चरक संहिता हिन्दी भाष्य — पृष्ठ 841–850

चरक संहिता हिन्दी भाष्य · Chaukhamba · पृष्ठ 841–850

पृष्ठ 841

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७५२ चरकसंहिता शरीरावयवानां दाहौष्ण्यको प्रपचने हेतुवैधर्म्यं हिमशिशिरवातसंस्पर्शा इति । एतत् सविपर्ययमुत्तरम् ॥ ३६ ॥

( १५ ) उत्तर: - हेतु के समान धर्म के कहने पर विपरीत धर्म वाला या विपरीत उपदेश करने पर समान धर्म का कहना उत्तर कहा जाता है । जैसे किसी ने कहा रोग कारण के समान धर्म वाले ही होते है । शरीर में शीतलता लाने वाले रोगों का साधर्म्य कारण बर्फ और शीतल वायु का स्पर्श होता है । ऐसा कहने पर दूसरा कहे कि हेतु के विधर्मी रोग होते हैं । जैसे शरीर के अवयवों में दाह, गर्मी, सड़न, पाक होने में कारण के विपरीत वर्फ शीतल वायु का स्पर्श होता है । यह विपरीतता को दिखाते हुये उत्तर दिया गया है ॥ ३६ ॥

* अथ सिद्धान्तः – सिद्धान्तो नाम स यः परीक्षकैर्बहुविधं परीचय हेतुभिश्च साधयित्वा स्थाप्यते निर्णयः । स चतुर्विधः - सर्वतन्त्रसिद्धान्तः, प्रतितन्त्रसिद्धान्तः, अधिकरण-सिद्धान्तः, अभ्युपगम सिद्धान्तश्चेति । तत्र सर्वतन्त्रसिद्धान्तो नाम तस्मिंस्तस्मिन् सर्वस्मितन्त्रे तत्तत् प्रसिद्धं यथा सन्ति निदानानि सन्ति व्याधयः, सन्ति सिद्धयुपायाः साध्यानामिति । प्रतितन्त्रसिद्धान्तो नाम तस्मिंस्तेरिमन्नेकै कस्मि-स्तन्त्रे तत्तत् प्रसिद्धं; यथा - अन्यत्राष्टौ रसाः षडन, पञ्चेन्द्रियाण्यत्र पडिन्द्रियाण्यन्यत्र तन्त्रे, वातादिकृताः सर्वे विकारा यथाऽन्यत्र, अत्र वातादिकृता भूतकृताश्च प्रसिद्धाः | अधिकरणसिद्धान्तो नाम स यस्मिन्नधिकरणे प्रस्तूयमाने सिद्धान्यन्यान्यप्यधिकरणानि भवन्ति, यथा- ' न मुक्तः कर्मानुबन्धिकं कुरुते, निस्पृहत्वात् ' इति प्रस्तुते सिद्धाः कर्मफल-मोक्ष - पुरुष - प्रेत्यभावा भवन्ति । अभ्युपगमसिद्धान्तो नाम स यमर्थमसिद्धमपरीक्षितमनु-पदिष्टमहेतुकं वा वादकालेऽभ्युपगच्छन्ति भिषजः; तद्यथा - इव्यं प्रधानमिति कृत्वा वच्यामः, गुणाः प्रधानमिति कृत्वा वच्यामः, वीर्य प्रधानमिति कृत्वा वच्यामः इत्येव-मादिः । इति चतुविधः सिद्धान्तः ॥ ३७ ॥

( १६ ) सिद्धान्त - परीक्षकों द्वारा अनेक बार परीक्ष्य विषयों की परीक्षा कर और हेनुओं के द्वारा उन परीक्ष्य विषयों को सिद्ध कर जो स्थायी निर्णय दिया जाता है, उसे सिद्धान्त कहते हैं । यह सिद्धान्त ४ प्रकार का होता है । १. सर्वतंत्र सिद्धान्त, २ प्रतितंत्र सिद्धान्त, ३. अधिकरण सिद्धान्त, ४. अभ्युपग्म सिद्धान्त -- १. सर्वतंत्र सिद्धान्त उसे कहते हैं जो सभी शास्त्रों में सिद्धान्त रूप से प्रसिद्ध है जैसे - ( रोग का कारण ) निदान है, व्याधियाँ हैं, साध्य रोगों की चिकित्सा का उपाय है । २. प्रतितन्त्र सिद्धान्त - एक - एक शास्त्र में प्रसिद्ध अर्थात् जो भिन्न शास्त्रों में भिन्न-भिन्न रूप से पाया जाता है उसे कहते हैं । जैसे अन्यत्र ( धामार्गव तंत्र में १. मधुर, २. अम्ल, ३. लवण, ४. कटु, ५. तिक्त, ६. कवाय, ७. क्षार, ८ अव्यक्त यह ) आठ रस सिद्धान्त में माने गये हैं । इस चरक संहिता में मधुरादि छः रस माने गये है । इस संहिता में ५ ज्ञानेन्द्रियाँ मानी गई है । अन्यत्र मन को लेकर ६ ज्ञानेन्द्रियाँ मानी गयी हैं । इस संहिता में वात, पित्त, कफ इन तीन दोष से ही सभी रोगों की उत्पत्ति मानी गई है । दूसरे तन्त्रों में वात, पित्त, कफ जन्य और भूतज ( जीवा जन्य अथवा भूत प्रेत जन्य ) माने गये हैं । ३. अधिकरण सिद्धान्त - जिस विषय का जो प्रकरण चलना हो, अर्थात् लिखा जाता हो या कहा जाता हो उसमें उसी से सम्बन्ध रखने वाले दूसरे सिद्ध अधिकरण का आ जाना अधिकरण सिद्धान्त कहा जाता है । जैसे - मुक्त पुरुष शुभ - अशुभ फल देने वाले कार्यों को नहीं करते हैं क्योंकि वह निष्काम होते हैं, उन्हें १. ' सर्वतन्त्रेषु यत्प्रसिद्धम् ' इति पा ० । २. ' तस्मिंस्तस्मिंस्तन्त्रे यो. 1 ३. ' कर्म ' इति पा ० ।

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रोगभिषग्जितीय विमानाध्यायः ८ ] विमानस्थानम् ७५३ किसी लौकिक या पारलौकिक फलों की आकांक्षा नहीं रहती, अतः ये निस्पृह होते हैं । इस प्रस्ताव से यह सिद्ध होता है, कि कर्मों का फल होता है, मोक्ष होता है, पुरुष है । मरने के बाद पुनः जन्म होता है | अभ्युपगम सिद्धान्त - जिस असिद्ध अपरीक्षित अनुपदिष्ट और अहेतुक बात को वैद्य वाद के समय मान लेते हैं उसे अभ्युपगम सिद्धान्त कहते है । जैसे द्रव्य को प्रधान मानकर कहेंगे, गुण को प्रधान मानकर कहेंगे, इस तरह यह चार प्रकार का सिद्धान्त होता है ॥ ३७ ॥

विमर्श -- जब तक शास्त्रार्थ के द्वारा वादी प्रतिवादी का सिद्धान्त खंडित नहीं हो जाता, तब तक उसके सिद्धान्तों को मानना अभ्युपगम सिद्धान्त है । * अथ शब्दः - शब्दो नाम वर्णसमाम्नायः स चतुर्विधः - दृष्टार्थश्च, अदृष्टार्थश्च सत्यश्च, भनृतश्चेति । तत्र दृष्टार्थो नाम - त्रिभिर्हेतुभिर्दोषाः प्रकुप्यन्ति, षभिरुपक्रमैश्च प्रशा-म्यन्ति सति श्रोत्रादिसद्भावे शब्दादिग्रहणमिति । अदृष्टार्थः पुनः - अस्ति प्रेत्यभावः, अस्ति मोक्ष इति । सत्यो नाम - यथार्थभूतः सन्त्यायुर्वेदोपदेशाः सन्ति सिद्ध्युपायाः

साध्यानां व्याधीनां सन्त्यारम्भफलानीति । सत्यविपर्ययश्चानृतः ॥ ३८ ॥

( १७ ) शब्द - शब्द उसे कहते हैं, जो वर्ण को मिलाने वाला समूह होता है । अर्थात् अक्षर के समूहको शब्द कहते हैं । वह चार प्रकार का होता है । १. दृष्टार्थे, २. अदृष्टार्थ, ३. सत्य, ४. अनृत ( झुग ) । १. दृष्टार्थ - तीन हेतुओं ( असात्म्येन्द्रियार्थसंयोग, प्रज्ञापराध, परिणाम ) से दोष कुपित होते हैं । छः ( लंबन, बृंहण, स्नेहन, रूक्षण, स्वेदन, स्तंभन ) उपक्रम से शान्त होते हैं । श्रोत्रादि इन्द्रियों के रहने पर ही शब्द आदि विषयों का इन्द्रियों से ग्रहण होता है । २. अदृष्टार्थ - - मरने के बाद पुनः जन्म होता है, मोक्ष होता है | ( इन दोनों वाक्यों का अर्थ किसी भी इन्द्रिय से प्रत्यक्ष नहीं होग, केवल शास्त्र ज्ञान से इसके यथार्थपन को स्वीकार किया जाता है । इसलिये इसे अदृष्टार्थ माना जाता है । ) ३. सत्य - उसे कहते हैं, जो यथार्थ हो, जैसे आयुर्वेद का उपदेश है, साध्य रोगों की चिकित्सा का उपाय है । जो कार्य आरंभ किया जाता है, उसका फल अवश्य होता है । ( यह वाक्य यथार्थ रूप में कहे गये हैं इसलिये सत्य हैं । ) ४. अनृत — जो सत्य से विपरीत होता है, उसे अनृत ( झूठ ) कहते हैं । ( उदाहरण के लिये विष खाने से मृत्यु नहीं होती, कर्मों का फल नहीं होता, असाध्य रोग भी अच्छे होते इन

वाक्यों का अर्थ कभी भी यथार्थ नहीं है । इसलिये झूठ है ) ॥ ३८ ॥

विमर्श - - शब्द ध्वन्यात्मक व वर्णात्मक ये दो होते हैं । यहाँ पर केवल वर्णात्मक शब्दों काही वर्णन किया गया है । वर्णात्मक भी परम आप्त ब्रह्म आदि से बनाये गये वेदादि शब्द और लौकिक आप्त से कहे गये शब्द ये दो प्रकार के होते हैं । यहाँ इन दोनों प्रकार के वर्णात्मक शब्दों का वर्णन किया गया है । साथ ही अनाप्त पुरुषों के शब्दों का भी वर्णन है । * अथ प्रत्यक्षं — प्रत्यक्षं नाम तद्यदात्मना चेन्द्रियैश्च स्वयमुपलभ्यते; तत्रात्मप्रत्यक्षाः सुखदुःखेच्छाद्वेषादयः शब्दादयस्त्विन्द्रियप्रत्यक्षाः ॥ ३ ९ ॥ ( १८ ) प्रत्यक्ष - • जो आत्मा ( मन ) और पंच इन्द्रियों से स्वयं जाना जाता है उसे प्रत्यक्ष कहते हैं । सुख, दुःख, इच्छा, द्वेष, प्रयत्न आदि का मन से ( अर्थात् ये मानस प्रत्यक्ष के विषय हैं ) प्रत्यक्ष होता है । शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध का इन्द्रियों से प्रत्यक्ष होता है ॥ ३ ९ ॥ * अथानुमानम् - अनुमानं नाम तर्कों युक्त्यपेक्षः, यथा - अग्निं जरणशक्त्या, बलं व्यायाम शक्त्या, श्रोत्रादीनि शब्दादिग्रहणेनेत्येवमादि ॥ ४० ॥

( १ ९ ) अनुमान - ' युक्तिसापेक्ष तर्क को अनुमान कहा जाता है । जैसे पाचनशक्ति को उचित रूप से होते देख उत्तम पाचकाग्नि का अनुमान किया जाता है । व्यायाम शक्ति के प्रबल ४८ च ० सं ०

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७५४ चरकसंहिता रहने पर बल का अनुमान; शब्द, स्पर्श आदि विषयों को उचित रूप से इन्द्रियाँ ग्रहण करती हैं यह बात देख इन्द्रियों की शक्ति ठीक है, यह अनुमान किया जाता है ॥ ४० ॥

अथैतिह्यम् - ऐतिह्यं नामाप्तोपदेशो वेदादिः ॥ ४१ ॥

( २० ) ऐतिह्य आप्तों के उपदेश स्वरूप वेद, धर्मशास्त्र, स्मृति, पुराण आदि ग्रन्थ ऐतिह्य कहे जाते है ॥ ४१ ॥

अथौपम्यम् - औपम्यं नाम यदन्येनान्यस्य सादृश्यमधिकृत्य प्रकाशनं यथा-दण्डेन दण्डस्य, धनुषा धनुःस्तम्भस्य, इष्वासेनाऽऽरोग्यदस्येति ॥ ४२ ॥

( २१ ) उपमान -- एक दूसरी प्रसिद्ध वस्तु का सादृश्य देकर परस्पर में विभिन्न दूसरी अप्रसिद्ध वस्तु का ज्ञान कराये जाने को उपमान कहते हैं । जैसे दण्ड से दण्डक रोग को समझाना, धनुष से धनुःस्तम्भ रोग को और बाण चालक से आरोग्य देने वाले वैद्य को समझाना ॥ ४२ ॥

अथ संशयः - संशयो नाम सन्देहलक्षणानुसन्दिग्धेष्वर्थेष्वनिश्चयः; - यथा -दृष्टा ह्यायुष्मल्लक्षणैरुपेताश्चानुपेताश्च तथा सक्रियाश्चाक्रियाश्च पुरुषाः शीघ्रभङ्गाश्चिरजीविनश्च, एतदुभयदृष्टत्वात् संशयः - किमस्ति खल्वकालमृत्युरुत नास्तीति ॥ ४३ ॥

( २२ ) संशय - सन्देह के लक्षणों से युक्त होने से सन्देहयुक्त विषयों का अनिश्चित रूप से ज्ञान होना संशय कहा जाता है । जैसे देखा जाता है कि एक रोगी आयु के हितकारी सभ लक्षणों से युक्त है और दूसरा रोगी आयुष्य लक्षणों से युक्त नहीं है और उचित चिकित्सा नहीं होने पर या उचित चिकित्सा होने पर भी एक शीघ्र मरता है और दूसरा बहुत दिनों तक जीवित रहता है । इन दोनों को देखने से संशय होता है कि मनुष्यों की अकाल मृत्यु होती है या नहीं होती ॥ ४३ ॥

अथ प्रयोजनं - प्रयोजनं नाम यदर्थमारभ्यन्त आरम्भाः यथा -- यद्यकालमृत्युरस्ति ततोऽहमात्मानमायुष्यैरुपचरिष्याम्यनायुष्याणि च परिहरिष्यामि कथं मामकालमृत्युः प्रसहेतेति ॥ ४४ ॥

( २३ ) प्रयोजन F जिसके लिए कार्यों का प्रारम्भ किया जाता है उसे प्रयोजन कहते हैं । जैसे यदि अकाल मृत्यु होती है तो मै अपने लिए आयु को बढ़ाने वाले या आयु के लिए हितकारी आहार - बिहार का सेवन करूँगा और आयु के लिए जो अहितकर आहार - विहार है उसे त्याग कर दूँगा, कैसे मुझे अकाल मृत्यु मार सकेगी ॥ ४४ ॥

विमर्श - ' प्रयोजनमनुद्दिश्य मन्दोऽपि न प्रवर्तते ' अर्थात् बिना प्रयोजन की इच्छा से मूर्ख व्यक्ति भी किसी कार्य में प्रवृत्त नहीं होता, अर्थात् जब यह ज्ञान हो जाता है कि इस कार्य को समाप्त कर लेने पर यह फल अवश्य मिलेगा तब उस कार्य में विद्वान् या मूर्ख सबकी प्रवृत्ति होती है । प्रकृत वाक्य में अकाल मृत्यु से बचना प्रयोजन है । इसी प्रयोजन को हृदय में रखकर आयु के लिये हितकर वस्तुओं का सेवन किया जाता है । इसी बात को न्याय दर्शन में स्पष्ट लिखा है, ' यमर्थमधिकृत्य प्रवर्तते तत्प्रयोजनम् ' -- जिस अर्थ को लेकर कार्य में प्रवृत्ति होती है उसे प्रयोजन कहते हैं । अथ सन्यभिचारं - सव्यभिचारं नाम यद्व्यभिचरणं; यथा - भवेदिदमौषधमस्मिन् व्याधौ यौगिकमथवा नेति ॥ ४५ ॥

( २४ ) सम्यभिचार: - सव्यभिचार उसे कहते हैं, जिसका व्यभिचरण हो ( अर्थात् निश्चित रूप से किसी एक ही बात को न बतावे, कभी एक को बतावे और कभी दूसरे को बतावे ) जैसे-यह औषध उस रोग में प्रयोग करने से लाभकर हो या न भी हो ॥ ४५ ॥

१. ' संदिग्धेष्वर्थेष्वनिश्चयः ० ' ग. ।

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रागभिषग्जितीयविमानाध्यायः ८ ] विमानस्थानम् ५५ विमर्श - यह हेत्वाभास का भेद है, न्याय में - ' सम्यभिचारविरुद्ध सत्प्रतिपक्षा सिद्धबाधिताः पञ्च हेत्वाभासाः ' ( तर्कसंग्रह ) बताया है । सव्यभिचार के ३ भेद किये हैं- १. साधारण --' साध्याभाववदवृत्तिः साधारणोऽनैकान्तिकः ' साध्य के अभाव स्थल में हेतु के रहने को धारण कहा जाता है, जैसे- पर्वत अग्निवाला है क्योंकि यह प्रमेय है, इसमें प्रमेय हेतु अग्नि के अभाव- स्थल तालाब में भी पाया जाता है, अतः इसे साधारण सत्र्यभिचार कहते हैं । २. असाधारण - ' सर्व-पक्षविपक्षव्यावृत्तः पक्षमात्रवृत्तिरसाधारण: ' जो हेतु सभी सपक्ष एवं विपक्ष से पृथक होकर केवल पक्षमात्र में रहे उसे असाधारण कहते हैं, जैसे शब्द नित्य है क्योंकि उसमें शब्दत्व है, यहाँ शब्दत्व सभी नित्य, अनित्य जो सपक्ष हो या विपक्ष उससे भिन्न है, केवल पक्ष शब्द में शब्द रहता है अतः इसे असाधारण कहते हैं । ३. अनुपसंहारी - ' अन्वयव्यतिरेकदृष्टान्तरहितोऽनुप-मंडारी ' जो हेतु अन्वय, व्यतिरेक और दृष्टान्त इन तीनों से शून्य हो उसे अनुपसंहारी कहते हैं, जैसे - मभी वस्तु अनित्य है प्रमेय होने के कारण, यहाँ सत्रको पक्ष बताया गया तो उसका अन्वय, व्यतिरेक या दृष्टान्त कहाँ बनेगा? कहीं नहीं बनेगा, क्योंकि सत्र वस्तु के बाहर कोई वस्तु रहनी ही नहीं, अतः ऐसे हेतु को अनुपसंहारी हेतु कहते हैं । इस प्रकार सञ्यभिचार के तीन

भेद माने गये हैं ।

अथ जिज्ञामा - जिज्ञामा नाम परीक्षा; यथा भेषजपरीक्षोत्तरकालमुपदेच्यते ॥ ४६ ॥

( २५ ) जितामा - परीक्षा का नाम जिज्ञासा है, जैसे भेषज परीक्षा उत्तर काल में ( इसी अध्याय में परीक्षा का विवरण करते समय या चि अ. १ में ' भेषजं द्विविधं च तत् ' से ) कहेंगे || विमर्श - प्रत्यक्षादि प्रमाणों द्वारा यथार्थता की परीक्षा जिज्ञासा कहलाती है । भेषजपरीक्षा में परीक्षा का अभिप्राय जिज्ञासा से ही है, इसी प्रकार ' धर्मजिज्ञासा ' में जिज्ञासा का अभिप्राय परीक्षा से ही है, क्योंकि भेषज तथा धर्म की यथार्थना का ज्ञान प्रत्यक्ष आदि परीक्षाओं ( पमार्गों ) द्वारा ही किया जाता है । ' अथ व्यवसायः - व्यवसायो नाम निश्वयः यथा - वातिक एवायं व्याधिः, इदमेवास्य भेषजं चेति ॥ ४७ ॥

( २६ ) व्यवसाय - किसी वस्तु के निश्चित कारण को व्यवसाय कहते हैं, जैसे यह रोग वातजन्य ही है, यही इसकी औषध है, इस प्रकार निर्णय करने को व्यवसाय कहा जाता है ॥ ४७ ॥

अथार्थप्राप्तिः– अर्थप्राप्तिर्नाम यत्रैकेनार्थेनोक्तेन परस्यार्थस्यानुक्तस्यापि सिद्धिः यथा - नायं संतर्पण साध्यो व्याधिरित्युक्ते भवत्यर्थ प्राप्तिः -- अपतर्पण साध्योऽयमिति, नानेन दिवा भोक्तव्यमित्युक्तं भवत्यथप्राप्तिः - निशि भोक्तव्यमिति ॥ ४८ ॥

२७ ) अर्थप्राप्ति - जहाँ एक अर्थ कहने के बाद दूसरे न कहे गये अर्थ का ज्ञान स्वयं हो जाता है, उसे अर्थप्राप्ति कहते हैं । जैसे यह रोग अपतर्पण साध्य नहीं है, यह कहने के बाद बिना कहे अर्थप्राप्ति से ज्ञान हो जाता है कि संतर्पण से अच्छा हो जायगा । इसे दिन में भोजन नहीं करना चाहिए, यह कहने पर अर्थनः प्राप्ति हो जाती है कि रात्रि में भोजन करना चाहिए ॥ ४८ ॥

विमर्श - यहाँ पर अर्धप्राप्ति से अर्थापत्ति का ही ग्रहण होता है, यद्यपि कुछ विद्वान् अर्थप्राप्ति व अर्थापत्ति में नेद समझते हैं । जैसे अर्थप्राप्ति का उदाहरण - अमुक व्यक्ति मूर्ख है, तो यह कहने से अर्थनः प्राप्ति होती है कि विद्वान् नहीं है । यदि यह अर्थ न मा माना जाय तो भो इसमे कोई हानि नहीं होती है । अर्थापत्ति वह है, जिसमें बलार मानना ही पड़ता है । जैसे --मोटा देवदत्त दिन में नहीं खाता है, इस वाक्य में यदि रात में भी भोजन का अभाव माना १. ' इदमेवात्र ' इति पा ० ।

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७५६ चरकसंहिता जाय तो मोटा होना असंभव है, क्योंकि बिना भोजन के कोई भी मोटा नहीं हो सकता, व दिन में भोजन का निषेध शब्दतः किया जाता है, इसलिये मोटे होने में आपत्ति देख बलात् रात्रि में भोजन का आक्षेप किया जाता है । पर अर्थप्राप्ति में मूर्ख है, यह कहने पर यदि बुद्धिमान् नहीं है, यह कल्पना न भी की जाय तो कुछ हानि नहीं है । अतः दोनों भिन्न - भिन्न वस्तुएँ हैं । ऐसा कुछ लोगों का मत है । यहाँ पर श्रुतार्थापत्ति और दृष्टार्थापत्ति भेद से अर्थापत्ति दो प्रकार की होती है, जैसे-किसी ने कहा ' बन्द करो ' तो यह सुन कर यह कल्पना करनी पड़ती है कि द्वार को बन्द करो, नहीं खाता हूँ, तो उसकी मोटाई यह श्रुतार्थापत्ति है । किसी मोटे पुरुष ने कहा कि मैं दिन में देख कर यह कल्पना होती है कि रात में अवश्य खाता होगा । अथ संभवः - यो यतः संभवति स तस्य संभवः, यथा - षड्धातवो गर्भस्य, व्याधे-रहितं, हितमारोग्यस्येति ॥ ४ ९ ॥ ( २८ ) सम्भव - • जिसकी उत्पत्ति जहाँ से संभावित है, उसका वह संभव है । जैसे -छः धातु ( पंचमहाभूत आत्मा ) गर्भं का संभव है, व्याधि का अहित सेवन और हित सेवन आरोग्य का संभव है ॥ ४ ९ ॥ * अथानुयोज्यम् - अनुयोज्यं नाम यद्वाक्यं वाक्यदोषयुक्तं तत् । सामान्यतो व्याहृते-वर्थेषु वा विशेषग्रहणार्थं यद्वाक्यं तदप्यनुयोज्यं यथा - ' संशोधनसाध्योऽयं व्याधिः ' इत्युक्ते ' किं वमनसाध्योऽयं, किंवा विरेचनसाध्यः ' इत्यनुयुज्यते ॥ ५० ॥

( २ ९ ) अनुयोज्य - अनुयोज्य उसे कहते हैं, जो वाक्य दोष से युक्त हो । अथवा सामान्य रूप में कहे गये अर्थों में विशेष रूप से अर्थ ज्ञान के लिये जो दूसरा वाक्य प्रयोग किया जाय उसे भो अनुयोज्य कहते हैं । जैसे यह रोग संशोधन साध्य है, यह कहने के बाद यह वमन साध्य है, या विरेचन साध्य है, यह कहना अनुयोज्य है ॥ ५० ॥

विमर्श - आगे वाक्य - दोष और वाक्य प्रशंसा दोनों की व्याख्या की जायगी । इन दोषों से युक्त वाक्ा होने पर दोषों को दूर करने के लिये दूसरा जो वाक्य प्रयोग किया जाता है उसे अनुयोज्य कहते हैं । ‘ अनु पश्चात् युज्यते इति अनुयोज्यः ' अर्थात् जिसका बाद में योग किया जाय

अर्थात् एक वाक्य के बाद दूसरे वाक्य का विशेष ज्ञान के लिये प्रयोग किया जाय ।

* अथाननुयोज्यम् — अननुयोज्यं नामातो विपर्ययेण; यथा - अयमसाध्यः ॥ ५१ ॥

( ३० ) जो अनुयोज्य के ठीक विपरीत हो उस वाक्य को अननुयोज्य कहते हैं । जैसे — यह रोग असाध्य है ॥ ५१ ॥

* अथानुयोगः - अनुयोगो नाम स यत् तद्विद्यानां तद्विद्यैरेव सार्धं तन्त्रे तन्त्रैकदेशे वा प्रश्नः प्रश्नैकदेशो वा ज्ञानविज्ञानवचनप्रतिवचनपरीक्षार्थमादिश्यते । यथा - ' नित्यः पुरुषः ' इति प्रतिज्ञाते यत् परः ' को हेतुः ' इत्याह, सोऽनुयोगः ॥ ५२ ॥

( ३१ ) अनुयोग - एक विद्या का विद्वान् जत्र उसी विद्या के विद्वान् से ज्ञान, विज्ञान, वचन, प्रतिवचन की परीक्षा के लिये तन्त्र ( शास्त्र ) या तन्त्र के एक देश में या प्रश्न का एक भाग पूछे जैसे नित्य पुरुष है, यह प्रतिज्ञा करने पर दूसरा कहे कि इसमें क्या हेतु है, तो यह अनुयोग है । अर्थात् प्रतिज्ञा में हेतु को पूछने वाला वाक्य अनुयोग कहा जाता है ॥ ५२ ॥

अथ प्रत्यनुयोगः -- प्रत्यनुयोगो नामानुयोगस्यानुयोगः; यथा - अस्यानुयोगस्य पुनः को हेतुरिति ॥ ५३ ॥

१. ' सामान्योदाहृतेष्वर्थेषु ' इति पा ० ।

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रोगभिषग्जितीयविमानाध्यायः ८ ] विमानस्थानम् ७५७

( ३२ ) प्रत्यनुयोग • अनुयोग के बाद पुनः अनुयोग करना प्रत्यनुयोग कहा जाता है ।

जैसे -- इस अनुयोग का फिर क्या हेतु है ॥ ५३ ॥

विमर्श - पुरुष नित्य है, इस प्रतिज्ञा में प्रतिवादी ने जो नित्य होने में कारण पूछा, इसका नाम अनुयोग है । जब पुरुष के नित्य होने में ' अकृतकत्वात् ' हेतु दिया गया तो पुनः प्रतिवादी ने प्रश्न किया इसमें क्या कारण है, इसे प्रत्यनुयोग कहते हैं । * अथ वाक्यदोषः - वाक्यदोषो नाम यथा खल्वस्मिन्नर्थे न्यूनम् अधिकम्, अनर्थकम्, अपार्थक, विरुद्धं चेति; एतानि ह्यन्तरेण न प्रकृतोऽर्थः प्रणश्येत् । तत्र न्यूनं - प्रतिज्ञाहेत्-दाहरणोपनयनिगमनानामन्यतमेनापि न्यूनं न्यूनं भवति यद्वा बहुपदिष्टहेतुकमेकेन हेतुना साध्यते तच न्यूनम् । अथाधिकम् - अधिकं नाम यन्न्यूनविपरीतं यद्वाऽऽयुर्वेदे भाव्यमाणे बार्हस्पत्यमौशनसमन्यद्वा यत्किंचिदप्रति संबद्धार्थमुच्यते, यद्वा संबद्धार्थमपि द्विरभिधीयते तत् पुनरुक्तदोषत्वादधिकं तच्च पुनरुक्तं द्विविधम् - अर्थपुनरुक्तं, शब्दपुन-रुक्तं च; तत्रार्थपुनरुक्तं यथा - भेषजमौषधं साधनमिति, शब्दपुनरुक्तं पुनर्भेषजं भेषज मिति । अथानर्थकम् - अनर्थकं नाम यद्वचनमक्षरग्राममात्रमेव स्यात् पञ्चवर्गवन्न चार्थतो गृह्यते । अथापार्थकम् - अपार्थकं नाम यदर्थवञ्च परस्परेणासंयुज्यमानार्थकं यथा-चक्र न ( त ) त्र वंश - वज्र - निशाकरा इति । अथ विरुद्धं - विरुद्धं नाम यद्दृष्टान्तसिद्धान्त-समयैर्विरुद्धं तत्र पूर्वं दृष्टान्तसिद्धान्तावुक्तौः समयः पुनस्त्रिधा भवति; यथा - आयुर्वैदिक-समयः, याज्ञिकसमयः, मोक्षशास्त्रकसमयश्चेति; तत्रायुर्वैदिकसमयः - चतुष्पादं भेषजमिति, याज्ञिकसमयः - आलभ्या यजमानैः पशव इति, मोक्षशास्त्रकसमयः - सर्वभूतेष्वहिंसेति;

तत्र स्वसमयविपरीतमुच्यमानं विरुद्धं भवति । इति वाक्यदोषाः ॥ ५४ ॥

( ३३ ) वाक्य - दोप I कोई वाक्य किसी अर्थ में न्यून, अधिक, अनर्थक, असम्बद्ध अर्थ वाला -या विरुद्ध हो तो इन दोषों से युक्त वाक्य को दोषयुक्त वाक्य कहते हैं । इन न्यूनता आदि दोषों के बिना वाक्य का स्वाभाविक अर्थ नष्ट नहीं होता है । १. न्यून -- उसे कहते हैं, जिसमें प्रतिज्ञा, हेतु, उदाहरण, उपनय, निगमन इनमें से किसी एक का अभाव हो । अथवा जो अनेक हेतुओं से सिद्ध हो, उसे केवल एक ही हेतु से सिद्ध किया जाय तो उसे भी न्यून वाक्य दोष कहा जाता है । २. अधिक — जो न्यून से विपरीत हो, उसे अधिक कहा जाता है । अथवा जहां आयुर्वेद का विषय कहना आवश्यक हो, वहां अप्रासंगिक बार्हस्पत्य या औशनस शास्त्र का या अन्य किसी शास्त्र का वचन कहा जाय या प्रासांगिक बात हो, फिर भी दो बार कहा जाय तो वह भी पुनरुक्त होने से अधिक कहा जाता है । यह पुनरुक्त दो तरह का होता है । अर्थ पुनरुक्त और शब्द पुनरुक्त | अर्थ पुनरुक्त जैसे भेषज, औषध, साधन ( ये तीनों शब्द एक ही अर्थ में प्रयोग किये जाते हैं, एक ही के प्रयोग से अर्थ का ज्ञान हो जाता है, दो का प्रयोग करना व्यर्थ ही है इसलिये अर्थ पुनरुक्त होने से यह वाक्य दोषयुक्त माना जाता है ) । शब्द पुनरुक्त जैसे भेषजं भेषजं ( यहां एक बार भेषज कहकर दूसळी बार पुनः भेषज कहने से शब्द पुनरुक्त दोष युक्त वाक्य हुआ ) । ३. जनर्थक – जो वचन केवल अक्षर का समुदाय मात्र हो, केवल क ख ग आदि ५ वर्गों की तरह हो उसे अनर्थक कहते हैं । इस समुदाय से किसी भी अर्थ का ज्ञान नहीं होता है । ४. पार्थक - जिसमें शब्द अर्थ युक्त हों, पर परस्पर किसी का भी सम्बन्ध न हो, उस अनर्थक वाक्य को अपार्थक कहते है । जैसे चक्र, तक्र, वंश, वज्र, निशाकर । ५. विरुद्ध - जो वाक्य दृष्टान्त, सिद्धान्त और समय के विपरीत हो उसे विरुद्ध कहते है । इसमें दृष्टान्त व सिद्धान्त इसी - प्रकरण के चौतीस व सैत्तीस के गद्य में कहा जा चुका है । समय- वह तीन तरह का

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७५८ चरकसंहिता होता है । १. आयुर्वेदिक समय, २. याज्ञिक समय, ३. मोक्षशास्त्रिक समय । इसमें आयुर्वेदिक समय चतुष्पाद ( भिषक्, द्रव्य, सेवक, रोगी ) भेषज है । याज्ञिक समय - यजमानों के द्वारा पशुओं का वध करना चाहिये । मोक्षशास्त्रिक समय- सभी प्राणियों में अहिंसा का व्यवहार करना चाहिये, इनमें अपने - अपने समय से विपरीत कहने को विरुद्ध कहा जाता है ॥ ५४ ॥

* अथ वाक्यप्रशंसा - वाक्यप्रशंसा नाम यथा खल्वस्मिन्नर्थे त्वन्यूनम्, अनधिकम्, अर्थवत्, अनपार्थकम्, अविरुद्धम्, अधिगतपदार्थं चेति यत्तद्वाक्यमननुयोज्यमिति प्रशस्यते ॥ ५५ ॥

( ३४ ) वाक्य - प्रशंसा – • वाक्य - प्रशंसा उसे कहते है जो वाक्य दोष युक्त न हो, जैसे इस अर्थ में यह वाक्य न्यून नहीं है, अधिक नहीं है, अनर्थक नहीं है, अपार्थक नहीं है, विरुद्ध नहीं है और ज्ञात है पद का अर्थ जिसका इस प्रकार जो वाक्य होता है वह अननुयोज्य होता है अतः श्रेष्ठ वाक्य माना जाता है ॥ ५५ ॥

अथच्छलं — छलं नाम परिशठमर्थाभासमनर्थकं वाग्वस्तुमात्रमेव । तद्विविधं - वाक्-छलं, सामान्यच्छलं च । तत्र वाक्छलं नाम यथा - कश्चिद्भूयात् - नवतन्त्रोऽयं भिषगिति, अथ भिषग् ब्रूयात् - नाहं नवतन्त्र एकतन्त्रोऽहमिति; परो ब्रूयात् - नाहं ब्रवीमि नव तन्त्राणि तवेति, अपि तु नवाभ्यस्तं ते तन्त्रमितिः भिषक् ब्रूयात् न मया नवाभ्यस्तं तन्त्रम्, अनेकधाऽभ्यस्तं मया तन्त्रमितिः एतद्वाक्छलम् । सामान्यच्छलं नाम यथा-व्याधिप्रशमनायौषधमित्युक्ते, परो ब्रूयात् - सत् सत्प्रशमनायेति किं नु भवानाह; सन् हि रोगः, सदौषधं; यदि च सत् सत्प्रशमनाय भवति, तत्र सन् कासः, सन् क्षयः, सत्सा-मान्यात् कासस्ते क्षयप्रशमनाय भविष्यतीति । एतत् सामान्यच्छलम् ॥ ५६ ॥

( ३५ ) छल – छल उसे कहते हैं जो वाक्य परिशठ ( शठतामूलक, ठगने के लिए प्रयुक्त ), अर्थाभास ( अर्थ कुछ नहीं हो केवल अर्थ की तरह प्रतीत होता हो ), अनर्थक ( निष्प्रयोजन ) और वाग्जाल मात्र हो, यह दो प्रकार का होता है, १. वाक्चल २. सामान्यच्छल । १. वाकूल -जैसे कोई व्यक्ति कहता है कि यह वैध नवतन्त्र है. अर्थात् नया पड़ा हुआ हैं तब वैद्य कहता है ' नाहं नवतन्त्र एकतन्त्रोऽहमिति ' अर्थात् मैं नव शास्त्र का नहीं, एक ही शास्त्र का विद्वान् हूँ ( पूर्वपक्षी ने नत्र शब्द को नया अर्थ में प्रयुक्त किया था पर वैद्य छल से नत्र शब्द का नव संख्या अर्थ कर अपने को एक शास्त्र का विद्वान् सभा में घोषित करता है ) । फिर इस को समझ कर प्रतिपक्षी कहता है - मैं यह नहीं कहता कि तुम नवशास्त्र के विद्वान् हो, मैं कहता हूं ' नदाभ्यस्तं हि ते तन्त्रम् ' तुम्हारा शास्त्र में नया अभ्यास हैं । तब वैद्य कहता है- तुम कहते हो, नव बार शास्त्रों का मैने अभ्यास किया है, तो नव वार मैने शास्त्रों का अभ्यास नहीं किया है किन्तु अनेक बार शास्त्रों का अभ्यास किया है । यहाँ नत्राभ्यास का नूतन अभ्यास इस अर्थ से शत्रु ने प्रयोग किया पर छल से वैद्यने नव का नौ संख्या अर्थ करके उत्तर दिया कि मैने नौ वार नहीं बल्कि अनेक बार अभ्यास किया है । यह वाकूल है । २. सामान्यच्छल-जैसे एक वैद्य ने कहा- रोगों को शान्त करने के लिए औषधे होती है । ऐसा कहने पर दूसरा विपक्षी वैद्य कहता है कि आप क्या कह रहे हैं? सन् सत् को शान्त करता है ( सत् सत्ता वाली वस्तु ) । सत् रोग भी है और सत् औषध भी है इसलिए सत्तात्मक रोग सत्तात्मक औषध से शान्त होता है । यदि आप सत् सत् को शान्त करता है, ऐस कहते हैं तब सत् कास से सत्

क्षय का नाश हो जाना चाहिए । इस प्रकार यह सामान्यच्छल कहा गया ॥ ५६ ॥

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रागभिषग्जितीयविमानाध्यायः ८ ] विमानस्थानम् ove विमर्श -- छल का तात्पर्य है धोखा देना, जिस अर्थ में वाक्यों का प्रयोग करना अभिलषित हो, उस अर्थ से विपरीत अर्थ की कल्पना कर विपक्षी की बोली बन्द कर देना छल कहा जाता है । इसी बात को न्याय दर्शन में ' वचनविघातोऽर्थविकल्पोपपत्त्याच्छलम् ' ( न्याय दर्शन १.२.१० ) अपने तर्क से नूतन अर्थ की कल्पना कर दूसरे के वचनों का विघात कर देने को छल कहा जाता है । यह तीन प्रकार का माना गया है १. वाक्चल २. सामान्यच्छल ३. उपचारच्छल । १. वाक्छल — ‘ सामान्यशब्दोक्ते ह्यर्थे वक्तुरभिप्रायादर्थान्तरकल्पना वाक्छलम् ' सामान्य अर्थ में प्रयुक्त वाक्यों के वक्ता के अभिप्राय के विरुद्ध, अर्थ की कल्पना करने को वाक्छल कहा जाता है । उदाहरण - ' मन्त्राः क्रोशन्ति ' इस वाक्य का तात्पर्य है - मञ्चस्थ पुरुष चिल्ला रहे हैं, पर दूसरा व्यक्ति वाक्छल से कह रहा है कि अचेतन मञ्च चिल्ला नहीं सकता इस प्रकार का आक्षेप बाछल कहा जाता है । २. सामान्यच्छल - ' सम्भवतोऽर्थस्यातिसामान्ययोगादसंभूतार्थंकल्पना सामान्यच्छलम् ' ( न्या. १. २. १३ ) यथासम्भव सामान्य शब्द द्वारा कहे गए अर्थ में अर्थान्तर का सामान्य योग होने से असम्भूत अर्थान्तर की कल्पना करना ' सामान्यच्छल ' कहा जाता है । जैसे मूल में सत् सत् को शान्त करता है, उदाहरण दिया गया है । ३. उपचारच्छल-' धर्मविकल्पनिर्देशोऽर्थसद्भावप्रतिषेध उपचारच्छलम् ' – किसी भी वाक्य का प्रयोग यदि उचित अर्थ के प्रतिपादन के लिए होता है तो उसे धर्म कहते हैं । धर्म में विकल्प अर्थात् अन्यत्र दृष्ट अर्थ का अन्यत्र प्रयोग होने पर यथार्थ की सत्ता का प्रतिषेध करने को उपचारच्छल कहते हैं, जैसे ' मञ्चाः क्रोशन्ति ' इस वाक्य प्रयोग से उपचार द्वारा जाना जाता है । कि मञ्चस्थ पुरुष चिल्लाता है, क्योंकि मञ्च जड़ है, बोल नहीं सकता । यहाँ पर मञ्च शब्द का प्रयोग पुरुष के लिए किया गया है जिसका अन्यत्र काष्ठनिर्मित मञ्च अर्थ में प्रयोग देखा गया है अन्यत्र दृष्ट का पुरुष में प्रयोग किया जाता है तब मञ्च में काष्ठनिर्मित मञ्च अर्थ का प्रतिषेध ( वाध ) हो जाता है और पुरुष का बोध होता है । इस प्रकार ३ छल मान कर अन्त में चरक प्रतिपादित वाक्छल और सामान्यच्छल ये दो ही छल माने जाते हैं । न्यायदर्शन भी उपचार छल को वाक्छल में ही अन्तर्भूत कर लेते हैं, जैसा कि - ' वाक्डलमेवोपचारच्छलं तदविशेषात् ' - वाक्छल ही उपचारच्छल है क्योंकि दोनों में कोई विशेषता नहीं है! यह बात दोनों के उदाहरण से ही स्पष्ट हो जाती है । ऊपर वाक्छल और उपचारच्छल का उदाहरण ' मञ्चाः क्रोशन्ति ' देकर स्पष्ट किया गया है । अथाहेतुः - अहेतुर्नाम प्रकरणसमः, संशयसमः, वर्ण्यसमश्चेति । तत्र प्रकरणसमो नामा हेतुर्यथा-- अन्यः शरीरादात्मा नित्य इति परो ब्रूयात् - यस्मादन्यः शरीरादात्मा, तस्मान्नित्यः शरीरं ह्यनित्यमतो विधर्मिणा चात्मना भवितव्यमित्येष चाहेतुः; नहि य एव पक्षः स एव हेतुरिति । संशयसमो नामाहेतुर्य एव संशयहेतुः स एव संशयच्छेदहेतुः; यथा - अयमायुर्वेदेकदेशमाह, किंन्वयं चिकित्सकः स्यान्न वेति संशये परो ब्रूयात्-यस्मादयमायुर्वेदै कदेशमाह तस्माच्चिकित्सकोऽयमिति, न च संशयच्छेदहेतुं विशेषयति, एष चाहेतुः; न हि य एव संशयहेतुः, स एव संशयच्छेदहेतुर्भवति । वर्ण्यसमो नामाहेतुः-तुर्वर्ण्याविशिष्टः यथा - कश्चियात् - अस्पर्शत्वाद्बुद्धिरनित्या शब्दवदिति; अत्र वर्ण्यः शब्दो बुद्धिरपि वर्ष्या, तदुभयवर्ण्याविशिष्टत्वाद्वर्ग्यसमोऽप्यहेतुः ॥ ५७ ॥

( ३६ ) अहेतु - ' अहेतु ३ प्रकार का होता है । १. प्रकरणसम, २. संशयसम, ३. वर्ण्यसम । १. प्रकरणसम अहेतु - जैसे शरीर से भिन्न आत्मा नित्य है, ऐसा कहने पर दूसरा व्यक्ति १. ' अनेन ' इति पा ० ।

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७६० चरकसंहिता २. हे कि जिस कारण शरीर से आत्मा भिन्न है उसी कारण से नित्य है क्योंकि शरीर अनित्य है इसस भिन्न आत्मा को होना चाहिए । यह इस प्रकरण में अहेतु है क्योंकि जो पक्ष होता है वही हेतु नहीं हो सकता । यहाँ आत्मा को नित्य सिद्ध करना पक्ष है, उसी आत्मा को शरीर से भिन्नता का कारण ( हेतु ) देकर नित्य सिद्ध करना अहेतु है, अपनी ही नित्यता सिद्ध करने में अपने को ही कारण मानना अनुचित है । २ संशयसम अहेतु -- जो संशय ( सन्देह ) का हेतु हो, यदि वही संशय को दूर करने का भी हेतु हो तो उसे संशयसम अहेतु कहते हैं । जैसे कोई कहता है कि यह आयुर्वेद के एक अंश को कहता है । इसलिये सन्देह है कि यह चिकित्सक है या नहीं, तो दूसरा व्यक्ति कहे, क्योंकि यह आयुर्वेद के एक देश को कहता है इसलिये चिकित्सक है । यहाँ पर आयुर्वेद के एक देश को जानने से ही संदेह हुआ, वही आयुर्वेद का एक अंश जानना ही संदेह का निराकरण करना है । अतः इसे संशयसम अहेतु कहते हैं । यहाँ संशय के हेतु में कुछ विशेषता नहीं बताई गई है । यह अहेतु है । जो संशय का हेतु होता है, वही संदेह के नाश में कारण नहीं होता । ३. वर्ण्यसम अहेतु — जो हेतु वर्णन करने योग्य विशेषता से युक्त न हो उसे वर्ण्यसम अहेतु कहते है । जैसे कोई कहता है, स्पर्शयोग्य न होने से बुद्धि अनित्य है, शब्द की तरह । यहाँ पर शब्द वर्णन करने योग्य हैं और बुद्धि भी वर्णन करने योग्य है, इन दोनों वाक्यों में बुद्धि व शब्द वर्णन करने के योग्य होने से परस्पर अविशिष्ट ( एक समान ) हैं । अतः यह हेतु वर्ण्यसम अहेतु कहा जाता है | विमर्श -जो हेतु वाक्य का साधक न हो, उसे अहेतु माना जाता है – ' न हेतु: अहेतुः ' । इसे ही हेत्वाभास भी कहते हैं । जो हेतु न हो पर हेतु की तरह आभासित ( प्रतीत होता हो उसे हेत्वाभास कहते हैं । न्याय दर्शन में हेत्वाभास ५ प्रकार का माना है । उसमें संशयसम का नाम नहीं आता । वात्स्यायन ने संशयसम को सज्यभिचार के अन्तर्गत कर दिया है, प्रकरणसम का लक्षण न्याय दर्शन में इस प्रकार किया है- ' यस्मात् प्रकरण-चिन्ता स एव निर्णयार्थमुपदिष्टः प्रकरणसमः ' अर्थात् जिससे प्रकरण का विचार हो रहा है, वह निर्णय के लिये निमित्त मान लिया जाय, तो वह प्रकरणसम हेत्वाभास कहा जाता हैं । जैसे शरीर से भिन्न आत्मा की नित्यता का प्रकरण चलने पर शरीर से भिन्नता को ही यदि आत्मा की नित्यता की सिद्धि में हेतु मान लें तो यह प्रकरणसम हेत्वाभास होगा । इसी प्रकार न्याय भाष्य के ' यत्र समानो धर्मः संशयकारणं हेतुत्वेन उपादीयते स संशयसमः स व्यभिचार एव ' इस लक्षण के अनुसार संशय का कारणभूत समान धर्म कारण रूप में यदि स्वीकृत किया जाय तो वह संशयसम अहेतु होता हैं और यह सत्यभिचार के अन्तर्गत आता है । जैसे आयुर्वेद का एक देश का कहना चिकित्सक व अचिकित्सक दोनों के लिये समान रूप से संदेह का कारण है और उसे ही संदेह निराकरण के लिये हेतु रूप में स्वीकृत करते हैं अतः यह हेत्वाभास संशयसम होता है । आयुर्वेद का एकदेशीय ज्ञान चिकित्सक के न होने और होने इन दोनों में समान रूप से संशयात्मक होता है । यह अनैकान्तिक होने से सत्र्यभिचार के अन्तर्गत मान लिया जाता है । गौतम ने हेत्वाभास के लक्षणों में बताया है कि ' साध्याविशिष्टः साध्यत्वात् साध्यसमः ' अर्थात् साध्यत्व से साध्य समान हो तो साध्यसम हेत्वाभास होता है और ' माध्यदृष्टान्तयोः साधर्म्याद् वर्ण्यसमः ' साध्य और दृष्टान्त दोनों में साधर्म्य होने से वर्ण्य -सम अद्देनु होता है, जैसे ' स्पर्श न होने से वृद्धि अनित्य है, शब्द की तरह ' यहाँ पर ' अनित्यत्व धर्म से बुद्धि अनित्य है, शब्द की तरह इस वाक्य में अनित्यत्व धर्म से वर्णन करने योग्य शब्द

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रोगभिषग्जितीयविमानाध्यायः ८ ] विमानस्थानम् ७६१ और अनित्यत्व धर्म से ही वर्णन करने योग्य बुद्धि है । यहाँ पर दृष्टान्त और साध्य दोनों वर्णन करने योग्य इस अर्थ में समान होने से ' स्पर्शत्वात् ' यह हेतु वर्ण्यसम हेत्वाभास है । अथातीत कालम् - अतीतकालं नाम यत् पूर्वं वाच्यं तत् पश्चादुच्यते, तत् कालातीत-स्वाद ग्राह्यं भवतीति; पूर्वं वा निग्रह प्राप्तमनिगृह्य परिगृह्य पक्षान्तरितं पश्चान्निगृहीते, तत्त--स्यातीत कालत्वान्निग्रहवचनमसमर्थं भवतीति ॥ ५८ ॥

( ३७ ) अतीत काल - • जिसे पहले कहना चाहिये यदि उसे बाद में कहा जाय तो उसे कालातीत कहा जाता है । वह कालातीत दोषयुक्त होने से अग्राह्य होता है । इस प्रकार निग्रह -स्थान में आये हुये को निग्रह न करके बाद में जब वह दूसरे पक्ष को लेकर शास्त्रार्थं करता है । ऐसा जान कर या निग्रह किया जायगा तो उसका वह निग्रह वचन कालातीत हो जाने से असमर्थ होता है ॥ ५८ ॥

विमर्श - इसलिये दीने हुए वाद - विवाद के आधार पर उसे हराया नहीं जा सकता है, क्योंकि अतीतकाल दोपयुक्त है । अथोपालम्भः - उपालम्भो नाम हेतोर्दोषवचनं यथा - पूर्वमहेतवो हेत्वाभासा व्याख्याताः ॥ ५ ९ ॥ ( ३८ ) उपालम्भ – हेतु में दोषों का दिखाना या कहना उपालम्भ कहा जाना है । जैसे पहले अहेतु स्वरूप हेत्वामान की व्याख्या की गयी है ॥ ५ ९ ॥ अथ परिहारः - परिहारो नाम तस्यैव दोषवचनस्य परिहरणं; यथा - नित्यमात्मनि शरीरस्थे जीवलिङ्गान्युपलभ्यन्ते तस्य चापगमान्नोपलभ्यन्ते तस्मादन्यः शरीरादात्मा नित्यश्चति ॥ ६० ॥

( ३ ९ ) परिहार – उसी दोष - वचन का निराकरण करना परिहार कहा जाता है । जैसे आत्मा के शरीर में रहने पर जीव के लक्षण अर्थात् सुख, दुःख, इच्छा, द्वेष, धर्म, अधर्म नित्य दिखाई देते हैं । उस आत्मा के निकल जाने पर जीवन के लक्षण नहीं दिखाई पड़ते हैं । इसलिये आत्मा शरीर से भिन्न है और नित्य है ॥ ६० ॥

अथ प्रतिज्ञाहानिः - प्रतिज्ञाहानिर्नाम सा पूर्वपरिगृहीतां प्रतिज्ञां पर्यनुयुक्तो यत् परित्यजति यथा प्राक् प्रतिज्ञां कृत्वा नित्यः पुरुष इति, पर्यनुयुक्तस्त्वाह - अनित्य इति ॥ ( 20 ) ¤fau - zifa — पहले की हुई प्रतिज्ञा को परास्त होने पर त्याग देना अथवा पहले की गई प्रतिज्ञा को दाद में स्थापना करने में असमर्थ होना प्रतिज्ञाहानि है । जैसे पहले

प्रतिज्ञा किया कि पुरुष नित्य है । जब हारने लगा तो कह दिया कि अनित्य है ॥ ६१ ॥

विमर्श - न्यायदर्शन में १ प्रतिज्ञाहानि, २. प्रतिज्ञान्तर, ३. प्रतिज्ञानिरोध, ४. प्रतिज्ञा संन्यास इन चारों का वर्णन अलग - अलग किया गया है, पर आयुर्वेद इन सबका अन्तर्भाव एक ही प्रतिज्ञाहानि में कर लेता है, क्योंकि अपनी प्रतिज्ञा का न्याम स्वयं निगृहीत होने पर करना या प्रसङ्गतः अपनी ही प्रतिज्ञा को बदल देना उसी प्रतिज्ञा का विरोध करना या पहले प्रतिज्ञान प्रतिज्ञा को निगृहीत होने पर छोड़ देना आदि सभी को प्रतिज्ञाहानि ही कहा जाता है । जैसे— ' प: नित्य:, अकृतकन्यात्, यो दियो हि अकृतकः स स नित्यः, यथा आकाशः स चायं पुरुषः अकृतकः तस्मान्नित्यः ' पुरुष नित्य है, किसी के द्वारा नहीं बनाए जाने के कारण, जो - जो किसी से नहीं बनाया जाता है वह वह नित्य होता है, जैसे आकाश, यह पुरुष भी अकृतक है अतः नित्य १. ' परम् ' इति पा ० ।