चरक संहिता हिन्दी भाष्य — पृष्ठ 861–870
चरक संहिता हिन्दी भाष्य · Chaukhamba · पृष्ठ 861–870
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७७२ चरकसंहिता शयप्रकृतिमातुराहारविहारप्रकृतिं महाभूतविकारप्रकृतिं च गर्भशरीरमपक्षते । एतानि हि येन येन दोषेणाधिकेन केननिकेन वा समनुबद्ध्यन्ते, तेन तेन दोषेण गर्भोऽनुबद्ध्यते; ततः सा सा दोषप्रकृतिरुच्यते मनुष्याणां गर्भादिप्रवृत्ता । तस्माच्छ लेप्मलाः प्रकृत्या
केचित्, पित्तलाः केचित्, वातलाः केचित् संसृष्टाः केचित्, समधातवः केचिद्भवन्ति ।
तेषां हि लक्षणानि व्याख्यास्यामः ॥ ९ ५ ॥।
( १ ) प्रकृति परीक्षा ( Investigation for Constitution ) प्रकृतिपरीक्षा - प्रकृति आदि दश जो परीक्षा के लिए भाव बताये हैं उनकी व्याख्या की जाती है । जैसे - गर्भ शरीर शुक्र और आर्त्तव प्रकृति की, काल और गर्भाशय प्रकृति की, माता के आहार - विहार प्रकृति की महाभूत विकार - प्रकृति की अपेक्षा रखता है । यह प्रकृति जिस जिस - दोष के आधिक्य से हो, जैसे- एक दोष के या दो दोष के या अनेक दोष के आधिक्य से होने पर उन्हीं उन्हीं दोषों से गर्भ भी ( गर्भाशयस्थ बालक ) सम्बन्धित हो जाता है इसके बाद गर्भकाल से ही लेकर मनुष्यों की जो प्रकृति बनती है उसे दोष प्रकृति कहते हैं । इसलिए कुछ मनुष्य प्रकृति से वातल, कुछ पित्तल, कुछ श्लेष्मल, कुछ द्वन्द्वज प्रकृति और कुछ सनधातु-प्रकृति वाले होते हैं । उनके लक्षणों का व्याख्यान करेंगे ॥ ९ ५ ॥ विमर्श - मनुष्यों की प्रकृति गर्भकाल से ही बनती है उसके लिए सात कारणों का उल्लेख मूल में किया गया है । इसी बात को सुश्रुत में कहा है- ' शुक्रशोणितसंयोगे यो भवेद् दोष उत्कटः । प्रकृतिर्जायते तेन तस्या में लक्षणं शृणु ॥ ' लेमा हि त्रिग्धलक्ष्णमृदुमधुरसारसान्द्रमन्दस्तिमितगुरुशीत विजलाच्छः । तस्य स्नेहाच्छ लेप्मलाः, स्निग्धाङ्गाः, श्लक्ष्णत्वाच्छ्रलचणाङ्गाः, मृदुत्वाद्द्दष्टिसुखसुकुमारावदात-गात्राः, माधुर्यात् प्रभूतशुक्रव्यवायापत्याः सारत्वात् सारसंहत स्थिरशरीराः सान्द्रत्वादु-पचितपरिपूर्णसर्वाङ्गाः, मन्दत्वान्मन्दचेष्टाहारव्याहाराः, स्तैमित्यादशीघ्रारम्भक्षोभविकाराः, गुरुत्वात् साराधिष्ठितावस्थितगतयः, शैत्यादल्पत्तुत्तृष्णा संतापस्वेददोषाः, विजत्वात् सुश्लिष्टसारसन्धिवन्धनाः, तथाऽच्छुत्वात् प्रसन्नदर्शनाननाः प्रसन्नस्निग्धवर्णस्वराश्व भवन्ति । त एवंगुणयोगाच्छ्लेप्मला बलवन्तो वसुमन्तो विद्यावन्त ओजस्विनः शान्ता आयुष्मन्तश्च भवन्ति ॥ ९ ६ ॥ १. इलेष्म प्रकृति के लक्षण कफ, स्निग्ध, लक्षण, मृदु, मधुर, सार, सान्द्र, मन्द स्तिमित, गुरु, शीत, पिच्छिल, और स्वच्छ होता है । उस कफ के स्निग्ध होने से कफ प्रकृति, वाले मनुष्य स्निग्ध अङ्गवाले होते हैं । ऋण होने से क्षण अङ्ग वाले होते हैं । मृदु होने के कारण देखने में सुन्दर सुकुमार और गौर वर्ण के होते हैं । मधुर होने के कारण कफ प्रकृति वाले मनुष्य अधिक शुक्र वाले, अधिक मैथुन करने में समर्थ और अधिक सन्तान वाले होते हैं । सार गुण होने से सार और सङ्गठित एवं स्थिर शरीर वाले होते हैं । कफ के सान्द्र गुण होने से कफ प्रकृति वाले मनुष्य के सभी अङ्ग पुष्ट और परिपूर्ण होते है । कफ के मन्द्र गुण होने से कफ प्रकृति वाले मन्द चेष्टा, अल्प आहार - विहार करने वाले होते हैं । कफ के स्तिमित गुण होने से कफ प्रकृति वाले मनुष्य किसी भी कार्य को शीघ्र नहीं करते हैं । अर्थात् सोच - विचार कर या आलस्य से देर से करते हैं । कभी भी उनके मन में क्षोभ ( दुःख ) एवं विकार नहीं होते अथवा देर से और कम होते हैं । कफ के गुरु १. ' दोपेण एकेनाधिकेन समेन वाऽनुबध्यन्तेः ग. । ३. ' साराधिष्ठितगतयः ' यो । २. ' ० पिच्छिलाच्छः ' इति पा ० । ४. ' पिच्छिलावात् ' इति पा ० ।
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रोगभिषग्जितीयविमानाध्यायः ८ ] विमानस्थानम् ७७३ गुण होने के कारण कफ प्रकृति वालों की गति दृढ़ और निश्चित रूप से होती है । ( अर्थात् जिस कार्य को करने की प्रतिज्ञा कर लेंगे उससे विमुख न होंगे और ऐसे कार्य करेंगे जिससे अपनी प्रतिष्ठा बनी रहे और कार्य करने में चञ्चल भी नहीं होते ) । कफ के शीत गुण होने के कारण कफ प्रकृति वाले मनुष्यों को भूख प्यास, ताप, पसीना और दोष कम कष्ट देते हैं । कफ के पिच्छिल गुण होने से कफ प्रकृति वाले मनुष्यों का सन्धिबन्धन एक में सटा हुआ और वलवान् होता है । कफ के अच्छे गुण होने से कफ प्रकृति वाले मनुष्यों की दृष्टि, मुख प्रसन्न एवं स्निग्ध दिखाई पड़ते हैं । और उनके वर्ण और स्वर भी स्निग्ध एवं प्रसन्न होते हैं । इस प्रकार इन उपर्युक्त गुणों के कारण कफ प्रकृति वाले मनुष्य बलवान्, धनी, विद्या वाले, ओजस्वी, शान्त और अधिक आयु वाले होते हैं ॥ ९ ६ ॥ पित्तमुष्णं तीक्ष्णं द्रवं बिस्रमम्लं कटुकं च । तस्यौष्ण्यात् पित्तला भवन्त्युष्णासहा; उष्णमुखाः, सुकुमारावदातगात्राः, प्रभूतविप्लुव्यङ्गतिलपिडकाः, चुत्पिपासावन्तः क्षिप्र-वलीपलितखालित्य दोषाः । प्रायोमृद्वल्पकपिलश्मश्रुलोमकेशाश्च तैच्ण्यात्तीक्ष्णपराक्रमाः, तीक्ष्णाग्नयः, प्रभूताशनपानाः क्लेशास हिष्णवो, दन्दशूकाः; द्रवत्वाच्छिथिलमृदुसन्धिर्मासाः, प्रभूतसृष्टस्वेदमूत्रपुरीषाश्च; विस्रत्वात् प्रभूत पूतिकक्षास्यशिरः शरीरगन्धाः; कट्वम्लत्वादल्प-शुक्रव्यवायापत्याः; त एवंगुणयोगात् पित्तला मध्यबला मध्यायुषो मध्यज्ञानविज्ञानवित्तोप-करणवन्तश्च भवन्ति ॥ ९ ७ ॥ २. पित्तप्रकृति के लक्षण - पित्त, उष्ण, तीक्ष्ण, द्रव, विस्र, अम्ल, कटु गुणयुक्त होता है । पित्त उष्ण गुण होने से पित्त प्रकृति के मनुष्य उष्ण वातावरण में रहना पसन्द नहीं करते । अर्थात् उन्हें सहन नहीं होता | उनका मुख उष्ण होता है । वे सुकुमार और गौरवर्णं होते हैं । उनके शरीर के ऊपर विप्लु ( छोटी - छोटी फुन्सियाँ ), व्यङ्ग ( मुख में झाँई ), तिल एवं पिड़काएँ अधिक होती हैं । उन्हें भूख और प्यास अधिक लगती है । शीघ्र ही अर्थात् समय के पहले वली ( झुर्री पड़ना ), पलित ( बालों का पकना ) और खालित्य दोष ( वालों का गिरना ) युक्त पित्त प्रकृति वाले होते हैं । प्रायः दाढ़ी के बाल, शरीर के रोम, शिर के बाल मृदु अल और कपिलवर्ण ( बन्दरों के बालों की तरह ) के होते हैं । पित्त के तीक्ष्ण गुण होने से पित्त प्रकृति वाले तीक्ष्ण पराक्रम एवं तीक्ष्ण अग्नि वाले, अधिक मात्रा में खाने - पीने वाले, कष्ट के न सहन करने वाले एवं बार - बार खाने वाले होते हैं । पित्त के द्रव गुण होने से पित्त प्रकृति वाले मनुष्य की सन्धियाँ एवं मांस पेशियाँ शिथिल एवं कोमल होती हैं और पसीना, मूत्र और मल अधिक मात्रा में करने वाले होते हैं । पित्त के विस्र होने के कारण पित्त प्रकृति वाले मनुष्य की काँख, मुख, शिर और शरीर से अधिक दुर्गन्ध निकलती है । पित्त के कटु एवं अम्ल रस होने के, कारण पित्त प्रकृति वाले पुरुष अल्प शुक्र, अल्प मैथुन - शक्ति एवं अल्प पुत्र वाले होते हैं । इस प्रकार उपर्युक्त गुणों के संयोग से पित्त प्रकृति के मनुष्य मध्य बल, मध्य आयु, मध्य ज्ञान, विज्ञान, धन एवं उपकरण ( सामग्री ) वाले होते हैं ॥ ९ ७ ॥ वातस्तु रूक्षलघुचलबहुशीघ्रशीत परुषविशदः । तस्य रौच्याद्वातला रूक्षापचितात्प-शरीराः प्रततरूक्षत्क्षामसन्नसक्तजर्जरस्वरा जागरूकाश्च भवन्ति, लघुत्वाल्लघुचपलगतिचेष्टा-हौरव्याहाराः, चलत्वाद नवस्थित सन्ध्यक्षि ब्रहन्वोष्जिह्वाशिरःस्कन्धपाणिपादाः, वहु-वहुप्रलाप कण्डरा सिराप्रतानाः, शीघ्रत्वाच्छीघ्रसमारम्भक्षोभविकाराः शीघ्रत्रासराग-१. ' ० चेष्टाहाराः ' इति पा ० । २. ' भीमारम्भ ' ह. ।
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७७४ चरकसंहिता विरागाः श्रुतग्राहिणोऽल्पस्मृतयश्च, शैत्याच्छीतासहिष्णवः प्रततशीतकोद्वेपकस्तम्भाः, पारुष्यात् परुषकेशश्मश्रुरोमनखदशनवदनपाणिपादाः, वैशद्यात् स्फुटिताङ्गावयवाः सतत-सन्धिशब्दगामिनश्च भवन्ति त एवं गुणयोगाद्वातलाः प्रायेणाल्पवलाश्चाल्पायुपश्चाल्पाप-त्याश्रातपसाधनाश्चाल्पधनाश्च भवन्ति ॥ ९ ८ ॥ ३. वातप्रकृति के लक्षण - वायु रूक्ष, लघु, चल, बहु, शीघ्र, शीत, पुरुष, विशद, गुणयुक्त होता है । वायु के रूक्ष गुण के कारण वात प्रकृति वाले मनुष्य का शरीर रूखा, कृश, ( दुबला - पतला ) और छोटा होता है । उनका स्वर ' अत्यन्त रूक्ष, क्षाम ( क्षीण ) भिन्न ( फटा हुआ ), मन्द ( धीरे - धीरे ), सक्त ( रुक - रुक कर बोलना ) और जर्जर ( सुनने में कटु एवं अप्रिय ) होता है । उन्हें निद्रा कम आती हैं । वायु के लघु होने से वान प्रकृति वाले मनुष्यों की गति, चेष्टा एवं आहार लघु एवं चञ्चल होता है । अर्थात् गति और चेष्टाए थोड़ी और अनियमित होती हैं भोजन थोड़ा और बार - बार होता है । वायु के चल गुण होने से वात प्रकृति वाले मनुष्य की सन्धि, हड्डी, भ्रू, हनु, ओठ, जीभ, शिर, कन्धा, हाथ और पैर चञ्चल होते हैं । वायु में बहुगुण होने के कारण वात प्रकृति वाले अधिक बोलते हैं और उनके शरीर में कण्डरा तथा शिराओं का प्रसार अधिक दिखाई पड़ता है । वायु के शीघ्र गुण होने के कारण वात प्रकृति वाले मनुष्य सभी कार्यों को शीघ्र ही आरम्भ करते हैं और उनके मन में शीघ्र ही क्षोभ ( दुःख ) उत्पन्न होता है । रोग भी शीघ्र ही उत्पन्न होते हैं वे शीघ्र ही भय, प्रेम और वैराग्य से युक्त होते हैं और वात प्रकृति वाले किसी भी बात को सुन कर शीघ्र ही ग्रहण कर लेते हैं । पर उन्हें शीघ्र ही भूल भी जाते हैं । वायु के शीत गुण होने के कारण वात प्रकृति वाले मनुष्य शीतलता को नहीं सहने बाले होते हैं । उन्हें निरन्तर शीतजन्य विकार, कम्प तथा स्तम्भ ( जकड़ाहट ) होती रहती है । वायु के परुष होने के कारण वातप्रकृति वाले पुरुष के केश, दाढ़ी, रोम, नख, दाँत, मुख, हाथ, पैर तथा शरीर के अन्य अङ्ग परुष अर्थात् खुरदरे होते हैं । वायु के विशद होने से वात प्रकृति वाले मनुष्य के अङ्ग और प्रत्यङ्ग फटे हुए होते हैं और उनकी सन्धियों से चलते समय निरन्तर शब्द निकलते रहते हैं । इस प्रकार इन उपर्युक्त गुणों के संयोग से वात प्रकृति वाला मनुष्य प्रायः अल्पबल वाला, कम आयु और कम सन्तान वाला और कम साधन सामग्री वाला एवं दरिद्र होता है ॥ ९ ८ ॥ संसर्गात् संसृष्टलक्षणाः ॥ ९९ ॥
४, ५, ६. द्वन्द्वज प्रकृति - इन ऊपर बताई हुई भिन्न - भिन्न प्रकृतियों के लक्षण यदि एक ही पुरुष में दो - दो प्रकृतियों के लक्षण मिल जाँय तो उसे द्वन्द्वज प्रकृति वाला कहा जाता है ॥ ९९ ॥
सर्वगुणसमुदितास्तु समधातवः । इत्येवं प्रकृतितः परीक्षेत ॥ १०० ॥
७. समधातु प्रकृति - ऊपर बताए हुए तीनों दोषों की प्रकृतियों के लक्षण यदि एकत्र पाये जाँय तो उन्हें सम धातु प्रकृति वाला कहा जाता है । इस प्रकार प्रकृति से रोगी की परीक्षा करनी चाहिए ॥ १०० ॥
विमर्श - रोगियों की परीक्षा प्रकृति के अनुसार करने का आदेश आचार्य चरक ने दिया है । इसका तात्पर्य यह है कि जिस प्रकृति का जो रोगी होता है, उसकी प्रकृति का ध्यान रखते हुए चिकित्सा की जाती है । जैसे- पित्त प्रकृति का मनुष्य यदि बात रोग से पीड़ित हो गया तो वातनाशक उष्ण द्रव्यों का प्रयोग नहीं किया जाता है क्योंकि पित्त प्रधान शरीर में उष्ण गुण युक्त द्रव्य वात को शान्त करते हुए शीघ्र ही पित्त को भी कुपित कर देंगे । इसलिए बात-
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रोगभिषग्जितीयविमानाध्यायः ८ ] विमानस्थानम् ७७५ नाशक से युक्त एवं गुरु द्रव्यों का ही प्रयोग किया जाता है जिससे वायु शान्त हो जाय और पित्त का विरोध भी न हो । दूसरी बात प्रकृति के अनुसार रोग के साध्यासाध्यत्व का भी ज्ञान होता है और रोग साध्य होने पर ही चिकित्सा की जाती है । जैसा कि मुश्रुत ने ' प्रकोपो वाऽन्यथाभावः क्षयो वा नोपजायते । प्रकृतीनां स्वभावेन जायते तु गतायुषः ॥ ' ( शा. अ. ४ ), चरक ने ' प्रकृतियतेऽत्यर्थ विकृतिश्चाभिवर्द्धते । कृत्स्नमौत्पातिकं घोरमरिमुपलक्ष्यते । ' ( इ. अ. १२ ) और वाग्भट ने भी ' गुगोपनयी यस्य स्वस्थस्य व्याधितस्य वा । चात्यन्यथात्वं प्रकृतिः षण्मासान्न सजीवनि ॥ ' कहा है । इस प्रकार प्रकृति की परीक्षा कर उसकी चिकित्सा की जानी है । यदि दोष के अनुसार या सत्त्व, रज, तम के अनुसार या पंचमहाभूत के अनुसार जन्म काल से ही नियत प्रकृति वाले पुरुषों में सहमा परिवर्तन हो तो विकृति अर्थात् अरिष्ट समझा जाता है । विकृतितश्चेति विकृतिरुच्यते विकारः । तत्र विकारं हेतु - दोष - हृदय - प्रकृति- देश - काल-बलविशेषैलिंङ्गतश्च परीक्षेत, न ह्यन्तरेण हेवादीनां बलविशेषं व्याधिबलविशेषोपलब्धिः यस्य हि व्याधेर्दोष- दूष्य - प्रकृति - देश - काल- बलसाम्यं भवति, महच्च हेतुलिङ्गबलं, स व्याधिर्बलवान् भवनि; तद्विपर्ययाच्चाल्पबलः मध्यबलस्तु दोषदूष्यादीनामन्यतमसामा-न्याद्धेतु लिङ्गमध्यबलत्वाच्चोपलभ्यते ॥ १०१ ॥
( २ ) विकृति परीक्षा ( Pathological Investigation ) विकृति परीक्षा - विकृति के द्वारा परीक्षा इस प्रकार करनी चाहिए -- विकृति कहते हैं विकार को, उसकी परीक्षा हेतु, दोष, दूष्य, प्रकृति, देश, काल बल, इनके भेदों से तथा इनके लक्षणों द्वारा करनी चाहिए, क्योंकि हेतु आदि के बल को जब तक न जाना जावे तब तक व्याविवल का ज्ञान नहीं हो सकता । जिस व्यावि का दोष, दूष्य, प्रकृति, देश, काल का बल समान होता है । और हेतु और लक्षण का बल अधिक होता है, वह व्याधि बलवान होती है । इसके विपरीत, अर्थात् दोष, दूष्य, प्रकृति, देश, काल समान न हो और कारण और लक्षण ये बहुत कम हों तो व्याधि • दुर्बल होती है । जिस व्याधि के दोष, दूष्य, प्रकृति देश, काल इनमें कुछ की समानता हो और कुछ की असमानता हो और कारण तथा लक्षणों का मध्यबल हो तो वह रोग मध्यबल वाला होता है ॥ १०१ ॥
सारतश्चेति साराण्यष्टौ पुरुषाणां बलमानविशेषज्ञानार्थमुपदिश्यन्ते; तद्यथा - वग्रक-मांसमेदोऽस्थिमज्जशुक्रसत्त्वानीति ॥ १०२ ॥
( ३ ) सार परीक्षा ( Investigation for the Strength of the Systems ) सारपरीक्षा - सार द्वारा परीक्षा इस प्रकार करें पुरुषों के बल का प्रमाण जानने के लिए आठ प्रकार के सार बताये गये हैं, जैसे- १. त्वचासार, २. रक्तसार, ३. मांससार, ४. मैद्रसार, ५. अस्थिसार, ६. मज्जासार, ७ वीर्यसार, ८ सत्त्वसार, इन सब की परीक्षा ठीक - ठीक रूप से प्रत्येक पुरुष में की जाती है ॥ १०२ ॥
तत्र स्निग्धलचणमृदुप्रसन्नस्च्माल्पगम्भीर सुकुमारलोमा सप्रभेव च स्वक् त्वक्सा-राणाम् । सा सारता सुखसौभाग्यैश्वयोंपभोगबुद्धिविद्यारोग्यप्रहर्षणान्यायुज्यत्वं चाचष्टे ॥ १. त्वचासार पुरुष के लक्षण - त्वक्सार पुरुष की त्वचा स्निग्ध, लक्षण, कोमल, देखने में प्रसन्न, सूक्ष्म अर्थात् पतली, गहरी, सुकुमार, रोमवाली एवं चमकदार होती है । इस प्रकार का सार होना सुन, सौभाग्य, ऐश्वर्य, उपभोग, बुद्धि, विद्या, आरोग्य, प्रसन्नता तथा दीर्घायु का सूचक है ॥
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७७६ चरकसंहिता कर्णाक्षिमुख जिह्वानासौष्ठपाणिपादतलनखललाटमेहनं स्त्रिग्धरक्तवर्णं श्रीमद्भाजिष्णु रक्तसाराणाम् । सा सारता सुखमुद्धतां मेधां मनस्त्रित्वं सौकुमार्यमनतिवलमक्लेशसहिष्णुत्व-मुष्णासहिष्णुत्वं चाचष्टे ॥ १०४ ॥
२. रक्तसार पुरुष के लक्षण - रक्तसार पुरुष के कान, नेत्र, मुख, जीभ, नासिका, ओष्ठ, हाथ और पैर के तलवे, नख, ललाट और मूत्रेन्द्रिय स्निग्ध, रक्तवर्ण की, शोभायुक्त और चमकने वाली होती हैं । इस प्रकार का सार होना, मुख, उद्दण्डता, धारणाशक्ति, मनस्विता, सुकुमारता, अधिक बल की क्षमता होना, कष्ट सहने वाला और गर्मी को न सहन करने की योग्यता का है ॥ १०४ ॥
सूचक शङ्खललाटकृकाटिकाक्षिगण्डहनुग्रीवास्कन्धोदर कक्षवक्षः पाणिपादसन्धयः स्थिरे गुरु-शुभम सोपचिता मांससाराणाम् । सा सारता क्षमां धृतिमलौल्यं वित्तं विद्यां सुखमार्जव--मारोग्यं बलमायुश्च दीर्घमाचष्टे ॥ १०५ ॥
३. मांससार पुरुष के लक्षण - मांससार पुरुषों के प्रदेश, ललाट, कृकाटिका ( ग्रीवा कां पश्चात् भाग ), नेत्र, गाल, हनु, गर्दन, कन्धा, उदर, काँख, छाती, हाथ, पैर, सन्धियाँ भारी, स्थिर एवं मांस से भरी हुई दृढ़ होती हैं । इस प्रकार का मांगमार सहनशीलता, धीरता, लालची न होना, धन, विद्या, सुख, सरलता, आरोग्य, बल और दीर्घायु का सूचक है ॥ १०५ ॥
वर्णस्वरनेत्र शलोमनखदन्तोष्ठमूत्रपुरीषेषु विशेषतः स्नेहो मेदःसाराणाम् । सा सारता वित्तैश्वर्यसुखोपभोगप्रदा नान्यार्जवं सुकुमारोपचारतां चाचष्टे ॥ १०६ ॥
४. मेदासार पुरुष के लक्षण - मेदासार वाले पुरुषों के वर्णं, स्वर, आँख, केश, रोम, नख, दाँत, ओष्ठ, मूत्र, मल में अधिक चिकनापन पाया जाता है । इस प्रकार का सार होना धन, ऐश्वर्य, सुख, उपभोग, दानशीलता, सरलता, कोमलना और सेवाभाव का सूचक है ॥ १०६ ॥
पाणिगुल्फजान्वर त्रिजत्रु चिवुक शिरः पर्व स्थूलाः स्थूलास्थिनखदन्ताश्चास्थिसाराः । महोत्साहाः क्रियावन्तः कुशसहाः सारस्थिरशरीरा भवन्त्यायुष्मन्तश्च ॥ १०७ ॥
५. अस्थिसार पुरुष के लक्षण - अस्थिसार वाले पुरुष की एड़ी, गुल्फ, जानु, अरलि ( ' बद्धमु-ष्टिररलि: ' - बँधी हुई मुट्ठी के साथ बाहु ), जत्रु ( हसली ), चिवुक, तिर, शरीर की गाँठें, अस्थि, नख और दन्त मोटे होते है । इस प्रकार के अस्थिसार पुरुष बड़े उत्साह वाले, अधिक कार्य करने वाले, कष्ट को सहने वाले दृढ़ शरीर वाले तथा अधिक आयु वाले होते हैं ॥ १०७ ॥
मृद्वङ्गा बलवन्तः स्निग्धवर्णस्वराः स्थूलदीर्घवृत्तसन्धयश्च मनसाराः । ते दीर्घायुषो बलवन्तः श्रुतवित्तविज्ञानापत्यसंमानभाजश्च भवन्ति ॥ १०८ ॥
६. मज्जासार पुरुष के लक्षण - मज्जासार पुरुषों के अंग पतले होते हैं । वे बलवान् होते हैं, और उनके शरीर के वर्ण और स्वर चिकने अर्थात् कोमल होते हैं । उनके शरीर की सारी सन्धियाँ मोटी, लम्बी, गोलाकार होती हैं । इस प्रकार मज्जासार वाले पुरुष दीर्घायु बलवान्, शास्त्रज्ञानसम्पन्न, विज्ञान - ( ' विज्ञानं शिल्पशास्त्रयोः ' कलाज्ञान ) सम्पन्न, धनी, सन्तान युक्त और आदर के पात्र होते हैं ( सुश्रुत ने मज्जासार पुरुष के नेत्र बड़े - बड़े होते है, ऐसा माना है ) ॥ सौम्याः सौम्यप्रेक्षिणः क्षीरपूर्णलोचना इत्र प्रहर्षबहुलाः स्निग्धवृत्तसारसम संहत-१. ' सुखमुदयताम् ' ग. । ३. ' ० दैन्यानि ' ग. | २. ' स्थिरमांसोपचिता ' इति पा ० । ४. ' तन्वङ्गा ' इति पा. 1
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रोगभिषग्जितीय विमानाध्यायः ८ विमानस्थानम् ७७७ शिखरदशनाः प्रसन्नस्निग्धवर्णस्वरा भ्राजिष्णवो महास्फिचश्च शुक्रसाराः । ते स्त्रीप्रियोप-भोगी बलवन्तः सुखैश्वर्यारोग्यवित्तसंमानापत्य भाजश्च भवन्ति ॥ १० ९ ॥ ७. शुक्रसार पुरुष के लक्षण - शुक्रसार वाले पुरुष सौम्य ( कोमल प्रकृति ) और सौम्य दृष्टि ( सद्भावपूर्ण कोमल दृष्टि ) वाले होते हैं । ' उनके नेत्र दूध से भरे हुए की तरह श्वेत और दया से भरे हुये से प्रतीत होते हैं । वे सदा प्रसन्न मन वाले होते हैं । उनके दाँत चिकने, गोलाकार, दृढ़, समानाकार वाले, ठोस ( इतने परस्पर मिले हुए जिससे छिद्र न दिखाई पढ़ें ) होते हैं । दाँत के अग्रभाग भी बराबर होते हैं । उनके शरीर का वर्ण और स्वर देखने और सुनने में निर्मल और चिकने होते है । उनके शरीर में चमकीलापन होता है और उनके नितम्ब बड़े बड़े होते है । इस प्रकार के शुक्रसार पुरुष स्त्रियों के अधिक प्रिय होते हैं, या वे स्त्रियों को अधिक चाहने वाले होते हैं । उन्हें सांसारिक सभी आवश्यक वस्तु उपभोग के लिए प्रिय होती है और वे बलवान् होते हैं । वे सुख, ऐश्वर्य, आरोग्य, धन, आदर और अधिक सन्तान के पात्र होते है अर्थात् शुक्रमार पुरुष सुखी, स्वस्थ, धनी, सन्तानयुक्त और मानी होते हैं ॥ १० ९ ॥ स्मृतिमन्तो भक्तिमन्तः कृतज्ञाः प्राज्ञाः शुचयो महोत्साहा दत्ता धीराः समरविक्रान्त-योधनस्त्यविपादाः सव्यवस्थितर्गतिगम्भीरबुद्धिचेष्टाः कल्याणाभिनिवेशिनश्च सत्व-साराः । तेषां स्वलक्षणैरेव गुणा व्याख्याताः ॥ ११० ॥
८. सत्त्वसार पुरुष के लक्षण - सत्त्वसार वाले पुरुष स्मरणशक्ति युक्त, भक्ति सम्पन्न, कृतज्ञ, वुद्धिमान, पवित्र, अधिक उत्साह वाले, चतुर और धीर होते है । लड़ाई में पराक्रमपूर्वक युद्ध करते हैं । उनके शरीर में विषाद विल्कुल नहीं होता । उनकी गतियाँ स्थिर होती हैं । बुद्धि और चेष्टायें ( करचरणानुकूल व्यापार ) गम्भीर होती हैं । ये निरन्तर कल्याण करने वाले विषयों में अपने मन और बुद्धि को लगाये रहते हैं । यह सत्त्वसार पुरुष के गुण हैं । इनके लक्षणों के अनुसार ही व्याख्या गुणों की हो गई अर्थात् जो - जो लक्षण बतलाये गये हैं, वे ही गुण सत्त्वसार पुरुष में होते हैं ॥ ११० ॥्
तत्र सर्वैः सारैरुपेताः पुरुषा भवन्त्यतिवलाः परमसुखयुक्ताः क्लेशसहाः सर्वारम्भे-ध्वात्मनि जातप्रत्ययाः कल्याणाभिनिवेशिनः स्थिरसमाहितशरीराः सुसमाहितगतयः सानुनादस्त्रिग्धगम्भीरमहास्वराः सुखैश्वर्यवित्तोपभोगसंमानभाजो मन्दजरसो मन्दविकाराः प्रायस्तुल्यगुणविस्तीर्णापत्याश्चिरजीविनश्च ॥ १११ ॥
सारपरीक्षा का परिणाम - इनमें सब सारों से सम्पन्न पुरुष अधिक बलवान्, अधिक गौरव सम्पन्न, क्लेश को सहने वाला, सभी कार्यों में अपनी आत्मा पर विश्वास रखने वाला, निरन्तर कल्याणकारी कार्यों में अपने मन और बुद्धि को लगाने वाला, स्थिर, और संगठित शरीर वाला, चलते समय अपनी गति को ठीक रखने वाला होता है, और उसका स्वर प्रतिध्वनियुक्त चिकना, गम्भीर और महान होता है । वे सुख, ऐश्वर्य, धन उपभोग और आदर के पात्र होते है । उन्हें जल्दी बुढ़ापा नहीं आती उन्हें रोग कम होते हैं । प्रायः उन्हीं के गुणयुक्त अर्थात् समान गुण वाले अधिक सन्तान होते हैं, और वे अधिक आयु वाले होते हैं ॥ १११ ॥
अतो विपरीतास्त्वसाराः ॥ ११२ ॥
और भी — असार पुरुष अर्थात् इन बताये हुए सारों में कोई भी सार जिन मनुष्यों में नहीं पाया जाता है, वे इससे विपरीत गुण वाले होते हैं ॥ ११२ ॥
१. ' स्त्रीप्रियाः प्रियोपभोगाः ' इति पा ० । ३. ' परमगौरवयुक्ताः ' इति पा ० । २. ' स्ववस्थितगति ० ' इति पा ० ।
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७७८८ चरकसंहिता मध्यानां मध्यैः सारविशेषैर्गुणविशेषा व्याख्याता भवन्ति ॥ ११३ ॥
और भी - मध्यमसार से युक्त अर्थात् बतलाये हुये सारों में कुछ सार के लक्षण पाये जाते हैं, और कुछ के लक्षण नहीं पाये जाते हैं, ऐसे मध्यसार पुरुषों के गुणों की व्याख्या भी हो गई ॥ ११३ ॥
इति साराण्यौ पुरुषाणां बलप्रमाणविशेषज्ञ, नार्थमुपदिष्टानि भवन्ति ॥ ११४ ॥
और भी वे आठ सार पुरुषों के बल - प्रमाण को विशेष रूप से जानने के लिये उपदेश किये गये है ॥ ११४ ॥
कथं नु शरीरमात्रदर्शनादेव भिषङ्मोदयमुपचितत्वाद्वलवान्, अयमल्पबलः कृश-स्वात्, महाबलोऽयं महाशरीरत्वात्, अयमल्पशरीरत्वादल्पवल इति; दृश्यन्ते ह्यल्पशरीराः कृशाश्चैके बलवन्तः; तत्र पिपीलिकौमारहरणवत् सिद्धिः । अतश्च सारतः परीक्षेते-त्युक्तम् ॥ १ ९ ५ ॥ सारपरीक्षा का प्रयोजन - शरीर मात्र के देखने से वैद्य समुदाय किस प्रकार मोह को प्राप्त हो जाता है - इस रोगी का शरीर माँस से भरा और दृढ़ है इसलिए बलवान होगा, इस रोगी का शरीर पतला है इसलिए यह दुर्बल होगा, इस रोगी का शरीर बहुत बड़ा है इसलिए बहुत बलवान होगा, इस रोगी का शरीर छोटा है इसलिए कम बल वाला होगा, इस प्रकार वैद्य विचार कर धोखे में पड जाता है । क्योंकि देखा जाता है कि छोटे और पतले शरीर होने पर भी वे बलवान होते हैं, इसमें चींटी का भार ढोने की तरह प्रमाण कुछ लोग उपस्थित करते हैं । जैसे चींटी छोटी और पतले शरीर के होते हुए भी अपने से अनेक गुना अधिक भार उठाकर ले जाती हैं, उसी प्रकार दुर्बल और छोटे शरीर वाले पुरुष भी अधिक बल युक्त होते हैं, और मोटे तथा बड़े शरीर वाले पुरुष भी होन बल वाले होते हैं, इसलिए सार से परीक्षा करना बतलाया गया है || संहननतश्चेति संहननं, संहतिः, संयोजनमित्येकोऽर्थः । तत्र समसुविभक्तास्थि, सुबद्ध-सन्धि, सुनिविष्टमांसशोणितं, सुसंहतं शरीरमित्युच्यते । तत्र सुसंहतशरीराः पुरुषा बलवन्तः, विपर्ययेणाल्पवलाः, मध्यत्वात् संहननस्य मध्यबला भवन्ति ॥ ११६ ॥
( ४ ) संहनन परीक्षा ( Investigation for the Compactness of the Body ) संहनन- परीक्षा - • शरीर की परीक्षा संहनन से करें संहनन, संहति और संयोजन इनका एक ही अर्थ होता है । जिसके शरीर में हड्डियाँ सम और अलग - अलग उचित रूप में विभक्त हों, सन्धियाँ दृढ़ता से बंधी हो, मांस और रक्त अच्छी तरह अपने - अपने स्थानों में स्थित हो, इस प्रकार के शरीर को सुसंगठित कहा जाता है । संगठित शरीर वाले मनुष्य वलवान होते हैं, इससे विपरीत पुरुष अल्प बल वाले होते हैं, और जो उत्तम और हीन, इन दोनों संगठन के बीच के संहनन से युक्त हों वे मध्य वल वाले होते हैं, अर्थात् उत्तम मंहनन होने से, उत्तम वल, हीन संहनन होने से अल्प बल, जो उत्तम संहनन और हीन मंहनन इन दोनों से युक्त न हों वे मध्य वल वाले होते हैं ॥ ११६ ॥
प्रमाणतश्चेति शरीरप्रमाणं पुनर्यथास्वेनाङ्गुलिप्रमाणेनोपदेच्यते उत्सेधविस्ताराया-मैर्यथाक्रमम् । तत्र पादौ चत्वारि पट् चतुर्दशाङ्गुलानि जङ्घे त्वष्टादशाङ्गुले षोडशाङ्गुल-परिक्षेपे च जानुनी चतुरङ्गुले पोडशाङ्गुलपरिक्षेपे, त्रिंशदङ्गुलपरिक्षे पावष्टादशाङ्गुलावूरु, १. ' पिपीलिकाभारवहनवत् ' यो । ३. ' पादौ चतुर्दशाङ्गुलौ ' ग. । २. ' संघातः ' ग. । ४. ' परिक्षेपः परिणाहः ' चक्रः ।
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रोगभिषग्जितीयविमानाघ्याय ः ८ ] विमानस्थानम् ७७६ षडङ्गुलदीर्घौ वृषणावष्टाङ्गुलपरिणाहौ, शेर्फः षडङ्गुलदीर्घं पञ्चाङ्गुलपरिण'हं, द्वादशा-ङ्गुलि ( ल ) परिणाहो भगः, पोडशाङ्गुलविस्तारा कटी, दशाङ्गुलं वस्तिशिरः, दशाङ्गुल-विस्तारं द्वादशाङ्गुलमुदरं, दशाङ्गुलविस्तीर्णे द्वादशाङ्गुलायामे पार्थे, द्वादशाङ्गुलं स्तनान्तरं, द्व्यङ्गुलं स्तनपर्यन्तं चतुर्विंशत्यङ्गुलविशालं द्वादशाङ्गुलोत्सेधमुरः, द्व्यङ्गुलं हृदयम्, अष्टाङ्गुलौ स्कन्धौ पडङ्गुलावंसौ, घोडशाङ्गुलौ प्रवाहू पञ्चदशाङ्गुलौ प्रपाणी, reat greater, क्षाष्टाङ्गुलौ, त्रिकं द्वादशाङ्गुलोत्सेधम्, अष्टादशाङ्गुलोत्सेधं पृष्ठं, चतुरङ्गुलोत्सेधा द्वाविंशत्यङ्गुलपरिणाहा शिरोधरा, द्वादशाङ्गुलोत्सेधं चतुर्विंशत्यङ्गुलपरि-णाहमाननं, पञ्चाङ्गुलमास्यं, चिवुकौष्टकर्णाक्षिमध्यनासिकाललाटं चतुरङ्गुलं. पोडशा-लोत्सेधं द्वात्रिंशदङ्गुलपारिणाहं शिरः इति पृथक्त्वेनाङ्गावयवानां मानमुक्तम् । केवलं पुनः शरीरमङ्गुलिपर्वाणि चतुरशीतिः । तदायामविस्तारसमं समुच्यते । तत्रायुर्वलमोजः सुखमैश्वर्यं वित्तमिष्टाश्चापरे भावा भवन्त्यायत्ताः प्रमाणवति शरीरे; विपर्ययस्त्वतो हीने-ऽधिके वा ॥ ११७ ॥
( ५ ) प्रमाण परीक्षा ( Investigation for the Proportionate Relation of the Different Organs ) प्रमाण द्वारा आयु की परीक्षा I अपनी - अपनी अंगुली के प्रमाण से शरीर के प्रमाण का उपदेश किया जा रहा है । ऊँचाई, चौड़ाई और लम्बाई क्रम से पैर चार, छः और १४ अंगुल का होता है । जंघा की लम्बाई १८ अंगुल, गोलाई १६ अंगुल, जानु की लम्बाई ४ अंगुल और गोलाई १६ अंगुल, ऊरु की गोलाई ३० अंगुल और १८ अंगुल लम्बाई, दोनों अण्डकोष ६ अंगुल लम्बे और ८ अंगुल गोल, लिंग ६ अंगुल लम्बा और ५ अंगुल गोल होता है । भग का विस्तार १२ अंगुल, कमर १६ अंगुल चौड़ी, बस्ति सिर की चौड़ाई १० अंगुल पेट लम्बाई में १२ अंगुल तथा चौड़ाई में १० अंगुल, पार्श्व चौड़ाई में १० अंगुल लम्बाई में १२ अंगुल, दोनों स्तनों के बीच का भाग १२ अंगुल का होता है । दो अंगुल स्तन - पर्यन्त ( काला भाग ) दो अंगुल है, छाती चौड़ाई में २४ अंगुल, ऊँचाई में १२ अंगुल, हृदय ३ अंगुल का, दोनों कन्धा ८-८ अगुल, दोनों अंस ६-६ अंगुल, दोनों प्रबाहु १६ १६ अंगुल, दोनों प्रपाणि ( केहुनी से कलाई तक का भाग ), १५-१५ अंगुल, दोनों हाथ १०-१२ अंगुल, दोनों कांख ८-८ अंगुल, त्रिकास्थि १२ अंगुल ऊंची, पीठ १६ अंगुल ऊँची, गर्दन ऊँचाई में ४ अंगुल, गोलाई में २२ अंगुल, मुख - मण्डल ऊँचाई में १२ अंगुल, गोलाई में २४ अंगुल, मुख ६ अंगुल, चित्रक, ओष्ठ, दोनों कान, दोनों नेत्र के बीच का स्थान नाक, ललाट ये सब चार अंगुल सिर ऊँचाई में १६ अंगुल और गोलाई में ३२ अंगुल होता है । ( चक्रपाणि ने ' पङ्गुलोत्सेधं शिरः ' इति पृष्ठमनु ग्रीवाया उपरि शेयम् ) से सिर की ऊँचाई ६ अंगुल की मानी है और गंगाधर ने भी ६ ही अंगुल मानी है ) । इस प्रकार शरीर के अंगों के अवयवों का अलग - अलग प्रमाण बताया गया है । केवल ( सारा ) शरीर ८४ अंगुलिपर्व लम्बा होता है । इस प्रकार यह शरीर आयाम और विस्तार में शरीर के बराबर हो तो उसे समशरीर कहा जाता है । इस समशरीर में आयु, वल, ओज, सुख, ऐश्वर्य, धन, और १. ' अष्टाङ्गुलपरिणाहं शेफः ' ह. । २. त्र्यङ्गुलं हृदयं ' यो. । ३. ' प्रबाहुरं सादर्वाक् कफोणिपर्यन्तः, प्रपाणिः कफोण्यधस्तात् ' चक्रः ।
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७८० चरकसंहिता अन्य अपने मन के अनुकूल पदार्थ प्राप्त होते रहते हैं । यदि इस मान से शरीर हीन या अधिक प्रमाण हो तो उसकी आयु, बल, ओज, सुखादि, हीन और मध्य होते है ॥ ११७ ॥
* सात्म्यतश्चेति सात्म्यं नाम तद्यत् सातत्येनोपसेव्यमानमुपशेते । तत्र ये घृतचीर-तैलमांसरससात्म्याः सर्वरससात्म्याश्च ते वलवन्तः क्लेशसहाश्चिरजीविनश्च भवन्ति, रूक्ष-सात्म्याः पुनरेकरससात्म्याश्च ये ते प्रायेणात्पबला अल्पक्लेशसहा अल्पायुषोऽल्पसाध-नाश्च भवन्ति, व्यामिश्रसात्म्यास्तु ये ते मध्यवलाः सात्म्यनिमित्ततो भवन्ति ॥ ११८ ॥
( ६ ) सात्म्य परीक्षा ( Investigation for the Homologation ) सात्म्य द्वारा परीक्षा - सात्म्य उसका नाम है जो निरन्तर सेवन करने पर अपने प्रकृति के अनुकूल हो जाय । इसमें जो मनुष्य घृत, दूध, तेल, मांस रस का सात्म्य कर चुके हैं या सभी रसों का सात्म्य कर चुके हैं वे पुरुष बलवान्, क्लेश को सहने वाले और बहुत दिनों तक जीने वाले होते हैं । जो लोग रूक्ष वस्तुओं का सात्म्य कर चुके हैं या केवल एक ही रस का सात्म्य किये हैं वे प्राय: अल्प बल वाले, थोड़े क्लेश को सहने वाले, अल्प आयु वाले और अल्प साधन से युक्त होते है और जो लोग मिले हुये रसों का सात्म्य किये हुये हैं अर्थात् दो, तीन रसों का सात्म्य है मध्य बल वाले होते हैं ॥ ११८ ॥
सत्वतश्चेति सचमुच्यते मनः । तच्छरीरस्य तन्त्रकमात्मसंयोगात् । तत्रिविधं बल-भेदेन - प्रवरं, मध्यम, अवरं चेति; अतश्च प्रचरमध्यावर सत्त्वाः पुरुषा भवन्ति । तत्र प्रवर-सवाः सवसारास्ते सारेषूपदिष्टाः, स्वल्पशरीरा ह्यपि ते निजागन्तुनिमित्तासु महतीष्वपि पीडास्वव्यथा दृश्यन्ते सत्त्वगुण वैशेन्यात्; मध्यसत्त्वास्त्वपरानात्मन्युपनिधाय संस्तम्भय-त्यात्मनाऽऽत्मानं परैर्वाऽपि संस्तभ्यन्ते; हीनसत्त्वास्तु नात्मना नापि परैः सवबलं प्रति शक्यन्ते उपस्तम्भयितुं, महाशरीरा ह्यपि ते स्वल्पानामपि वेदनानामसहा दृश्यन्ते, सन्नि-' हितभयशोकलोभमोहमाना रौद्रभैरवद्विष्टबीभत्सविकृतसंकथास्वपि च पशुपुरुषमांसशो-णितानि चावेच्य विषादवैवर्ण्यमृच्छोन्मादभ्रमप्रपतनानामन्यतममाप्नुवन्त्यथवा मर-णमिति ॥ ११ ९ ॥ ( ७ ) सत्व परीक्षा ( Investigation for Mental State ) सत्त्व द्वारा परीक्षा - इस प्रकार करनी चाहिये । सत्त्व मन को कहा जाता है । वह सत्त्व आत्मा के संयोग से शरीर का नियमन करने वाला होता है । यह बल भेद से तीन प्रकार का होता है । १. प्रवर, २ मध्यम, ३. अवर, इसलिये पुरुष भी तीन प्रकार के प्रवर, मध्यम और अवर सत्व वाले होते हैं । इनमें प्रवर सत्त्व वाले सत्त्वसार होते हैं । सारों के वर्णन में उनका विवेचन हो चुका है । वे सत्त्वसार वाले मनुष्य छोटे शरीर होने पर भी सत्त्व गुण की अधिकता होने से निज ( वात, पित्त, कफ ) और आगन्तुक कारणों से उत्पन्न होने वाली बड़ी से बड़ी विपत्तियों में या रोगों में भी नहीं घबड़ाते । मध्य सत्त्व वाले पुरुष दूसरों को अपने में रख कर अर्थात् उनका सहारा लेकर अपने से अपने को अवलम्बित कर कार्य करते हैं । अथवा दूसरे से आश्वासन पाकर अपना कार्य करते हैं । ( अर्थात् विपत्ति या रोग आ जाने पर दूसरे मनुष्यों का उदाहरण देखकर अर्थात् अमुक व्यक्ति के ऊपर त्रिपत्ति या रोग का आक्रमण हुआ था उससे छुटकारा अमुक उपाय या अमुक १. ' पीडास्वव्यग्रा ' इति पा ० ।
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रोगभिषग्जितीयविमानाध्याय: ८ ] विमानस्थानम् ७८१ चिकित्सा करने पर हो गया था- इस बात को ध्यान में रखकर विपत्ति को सहन करते हैं । या दूसरा कोई व्यक्ति उसे समझा देता है कि ' घबड़ाओ नहीं इन - इन उपायों के करने से या अमुक वैद्य की चिकित्सा करने से शीघ्र ही अच्छे हो जावोगे ' इस प्रकार की बातें सुनकर वे अपने कष्ट को सह लेते हैं ) । हीन सत्त्व वाले पुरुष न अपने स्त्रयं दूसरों को उदाहरण स्वरूप में देखकर, न दूसरों के समझाने पर भी अपने मन के वेग को रोक सकते हैं । अर्थात् विपत्ति आने पर रोते और चिल्लाते हैं । ऐसे हीन सत्त्ववाले पुरुष बहुत बड़े शरीर होने पर भी छोटी- छोटो विपत्तियों को भी सहने में असमर्थं दिखाई पड़ते हैं और उनके पास सदा भय, शोक, लोभ, मोह और मान ( अहंकार ) इकट्ठा रहता है । रौद्र, भैरव, अप्रिय, घृणित, विकृत कथाओं को सुनकर, पशु और पुरुष के मांस या रक्त को देखकर विषाद ( दुख ), वैवर्ण्य, मूर्च्छा, पागलपन, चक्कर का आना, या गिर पडना आदि कारणों में किसी एक को अवश्य प्राप्त करते हैं । या इन्हीं कारणों से उनकी मृत्यु भी हो जाती है ॥ ११ ९ ॥ * आहारशक्तितश्चेति आहारशक्तिरभ्यवहरणशक्त्या जरणशक्त्या च परीचया; बला-युपी ह्याहारायते ॥ १२० ॥
( ८ ) आहार परीक्षा ( Investigation for Intake and Digestive Capacity ) आहार - शक्ति के द्वारा इस प्रकार परीक्षा करे -आहार - शक्ति की परीक्षा भोजन करने की शक्ति से या पत्राने की शक्ति को देखकर की जाती है । बल और आयु आहार के अधीन होता है ॥ १२० ॥
व्यायामशक्तितश्चेति व्यायामशक्तिरपि कर्मशक्तया परीक्ष्या । कर्मशक्त्या ह्यनुमीयते वलन्त्रैविध्यम् ॥ १२१ ॥
( ९ ) व्यायामपरीक्षा ( Investigation for the Body - Power ) व्यायाम शक्ति के द्वारा रोग की परीक्षा इस प्रकार करें --- व्यायाम शक्ति की भी परीक्षा कार्य करने की शक्ति से होती है । कार्य करने की शक्ति से यह अनुमान किया जाता है कि इसके शरीर में उत्तम, मध्यम, हीन बल में कोई एक बल है । अधिक कार्य करने की शक्ति से उत्तम बल, मध्य कार्य की शक्ति से मध्यम बल और अल्प कार्य करने की शक्ति से होनबल, यह अनुमान से ही जाना जाता है ॥ १२१ ॥
वयस्तश्चेति कालप्रमाणविशेषापेक्षिणी हि शरीरावस्था बयोऽभिधीयते । तद्वयो यथा-स्थूलभेदेन त्रिविधं - बालं, मध्यं, जीर्णमिति । तत्र बालमपरिपक्वधातुमजातव्यञ्जनं सुकु-मारमक्लेश सहम संपूर्ण बलं श्लेष्मधानुप्रायमाषोडशवर्षं विवर्धमानधानुगुणं पुनः प्रायेणा-नवस्थितसमात्रिंशद्वर्षमुपदिष्टं; मध्यं पुनः समत्वागतबलवीर्यपौरुषपराक्रमग्रहणधारण-स्मरणवचनविज्ञान सर्वधानुगुणं वलस्थितमवस्थितसत्त्वमविशीर्यमाणधातुगुणं पित्तधातुप्रा-यमापष्टिवर्षमुपदिष्टम्; अतः परं हीयमानधात्विन्द्रियबलवीर्य पौरुषपराक्रमग्रहणधारण-स्मरणवचनविज्ञानं भ्रश्यमानधातुगुणं वायुधातुप्रायं क्रमेग जीर्णमुच्यते आवर्षशतम् । वर्षशतं खल्वायुपः प्रमाणमस्मिन् काले; सन्ति च पुनरधिकोनवर्षशतजीविनोऽपि मनु-१. ' यथावस्थाभेदेन ' इति पा ० ।