प्रकृतिविघात है । विमर्श - प्रकृतिविघात का तात्पर्य यह है कि समान गुण वाले या समान गुणों में अधिक साम्य रखने वाले द्रव्य ही कृमि उत्पन्न करेंगे क्योंकि कृमि अपने समान प्रकृति वाले द्रव्यों से प्रभावित होते हैं, अतः उनकी प्रकृति के विपरीत द्रव्यों का प्रयोग कृमियों के स्वभाव के विपरीत होने से उनका नाश कर देता है, जैसा कि - ' हासहेतुविशेषश्च ' से सङ्केत किया गया है । * अनन्तरं निदानोक्तानां भावानामनुपसेवनं - यदुक्तं निदानविधौ तस्य विवर्जनं तथाप्रायाणां चापरेषां द्रव्याणाम् । इति लक्षणतश्चिकित्सितमनुव्याख्यातम् । एतदेव पुनर्विस्तरेणोपदेच्यते ॥ १५ ॥
( ३ ) निदान परिवर्जन - प्रकृतिविघात के बाद निदान में कहे गए भावों का सेवन न करना, यह जो निदान - विवि में बताया गया है उसका त्याग और निदान के समान गुण वाले अन्य द्रव्यों का भी त्याग करना चाहिए । यह लक्षण द्वारा संक्षेप में चिकित्सा बतायी गया, इसी को फिर विस्तार से आगे कहते हैं ॥ १५ ॥
अथैनं क्रिमिकोष्ठमातुरमध्रे षड्रात्रं सप्तरात्र वा स्नेहस्वेदाभ्यामुपपाद्य श्वभूते एनं संशोधनं पाययताऽस्मीति चीरगुडदधितिलमत्स्यानूपमांसपिष्टान्नपरमान्न कुलुम्भ - नहसप्र-युक्तभोज्यः साय प्रातश्श्रोपपादयेत् समुदीरणाथ क्रिमीणां काष्ठाभिसरणाथं च भिषक् । अथ व्युष्टायां राज्यां सुखोषितं सुप्रजार्णभक्तं च विज्ञायास्थापनवमनविरेचनंस्तदहरेवापपाद-दुपपादनीयश्चेत् स्यात् सर्वान् पराच्य विशेषान् परीचय सम्यक् ॥ १६ ॥
( १ ) अपकर्षण विधि का विस्तृत विवेचन - जिन पुरुषों के कोष्ठ ( आमाशय या पक्वाशय ) में कृभि उत्पन्न हो गये हों ऐसे रोगियों को सर्वप्रथम ६ या ७ दिन तक स्वहन और स्वंदन करने के बाद आगे आने वाले दूसरे दिन संशोधन पिलाना है यह निश्चय करके वैद्य कृमि को उभाड़ने १. ‘ न्यायतः न्याय्यम्, उचितमित्यर्थः ' इति योगन्द्रनाथसेनः ।
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व्याधितरूपीयविमानाध्यायः ७ ] विमानस्थानम् ७२६ की दृष्टि से या यदि वे अपने कोउ को छोड़ या बढ़ कर अन्य स्थानों में चले गये हों तो अपने स्थानों में आ जायें इसलिए सुबह और शाम दूध, दही, गुड़, तिल, मछली, आनूप मांस नि परमान्न ( खीर ), बर्रे का तेल आदि से युक्त भोजन या भोजन में इन्हीं की प्रधानता रख भोजन करावें । जब रात्रि बीत जाय तब रोगी रात्रि में सुखपूर्वक शयन कर चुका है, रात में खाया हुआ भोजन उत्तम रीति से पच गया है, यह जानकर और रोगी की शारीरिक - मानसिक स्थिति आदि परीक्ष्य विषयों की भली - भाँति परीक्षा करने के बाद जब वह संशोधन योग्य प्रतीत हो तब उसका एक ही दिन में आस्थापन, वमन, विरेचन द्वारा संशोधन करना चाहिए ॥ १६ ॥
अथाहरेति ब्रूयात् - मूलक सर्षपलशुनकरञ्ज शिग्रुमधुशिग्रुखर पुष्पाभूस्तृणसुमुखसुर--सकुठेरकगण्डीरकालमालक पर्णास तवक फणिज्झ कानि सर्वाण्यथवा यथालाभ; तान्याहृता--न्यभिसमीक्ष्य खण्डशश्छेदयित्वा प्रक्षाल्य पानीयेन सुप्रक्षालितायां स्थाल्यां समावाप्य गोमूत्रे गार्धोदकेनाभिषिच्य साधयेत् सततमवघट्टयन् दर्या, तर्मुपयुक्तभूयिष्ठेऽम्भसि -गतरसेष्वौषधेषु स्थालीमवतार्य सुपरिपूतं कषायं सुखोष्णं मदनफलपिप्पलीविडङ्गकलक-तँलोपहितं स्वर्जिकालवणितमभ्यासिच्य वस्तौ विधिवदास्थापयेदेनं; तथा s कलर्ककुट-जाढको कुष्ठकंडर्यकषायेण वा, तथा शिग्रपीलुकुस्तुम्बुरु कटुकासर्षपकषायेण, तथाऽऽम-- लकशृङ्गवेरदारुहरिद्रापिचुमर्दकषायेण मदनफलादिसंयोगसंपादितेन, त्रिवारं सप्तरात्रं वाऽऽस्थापयेत् ॥ १७ ॥
और भी - जब यह समझ लें कि एक ही दिन में आस्थापन, वमन और विरेचन क्रिया को रोगी सहन करने में समर्थ है नव उसके किसी निजी व्यक्ति से या उसी से सामान लाने को कहे, सामान -- मूली, सरिसो, लहसुन, सहिजन का बीज, मीठा सहिजन ( मुनगा ) का बीज, अजमोदा, सुगन्ध तृण ( हरद्वार तृण ), मुमुख ( तुलसी भेद ), सुरस ( श्वेत तुलसी ), कुठेरक ( वन तुलसी ), गण्डीरक ( गडेर घास ), कालमालक ( काली तुलसी ), पर्णास ( पुदीना ), क्षवक ( नकचिकनी ), फणिज्झक ( दवना ) इन सभी द्रव्यों को मगावें या जो - जो मिल सकें उनको मँगाकर देख कर ठीक उचित रूप में वही द्रत्र्य है या बिना पहिचाने दूसरा द्रव्य भी आ गया है इस प्रकार देखकर खण्ड - खण्ड टुकड़े करके जल से अच्छी प्रकार धो लें । फिर अच्छी प्रकार जल से धुलो हुई हांडी में उन टुकड़ों को रखकर सम मात्रा में गोमूत्र और जल उसी हांड़ी में डाल दें । अब आग पर रखकर क्वाथ की तरह कलछी से चलाते हुए पकावें । जल का बहुत भाग जल जाने पर और औषधियों का रस उस जल में आ जाने पर हांड़ी को नीचे उतार लें और वस्त्र से अच्छी प्रकार छान लें, और उस क्वाथ में मनफल, पीपल और वायविडंग का कल्क, तिल का तेल, सज्जांखार, सेंधानमक मिलाकर बस्ति में रखकर रोगी को विधिपूर्वक आस्थापनवस्ति दें । इसी प्रकार रक्त मदार, श्वेतमदार, कुरेया, अरहर, कूठ और मीठे नीम के क्वाथ से अथवा इसी प्रकार सहिजन, पीलू, धनियाँ, कुटकी, सरसो के क्वाथ से अथवा आँवला, अदरक, दारुहरिद्रा, नीम के काथ से, जिसमें मदनफल का कल्क डाला गया हो, तीन दिन या सात दिन तक स्थापन ( निरूह ) वस्ति का प्रयोग करें ॥ १७ ॥
प्रत्यागते च पश्चिमे बस्ती प्रत्याश्वस्तं तदहरेवोभयतो भागहरं संशोधनं पाययेद्यक्त्या; तस्य विधिरुपदेच्यते -- मदनफलपिप्पलोकषायस्यार्घाञ्जलिमात्रेण त्रिवृत्कलकाक्षमात्र-मालोड्य पातुमस्म प्रयच्छेत्, तदस्य दोषमुभयतो निर्हरति साधुः एवमेव कल्पोक्तानि वमन विरेचनानि प्रतिसंसृज्य पाययेदेनं बुद्ध्या सर्वविशेशनवेक्षमाणो भिषक् ॥ १८ ॥
१. ' नस्मिञ् शीतीभूते तूपयुक्तभूयिष्ठेऽम्भसि ' ग. । २. पश्चिमे शेपे ।
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७३० चरकसंहिता और भी - अन्तिम बस्ति के गुदा से बाहर निकल जाने पर रोगी को आश्वासन देकर उसी दिन दोनों ( ऊर्ध्व - अधः ) मार्गों से दोषों को निकालने वाला संशोधन युक्तिपूर्वक पिलावें । उसकी विधि कही जाती है - मैनफल की पिप्पली ( आन्तर भाग ) का क्वाथ आधी अंजलि ( अर्थात् दो पल ) लेकर उसमें सफेद निशोध का एक रुपया भर कल्क मिलाकर पीने के लिए दें । यह क्वाथ उस रोगी के शरीर से अच्छी प्रकार मुख से वमन और गुदा से मलों को निकालता है । इसी प्रकार कल्प स्थान में बताये हुए अलग - अलग वमन एवं विरेचन कारक औषधियों को एक में मिलाकर अपनी बुद्धि से सभी विशेष बातों को ( अर्थात् सम्यक् योग हो पर अतियोग, हीनयोग न होने पावे ) विचार कर वैय उस रोगी को पिलावे ॥ १८ ॥
अथैनं सम्यग्विरिक्तं विज्ञायापराले शैखरिककषायेण सुखोष्णेन परिपेचयेत् । तेनेव च कषायेण वाह्याभ्यन्तरान् सर्वोदकार्थान् कारयेच्छुश्वत्; तदभावे कटुतिक्तकषायागा-मौवानां काथैर्मूत्रारैर्वा परिषेचयेत् । परिषिक्तं चैन निवातमागारमनुप्रवेश्य पिपली-पिप्पलीमूलचव्यचित्रकशृङ्गवेरसिद्धेन यवाग्वादिना क्रमेणोपाचरेत् विलेपीक्रमागत चैन-मनुवासयेद्विडङ्गतैलेनैकान्तरं द्विखिर्वा ॥ १ ९ ॥ शिरोविरेचन - जब यह समझ लें कि रोगी के उचित रूप से वनन और विरेचन द्वारा दोप निकल गये है, तत्र सायंकाल अपामार्ग ( चिचिरी ) के उष्म क्वाथ से स्नान करावें और उसी के क्वाथ से बाहरी और भीतरी जलीय कार्यों को निरन्तर करावें ( अर्थात् सी के कार्य से भोजन का निर्माण, ध्यास लगने पर उसी का पान, स्नान, मलमूत्र आदि के समय उसी क्काय का प्रयोग करें ) । यदि अपामार्ग न मिल सके तो कटु, तिक्त, कषाय रस वाले औषध द्रव्यों के क्वाथ से या गो - मूत्र या क्षारीय द्रव्यों को घोल कर स्नान करावें । स्नान कर लेने के बाद जिस घर में अधिक हवा का प्रवेश न हो उसमें ले जाकर पिप्पली, पीपरामूल, चव्य, चित्रक और अदरक के काथ से बनी हुई यवागू आदि के क्रम से उपचार करें, खिलाते हुए विलेपी क्रम तक पहुँचे हुए उसको विडंग तेल से एक - एक दिन के अन्तर से दो अथवा तीन बार अनुवासन वस्ति दें ॥ १ ९ ॥ यदि पुनरस्यातिप्रवृद्धान्छीर्षादान् क्रिमीन् मन्येत शिरस्येवाभिसर्पतः कदाचित, ततः स्नेहस्वेदाभ्यामस्य शिर उपपाद्य विरेचयेदपामार्गतण्डुलादिना शिरोविरेचनेन ॥ २० ॥
औरभी यदि फिर भी शीर्षाद ( रोगी के शिर को खाने वाले ) कृमि अत्यन्त बढ़ कर कभी शिर में चलते हुए, जान पढ़ें तो सिर पर स्नेहन - स्वेदन करने के बाद सूत्रस्थान के तृतीय अध्याय में कथित अपामार्ग, तण्डुल आदि शिरोविरेचनीय औषधों से सिर का विरेचन करावें || ०२ || १ यस्त्वभ्यवहार्यविधिः प्रकृतिविधातायोक्तः क्रिमीणामथ तमनुव्याख्यास्यामः, -मूलक-पण समूलाग्रप्रतानामाहृम्य खण्डशश्छेदयित्वोलू ( दू ) खले क्षोदयितया पाणिभ्यां पीडयित्वा रसंगृह्णीयात् तेन रसेन लोहितशालितण्डुलपिष्टं समालोड्य पुपलिकां कृत्वा विधूमे. Ca ङ्ग रेप कुंड्य विडङ्गतैललवणोपहितां क्रिमिकोष्टाय भक्षयितु प्रयच्छेत्, अनन्तरं चाल-कः किमुदविद्वा पिप्पल्यादिपञ्चवर्गसंसृष्टं सलवणमनुपाययेत् । ( २ ) प्रकृतिविधान का विस्तृत विवेचन -- कृमियों के प्रकृति ( उत्पन्न होने के कारणों के ) नाश के लिए जो भोजन की विधि बनाई गई है उसकी व्याख्या की जाती है । मूषकपण ( मूसाकानी ) के मूल, अग्र प्रतान अर्थात् पंचांग को लेकर ' छोटे - छोटे टुकड़े कर ओखल में कूड हाथ से मसल कर रस निकाल लें । उसी रस में लाल धान के चावलों को पीस कर बनाये हुए १. ' मूषिकपर्णी ' इति पा ० । २. ' विपाच्य ' इति पा ० ।
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व्याधितरूपीयविमानाघ्यायः ७ ] विमानस्थानम् ७३१ आटा को मिलाकर रोटी बना धूमरहित अग्नि पर पकावें और विडंग तैल, नमक के साथ उस रोटी को कृमिकोष्ठ पुरुष को खाने के लिए दें । उसके बाद खट्टो कांजी या मट्ठा में पीपर, पीपरामूल, चत्र्य, चित्रक, सोंठ और नमक मिलाकर पिलावें । अनेन कल्पेन मार्कवार्क सहचरनीपनिर्गुण्डी सुमुखसुरस कुठेरकगण्डीर कालमालकपर्णा-सक्षवकफणिऽझकब कुलकुटज सुवर्णक्षीरीस्वरसानामन्यतमस्मिन् कारयेत् पूपलिकाः; तथा किणिही किराततिक्तक सुवहानलकहरीतकीविभीतकस्वरसेषु कारयेत् पूपलिकाः; स्वरसांचै-तेषामेकैकशो द्वन्द्वशः सर्वशो वा मधुविलुलितान् प्रातरनन्नाय पातुं प्रयच्छेत् ॥ २१ ॥
और -भी इसी विधि से भृंगराज, मदार, कटसरैया, कदम्ब, मेउड़ी ( सिन्दुवार ), सुमुख, सुरस, कुठेरक, गढेर वास, काली तुलसी, पुदीना, नकचिकनी, दौना, मौलसिरी, कुरैया, भड़भाँड़ ( धमोय ), इनमें से किसी एक द्रव्य के स्वरस में रोटी बनवायें और अपामार्ग, चिरायता, निशोथ, आँवला, हरें और बहरे के स्वरस में आटा गूथ कर रोटी बनवावें और रोगी को खाने के लिए दें अथवा इन बताये हुए सभी द्र्य या एक, दो या जितना मिल सकें उनका स्वस मधु मिलाकर भोजन के पहले पीने के लिए दें ॥ २१ ॥
अथाश्वशकृदाहृस्य महति किलिञ्जक प्रस्तीयतिये शोषयित्वोदूखले क्षोदयित्वा दृषदि पुनः सूक्ष्मचूर्णानि कारयित्वा विडङ्गकषायेण त्रिफलाकषायेण वाऽष्टकृत्वो दशकृत्वो वा ss. सुपरिभाविना भावयित्वा दृषदि पुनः सूक्ष्माणि चूर्णानि कारयित्वा नवे कलशे समावाप्यानुगुप्त निधापयेत् । तेषां तु खलु चूर्णानां पाणितलं यावद्वा साधु मन्येत तत् क्षण संसृज्य क्रमिकं ष्टिने लेढुं प्रयच्छेत् ॥ २२ ॥
और भी - इसके बाद घोड़े की लीद लाकर एक बहुत बड़ी चटाई के ऊपर फैला कर धूप में सुखायें जब पूर्णरूप से सूख जाय तो ओखल में कूट कर सिल पर पीस कर खूब महीन चूर्ण बना लें, उसके बाद वायविडंग के काथ से या त्रिफला के क्वाथ से आठ बार या दस बार अच्छी प्रकार से भावना देकर सुखा लें, फिर सिल पर पीस कर महीन चूर्ण बना कर ( कपड़े में छान कर ) नये मट्टी के पात्र में सुरक्षित रूप से मुख बन्द कर रक्खें । जब आवश्यकतानुसार औषध खिलाना हो तो इस चूर्ण का पाणितल ( १ तोले भर ) या मनुष्य के प्रकृति - बल या कृमियों की अधिकता देखते हुए जितनी मात्रा में देना उचित समझें, मधु में मिला कर जिस व्यक्ति के कोष्ठ में कृमि हों उसे पीने के लिए दें ॥ २२ ॥
तथा भल्लातकास्थीन्याहृत्य कलशप्रमाणेन चापोथ्य स्नेहभाविते दृढे कलशे सूक्ष्माने-शरीरमुपवेष्टर्थं मृदावलिप्ते समावाप्योडुपेन पिधाय भूमावाकष्टं निखातस्य स्नेहभावतस्यैवान्यस्य दृढस्य कुम्भस्योपरि समारोप्य समन्ताद्गोमयैरुपचित्य दाहयेत्, स यदा जानीयात् साधु दग्धानि गोमयानि विगतस्नेहानि च भल्लातकास्थीनीति ततस्त कुम्भमुद्धरेत् । अथ तस्माद् द्वितीयात् कुम्भात् स्नेहमादाय विडङ्गतण्डुलचूर्णैः स्नेहाधंमात्रैः प्रतिसंसृज्यात सर्वमहः स्थापयित्वा ततोऽस्मै मात्रां प्रयच्छेत् पानाय; तेन साधु विरिच्यते, विरिक्तस्य चानुपूर्वी यथोक्ता । एवमेव भद्रदारुसरलकाष्ठस्नेहानुपकल्प्य पातुं प्रयच्छेत् ॥ २३ ॥
और भी - चार आढक पके हुए, भिलावे के बीज लेकर कुचल कर, एक घड़े में, जो स्नेह से १. काष्ठफलके कटे वा । २. ' लक्ष्णानि च । ३. ' क्रिमिकोष्ठाय ' इति पा ० । ४. चक्रसंमतोऽयं पाठः । ५. ' उडुपेन शरावाद्याच्छादनेन ' गङ्गाधरः ।