चरक संहिता हिन्दी भाष्य — पृष्ठ 981–990

चरक संहिता हिन्दी भाष्य · Chaukhamba · पृष्ठ 981–990

पृष्ठ 981

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८६२ चरकसंहिता ग्राम्बुद रजोधूम नीहारैरसमावृतम् । यथाऽर्कमण्डलं भाति भाति सत्त्वं तथाऽमलम् ॥१४ ॥

ज्वलत्यात्मनि संरुद्धं तत् सत्त्वं संवृतायने । शुद्धः स्थिरः प्रसन्नाचिदीपो दीपाशये यथा ॥ १५ ॥

शुद्ध मन का स्वरूप --- इन ऊपर बताये हुए शुद्धि के उपायों ( मोक्षसाधक उपायों ) द्वारा रज और तम से रहित होकर मन वैसे ही शुद्ध हो जाता है जैसे तेल, कपड़े के टुकड़े और बाल के बने हुए ब्रश ( Brush ) से मलने पर दर्पण पूर्ण साफ हो जाता है । सूर्यादिग्रह, मेघ, धूलि, धूम, कुहरा आदि से न ढका हुआ सूर्यमण्डल जिस प्रकार चमकता है ठीक उसी प्रकार वह निर्मल सत्त्व ( मन ) चमकता रहता है । वह शुद्ध मन आत्मा से रद्ध होने के कारण अर्थात् आत्मस्थित निर्मल मन मार्ग के रुके रहने पर उस प्रकार प्रकाशमान होता है जिस प्रकार दीपक की ज्वाला दीपाशय ( लालटेन आदि ) में प्रकाशित होती है ॥ १३-१५ ॥ विमर्श - चञ्चल मन सदा इतस्ततः भ्रमण करता है, जब ' योगो मोक्षप्रवर्तकः ' के अनुसार योगाभ्यास में मनुष्य प्रवृत्त होता है तो सारे इन्द्रियों के मार्ग बन्द हो जाते हैं और मन आत्मा में स्थिर हो जाता है । उस समय उसका तेज अधिक बढ़ जाता है । इसी को समझाने के लिए आचार्य ने लालटेन आदि को उदाहरण स्वरूप दर्शाया है । दीपक में कांच का स्वच्छ आवरण रहने पर प्रकाश अधिक होता ही है । आत्मा के ऊपर माया का आवरण लगा रहता है । मन भी माया से आक्रान्त रहता है । जब इन शुद्धि के उपायों द्वारा आत्मा एवं मन की शुद्धि हो जाती है । तो मन अधिक प्रकाशमान हो जाता है । शुद्धसत्त्वस्य या शुद्धा सत्या बुद्धिः प्रवर्तते । यया भिनत्यतिबलं महामोहमयं तमः ॥१६ ॥

सर्वभावस्वभावज्ञो यया भवति निःस्पृहः । योगं यया साधयते सांख्यः संपद्यते यया ॥

या नोपेत्यहङ्कारं नोपास्ते कारणं यथा । यया नालम्बते किंचित् सर्वं संन्यस्यते यया ॥

याति ब्रह्म यया नित्यमजरं शान्तमव्यर्यम् ।

विद्या सिद्धिर्मतिर्मेधा प्रज्ञा ज्ञानं च सा मता ॥ १ ९ ॥

शुद्ध बुद्धि का स्वरूप -- शुद्ध मन वाले पुरुष में जो सत्या बुद्धि उत्पन्न होती है, जिस सत्या बुद्धि से अविलष्ठ भयंकर मोहस्वरूप तम ( अन्धकार - माया के प्रपञ्च ) को भेदन करने में मनुष्य समर्थ होता है; जिसके द्वारा सभी उत्पत्तिधर्मा भावों के स्वभाव को जान कर मनुष्य निःस्पृह हो जाता है, जिस सत्यबुद्धि से योग की सिद्धि होती है, जिससे सांख्य ( तत्त्वज्ञाता ) हो जाता है, जिस बुद्धि के प्राप्त हो जाने पर अहंकार नहीं होता है, जिस सत्यावुद्धि के द्वारा कारण ( जिससे पुनर्जन्म - मरण हो ऐसे कार्यों ) की उपासना नहीं करता है, जिसके द्वारा किसी ( राग - द्वेष, कामादि ) का आलम्बन ( आश्रय ) नहीं लेता है, जिससे सभी वस्तुओं को त्याग दिया जाता है; जिस बुद्धि के द्वारा नित्य, अजर, शान्त और अक्षर ब्रह्म को प्राप्त किया जाता है, उस सत्याबुद्धि को ही विद्या, सिद्धि, मनि, मेधा, प्रज्ञा और ज्ञान कहा जाता है ॥ १६-१९ ॥ विमर्श - इस प्रकार सत्याबुद्धि मन के शुद्ध होने पर प्राप्त की जाती है और मन की शुद्धता ऊपर बताए हुए - आचार्य के पास जाना, उसके उपदेश का पालन करना आदि - पर निर्भर है । जैसा कि ' लतामुपासनं सम्यगमतां परिवर्जनम् ' इत्यादि प्रथम अध्याय में कह आए है । जब तक मन में रज और तम ये दोनों दोष रहते हैं तब तक मन शुद्ध नहीं होता । उसी

को दूर करने के ऊपर उपाय बताए गए हैं ।

लोके विततमात्मानं लोकं चात्मनि पश्यतः । परावरदृशः शान्तिर्ज्ञानमूला न नश्यति ॥

१. ' शान्तमक्षरम् ' इति पा ० ।

पृष्ठ 982

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पुरुषविचयशारीराध्याय: ५ ] शारीरस्थानम् ८६३ समानता का फल - लोक में अपने को और अपने में लोक को व्याप्त देखते हुए ब्रह्म और महदादि प्रकृति को समझने वाले तत्त्वदर्शी पुरुष की ज्ञानजन्य शान्ति कभी नष्ट नहीं होती ॥२० ॥

विमर्श - ' यथा लोके तथा शरीरे ' इस ज्ञान का मुख्य कारण है तत्त्वदर्शिता का होना । तब जो मोक्षरूपी शान्ति प्राप्त होती है वह अक्षर है अर्थात् कभी नष्ट नहीं होती । पश्यतः सर्वभावान् हि सर्वावस्थासु सर्वदा । ब्रह्मभूतस्य संयोगो न शुद्धस्योपपद्यते ॥ और भी - सर्वदा सभी जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति अवस्थाओं में सत्र लोक एवं शरीरगत भावों को तुल्य रूप में देखते हुए जीवन्मुक्त शुद्ध ( रज और तम से रहित ) पुरुष का धर्म ( सुख ), अधर्म ( दुःख ) से संयोग ( सम्बन्ध ) नहीं होता ॥ २१ ॥

विमर्श -- यहाँ ' पश्यतः ' ( देखते हुए ) से स्पष्ट किया गया है कि जीवन्मुक्त पुरुष सभी भावों में राग और द्वेष के कारण प्रेम और त्याग न करके केवल उसे देखता ही रहता है । ब्रह्मभूत का जीवन्मुक्त अर्थ करना हो उचित प्रतीत होता है क्योंकि ब्रह्मभूत मुक्त पुरुष को आत्मा और मन का परस्पर सम्बन्ध विच्छेद हो जाने से ज्ञान भी नहीं होता तो दर्शन कैसे होगा, जिसके लिये

' पश्यतः ' यह क्रिया दी गई हैं ।

* नात्मनः करणाभावालिङ्गमप्युपलभ्यते । स सर्वकरणायोगान्मुक्त इत्यभिधीयते ॥२२ ॥

मुक्त का स्वरूप - करण ( शरीर, मन और इन्द्रियों ) का अभाव होने से आत्मा का चिह्न भी नहीं पाया जाना है । तत्र पुरुष सभी करण ( मन, शरीर ) आदि का त्याग कर देने से मुक्त कहा जाता है ॥ २२ ॥

* विपापं विरजः शान्तं परमक्षरमव्ययम् । अमृतं ब्रह्म निर्वाणं पर्यायैः शान्तिरुच्यते ॥२३ ॥

मुक्ति, शान्त, पर, अक्षर, अव्यय, अमृत, ब्रह्म, निर्वाण और का पर्याय - विदाप, विरज शान्ति ये मोक्ष के पर्याय कहे जाते हैं ॥ २३ ॥

* एतत्तत् सौम्य! विज्ञानं यज्ज्ञात्वा मुक्तसंशयाः । मुनयः प्रशमं जग्मुर्वीतमोहरजःस्पृहाः ॥ शरीर - विचय का महत्त्व - हे सौम्य! यह वह शरीर - विचय नामक विज्ञान है जिसे जान कर संदेहरहित मुनिगण मोह ( तम ) और रज ( राग ) से पृथक् होकर प्रशम ( मोक्ष ) को प्राप्त कर गए ॥ २४ ॥

तत्र श्लोकौ -सप्रयोजनमुद्दिष्टं लोकस्य पुरुषस्य च । सामान्यं मूलमुत्पत्तौ निवृत्तौ मार्ग एव च ॥ २५ ॥

शुद्धसत्त्वसमाधानं सत्या बुद्धिश्च नैष्ठिकी । विचये पुरुषस्योक्ता निष्ठा च परमर्षिणा ॥२६ ॥

इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते शारीरस्थाने पुरुषविचय-शारीरं नाम पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥

अध्याय उपसंहार - परमर्षि आत्रेय ने इस पुरुष - विचय नामक अध्याय में लोक और पुरुष की समानता और उसे बताने का प्रयोजन, उत्पत्ति ( प्रवृत्ति ) का कारण, निवृत्ति का मार्ग, शुद्ध सत्व का समाधान, मोक्षसाधक सत्यावुद्धि और मोक्ष की प्राप्ति के उपाय का वर्णन किया है ॥ २५-२६ ॥ इस प्रकार चरक द्वारा प्रतिसंस्कृत अग्निवेशकृततन्त्र ( चरकसंहिता ) के शारीरस्थान में पुरुष-विचयशारीर नामक पांचवा अध्याय समाप्त हुआ ॥ ५ ॥

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८६४ चरकसंहिता अथ षष्ठोऽध्यायः अथातः शरीरविचयं शारीरं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥

इति ह स्माह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥

अब पुरुष - विचय शारीर के बाद शरीर विचय नामक शारीर की व्याख्या की जायगी ।

जैसा कि भगवान आत्रेय ने कहा था ॥ १-२ ॥

विमर्श - इस अध्याय के पूर्व मोक्ष में सहायक पुरुष -विचय अध्याय का वर्णन किया गया है, मोक्ष का साधक योगाभ्यास होता है और योगाभ्यास में शरीर के अङ्ग - प्रत्यङ्ग एवं रस - रक्तादि धातुओं का ज्ञान आवश्यक है । अतः शरीर के अङ्ग - प्रत्यङ्गों का ( विचय ) विभाग से ज्ञान प्राप्त करने के लिए शरीर - विचय नामक अध्याय का वर्णन किया गया है । अथवा शास्त्राध्ययन का मुख्य प्रयोजन मोक्ष के साधक उपायों का वर्णन करने के बाद ( शा. अ. ५ ) गौण प्रयोजन चिकित्सा के लिए उपयोगी शारीर ज्ञान बताने के लिए शरीर - विचय नामक अध्याय की व्याख्या की जा रही है । ॐ शरीरविचयः शरीरोपकारार्थमिष्यते । ज्ञात्वा हि शरीरतत्त्वं शरीरोपकार करेषु

भावेषु ज्ञानमुत्पद्यते । तस्माच्छरीरविचयं प्रशंसन्ति कुशलाः ॥ ३ ॥

( १ ) शरीर विचय प्रकरण शरीर - विचय का प्रयोजन -- • भिषग् विद्या ( चिकित्सा शास्त्र ) में शरीर के उपकार ( लाभ ) के लिए शरीर का विभागशः ज्ञान परम आवश्यक है । शरीर के तत्वों का ठीक - ठीक ज्ञान कर लेने पर शरीर के उपकारक भावों का ज्ञान हो जाता है । इसलिए कुशल वैद्य शरीर - विचय की अर्थात् विशेष रूप से अङ्ग - प्रत्यङ्ग रस रक्तादि धातुओं के विभाग- ज्ञान की प्रशंसा करते हैं ॥ ३ ॥

* तत्र शरीरं नाम चेतनाधिष्ठानभूतं पञ्चमहाभूत विकारसमुदायात्मकं सर्मयोगवाहि । यदा ह्यस्मिन् शरीरे धातवो वैषम्यमापद्यन्ते तदा कुशं विनाशं वा प्राप्नोति । वैषम्यगमनं हि पुनर्धातूनां वृद्धिहासगमन कात्स्न्येन प्रकृत्या च ॥ ४ ॥

शरीर की परिभाषा - चेतना ( आत्मा ) का आश्रयभूत और पञ्च महाभूतों के विकार के समष्टि रूप का नाम शरीर है । यह शरीर समयोगवाही होता है, अर्थात् तीन दोष, सप्तधातु और मलों के सममात्रा में रहने से यह शरीर चलता है । जब इस शरीर में धातुयें विषमता को प्राप्त होती हैं तब यह शरीर क्लेश ( कष्ट ) या विनाश ( मृत्यु ) को प्राप्त होता है । धातुओं का वैषम्य होने का तात्पर्य धातुओं को वृद्धि और हास ( बढ़ने और घटने ) से है । धातुओं का बढ़ना - घटना आंशिक रूप में या प्रकृति से होता है ॥ ४ ॥

विमर्श - यहां सर्वप्रथम चेतना का आश्रयभूत शरीर का वर्णन किया गया है, पर चेतना के आश्रय अहंकार आदि प्रत्येक विकारों में रहते हैं अतः प्रत्येक को अलग - अलग शरीर मानना पड़ेगा । इसलिए पञ्च - महाभूत और १६ विकार के समुदाय को शरीर बताया गया है । अथवा पञ्च महाभूत के विकार ( रसास ग् ) मांसमेदादि धातुयें वात, पित्त, कफ और मलमूत्र, स्वेदादि इनका समुदाय स्वरूप ही शरीर है । चक्रपाणि ने, ' समयोगवाहि ' पाठ रख कर शरीर का विशेषण किया है, गङ्गाधर ने ' समसंयोग-वाहिनः ' पाठ रखकर धातु का विशेषण किया है । धातुओं की विषमता न्यून मात्रा में होने से कष्ट और अधिक मात्रा में होने से विनाश होता है । १. ' समयोगवाहिनो यदा ह्यस्मिन् ' इति पा ० ।

पृष्ठ 984

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शरीरविचयशारीराध्याय: ६ ] शारीरस्थानम् ८६५ यहाँ ‘ वैषम्य गमन ' का तात्पर्य विषम अवस्था की प्राप्ति से हैं । इसलिए स्वभाव से ही धातुओं में जो विषमता होती है वह रोगकारक नहीं मानी जाती । धातुओं का वृद्धि - हास होना ही वैषम्य गमन माना जाता हैं इनका वृद्धि - हास, कुछ आंशिक रूप में या सम्पूर्ण रूप में होता है ॥ कुछ आचार्य ‘ अकात्स्यं ' शब्द को क्लेश और विनाश शब्द के साथ सम्बन्धित कर इस प्रकार अर्थ करते हैं धातुयें की विषमता होने पर भी कुंश और विनाश सभी को नहीं प्राप्त होते, क्योंकि अकात्स्र्न्य रूप ( आंशिक रूप ) से क्लेश या विनाश होता है यह ' अकात्स्न्ये ' पद से ही स्पष्ट प्रतीत होता है । वे अपने सिद्धान्त को पुष्ट करने के लिए अग्रांकित युक्ति देते हैं -- वृष्य, या शुकल औषध प्रयोग से शुक्र की अधिकता होने पर वृद्धिजन्य विषमता होती है तथा वाल्यावस्था में धातुयें स्वयं वृद्ध होती है पर वह रोगोत्पादक नहीं होतीं । किन्तु इस प्रकार की व्याख्या अरुचिकर है-शुकल औषधि से शुक्र की वृद्धि होने पर भी वह रोगोत्पादक नहीं होती अतः उसे विषम न कहकर प्राकृत ही कहा जाता है । विषमता का नाम विकार ( रोग ) है जो विषमता रोगो-स्पादक होती हैं उसे ही धातुवैषम्य कहा जाता है जैसा कि - ' विकारो धातुवैषम्यं, साम्यं प्रकृति-रुच्यते । सुखसंज्ञकमारोग्यं विकारो दुःखमेव च । ' ( सू. अ. ९ ) से बताया गया है | वाल्यावस्था में जो धातुर्थे स्वभाव से वृद्ध होती हैं वह वृद्धि भी रोग नहीं है अतः वह भी वैषम्य शब्द से गृहीत नहीं होता है । अपितु अवस्था ( वय ) के अनुसार उन्हें प्राकृतमानावस्था वाला ही माना जाता है । तात्पर्य यह है कि बढ़ी हुई धातुयें जितनी मात्रा में रोगकारक नहीं होतीं उतनी मात्रा धातुओं की प्राकृतावस्था ही मानी जाती है । अतः सामान्य रूप से धातुओं की जितनी वृद्धि रोग-कारक नहीं है उसे प्राकृतावस्था, जितनी मात्रा रोगकारक है उसे वैषम्यावस्था कहना चाहिए | एक दूसरा मत यह है कि दोषों का वैषम्य गमन प्रकृति से भी होता हैं जैसा कि ' प्रकृतिस्थं यदा पित्तं मारुतः श्लेष्मणः क्षये । स्थानादादाय गात्रेषु यत्र यत्र विसर्पति । तदा भेदश्च दाहश्च तत्र तत्रा-नवस्थितः ( तु. अ. १७ ) प्रकृतिस्थ पित्त भी रोगकारक होता है, अतः रोगोत्पादक दोषों की प्रकृतिस्थता को भी वैषम्य शब्द से लेना चाहिये पर यह मत भ्रामक है, क्योंकि दोषों की गति प्रकृतावस्था में भी होती है पर वे रोगोत्पादक नहीं होती हैं अतः प्रकृतिस्थ दोषों की गति को वैषम्य गमन नहीं कहा जा सकता, जैसा कि - ' क्षीणा जहति लिङ्गं स्वं, समाः स्वं कर्म कुर्वते । दोषाः प्रवृद्वाः स्वं लिङ्गं दर्शयन्ति यथावलम् ॥ ( सू. अ. ११ ) तथा ' साम्यं प्रकृतिरुच्यते । ' ( सू.अ. ९ ) आदि वचनों से समता को प्रकृति, आरोग्य और शरीर में अपना उचित कार्य अवश्य करने वाला बताया गया है । प्रकृतिस्थ पित्त देशान्तर- गमन कर दाह आदि को जो उत्पन्न करता है उसका तात्पर्य यह हैं कि पाचक या रञ्जकादि पित्त अपने उचित मान में रहते हुए कफ़ के क्षीण होने पर कुपित वायु के द्वारा शरीर के किसी एक देश में प्रक्षिप्त किया जाता है तब आगन्तुक पित्त और उस देश में रहने वाला भ्राजक पित्त ( स्थानीय ) दोनों मिल कर उस स्थान में पित्त की वृद्धि करते है अतः यह विकार भी वृद्ध वायु के द्वारा प्रक्षिप्त पित्त का ही माना जाता है । इसी प्रकार अपने मान में रहने वाले रस - रक्तादि धातुओं के वातादि दोषों से दूषित होने पर जो विकार उत्पन्न होता है वह चातादि दोनों की वृद्धि के ही कारण होता है और दुष्ट दोषों के सम्बन्ध से रस - रक्तादि धातुओं में भी गुण की हानि या गुण को वृद्धि हो जाती है । इस प्रकार दृष्य रस- रक्तादि धातुओं में वृद्धि-हास होता है तो यह विकार भी प्रकृतिस्थ रस - रक्तादि धातुओं का न मान कर वैषम्यावस्था

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८६६ चरकसंहिता प्राप्त दोष और दूष्यजन्य ही माना जाता है अतः प्रकृतिस्थ दोषों का रोगोत्पादक कहना उचित नहीं है । * यौगपद्येन तु विरोधिनां धातूनां वृद्धिहासौ भवतः । यदि यस्य धातोर्वृद्धिकरं तत्ततो विपरीत गुणस्य धातोः प्रत्यवायकरं संपद्यते ॥ ५ ॥

धातुओं की वृद्धि और हास - परस्पर विरुद्ध गुण वाले धातुओं की वृद्धि और हास एक ही साथ होते हैं, क्योंकि जो द्रव्य ( समान गुण होने से ) जिस धातु को बढ़ाने वाला होता है, वही द्रव्य ( विशेष गुण होने के कारण ) अपने से विपरीत गुण वाले धातुओं का हास करने वाला होता है ॥ ५ ॥

विमर्श - एक काल में ही परस्पर विरुद्ध गुण वाले धातुओं की वृद्धि - हास होता है तब उसे वैषम्यावस्था कहते हैं जिसे विकार ( दुःख, रोग ) माना जाता है । जो औषधि जिस धातु को बढ़ाती है वही औषधि उस धातु से विपरीत गुण वाले धातु को घटाती है - जैसे दुग्ध मधु, गुण स्निग्ध होने से कफ एवं शुक्र को बढ़ाता है और रूक्ष, कटु गुण युक्त वात को नष्ट करता है । * तदेव तस्माद्भेषजं सम्यगवचार्यमाणं युगपन्न्यूनातिरिक्तानां धातूनां साम्यकरं भवति, अधिकमपकर्षति न्यूनमाप्याययति ॥ ६ ॥

और भीं -- इसलिए उचित रूप में प्रयुक्त वही औषधि एक ही साथ न्यून ( ह्रास को प्राप्त ) और अतिरिक्त ( वृद्धि को प्राप्त ) धातुओं को साम्य ( समान रूप में ) करने वाली होनी है । अधिक हुई धानुओं को कम करता है और घटी हुई को बढ़ाना है ॥ ६ ॥

विमर्श -- यहाँ औषध का सम्यक् प्रयोग ही न्यून और अतिरिक्त धातुओं का साम्य करता है । इसका तात्पर्य यह है कि औषधि की मात्रा, व्याविनाश की योग्यता से प्रयुक्त हो और सड़ी-गली और जीर्ण न हो इसका ध्यान रख कर जब तक धातुयें साम्यावस्था को प्राप्त न हों तब तक उसका प्रयोग किया जाता है । यदि मात्रा आदि से विगुण औषधि का प्रयोग किया जाता है तो वह उचित कार्य नहीं करती । जैसे किसी व्यक्ति के शरीर में कफ वृद्ध है और पित्त क्षीण है तो कफ को हास और पित्त को वृद्ध करने के लिए कटु मरिच का प्रयोग किया जाना है क्योंकि-' मरिचं कटुकं तीक्ष्णं दीपनं कफवातनुत् । उष्णं पित्तकरं रूक्षं श्वासकासकृमीञ्जयेत् । ' मरिच कफनाशक और पित्तवर्द्धक है । अतएव कफ के नाश हो जाने के बाद भी मरिच का प्रयोग किया गया तो पित्त को अधिक बढ़ा कर विषमता उत्पन्न कर देता । विरोधी धातुओं की वृद्धि एवं हास की चर्चा चला कर यहाँ धातुसाम्य बता कर उपसंहार करने के बदले न्यून की वृद्धि और अधिक का हास बताकर पुनः अपनी वृद्धि - हास के प्रसंग से ही वाक्य समाप्त किया है । यह वृद्धि - हास - क्रिया वहीं की जाती हैं जहाँ एक धातु की वृद्धि से दूसरे का क्षय होता है । जहाँ केवल वृद्धि है वहाँ केवल हास और जहाँ केवल हास है वहाँ केवल वृद्धि कर्म किया जाता है । * एतावदेव हि भैषज्यप्रयोगे फलमिष्टं स्वस्थवृत्तानुष्ठाने च यावद्धातूनां साम्यं स्यात् । स्वस्थापि धातूनां साम्यानुग्रहार्थमेव कुशला रसगुणानाहारविकारांश्च पर्यायेणेच्छ-मृत्युपयोक्तुं सात्म्यसमाज्ञातान्; एकप्रकारभूयिष्ठांश्चोपयुञ्जानास्तद्विपरीतकरसज्ञातया चेष्टयः सममिच्छन्ति कर्तुम् ॥ ७ ॥

१. विपरीतकरणलक्षणसमाज्ञातया ' इति पा ० ।

पृष्ठ 986

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शरीरविचयशारीराध्याय: ६ ] शारीरस्थानम् ६६७ वैद्य का कर्त्तव्य - औषध का प्रयोग करने में और स्वस्थ वृत्त का अनुष्ठान करने में यही फल अभीष्ट होता है कि धातुओं की समता हो । कुशल स्वस्थ पुरुष भी धातुओं में समता बनाये रखने के लिए ही, प्रकृति के अनुकूल सात्म्य समाज्ञान मधुरादि रसों का, गुर्वादि गुणों का और भक्ष्य, भोज्य, चर्च्य, चूष्प आदि आहार विकारों का क्रम से प्रयोग करना चाहते हैं । जो व्यक्ति किसी विशेष कारणवश एक प्रकार के ही रस का अधिक सेवन करता है तो उस रस से बढ़ने बाली धान के विपरीत समाजात ( जानी हुई ) चेष्टाओं से उस धातु को कुशल पुरुष सम करना चाहते हैं ॥ ७ ॥

विमर्श -- धातुओं को साम्य करना ही औषध प्रयोग का फल होता है, क्योंकि ' धातुसाम्य-क्रिया चोक्ता तन्त्रस्यास्य प्रयोजनम् ' कहा है । वैद्य का कार्य, धातुसाम्य करना है, इसे ही चिकित्सा कहते हैं और इसी के लिए औषध प्रयोग किया जाता है । धातुसाम्य करना मात्र ही औषध प्रयोग का फल है तो स्वस्थ मनुष्य में सभी धातुयें सम होती हैं अतः स्वस्थ मनुष्य को औषध प्रयोग नहीं करना चाहिए इस शंका के समाधान में उत्तर दिया है कि साम्य की रक्षा के लिए ही सात्म्यसमाज्ञान अर्थात् अभ्यास से जो आहार - विहार प्रकृति के अनुकूल हो गया है और जो सम ( पथ्य ) है पर पथ्यत्वेन ज्ञात नहीं है, ( अथवा सात्म्य रूप से समाज्ञात है ) ऐसे रसगुण और आहार का क्रम से प्रयोग धातुसाम्य के लिए किया जाता हैं और आसात्म्यत्वेन परिज्ञात का त्याग कर दिया जाता है । रस आदि का क्रम से प्रयोग किया जाता है इसका तात्पर्य यह है कि मधुर रस के प्रयोग से होने वाली कफ वृद्धि को रोकने के लिए कटु, तिक्त और कपाय रस का प्रयोग करना, गुणतः गुरु द्रव्य के प्रयोग से होने वाली गुरुता को रोकने के लिए लघु गुण वाले द्रव्यों का प्रयोग करना, भक्ष्य, चर्च्य आदि आहार द्रयों के उपयोग के बाद उसे पचने के लिए पाचन आदि का प्रयोग करना आदि क्रम कहा जाता है । यदि विशेष कारणवश एक ही प्रकार के रस का अधिक प्रयोग किया जाता है उससे वृद्ध धातु को सम करने के लिए उस धातु के विपरीत क्रिया की जाती है, जैसे- विशेष रूप से मधुर आहार रस के प्रयोग से मधुर के सामान्य कफ धातु की वृद्धि को रोकने के लिए कफ के कर्म को क्षय करने वाले व्यायामादि चेष्टाओं के द्वारा धातुओं का साम्य किया जाता है । देशकालात्मगुणविपरीतानां हि कर्मणामाहारविकाराणां च क्रियोपयोगः सम्यक, सर्वातियोगसन्धारणम्, असन्धारणमुदीर्णानां च गतिमतां साहसानां च वर्जनं, स्वस्थवृत्तमेतावद्धातूनां साम्यानुग्रहार्थमुपदिश्यते ॥ ८ ॥

और भी - देश, काल और अपने शरीर के गुणों से विपरीत गुण वाले कर्मों एवं आहार-विकारों ( भोज्य पदार्थों ) का क्रमपूर्वक उचित रूप में प्रयोग, तथा सत्र अतियोगों को रोकना, गतिमान ( अपने स्थान से चलायमान ) और उभरे हुए मल - मूत्रादि वेगों को न रोकना, सभी अयथाबलमारम्भ साइसों का रोकना, चे संक्षेप में धातुओं को समता में रखने वाला स्वस्थवृत्त का उपदेश है || ८ || विमर्श - देश - विपरीत - कर्म जैसे मरु प्रदेश में शयन कर्म, आहार जैसे स्निग्ध, मधुर भोजन, काल - विपरीत - कर्म जैसे वसन्त ऋतु में व्यायाम, आहार - लघु, रूक्ष भोजन; आत्मगुण ( शरीर गुण ) विपरीत - कर्म स्थूल शरीर के लिए व्यायाम, जागरण आदि कर्म, आहार - रूक्ष, बाजरा, मक्का, जौ आदि का सेवन अर्थात् इनका उचित रूप में प्रयोग करना चाहिये । १. ‘ क्रमेणोपयोगः, सम्यक् सर्वाभियोगः, अनुदीर्णानां संचारणम् ' इति पा ० । ५० च ० सं ०

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८६८ चरकसंहिता धातवः पुनः शारीराः समानगुणैः समानगुणभूयिष्ठैर्वाऽप्याहार विकारैरभ्यस्यमानै-वृद्धिं प्राप्नुवन्ति, हासं तु विपरीतगुणैर्विपरीतगुणभूयिष्ठैर्वाऽप्याहारैरभ्यस्यमानैः ॥ ९ ॥

और --भी शारीरिक रसादि धातुएँ समान गुण वाले, या समान गुणभूयिष्ठ आहार विकारों के अभ्यास ( लगातार सेवन ) से वृद्धि को प्राप्त होते हैं । विपरीत गुण वाले, या विपरीत गुण भूयिष्ठ आहार - विकारों के अभ्यास से हास ( न्यूनता ) को प्राप्त होते हैं ॥ ९ ॥

विमर्श - यहाँ शारीरिक धातु का निर्देश कर देने से बुद्धि, मन आदि की वृद्धि वा हास समान गुण या विपरीत गुण वाले आहार - विकारों से नहीं होता है ऐसा सूचित किया गया है । यहाँ समान गुण आहार मांस, मांस का वर्द्धक और समानगुणभूयिष्ठ दूध रूप, द्रवता और मधुरता सामान्य से शुक्र का वर्द्धक है । विपरीत गुण जैसे रूक्ष वात का स्निग्ध घृत एवं तैल नाशक हैं, विपरीत गुणभूयिष्ठ- अम्ल पित्तको न्यून अम्ल एवं शीतगुण अधिक होने से नीबू पित्तशामक होता है । * तत्रेमे शरीरधातुगुणाः संख्या सामर्थ्यकराः; तद्यथा - गुरुलघुशीतोष्ण स्निग्धरूक्ष-मन्दतीचा स्थिर सरमृदुकठिनविशदपिच्छिल श्लक्ष्गखर सूक्ष्मस्थूल सान्द्रद्रवाः । तेषु ये गुरवस्ते गुरुभिराहारविकारगुणैरभ्यस्यमानैराप्याय्यन्ते लघवश्च हसन्ति; लघवस्तु लघुभिराप्याय्यन्ते, गुरवश्च हसन्ति । एवमेव सर्वधातुगुणानां सामान्ययोगाद् वृद्धिः, विपर्ययाद्ध ( सः । तस्मान्मांसमाप्याय्यते मांसेन भूयस्तरमन्येभ्यः शरीरधातुभ्यः, तथा लोहितं लोहितेन, मेदो मेदसा, वसा वसया, अस्थि तरुणास्ना, मज्जा मज्जा, शुक्रं शुक्रेण, गर्भस्त्वामगर्भेण ॥ १० ॥

शरीर धातुओं के गुण - उन गुणों में ये शारीरिक धातुओं के गुण ( औषधों के समान या असमान होने से वृद्धि या हास करने वाले होते हैं ) वे वृद्धि और हास का ज्ञान कराने में समर्थ होते हैं । जैसे - गुरु, लघु, शीत. उष्ण, स्निग्ध, रूक्ष, मन्द, तीक्ष्ण, स्थिर, सर, मृदु, कठिन, विशद, पिच्छिल, श्लक्ष्ण, खर, सूक्ष्म, स्थूल, सान्द्र, द्रव । इनमें जो शारीर धातु गुरु गुण वाले होते है गुरु आहार - विकारों के अभ्यास ( लगतार सेवन ) से बढ़ते है और लघु शारीर धातु हास को प्राप्त होते हैं । लघु शारीर धातु लघु आहार विकारों से बढ़ते हैं और गुरु शारीर धातु हास को प्राप्त होते हैं । इसी प्रकार सभी धातुओं के गुण समान गुण योग से बढ़ते हैं और विपरीत रूप में गुण - योग से हास को प्राप्त होते हैं । इसी लिए अन्य शारीर धातुओं की अपेक्षा अधिक से मांस सेवन से मांस धातु की वृद्धि होती है और रक्त सेवन से रक्त, मैदा सेवन से मेदा, वसा वसा, तरुणास्थि सेवन से अस्थि मज्जा से मज्जा, शुक्र से शुक्र, आम गर्भ ( अण्डा ) से गर्भ की पुष्टी एवं वृद्धि होती है ॥ १० ॥

२० गुर्गों का विमर्श - सूत्रस्थान में ४१ गुणों का वर्णन कर चुके हैं यहाँ केवल हास में शारीरिक कारण नहीं होते हैं । ही वर्णन है क्योंकि इन्द्रियगुण, आत्मगुण और परादिगुण वृद्धि एवं गया है । मांस का सेवन और अतः इस गुण वृद्धि हास प्रकरण में उनका उल्लेख नहीं किया यह है कि मांस सेवन से धातुओं की अपेक्षा मांस की वृद्धि अधिक करता है । इसका तात्पर्य रूप में वृद्धि होती है । यद्यपि अन्य धातुओं की भी वृद्धि होती है पर मांस की अपेक्षा न्यून होता है अतः यहाँ स्पर्श इन्द्रिय गुण में शीत स्पर्श वात और उष्ण स्पर्श पित्त को बढ़ाने वाला कहने से ही गतार्थ कर गुण का भी नामोल्लेख करना था, पर इस स्पर्श को शीत एवं उष्ण के दिया गया है । रस गुण भी शारीर धातुओं को बढ़ाता है, पर रस का एक स्वतन्त्र प्रकरण ही सूत्रस्थान में बताया गया है अतः यहाँ रस का भी नामोल्लेख नहीं किया गया है ।

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शरीरविचयशारीराध्याय: ६ ] शारीरस्थानम् τεε * यत्र त्वेवं लक्षणेन सामान्येन सामान्यवतामाहारविकाराणामसान्निध्यं स्यात्, सन्निहितानां वाऽप्ययुक्तत्वान्नोपयोगो घृणित्वादन्यरमावा कारणात् स च धातुरभि -वर्धयितव्यः स्यात् तस्य ये समानगुणाः स्युराहारविकारा असेव्याश्च तत्र समानगुण-भूयिष्ठानामन्य प्रकृतीनामप्याहार विकाराणामुपयोगः स्यात् । तद्यथा - शुक्रक्षये क्षीरस-र्पिषोरुपयोगो मधुरस्निग्धशीतसमाख्यातानां चापरेषां द्रव्याणां मूत्रक्षये पुनरिचुरसवा-रुणीमण्डद्रवमधुराम्ललवणोपक्लेदिनां पुरीषक्षये कुल्माषमाषकुधकुण्डाजमध्ययवशाकधा-न्याम्लानां, वातक्षये कटुकतिक्तकषाय रूक्षलघुशीतानां पित्तक्षयेऽम्ललवणकटुकक्षारोष्ण-तीक्ष्णानां श्लेष्मक्षये स्निग्धगुरुमधुर सान्द्रपिच्छिलानां द्रव्याणाम् । कर्मापि यद्यस्य धातो-वृद्धिकरं तत्तदासेव्यम् । एवमन्येषामपि शरीरधातूनां सामान्यविपर्ययाभ्यां वृद्धि यथाकालं कार्यों । इति सर्वधातूनामेकैकशोऽतिदेशतश्च वृद्धिहासकराणि व्याख्यातानि भवन्ति ॥ ११ ॥

शरीरधातु के वृद्धि - हास में कारण - जहाँ पर इस प्रकार के तुल्य जानिरूप सामान्य लक्षणों के द्वारा सामान्य आहार - विकारों का सान्निध्य ( प्राप्ति ) न हो, या प्राप्ति होने पर भी सात्म्य के अनुकूल न होने से उसका उपयोग न किया जाय, या अन्य किसी भी कारण से उस तुल्य जातिरूप सामान्य का प्रयोग न किया जा सके ( जैसे मांस वृद्धि के लिए मांस का प्रयोग ), पर वह धातु बढानी अवश्य हो और उस धातु के समान गुण वाले आहार - विकार सेवन करने योग्य प्राप्त नहीं हों । तब वहाँ पर उस बढ़ाने योग्य धातु के विजातीय होते हुए भी समान गुण भूयिष्ठ आहारविकारों का प्रयोग किया जाता है । जैसे - १. शुक्रक्षय में घृत और दुग्ध का प्रयोग कराना चाहिए, इसी प्रकार और अन्य द्रव्य जो मधुर एवं स्निग्ध हों उनका प्रयोग करना चाहिए | २. मूत्रक्षय में ईख का रस, वारुणीमण्ड, द्रव, मधुर, अम्ल और लवण रस एवं उपक्लेदी ( शरीर को गीला करने वाला ) द्रव्य का प्रयोग करना चाहिए । ३. पुरीषक्षय में कुल्माष उड़द, कुकुण्ड ( पललादिच्छत्रिका ), बकरे के मध्य शरीर का मांस, जौ, शाक, धान्याम्ल का प्रयोग करना चाहिए । ४. वातक्षय में कटु, तिक्त, कषाय रस वाले और रूक्ष, लघु, शीत गुण वाले द्रव्यों का प्रयोग । ५. पित्तक्षय में अम्ल, लवण, कटु रस वाले द्रव्य, क्षार पदार्थ और उष्ण एवं तीक्ष्ण गुण वाले द्रव्यों का प्रयोग । ६. कफक्षय में स्निग्ध, गुरु, मधुर रस वाले, सान्द्र और पिच्छिल गुण वाले द्रव्यों का प्रयोग करना चाहिए । कर्म भी - जिस - जिस धातु को जो - जो कर्म बढ़ाने वाले हों उस उस धातु के क्षीण होने पर उन उन कर्मों का सेवन किया जाना चाहिए । इसी प्रकार और अन्य शारीर धातुओं की समानता और विपरीतता के आधार पर आवश्यकता पड़ने पर बृद्धि और हास किया जाना चाहिए । इस प्रकार सभी धातुओं का एक - एक करके और अतिदेश द्वारा वृद्धिकर भावों की व्याख्या की गयी है ॥ ११ ॥

विमर्श - यहाँ समान और समान गुणों की अधिकता वाले ये दो प्रकार के वृद्धिजनक सामान्य माने हैं, दूसरे शब्दों में इन्हें क्रमशः अत्यन्त सामान्य और एकदेश सामान्य भी कहा जाता है । वस्तुतः उत्तम वृद्धि अत्यन्त सामान्य के द्वारा ही होती है, जैसे रक्त की वृद्धि रक्त से, मांस की वृद्धि मांस से, शुक्र की वृद्धि शुक्र से, इसीलिए रक्त की वृद्धि बकरे के रक्त से, मांस की वृद्धि बकरे के मांस से, शुक्र की वृद्धि नक्र के या बकरे के शुक्र से, करने की व्यवस्था शास्त्रकारों ने की है । पर इस प्रकार के सामान्य का प्रयोग न मिलने से, किसी व्यक्ति विशेष के लिए अयुक्त होने से, घृणा से, या अन्य कारणों से यदि इनका प्रयोग न कर सकें, और धातुक्षीण है, उसको बढ़ाना

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६०० चरकसंहिता परम आवश्यक है, ऐसी दशा में एक देश सामान्य का ही प्रयोग किया जाता है, जिसका उपर्युक्त गद्य में आचार्य ने किया है । पुरीषक्षय में ' कुष्कुण्ड, शब्द आया है, जिसका अर्थ चक्रपाणि और गंगाधर ने पललच्छत्रिका किया है । यह मांस का ही भाग ज्ञात होता है अतिदेश द्वारा वृद्धि कर भावों का वर्णन किया है इसका तात्पर्य यह है कि जिन धातुओं का वृद्धिहास बताया गया है उन धातुओं से अतिरिक्त धातुओं में भी इसी प्रकार सामान्य और विशेष से वृद्धि और हास जानना चाहिए | यथा - ' प्रकृतस्यानागतस्य साधनमतिदेशः ' ( सु. उ. अ. ६५ ) चरकोक्त पुरीषादि क्षय में जो समान गुण भूयिष्ठ प्रतिनिध द्रव्यों का वर्णन है उनका संग्रह निम्नांकित रूप में किया जा रहा है-विभिन्न क्षय में प्रयोगार्थ प्रतिनिधि द्रव्य ( समानगुण भूयिष्ठ ) 1 शुक्रक्षय मूत्रक्षय पुरीषक्षय वातक्षय पित्तक्षय श्लेष्मक्षय क्षीर इक्षुरस कुल्माष कटु अम्ल स्निग्ध सर्पि वारुणी मण्ड भाष तिक्त लवण गुरु मधुर द्रव्य द्रव कुष्कुण्ड कषाय कटु मधुर स्निग्ध द्रव्य मधुर अजमध्य रूक्ष क्षार सान्द्र द्रव्य I अम्ल यव लघु उष्ण लवण शाक शीत द्रव्य तीक्ष्ण द्रव्य उपक्लेदि द्रव्य धान्याम्ल ६ ६ ७ ७् कार्त्स्न्येन शरीरवृद्धिकरास्त्विं मे भावा भवन्ति तद्यथा- कालयोगः, स्वभावसंसिद्धिः, आहारसौष्ठवम्, अविघातश्चेति ॥ १२ ॥

शरीर वृद्धिकर भाव -- सम्पूर्ण रूप से शरीर को पुष्टि करने वाले ये भाव होते हैं । जैसे— १. कालयोग ( नित्यग काल वर्ष, मास, पक्ष, दिन, रात और आवस्थिक हेमन्तादि ऋतु काल, अवस्था, वाल युवा का समयोग होना ) । २. स्वभावसंसिद्धि - स्वभाव से वृद्धि होना यह अदृष्ट है और अचिन्तनीय होता है । ३. आहारसौष्ठव - अष्ट आहारविधि विशेषायतन, आहारविधि विधान एवं द्वादश अशन प्रविचार का समयोग होना । ४. अविघात - शरीर वृद्धि को नष्ट करने वाले भावों का न होना ॥ १२ ॥

* बलवृद्धिकरास्त्विमे भावा भवन्ति । तद्यथा - बलवत्पुरुषे देशे जन्म बलवत्पुरुषे काले च, सुखश्च कालयोगः, वीजक्षेत्रगुणसंपच्च, आहारसंपच्च, शरीरसंपञ्च, सात्म्यसंपच्च, सत्त्वसंपञ्च, स्वभावसंसिद्धिश्च, यौवनं च, कर्म च संहर्षश्चेति ॥ १३ ॥

वल - वृद्धिकर भाव – वल को बढ़ाने वाले ये भाव होते हैं, जैसे- १. बलवान् पुरुषों के देश जैसे सिन्ध, पञ्जाब में जन्म होना, २. बलवान् पुरुष के कुल में जन्म होना, ( जिस वंश में बलवान् पुरुष क्रमशः उत्पन्न होते आये हों उस कुल में जन्म लेना ), ३. बलवान् काल में जन्म होना, ( जिस काल में स्वभाव से बल बढ़ता है, जैसे विसर्ग काल उसमें जन्म होना ), ४. सुखकारक काल १. ' शरीरपुष्टिकरा स्त्विमे ' इति पा.

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शरीरविचयशारीराध्यायः ६ ] शारीरस्थानम् ६०१ योग, ५. वीज - ( शुक्र और आर्तब ), क्षेत्र ( गर्भाशय ) का अच्छे गुणों से युक्त होना अर्थात् रोगाकान्त न होना, ६. उत्तम आहारों का सेवन, ७. शरीर का संगठन प्रशस्त होना, ८. उत्तम आहार - विहारों को अभ्यास के द्वारा सात्म्य बनाये रखना, ९ मन का उत्तम गुणों से युक्त रहना, १०. स्त्रभावसंसिद्धि ( यह अदृष्ट कारणों से होता है अतः अविचारणीय होता है ११. युवावस्था १२. कर्म जैसे - व्यायाम आदि, १३. मन का सदा प्रसन्न रहना, अर्थात् शोकग्रस्त न होना || १३ || * आहारपरिणामकरास्त्विमे भावा भवन्ति । तद्यथा - ऊष्मा, वायुः, क्लेदः, स्नेहः, कालः, समयोगश्चेति ॥ १४ ॥

आहार - परिणामकर भाव - आहार को पका कर रसादि विभिन्न धातुओं में परिणत करने वाले ये भाव होते हैं, जैसे- १. ऊष्मा ( पाचक पित्त, पञ्चभूतानि एवं सप्त धात्वग्नियाँ— १३ अनियाँ ), २. वात, ३. क्लेद ( कफ ), ४. स्नेह, ( घृत आदि ), ५. काल - ( पाक का समय ) ६. समयोग ( आहार विधि विशेषायतन आदि का समयोग का होना ) ॥ १४ ॥

तत्र तु खल्वेपामूष्मादीनामाहार परिणामकराणां भावानामिमे कर्मविशेषा भवन्ति । तद्यथा - ऊष्मा पचति, वायुरपकर्षति, कुंदः शैथिल्यमापादयति, स्नेहो मार्दवं जनयति, कालः पर्याप्तिमभिनिर्वर्तयति, समयोगस्त्वेषां परिणामधातुसाम्यकरः संपद्यते ॥ १५ ॥

आहार परिणाम भाव के कर्म - आहार को परिणत करने वाले ऊष्मा आदि आहार परिणामकर भावों को ये भिन्न - भिन्न कर्म होते हैं, जैसे – ऊष्मा ( पित्त ) अन्न को पचाती है । वायु उसे नीचे की तरफ खींचती है, क्लेद ( कफ ) अन्न को शिथिल करता है अर्थात् गीला करता है स्नेह अन्न को मृदु करता है, काल उसे सुपक रूप में परिणत करता है । समयोग पचे हुए रसादि धातुओं को सम करता है ॥ १५ ॥

विमर्श - आहार द्वारा शरीर की क्षीण धातुओं की पूर्ति होती है । किन्तु आहार हम जिस रूप में लेते हैं वह उसी रूप में शरीर की क्षीण धातुओं की पूर्ति नहीं करता है, अपितु वह नानाविध शरीर घटकों के रूप में परिणत होकर उनकी पूर्ति और पुष्टि करता है । उन्हीं आहार के परिणत करने वाले भावों का यहाँ वर्णन किया गया है । ऊष्मा शब्द शरीर के सभी पाक या परिवर्तन करने वाले पाचक रसों तथा स्रावों के लिए प्रयुक्त हुआ है, जिसे आयुर्वेद में पित्त माना गाया है । वायु का कार्य शरीर के सभी चेष्टाओं का नियंत्रण करना है, अतः आहार एवं उसके विभिन्न परिवर्तनों को भिन्न - भिन्न स्थान में पहुँचाना, पाचक रसों का स्राव कराना आदि सभी कर्मों का वायु से होना ' अपकर्षण ' शब्द से संकेत किया गया है । क्लेद और स्नेह ये दोनों कफज स्राव हैं जो आहार को शिथिल एवं उचित रूप से पाचक रसों की क्रिया हो सके ऐसा मृदु बनाते हैं । इन सभी कर्मों के होने में समय लगता है अतः काल का निर्देश किया गया है । आहार का सममात्रा में लेना ही समधातुओं को उत्पन्न कर शरीर को स्वस्थ रखता है अतः समयोग का भी उल्लेख किया गया है, अन्यथा - ' अनात्मवन्तः पशुवद्भुञ्जते येऽप्रमाणतः । रोगानी-कस्य ते मूलमजीर्णे प्राप्नुवन्ति हि ॥ ' अजीर्ण होकर सम्पूर्ण रोगों का क्षेत्र शरीर बन जाता है । इसी तथ्य को शब्दान्तर से अन्यत्र कहा गया है यथा - अन्नमादानकर्मा तु प्राणः कोष्ठे प्रकर्षति । तद्द्रवैर्भिन्नसंघातं स्नेहेन मृदुतां गतम् ॥ समानेनावधूतोऽग्निरुदर्यपवनेन तु । काले पक्कं समं सम्यक पचत्यायुर्विवृद्धये ॥ ' ( च. चि. अ. १५ ) १. ' संयोगश्च ' इति पा ० । 1