चरक संहिता हिन्दी भाष्य — पृष्ठ 921–930
चरक संहिता हिन्दी भाष्य · Chaukhamba · पृष्ठ 921–930
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८३२ चरकसंहिता बलवत् कर्मक्षय होने से मुक्ति होती है यह सार्वतन्त्रिक सिद्धान्त है पर ' नाभुक्तं क्षीयते कर्म कल्पकोटिशतैरपि ' के अनुसार ' प्रारब्वकर्मणो भोगादेव क्षयः ' योग कर लेने पर जब प्रारब्ध बलवान् कर्म का क्षय होगा, तब मुक्ति होती है । यह वात योगियों के लिए नहीं हैं, यह तो सामान्य पुरुषों के लिए है, योगियों के लिए तो - ' यथैधांसि समिद्धोऽग्निर्भस्मसात्कुरुतेऽर्जुन । ज्ञानान्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा ॥ ' ( गीता अ. ४ ) तथा ' ऋते ज्ञानान्न मुक्तिः ' बिना ज्ञान के मुक्ति होती ही नहीं । जब बलवान् कर्म का क्षय हो जायगा तो कर्म के अभाव में संयोग का वियोग ( अभाव ) सुतरां सिद्ध है, अतः मुक्त पुरुष का पुनर्जन्म नहीं होता । इसे ही मोक्ष कहते हैं ।
सतामुपासनं सम्यगसतां परिवर्जनम् । व्रतचर्योपवासौ च नियमाश्च पृथग्विधाः ॥ १४३ ॥
धारणं धर्मशास्त्राणां विज्ञानं विजने रतिः । विषयेष्वरतिर्मोक्षे व्यवसायः परा धृतिः ॥ १४४ ॥
कर्मणामसमारम्भः कृतानां च परिक्षयः । नैष्क्रम्यमनहङ्कारः संयोगे भयदर्शनम् ॥ १७५ ॥
मनोबुद्धिसमाधानमर्थतत्त्वपरीक्षणम् | तत्त्वस्मृतेरुपस्थानात् सर्वमेतत् प्रवर्तते ॥ १४६ ॥
मोक्ष के साधन - सज्जनों की अच्छी प्रकार से सेवा करना, दुष्टजनों का साथ न करना, चान्द्रायण आदि व्रतों को करना, आत्मशुद्धि के लिए उपवास करना, अलग - अलग बनाये हुये नियमों का पालन करना, धर्मशास्त्रों का अभ्यास करना, विज्ञान अर्थात् प्रमाणों के द्वारा प्रमा का ज्ञान करना, निर्जन एकान्त स्थान में रहना, काम - क्रोधादि विषयों में प्रेम न करना, मोक्षसाधक कर्मों नें प्रवृत्ति रखना, उत्तम धैर्य का रखना, नित्य एवं नैमित्तिक कार्य - कर्मों का या भविष्य में धर्म और अधर्म के साधनभूत कर्मों का प्रारम्भ न करना, पूर्वजन्म में या इह जन्म में किये हुये कर्मों का क्षय होना, घर से या आश्रय से दूर होकर कर्मफल भोगने के लिए कर्म न करना, अहंकार न करना, आत्मा और शरीर के संयोग होने पर अपने को भयभीत बनाना अर्थात् उसे चारो तरफ से भय ही भय दिखाई देना, मन और बुद्धि को समाधिस्थ करना, अर्थ के तत्त्वों को परीक्षा करने के बाद उसका ग्रहण करना, ये सभी ठीक ठीक स्मृति ज्ञान की प्राप्ति से ही प्रवृत्त होते हैं ॥ १४३-१४६ ॥ विमर्श - नियम पाँच बताये गये हैं यथा – ' शौचसंतोष तपःस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि नियमाः । ' ( योग साधन पाद सूत्र ३२ ) १. शौच - मट्टी, जल आदि से शरीर का प्रक्षालन, हितकारी थोड़ा मैध्य भोजन से बाहरी शौच और आभ्यन्तर चित्त की शुद्धि चित्त का मल, मद, मान, असूया आदि को दूर करने से होती है । २. सन्तोष - प्राणरक्षामात्र भोजन और विद्या, मान, भोग आदि आवश्यक सामग्रियों को आवश्यकता से अधिक लेने की इच्छा न रखना । ३. तप - भूख - प्यास, शीत - गर्मी को सहना, ४. स्वाध्याय-- मोक्ष शास्त्र का अध्ययन या ओंकार का जप करना, ५. ईश्वरप्रणिधान, परमगुरु परमेश्वर में सभी कर्मों को समर्पण करना जैसा कि -' सर्वकर्माण्यपि सदा कुर्वाणो मद्रयपाश्रयः । यत्प्रसादादवाप्नोति शाश्वतं पदमव्ययम् ॥ ' ( गीता १८ ) मन और बुद्धि के समाधान से समाधि ग्रहण करना बताया है, समाधि क्या है? किसे कहते हैं? इस पर योगसूत्र के ३ तीसरे पाद सूत्र ३. ' तदेवार्थमात्रनिर्मासं स्वरूपशून्यमिव समाधिः । " स्वरूप से शून्य होने की तरह होकर केवल अर्थ मात्र अर्थात् इष्टदेव मात्र काही निर्भास होना समाधि हैं । स्वरूपशून्य का तात्पर्य है कि धारणा और ध्यानपूर्वक ही समाधि होती है, पर समाधि काल इन दोनों की अवस्था शून्य सी हो जाती है, धारणा और ध्यान में तेज, शब्द आदि विषयों का १. नैष्कर्म्यम् ' ' इति पा ० ।
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कतिधापुरुषीयशारीराध्यायः १ ] शारीरस्थानम् ८३३ इन्द्रियों से सम्बन्ध होता है तब ये दोनों को अवस्था भट्ट हो जाती है, पर समाधि स्थिर होती है, धारणा - देशयन्यचित्तस्य धारणा ' अर्थात् हृत्पुण्डरीकेाभ्यां वा मूर्ध्नि पर्वतमस्तके । एवमादि-प्रदेशेषु धारणा भित्तबन्धनम् । ध्वान II तत्र प्रत्येकता ध्यानम् ' ऊपर बनाए हुए देश हृदय आदि स्थान में मन को रोना धारणा है और इन्हीं स्थानों में ईश्वर के स्वरूप की वृत्ति का प्रवाह लग जाना, अर्थात् बार - बार ईश्वर का ही स्वरूप अस्थायी रूप से आना । जब स्थायी रूप से ईश्वर का स्वरूप उन स्थानों में स्थित हो जाना है सब समाधि कही जाती है ।
स्मृतिः सत्वनाचैव यतैरुपजायते ।
स्मृत्वा स्वभावं भावानां स्मरन् दुःखात् प्रमुच्यते ॥ १४७ ॥
दुःखाभाव में स्मृति कारण - मोक्ष के उपायों में बनाए हुए ' मनामुपायनम् ' से लेकर ' व्यवसायः पराभूतः तक नियमों का पालन करने से स्मृति जानी जाती है, जब भाव ( संसार में उत्पन्न वस्तुओं ) का स्वभाव स्मरण होता है तब दुःख से मुक्त हो जाता है ॥ १४७ ॥
विमर्श -- पूर्वापर के विषयों को ध्यान में रखना ही स्मृति है यथा - ' अनुभवजन्यं ज्ञानं स्मृति: । ' या ' अनुभूतविषयासम्प्रभोषः स्मृतिः । ( यो. सृ. वा. १ ) । संसार में रज और तम से युक्त मन द्वारा जो भी कार्य किये जाते हैं वे सभी कार्य दुःखदायी होते हैं । स्मृति ठीक रहने से सभी कार्यों को दुःख स्वरूप मान वीरे छोड़ देने से मुसोत्पादक श्वर की धारणाध्यान समाधि में मन लग जाता है । फलस्वरूप आनन्दस्वरूप ब्रह्म में लीन हो जाता है ।
वयते कारणान्यौ स्मृतिर्यैरुपजायते ।
निमित्तरूपग्रहणात् सारस्यात् सविपर्ययात् ॥ १४८ ॥
सत्त्वानुबन्धादभ्यासाज्ज्ञानयोगात् पुनः श्रुतात् ।
दृष्टश्रुतानुभूतानां स्मरणात् स्मृतिरुथ्यते ॥ १४ ९ ॥
स्मृति के कारण - स्मरणज्ञान होने के आठ कारण होते हैं जिन्हें आगे कहा जाता है, २. निमित्त से, २. रूप ग्रहण से " ३ सादृश्य से, ४ विपरीन वस्तु देखने से, ५. मन को स्मरण करने योग्य विषयों में लगाने से, ६. अभ्यास से, ७ ज्ञान योग से, ८. सुने हुए विषयों को पुनः सुनने से इन आठ कारणों से स्मृति होती है और दृष्ट, श्रुत एवं अनुभूत ज्ञानों का स्मरण करना स्मृति कही जाती है ॥ १४८-१४९ ॥ विमर्श - १. निमित्त, जैसे कारण को देखकर कार्य का स्मरण करना, कुम्भार को देख घड़े का स्मरण करना, या मोहन जैसा मधुर बोलता है उसी तरह मेरा पुत्र भी मधुर बोलता है तो इस मधुर वाणी निमित्त मे दूर रहने वाले अपने पुत्र का स्मरण किया जाता है । २. रूपग्रहण जैसे वन में गवय को देखकर गौ का स्मरण करना, ३. सादृश्य - पिता के समान पुरुष को देखकर पिता का स्मरण करना, ४ विपरीत जैसे किसी की गाय अधिक दूध देती है, अपनी गाय अस्प दूध देती है, कालान्तर में अधिक दूध देने वाली गाय को देखकर यह स्मरण हो आना है कि मेरी गाय दूध कम देती है, ५. सत्त्वानुबन्ध - मन से शिव या राम का स्मरण करना, अर्थात् अपने मन को जिस विषय से सम्बन्धित करना चाहे उसका स्मरण करना, ६. अभ्यास- - अभ्यस्त वस्तु को ज्ञान के आधार पर स्मरण करना, ७ ज्ञान योग - धारणा, ध्यान, समाधि की सिद्धि के बाद जो ज्ञान होना है उसे ज्ञान योग कहते हैं ८ पुनः सुनने से - जैसे कोई ठोक कण्ड था पर भूल गया है तो यदि फिर सुन लिया जाता है तो उसका स्मरण हो जाता है । ये आठों कारण तभी स्मृति के कारण होते हैं जब पूर्व काल में दृष्ट या श्रुत, या अनुभूत ५३ च ० सं ०
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८३४ चरकसंहिता हो, यह गङ्गाधर का मत है पर ज्ञान योग से त्रिकाल का स्मरण विना दृष्ट, श्रुत, अनुभूत के ही होता है । इसलिए चक्रपाणि ने दृष्ट, श्रुत, अनुभूत से स्मृति का लक्षण बताया है । वस्तुतः गङ्गाधर का मत ठीक है, ज्ञान भिन्न वस्तु हैं और स्मरण भित्र वस्तु है यहां ज्ञान योग का तात्पर्य यह वस्तुओं का सन्निकर्ष होने पर ही मन इन्द्रिय के संयोग से स्मृति होती है पर योगी विना इन्द्रिय और विषय के सन्निकर्ष से भी स्मरण करता है ।
* एतत्तदेकमयनं मुक्तैर्मोक्षस्य दर्शितम् ।
तस्मृतिबलं, येन गता न पुनरागताः ॥ १५० ॥
अयनं पुनराख्यातमेतद्योगस्य योगिभिः ।
संख्यातधर्मैः सांख्यैश्व मुक्तैर्मोक्षस्य चायनम् ॥ १५१ ॥
मोक्षप्राप्ति का साधन - • जीवन्मुक्त पुरुषों ने मोक्ष का यह एक मार्ग दर्शाया है । जिस व्यक्ति ने योग ज्ञान से तत्त्वस्मृति का बल प्राप्त कर लिया, तब इस मार्ग से जो गया अर्थात् मृत हुआ वह फिर जन्म लेकर इस संसार में नहीं आता । योगी जन इस तत्त्वस्मृति बल को योग का मार्ग बताया है और पुनः धर्म को जिन्होंने जान लिया है और जो परम ज्ञानी है ऐसे जीवनमुक्त पुरुषों ने इसे मोक्ष का मार्ग बताया है ॥ १५०- १५१ ॥
* सर्वं कारणवद्दःखमस्वं चानित्यमेव च ।
न चात्मकृतकं तद्धि तत्र चोत्पद्यते स्वता ॥ १५२ ॥
यावन्नोत्पद्यते सत्या बुद्धिर्नैतदहं यया ।
नैतन्ममेति विज्ञाय ज्ञः सर्वमतिवर्तते ॥ १५३ ॥
सत्याबुद्धि का परिणाम - सभी कारण वाला कार्य दुःख का हेतु है । अस्व है अर्थात् आत्मा सम्बन्धित वह कार्य नहीं है या वह कार्य तत्त्व शून्य हैं और अनित्य है । आत्मा उदासीन है अतः वह कार्य आत्मा द्वारा नहीं किया गया है पर उसमें स्वता ( यह मुझसे किया गया है या यह मैरा है ) उत्पन्न होती है । यह भ्रमात्मक ज्ञान तबतक बना रहता है जब तक कि सत्याबुद्धि से, यह मैं बुद्धि अहंकार से उत्पन्न नहीं हूँ और यह बुद्धि आदि मेरा नहीं है किन्तु प्रकृति का प्रपञ्च मात्र है, यह ज्ञान नहीं हो जाता है । यह जब ज्ञान हो जाता है तब आत्मा को ज्ञानी कहा जाता है और तब आत्मा सभी तत्त्वों को स्मृति बल से जान कर संसार का अतिक्रमण कर जाता है । अर्थात् मुक्त हो जाता है ॥ १५२-१५३ ॥
* तस्मिंश्चरमसंन्यासे समूलाः सर्ववेदनाः ।
ससंज्ञाज्ञानविज्ञाना निवृत्तिं यान्त्यशेषतः ॥ १५४ ॥
अशेष दुःख की निवृत्ति - जब आत्मा सभी वस्तुओं का अतिक्रमण कर लेती हैं और वह उस चरम सन्यास अवस्था में ( अर्थात् त्यागावस्था ) संज्ञा ( नाम मात्र का निर्विकल्पक ज्ञान ) ज्ञान ( सविकल्पक ज्ञान ) विज्ञान ( शास्त्र का ज्ञान ) से शून्य हो जाती है तो वहाँ मूल के साथ सभी प्रकार के भूत, भविष्य एवं वर्तमान वेदनायें अशेष रूप से ( सम्पूर्ण रूप से ) नष्ट हो जाती है ॥ १५४ ॥
विमर्श - चरम - संन्यास का तात्पर्य यह है कि सर्वप्रथम सभी सकारण कार्य तत्त्वरहित है अनित्य हैं । मेरा शरीर भी सकारण है अतः अनित्य है, क्षणभङ्गुर है और दुःख का कारण हैं । तब सुख के कारण कौन हैं इस जिज्ञासा से गुरु व्यक्ति की शरण में जाता है, जैसा कि सांख्यकारिका से स्पष्ट १. ' समग्रज्ञेयविज्ञानान्निवृत्तिम् ' इति पा ० ।
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कतिधापुरुषीयशारीराध्याय: १ ] शारीरस्थानम् ८३५ है - ' दुःखत्रयाभिधानाजिज्ञासा तदपघातके हेतौ ' आदि । और गुरु के उपदेश से सर्वसुख का साधन मोक्ष है, यह जान कर संन्यास लेना है । क्रियाओं से विरक्त होकर अपने अनुभव द्वारा सभी सकारण कार्यों का स्वभाव जान कर शनैः शनैः उनका जब त्याग कर देता है तब उसे चरम संन्यास कहते हैं । ऐसी दशा में मन से रज और तम दूर हो जाते हैं और सभी समूल वेदनायें नष्ट हो जाती हैं या वेदनाओं का मूलधर्म अधर्म नष्ट हो जाता है । यहाँ वेदना से संसार में जन्म लेना ही लिया गया है क्योंकि जन्म लेना और मरना वेदना ही है । धर्म से स्वर्गात उत्तम लोक की प्राप्ति होती है और बाद में पुनः जन्म होता है, जैसा कि -- ' क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोके विशन्ति ' से बताया हैं । अतः चरम संन्यास ज्ञान से ही प्राप्त होता है और ज्ञान द्वारा मूल ( अधर्म ) के साथ सभी वेदनायें नष्ट हो जाती हैं, जैसा कि गीता में बनाया गया है यथा-‘ ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा ' और ' ऋते ज्ञानान्न मुक्तिः ' का भी यही तात्पर्य है ।
* अतः परं ब्रह्मभूतो भूतात्मा नोपलभ्यते ।
निःसृतः सर्वभावेभ्यश्चिह्नं यस्य न विद्यते ॥
ज्ञानं ब्रह्मविदां चात्र नाज्ञस्तज्ज्ञातुमर्हति ॥ १५५ ॥
( २३ ) प्रश्न: प्रशान्त भूतात्मा के क्या लिङ्ग हैं ( एकः प्रशान्तो भूतात्मा कैर्लिङ्गैरुपलभ्यते? ), इसका उत्तर— इसके बाद वह ब्रह्मभूत, अर्थात् ब्रह्मस्वरूप हो जाता है, तब भूताभा का ज्ञान प्रत्यक्ष, अनुमान, आप्तोपदेश प्रनागों से नहीं होता । क्योंकि जब जीवात्मा ब्रह्म रूप हो जाता है तब सभी भाव ( बुद्धि अहंकार आदि अष्ट प्रकृति और १६ विकार ) से निःसृत अर्थात् रहित हो जाता है । ऐसी दशा में उस जीवात्मा का कुछ चिह्न ( लक्षण ) नहीं रहता है । ब्रह्म को जानने वाले विद्वान् ज्ञानी को ही ब्रह्म के विषय में ज्ञान होता है । जो अज्ञानी है वे ब्रह्म तत्त्व को जानने में समर्थ नहीं होते ॥ १५५ ॥
विमर्श - ईश्वर का ही अंश जीवात्मा है, जब ईश्वर ( परमात्मा ) विकार एवं प्रकृति से युक्त होता है, तब प्राण, अपान, निनेष, उन्मेष जादि लक्षणों का ज्ञान होता है । जब सभी प्रकृति और विकार से शून्य हो जाता है, तब उसमें प्राण अपानादि क्रिया नहीं होती । अतः चिह्न न होने से किसी भी प्रमाण द्वारा उपलब्ध नहीं होता । ऐसे ब्रह्म के पास पहुंचने की गति ब्रह्मज्ञानी की ही होती है ।
तत्र श्लोकः-प्रश्नाः पुरुषमाश्रित्य त्रयोविंशतिरुत्तमाः ।
कतिधा पुरुपीयेऽस्मिन्निर्णीतास्तत्त्वदर्शिना ॥ १५६ ॥
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते शारीरस्थाने कति-धापुरुषीयं शारीरं नाम प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥
* G इस कतिधापुरुषीय अध्याय में पुरुष को लेकर तेईस उत्तम प्रश्नों का निर्णय तत्वदर्शी आत्रेय ने किया है || १५६ ॥
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८३६ चरकसंहिता विमर्श - कतिधा पुरुषीय अध्याय का आयुर्वेदीय दर्शन की दृष्टि से बड़ा ही महत्त्व हैं । सुविधा के लिए अध्यायगत १ से २३ प्रश्नों का संग्रह निम्नलिखित रूप में किया जा रहा है । संस्कृत में प्रश्न हिन्दी में प्रश्न १. कतिधापुरुषो धीमन् धातुभेदेन धातु की दृष्टि से पुरुष के मेद भिद्यते? २. पुरुषः कारणं कस्मात्? उत्तर की श्लोक ० १६-३८ पुरुष को कारण क्यों माना जाता है? ३ ९ -५२ ३. प्रभवः पुरुषस्य कः? पुरुष की उत्पत्ति किससे? ५३ ४. क्रमशो ज्ञः सः? आत्मा ज्ञानी है या जज्ञानी? ५४-५८ ५. स नित्य: किननित्यो निदर्शित:? पुरुष नित्य है या अनित्य? ५ ९ -६२ ६, ७, प्रकृतिः का विकाराः के? प्रकृति और विकृति किसे कहते है? ६३-६९ ८. किं लिङ्गं पुरुषस्य च? अव्यक्त पुरुष के क्या लक्षण है? ७०-७४ ९. निष्क्रियस्य क्रिया तस्य भगवन् आत्मा निष्क्रिय होते हुए भी सक्रिय ७५-७६ विद्यते कथम्? कैसे? जायते? १०. स्वतन्त्रश्चेदनिष्टानु कथं योनिषु स्वतन्त्र आत्मा इच्छा के विपरीत परतंत्र ( अनिष्ट ) योनि में क्यों जन्म लेती है? ७७ ११. वशी यद्यसुखैः कस्माद्भावैराक्र-म्यते बलात्? वशी आत्मा दुःखकर भावों से बलात् क्यों आक्रामित होती है? ७८ १२. सर्वाः सर्वगतत्वाच्च वेदनाः किं । सर्वगत आत्मा सम्पूर्ण वेदनाओं का ७ ९ न वेत्ति सः? अनुभव क्यों नहीं कर पाती है? १३. न पश्यति विभुः कस्माच्छैलकु-व्यतिरस्कृतम्? पर्वतादि विभु आत्मा के देखने में बाधक क्यों? ८०-८१ १४. क्षेत्रज्ञः क्षेत्रमथवा किं पूर्वमिति | आत्मा ( क्षेत्रज्ञ ) और शरीर ( क्षेत्र ) ८२ संशयः? इसमें पहले उत्पत्ति किसकी? १५. साक्षिभूतश्च कस्यायं कर्त्ता ह्यन्यो आत्मा साक्षी किसका? ८३ विद्यते? वेदनाकृतः? अनुभव कैसे? * १७, १८, १ ९. अथ चार्तस्य भगवं स्तिसृणां कां चिकित्मनि? १६. स्यात्कथं चाविकारस्य विशेषो निर्विकार आत्मा को सुख - दुःख का २०. कारणं वेदना किम्? २१. वेदनानां किमधिष्ठानमुच्यते? । २२. क चैना वेदनाः सर्वा निवृत्तिं यान्त्यशेषतः? २३. एकः प्रशान्तो भूतात्मा कैलिङ्ग रुपलभ्यते? रोगी की त्रिकाल वेदना ( पृथक् पृथक् ) में किसकी चिकित्सा होती है? वेदनाओं के कारण क्या हैं? वेदनाओं के अधिष्ठान क्या हैं? सर्ववेदना की निवृत्ति ( समाप्ति ) कहाँ? प्रशान्त भूतात्मा के क्या लिङ्ग है? ८४-८५ ८६ - ९ ७ ९८- १३५ १३७-१५४ १५५ १३६ इस प्रकार चरक के द्वारा प्रतिसंस्कृत अग्निवेशकृततन्त्र ( चरकसंहिता ) के शारीरस्थान में कतिवापुरुषीय शारीर नामक पहला अध्याय समाप्त हुआ ॥ १ ॥
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अतुल्य गोत्रीयशारीराध्यायः २ ] शारीरस्थानम् अथ द्वितीयोऽध्यायः अथातोऽतुल्यगोत्रीयं शारीरं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इत ह स्माह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
८३७ अब इसके बाद अतुल्यगोत्रीय शारीर की व्याख्या की जायगी । जैसा कि भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥ १-२ ॥ विमर्श – पड्वातुज पुरुष कर्मबन्धन से युक्त होकर बार - बार जन्म लेना है । उस वार - बार उत्पत्ति होने में जो कारण है उसको बनाने के लिए यह अध्याय कहा जा रहा है । इस अध्याय के प्रथम शब्द ' अतुल्यगोत्र ' के आधार पर इसका नाम अतुल्यगोत्रीय शारीर रक्खा है ।
अतुल्यगोत्रस्य रजःक्षयान्ते रहोविसृष्टं मिथुनीकृतस्य ।
किं स्याच्चतुःपात्प्रभवं च षड्भ्यो ' यत् स्त्रीषु गर्भत्वमुपैति पुंसः ॥ ३ ॥
सन्तानोत्पत्ति विषयक प्रश्न – ( १ ) मासिक रजः स्राव होने के तीन दिन बाद, भिन्नगोत्र वाले पुरुष के साथ स्त्री एकान्त में मैथुन करती है, तब एकान्त में निकला वह क्या वस्तु है, जो चार पाद से युक्त है, छः रसों से उत्पन्न होता और जो सभी स्त्रियों में गर्भत्व को प्राप्त होता है || विमर्श - अतुल्य गोत्र का तात्पर्य यह है कि स्त्री - पुरुष का विवाह एक गोत्र में न हो । मनुस्मृति-कार ने भी इसका समर्थन किया है यथा - ' असपिण्डा च या मातुरसगोत्रा च या पितुः । सा प्रशस्ता द्विजातीनां दारकर्मणि मैथुने । ' ' रजःक्षयान्ते ' का तात्पर्य - - - ' प्रथनेऽहनि चाण्डाली, द्वितीये ब्रह्मवातिनी । तृतीये रजकी प्रोक्ता चतुर्थेऽह्नि विशुध्यति ॥ ' से रजःस्राव के ३ तीन दिन अवश्य ' ही त्याज्य है अतः चतुर्थ दिन से १२ दिन तक का समय रजःक्षयान्न से लिया जाता है यथा-' ऋतुस्तु द्वादश निशाः पूर्वास्तिस्रश्च निन्दिताः । ' ( वा. शा. १ ) । रहोविसृष्टम् -- एकान्त में विसृष्ट ( निकाला गया ) से एकान्त में मैथुन करने का ही विधान है । यथा- ' सन्तोऽप्याहुरपत्यार्थ दम्पत्योः सङ्गतं रहः । दुरपत्यं कुलाङ्गारो गोत्रे जातं महत्यपि ॥ ' ( वा. शा. १ ) तथा - आहार निर्धार विहारयोगाः सदैव सद्भिर्विजने विधेयाः ( भा. प्र. ग. प्र. ) ।
शुक्रं तदस्य प्रवदन्ति धीरा यद्धीयते गर्भसमुद्भवाय ।
वाय्यग्निभूम्यब्गुणपादवत्तत् षड्भ्यो रसेभ्यः प्रभवश्च तस्य ॥ ४ ॥
( १ ) प्रश्न: शुक्रविषयक प्रश्न ( अतुल्य गोत्रस्येति ) का उत्तर - अतुल्य गोत्र वाले पुरुष मैथुन के बाद गर्भ उत्पत्ति के लिए स्त्री की योनि मार्ग में जो कुछ धारण कराता है वह उस पुरुष का शुक्र है । ऐसा धीर पुरुष कहते है । वह शुक्र वायु, अग्नि, पृथिवी और जल के उत्तम गुणों से युक्त है और इन्हीं गुणों से युक्त होने से चार पाद वाला कहा जाता है और इस शुक्र की ६ मधु-रादिरसों से उत्पत्ति होती है ॥ ४ ॥
विमर्श - यहाँ शुक्र को चतुष्पाद और ६ रसों से उत्पन्न माना गया है । जब ' सर्वं खल्विदं जगत् पाञ्चभौतिकमिति ' के अनुसार सभी संसार पश्चभूत से बना है तो संसार से बाहर शुक्र तो नहीं है? अत एव शुक्र को भी पाञ्चभौतिक मानना चाहिए । पर पाञ्चभौतिक सृष्टि में आकाश को पाँचवाँ भूत इसलिए माना जाता है कि वह व्यापक है सर्वत्र अवश्यं भावि है वह क्रियाशील हो या न हो पर उसकी गणना अवश्य होती है । यहां रूपवाले से ही रूप की उत्पत्ति मानी है आकाश रूपरहित है शेष ४ में रूप है । अतः चार महाभूतों को ही पात्र माना गया है । १. ' चतुष्पदं षट्प्रभवं किमस्य ' इति पा. ।
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८३८ चरकसंहिता ' रसजं पुरुषं विद्याद्रसं रक्षेत्प्रयत्नतः । अन्नात्पानाच्च मतिमानाचाराच्चाप्यतन्द्रितः ॥ ' ( सु. सू-अ. १४ ) के अनुसार पुरुष को रसज माना है और खाया हुआ षड्रस भोजन जब पचकर शुद्ध रस बन जाता है तब वही रस एवं मासेन रसः शुक्रो भवति, स्वाभाञ्चार्त्तवम् ' ( सु. सू. अ. १४ ) के अनुसार १ मास में शुक्र बनता है अत एव शुक्र को षड्रसज माना है । संपूर्ण देहः समये सुखं च गर्भः कथं केन च जायते स्त्री । गर्भ चिराद्विन्दति सप्रजाऽपि भूत्वाऽथवा नश्यति केन गर्भः ॥ ५ ॥
१. गर्भ सम्पूर्णदेह, कैसे होता है । २. समय पर कैसे होता है । ३. सुखपूर्वक कैसे होता है । ४. बन्ध्या न होते हुए स्त्री देर से गर्भं क्यों धारण करती है । ५. गर्भ होकर कैसे नष्ट हो जाता है । ये पाँच प्रश्न किए हैं ॥ ५ ॥
विमर्श - ये तीन प्रश्न चक्रपाणि और गङ्गाधर ने माने हैं । १. गर्भ सम्पूर्ण देह ( अङ्ग-प्रत्यङ्गयुक्त ) से युक्त होकर सुखपूर्वक ठीक समय पर कैसे होता है? २. जिस स्त्री को सन्तान है अर्थात बन्ध्या नहीं है फिर भी देर से वह गर्भ धारण किस कारण से करती है । ३. या गर्भ धारण होकर किस कारण नष्ट हो जाता हैं ।
शुक्रासृगात्माशयकाल संपद् यस्योपचारश्च हितैस्तथाऽन्नैः ' ।
गर्भश्च काले च सुखी सुखं च संजायते संपरिपूर्णदेहः ॥ ६ ॥
( १ - २ - ३ ) प्रश्न: सम्पूर्ण देह, समय पर, सुखपूर्वक कैसे होता है ( सम्पूर्णदेहः, समये, सुखं च कथं जायते ) इसका उत्तर - शुक्र, आर्तव आत्मा, गर्भाशय और ऋतुकाल की सम्पत्ति ( शुद्धता ) हो, माता के दिन आहार - विहार द्वारा गर्भ का उचित उपचार हो तव गर्भ, देह से परिपूर्ण होकर, सुखपूर्वक गर्भाशय में रह कर समय से सुखपूर्वक बिना कष्ट से उत्पन्न होता है ॥६ ॥
विमर्श - शुक्र और आर्नव की सम्पत्ति का तात्पर्य यह है कि ये दोनों दोषरहित हों । जैसा कि सुश्रुत ने भी स्पष्ट बनाया है यथा- ' वातपित्तश्लेष्मशोणित कुणपग्रन्धिपूति प्रयक्षीणमूत्रपुरीषरेतसः प्रजोत्पादने न समर्थां भवन्ति, आतंत्रमपि त्रिभिर्दोपैः शोगितचतुर्थः पृथग्द्वन्द्वैः समस्तैश्चोपसृष्टमवीजं भवति । ' ( सु. शा. अ. २ ) और वे अपने प्राकृत गुणों से युक्त हो यथा - ' स्फटिकाभं द्रत्रं स्निग्धं मधुरं मधुगन्धि च । शुक्रमिच्छन्ति केचित्तु तैलक्षौद्रनिभं तथा । शशासृक्प्रतिमं यत्तु यद्वा लाक्षार-सोपमम् । तदार्तवं प्रशंसन्ति यद्वासो न विरञ्जयेत् ॥ ' आत्मा की सम्पत्ति - जन्मान्तरीय शुभ कार्यों से प्रेरित होकर पुनर्जन्म के लिए शुक्र और आर्तव से युक्त होना । आशयसम्मत् – गर्भाशय का रोगरहित होना । कालसम्पत् - ऋतुकाल ही ( आदि के तीन दिन छोड़ कर ) गर्भाधान का होना । इस प्रकार इन शुक्र आदि सभी की शुद्धि में होने पर गर्भाधान हो और बाद में गर्भिणी अपने आहार - विहार यदि नियमों को उचित में पालन करती रहे तो बालक सभी भावों से पुष्ट और परिपूर्ण देह होकर, सुखपूर्वक क्लेशरहित रूप, काल पर उत्पन्न होता है । काल का तात्पर्य यह है - ' नवमे दशमे मासि नारी गर्भे प्रसूयते । एकादशे द्वादशे वा न च विकारतः ॥ '
योनिप्रदोषान्मनसोऽभितापाच्छु कासृगाहारविहारदोषात् ।
अकालयोगाद्वलसंक्षयाञ्च गर्भ चिराद्विन्दति सप्रजाऽपि ॥ ७ ॥
( ४ ) प्रश्न: वन्ध्यान होती हुई भी स्त्रां देर से गर्भ क्यों धारण करती है? ( सप्रजापि चिराद् गर्भे कथं विन्दनि ), इसका उत्तर - योनि में दोष होने से, मानसिक कष्ट होने से, शुक्र- आर्तव के दूषित होने से, उचित आहार - विहार के न होने से, अकाल में ( ऋतुकाल के अतिरिक्त समय में ) १. ' हितैस्तथाऽर्थैः ' इति पा. ।
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अतुल्य गोत्रीयशारीराध्यायः २ १. ' विबद्धम् ' इति पा. । ३. ' दृष्ट्वाऽसृगेवम् ' इति पा.! शारीरस्थानम् ८३६ २. ‘ तदग्निसूर्यश्रमशरोषशोकैः ' इति पा.। संभोग करने से, रोगादिकों के कारण बल का क्षय हो जाने से, एक बार जिसे बच्चा उत्पन्न हुआ भी हैं ऐसी स्त्री देर से गर्भ धारण करती है ॥ ७ ॥
विमर्श -- चरक ने इसका अन्य स्थल पर भी समर्थन किया है, यथा - ' विंशतिर्व्यापदो योने-निर्दिष्टा रोगसंग्रहे । न शुक्रं धारयत्येभिर्दोषैर्योनिरुपद्रुता ॥ तस्माद्गर्भ न गृह्णाति स्त्री गच्छत्याम-यान् बहून् । गुल्मार्शःप्रदरादींश्च ॥ ' ( चि. ३० ) अकालयोग से तालर्य यह है कि - ऋतु-काल बारह दिन का होता है । १२ दिन के बाद ( या १६ दिन के बाद किसी किसी ने १६ दिन का ऋतुकाल माना है ) सम्भोग करने से गर्भाधान नहीं होता । कहा भी है- ' दिने व्यतीते नियतं संकुचत्यम्बुजं यथा । दिने व्यतीते नार्यास्तु योनिः संक्रियते तथा ॥ ' ( सु. शा. ३ ) आधुनिक दृष्टि से जहाँ शुक्रकीट संख्या बहुत अधिक होती है वहाँ स्त्रीबीज ( Ovum ) प्रत्येक मास में प्रायः एक ही पक्क होकर निकलता है । उस समय को Ovulation Period कहते हैं । अगर उस समय शुक्रकीट तथा स्त्रीबीज का संयोग ( Fertilisation ) होगा तब तो गर्भाधान होगा अन्यथा नहीं । अतएव स्त्री तथा पुरुष के सभी दृष्टि से स्वस्थ होने पर भी उपर्युक्त संयोग के अभाव में देर से सन्तान हो सकती है । और जब वे अस्वस्थ हों तो कहना ही क्या?
असृङ्गिर्रुद्धं पवनेन नार्या गर्भ व्यवस्यन्त्यबुधः कदाचित् ।
गर्भस्य रूपं हि करोति तस्यास्तदसृग ( स्रम ) स्रावि विवर्धमानम् ॥ ८ ॥
तदग्निसूर्य श्रमशो कैरो गैरुष्णान्नपानैरथवा प्रवृत्तम् ।
दृष्ट्वाऽसृगेकं न च गर्भसंज्ञं केचिन्नरा भूतहृतं वदन्ति ॥ ९ ॥
ओजोशनानां रजनीचराणामाहार हेतोर्न शरीर मिष्टम् ।
गर्भ हरेयुर्यदि ते न मातुर्लब्धावकाशा न हरेयुरोजः ॥ १० ॥
( ५ ) प्रश्न: गर्भ होकर कैसे नष्ट हो जाता है ( भूत्वा केन गर्भः नश्यति ), इसका उत्तर -दुष्ट वायु के द्वारा आर्तव को रुका हुआ देख कर कभी - कभी अल्पश लोग स्त्री को गर्भ रह गया है ऐसा निश्चय कर लेते है । क्योंकि वह रुका हुआ रक्त गर्भाशय में बढ़ कर गर्भ का लक्षण ( जैसे नयन, स्तनों का स्थूल होना आदि ) उत्पन्न कर देता है । बाद में अनिताप, सूर्यताप, श्रमजन्य थकावट, शोक और रोग से अथवा उष्ण अन्नपान के सेवन से गिरते हुए रक्त को देख कर कुछ मूर्ख मनुष्य जो निश्चित रूप से उसे गर्भ समझ बैठे हैं वे कहते हैं कि गर्भ को भूत - प्रेत ने हर लिया है । यह बात कहना ठीक नहीं है क्योंकि ओज भक्षण करने वाले रजनीचरगण ( भूतसमु-( दाय ) के आहार के लिए शरीर कभी इष्ट नहीं हो सकता । क्योंकि यदि वे भूत - प्रेतगर्भ - शरीर को हरण कर लेते हैं तो क्या समय पाकर अर्थात् गर्भ का हरण करने के बाद माना का ओज न हरण कर लेते । अर्थात् अवश्य हरण कर लेते । ( पर प्रत्यक्ष में देखा जाता है कि माता नहीं मरती है यदि वे माता का आज हरण करते तो ओज के नाश होने पर माता अवश्य मर जाती । ) विमर्श- - आजकल इस प्रकार के गर्भ को Pseudo or Spurious Pregnancy ) कहते हैं । वर्तमान काल में उन स्त्रियों में जिनको गर्भ की अत्यन्त इच्छा हो एक विशेष परन्तु विचित्र विकार प्रकट हो जाता है । इसमें गर्भ के कुछ साधारण लक्षण गर्भिणी को अनुभव होने लगते हैं । जैसे वमन, आर्तव का न होना, स्तनों का स्थूल होना । क्रमशः उदर की वृद्धि भी होने लगती है । परन्तु जब स्त्री को कोरोफार्म से बेहोश कर उसके उदर की परीक्षा की जाती है तो गर्भाशय की वृद्धि प्रतीत नहीं होती और उदरवृद्धि की स्थिति आंत में विकृत वायु एकत्र होने से रहती हैं ।
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८४० चरकसंहिता
* कन्यां सुतं वा सहितौ पृथग्वा सुतौ सुते वा तनयान् बहून् वा ।
कस्मात् प्रसूते सुचिरेण गर्भमेकोऽभिवृद्धिं च यमेऽभ्युपैति ॥ ११ ॥
प्रश्न: ( १ ) स्त्री किस कारण से कन्या को उत्पन्न करती है । ( २ ) पुत्र कैसे उत्पन्न करती है । ( ३ ) पुत्र व पुत्री साथ ही कैसे उत्पन्न करती है । ( ४ ) दो पुत्रों को जोड़े के रूप में कैसे उत्पन्न करती है । ( ५ ) दो पुत्रियों को जोड़े के रूप में कैसे उत्पन्न करती है । ( ६ ) बहुत सन्तान को एक ही काल में कैसे उत्पन्न करता है । ( ७ ) गर्भ को बहुत देर से क्यों प्रसव करती है । ( ८ ) जोड़े सन्तान में एक की अधिक वृद्धि होती है, एक की कम वृद्धि होती है, ऐसा क्यों होता है ॥ ११ ॥
विमर्श - गंगाधर ने ' पृथग्वा ' से भी एक प्रश्न माना है अतः ९ प्रश्न होते हैं ।
रक्तेन कन्यामधिकेन पुत्रं शुक्रेण तेन द्विविधीकृतेन ।
बीजेन कन्यां च ' च सूते यथास्वबीजान्यतराधिकेन ॥ १२ ॥
शुकाधिकं द्वैधमुपैति बीजं यस्याः सुतौ सा सहितौ प्रसूते ।
रक्ताधिकं वा यदि भेदमेति द्विधा सुते सा सहिते प्रसूते ॥ १३ ॥
भिनत्ति यावद्बहुधा प्रपन्नः शुक्रार्तवं वायुरतिप्रवृद्वः ।
तावन्त्यपत्यानि यथाविभागं कर्मात्मकान्यस्ववशात् प्रसूते ॥ १४ ॥
( १-२-३-४-५-६ ) प्रश्न: कन्या, पुत्र, साथ साथ, अलग - अलग, दो पुत्र, दो पुत्री, बहुत सन्तान कैसे होती हैं ( कस्मात् कन्या सूतं सहितौ पृथग्वा सुतौ सुते वा तनयान्वहून्वा प्रसूते ), इसका उत्तर- आर्तव के अधिक होने से कन्या और शुक्र के अधिक होने से पुत्र उत्पन्न होता है । जत्र शुक्र आर्तव मिलित बीज भाग को वायु समान भाग में बाँटता है तो जिस भाग में शुक्र की अधिकता होती है उससे पुत्र, जिस भाग में आतंत्र की अधिकता होती है उस भाग से कन्या, इस प्रकार पुत्र व पुत्री साथ उत्पन्न होते हैं । जब वीज भाग को वायु ऐसा दो भाग करता है जिन दोनों भाग में शुक्र की ही अधिकता होती है तब उस भाग से दो पुत्र होते हैं । जब वीजभाग को वायु ऐसा दो भाग करता है जिसमें आतंत्र की अधिकता होती है तो दो कन्याएँ उत्पन्न होती हैं । गर्भाशय में गये हुये शुक्र आर्तव को गर्भाशय में ही अत्यन्त बढ़ा हुआ वायु जितना अधिक विभाग करता है उतनी ही संतानें होती हैं । यह वान पूर्वजन्म के कर्म के अनुसार होती है इसमें स्त्री का कोई भी वश नहीं होता है ॥ १२-१४ ॥ विमर्श - आधुनिक विचार से शुक्र में शुक्राणु की संख्या अत्यधिक होतो हैं, पर गर्भाधान के लिये एक ही शुक्राणु स्त्रीबीज के साथ संयुक्त होकर गर्भोत्पत्ति में समर्थ होता है । शुक्राव स्त्रीबीज में क्रोमोसोम ( Chromosome ) की संख्या ४८ होती है । पक होते समय विभजन के कारण इनकी संख्या २४ रह जाती है । इनमें कुछ क्रोमोसोम ( Chromosome ) लिंगवाहक होते हैं । स्त्रीबीज में इनकी संख्या सम या २ रहती है । जिससे विभजन के द्वारा पक्क हुये प्रत्येक स्त्रीवीज में स्त्रीत्त्रवाहक ( Xchromosome ) आ जाता है । शुक्राणु में पुंस्त्व-जनक ( Ychromosome ) एक होना है । विभाजन के समय पक्क हुये शुक्राणुओं में आधे पुंस्त्वजनक क्रोमोसोम युक्त शुक्राणु स्त्रीबीज से मिलते है तो वे पुरुष को उत्पन्न करते हैं । और यदि पुंस्त्वहीन शुक्राणु स्त्रीबीज से मिलते हैं तो कन्या उत्पन्न करते हैं । इन दोनो " के संयोग होने में कोई भी दृष्ट कारण नहीं होता है । किन्तु ' आधिक्ये रजसः कन्या पुत्रः शुक्राधिको भवेत् । नपुंसकं समत्वेन यथेच्छा पारमेश्वरी ॥ ' ( शार्ङ्गधर ) के अनुसार ईश्वर ही कारण होता है ।
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अतुल्यगोत्रीय शारीराध्यायः २ ] शारीरस्थानम् ८४१ जोड़े मंतान पैदा होने के विषय में सुश्रुत ने यथा - ' बीजेऽन्तर्वायुना भिन्ने द्वौ जीवौ कुक्षिमागनौ । यमावित्यभिधीयते धर्मेतरपुरस्सरौ ॥ ' ( सु. शा. अ. २ ) से जोड़ा संतान उत्पन्न होना बीज का दो भाग में विभाजन बताया है । आधुनिक दृष्टिकोण से स्त्रां बीज पृथक् पृथक् होने पर सामान्यतः अनिमास बीजकोष से केवल एक बीज बाहर आता है । कभी - कभी बाम एवं दक्षिण वीजकोष से या कभी एक ही डिम्भग्रन्थि से २ वीज बाहर आते हैं । शुक्र में करोड़ों शुक्राणु होते हैं । पर ' एक ही शुक्राणु स्त्रीबीज से संयोग करता है । पर यदि संयोगवश वाम व दक्षिण वीजकोष से निकले - हुये, स्त्रां बीज अलग - अलग दो शुक्राणुओं से संयोग कर लें तो दो संतान अथवा वाम दक्षिण वोजकोष से दो - दो स्त्रीबीज निकलकर ४ ] शुक्राणु से संयोग कर लें, तो चार संतान हो जाते हैं । इसे आजकल Multiple Pregnancy कहा जाता है ।
आहारमाप्नोति यदा न गर्भः शोषं समाप्नोति परिस्रुतिं वा ।
स्त्री प्रसूते सुचिरेण गर्भं पुष्टो यदा वर्षगणैरपि स्यात् ॥ १५ ॥
( ७ ) प्रश्न: देर से संतान क्यों होती है ( कस्मात् सुचिरेण गर्भ प्रसूते ) इसका उत्तर -जब गर्भ को उचित आहार नहीं मिलता या गर्भाधान होने पर भी योनि से स्राव होता रहता है तो गर्भ सूख जाता है । ऐसे गर्भ को स्त्री देर से प्रपत्र करती है । और जब गर्भ की पुष्टि वर्षो में होती है तब वह उत्पन्न होता है ॥ १५ ॥
विमर्श - इस प्रकार के गर्म को ही नागोदर, उपवेष्टक व लीन माना गया है । यथा--“ संजातसारे महति गर्भे योनिपरिस्रवात् । वृद्धिमप्राप्नुवन् गर्भः कोष्ठे तिष्ठति सस्फुरः ॥ उपविष्टक -माहुस्तं वर्धते तेन नोदरम् । शोकोपवासरूक्षाद्यैरभवा योन्यतितवात् ॥ वाते क्रुद्धे कृशः शुष्येद्गर्भो “ नागोदरं तु तत् ॥ ' लीनाख्ये – निस्फुरे.... " हर्षयेत् सततं चैनामैवं गर्भः प्रवर्धते । पुष्टोऽन्यथा वर्ष-गणैः कृच्छ्राज्जायेत नैव वा ॥ ' ( अष्टांगहृदय शा. अ ०२ )
कर्मात्मकत्वाद्विषमांशभेदाच्छुक्रा सृजोवृद्धिमुपैति कुक्षौ ।
एकोऽधिको न्यूनतरो द्वितीय एवं यमेऽप्यभ्यधिको विशेषः ॥ १६ ॥
( ८ ) प्रश्न: दो बच्चे में एक बच्चा गर्भाशय में ही क्यों पुष्ट और दूसरा दुर्बल होता है? ( एकोऽभिवृद्धि कस्मादभ्युपैति ), उत्तर -- • कर्म के वशीभूत होकर गर्भाशय गत शुक्रार्तव मिलित भाग को वायु विषन अंश में विभाजित करता है । अर्थात् एक भाग छोटा दूसरा भाग बड़ा होता है । जो भाग बड़ा होता है उससे उत्पन्न होने वाला गर्भ पुष्ट एवं बड़ा होता है जो भाग छोटा होता है उससे दुर्बल और छोटा होता है । इस प्रकार जोड़े होने वाले गर्भ मैं एक विशेषकर पुष्ट एवं बड़ा होता है ॥ १६ ॥
कस्माद्विरेताः पवनेन्द्रियो वा संस्कारवाही नरनारिषण्डौ ।
aat तथेर्ष्याभिरतिः कथं वा संजायते वातिकपण्डको वा ॥ १७ ॥
प्रश्न- ( १ ) किस कारण से गर्भ द्विरेता अर्थात् स्त्री - पुरुष के चिह्न से युक्त होता है? ( २ ) पवनेन्द्रिय ( जिसके इन्द्रिय से मैथुन करते समय शुक्र न निकल कर केवल वायु निकलता हैं ) ( ३ ) संस्कारवाही ( बाजीकरण औषध से शरीर को संस्कारित करने के बाद मैथुन करने में शक्ति हो, अन्यथा नपुंसकता का अनुभव करता हो ( ४ ) नरषण्ड ( पुरुष नपुंसक ) कैसे होते हैं? ( ५ ) नारीषण्ड ( स्त्री नपुंसक ) कैसे होती है? ( ६ ) वक्री कैसे होते हैं? ( ७ ) ईर्ष्यक कैसे होते हैं? ( ८ ) वानिक घण्ड कैसे होते हैं? ॥ १७ ॥
१. ' मेऽधिकेऽप्येष भवेद्विशेषः ' इति पा ० ।