चरक संहिता हिन्दी भाष्य — पृष्ठ 831–840

चरक संहिता हिन्दी भाष्य · Chaukhamba · पृष्ठ 831–840

पृष्ठ 831

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७४२ चरकसंहिता अङ्गों को आच्छादित कर, शिर को नीचे कर, स्मरण शक्ति को ठीक रखते हुए, स्थिर मन से सभी बातों का बार - बार विचार कर और अपनी प्रतिष्ठा ठीक रहे ऐसा बुद्धि से विचार कर उसी प्रकार आचरण करते हुए आतुर के गृह में प्रवेश करना चाहिये । रोगी के घर में प्रवेश कर वचन, मन, बुद्धि और अपनी इन्द्रियों को रोगी या रोगी के लाभ के विषय को छोड़ कर अन्य विषयों में नहीं लगाना चाहिए या रोगी के अन्य विषयों में भी अपनी इन्द्रियों को नहीं लगाना चाहिए, जैसे रोगी के पारिवारिक स्थिति, गृह आदि वस्तुओं की समालोचना आदि नहीं करनी चाहिए । रोगी के घर की बातें या परिस्थितियों को बाहर दूसरे से नहीं कहना चाहिए । रोगी की आय समाप्त हो गई है, यह जानते हुए भी जहाँ कहने से रोगी की शीघ्र या रोगी के अन्य हितैषियों को मृत्यु होने की सम्भावना हो वहाँ नहीं कहनी चाहिए । ज्ञानी होते हुए भी अपने ज्ञान की अधिक प्रशंसा नहीं करनी चाहिए, क्योंकि अधिक अपनी प्रशंसा करने वाले आप्तजन ( विश्वास पात्र ) से भी बहुत लोग घबड़ा जाते हैं ॥ १३ ॥

8 न चैव ह्यस्ति सुतरमायुर्वेदस्य पारं तस्मादप्रमत्तः शश्वदभियोगमस्मिन् गच्छेत्, एतच्च कार्यम् एवंभूयश्च वृर्त्तसौष्ठवमनस्यता परेभ्योऽप्यागमयितव्यं कृत्स्रो हि लोको बुद्धिमतामाचार्यः शत्रुश्चाबुद्धिमताम्, अतश्चाभिसमीक्ष्य बुद्धिमताऽमित्रस्यापि धन्यं यशस्यमायुष्यं पौष्टिकं लौक्यमभ्युपदिशतो वचः श्रोतव्यमनुविधातव्यं चेति । आयुर्वेद असीम - आयुर्वेद शास्त्र का पार नहीं है अर्थात् सीमा नहीं है, अतः प्रमादरहित ( सावधान ) होकर इस शास्त्र के अध्ययन में सदा उद्योग करना चाहिए और यह करना चाहिए-पुन: दूसरे की निन्दा या उसमें दोषारोषण न करते हुए दूसरों से भी आचरण की सुन्दरता को इसी तरह जान लेना चाहिए, क्योंकि बुद्धिमान् विचारक के लिए सारा जगत् आचार्य ( गुरु ) है और मूर्खों के लिये शत्रु है, अतः बुद्धिमान व्यक्तियों को चाहिए कि सभी दानों को ठीक समझकर धन्य ( कार्यों में उत्साहवर्द्धक ), यश को देने वाला, आयु के लिए सुखकारी, पुष्टिकारक, लौकिक सुखकारी वाक्यों का उपदेश शत्रु भी कर रहा है तो सुनना चाहिए और उसके अनुसार कार्य भी करना चाहिए | विमर्श - आचार्य के कहने का अभिप्राय यह है कि आयुर्वेदशास्त्र सीमाबद्ध नहीं है । यह अपार एवं अनन्त है, आयुर्विज्ञान का यह शास्त्र है, जिसनें आयुसम्बन्धी सभी आवश्यक वस्तुयें भरी पड़ी हैं, आयुर्वेद का द्वार आयुसम्बन्धी सभी ज्ञानों के लिए खुला है । अत: इस शास्त्र के अध्ययन करने वालों को प्रमादरहित हो अध्ययन करना चाहिए, दो - चार ग्रन्थों के अध्ययन कर लेने मात्र से कोई आयुर्वेद शास्त्र का पारंगत नहीं बन सकता । सुटत ने भी स्पष्ट बनाया है यथा- ' एकं शास्त्रमधीयानो न विद्याच्छास्त्रनिश्चयम् । तस्माद्बहुश्रुतं शास्त्रं विजानीयाच्चिकित्सकः ॥ ' इस शास्त्र के अध्ययन - काल में बनाए हुए सभी नियमों का पालन करना चाहिए । इसके अतिरिक्त और भी जो कोई सुन्दर आचरण हो उसे दूसरे से लेने में किसी प्रकार का अपमान नहीं समझना चाहिए तथा बिना किसी दोषारोपण के उसे उससे ग्रहण कर लेना चाहिए, इस प्रकार ' अमेध्यादपि काञ्चनम् ' के अनुसार गुण ग्रहण में निःसंकोच प्रवृत्त होने के लिए आचार्य ने विश्वमान्य सिद्धान्त को आगे रख कर सभी जिज्ञासुओं का ध्यान आकृष्ट किया है कि सम्पूर्ण संसार बुद्धिमानों के लिए गुरु है और मूर्खों के लिए यह संसार ही शत्रु है क्योंकि वे गुणग्राही नहीं होते है । अतः परमिदं ब्रूयात् — देवताग्निद्विजगुरुवृद्धसिद्धाचार्येषु ते नित्यं सम्यग्वर्तितव्यं, तेषु ते सम्यग्वर्तमानस्यायमग्निः सर्वगन्धरसरत्नबीजानि यथेरिताश्च देवताः शिवाय स्युः, १. ‘ एतच्चैवं कार्यमेवं भूयः प्रवृत्तस्य सौष्ठवमनसूयता ' ग. । २. ‘ लौकिकम् ' इतिपा ० ।

पृष्ठ 832

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रोगभिषग्जितीयविमानाघ्याय ः ८ ] विमानस्थानम् ७४३ अतोऽन्यथा वर्तमानस्याशिवायेति । एवं ब्रुवति चाचार्ये शिष्यः ' तथा ' इति ब्रूयात् । यथोपदेशं च कुर्वनध्याप्यः, अतोऽन्यथा स्वनध्याप्यः । अध्याप्य मध्यापयन् ह्याचार्यो यथोक्तैश्वाध्यापन फलैर्योगमा त्यन्यंश्चानुक्तः श्रेयस्करैर्गुणैः शिष्यमात्मानं च युनक्ति इत्यध्यापन विधिरुक्तः ॥ १४ ॥

और भी - इसके बाद गुरु शिक्षार्थी से यह कहे कि देवता, अग्नि, द्विजाति ( ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य ), गुरु, वृद्ध ( वय एवं विद्या में ), सिद्ध और आचार्य के साथ उचित प्रकार से व्यवहार करना । इन देवता आदि में उचित व्यवहार का पालन करने से ये अग्नि, सम्पूर्णगन्ध, रस, रत्न और बीज एवं ऊपर बताए हुए देवता आदि तुम्हारा कल्याग करेंगे । इससे विपरीत ( इनके साथ उचित व्यवहार न करना ) आचरण करने से ये हानिकारक होंगे । इस तरह जब आचार्य कहे तो शिष्य भी ऐसा ही होगा ( अर्थात् मै आपकी आज्ञायों का पालन करूँगा ) ऐसा कहे । इसके बाद गुरु के उपदेश के अनुसार आचरण करने वाला छात्र पढ़ाने योग्य होता है । यदि उपदेशों को सुनकर भी तदनुसार आचरण न करें तो वह पढ़ाने योग्य नहीं है । पढ़ाने योग्य छात्र को पढ़ाते हुए आचार्य अध्यापन के सम्पूर्ण ( जैसे शास्त्र की पुष्टि, यश की वृद्धि आदि ) गुणों से युक्त होता है और जो गुण यहाँ नहीं कहे गए हैं ऐसे श्रेयस्कर उत्तम गुणों से अपने को और शिष्य को युक्त करता है, यह इस प्रकार अध्यापन की विधि कही गई है ॥ १४ ॥

भाषाविधिमत ऊध्वं व्याख्यास्यामः -- भिषक् भिषजा सह संभाषेत । तद्विद्यसंभाषा हि ज्ञानाभियोगसंहर्षकरी भवति, वैशारद्यमपि चाभिनिर्वर्तयति, वचनशक्तिमपि चाधत्ते, यशश्चाभिदीपयति, पूर्वश्रुते च सदेहवतः पुनः श्रवणाच्छ्रतसंशयमपकर्षति श्रुते चासंदेह-वतो भूयोऽध्यवसायमभिनिर्वर्तयति, अश्रुतमपि च कञ्चिदर्थं श्रोत्रविषयमापादयति, यच्चा-चार्यः शिष्याय शुश्रूषवे प्रसन्नः क्रमेणोपदिशति गुह्याभिमतमर्थजातं तत् परस्परेण सह जल्पन् पिण्डेने विजिगीषुराह संहर्षात् तस्मात्तद्विद्यसंभाषामभिप्रशंसन्ति कुशलाः ॥ १५ ॥

( ३ ) तद्विद्य संभापापरिषद् ( Seminars & Symposia of Experts ) संभाषाविधि - अध्ययन, अध्यापन विधि के बाद अब सम्भाषाविवि की व्याख्या की जाती है । देय को वैद्य के साथ ही वातचीत करनी चाहिए । जिस विषय का जो विद्वान् है उसे उसी विषय के विद्वान् के साथ संभाषा ( वाद - विवाद करना ) ज्ञान की वृद्धि और आनन्ददायिका होती है, यह भाषा कुशलता भी उत्पन्न करती है, बोलने की शक्ति भी उत्पन्न करती है, यश फैलानी है, पहले कभी कोई विषय सुना, या अध्ययन किया पर उसमें सन्देह बना रह गया तो संभाषा के प्रसङ्ग में फिर सुना जाता है तो उस सन्देह को दूर करती हैं, मुने या अध्ययन किए गए विषयों में यदि सन्देह नहीं है तो और दृढ़ निश्चयात्मक बुद्धि उत्पन्न करती है, नहीं सुने गए या नहीं अध्ययन किए गए विषय भी कर्ण के विषयभूत अर्थात् सुनने को मिलते हैं । अधिक सेवा से प्रसन्न हो कर गुरु क्रमशः जिन गुप्त रहस्यों को सेवापरायण शिष्य को बताते है, उन गुप्त रहस्यों को परस्पर वाद - विवाद करते समय अपने पाण्डित्य का प्रदर्शन. करते हुए विजय प्राप्ति के लिए विजयोल्लास में कह देता है अर्थात् जो विषय गुरु सेवा से प्राप्त होने वाला हैं वह संभाषा परिषद् से शीघ्र ही बिना श्रम के ही प्राप्त हो जाता है, अतः तद्विद्य-संभाषा की प्रशंसा कुशल लोग करते हैं ॥ १५ ॥

१. ' पण्डेन ' ग. | ' पण्डेन स्वपाण्डित्यप्रकाशनेन ' गङ्गाधरः । ' पिण्डेन सारोद्धारेण ' चक्रः ।

पृष्ठ 833

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७४४ चरकसंहिता द्विविधा तु खलु तद्विद्यसंभाषा भवति - सन्धाय संभाषा, विगृह्यसंभाषा च ॥ १६ ॥

संभाषा के दो भेद - तधिसंभाषा दो प्रकार की होती है, एक संवायसंभाषा ( Frieneiy Discussion ) दूसरी विगृह्यसंभाषा ( Hostile Discussion ) ॥ १६ ॥

विमर्श - ' संघाय संभाषा, उसे कहते हैं जिस विवाद में संधि से, प्रेमपूर्वक, विश्वास से दोनों पक्षों में वार्तालाप हो, इस प्रकार की सभा में उचित तत्त्वों का निर्णय किया जाता है, विगृह्य संभाषा में किसी भी उचित या अनुचित उपायों द्वारा विपक्षी को परास्त किया जाता है । ' विगृह्य, ' विपरीत ग्रहण ', जो कुछ विपक्षी कहे उसके विपरीत उत्तरों को देकर उसे हराया जाता है, इस सभा के द्वारा अपनी विजय की ही प्रधानता रखी जाती है चाहे विवाद करने वाला विद्वान् हो या अल्पज्ञ हो । तत्र ज्ञान विज्ञानवचनप्रतिवचनशक्तिसंपन्नेनाको पने नानुपस्कृत विद्येनानसून के नानु-नेयेनानुनय कोविदेन क्लेशक्षमेण प्रियसंभाषणेन च सह सन्धाय संभाषा विधीयते । तथाविधेन सह कथयन् विखन्धः कथयेत् पृच्छेदपि च विस्रवः पृच्छते चास्मै विस्रन्धाय विशेदमर्थं ब्रूयात् न च निग्रहभयादुद्विजेत्, निगृह्य चैनं न हृष्येत्, न च परेषु विकत्थेत, न च मोहादेकान्तग्राही स्यात् न चाविदितमर्थमनुवर्णयेत्, सम्यक्

चोनुनयेनानुनयेत्, तत्र चावहितः स्यात् । इत्यनुलोमसंभाषाविधिः ॥ १७ ॥

१. सन्धाय ( अनुलोम ) संभाषा ( Friendly Discussion ) संधाय संभाषा की विधि - ज्ञान, विज्ञान, वचन ( प्रश्न ), प्रतिवचन ( उत्तर ) की शक्ति सम्पन्न, क्रोधरहित, जिसकी विद्या ( बुद्धि ) अनुपस्कृत ( दूषित न ) हो, अनिन्दित, विनयसम्पन्न, दूसरों को अपनी विनय नीति से अपने अनुकूल कर लेने की कला को जो जानने वाले, कष्ट को सहन करने वाले और प्रिय मधुर भाषण देने वाले व्यक्तियों के साथ संवाय संभाषा की जाती है, इन उपर्युक्त गुणसम्पन्न विद्वान् के साथ वार्तालाप करते हुए जो कुछ भी कहे विश्वास पूर्वक निडर होकर कहे, पूछना भी हो तो विश्वासपूर्वक निसङ्कोच पूछे, विश्वस्त विपक्षी यदि कुछ पूछे तो उसे स्पष्ट एवं विशद अर्थ युक्त उत्तर दें, यह मुझे हरा देगा यह सोच कर भयभीत नहीं होना चाहिए, विपक्षी उस विद्वान् को हराकर ज्यादा हर्ष न प्रगट करे, मैने अमुक विद्वान् को परास्त कर दिया है ऐसी बातें दूसरों से न कहें । मोह ( अज्ञानवश ) वश ' एकान्त ग्राही ', ( मैं जो कह रहा हूँ वही सत्य है इस प्रकार का आग्रह ) न हो, जो विषय स्वयं अज्ञात है, या जो विषय अप्रसिद्ध हैं ऐसे विषयों का वर्णन न करे, उचित रूप में विनय के द्वारा उससे अपना पक्ष स्वीकार करावे अर्थात् अपने पक्ष का बनावे, विनय गुण के संरक्षण में सावधान रहे, इस प्रकार यह अनुलोम संभाषा विधि है ॥ १७ ॥

अत ऊर्ध्वमितरेण सह विगृह्यसंभाषायां जल्पेच्छ्रेयसा योगमात्मनः पश्यन् । प्रागेव च जल्पाजल्यान्तरं परावरान्तरं परिषद्विशेषांश्च सम्यक् परीक्षेत । सभ्यपरीक्षा हि बुद्धिमतां कार्यप्रवृत्तिनिवृत्तिकालौ शंसति, तस्मात् परीक्षामभिप्रशंसन्ति कुशलाः । परीक्षमाणस्तु खलु परावरान्तरमिमान् जल्पकगुणान् श्रेयस्करान् दोषवतश्च परीक्षेत १. ' विशदमर्थजातं ' ग. 1 २. ' चानुनयेनानुनीयेत, अनुनयाच्च परं ' यो. । ३. ' विगृह्य संभाषेत ' ग. । ४. ' जल्पान्तरमिति सामयिकसर्वार्थादिविशेषितं जल्पविशेषं, परावरान्तरमिति प्रतिवादिन आत्मनश्च प्रतिभादिविशेषमित्यर्थः ' चक्रः ।

पृष्ठ 834

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रोगभिषग्जितीयविमानाध्यायः = ] विमानस्थानम् ७४५ सम्यक्; तद्यथा - श्रुतं विज्ञानं धारणं प्रतिभानं वचनशक्तिरिति एतान् गुगान् श्रेयस्क-रानाहु, इमान् पुनर्दोषवतः, तद्यथा— कोपनत्वमवैशारद्य भीरुत्वमधारणत्र मनवहितत्व मिति । एतान् गुणान् गुरुलाघवतः परस्य चंवात्मनश्च तुलयेत् ॥ १८ ॥

२. विगृह्य ( प्रतिलोम ) संभाषा ( Hostile Discussion ) विगृ संभाषा की विधि - इसके बाद अपनी श्रेष्ठता को देखते हुए ज्ञान विज्ञान आदि से ही से विगृह्य संभाषा में बात चीत करनी चाहिये । वार्तालाप के पहले अपने में या विपक्षी में ' विद्या - बुद्धि में कौन श्रेष्ठ है, इसके लिये जल ( वाद - विवाद ) के पूर्व जल्पान्तर की परीक्षा करनी चाहिये । जिससे बात करने वाले का गुण व दोष ज्ञात हो जाय । इसके बाद पर और अवर अर्थात् प्रतिभा आदि में श्रेष्ठ मैं हूँ या त्रिपक्षी, इसके बाद सभा में रहने वाले सभासदों की परीक्षा कर ले, कि हमारे पक्ष के हैं, या उदासीन व्यक्ति हैं, विद्वानों की सभा है, या मूर्खो की, इन सत्रों की परीक्षा उचित प्रकार से कर ले, क्योंकि बुद्धिमानों द्वारा की गई, उचित रूप से परीक्षा कार्य में प्रवृत्ति या निवृत्ति के समय को बताती है । अर्थात् परीक्षा करने के वाद यह निश्चय होता है, कि यह कार्य इस समय करने से फलद होगा और यह कार्य इस समय करने से हानिकारक होगा । इसी लिये कुशल जन परीक्षा की प्रशंसा करते हैं । परीक्षा करते हुये श्रेष्ठ व हीन जल्पक ( वाद - विवाद करने वाले व्यक्तियों ) के गुणों की विशेष रूप से अच्छे और दोषयुक्त गुणों की परीक्षा करे । जैसे श्रुत ( शास्त्रों का अच्छा ज्ञान ), विज्ञान ( विशेष रूप से शास्त्रों के सिद्धान्त और कर्माभ्यास में कुशल ), धारण ( वार्तालाप के प्रसंग में कही गई बातों का स्मरण ) करने वाला, प्रतिभान ( प्रतिभा युक्त ), वचनशक्ति ( वाद विवाद करने की शक्ति से युक्त अर्थात् अपने भावों को स्पष्ट रूप से व्यक्त करने का सामर्थ्य का होना ), ये इतने गुण जलक में होना श्रेष्ठ माना जाता है और इन आगे बताये हुये गुणों का होना दोष माना जाता है । जैसे क्रोवी होना, पांडित्य न होना, डर जाना, कहे हुए बात को धारण न करना, सावधान न होना, इन दोनों प्रकार के दोष एवं गुणों की तुलना अपने में और विपक्षी में करे, कि इन अच्छे गुणों में कितने भेरे में हैं, और कितने दूसरे जल्पक में है । इसी तरह कितने दोष मुझमें हैं, व कितने दूसरे में हैं, इस गुरुता श्रेष्ठता व लघुता की तुलना उचित रूप से करनी चाहिये ॥ १८ ॥

विमर्श - विगृह्य संभाषा सर्वदा विजय के ही दृष्टिकोप से आरम्भ की जाती है । इसके लिये जब तक अपने शत्रु के गुण - दोष की परीक्षा कर यह नहीं जान लिया जाता है, कि किन - किन अंशों में वह श्रेष्ठ है व किन - किन अंशों में दुर्बल है, तब तक विगृह्य संभाषा प्रारम्भ नहीं की जाती । तत्र त्रिविधः परः संपद्यते - प्रारः, प्रत्यवरः, समो वा, गुणविनिक्षेपतः; नरखेव कारस्वर्येन ॥ १ ९ ॥। विपक्षी के भेद गुणों के अनुसार तीन तरह का होता है । १. प्रवर ( श्रेष्ठ ), २. प्रत्यवर अपने से दुर्बल, हीन गुण वाला ) और ३. सम ( अपने समान ) यह भेद केवल गुण के अनुसार किया गया है, न कि कुल, स्वभाव, धर्म आदि सभी विषयों में ॥ १ ९ ॥ परिषत्तु खलु द्विविधा - ज्ञानवती, मूढपरिषच्च । सैव द्विविधा सती त्रिविधा पुनर-नेन कारविभागेन -- सुहृत्परिषत्, उदासीनपरिषत् प्रतिनिविष्टपरिषच्चेति । १. ' तोलयेत् ' इति पा ० । २. ' प्रतिनिविष्टाः स्वसौहार्दाभावेन निविष्टाः सभ्या यत्र सा ' गङ्गाधरः ।

पृष्ठ 835

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७४६ चरकसंहिता ( १ ) परिषद् के भेद ( Types of Assembly ) . परिषद् दो प्रकार की होती है - १. ' ज्ञानवती ' ( विद्वानों की ) जो ज्ञान - विज्ञानसम्पन्न हो । २. ' मूढपरिषत् ' ( मूर्खो की ) । यह सभा दो होते हुये आगे बताये हुये कारणों से तीन प्रकार की होती है । १. मित्रपरिषद्, २. उदासीनपरिषद्, ३. प्रतिनिविष्ट ( शत्रु ) परिषद् । विमर्श - इनका संग्रह निम्नलिखित सारणी में दिया जा रहा है । सुहृत्परिषद परिषद् ( Assembly ) ज्ञानवती ( Learned ) मूढा ( Foolish ) उदासीन प्रतिनिविष्ट सुहृत्परिषद उदासीन प्रतिनिविष्ट Favourable Indifferent Unfavourable Favourable Indifferent Unfavourable इस प्रकार कारण के अनुसार ६ परिषदें हुई १. ज्ञानवती सुहृत् परिषद्, २. ज्ञानवती उदासीन परिषद्, ३. ज्ञानवती प्रतिनिविष्ट परिषद्, ४. मूढ सुहृत्परिषद्, ५. मूढ उदासीन परिषद्, ६. मूढप्रतिनिविष्ट परिषद् । इनमें जिस परिषद् के सभ्य मित्र होंगे वह सुहृत्परिषद् कहलायेगी, जिसके सभ्य न मित्र न शत्रु होंगे यह परिषद् उदासीन परिषद् कहलायेगी जिसके सभ्य प्रतिकूल या शत्रु होंगे वह प्रतिनिविष्ट परिषद् कहलायेगी । यदि सभ्य ज्ञान प्रतिभा आदि सम्पन्न होंगे तो ज्ञानवती परिषद् और यदि सभ्य मूर्ख होंगे तो वह मूढपरिषद् कहलायेगी । तत्र प्रतिनिविष्टायां परिषदि ज्ञानविज्ञान वचनप्रतिवचनशक्तिसंपन्नायां मूढायां वा न कथंचित् केनचित् सह जल्पो विधीयते; मूढायां तु सुहृत्परिषद्युदासीनायां वा ज्ञानवि ज्ञानवचनप्रतिवचनशक्तीरन्तरेणाप्यदीप्तयशसा महाजनविद्विष्टेनापि सह जल्पो विधीयते । तद्विधेन च सह कथयता आविद्वदीर्घसूत्रसंकुलैर्वाक्यदण्डकैः कथयितव्यम्, अतिहृष्टं मुहुर्मुहुरुपहसता परं निरूपयता च पर्षदमाकारैर्बुवतश्चास्य वाक्यावकाशो न देयः; कष्टशब्दं च ब्रुवता वक्तव्यो नोच्यते, अथवा पुनर्हीींना ते प्रतिज्ञा, इति । पुनश्चाहू ( ह्न ) यमानः प्रतिवक्तव्यः परिसंवत्सरो भवान् शिक्षस्व तावत् न त्वया गुरुरुपासितो नूनम, अथवा पर्याप्तमेतावत्ते; सकृदपि हि परिक्षेपिक निहतं निहतमाहुरिति नाम्यं योगः कर्तव्यः कथञ्चित् । अप्येवं श्रेयसा सह विगृह्य वक्तव्यमित्याहुरेक; नत्वेवं ज्यायसा सह विग्रह प्रशंसन्ति कुशलाः ॥ २० ॥

और भी - इन परिषदों में यदि ज्ञान, विज्ञान, वचन ( प्रश्न ), प्रतिवचन ( उत्तर ) की शक्ति से सम्पन्न या मूर्ख प्रतिनिविष्ट ( शत्रु ) की परिषद् है तो कभी भी किसी ( प्रवर, प्रत्यवर, सम ) के भी साथ जल्प ( वाद - विवाद ) नहीं करना चाहिए । मूढ मित्रपरिषद् या उदासीन परिषद् में अपने स्वयं ज्ञान, विज्ञान, वचन, प्रनिवचन शक्ति से रहित होने पर भी, जिसका यश दूर तक नहीं फैला हो, जिससे महाजन ( स्थानीय विद्वान् या धनी प्रतिष्ठित सभ्य ) द्वेष करते हों, ऐसे व्यक्तियों से जल्प १. ' संपन्नायामपि मूढायां वा ' ग. । २. ' तथाविधेन ' ग. । ३. ' परिसंवत्सरो भवान् शिक्षस्व तावद्गुरुपासितो नूनम्, अथवा पर्याप्तमेतावत्ते ' ग. । ' पर्याप्त-मेतावत्ते इति ' पक्षाव सादाय ' इति शेषः ' इति चक्रः । ४. ' न्यासयोगः कर्तव्यः कथंचित्; एवं श्रेयसा ' ग. ।

पृष्ठ 836

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रोगभिषग्जितीयविमानाष्यायः ८ ] विमानस्थानम् ७४७ ( वार्तालाप, शास्त्रार्थ ) करना चाहिए । ऐसे व्यक्तियों से शास्त्रार्थ करते समय आविद्ध ( एक में मिले हुए ), दीर्घ ( बड़े बड़े ) सूत्रों से युक्त वाक्यदण्ड ( लम्बे वाक्य जिसमें क्रिया देर से आती हो ) से विषयों को कहना चाहिए । अत्यन्त प्रसन्न होकर, बार - बार विपक्षी का उपहास करते हुए, सभासदों को सम्बोधन कर ( जैसे आप सब देखिए यह कुछ नहीं कह रहे हैं इन्हें विषय का ज्ञान बिलकुल नहीं है आदि ) बोलते हुए विपक्षी को बोलने का समय ही नहीं देना चाहिए । कष्ट शब्दों को कहते हुए कहे कि तुम नहीं बोलते हो ( कष्ट शब्द का तात्पर्य है कि जो शब्द दुर्बोध हो जिसका अर्थ शीघ्रता न जाना जा सके, या जिसका तीन - चार अर्थ हो और शीघ्रता से यह ज्ञात न हो सके कि किस अर्थ में यहाँ प्रयोग किया गया है ऐसे शब्द का प्रयोग करें, जब वह न समझे तब कहे कि अच्छा तुम नहीं बोल रहे हो ) कष्ट दुर्बोध शब्द को कहते हुए अथवा यह कहे कि तुम्हारी प्रतिज्ञा हीन हो गई ( जिस पक्ष को तुम सिद्ध करना चाहते थे वह नहीं कर पाए अतः तुम्हारी प्रतिज्ञा पूरी न होने से तुम हार गये ) । यदि फिर भी वाद - विवाद करने का आह्वान करे ( फिर किसी अन्य दिन हमारे और आप में शास्त्रार्थ हो ऐसा कहे ) तो उत्तर में कहना चाहिए कि जाओ एक वर्ष तक और अध्ययन करो तुमने निश्चित रूप से गुरु की सेवा कर विद्या नहीं प्राप्त की है, अथवा इतना ही अभी तुम्हारे लिए पर्याप्त है । एक बार भी प्रतिवादी पराजित हो जाय तो विद्वान् उसे पराजित ही मानते हैं, उससे कभी भी किसी तरह पुनः योग ( सम्भाषा परिषद् में वार्तालाप ) नहीं करना चाहिए । विगृह्य सम्भाषा परिषद् में अपने से श्रेष्ठ विद्वान् से भी इसी प्रकार वार्ता करनी चाहिए यह कुछ विद्वानों का मत है । पर कुशल विद्वानों का मत है कि अपने से श्रेष्ठ विद्वानों के साथ इस प्रकार विगृह्य सम्भाषा नहीं करनी चाहिए || २० | विमर्श - शत्रु पर कैसे विजय प्राप्त करना चाहिए इसका चित्रण यहाँ किया गया है । शास्त्रार्थं करने की प्रक्रिया के विषय में किसी कवि ने बताया है - ' श्रोतव्यं च मन्तव्यं वक्तव्यं तु पुनः पुनः । तारस्वरेण वक्तव्यं सभायां विजयी भवेत् ' । अपने से बड़े विद्वान् से विगृह्य सम्भाषा नहीं करनी चाहिए ऐसी आचार्य चरक की आज्ञा है । प्रत्यवरेण तु सह समानाभिमतेन वा विगृह्य जल्पता सुहृत्षरिपदि कथयितव्यम्, अथवा s प्युदासीनपरिषद्यवधानश्रवणज्ञानविज्ञानोपधारणवचनप्रतिवचनशक्तिसंपन्नायां कथयता चावहितेन परस्य सानुप्यदोषत्रलमवेक्षितव्यं, समवेच्य च यत्रैनं श्रेष्ठं मन्येत नास्य तत्र जल्पं योजयेदनाविष्कृतमयोगं कुर्वन्; यत्र स्वेनमवरं मन्येत तत्रैवनमाशु-निगृह्णीयात् । तत्र खल्विमे प्रत्यवराणामाशु निग्रहे भवन्त्युपायाः; तद्यथा - श्रुतहीनं महता सूत्रपाठेनाभिभवेत्, विज्ञानहीनं पुनः कष्टशब्देन वाक्येन वाक्यधारणाहीनमा-विद्वदीघसूत्रसंकुलैर्वाक्यदण्डकैः, प्रतिभाहीनं पुनर्वचनेनैक विधेनानेकार्थवाचिना, वचन-शक्तिहीनमर्धोक्तस्य वाक्यस्याक्षेपेण, अविशारदमपत्रपणेन, कोपनमायासनेन, भीरुं

वित्रासनेन, अनवहितं नियमनेनेति । एवमेतैरुपायैः परमवरमभिभवेच्छीघ्रम् ॥ २१ ॥

और भी - • अपने से गुणों में हीन व्यक्ति या समान गुण वाले विद्वान् से मूर्खो की मुहृत्परिषद हो या विद्वानों की, उसमें विगृह्य सम्मापा करनी चाहिए, अथवा, अवधानश्रवण ( सभा की प्रत्येक कार्यवाही पर ध्यान देकर प्रत्येक बातों को सुनने वाले ), ज्ञान, विज्ञान, उपधारण ( जो बातें सुनी गई हो उसे धारण करने वाले ), वचन शक्ति वाले व्यक्तियों से युक्त उदासीन परिषद् हो तो उसमें वालाप करते समय सावधानी से विपक्षी के गुणों और दोषों के बल की परीक्षा करनी चाहिए १. परस्परसाद्गुण्य ० ' ग. । ३. ' अविशारदमित्यदृष्टस ' चक्रः । २. ' वाक्यस्य क्षेपणेन ' इति पा ० ।

पृष्ठ 837

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७४८ चरकसंहिता ( कि विपक्षी में गुण अधिक है या दोष ), इसकी परीक्षा करने के बाद जिस गुण में विपक्षों को चलवान् समझे उस विषय में उससे अपनी दुर्बलता को छिपाते हुए वाद - विवाद न करें । जिस विषय में उसे दुर्बल समझे उसी विषय में जलन करते हुए उसे शोघ्र ही पराजित करें । दुर्बल पुरुषों के निग्रह ( पराजित ) करने के लिए निम्न उपाय होते है - जैसे १. श्रुनहीन ( शास्त्र ज्ञान से रहित ) यदि अपना विपक्षी है तो उसे लम्बे - लम्बे सूत्रों के पाठों से पराजित करे २. यदि विज्ञानहीन हो तो दुर्बोध शब्दों के प्रयोग से पराजित करे ३. यदि कहे हुए वाक्यों को उचित रूप से धारण न कर सकता हो तो एक में सम्बद्ध लम्बे - लम्बे सूत्रों से मिश्रित बड़े बड़े वाक्य प्रयोग कर उसे पराजित करे । ४. यदि प्रतिभाहीन हो तो अनेक अर्थ के कहने वाले एक ही प्रकार के वचनों को कहकर उसे पराजित करे, ५. यदि वचन शक्तिहीन हो तो ऐसे आधे वाक्य का प्रयोग करे जिसमें बिना आक्षेप का पूरा ज्ञान न हो सके ( जैसे यह रोग संशोधन साध्य है इस वाक्य में यह आक्षेप से लाया जाता है कि विरेचन साध्य है या वमन | जब तक इनका आक्षेप न किया जाय तब तक ज्ञान नहीं होता ) । ६. यदि निपुण नहीं हो तो ( अर्थात् कभी सभा में बोलने का अभ्यास नहीं और किस प्रकार कहाँ पर शब्दों का प्रयोग करना चाहिए इसका ज्ञान न हो तो ) उसे लज्जित कर पराजित करना चाहिए, ७. यदि क्रोधी स्वभाव का हो तो क्रोध उत्पन्न करने वाले शब्दों का अनायास प्रयोग कर, ८. यदि भीरु ( डरपोक ) है तो उसे डरा कर ९. यदि अनवहित ( वाद के नियमों से अपरिचित या उसका पालन करने वाला न हो ) तो उसे नियम द्वारा अर्थात् तुम नियम के विपरीत चलोगे तो पराजित समझे जाओगे ऐसा बार - बार कह उसे पराजित करे इस प्रकार इन उपायों से दुर्बल विपक्षों को पराजित करे ॥ २१ ॥

विमर्श - किसी भी उचित या अनुचित उपायों द्वारा विरोधी को पराजित करना ही इस विगृह्य सम्भाषा का प्रयोजन है यथा -- ' घटं भिन्द्यात् पटं भिन्द्यात् कुर्याद् रासभरोहणम् । येन केन प्रकारेण प्रसिद्धः पुरुषो भवेत् ॥ ' तत्र श्लोकौ— * विगृह्य कथयेयुक्तया युक्तं च न निवारयेत् । विगृह्यभाषा तीव्रं हि केषांचिद्रोहमावहेत् ॥ नाकार्यमस्ति क्रुद्धस्य नावाच्यमपि विद्यते । कुशला नाभिनन्दन्ति कलहं समितौ सताम् ॥ विगृह्यसम्भाषा परिषद् में युक्तिपूर्वक सभी बातों को कहे और विपक्षी भो कोई बात युक्ति-पूर्वक कहता हो तो उसका विरोध न करें । विगृह्य सम्भाषा किसी - किसी व्यक्तियों में तीव्र द्रोह ( क्रोव झगड़ा ) को उत्पन्न कर देती है । जब क्रोध ( या झगड़ा ) हो जाता है तब क्रोधित व्यक्तियों के लिए संसार में कोई भी कार्य अकार्य नहीं होता है और न कुछ भी अवाच्य होता है । इसलिए कुशल ( चतुर ) विद्वान, सज्जनों की सभा में कलह को पसन्द नहीं करते हैं ॥ २२-२३ ॥ एवं प्रवृत्ते वादे कुर्यात् ॥ २४ ॥

वाद प्रारम्भ होने पर इस प्रकार ( विगृह्य सम्भाषा में बताए हुए श्रुतहीन, विज्ञानहीन, वाक्य धारणाहीन आदि दोष युक्त प्रतिवादी को परास्त करने वाले उपायों का अवलम्बन ) करें ॥ ( २ ) वादमार्ग के ४४ पद ( Fortyfour Terms for Debate ) प्रागेव तावदिदं कर्तुं यतेत - सन्धाय पर्षदाऽयनभूतमात्मनः प्रकरणमा शयितव्यं, यद्वा परस्य भृशदुर्गं स्यात्, पक्षमथवा परस्य भृशं विमुखमानयेत्; परिषदि चोपसंहिता-१. ' एवमिति तद्यथा श्रुतहीनमित्यादिग्रन्थोक्तं, वादे प्रवृत्ते सति कुर्यादित्यर्थः ' चक्रः । २. ' एवं प्रवृत्ते वादे प्रागेव तावदिदं कर्तुं यतेत ' यो ।

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रोग भिषग्जितीय विमानाध्यायः ८ J विमानस्थानम् ७४६ यामशक्यमस्माभिर्वक्तुम्, एषैव ते परिषद्यथेष्टं यथायोगं यथाभिप्रायं वादं वादमर्यादांच स्थापयिष्यतीत्युक्त्वा तूष्णीमासीत् ॥ २५ ॥

सभासदों को पहले से ही अनुकूल रखे II सर्वप्रथम इस प्रकार करने के लिए प्रयत्नशील हो कि सभा के सभ्य पुरुषों को अपने पक्ष में सन्धिद्वारा करके अपना बार - बार का अभ्यास किया प्रकरण ( विषय ) को, अथवा जो विषय विपक्षी के लिए अत्यन्त कठिन हो, वही विषय शास्त्रार्थं का मुख्य विषय परिषदों द्वारा रखवावें, अथवा ऐसा कोई उपाय रचे कि सारी सभा विपक्षी के प्रतिकूल हो जाय, सभा के सारे सभासद् जब अपने अनुकूल हो जाय या इकट्ठे हो जायँ तो कहे कि बाद किस विषय पर होगा यह मैं नहीं कह सकता, यही सभा अपनी इच्छा के अनुसार, योग्यता के अनुसार और अभिप्राय ( प्रयोजन ) के अनुसार वाद और वादमर्यादा ( किस विषय में और शास्त्रार्थं करते समय किन - किन नियमों का पालन करना आवश्यक होगा सह सभी बातों का ) निर्णय करेगी ऐसा कह कर चुप हो जाय ॥ २५ ॥

तत्रेदं वादमर्यादालक्षणं भवति - इदं वाच्यम् इदमवाच्यम् एवं पराजितो भवतीति ॥ २६ ॥

यह वादमर्यादा का लक्षण है । - वाद प्रारम्भ होने पर उसमें यह कहना चाहिए, यह नहीं कहना चाहिए इस प्रकार वह पराजित होता है ॥ २६ ॥

* इमानि तु खलु पदानि भिषग्वादमार्गज्ञानार्थमधिगम्यानि भवन्ति तद्यथा - वादः, द्रव्यं, गुणाः, कर्म, सामान्यं, विशेषः, समवायः, प्रतिज्ञा, स्थापना, प्रतिष्ठापना, हेतुः, दृष्टान्तः, उपनयः, निगमनम् उत्तरं, सिद्धान्तः, शब्दः, प्रत्यक्षम्, अनुमानम्, ऐतिह्यम्, औपम्यं, संशयः, प्रयोजनं, सव्यभिचारं, जिज्ञासा, व्यवसायः, अर्थप्राप्तिः, संभवः, अनुयो-ज्यम्, अननुयोज्यम्, अनुयोगः, प्रत्यनुयोगः, वाक्यदोषः, वाक्यप्रशसा, छलम्, अहेतुः, अतीतकालम्, उपालम्भः परिहारः, प्रतिज्ञाहानिः, अभ्यनुज्ञा, हेत्वन्तरम् अर्थान्तरं, निग्रहस्थानमिति ॥ २७ ॥

चौवालीस वाद – वैद्यविद्या या वैद्यों के वादमार्ग को जानने के लिए ये निम्न पद अवश्य जानने योग्य होते हैं जैसे —१. वाद, २. द्रव्य, ३. गुण, ४. कर्म, ५. सामान्य, ६. विशेष, ७. समवाय, ८. प्रतिज्ञा, ९. स्थापना, १०. प्रतिष्ठापना, ११. हेतु, १२. दृष्टान्त, १३. उपनय, १४. निगमन, १५. उत्तर, १६. सिद्धान्त, १७. शब्द, १८. प्रत्यक्ष, १ ९. अनुमान, २० ऐतिह्य, २१. औपम्य, २२. संशय, २३. प्रयोजन, २४. सत्यभिचार, २५. जिज्ञासा, २६. व्यवसाय, २७ अर्थप्राप्ति, २८.. सम्भव, २ ९. अनुयोज्य, ३० अननुयोज्य, ३१. अनुयोग, ३२. प्रत्यनुयोग, ३३. वाक्यदोष, ३४. वाक्यप्रशंसा, ३५. छल, ३६. अहेतु, ३७. अतीतकाल, ३८. उपालम्भ, ३ ९. परिहार, ४०. प्रतिज्ञाहानि, ४१. अभ्यनुज्ञा, ४२ हेत्वन्तर, ४३ अर्थान्तर ४४. निग्रहस्थान ॥ २७ ॥

विमर्श - इस प्रकार ये, ४४. वादमार्ग हैं, शास्त्रार्थ करने के पूर्व इसे जान लेना चाहिए यद्यपि ये वाद मार्ग आयुर्वेद शास्त्र में बनाए गए हैं, पर सामान्यतः किसी शास्त्र या किसी भी बहस के समय इन वादमार्गों का प्रयोग कर विजय प्राप्ति की जा सकती है । * तत्र वादो नाम स यत् परेण सह शास्त्रपूर्वकं विगृह्य कथयति । स च द्विविधः संग्रहेण - जल्पः, वितण्डा च । तत्र पक्षाश्रितयोर्वचनं जल्पः, जल्पविपर्ययो वितण्डा । यथा - एकस्य पक्षः पुनर्भवोऽस्तीति, नास्तीत्यपरस्य; तौ च स्वस्वपक्ष हेतुभिः स्वस्वपक्ष

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७५० चरकसंहिता स्थापयतः, परपक्षमुद्भात्रयतः, एष जल्पः । जपविपर्ययो वितण्डा । वितण्डा नाज परपक्षे दोषवचनमात्रमेव ॥ २८ ॥

( १ ) वाद उसे कहा जाता है जो दूसरे के साथ शास्त्र के अनुसार अपने - अपने पक्ष को कहते हुए विगृह्य सम्भाषा में वार्तालाप किया जाता है । वह वाद संक्षेप में दो प्रकार का होता है— १. जल्प । २. वितण्डा, अपने - अपने पक्षों का उद्घाटन युक्तिपूर्वक करना जल्प और जल्प के विपरीत वितण्डा होता है । जैसे एक पुरुष का पक्ष है पुनर्जन्म होता है और दूसरे का पक्ष है कि पुनर्जन्म नहीं होता । यदि ये दोनों व्यक्ति प्रमाण एवं युक्तियों के द्वारा अपने - अपने पक्ष की पुष्टि करते हैं और दूसरे के पक्ष को दोपयुक्त बतलाते हैं तो इसे जल्प कहते हैं । जल्प के ठीक विपरीत को वितण्डा कहते हैं । वितण्डा उसे कहते हैं जिसमें कि वह दूसरे के पक्ष में केवल दोषों को ही निकाले, पर अपना क्या सिद्धान्त है न कहे ॥ २८ ॥

* द्रव्य - गुण - कर्म - सामान्य विशेष- समवायाः स्वलक्षणैः श्लोकस्थाने पूर्वमुक्ताः ॥ २ ९ ॥ २, ३, ४, ५, ६, ७ ) द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, विशेष, समवाय का वर्णन ( सूत्र स्थान के दोर्घजीवितीय नामक पहले अध्याय में > ) अपने - अपने लक्षणों द्वारा कहा गया है || २ ९ ॥ अथ - नाम साध्यवचनं; यथा - नित्यः पुरुष इति ॥ ३० ॥

प्रतिज्ञा ( ८ ) प्रतिशा - जो वचन सिद्ध करना है, उसी वचन को कह देन प्रतिज्ञा है, जैसे - पुरुष नित्य है ॥ ३० ॥

* अथ_ स्थापना --- स्थापना नाम तस्या एव प्रतिज्ञाया हेतुदृष्टान्तोपनयनिगमनैः स्थापना । पूर्वं हि प्रतिज्ञा, पश्चात् स्थापना, किं प्रतिज्ञातं स्थापयिष्यति, यथा — नित्यः पुरुष इति प्रतिज्ञा; हेतुः - अकृतकत्वादिति; दृष्टान्तः - यथाऽऽकाशैमिति; उपनयः - यथा चाकृतमाकाशं तच्च नित्यं, तथा पुरुष इति; निगमनं - तस्मान्नित्य इति ॥ ३१ ॥

( ९ ) स्थापना - अपने द्वारा की गई उसी प्रतिज्ञा को हेतु दृष्टान्त, उपनय, निगमन द्वारा सिद्ध करने को स्थापना कहा जाता है । पहले प्रतिज्ञा होती है, बाद में उसकी स्थापना होती है । यदि पहले अप्रतिज्ञात ( प्रतिज्ञा न हो ) हो तो स्थापना किसकी की जायगी । जैसे- किसी ने कहा ' पुरुष नित्य ' है तो उसकी यह ' प्रतिज्ञा ' हो गई, हेतु - उसी प्रतिज्ञा में हेतु ( कारण ) है, अकृतक होना ( किसी के द्वारा निर्मित न होना ) है, दृष्टान्त - जैसे आकाश ( किसी से निर्मित नहीं होता और वह नित्य है ) । उपनयन -- जैसे आकाश का निर्माता कोई नहीं है, उसी प्रकार पुरुष का भी कोई निर्माता नहीं है । निगमन -- अतः पुरुष नित्य है, ( इस प्रकार अपनी प्रतिज्ञा को सिद्ध करना ही स्थापना है ) ॥ ३१ ॥

अथ प्रतिष्ठापना -- प्रतिष्ठापना नामया तस्या एव परप्रतिज्ञाया विपरीतार्थस्थापना । यथा - अनित्यः पुरुष इति प्रतिज्ञा; हेतुः -- ऐन्द्रियकत्वादिति; दृष्टान्तः-- यथा घट इति, उपनयो - यथा घट ऐन्द्रियकः स चानित्यः, तथा चायमिति; निगमनं --- तस्मादनित्य इति ॥ ३२ ॥

( १० ) प्रतिष्ठापना - विपक्षी के प्रतिज्ञा के विपरीत अपनी प्रतिज्ञा स्थापित करने को प्रतिष्ठापना कहते है । जैसे—- पहले किसी ने प्रतिज्ञा की है कि पुरुष नित्य होता है, उसी प्रतिज्ञा १. ' उद्भावयतः प्रतिषेधयतः ' गङ्गाधरः । २. ' पूर्व हि लोके प्रतिज्ञा ' ग. । ३. ' अकृतक माकाशं, तच्च नित्यं ' ह । ४. ' उपनयो - यथा चाकृतकमाकाशं तथा पुरुष इति ' इति पा. । ५. ' दृष्टान्तो- घट ऐन्द्रियकः स चानित्यः; उपनयो यथा घटस्तथा पुरुषः ' ह. ।

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रोगभिषग्जितीयविमानाध्याय: ८ ] विमानस्थानम् ७५१ के विरुद्ध कहना कि पुरुष अनित्य है, यह विरोधी की प्रतिज्ञा हुई । हेतु — क्योंकि इन्द्रिय से दिखाई पड़ता है । दृष्टान्त - जैसे घट । उपनयन- जैसे घट इन्द्रिय से दिखाई पड़ता है और वह अनित्य है उसी प्रकार पुरुष भी दिखाई पड़ता है और अनित्य है । निगमन - अतः पुरुष अनित्य हैं || २३ || अथ हेतुः -- हेतुर्नामोपलब्धिकार; तत् प्रत्यक्षम्, अनुमानम्, ऐतिह्यम्, औपम्य-मिति एभिर्हेतुभिर्यदुपलभ्यते तत् तत्वम् ॥ ३३ ॥

( ११ ) हेतु - उपलब्धि ( ज्ञान ) के साधनभूत कारण को हेतु कहा जाता है, और यह हेतु — १. प्रत्यक्ष, २. अनुमान, ३. ऐतिह्य ( आप्तोपदेश ), ४. औपम्य ( उपमान ) इन चार हेतुओं ( प्रमाणों ) से जो ज्ञात होता है, अर्थात् इनसे सिद्ध किया जाता है वह तत्त्व ( सत्य ज्ञान ) होता है ॥ ३३ ॥

* अथ दृष्टान्तः- दृष्टान्तो नाम यत्र मूर्खविदुषां बुद्धिसाम्यं, यो वेयं वर्णयति । यथा— अग्निरुष्णः, द्रुवमुदकं, स्थिरा पृथिवी, आदित्यः प्रकाशक इति; यथा आदित्यः प्रकाशकस्तथा सांख्यज्ञानं प्रकाशकमिति ॥ ३४ ॥

( १२ ) दृष्टान्त - • जिस स्थल में मूर्ख और विद्वान् दोनों की बुद्धि एक समान हो, अर्थात् दोनों ही ठीक रूप से समझते हों, उसे दृष्टान्त कहते हैं । और जो वर्णन करने योग्य वस्तु को उसी को उदाहरण बनाकर वर्णन करता है अर्थात् साध्य को सिद्ध करता है । जैसे अनि उष्ण है, जल द्रव है, पृथ्वी स्थिर है, सूर्य प्रकाशक है । जिस प्रकार सूर्य संसार की सभी वस्तुओं को प्रकाशित करता है उसी प्रकार सांख्य वचन अर्थात् आप्तजनों का वाक्य प्रकाश करता है ॥ ३४ ॥

उपनयो निगमनं चोक्तं स्थापनाप्रतिष्ठापनाव्याख्यायाम् ॥ ३५ ॥

( १३-१४ ) उपनय, निगमन, यह दोनों स्थापना और प्रतिष्ठापना की व्याख्या के समय कइ दिया गया है ॥ ३५ ॥

विमर्श - स्थापना की व्याख्या में ' चाकृतक माकाशं तथा पुरुषः ' और प्रतिष्ठापना में ' यथा घटस्तथा पुरुष इति ' इससे स्पष्ट हो जाता है कि साध्य के साधर्म्य से उदाहरण पर रहने वाला यह भी वैसा ही है । इस प्रकार वाक्य को समाप्त करना साध्य का उपनय होता है । इन दोनों उप-नयों में पुरुष की नित्यता अथवा अनित्यता इन साध्यों की तुल्यधर्मता ( अर्थात् क्रमशः अकृतक होना और इन्द्रिय द्वारा ग्रहण होना ) से आकाश और घट पर निर्भर ' तथा पुरुष: ' इस प्रकार वाक्य समाप्त करना उपनय कहा जाता है । इसी तरह वैधर्म्य से भी उपनय का उदाहरण दिया जाता है | जैसे शब्द अनित्य है, क्योंकि उसकी उत्पत्ति होती है । जो उत्पन्न होने वाले होते हैं । ये अनित्य होते हैं । जो उत्पत्तिशील नहीं होते, वे नित्य होते हैं । जैसे आत्मा यह शब्द वैसा नहीं है । इसे वैधर्म्य उपनय कहते है । निगमन --- स्थापना की व्याख्या में ' तस्मान्नित्यः ' और प्रतिष्ठापना की व्याख्या में ' तस्मादनित्यः ' से बनाया है अर्थात् उपनय के बाद अपनी प्रतिज्ञा को पुनः कहने को निगमन कहते हैं । जैसे- ' पुरुषो नित्यः ' यह प्रतिज्ञा है, ' अकृतकत्वात् ' यह हेतु है, ‘ अकृतकमाकाशं तच्च नित्यम् ' यह दृष्टान्त है, ' यथा चाकृतकमाकाशं तथा पुरुष: ' यह उपनय है । ' तस्मान्नित्यः ' यह निगमन है । अथोत्तरम् - उत्तरं नाम साधम्र्योपदिष्टे हेतौ वैधर्म्यवचनं, वैधम्र्योपदिष्टे वा तौ साधर्म्य वचनम् । यथा - ' हेतुसधर्माणो विकाराः, शीतकस्य हि व्याधेर्हेतुभिः साधर्म्य हिमशिशिरवातसंस्पर्शाः ' इति ब्रुवतः परो ब्रूयात् — हेतुविधर्माणो विकाराः, यथा १. ‘ तेनैव यद्वर्ण्य’ग. । २. ' सांख्य ज्ञानवचनम् ' इति पा ० ।