चरक संहिता हिन्दी भाष्य — पृष्ठ 851–860

चरक संहिता हिन्दी भाष्य · Chaukhamba · पृष्ठ 851–860

पृष्ठ 851

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७६२ चरकसंहिता है । ऐसे अपनी प्रतिज्ञा को स्थिर किया । पर बादी ने कहा- नहीं, पुरुष अनित्य है, और अनुमान का स्त्ररूप इस प्रकार किया कि ' अनित्यः पुरुषः, ऐन्द्रियकत्वात्, यो य ऐन्द्रियकः स स अनित्यः, यथा घटः, स चायं पुरुषः ऐन्द्रियकः, तस्मादनित्यः । पुरुष अनित्य है, इन्द्रिय विषय होने के कारण, जो जो इन्द्रियों का विषय होता है वह वह अनित्य होता है, जैसे घट, वैसा ही पुरुष भी इन्द्रियों काय है अतः अनित्य है । यह सुन कर यदि इसका खण्डन न कर सके और स्वीकार कर ले

कि आप ठीक कह रहे हैं तो इसे प्रतिज्ञा - हानि कहा जाता है ।

* अथाभ्यनुज्ञा - अभ्यनुज्ञा नाम सा य इष्टानिष्टाभ्युपगमः ॥ ६२ ॥

( ४१ ) अभ्यनुज्ञा ' जहाँ पर इष्ट ( अभिलषित ) और अनिष्ट को भी स्वीकार किया जाता है उसे अभ्यनुज्ञा कहा जाता है ॥ ६२ ॥

विमर्श - विपक्षी का दोष और अपना दोष क्रम से इष्ट और अनिष्ट कहा जाता है । यदि अपना पक्ष दोषयुक्त है । उसे विपक्षी कहता है, तो उसे स्वीकार कर अर्थात् उसका खंडन न कर शत्रु के पक्ष में दोष दिखाना कि यह दोष आप के भी पक्ष में है । अर्थात् जो दोष आप के पक्ष में है, वही दोष हमारे भी पक्ष में है । जैसे किसी ने कहा आप पुरुष को नित्य मानेंगे तो उसकी मृत्यु नहीं होनी चाहिये, यह दोष दिखाया, तो उत्तर दिया आप नित्य मानते हैं तो भी मृत्यु हो जाती है । यह दोष दोनों में सम हैं । या किसी ने कहा आप दुश्चरित्र हैं, तो इसका

परिहार न कर उसे भी दुश्चरित्र सिद्ध करना अभ्यनुज्ञा है ।

अथ हेत्वन्तरं - हेखन्तरं नाम प्रकृत हेतौ वाच्ये यद्विकृतहेतुमाह ॥। ६३ ॥

( ४२ ) हेत्वन्तर - जहाँ प्रकृत हेतु कहना चाहिये वहाँ विकृत हेतु का कहना हेत्वन्तर कहा जाता है ॥ ६३ ॥

विमर्श - विचार से हेत्वाभास और हेत्वन्तर एक सा ही प्रतीत होता है क्योंकि उचित हेतु न कह कर अनुचित हेतु का कहना हेत्वन्तर कहा जाता है । जैसे- ' पर्वतो वह्निमान् उष्यत्वात् ’ पर्वत अग्नि वाला है, गरम होने के कारण । यहाँ उष्णता का हेतु विकृत हेतु है, क्योंकि गर्मी के दिनों में सूर्य ताप से संतप्त पर्वत को स्पर्श कर अग्नि का अनुमान होने पर अग्नि की उपलब्धि नहीं होती । अतः यह विकृत हेतु हैं या हेतु न होते हुए हेतु का आभास मात्र है । इस वाक्य में ' धूमात् ' यह प्रकृत हेतु न कह कर विकृत हेतु ' उष्णत्वात् ' कहा गया है अतः हेत्वन्तर का उदाहरण हैं | न्याय दर्शन ने- ' अविशेषोक्ते हेतौ प्रतिषिद्धे विशेषमिच्छतो हेत्वन्तरम् ' अविशेषरूप से कहे गये हेतु के निषेध करने पर विशेषता युक्त अर्थात् हेतु को विशेषण - विशिष्ट बना देना हेत्वन्तर माना है । इससे पहला सामान्य हेतु प्रतिज्ञा का साधक नहीं होता । अतः दूसरा विशेषण दिया जाता है, यह दूसरा विशेषण हेत्वन्तर कहा जाता है । ॐ अथार्थान्तरम् - अर्थान्तरं नामैकस्मिन् वक्तव्येऽपरं यदाह । यथा - ज्वरलक्षणे वाच्ये प्रमेहलक्षणमाह ॥ ६४ ॥

( ४३ ) अर्थान्तर - जहाँ एक विषय का कहना उचित हो वहाँ दूसरा विषय कहना अर्थान्तर कहा जाता है, जैसे जहाँ ज्वर का लक्षण कहना हो वहाँ प्रमेह का लक्षण कहना ॥ ६४ ॥

अथ निग्रहस्थानं - निग्रहस्थानं नाम पराजयप्राप्तिः; तञ्च त्रिरभिहितस्य वाक्यस्या-परिज्ञानं परिषदि विज्ञानवत्यां यद्वा अननुयोज्यस्यानुयोगोऽनुयोज्यस्य चाननुयोगः । प्रतिज्ञाहानिः अभ्यनुज्ञा, कालातीतवचनम्, अहेतु:, न्यूनम् अधिकं, व्यर्थम्, अनर्थकं, पुनरुक्तं, विरुद्धं, हेत्वन्तरम् अर्थान्तरं च निग्रहस्थानम् ॥ ६५ ॥

१. ' व्यर्थमपार्थकं ' च.।

पृष्ठ 852

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रीगभिषग्जितीयविमानाध्यायः ८ ] विमानस्थानम् III ( ४४ ) निग्रहस्थान - पराजय को प्राप्त करना निग्रहस्थान है । यह ३ प्रकार का होता है— ज्ञानवती सभा में तीन बार कहे जाने पर भी वाक्य के अर्थ को न जानना, अथवा अननुयोज्य का अनुयोग या अनुयोज्य का अननुयोग ( करना ) । प्रतिज्ञाहानि, अभ्यनुज्ञा, कालातीतवचन, अहेतु, न्यून, अधिक, व्यर्थ, अनर्थक, पुनरुक्त, विरुद्ध हेत्वन्तर और अर्थान्तर ये निग्रह स्थान कहे जाते है ॥ ६५ ॥

विमर्श - निग्रहस्थान का लक्षण न्यायदर्शन में यह है - ' विप्रतिपत्तिरप्रतिपत्तिश्च निग्रहस्थानम् ' ( अ. १ १ ९ ) । विपरीत अथवा निन्दित प्रतिपत्ति ( ज्ञान ) को विप्रतिपत्ति कहते हैं और दूसरे से सिद्ध किये गये पक्ष का खंडन न करना या पक्ष के ऊपर दिये गये दोषों का समाधान न करना अप्रतिपत्ति है । नहीं समझना या समझकर उसकी परवाह न करना ये दोनों निग्रहस्थान ( पराजय ) हैं । यह निग्रहस्थान अनेक तरह का होता है, जैसा कि ' तदुत्रिकल्पाज्जातिनिग्रह-स्थानबहुत्वम् ' साधम्यं और वैधर्म्यं से खण्डन के विकल्प से ( अनेक प्रकार की कल्पना से ) जाति का बहुत होना और विप्रतिपत्ति एवं अप्रतिपत्ति के विकल्प से निग्रह का बहुत होना सिद्ध होता है । उसके २२ भेद न्यायदर्शन में बताये हैं जैसे- ' प्रतिज्ञाहानिः प्रतिज्ञान्तरं प्रतिज्ञाविरोधः प्रतिज्ञासंन्यासी हेत्वन्तरम् अर्थान्तरं निरर्थकमविज्ञातार्थमपार्थकम प्राप्तकालमन्यूनमधिकं पुनरुक्त मननुभाषणमज्ञानमप्रतिविक्षेपो मतानुज्ञापर्यनुपेक्षणं निरनुयोज्यानियोगोऽपसिद्धान्तो हेत्वाभासाश्च निग्रहस्थानि ' माना है । आयुर्वेद ने कुल १५ निग्रहस्थान माने है जैसे-१. प्रतिज्ञाहानि २ अभ्यनुज्ञा, ३. कालातीतवचन, ४ अहेतु, ५. न्यून, ६. अधिक, ७. व्यर्थ, ८. अनर्थक, ९. पुनरुक्त, १०. निरुद्ध, ११. हेत्वन्तर १२. अर्थान्तर, १३. तीन बार विद्वानों की सभा में वाक्य कहने पर भी ज्ञान न होना, १४. अननुयोज्य का अनुयोग करना, १५. अनुयोज्य का अनुयोग न करना । प्रतिज्ञान्तर, प्रतिज्ञाविरोध, प्रतिज्ञासन्यास इन तीनों को प्रतिज्ञाहानि में ही आयुर्वेद मानता है । न्याय दर्शन ने एक ' मतानुज्ञा ' को भी माना है जिसका लक्षण ' स्वपक्षदोषाभ्युपगमात् परपक्षे दोषप्रसंगो मतानुज्ञा ' अर्थात् जो प्रतिवादी ने दोष दिया उसको अपने पक्ष में स्वीकार कर बिना उसके उद्धार किये यह कहना कि तुम्हारे पक्ष में भी ऐसा ही दोप है, यह आयुर्वेद के अभ्यनुज्ञा के अन्दर चला आता है । शेष अप्राप्तकाल, अननुभाषण, अप्रतिभा, विक्षेप न्याय ने ये चार अधिक माने है । १. अप्राप्तकाल का लक्षण ' अवयवविपर्यासवचनमप्राप्तकालम् ' अर्थात् प्रतिज्ञादि पंचावयव का जैसा लक्षण कहा गया है उस प्रकार से अर्थवशात् जैसा कहने का क्रम है उसके विपरीत, क्षोभ से या अन्य कारणों से अवयवों का आगे पीछे कहना अप्राप्तकाल कहा जाता है । २. अननुभाषण - ' विज्ञातस्य परिषदा त्रिरनिहितस्याप्यप्रत्युच्चारणमननुभापगम् । ' अर्थात् विज्ञान-बर्ती सभा के सभासदों ने जिस अर्थ को जान लिया और बादी ने जिसको तीन बार कह दिया ऐसे जाने और तीन बार कहे हुये को सुनकर भी जो प्रतिवादी कुछ न कहे तो उसे अननुभाषण कहते हैं । ३. अप्रतिभा — ' उत्तरस्याप्रतिपत्तिरप्रतिभा ' परपक्ष का खण्डन करना उत्तर है । यदि किसी कारण से समय पर उत्तर न दिया गया अर्थात् उत्तर देने की सूझ न हुई तो उसे अप्रतिभा कहते हैं । ४. विक्षेप - ' कार्यव्यासंगात् कथाविच्छेदो विक्षेपः ' जहाँ प्रतिवादी वहाना कर समाधान के समय को टाल दे अर्थात् मुझे इस समय कुछ जावश्यक कार्य है, उसे करने के बाद पुनः आपका समाधान करूंगा ऐसे कहने को विशेष कहा जाता है । इस प्रकार इन चारों का वर्णन न्याय दर्शन

में पाया जाता है । आयुर्वेद - जिज्ञासुओं को इन्हें भी समझ लेना चाहिये ।

इति वादमार्गपदानि यथोद्देशमभिनिर्दिष्टानि भवन्ति ॥ ६६ ॥

पृष्ठ 853

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७६४ चरकसंहिता इस प्रकार वाद - मार्ग में प्रयुक्त होने वाले पदों की व्याख्या उद्देश्य के अनुसार कर दी गयी । वादस्तु खलु भिषजां प्रवर्तमानो प्रवर्तेतायुर्वेद एव, नान्यत्र । अत्र हि वाक्यप्रति-वाक्यविस्तराः केवलाश्वोपपत्तयः सर्वाधिकरणेषु । ताः सर्वाः समवेच्यावेक्ष्य सर्वं वाक्यं ब्रूयात्, नाप्रकृतकमशास्त्रमपरीक्षितमसाधकमा कुलमव्यापकं वा । सर्वं च हेतुमद्ब्रूयात् । हेतुमन्तो कलुषाः सर्व एव वादविग्रहाश्चिकित्सते कारणभूताः, प्रशस्त बुद्धिवर्धकत्वात्; सर्वारम्भसिद्धिं ह्यवत्यनुपहता बुद्धिः ॥ ६७ ॥

वाद के स्थल - वैद्यों का वाद - विवाद प्रारम्भ हो तो वह आयुर्वेद शास्त्र में ही प्रारम्भ करे अन्य शास्त्रों में न करे । यहाँ सब अधिकरणों ( आयुर्वेद के सब विषयों ) में वाक्य एवं प्रतिवाक्य के विस्तार को सम्पूर्ण युक्तियों के साथ कहा गया है, उन सभी युनियों को ठीक - ठीक सोच - समझकर वाक्यों को कहना चाहिए । पर अप्राकृतिक, शास्त्र ज्ञान से शून्य, विना परीक्षा किए, हेतु ( कारण ), शून्य वाक्य, बुद्धि को व्याकुल करने वाला, और अर्थ बनाने में असमर्थ वाक्य को न बोलें । जो कुछ बोले वह सब हेतुयुक्त बोले । हेतुयुक्त सभी वाद, विग्रह, अकलुषित ( ढोपरहित ) होते हैं । वे चिकित्सा शास्त्र की सिद्धि में कारण होते है, क्योंकि अच्छे प्रकार से बुद्धि को बढ़ाने वाले होते है । अच्छी शुद्ध बुद्धि सभी कर्मों में सिद्धि को देने वाली होती है ॥ ६७ ॥

इमानि खलु ताहि कानिचित् प्रकरणानि भिषजां ज्ञानार्थमुपदेष्यामः । ज्ञान-पूर्वकं हि कर्मणां समारम्भं प्रशंसन्ति कुशलाः । ज्ञात्वा हि कारण - करण कार्ययोनि - कार्य-कार्यफला - नुबन्ध - देश - कालप्रवृत्युपायान् सम्यगभिनिर्वर्तमानः कार्याभिनिर्वृत्ताविष्टफलानु-धं कार्यमभिनिर्वर्तयत्यनतिमहता यलेन कर्ता ॥ ६८ ॥

( घ ) दशविधपरीक्ष्य विषय ( Ten - Points for Investigation ) दशपरीक्ष्य भाव - • वैद्यों की ज्ञान - वृद्धि के लिए कुछ प्रकरण यहां कहा जाता है । कुशल व्यक्ति ज्ञानपूर्वक कार्य करने को प्रशंसित मानते हैं । १. कारण, २. करण, ३. कार्ययोनि, ४. कार्य, ५. कार्यफल, ६. अनुवन्ध, ७. देश, ८. काल, ९. प्रवृत्ति, १० उपाय, इनको ठीक - ठीक रूप से जानकर कार्य की उत्पत्ति में प्रवृत्त कर्ता अधिक प्रयास के विना ( अल्पयत्न से ही ) कार्य की सिद्धि में मन के अनुकूल इष्ट फल की प्राप्ति कर लेता है ॥ ६८ । नत्र कारणं नाम तद् यत् करोति स एव हेतुः, स कर्ता ॥ ६ ९ ॥ ( १ ) कारण - जो वैद्य चिकित्सा करता है, वह कारण होता है । उसी को हेतु भी कहते हैं और वही कर्ता भी है ॥ ६ ९ ॥ * करणं पुनस्तद् यदुपकरणायोपकरते कर्तुः कार्याभिनिर्वृत्तौ प्रयतमानस्य ॥ ७० ॥

( २ ) करण - कार्य को सम्पादन करने के लिए कार्य में प्रवृत्त होने वाले कर्ता के साधन स्वरूप जो होता है उसे करण कहते है ॥ ७० ॥

विमर्श - - न्याय वाले असाधारण कारण को करण मानने हैं, और ' कवासिद्धौ प्रकृोपकारकं करणन ' से व्याकरण वाले क्रिया सिद्धि होने में जो अधिक उपकार करता है उसे ' करण ' कहते हैं । जैसे चिकित्सा में लगे हुए वैद्य के लिए औषध, पात्र, ग्वन्द, यन्त्र, शस्त्र आदि सभी करण हैं, इनके विना चिकित्सा का कार्य पूर्ण हो नहीं सकता, या शरीर में ही कर्न आत्मा जब कोई कार्य करना चाहती है, दो विना इन्द्रियों के कुछ भी कार्य नहीं कर सकती । अतः शरीर ( आत्मा ) का करण इन्द्रियाँ हैं ।

पृष्ठ 854

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रोगभिषग्जितीयविमानाध्याय: ८ ] विमानस्थानम् * कार्ययोनिस्तु सा या विक्रियमाणा कार्यत्वमापद्यते ॥ ७१ ॥

७६५ ( ३ ) कार्ययांनि उसे कहते हैं जो भिन्न - भिन्न परिवर्तनों को प्राप्त होते हुए कार्य रूप में परिणत हो जाता है ॥ ७१ ॥

विमर्श - कार्य का जो समवायी या उपादान कारण हैं उसे कार्ययोनि कहते हैं । जैसे -घड़े का समवायी कारण मृत्तिका है, क्योंकि कुम्भकार मिट्टी से ही विभिन्न प्रक्रियों द्वारा घट का निर्माण

करता है अतएव मिट्टी घट का समवायी कारण है ।

* कार्य तु तद्यस्याभिनिर्वृत्तिमभिसन्धाय कर्ता प्रवर्तते ॥ ७२ ॥

( ४ ) कार्य - अपने इतिकर्तव्य को निश्चित करने के बाद जिस प्रयोजन से कर्ता क्रिया में लगता है उसे कार्य कहा जाता है ॥ ७२ ॥

* कार्यफलं पुनस्तद् यत्प्रयोजना कार्याभिनिर्वृत्तिरिष्यते ॥ ७३ ॥

( ५ ) कार्यफल - जिस प्रयोजन के लिए कार्य प्रारम्भ किया जाता है, वह कार्यफल है || ७३ || * अनुबन्धः खलु स यः कर्तारमवश्यमनुबध्नाति कार्यादुत्तरकालं कार्यनिमित्तः शुभो वाऽप्यशुभो भावः ॥ ७४ ॥

( ६ ) अनुबन्ध —जो कार्य करने के बाद, कार्य के ही द्वारा अच्छा या बुरा फल कर्ता को अवश्य भोगना पड़ता है उसे अनुबन्ध कहते है ॥ ७४ ॥

देशस्त्वधिष्ठानम् ॥ ७५ ॥

( ७ ) देश- या औषध * कालः पुनः परिणामः ॥ ७६ ॥

नाव का जो अधिकरण होता है उसे देश कहते हैं ॥ ७५ ॥

( ८ ) काल - जो ऋतु, मास, अपन एवं वर्ष आदि में स्वयं परिणाम ( परिवर्तन ) शील है उसे काल कहते है । ७६ ॥ प्रवृत्तिस्तु खलु चेष्टा कार्यार्याः सैव क्रिया, कर्म, यत्रः, कार्यसमारम्भश्व ॥ ७७ ॥

( ९ ) प्रवृत्ति कार्य के लिए जो चेटा होती है उसे प्रवृत्ति कहते हैं, वहीं क्रिया, कर्म, यला एवं कार्य - समारम्भ भा कहा जाता है ॥ ७७ ॥

विमर्श - न्यायदर्शन, वाणी, बुद्धि और शरीर से कार्य के आरम्भ को प्रवृत्ति कहता है, यथा-' प्रवृत्तिर्वाग् बुद्धिशरीरारम्भ इति ' इस प्रवृत्ति के दो भेद माने हैं - १. पापप्रवृत्ति, २. पुण्यप्रवृत्ति । उपायः पुनस्त्रयाणां कारणादीनां सौष्ठवमभिविधानं च सम्यक् कार्यकार्यफलानुबन्ध-वर्ज्यान, कार्याणामभिनिर्वर्तक इत्यतस्तुपायः कृते नोपायार्थोऽस्ति, न च विद्यते तदात्वे, कृताञ्च्चोत्तरकालं फलं, फलाञ्चानुवन्ध इति ॥ ७८ ॥

( १० ) उपाय - कारण, करण व कार्ययोनि का सौष्ठव ( अर्थात् कार्य के अनुरूप या अनुगुण. होना ) और अभिविधान ( कार्योत्पादक अवस्थिति ) का सम्यक् रूप से होना उपाय कहा जाता. हैं | कार्य, कार्यफल और अनुबंध को छोड़ कर करण, कारण और कार्ययोनि का कार्योत्पादक होना उपाय कहा जाता है । क्योंकि कारण आदि तीनों का सौष्ठव और अभिविधान कार्य उत्पादक होता है । इसलिये वह उपाय है । कार्य की उत्पत्ति के बाद उपाय का कोई प्रयोजन नहीं होता । जिस समय कार्य की उत्पत्ति होती है, उस समय भी उपाय की कोई आवश्यकता नहीं होती । १. ' अभिसंधानम्. । २. ' कार्यकार्य फलानुबन्धवर्ज्यानां तेषां तद्विकार्याणामभिनिर्वर्तकमित्यतस्तूपायः ' इति पा ० । ३. ' कार्यमिति शेषः ' चक्रः ।

पृष्ठ 855

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७६६ चरकसंहिता कार्य के उत्पन्न हो जाने पर उसका फल होना है । फल के वाद अनुबंध होता है । इसलिये कारण, करण, कार्ययोनि, इन तीनों को सुन्दर रूप से सम्पादन करने को ही उपाय माना जाता है ||| ७८ || एतदशविधमग्रे परीचयं, ततोऽनन्तरं कार्यार्थ प्रवृत्तिरिष्टा । तस्माद्भिषक कार्य चिकीर्षुः प्राक् कार्यसमारम्भात् परीक्षया केवलं परीच्यं परीचय कर्म समारभेत कर्तुम् ॥ ७ ९ ॥. परीक्षा के बाद ही कार्य का प्रारम्भ - यह कारण इत्यादि दश जो परीक्ष्य बताये हैं । उन्हें कार्य करने के पहले परीक्षा कर लेनी चाहिये । इसके बाद कार्य में प्रवृत होना श्रेष्ठ माना जाता है । इसलिये चिकित्सा के इच्छुक वैद्य चिकित्सा कार्यारंभ के पहले प्रत्यक्ष, अनुमान व आप्तोपदेश परीक्षा के द्वारा परीक्षा करने वाले विषयों की परीक्षा कर कर्म करना प्रारंभ करे ॥ ७ ९ ॥ तत्र चेद्भिषगभिषग्वा भिषजं कश्विदेवं खलु पृच्छेद् - वमनविरेचनास्थापनानुवासन-शिरोविरेचनानि प्रयोक्तुकामेन भिषजा कतिविधया परीक्षया कतिविधमेव परीचयं, कश्वात्र परीचयविशेषः, कथं च परीक्षितव्यः, किंप्रयोजना च परीक्षा, क च वमनादीनां प्रवृत्तिः क्व च निवृत्तिः, प्रवृत्तिनिवृत्तिलक्षणसंयोगे च किं नैष्ठिकं, कानि च वमनादीनां भेषजद्रव्याण्युपयोगं गच्छन्तीति ॥ ८० ॥

वमनादिविषयक ९ प्रश्न - यदि कोई वैद्य हो अथवा वैद्य न हो, कोई सामान्य पुरुष हो इस प्रकार वैद्य से पूछे कि वमन, विरेचन, आस्थापन अनुवासन, व शिरोविरेचन का प्रयोग करने की इच्छा रखने वाले चिकित्सकको कितने प्रकार की परीक्षाओं से कितने प्रकार के परीक्ष्य विषयों की परीक्षा करनी पड़ती है । परीक्ष्य विषयों के कितने व कौन - कौन से प्रकार है, किस प्रकार परीक्षा करनी चाहिये, परीक्षा का प्रयोजन क्या है, कहाँ वमन आदि पंचकर्म किये जाते हैं और कहाँ नहीं किए जाते? इनकी प्रवृत्ति और निवृत्ति के लक्षणों के संयोग होने पर क्या निश्चय करना चाहिये । कौन - कौन से भेषज ( द्रव्य ) वमन आदि कर्म के लिये उपयुक्त हैं ॥ ८० ॥

स एवं पृष्टो यदि मोहयितुमिच्छेत् ब्रूयादेनं- बहुविधा हि परीक्षा तथा परीक्ष्य-चिधिभेदः, कतमेन विविभेदप्रकृत्यन्तरेण भिन्नया परीक्षया केन वा विधिभेदप्रहृत्य तरेण परीक्ष्यस्य भिन्नस्य भेदाग्रं भवान् पृच्छत्याख्यायमानं; नेदानीं भवतोऽन्येन विधि-त्यन्तरेण भिन्नया परीक्षयाऽन्येन वा विधिभेदप्रकृत्यन्तरेण परीचयस्य भिन्नस्याभिलषित-मर्थ श्रोतुमहमन्येन परीक्षाविधिभेदेनान्येन वा विधिभेदप्रकृत्यन्तरेण परीचयं भित्त्वाऽन्य-थो ss चक्षाण इच्छां पूरयेयमिति ॥ ८१ ॥

और भी यदि वैद्य उस प्रश्नकर्ता को भ्रम में डालना चाहे तो उससे - इस प्रकार पूछने पर कहे - परीक्षाएँ अनेक प्रकार की होती हैं, परीक्ष्य विषय भी बहुत प्रकार के होते हैं । किस विधि - भेद के प्रकृत्यन्तर से भिन्न परीक्षा के द्वारा, किस विधि - भेद के प्रकृत्यन्तर से भिन्न परीक्ष्य के संख्या - भेद के विषय में आप मुझसे पूछ रहे हैं? ( अर्थात् परीक्षा करने की विधि अनेक प्रकार की होती है, परीक्ष्य विषय भी अनेक प्रकार के होते हैं । आप किस परीक्षा द्वारा परीक्षा करके किस परीक्षा करने योग्य विषय के भेद को मुझसे जानना चाहते हैं? जब तक आप अपने पूछने का तात्पर्य भली प्रकार नहीं समझाएँगे तब तक उत्तर भी नहीं समझ सकेंगे । ) अन्य किसी प्रकार के विविभेद कारणान्तर से भिन्न हुई परीक्षा द्वारा, अन्य किसी प्रकार भेद १. ' वेदानीम् ' ग. । २. ' मित्वाऽर्थमाचक्षाणः ' ग. ।

पृष्ठ 856

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रोगभिषग्जितीयविमानाध्यायः = | विमानस्थानम् ७६७ के भेदक धर्मान्तर से भिन्न परीक्ष्य विषय को पृथक् पृथक् कहता हुआ मै मनोनुकूल अर्थों को सुनने की इच्छा करने वाले आपकी इच्छा को इस समय पूर्ण न कर सकूंगा ॥ ८१ ॥

स यदुत्तरं ब्रूयात्तत् समीक्ष्योत्तरं वाच्यं स्याद्यथोक्तं च प्रतिवचनविधिमवेच्य सम्यक् यदि तु ब्रूयान्न चैनं मोहयितुमिच्छेत्, प्राप्तं तु वचनकालं मन्येत काममस्मै ब्रूयादाप्तमे निखिलेन ॥ ८२ ॥

और भी - वह पूर्वपक्षी जो उत्तर कहे, उसकी परीक्षा करके उत्तर दे । जो उचित हो और प्रतिवचन अर्थात् उत्तर देने की विधि ( विगृह्यसंभाषा में जो बनाया है ) का ध्यान रख कर उत्तर दे | यदि उत्तर उचित रूप में देता है तो उसे मूर्ख बनाने का प्रयास न करना चाहिये और समय पर युक्तियुक्त ठीक - ठीक उत्तर देना चाहिये । ऐसे विद्वान् के साथ जो कि ठीक - ठीक उत्तर दे रहा है, उससे सभी विषयों का प्रतिपादन विश्वासपूर्वक निडर होकर करना चाहिये ॥ ८२ ॥

* द्विविधा तु खलु परीक्षा ज्ञानवतां - प्रत्यक्षम्, अनुमानं च । एतद्धि द्वयमुपदेशश्च परीक्षा स्यात् । एवमेषा द्विविधा परीक्षा, त्रिविधा वा सहोपदेशेन ॥ ८३ ॥

परीक्षा के मेद - ज्ञानी विद्वानों के लिये परीक्षा दो प्रकार की होती है - १. प्रत्यक्ष, २. अनुमान वा प्रत्यक्ष, अनुमान यह दो और आप्होपदेश ये तीन परीक्षायें होती है । इस प्रकार ये दो परीक्षायें अथवा आप्तोपदेश लेकर तीन परीक्षायें होती है ॥ ८३ ॥

विमर्श - यहाँ पर दो या तीन परीक्षाओं का निर्देश किया गया है । दो परीक्षायें उन व्यक्तियों के लिये होती हैं जो आप्तोपदेश रूप शास्त्र के ज्ञान से सम्पन्न विद्वान् हैं । और तीन परीक्षायें सभी सामान्य व्यक्तियों के लिये है 1 । यद्यपि युक्ति व उपमान को भी प्रमाण रूप में चरक ने माना है । पर उसका अन्तर्भाव अनुमान के अन्तर्गत मान लिया जाता है । दशविधंतु परीचयं कारणादि यदुक्तमग्रे, तदिह भिषगादिषु संसार्य संदर्शयिष्यामः-इह कार्यप्राप्ती कारणं भिषक् " करणं पुनर्भेषजं, कार्ययोनिर्धातुवैषम्यं कार्यं धातुसाम्यं, कार्यफलं सुखावाप्तिः, अनुबन्धः खल्वायुः, देशो भूमिरातुरश्व, कालः पुनः संवत्सरश्चातुरा-वस्था च प्रवृत्तिः प्रतिकर्मसमारम्भः उपायस्तु भिषगादीनां सौष्ठवमभिविधानं च सम्यक् । इहाप्यस्योपायस्य विषयः पूर्वेणैवोपाय विशेषेण व्याख्यातः । इति कारणादीनि दश दशसु भिगादिषु संसार्य संदर्शितानि तथैवानुपूर्व्येतद्दशविधं परीच्यमुक्तं च ॥ ( ङ ) दशविध - परीक्षा का चिकित्सा शास्त्र में प्रयोग { Applied Aspect of Ten - Points Investigation in Medicine ) दश प्रकार की परीक्षा करने योग्य कारणादि पहले कह चुके हैं । उन्हीं को फिर यहाँ पर चिकित्सक, औषध आदि में विस्तार कर दिखाया जा रहा है । १. यहाँ पर कार्यप्राप्ति ( चिकित्सा द्वारा धातुओं को सम करने में ) में कारण वैद्य होता है । २. करण - औषध को कहा जाता है । क्योंकि स्वधातु - साम्य रूपी चिकित्सा में कारण वैद्य के सहायभूत औषध होता है । ३. कार्ययोनि - कार्य- रोग, उसका योनि ( कारण ) धातु का विषम होना है । ४. कार्य-धातुओं के विषम होने पर उत्पन्न रोगों में धातुओं को समकर रोगनाश करना कार्य होता है । ५. कार्यफल - सुख प्राप्ति है और इसी के द्वारा वैद्यों को अर्थ प्राप्ति और यशोलाभ भी २. ' कार्यप्राप्त ' इति पा ० । १. ‘ अवेक्ष्य सम्यक् । यदि तु न चैनं मोहयितुमिच्छेत् ' ग. । ३. ' अभिसंधानम् ' इति पा ० ।

पृष्ठ 857

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७६८ चरकसंहिता है । अतः अर्थप्राप्ति, यशप्राप्ति के साथ - साथ सुखप्राप्ति कार्यफल है । ६. अनुबंध - कार्यफल के बाद आयु का ठीक रहना ही अनुबंध है । ७. देश - भूमि और रोगी देश है । ८. काल -- यह संवत्सर और रोगी की अवस्थानुसार होता है । ९. प्रवृत्ति - प्रति रोगियों की चिकित्सा के लिये जो कार्य का आरंभ किया जाता है, उसे प्रवृत्ति कहते हैं । १०. उपाय - वैद्य, औषध, कार्य-योनि इन तीनों में अच्छी प्रकार कार्य करने की तत्परता का आना उपाय है । यहाँ भी इस उपाय के विषय की पहले कहे गये उपाय - भेद से ही व्याख्या की गई है । ये कारण आदि दश परीक्ष्यों को चिकित्सक आदि दश में विस्तार कर दिखा दिया गया है । उसी आनुपूर्वी से ही ये दश चिकित्सकादि के परीक्ष्य कहे गये हैं ॥ ८४ ॥

तस्य यो ' यो विशेषो यथा यथा च परीक्षितव्यः, स तथा तथा व्याख्यास्यते ॥ ८५ ॥

उन दश परीक्ष्यों के जिन जिन भेदों की जिस प्रकार परीक्षा होनी चाहिये, उनकी उस प्रकार ही व्याख्या की जाती है ॥ ८५ ॥

ल कारणं भिषगित्युक्तमग्रे, तस्य परीक्षा - भिपङ्नाम यो भिषज्यति यः सूत्रार्थप्रयोग-कुशलः, यस्य चायुः सर्वथा विदितं यथावत् । स च सर्वधातुसाम्यं चिकीर्षन्नात्मानमेवा-दितः परीक्षेत गुणिषु गुणतः कार्याभिनिर्वृत्तिं पश्यन् कच्चिदहमस्य कार्यस्याभिनिर्वर्त समर्थो न वेति; तत्रेमे भिपग्गुणा यैरुपपन्नो भिषग्धातुसाम्याभिनिर्वर्तने समय भवतिः तद्यथा - पर्यवदातश्रुतता, परिदृष्टकर्मता, दाच्यं शौचं जितहस्तना, उपकरणवत्ता, न्द्रियोपपन्नता, प्रकृतिज्ञता, प्रतिपत्तिज्ञता, चेति ॥ ८६ ॥

( १ ) कारण ( चिकित्सक के गुण ) - चिकित्सा में कारण चिकित्मक होता है । यह पहले कह आये हैं । उसकी परीक्षा यह है - चिकित्सक उसे कहते हैं जो चिकित्सा द्वारा रोग को दूर करना है, जो आयुर्वेद के सत्रों का अर्थ जानने और प्रयोग करने में कुशल है, जिसे ठीक - ठीक सभी प्रकार से आयु का ज्ञान हो । वह सभी धातुओं की समता रखने की इच्छा से अपनी आत्मा की ही पहले परीक्षा करे । गुणवान् वस्तुओं में गुण से कार्य की उत्पत्ति को देखते हुये कहीं हम इस कार्यको उत्पन्न करने में अर्थात् इस रोग की चिकित्सा करने में समर्थ होंगे या नहीं । उसमें ये वैद्य के गुण होते है --जिन से युक्त वैद्य धातुओं की समता उत्पन्न करने में समर्थ होता है । जैसे १. पर्यवदातश्रुतता । ( शास्त्रों का ज्ञान परिस्कृत होना ) । २. प्रत्येक कार्यों को देखने वाला होना, ३. कुशल होना, ४. पवित्र होना, ५. जितहस्तता ( हाथों का यशस्वी होना ), ६. सभी सामग्रियों से युक्त होना, ७. सभी इन्द्रियों से युक्त होना, ८. प्रकृति को समझना, ९ युक्ति को समझना या जिस रोग को जैसे समझना चाहिये उसे हेतु आदि के द्वारा उसी प्रकार समझने की शक्ति रखना या तत्काल बुद्धि का उदय होना ॥ ८६ ॥

करणं पुनर्भेषजम् । भेषजं नाम तद्यदुपकरणायोपकल्पते भिपजो धातु पाम्याभिनि-वृत्तौ प्रयतमानस्य विशेषतश्चोपायान्तेभ्यः । तद्द्द्विविधं व्यपाश्रयभेदात्- दैवव्यपाश्रयं, युक्तिव्यपाश्रयं चेति । तत्र देवव्यपाश्रयं - मन्त्रौषधिमणिमङ्गलबल्युपहार होम नियमप्राय--श्चित्तोपवासस्वस्त्ययनप्रणिपातगमनादि, युक्तिव्यपाश्चयं - संशोधनोपशमने चेष्टाश्च दृष्ट-फलाः । एतञ्चैव भेषजमङ्गभेदादपि द्विविधं द्रव्यभूतम् अद्रव्यभूतं च । तत्र दद्रव्य तं तदुपायाभिप्लुतम् । उपायो नाम भयदर्शन विस्मापनविस्मारण क्षोभणहर्षणभर्त्सनबधबन्ध-१. ' यो यः परीक्ष्यविशेषः ' ग. | २. ' अद्रव्यभूतं तद् यदुपायाभिप्लुतं ग. ।

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रोगभिषग्जितीयविमानाध्यायः - ] विमानस्थानम् ७६६ स्वसंवाहनादिरमूनों भावविशेशे यथोक्ताः सिद्धयुपायाश्चोपायाभिप्लुता इति । यत्त द्रव्यभूतं तद्वमनादिषु योगमुपैति । तस्यापीयं परीक्षा - इदमेवंप्रकृत्येवंगुणमेवंप्रभाव -स्मिन् देशे जातमस्मिन्नृतावेवं गृहीतमेवं निहितमेवमुपस्कृतमनया च मात्रया युक्तमस्मिन् व्याधाविधस्य पुरुषस्यैव तावन्तं दोषमपकर्षत्युपशमयति वा, यदन्यपि चैवंविधं भेषजं भवेत्तच्चानेन विशेषेण युक्तमिति ॥ ८७ ॥

( २ ) करण ( भेषज ) भेद - करण कहते हैं भेषज ( औषध ) को चिकित्सा करने में तत्पर वैद्य के लिये विशेष कर कार्ययोनि, प्रवृत्ति, देश, काल, उपायान्त कहे गए साधन आदि धातुसाम्य के लिए जो सामग्री होती है उसे नेपज कहते हैं । यह भेषज आश्रय भेद से दो प्रकार का होता है, १. दैवव्य-पाश्रय, २. युक्तित्र्यपाश्रय, इनमें मन्त्र, औषध, मणिवारण, मङ्गलपाठ, वलि, उपहार, होम, नियम, प्रायश्चित्त, उपवास, स्वस्त्ययनपाठ, प्रणिपात ( देवताओं को नम्रता पूर्वक नमस्कार ) गमन ( दूर - दूर तक जाकर तीर्थ करना या जैसे सुश्रुत ने प्रमेह यात्रा चिकित्सा में बताया है— ' अधनश्चेद् वैद्य संदेशाद् योजनशतं यायी स्यात् । सौ योजन ४०० कोश चलने से प्रमेह नष्ट होता है ) आदि क्रिया द्वारा जो चिकित्सा होती है उसे देवव्यपाश्रय औषध कहते हैं । संशोधन ( वमन, विरेचन, निरूह नस्य, क्रियाओं द्वारा दोपों को शरीर से अलग करना ), ' उपशमन ' ( विभिन्न पाचन - शमन आदि क्रियाओं द्वारा शरीर में ही दोपों को शान्त कर देना ) और प्रत्यक्ष फल देने वाली सभी क्रियायों को युक्तिन्व्यपाश्रय भेषज कहते हैं । यही भेषज अङ्गभेद से भी दो प्रकार का होता है १. द्रव्यभूत, २. अद्र्व्यभूत । इनमें उपायों द्वारा जो चिकित्सा होती है वह अद्रव्यभूत भेषज है । उपाय उसे कहते हैं जैसे भव दिखाना, विस्मापन ( आश्चर्य युक्त कर देना ) विस्मारण ( जिस बात को बार - बार स्मरण कर रोगी रोगग्रस्त हो जाता हो तो उसे भुला देना ), क्षोभण ( धातु एवं मन और शरीर में क्षोभ उत्पन्न करा देना ), हर्पण ( हर्प उत्पन्न कराना ), भर्त्सन ( निन्दा द्वारा फटकार ), वध ( मारने की धमकी देना ), बाँधना, शयन कराना, संवाहन, ( पैर मिजवाना ) आदि अमूर्त ( जिसका स्वरूप न हो ) क्रियाओं को और भी जो ठीक - ठीक सिद्धि के उपायों के साधन जैसे नौकर है उन सबों को उपाय कहा आता है । जो द्रव्यभूत भेषज हैं उनका मन विरेचन आदि क्रियाओं में प्रयोग होता है, उसकी भी परीक्षा इस प्रकार की जाती है । जैसे - यह द्रव्य इस प्रकृति ( स्वभाव ) का है, यह इसका गुण है, यह इसका प्रभाव है, इस देश में उत्पन्न हुआ, इस ऋतु में इसकी उत्पत्ति हुई है, या इस ऋतु में इस विधि द्वारा ग्रहण किया गया है, इस स्थान में इस विधि से निहित ( रखा गया ) है, इस प्रकार इस संस्कार द्वारा बनाया गया है, इस प्रकार के रोग में इस मात्रा से दिया जाय तो ऐसे पुरुष के शरीर से इतने मात्रा में दोषों को औषध निकालेगी या शरीर में ही दोषों को शान्त कर देगी । और जो भी औषध इस प्रकार के कार्य को करने वाले होते हैं उन्हें सभी को इस द्रव्य भूत औषध में समावेश कर लिया जाता है ॥ ८७ ॥

कार्ययोनिर्धातुवैषम्यं तस्य लक्षणं विकारागमः । परीक्षा स्वस्य विकारप्रकृतेश्चैवोना-तिरिक्तलिङ्गविशेषावणं विकारस्य च साध्यासाध्यमृदुदारुणलिङ्गविशेषावेक्षणमिति ॥ ८८ ॥

( ३ ) कार्ययोनि की परीक्षा - • धातुओं का विषम होना, कार्ययोनि है । उसका लक्षण रोगों का उत्पन्न होना है । इसकी परीक्षा रोगों की प्रकृति अधिक या कम लक्षण का होना और रोगों के साध्य, असाध्य, मृदु और दारुण लक्षणों को बार - बार ध्यान से देखना इसकी परीक्षा है ॥ ८८ ॥

कार्यं धातुसान्यं, तस्य लक्षणं विकारोपशमः । परीक्षा त्वस्य - रुगुपशमनं, स्वरवर्ण-१. गङ्गाधरस्तु ' उपायाभिप्लुताः ' इति न पठति । ४६ च ० सं ०

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७७० चरकसंहिता योगः, शरीरोपचयः, बलवृद्धिः, अभ्यवहार्याभिलाषः, रुचिराहारकाले, अभ्यवहृतस्य चाहारस्य काले सम्यग्जरणं, निद्रालाभो यथाकालं, वैकारिकाणां च स्वप्नानामदर्शनं, सुखेन च प्रतिबोधनं, वातमूत्रपुरीषरेतसां मुक्तिः, सर्वाकारैर्मनोबुद्धीन्द्रियाणां चाव्यापत्तिरिति ॥ ८ ९ ॥ ( ४ ) कार्य की परीक्षा - धातुओं को सम करना वैद्यों का कार्य होता है, रोगों का शान्त हो जाना उसका लक्षण है । इसकी परीक्षा निम्न प्रकार से की जाती है । वेदना का शान्त होना, स्वर और वर्ण का ठीक रहना, शरीर एवं बल की वृद्धि, भोजन करने की इच्छा, आहार में रुचि का होना, समय पर खाये हुये आहार का उचित समय से ठीक पच जाना, समय से निद्रा का आना, बुरे स्वप्नों का न देखना, सुखपूर्वक समय से सोकर उठ जाना, वात, मूत्र, पुरीष और शुक्र का अच्छी प्रकार से बिना किसी कष्ट के निकल जाना, मन, बुद्धि और इन्द्रियों का सभी तरह से कष्टरहित होना अर्थात् शारीरिक या मानसिक रोगों से पीड़ित न होना, धातु साम्य ( स्वस्थ मनुष्यों के ) कार्य की परीक्षा है ॥ ८ ९ ॥ कार्यफलं सुखावाप्तिः, तस्य लक्षणं - मनोबुद्धीन्द्रिय शरीर तुष्टिः ॥ १० ॥

( ५ ) कार्यफल - चिकित्सा रूपी कार्य का फल सुख की प्राप्ति है । मन, बुद्धि, इन्द्रिय, शरीर में संतोष रहना उसका लक्षण है ॥ ९ ० ॥ अनुबन्धस्तु खल्वायुः, तस्य लक्षणं - प्राणैः सह संयोगः ॥ ९ १ ॥ -( ६ ) अनुबंध. • आयु को अनुबन्ध कहते हैं । प्राणों के साथ मन, बुद्धि, शरीर का संयोग होना ही उसका लक्षण है ॥ ९ १ ॥ देशस्तु भूमिरातुरश्च ॥ ९ २ ॥ ( ७ ) देश -- देश तो भूमि और रोगी का शरीर है ॥ ९ २ ॥ विमर्श - यह देश परीक्षा का प्रकरण १२४ गद्य ( पृष्ठ ७८४ ) तक वर्णित है । तत्र भूमिपरीक्षा आतुरपरिज्ञानहेतोर्वा स्यादौषधपरिज्ञानहेतोर्वा । तत्र तावदिय-मातुर परिज्ञानहेतोः । तद्यथा - अयं कस्मिन् भूमिदेशे जातः संवृद्धो व्याधितो वा; तस्मिंश्च भूमिदेशे मनुष्याणामिदमाहारजातम्, इदं विहारजातम्, इदमाचारजातम्, एतावच्च बलम्, एवंविधं सग्वम्, एवंविधं सात्म्यम्, एवंविधो दोषः, भक्तिरियम, इमे व्याधयः, हित-मिदम्, अहितमिदमिति प्रायोग्रहणेन । औषधपरिज्ञानहेतोस्तु कल्पेषु भूमिपरीक्षा वक्ष्यते ॥ ९ ३ ॥ ( क ) भूमिपरीक्षा - उनमें भूमि की परीक्षा रोगी का परिज्ञान अर्थात् पूर्ण ज्ञान के लिये या औषधि का पूर्ण ज्ञान करने के लिये की जाती है । उसमें रोगी के ज्ञान करने के लिये यह परीक्षा की जाती है । जैसे यह रोगी किस देश में उत्पन्न हुआ है? किस देश में इसका पालन हुआ है? किस देश में रुग्ण हुआ है? उस उत्पन्न, पालन, और रुग्ण होने के देशों में मनुष्यों का इस प्रकार का आहार होता है, इस प्रकार का विहार होता है ऐसा आचार और उस देश के मनुष्यों में इतना बल होता है । ऐसा सच ( मन ) होता है । उस देश के मनुष्यों का ये आहार-विहार सात्म्य ( प्रकृति के अनुकूल ) हैं इस प्रकार वातादि दोष बढ़ते हैं । इस तरह यह इच्छा होती है । यह रोग अधिक होता है । यह उन लोगों के लिये हिनकर है और यह आहार - विहार अहितकर इत्यादि की परीक्षा की जाती है । औषध को पूर्ण रूप से जानने के लिये भूमि परीक्षा कल्प स्थान में कही जायगी ॥ ९ ३ । १. गङ्गाधरस्तु ' प्रायोग्रहणेन ' इति न पठति ।

पृष्ठ 860

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रोगभिषग्जितीयविमानाध्याय: ८ ] विमानस्थानम् ७७१ आतुरस्तु खलु कार्यदेशः । तस्य परीक्षा आयुषः प्रमाणज्ञानहेतोर्वा स्यात्, बलदोप-प्रमाणज्ञानहेतोर्वा । तत्र तावदियं बलदोषप्रमाणज्ञानहेतोः; दोपप्रमाणानुरूपो हि भेषज-प्रमाणविकल्प प्रमाणविशेषापेक्षो भवति । सहसा ह्यतिबलमौषधमपरीक्षक प्रयुक्तमल्प-बलमातुरमतिपातयेत्; न ह्यतिवलान्याग्नेयवायवीयान्यौषधान्यग्निक्षारशस्त्रकर्माणि वा शक्यन्तेऽल्पवलैः सोढुम्; असह्यातितीच्णवेगत्वाद्धि तानि सद्यः प्राणहराणि स्युः । एतञ्चैव कारणमपेक्षमाणा हीनबल्मानुरमविपादकरैर्मृदु सुकुमारप्रायैरुत्तरोत्तर गुरुभिरविभ्रमैरनात्य-यिकैश्चोपचरन्त्यौषधैः; विशेषतश्च नारीः, ता ह्यनवस्थितमृदुविवृतविक्लवहृदयाः प्रायः सुकुमार्योऽबलाः परसंस्तभ्याश्च । तथा बलवति बलवद्वयाधिपरिगते: स्वल्पबलमौषधम-परीक्षकप्रयुक्तमसाधकमेव भवति । ( च ) दशविध आतुर परीक्षा ( Ten Investigations Regarding Patients ) ( ख ) रोगी शरीर परीक्षा - चिकित्सा रूपी कार्य का देश रोगी का शरीर होता है । इसकी परीक्षा आयु के प्रभाग जानने के लिये या रोगी का बल - दोष के प्रमाणों को जानने के लिये की जाती है । इनमें बल एवं दोष प्रमाण जानने के लिये इस प्रकार परीक्षा की जाती है । दोष के प्रमाण के अनुरूप औषध का प्रमाण दिया जाता है । या रोगी का बल या रोग का बल देखकर औषधि की मात्रा निश्चित की जाती है । क्योंकि सहसा अत्यन्त बलवान औषधि अर्थात् तीक्ष्ण वीर्य या मात्रा में अधिक, रोगी की परीक्षा न कर यदि दुर्बल रोगी में प्रयुक्त की जाय तो अत्यन्त बलवान होने से रोगी को सहसा मार डालती है । इसी प्रकार अल बल वाले मनुष्य अत्यन्त बलबान आग्नेय गुण भूयिष्ठ ( उष्ण ), वायव्य ( वायु गुण ) प्रधान औषधियाँ या अग्नि, क्षार, शस्त्र कर्म को महने में असमर्थ होते हैं । क्योंकि अत्यन्त क्षीण होने से औषधि के वेगों को सहन नहीं कर सकते हैं । फल स्वरूप वह औषध रोगी के प्राणों को नष्ट सहमा करने वाला होता है । इन्हीं कारणों को विचार करते हुये वैद्य समुदाय हीन बल वाले रोगी के लिये जो विषाद न उत्पन्न कर सके, मृदु एवं सुकुमार, उत्तरोत्तर गुरु, विभ्रमरहित, उपद्रव न करने वाले औषध द्रव्यों से चिकित्सा करते हैं । विशेषकर स्त्रियों की चिकित्सा इसी प्रकार से की जाती है । क्योंकि उनका हृदय अनवस्थित ( स्थिर नहीं ) मृदु और विवृत होता है । शीघ्र ही थोड़ी ही विपत्ति से घबड़ा जाने वाली होती हैं । और स्त्रियाँ सुकुमार, अबला और दूसरे के सहारे रहने वाली होती हैं । जब बिना परीक्षा किये हुये बलवान रोगी व बलवान रोग के होने पर अल्प बल वाली औषधियों को दिया जाता है । तो वह कार्यकर नहीं होती है । तस्मादातुरं परीक्षेत प्रकृतितश्च, विकृतितश्च, सारतश्च, संहननतश्च, प्रमाणतश्च, सात्म्यतश्च, सत्त्वतश्च, आहारशक्तितश्च, व्यायामशक्तितश्च, वयस्तश्चेति, बलप्रमाणविशेष-ग्रहणहेतोः ॥ ९ ४ ॥ इसलिए रोगी के विशेष रूप से बल के प्रमाण को जानने के लिए - १. प्रकृति, २. विकृति, ३. सार, ४. संहनन, ५ प्रमाण, ६. सात्म्य ७ सन्च, ८. आहारशक्ति, ९. व्यायामशक्ति और १०. वय ( अवस्था ) से परीक्षा की जाती है ॥ ९ ४ ॥ तत्र प्रकृत्यादीन् भावाननुव्याख्यास्यामः । तद्यथा - शुक्रशोणितप्रकृतिं, कालगर्भा-१. ' भेषजप्रमाणविशेषः ' इति पा ० । २. ' मृदुविवृतमगम्भीरं ' चक्रः । " मृदुत्रिवृत ० यो । ३. ' परमसंस्तभ्याश्च ' यो । पा ० । ४. ' तत्रे प्रकृत्यादयो भावाः ' इति