चरक संहिता हिन्दी भाष्य — पृष्ठ 821–830

चरक संहिता हिन्दी भाष्य · Chaukhamba · पृष्ठ 821–830

पृष्ठ 821

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७३२ चरकसंहिता भावित हो, मजवून हो, जिसकी पेंदी में अनेक सूक्ष्म छिद्र हों, जिसके मध्य भाग के ऊपर मट्टी का लेप कर मुखाया गया हो, रस कर ढक्कन से उसके मुख को बन्द कर गीली मिट्टी से दोनों के संधियों को भली प्रकार बन्द कर मुखा लें । दूसरे एक स्नेह भाविन घड़े को भूमि के अन्दर गले तक गाड़ दें, इस गड़े हुए घड़े के ऊपर उस भिलावे से पूर्ण घड़े को रख दें । यद्द् ध्यान रहे कि जो छिद्र उसमें बनाये गये हैं, वह नीचे वाले घड़े के मुख के बाहर न हो । फिर ऊपर वाले घड़े के चारों तरफ सूखे गोबर के कण्डे रख कर आग लगा दें । जब देख लें कि सारे कण्डे जल गये हैं और भिलावे के बीजों का तेल निकल कर नीचे वाले पात्र में गिर गया है । ऊपर वाले घड़े में केवल भिलावे की गुठली रह गई है, तब ऊपर वाले घड़े को हटा दें । और नीचे वाले घड़े को निकाल कर उस तैल को निकाल कर उसमें तैल से आधा वायविडंग का चूर्ण मिला कर पूरे दिन धूप में रख कर रोगी के वल के अनुसार पीने के लिए यथायोग्य मात्रा में दें । इससे उत्तम रीति से विरेचन हो जाता है । विरेचन हो जाने के बाद पेया, विलेपी, यूष, मांसरस का प्रयोग जिस प्रकार उचित वमन, विरेचन होने के बाद, विधान बताया गया है, उसी के अनुसार करें । इसी प्रकार देवदार और सुलई की लकड़ी से तैल बना कर पीने के लिए

देना चाहिए ।

अनुवासयेचेनमेनुवासनकाले ॥ २४ ॥

अनुवासन बस्ति देने के समय में इसे अनुवासन बस्ति दें ॥ २४ ॥

अथाहरेति ब्रूयात् — शारदान्नवांस्तिलान् संपदुपेतान्; तानाहृत्य सुनिष्धूनान्निष्पूय, सुशुद्वा शोधयित्वा विडङ्गकषाये सुखोप्ने प्रक्षिप्य निर्वापयेदादोषगमनात्, गतदोषान-भिसमीक्ष्य सुप्रैलूनान् प्रलुञ्चय, पुनरेव सुनिष्यूँ नान् निष्पूय, सुशुद्धाञ् शोधयित्वा, विडङ्ग-कषायेण त्रिःसप्तकृत्वः सुपरिभावितान् भावयित्वा, आतपे शोषयित्वा, उलू. ( दू ) खले संतुद्य, दृषदि पुनः लचणपिष्टान् कारयित्वा द्रोण्यामभ्यवधाय, विडङ्गकषायेण मुहुर्मुहुर-सिञ्चन् पाणिमदमेव मर्दयेत्; तस्मिंस्तु खलु प्रपीड्यमाने यत्तैलमुदियात्तत् पाणिभ्यां पर्यादाय, शुचौ दृढे कलशे न्यस्यानुगुप्त निधापयेत् ॥ २५ ॥

और भी - इसके बाद शरदऋतु में उत्पन्न, उत्तम गुणों से युक्त, नूतन निलों को लाने को कहे । उन्हें लाकर साफ कर, धोकर, शुद्ध करने के बाद उष्ण वायविडंग के क्वाथ में डालकर उतनी देर छोड़ दे जब तक उसके दोष न निकल जायें । दोषरहित देखकर अच्छी प्रकार हाथ से मसल कर भूसी को निकाल दे फिर धोकर और साफ कर बायविडंग के क्वाथ में अच्छी तरह २१ वा भावना देकर धूप में सुखा कर ओखली में कूट सिल पर महीन पीसकर टब या नाद में रखकर वायविडङ्ग क्वाथ से बार - बार सींचते हुए हाथों से मर्दन करें, बाद में मर्दन करते - करते, जब उसमें से तेल निकलने लगे तो उसे हाथों से लेकर स्वच्छ एवं दृढ़ घड़े में रख कर उस घड़े का मुख बन्द कर सावधानी से रखे ॥ २५ ॥

अथाहरेति ब्रूयात् - तिल्वको हालको द्वौ बिल्वमात्रौ पिण्डौ लक्ष्णपिष्टो विडङ्गकषायेण, तदर्धमात्रौ श्यामात्रिवृतयोः, अतोऽर्धमात्रौ दन्तीद्ववन्त्योः, अतोऽर्धमात्रौ च चव्यचित्र-१. ' चैनमत एवानुवासनकाले ' इति पा ० । २. ' मुनिपूतान् शोधयित्वा ' इति पा ० । निष्पूवेति मृत्तिकाद्यवकरान्निचित्य, शोषयित्वा प्रक्षाल्य ' चक्रः । ३. ' सुप्रशूनान् ग । ' सुप्रशूनान् स्फीतान् प्रलुच्य निस्तुषीकृत्य ' गङ्गाधरः । ४. ' सुनिष्पूनान्निष्पूय सुशुद्धाशोधयित्वा च । ५. ' सुभावितानात पे ' इति पा ० ।

पृष्ठ 822

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व्याधितरूपीयविमानाध्याय ७ ] विमानस्थानम् ७३३ कयोरिति । एतं संभारं विडङ्गकपायस्यार्धाढकमात्रेण प्रतिसंसृज्य तत्तैलप्रस्थं समावाप्य, सर्वमालोय, महति पर्योगे समासिच्यानावधिश्रित्यासने सुखोपविष्टः सर्वतः स्नेहमवलो-कयनजसं मृदग्निना साधयेदर्या सततमवघट्टयन् । स यदा जानीयाद्विरमति शब्दः, प्रशाम्यति च फेनः प्रसादमापद्यते स्नेहः, यथास्व च गन्धवर्णरसोत्पत्तिः संवर्तते च भैषज्यमङ्गुलिभ्यां मृद्यमानमनतिमृनतिदारुणमनङ्गुलिग्राहि चेति, स कालस्तस्यावतार-णाय । ततस्तमर्वतार्य शीतीभूनमहतेन वाससा परिपूय, शुचौ दृढे कलशे समासिच्य, पिधानेन विधय, शुक्लेन वस्त्रपट्टेनावच्छाद्य, सूत्रेण सुबद्धं सुनिगुप्तं निधापयेत् । तस्मै मात्रां प्रयच्छेत् पानाय, तेन माधु विरिच्यते; सभ्यपतदोषस्य चानुपूर्वी यथोक्ता । ततश्चैनमनुवासयेदनुवासनकाले । एतेनैव च पाकविधिना सर्षपातपीकर ञ्जकोषात की-स्नेहानुपकल्प्य पाययेत् सर्वविशेषानवेक्षमाणः । तेनागदो भवति ॥ २६ ॥

और भी - इसके बाद तिल्क ( पठानीलोध ), बनैला कोदो इन दोनों को १-१ पल लाओ ऐसा रोगी से कह कर मँगावे । आ जाने पर इन तिल्वक और वनैला कोदो के हो पलों को वायविडङ्ग काय की सहायता से अच्छी प्रकार महीन पीस कर दो पिण्ड रखे । तब उससे आधे प्रमाण में अर्थात् २ - २ तोले काली निशोथ और श्वेत निशोथ के पीसे हुये दो पिण्ड ले | इससे आधे ( १-२ तोले ) दन्ती के मूल और द्रवन्ती के मूल के महीन पीसे हुए दो पिण्ड, इससे आधे प्रमाण से चव्य ( चान ), चित्ता के मूल के ३३ तोले के पीसे हुए दो पिण्डों को भी अलग - अलग बना कर रख लें । इन सब को आधा आढक ( दो प्रस्थ या दो सेर ) वायविडङ्ग के काथ में निश्रित कर उसी में पहले के बनाये तिल तेल को १ प्रस्थ ( १ सेर ) के प्रमान में लेकर डाल दें । अच्छी प्रकार जालोडन कर एक बड़े कड़ाहे में डालकर आग पर पकाने के लिये चढ़ा दें और तैलपाचक वैद्य सुपूर्वक आराम से बैठकर पकते हुये तेल को ध्यानपूर्वक देखते हुए कलछी से बराबर चलाने नये मुटु आँच से तेल को पकायें । जब यह समझ ले कि अब शब्द नहीं उठ रहा है, फेन शान्त हो गया है, तैल स्वच्छ हो रहा है, द्रव्य के अनुसार तेल में गन्ध, वर्णं ( तेल ( का रंग ) और रस की उत्पत्ति हो गयी है, औषधकल्क की अङ्गुलि से गोली बनाई जाय तो गोली बन रही है, औषधिकल्क को लेकर हाथ से मर्दन किया जाय तो न अधिक कोमल हो, न अधिक कठोर हो और अगुलियों में सटता भी न हो तब समझें कि अब तैल को आग पर से उतारने का समय आ गया है । तब उसके वाद उसे उतार ले । जब उतार लेने पर शीतल हो जाय तो साफ नूतन कपड़े से छान कर पवित्र ( साफ ), मजबूत, पात्र में रख ढक्कन से ढक कर सफेद वस्त्र से मुख को ढक एक अच्छे दृढ़ डोरे मे मुख को बाँधकर सावधानी में रखे । तब बल, वीर्य, शरीर और दोप दृष्यों का ध्यान रखते हुये मात्रा से रोगी को पीने के लिए दे । इससे उत्तन विरेचन होता है । दोपों के भलीभाँति निकल जाने पर वमन विरेचन होने के बाद जो भोजन और नियम आदि का विधान है उसका उसी प्रकार सेवन कराना चाहिए । तब अनुवासन का समय प्राप्त होने पर अनुवासन बस्ति दें । इसी स्नेह पकाने के नियमों से सरसों, अलसी ( तीसी ), करअ ( डिटोहरी ), कोपातकी ( कडुई तरोई ) के तेलों को बनाकर सभी परीक्षाओं से परीक्षित कर रोगियों के अवस्थान्तरों को समझ कर पिलाये । इससे रोग से छुटकारा हो जाता है ॥ २६ ॥

विमर्श - उपर्युक्त गद्य में ' प्रशाम्यति फेनः से फेन का शान्त होना बनाया गया है । अन्यत्र तैल - पाक के अन्त में फेन की उत्पत्ति मानी गयी है - ' यदा फेनोद्रमस्तैले फेनशान्तिश्च सर्पिषि । ' १. ' ततस्तैलप्रस्थमावाप्य ' इति पा ० । २. ' ततस्तमवहृत्य ' ग. ।

पृष्ठ 823

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७३४ चरकसंहिता इस प्रकार के विरुद्ध वचन का समाधान इस प्रकार किया जा सकता है कि यद्यनेि यह प्रकरण तैल - सिद्धि के लिए है, पर सामान्यतः सह सिद्धि को ध्यान में रख कर यह वाक्य कहा गया है, और स्नेहों में प्रधान घृत होता है, यथा- ' घृततैलव सामज्जा स्नेहोद्दिष्टश्चतुर्विधः । तत्रापि चोत्तमं सर्पिः संस्कारस्यानुवर्तनात् ॥ ' यहाँ भी स्नेह प्रधान वृत की ही सिद्धि लिखी है । एवं द्वयानां श्लेष्मपुरीषसंभवानां क्रिमीणां समुत्थान संस्थानवर्णनामप्रभावचिकिस्पित विशेषा व्याख्याताः सामान्यतः । विशेषतस्तु स्वत्वमात्रमास्थापनानुवामनानुलोमहरण-भूयिष्ठं तेष्वेवौषधेषु पुरीषजानां किमीणां चिकित्पितं कर्तव्यं, मान्त्राधिकं पुनः गिरोविरे-चनवमनोपशमनभूयिष्ठं ते वेवौषधेषु श्लेष्मजानां क्रिमीणां चिकित्सितं कार्यम; इत्येष क्रिमिना भेषजविधिरनुव्याख्यातो भवति । इस प्रकार कफज एवं मलज दोनों प्रकार के कृमियों के निदान, स्थान, आकार, वर्ग ( रूप ), नाम, प्रभाव और चिकित्सा के भेदों की व्याख्या सामान्य रूप से बनाई गई है । विशेष रूप से बनाए हुए उपर्युक्त क्रिमिन औषधों में से कोई औपध लेकर अल्प मात्रा में, आस्था-पन, अनुवासन, अनुलोमहरण ( विरेचन ) द्वारा पुरीषज क्रिमियों की चिकित्सा करनी चाहिए और कफज क्रिमियों में, अधिक मात्रा में. शिरोविरेचन ( नस्य ), वमन, शमन के लिए औषधियाँ करनी चाहिए । इस प्रकार यह किनिन औषयों की व्याख्या की गई । विमर्श - सामान्यतः पुरीपन में वस्ति और विरेचन और कफज में वनन और नस्य एवं औषध प्रयोग में कमियों को शान्त किया जाता है पर पुरीषत्र क्रिमियों को औषध प्रयोग से शान्त नहीं किया जाता, उनका निकालना ही उत्तम औषध है । मनिष्ठता यथास्वं हेतवर्जने प्रयतितव्यम् । यथोद्देशमेवमिदं किमिकोष्टचिकिस्मतं यथावदनुव्याख्यातं भवति ॥ २७ ॥

( ३ ) निदानपरिवर्जन - • इन बनाई हुई विधियों का सेवन करते हुए अपने - अपने रोग-हेतुओं का त्याग करने में प्रयास करना चाहिए । इस प्रकार उद्देश के अनुसार कृमिकोष्ठ ( कफज एवं पुरोषज ) वाले पुरुषों की चिकित्सा - व्याख्या कर दी गई ॥ २७ ॥

भवन्ति चात्र-अपकर्षणमेवादौ क्रिमीणां भेषजं स्मृतम् ।

तो विघातः प्रकृतेर्निदानस्य च वर्जनम् ॥ २८ ॥

अयमेव विकाराणां सर्वेषामपि निग्रहे ।

विधिविधा योऽयं क्रिमीनुद्दिश्य कीर्तितः ॥ २ ९ ॥

संशोधनं संशमनं निदानस्य च वर्जनम् ।

एतावद्भिषजा कार्य रोगे रोगे यथाविधि ॥ ३० ॥

उपसंहार - • सर्वप्रथम कृमियों का अपकर्षण ( खींच कर निकालना ) करना ही औषध माना है, इसके बाद प्रकृति का विधान, निदान का त्याग करना । कृमियों को ध्यान में रखकर ये जो चिकित्सा के तीन प्रकार बताये गये है ये सभी प्रकार, सभी प्रकार के रोगों का नाश करने में समर्थ होते है । वह कौन सी विधि है उसे बनाते है - संशोधन, संशमन और निदान ( रोग के कारणों ) का परित्याग करना । वैद्य को प्रत्येक रोग में इन तीनों का प्रयोग विधिपूर्वक करना चाहिए ॥ २८-३० ॥ १. ' क्रिमीणां पुरीषसंभवानां ' ग. ।

पृष्ठ 824

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रोग भिषग्जितीय विमानाध्याय: ८ ] विमानस्थानम् तत्र श्ल कौ ७३५ व्याधितौ पुरुषौ ज्ञाज्ञौ भिषजौ सप्रयोजनौ । विंशतिः क्रिमयस्तेषां हेत्वादिः सप्तको गणः ॥

उक्त व्याधितरूपीये विमाने परमर्षिणा । शिष्य संबोधनार्थाय व्याधिप्रशमनाय च ॥३२ ॥

इत्यनिवेशकृते तन्त्रे चाकप्रतिसंस्कृते विमानस्थाने व्याधितरूपीय विमानं नाम सप्तमोऽध्यायः ॥ अध्याय की सूची - • दो व्याधित पुरुष, बुद्धिमान् वैध और अज्ञ वैद्य, उन दोनों वैद्यों का प्रयोजन ( कार्य और कार्य - फल ), २० बीस प्रकार के कृमि, उनके हेतु आदि सात गण जैसे हेतु, स्थान, आकार, रूप, नाम, प्रभाव और चिकित्मा का वर्णन, ये सभी बार्ने परमर्षि आत्रेय ने शिष्यों को ममझाने के लिए और रोगों को शान्त करने लिए इस व्याधितरूपीय विमान स्थान में कही हैं ॥ इस प्रकार चरक द्वारा प्रतिसंस्कृत अग्निवेश कृन तन्त्र ( चरकसंहिता ) के विमानस्थान नें व्याधितरूपीयविमान नामक सप्तम अध्याय समाप्त हुआ ॥ ७ ॥

अथाष्टमोऽध्यायः अथातो रोगभिषग्जितीयं विमानं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥

इति ह म्माह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥

अब रोगभिषग्जितीय नामक विमान स्थान की व्याख्या की जायगी जैसा कि भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥ १-२ ॥ विमर्श - विमान स्थान के पूर्वोक सात अध्यायों में रस, दोष, द्रव्य और विकार आदि के मान - ज्ञान का निरूपण अनेक प्रकार से किया गया है । अच्छे वैद्यों को उपयुक्त ज्ञान इसी से हो सकता है, परन्तु जब तक अच्छे वैद्य की परिभाषा तथा आचार्यों के सूत्र रूप में उपदेश समझने का ढंग आदि का वर्णन जिज्ञासुओं की जानकारी के लिए न किया जाय तत्र तक उसका पूर्णज्ञान नहीं हो सकता । अतः इस आठवें रोगभिषग्जितीय नामक विमान की व्याख्या अभीष्ट हुई । रोगों की चिकित्सा का अधिकार कर यह अध्याय कहा गया है अतः इसका रोगभिषग्जितीय नाम रखा गया है । यह चिकित्सा का ज्ञान भी अच्छे वैद्य होने पर ही निर्भर है इसलिए सर्वप्रथम बैद्य बनने की इच्छा रखने वाले पुरुष के कर्तव्य का सङ्केन निम्नलिखित पदों द्वारा किया गया है । बुद्धिमानात्मनः कार्यगुरुलाघवं कर्मफलमनुबन्धं देशकालौ च विदित्वा युक्तिदर्शना-द्विषम्बुभूषुः शास्त्रमेवादितः परीक्षेत । विविधानि हि शास्त्राणि भिषजां प्रचरन्ति लोकें; तत्र यन्मन्येत सुमहद्यशस्विवीरपुरुषासेवितमर्थबहुलमाप्तजन पूजितं त्रिविधशिष्य बुद्धि-हितमपगतपुनरुक्तदोषमाषं सुप्रणीत सूत्रभाष्य सग्रहक्रमं स्वाधार मनवपतितशब्द मकष्टशब्द पुष्कलाभिधानं क्रमागतार्थमर्थतत्वविनिश्चयप्रधानं सगतार्थमसंकुलप्रकरणमाशु प्रबोधकं लक्षणवञ्च्चोदाहरणवच्च, तदभिप्रपद्येत शास्त्रम् । शास्त्रं ह्येवंविधममल इवादित्यस्तमो विधूय प्रकाशयति सर्वम् ॥ ३ ॥

१. ' कार्यगुरुलाघवे ' इति पा ० । २. ' स्वाधारं शोभनाभिधेयम्, अनवपतितमग्राम्यशब्द ' चनः ।

पृष्ठ 825

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७३६ चरकसंहिता ( क ) शास्त्र - परीक्षा ( Selection of the Branch of Medical Science ) शास्त्र- परीक्षा - बुद्धिमान् पुरुष अपने कार्य ( कर्तव्य ) की गुरुता ( कठिनता ), लघुता ( सरलता ). कर्मफल ( धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष आदि किसी भी एक विषय को लेकर अध्ययन में प्रवृत्त होना ), अनुबन्ध ( कर्म से होने वाले शुभ या अशुभ अर्थात् इस शास्त्र को पढ़ने से अच्छा फल होगा या बुरा ), देश और काल ( कर्त्तव्य कार्य के अनुसार देश - काल है या नहीं ) को जान कर और युक्तिपूर्वक सोच कर जब वैद्य बनने की इच्छा करें तो सर्वप्रथम शास्त्र की ही परीक्षा करें । क्योंकि वैद्यों के अनेक प्रकार के शास्त्र संसार में प्रचलित हैं । इनमें जिसे समझे कि बहुत बड़े यशस्वी और धीर पुरुषों से सेवित ( पढ़ा जाता ), विषय - बहुल, आप्तजनों से पूजित, उत्तम, मध्यम और अल्प बुद्धि वाले शिष्यों के लिए लाभप्रद, पुनरुत दोष से रहित, ऋषि से बनाया गया. सम्यक् रचित सूत्र, भाष्य और संग्रह के क्रम वाला, सुन्दर अर्थ वाला, अनवपतित शब्द ( जिसमें ग्राम्य शब्दों का प्रयोग न हो ) वाला, जिसके उच्चारण में कष्ट न हो ऐसे शब्दों से युक्तः विषय का वर्णन अधिक रूप में किये गये प्रकरण क्रम से विषयों के सन्निवेश वाला, अर्थतत्त्व को निश्चय करने में प्रधान, सङ्गतार्थ ( पूर्व - पर के वाक्यों में विरुद्धता न पाई जाती हो ऐसा प्रकरण के अनुसार विषय वाला ), असंकुल प्रकरण ( जिसमें दूसरे प्रकरण का विषय दूसरे में और दूसरे का दूसरे में न कहा गया हो ). शीघ्र अर्थ को बनाने में समर्थ, लक्षण और उदाहरण वाला हो उसी शास्त्र ( ग्रन्थ ) को अध्ययन के लिए चुने । इस प्रकार सर्वगुणसम्पन्न शास्त्र जिस प्रकार स्वच्छ सूर्य अन्धकार को दूर कर घटपटादि विषयों को प्रकाशित करता है उसी प्रकार अज्ञान रूपी अन्धकार को दूर कर शास्त्रीय विषयों का प्रकाश करता है ॥ ३ ॥

विमर्श - इस गद्य में पुनरक्त दोष से रहित होना शास्त्र की परीक्षा बताई गई है । इस वाक्य में पुनरुक्त न हो ऐसा भी कहने से दुबारा बार - बार पढ़ना यह दोष मान लिया जायगा । दोष शब्द को नाम लेकर क्यों कहा- इस बात पर आचार्य चक्रपाणि ने समाधान इस प्रकार किया है - ' अपगतपुनरुक्तमिति कर्त्तव्ये यद्दोषपाठं करोति तेन अधिकरणवशप्राप्तं यत् करोति नत् पुनरुक्तमदोघं भवति ' अर्थात् जो अर्थ प्रकरण प्राप्त दो बार भी कहा जाय तो भी पुनरुक्त दोषयुक्त नहीं होता - क्योंकि पुनरुक्त दोष निम्न स्थानों में नहीं जाना जाता - ' अधिकरणवशाद्दीर्घाद् गुणदोषप्राप्तितोऽर्थसम्बन्धात् । स्तुत्यर्थ संशयतः शिष्यधियां चाभिवृद्ध्यर्थम् ॥ अल्पतोऽन्तरि-नत्वाद्विशेषणेष्वपि च तन्त्रवृद्धिस्तु । यत्तन्त्रं स्यात् पुनरुक्तं नेष्यते तद्विभाव्य विवरणम् ॥ ' इस गद्य-में उत्तम शास्त्र वह माना गया है जिसमें - सूत्र, भाष्य और संग्रह - क्रम ठीक हो । सूत्र, उसका लक्षण यह है, यथा — ‘ अल्पाक्षरत्वे सति बह्वर्थबोधकत्वं सूत्रत्वम् ' – जो अल्प अक्षरों का समुदाय होते हुए भी बहुत अर्थों को बताने वाला हो । भाष्य का यह लक्षण है - ' सूत्रार्थो वर्ण्यते यत्र एद्रः सूत्रानुसारिभिः । स्वपदानि च वर्ण्यन्ते भाष्यं भाष्यविदो विदुः ॥ ' सूत्रों के अनुसार पदों द्वारा सूत्रों का अर्थ जहाँ वर्णित हो और रचयिता ने अपने विचारों को भी पदों द्वारा जहाँ स्पष्ट किया हो उसे भाष्य कहते हैं । ॐ ततोऽनन्तरमाचार्यं परीक्षेत; तद्यथा - पर्यवदातश्रुतं परिदृष्टकर्माणं दक्षं दक्षिणं शुचिं जितहस्तमुपकरणवन्तं सर्वेन्द्रियोपपन्नं प्रकृतिज्ञं प्रतिपत्तिज्ञमनुपस्कृत विद्यमनहङ्कृतमन-१. ' उपस्कृतविद्यम् ' इति पा ० ।

पृष्ठ 826

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रोगमिषग्जितीयविमानाध्यायः ८ ] विमानस्थानम् ७७३ सूयकमकोपनं क्लेशतमं शिष्यवत्सलमध्यापक ज्ञापनसमर्थं चेति । एवंगुणो ह्याचार्यः सुक्षेत्रमार्तवो मेघ इव शस्य गुणैः सुशिप्यमाशु वैद्यगुणैः सं गदयति ॥ ४ ॥

( ख ) आचार्य - परीक्षा ( Search for Professor ) आचार्य परीक्षा शास्त्र परीक्षा करने के बाद आचार्य ( गुरु ) की परीक्षा करें । जैसे — जो पर्यवदात ( शास्त्र के मर्मों से अच्छी प्रकार परिचित होने से निर्मल ज्ञान युक्त ), चिकित्सा के प्रत्येक कर्म को बार - बार प्रत्यक्ष देखने वाला, दक्ष ( जिसकी बुद्धि अत्यन्त तेज होने के कारण प्रत्येक कार्य एवं प्रश्न के विषय में औचित्य का निर्णय शीघ्र कर लेती हो ), दक्षिण ( प्रत्येक कार्य करने में कुशल ), पवित्र हो, जिसका हाथ यशस्वी हो या प्रत्येक कार्य करने में अभ्यस्त हो, चिकित्सा में प्रयुक्त होने वाली सारी सामग्री से सम्पन्न हो, सभी इन्द्रियों से सम्पन्न हो ( अन्धा, लँगड़ा, काना न हो ), प्रकृतिज्ञ ( स्वभाव ) को जानने वाला हो, प्रतिपत्तिज्ञ ( कर्तव्य को जानने वाला हो ), अनुपस्कृतविद्य ( अविकृत विद्या वाला ), अहङ्कारशून्य, झूठा आरोप लगा कर दूसरे की निन्दा न करने वाला, अक्रोची, क्लेश ( कठिनाइयों ) का सामना करने वाला, शिष्यों पर प्रेम रखने वाला, अध्यापन में समर्थ, विषयों को समझाने में चतुर, इन गुणों से युक्त अध्यापक सुयोग्य शिष्यों को वैसे ही वैद्य के गुणों से शीघ्रयुक्त कर देता है, जिस प्रकार अच्छे उपजाऊ जोते हुए खेत को ऋतुकालीन मेघ शस्य ( अन्न ) से सम्पन्न कर देता है ॥ ४ ॥

तमुपसृत्यारिराधयिषुरुपचरेदग्निवच्च देववच्च राजवश्ञ्च पितृवच्च भर्तृवच्चाप्रमत्तः । ततस्त-स्प्रसादात् कृत्स्नं शास्त्रमधिगम्य शास्त्रस्य दृढतायामभिधानस्य सौष्ठवेऽर्थस्य विज्ञाने वचन-शक्तौ च भूयो भूयः प्रयतेत सम्यक् ॥ ५ ॥

( ग ) शास्त्र ज्ञान के साधन ( Means of Learning for Medical Science ) ज्ञान के उपाय — इन उपर्युक्त गुणों से युक्त आचार्य ( गुरु ) के पास जाकर आराधना करने की इच्छा वाला, प्रमादरहित होकर अग्नि की तरह, देवता की तरह, राजा की तरह, पिता की तरह, स्वामी की तरह, सावधान होकर सेवा करे । उसके बाद उस गुरु की प्रसन्नता से सम्पूर्ण शास्त्र का अध्ययन कर शास्त्र के अध्ययन में दृढ़ता और अध्ययन किये हुए विषयों को उचित रूप में प्रतिपादन करने की सुन्दरता लाने में, अर्थ को समझने में, वचन - शक्ति अर्थात् व्याख्यान के द्वारा दूसरों को समझाने की शक्ति मुझमें हो जाय इसके लिए बार - बार अच्छी प्रकार से प्रयास करना चाहिए ॥ ५ ॥

छ तनोपायाननुव्याख्यास्यामः - अध्ययनम्, अध्यापनं, तद्विद्यसंभाषा चेत्युपायाः ॥ ६ ॥

कुशल वैद्य बननें के उपाय - शास्त्र की दृढ़ता में तत्पर होने के लिए उपायों की जाती है । अध्ययन, अध्यापन और तद्विद्यसम्भाषा ये तीन उपाय है ॥ ६ ॥ की व्याख्या

तत्रायमध्ययनविधिः — कव्यः कृतक्षणः प्रातरुत्थायोपव्यूषं वा कृत्वाऽऽवश्यकमुपस्पृश्यो-दकं देवर्षिगोब्राह्मणगुरुवृद्धसिद्धाचार्येभ्यो नमस्कृत्य समे शुचौ देशे सुखोपविष्टोमनःपुरः-१. ' तत्रोपायान्ते व्याख्यास्य इति पा ० । २. ' उपव्यूषं किञ्चिच्छेषायां रात्रौ' चक्रः । ४७ च ० सं ०

पृष्ठ 827

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७३८ चरकसंहिता सराभिर्वाग्भिः सूत्रमनुक्रामन् पुनः पुनरावर्तयेद् बुद्ध्वा सम्यगनुप्रविश्यार्थतस्वं स्वदोषपरि-हारार्थं परदोषप्रमाणार्थं च; एवं मध्यन्दिनेऽपराह्णे रात्रौ च शश्वदपरिहापयन्नध्ययनमभ्य-स्येत् । इत्यध्ययनविधिः ॥ ७ ॥

( १ ) अध्ययन विधि ( Method of Study ) ( १ ) अध्ययन विधि - कल्य ( स्वस्थ ) और कृतक्षण ( सारे व्यापारों को छोड़ केवल आयुर्वेद अध्ययन के संकल्प वाले ) छात्र प्रातःकाल या उपव्यूष काल ( कुछ रात्रि शेष रहे ) में उठ कर आवश्यक शौचादि क्रिया करने के बाद स्नान, संध्या, आचमन, देवता, ऋषि, गौ, ब्राह्मण, गुरु, वृद्ध, सिद्ध और आचार्यों को नमस्कार करके समतल, पवित्र स्थान में सुखपूर्वक बैठकर, अपने दोष एवं त्रुटियों के दूर करने के हेतु और दूसरे के दोष और त्रुटियों को जानने के लिए अर्थतत्त्व को भली प्रकार जान कर एकाग्रमन से आयुर्वेद सूत्रों को जिस क्रम से अध्ययन किया हो उसका उसी क्रम से बार बार आवृत्ति ( दोहरायें ) करें । इसी प्रकार मध्याह्न, सायंकाल, रात्रि में निरन्तर समय को व्यर्थ न विताते हुये शास्त्रों का अभ्यास करे, यह अध्ययन की विधि है ॥ ७ ॥

अथाध्यापन विधि - अध्यापने कृतबुद्धिराचार्यः शिष्यमेवादिनः परीक्षेत; तद्यथा-प्रशान्तमार्य प्रकृति कम क्षुद्रकर्माणमृजुचतुर्मुखनासावंशं तनुरक्तविशदजिह्वमविकृतदन्तोष्ठम-मिन्मिनं धृतिमन्तमनहङ्कृतं मेधाविनं वितर्कस्मृतिसंपन्नमुदारसत्वं तद्विद्यकुलजमथवा तद्विद्यवृत्तं तत्त्वाभिनिवेशिनमव्यङ्गमव्यापन्नेन्द्रियं निभृतमनुद्धतमर्थतस्वभावकमको पनम-व्यसनिनं शीलशौचाचारानुरागदाच्यप्रादक्षिण्योपपन्नमध्ययनाभिकाममर्थविज्ञाने कमदर्शने चानन्यकार्य मलुब्धमनलप्तं सर्वभूतहितैषिणमाचार्य सर्वानुशिष्टिप्रतिकरमनुरक्तं च, एवं. गुणसमुदितमध्याप्यमाहुः ॥ ८ ॥

( २ ) अध्यापन विधि ( Method of Teaching ) ( २ ) अध्ययनार्थं शिष्य परीक्षा [ Medical Examination ] - अब इसके बाद अध्यापन विधि -- छात्रों को पढ़ाने की इच्छा ( बुद्धि ) रखने वाले आचार्य प्रारम्भ में शिष्य की ही परीक्षा करें, जैसे-- शान्त प्रकृतिवाला, आर्य ( श्रेष्ठ ) स्वभाव वाला अक्षुद्र ( उत्तम ) कार्यों को करने वाला, सीधे नेत्र, मुख और नासावंश वाला, पतली, रक्त, विशद, जिह्वा वाला, अविकृत दन्त और ओष्ठवाला, एवं मिनू - मिन् न बोलने वाला, धैर्यसम्पन्न, अहङ्कार-रहित, धारण करने की उत्तम शक्ति वाला, तर्क एवं स्मरण शक्ति सम्पन्न, उदार मन वाला, वैद्य के कुल में उत्पन्न हुआ, अथवा वैद्यों के आचार - विचार से भली प्रकार परिचित अर्थं तत्त्व को जानने में अभिनिवेश ( प्रबल इच्छा ) वाला, अविकृत अङ्ग वाला, सभी इन्द्रियों से युक्त विश्वासपात्र, अनुद्धत अर्थं तत्त्व का चिन्तक, शील, शौच, ( पवित्रता ), आचार, अध्ययन में प्रेम, चतुरता, एवं अनुकूलता से युक्त अध्ययन करने का अत्यन्त इच्छुक, शास्त्र के अर्थ को समझने और प्रत्यक्ष कर्म देखने के लिये एकाग्र मन से तत्पर, लोभरहित, आलसरहित, सभी प्राणियों के हित को चाहनेवाला, गुरु के प्रत्येक आज्ञाओं और उपदेशों को मानने वाला और गुरु में प्रेम रखने वाला ऐसे सभी गुण सम्पन्न छात्र को आयुर्वेद पढ़ाने योग्य कहते हैं ॥ ८ ॥

१. ' बुद्धया ' इति पा ० । ३. ' अलङ्कृतं ' ग. | २. ' परदोषप्रमाणार्थं परकीयाध्ययनदोषज्ञानार्थम् ' चक्रः । ४. ' अनुद्धतवेशम् ' इति पा ० । ५. ' सर्वाशिष्टिप्रतिपत्तिकरम् ' इति पा ० ।

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रोगभिषग्जितीयविमानाध्यायः ८ ] विमानस्थानम् ७३६ विमर्श -- इसी प्राचीन परिपाटी को ध्यान में रखकर आधुनिक जगत में Medical College में छात्रा के प्रवेश के समय Competative Examination में उत्तीर्ण होने पर ही प्रवेश होता है । जो अयोग्य होते हैं उन्हें छाँट दिया जाता है । प्राचीनकाल में भी योग्यता की परीक्षा करने पर ही आयुर्वेद अध्ययन के लिए आज्ञा दी जाती थी । सुश्रुत ने भी शिष्यों की परीक्षा करने की विधि ठीक इसी प्रकार बताई है जिसमें कुछ विशेषता है । यथा - ' ब्राह्मणक्षत्रियवंश्या-नामन्यतममन्वयवयःशीलशौर्य - शौचाचारविनयशक्तिबलमेधाधृतिस्मृतिमतिप्रतिपत्तियुक्तं तनुजिहौ-उदन्ताग्रमृजुवक्त्राक्षिनामं प्रसन्नचित्तवाक्चेष्टं क्लेशसहञ्च भिषक् शिष्यमुपनयेत् । अतो विपरीत-गुणं नोपनयेत् ' । एवंविधमध्ययनार्थिनमुपस्थितमारिराधयिषुमाचार्योऽनुभाषेत - उदगयने शुक्लपचे प्रशस्तेऽहनि तिष्यहस्तश्रवणाश्वयुजामन्यतमेन नक्षत्रेण योगमुपगने भगवति शशिनि कल्याणे च करणे मैत्रे मुहूर्ते मुण्ड कृतोपवासः स्रातः काषायवस्त्रसवीतः सगन्धहस्तः समिधोऽग्निमाज्यमुपलेपनमुदकुम्भान् माल्यदामदी पहिरण्य हेमेर जन मणिमुक्ता विद्रुमदौ-परिधीन् कुशला जसर्षपक्षतांश्च शुक्लानि सुमनांमि प्रथिताग्रथितानि मेध्यान् भक्ष्यान् गन्धश्च दृष्टानादायोपनिष्ठस्वेति ॥ ९ ॥

अध्यापन का प्रारम्भ [ Begining of Session ] और भी - आचार्य की आराधना का इच्छुक, ऊपर बनाये हुये गुणों से युक्त छात्र गुरु के पास आवे तो गुरु कहे कि उत्तरायण के शुक्ल पक्ष में अच्छे दिन को पुष्य, हस्त, श्रवण, अश्विनी इनमें से किसी एक नक्षत्रों के सा । कल्याण-कारक भगवान् चन्द्रमा से योग होने पर कल्याण कारक, करण और मैत्र मूहुर्त में मुण्डन कराकर एक दिन पहले उपवास अर्थात् व्रत करने के बाद स्नान कर कषाय वस्त्र पहन कर हाथ में सुगन्धित द्रव्य, समिध ( हवन करने की लकड़ी ), अग्नि, घी, लेप द्रव्य, जल के घड़े, माला, दाम ( हार ), दीप, सुवर्ण, हेम ( सुवर्ण से बने हुए आभूषण ), चाँदी, मणि, मोती, मूँगा, क्षौम - परिधि ( अलसी के तन्तुओं से निर्मित वस्त्र ), कुश, धान का लावा, सरसों, अक्षत और सफेद फूल जो कुछ छुट्टे फूल हो, कुछ के माले बने हों मेध्य ( बुद्धिवर्धक ) भक्ष्य और गंध एवं घिसा हुआ चन्दन इन सामग्रियों को लेकर तुम आओ ॥ ९ ॥

तथा कुर्यात् ॥ १० ॥

वह ऐसा करें ॥। १० ॥

तमुपस्थितमाज्ञाय समे शुचौ देशे प्राकप्रवणे उदकप्रवणे वा चतुष्किष्कुमात्रं चतुरस्रं स्थण्डिलं गोमयोदकेनोपलिप्तं कुशास्तीर्ण सुपरिहितं परिधिभिश्चतुर्दिशं यथोक्तचन्दनोद-कुम्भक्षौमहेमहिरण्यरजत मणिमुक्ताविदुमालङ्कृतं मेध्यभक्ष्यगन्धशुक्लपुष्पलाजसर्षपाक्षतो-पशोभितं कृत्वा, तत्र पालाशीभिरैडुदीभिरौदुम्बरीभिर्माधुकीभिर्वा समिद्भिरग्निमुपसमा -धाय प्रामुखः शुचिरध्ययन विधिमनुविधाय मधुमर्विभ्यां त्रित्रिर्जुहुयादग्निमाशीः संप्रयुक्त-ह्माणमधिन्वन्तरिं प्रजापतिमश्विनाविन्द्रमृषींश्च सूत्रकारानभिमन्त्रयमाणः पूर्व स्वाहेति ॥ ११ ॥

और भी - इस प्रकार सर्वगुणसम्पन्न शिष्य सभी सामग्रियों को लेकर आ गया है । कर समतल, पवित्र, भूमि, जो पूर्वतरफ या उत्तर तरफ ढालू हो वहाँ पर चार हॉ, लम्बा १. ' हिरण्यशब्देनाघटितं हेम गृह्यते, हेमशब्देन च घटितम् ' चक्रः । २. ' परियो होमकुण्डचतुःपार्श्वे स्थाप्याः पलाशादिदण्डा उच्यन्ते ' चक्रः । म झ ड़ी ३. ' अथ सोऽपि तथा ' इति पा ० । ४. ' सूपविहितं ' ग. ।

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७४० चरकसंहिता एक वेदी बना कर, गोवर और जल से लीपने के बाद कुशा विद्या, चारों दिशाओं में परिधियों से अच्छी प्रकार वेष्टित करके कहे गए चन्दन, जल से भरे हुये घड़े, रेशमी वस्त्र, सुवर्ण के आभूषण तथा टुकड़े, चाँदी, मणि, मोती और मूँगा से अलंकृत कर और पवित्र भक्ष्य, गंध, सफेद फूल, धान के लावा, सरसों एवं अक्षत से सजाकर पलाश, हिंगोट, गूलर या महुआ की लकड़ी से अनि का आधा न करके, पूर्व मुख होकर पवित्र अध्ययन विधि के अनुसार ब्रह्मा, अग्नि, धन्वन्तरि, प्रजापति अश्विनीकुमार, इन्द्र, ऋषि और सूत्रकारों को अभिमंत्रित करके आशीर्वाद युक्त मंत्रों से प्रथम ' स्वाहा ' ऐसा कहते मधु और घृत से तीन - तीन बार अग्नि में होम करें ॥ ११ ॥

शिष्यश्चैनमन्वालभेत । हुत्वा च प्रदक्षिणमग्रिमनुपरिक्रामेत् । परिक्रम्य ब्राह्मणान् स्वस्ति वाचयेत्; भिषजश्वाभिपूजयेत् ॥ १२ ॥

शिष्यकर्त्तव्य - इसके बाद शिष्य होम करे, हवन करके अग्नि की परिक्रमा करे, परिक्रमा करके ब्राह्मणों द्वारा स्वस्तिवाचन करावे और वैद्यो की पूजा करे ॥ १२ ॥

अथैनमग्निकाशे ब्राह्मणसकाशे भिषक्सकाशे चानुशिष्यात् - ब्रह्मचारिणा श्मश्रु-धारिणा सत्यवादिनाऽमांसादेन मेध्यसेविना निर्मात्परेणाशस्त्रधारिणा च भवितव्यं, न च ते मद्वचनात् किञ्चिदकार्यं स्यादन्यत्र राजद्विष्टात् प्राणहराद्विपुलादधर्म्यादनर्थसंयुक्ताद्वा-s यर्थात्; मदर्पणेन मत्प्रधानेन मदधीनेन मत्प्रियहितानुवर्तिना च शश्वद्भवितव्यं पुत्रवद्दा-सवदर्थिवञ्चोपचरताऽनुवस्तव्योऽहम्, अनुरसेकेनावहितेनानन्यमनसा विनीतेनावेक्ष्या-वेच्य कारिणाऽनसूयकेन चाभ्यनुज्ञातेन प्रविचरितव्यम्, अनुज्ञातेन ( चाननुज्ञातेन च ) प्रविचरता पूर्वं गुर्वर्थोपाहरणे यथाशक्ति प्रयतितव्यं, कर्मसिद्धिमर्थसिद्धिं यशोलाभ प्रेत्य च स्वर्गमिच्छता भिषजा स्वया गोब्राह्मणमादौ कृत्वा सर्वप्राणभृतां शर्माशासितव्यमह रहरुत्तिष्ठता चोपविशता च, सर्वात्मना चातुराणामारोग्याय प्रयतितव्यं, जीवितहेतोरपि चातुरेभ्यो नाभिद्रोग्धव्यं, मनसाऽपि च परस्त्रियो नाभिगमनीयास्तथा सर्वमेव परस्वं निभृतवेशपरिच्छदेन भवितथ्यम्, अशौण्डेनापापेनापापसहायेन च लचणशुलधर्म्यशय-धन्यसत्यहितमितवचसा देशकालविचारिणा स्मृतिमता ज्ञानोत्थानोपकरण संपत्सु नित्यं यत्नवता च; न च कदाचिद्राजद्विष्टानां राजद्वेषिणां वा महाजनद्विष्टानां महाजन द्वेषिणां वाऽप्यौषधमनुविधातव्यं, तथा सर्वेषामत्यर्थविकृतदुष्टदुःखशीलाचारोपचाराणामनपवा-दप्रतिकाराणां मुमूर्पूणां च तथैवासन्निहितेश्वराणां स्त्रीणामनध्यक्षाणां वा; न च कदाचित् स्त्रीदत्तमामिषमादातव्यमननुज्ञातं भर्त्राऽथवाऽध्यक्षेण, आतुरकुलं चानुप्रविशता विदितेना-नुमतप्रवेशिना साधं पुरुषेण सुसंवीतेनावाक्शिरसा स्मृतिमता स्तिमितेनावेदयावेक्ष्य मनसा सर्वमाचरता सम्यगनुप्रवेष्टव्यम्, अनुप्रविश्य च वाङ्मनोबुद्धीन्द्रियाणि न क्वचित् प्रणिधातव्यान्यन्यत्रातुरादातुरोपकारार्थादातुर गतेष्वन्येषु वा भावेषु न चातुरकुलप्रवृत्तयो बहिर्निश्वारयितव्याः, हसितं चायुषः प्रमाणमानुरस्य जानताऽपि त्वया न वर्णयितव्यं तत्र यत्रोच्यमानमातुरस्यान्यस्य वाऽप्युपघाताय संपद्यते; ज्ञानवताऽपि च नात्यर्थमात्मनो ज्ञाने विकत्थितव्यम् आप्तादपि हि विकत्थमानादत्यर्थमुद्विजन्त्यनेके ॥ १३ ॥

और भी - इसके बाद उस शिष्य को अग्नि, ब्राह्मण और वैद्य के समीप में यह शिक्षा ( आदेश ) दे, कि तुम्हें ब्रह्मचारी ( मैथुन के अष्टांगों ' स्मरणं कीर्तनं केलि प्रेक्षणं गुह्यभाषणमित्यादि से रहित होकर ब्रह्मचर्य का पालन करने वाला ) श्मश्रुधारी ( ब्रह्मचारी रहते हुए बाल नहीं बनाना दाढ़ी और १. ' अनुसर्तव्योऽहम् ' इति पा ० । २. ' न चानभ्यनुज्ञातेन ' ह. । ३. ' ० मल्पवादप्रतीकाराणाम् ' इति पा ० ।

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रोगभिषग्जितीय विमानाध्यायः ८ ] विमानस्थानम् ७११ मूँछ को बढ़ाये रहना चाहिए ), सत्य बोलने वाला, मांस का सेवन न करने वाला, जो अन्नपान बुद्धिवर्द्धक हो उसे ही सेवन करने वाला, दूसरे की वृद्धि देख कर दुःखी न होने वाला और शस्त्र ( सलवार आदि ) को न धारण करने वाला होना चाहिए । मेरे वचन से तुम्हारे लिए कोई भी कार्य अकार्य न होगा | अर्था मैं जो कहूँ उसे अवश्य मानना, परन्तु मेरे कहने से भी राजा से द्वेष, जिससे तुम्हारे पर आघात ( हानि ) पहुँचे, ऐसा वचन जिसके पालन से बहुत बड़ा अधर्म हो और अनर्थ के कारणभूत वचनों ( आज्ञायें ) को न करना, मदर्पण मुझे ही सब देते हुए यहाँ मुझे ही प्रधान समझते हुए, मेरे ही अधीन रहते हुए और जिस प्रकार मेरा प्रिय और हित हो वही कार्य सर्वदा करते हुए जिस तरह पिता की सेवा पुत्र करता है, स्वामी की सेवा नौकर करता है, अर्थी ( धन के इच्छुक व्यक्ति धन के लिए धनी की सेवा करता है, उसी प्रकार मेरी सेवा प्रतिदिन करते हुए रहना, किसी भी मेरे कार्यों में उत्सुकता न रखना, ( अध्ययन में सदा उत्सुक रहना पर मेरे कार्यों में उत्सुक न रहना ), सावधान, एकाग्रमन, विनय सम्पन्न, प्रत्येक कार्यों को सोच-विचार कर करने वाला, अनसूयक ( दूसरे के गुणों में झूठा दोषारोपण न करने वाला तुम्हें होना चाहिए ) और बिना मेरी आशा से कहीं भी तुम्हें भ्रमण करने नहीं जाना चाहिए । मेरे आज्ञानुसार घूमते हुए तुम्हें सर्वप्रथम गुरु की अभीष्ट वस्तु लाने में शक्ति के अनुार प्रयत्न करना चाहिए, " कर्म ( चिकित्सा ) में सिद्धियाँ, अर्थसिद्धि ( धर्मार्थ काम की प्राप्ति ), यश की प्राप्ति और मरने के बाद स्वर्गप्राप्ति की इच्छा रखते हुए, वैद्य तुम्हें सबसे पहले गौ, ब्राह्मण और बाद में सभी प्राणिमात्र की शुभकामना प्रतिदिन उठते - बैठते समय करनी चाहिए, सभी प्रकार से यह बेटा करनी चाहिए कि रोगी रोग से अवश्य सुरकारा पा जायें । अपने जीवन के ( जीविका ) लिए भी कभी रोगियों से द्रोह नहीं करना चाहिए, मन से भी दूसरे की खियों की इच्छा नहीं करनी चाहिए और दूसरे के धन की भी इच्छा नहीं करनी चाहिए, वेश - भूषा ऐसा होना चाहिए कि सभी जनता उससे प्रभावित एवं उस पर विश्वास रख सकें, अर्थाद वहण्डता एवं अभिमान देश से न टपकता हो । मपान, पाद एवं पापियों के साथ का त्याग करना चाहिए, अर्थात् मदिरापान, स्वयं पाप में लिप्त न होना, और पाप ( ब्रह्महत्या, वेश्यादिगमन आदि ) करने वाले से साथ भी नहीं करना चाहिए, चिकने, दोषरहित, धर्मयुक्त, कल्याणकारक ( प्रशंसित ), सत्य, हितकारी और थोडे वाक्यों को कहने वाला होना चाहिए, देश काल का विचार करते हुए, स्मरण शक्ति को ठीक रखते हुए, रोगों के ज्ञान, उत्थान ( कारण, निदान ), उपकरण ( चिकित्सा ) ये तीनों कार्य कैसे उत्तम रीति से किया जाय, इसमें सदा प्रयत्न करना चाहिए, कभी भी उनकी चिकित्सा नहीं करनी चाहिए, जिससे राजा द्वेष करता हो या जो राजा से द्वेष करता हो, या जो राजा के समान बड़े प्रभावशाली, धनी - मानी व्यक्ति हों, जिनके प्रभाव में काफी जन - समूह हो, ऐसे महाजन जिससे द्वेष करते हों, या जो महाजन से द्वेष रखता हो । और उन सभी प्राणियों की चिकित्सा नहीं करनी चाहिए, जिनका अत्यन्त विगड़ा हुआ, अनुचित, दुःखमय स्वभाव, आचरण एवं चिकित्सा है, अर्थात् चिकित्सा में बनाए हुए रोगियों के नियमों का पालन नहीं करते हैं या द्रव्याभाव के कारण अपना जीवन दुःखमय व्यतीत कर रहे हैं, और अनपवाद प्रतीकार है अर्थात् चिकित्सा में आए हुए विनों को दूर करने में समर्थ न हो, जैसे विश्रामपूर्वक औषध सेवन आवश्यक हो तो भी विश्राम न कर सकें, जो मरणासन्न हो, इसी प्रकार जिन स्त्रियों का पति पास न हो, या कोई उसका अध्यक्ष न हो अर्थात स्वतन्त्र हो तो उसकी चिकित्सा नहीं करनी चाहिए पति या रक्षक की बिना आज्ञा से यदि खी मांस या कोई भी भोग्य सामग्री दे तो कभी भी नहीं लेना चाहिए । रोगी के घर में प्रवेश करते समय तुम्हें रोगी का वृत्त ज्ञात है, गृहपति से गृह में लिना ले जाने की अनुमति मिल चुकी है ऐसे व्यक्ति के साथ, अच्छे स्वच्छवस्त्र से