श्रीगणेशाय नमः।
चरक - संहिता (द्वितीय खण्ड) — पृष्ठ 611–616
चरक - संहिता (द्वितीय खण्ड) · भार्गवपुस्तकालय, बनारस · पृष्ठ 611–616
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अ ०१५ ] चिकित्सितस्थानम् ६२७ ^^^ और स्नेहस्तिया देनी चाहियें । दोपवृद्धि के कारण अनि के मन्द होने पर वमन और विरेचन से शरीर का शोधन करके दोषानुसार चिकित्सा करनी चाहिये । उपवास के कारण अग्निमान्द्य हो तो यवागू के साथ घृत पीना चाहिये । व्याधि के कारण अग्निमान्द्य होने पर घृत स्वयं ही अग्निवर्धक होता है । अन्नावपीड़ित ( भोजन के मध्य में ) दिया हुआ घृत अग्नि दीपक और शरीर की पुष्टि करता है । निरन्तर अति मैथुन के कारण क्षीण हुए पुरुषो को मास खाने वाले प्रसह - वर्ग के पशु पक्षियों के मास रस को अनार आदि से खट्टा करके देना चाहिये । ये प्रसह वर्ग के पशु, पक्षी, लघु, तीक्ष्ण और उष्ण तथा शोधक होने से अग्नि को शीघ्र बढा देते है । इनका मास खाने से ही पुष्ट रहता है, इसलिये ये शीघ्र ही आदमी को पुष्ट कर देते हैं ॥ २०७ - २१२ ॥
यथा निरिन्धनो वह्निरल्पो वातीन्धनावृतः ।
स्नेहान्नपानैर्विविधै'चूर्णारिष्टसुरासवैः ॥ २१३ ॥
प्रयुक्तैर्भिषजा सम्यग्बलमग्नेः प्रवर्धते । जिस प्रकार विना ईधन के या थोड़े ईधन से अथवा ईधन के अधिक होने से अग्नि प्रदीप्त नही होती, उसी प्रकार भोजन न करने से या थोड़े भोजन से अथवा अधिक भोजन से भी जाठराग्नि प्रदीप्त नही होती । वैद्य के विधिपूर्वक स्नेहयुक्त अन्नविधि के चूर्ण, अरिष्ट, आसवो के सुरा के प्रयोग करने पर अग्नि
का बल बढ़ता है ॥। २१३ ॥
यथा हि सारदार्वग्निः स्थिरः सन्तिष्ठते चिरम् ॥ २१४ ॥
स्नेहान्नविधिभिस्तद्वदन्तरग्निर्भवेत्स्थिरः ।
हितं जीर्णे मित चाश्नंश्चिरमारोग्यमश्नुते ॥ २१५ ॥
सवैषम्येण धातूनामग्निवृद्धौ यतेत ना ।
समैर्दोषैः समो मध्ये देहस्यौष्माग्निसंस्थितः ॥ २१६ ॥
पचत्यन्नं तदारोग्यपुष्टयायुर्बलवृद्धये ।
दोषैर्मन्दोऽतिवृद्धो वा विषमैर्जनयेद् गदान् ॥ २१७ ॥
वाच्यं मन्दस्य तत्रोक्तम्-जिस प्रकार सारवान् कठोर ( अथवा सारयुक्त लकड़ी में ) अग्नि देर तक बनी रहती है, उसी प्रकार स्नेहयुक्त अन्नविधि के प्रयोग से भी जाठराग्नि स्थिर हो जाता है, देर तक रहता है । हितकारी प्रथम भोजन के जीर्ण होने पर परि-मित भोजन करने वाला व्यक्ति स्थायी आरोग्य को प्राप्त करता है । धातुओं को विपम रूप न करते हुए ( समान अवस्था मे रखते हुए ही ) अग्नि को बढाने १. ‘ स्नेहान्नविधिभिश्चित्रै इति वा ।
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६२८ चरकसंहिता [ अ ० १५ wwwww का प्रयत्न करना चाहिये । दोषो के समानावस्था मे होने से शरीर की उष्णिमा भी शरीर के मध्य मे ( जठर मे ) समानावस्था मे रहती है । यह समान अग्नि आरोग्य, पुष्टि, आयु, बल की वृद्धि के लिये अन्न का परिपाक करता है । वातादि दोषो के कारण अनि मन्द होने से या अति बढने से या विषम होने से ( कफ के कारण मन्द, पित्त के कारण प्रबल और वायु के विषम होने पर )
रोगा को उत्पन्न करता है । मन्दानि की चिकित्सा पूर्व कह दी है ॥२१४-२१७ ॥
भस्मचिकित्सामाह--अतिवृद्धस्य वक्ष्यते ।
नरे क्षीणक पित्तं कुपितं मारुतानुगम् ॥ २१८ ॥
स्वोष्णा पावकस्थाने बलमग्नेः प्रयच्छति ।
तथा लब्धलो देहे विरूक्षे सानिलोऽनलः ॥ २१६ ॥
परिभूय पचत्यन्नं तैक्ष्ण्यादाशु मुहुर्महुः । पक्वान्नं स ततो धातूञ्छोणितादीन्पचत्यपि
ततो दौर्बल्य मातङ्कान्मृत्युं चोपनयेन्नरम् ।
मुक्तेने लभते शान्ति जीर्णमात्रे प्रताम्यति ॥
अब अतिवृद्धाग्नि भस्मक रोग की चिकित्सा का उपदेश सम्प्राप्ति - जिस समय पुरुष मे कफ क्षीण हो जाता है, जाठराग्नि के स्थान मे कुपित हो जाता है, इस कुपित पित्त मिली रहती है । यह पित्त अपनी उष्णिमा से अग्नि का बल ॥ २२० ॥
२२१ ॥ करते है -उस समय पित्त के साथ वायु भी बढा देता है । इस प्रकार से बल प्राप्त करके यह अग्नि वायु की सहायता से रूक्ष शरीर मे तीक्ष्णता ( तेजी ) से अन्न का बार - बार पचा देती है । अन्न का परिपाक करके रक्त आदि धातुओ का भी निरन्तर पाक करता रहता है । इसलिये रोगी मे दुर्बलता आ जाती है, रोग से रोगी की मृत्यु हो जाती है । अन्न के खाने से रोगी को शान्ति मिलती है, और अन्न के जीर्ण होने पर कष्ट अनुभव होने लगता है । अग्नि की वृद्धि से प्यास, श्वास, दाह, मूर्च्छा आदि रोग हो जाते है ॥२२ ९ ॥
तृश्वासदाह मूर्च्छाद्या व्याधयोऽत्यग्निसम्भवाः ।
तमत्यग्नि गुरुस्निग्धशीतैर्मधुरविज्जलैः ॥ २२२ ॥
अन्नपानैर्नयेच्छान्ति दीप्तमग्निमिवाम्बुभिः ।
मुहुर्मुहुरजीर्णेऽपि भोज्यान्यस्योपहारयेत् ॥ २२३ ॥
निरिन्धनोऽन्तरं लब्ध्वा यथैनं न विपादयेत् ।
पायसं कृशरा स्निग्धं पैष्टिकं गुडवैकृतम् ॥ २२४ ॥
अद्यात्तथोदकानूपपिशितानि घृतानि च ।
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अ ० १५ ] चिकित्सितस्थानम् ६२६ A ( १ ) जिस प्रकार प्रज्वलित अग्नि को पानी से शान्त करते है, इसी प्रकार इस प्रदीप्त अग्नि को गुरु, मधुर, स्निग्ध, शीतल खान - पान से शान्त करना चाहिये । अजीर्ण होने पर भी रागी का बार - बार भोजन देना चाहिये, जिससे कि इनरहित देख कर अनि इसका नष्ट न करे । क्योंकि इधन न मिलने से अवसर पाकर अनि रोगी को नष्ट कर देता है । इसके लिये रोगी को पायस ( दूध - पाक, तस्मे, खीर ), कृशरा, पिट्टी से बने स्निग्न खाद्य पदार्थ, गुड़ से
बनी वस्तुए, औदक या आनूप पशुओ का मास तथा घृत देने चाहिये । २२२-२२४ ।
मत्स्यान्विशेपतः ऋक्ष्णान्स्थिरतोयचरास्तथा ॥ २२५ ॥
आविकं सघृत मासमद्यादत्यग्निनाशनम् ।
यवागूं समधूच्छिष्टा घृत वा क्षुधितः पिबेत् ॥ २२६ ॥
( २ ) स्थिर पानी मे विचरने वाली चिकनी मछलिया खाने के लिये देनी चाहिये । इस प्रकार की मछलिया अतिगुरु होता है । अग्नि की वृद्धि को कम करने के लिये भेड़ के मास को घृत के साथ देना चाहिये । अथवा भूख लगने पर यवागू को मोम या घृत के साथ पीना चाहिये ॥ २२५–२२६ ॥ गोधूमचूर्णमन्थं वा व्यधयित्वा शिरा पिवेत् । ( ३ ) शिरा का वेवन कराके पीछे से गेहूं के आटे
पिलाना चाहिये ।
यो वा शर्करा सर्पिर्जविनीयोषधः शृतम् ॥
( ४ ) जीवनीय ओषधियो मे पके दूध को शर्करा पिलाना चाहिये ॥ २२७ ॥
फलानां तैलयोनीनामुत्कुञ्चाश्च सशर्कराः । का मन्थ ( सत्तू ) २२७ ॥ और वृत के साथ ( ५ ) जिन फलो से तैल निकलता है उन फलो से तथा शक्कर से मिला कर बनाई हुई गुझिया अग्नि को कोमल कर देती है । [ तैल वाले फल माल-कगनी या अलसी, बादाम, पिस्ता आदि ] मार्दवं जनयन्त्यग्नेः स्निग्धा मासरसास्तथा ॥ २२८ ॥
( ६ ) इसी प्रकार से स्निग्ध मासरस भी अग्नि को घटा देता है ॥ २२८ ॥
पिवेच्छीताम्बुना सर्पिर्मधूच्छिष्टेन वा युतम् ।
( ७ ) मोम या शीतल जल के साथ मिला कर घृत को पिलाना चाहिये ।
गोधूमचूर्ण पयसा ससर्पिष्कं पिबेन्नरः ॥ २२६ ॥
( ८ ) गेहूँ के चूर्ण को घी के साथ भून कर दूध में मिला कर पिलाना चाहिये ॥ २२६ ॥
आनूपरससिद्धान्वा त्रीन्स्नेहास्तैलवर्जितान् ॥ २३० ॥
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६३० चरकसंहिता [ अ ० १५ ( १ ) घी, वसा ( चर्बी ) और मेद इन तीन स्नेहो को आनूप मासरस के साथ सिद्ध करके पिलाना चाहिये ॥ २३० ॥
पयसा समिता चापि घना त्रिस्नेहसंयुताम् । ( १० ) दूध के साथ समिता ( मैदा, गेहूं का बारीक आटा ) को घी,
वसा और मेद से मिला कर घट्ट ( घना ) करके खाना चाहिये ।
नारीस्तन्येन सयुक्ता पिबेदौदुम्बरी त्वचम् ॥ २३१ ॥
( ११ ) गूलर की छाल को स्त्री के दूध में मिलाकर पिलाना चाहिये ॥ २३१ ॥
आभ्या वा पायसं सिद्धमद्यादत्यग्निशान्तये । ( १२ ) अथवा गूलर के दूध और औरत के दूध से खीर पका कर खिलानी चाहिये इससे अग्नि की वृद्धि शान्त होती है ।
श्यामात्रवृद्विपकं वा पयो दद्याद्विरेचनम् ।
असकृत्पत्तशान्त्यर्थ पायसप्रतिभोजनम् ॥ २३२ ॥
प्रसमीक्ष्य भिषक प्राज्ञस्तस्मै दद्याद्विधानवित् । ( १३ ) श्यामा ( निशोथ ) और त्रिवृत् के साथ दूध पका कर विरेचन के हिये देना चाहिये । पित्त की शान्ति के लिये बार - बार दूध देना चाहिये । चिकित्सा विधि को समझने वाले बुद्धिमान् वैद्य को चाहिये कि अवस्थानुसार भोजन करावे ॥ २३२- ॥ यत्किचिन्मधुरं सर्व मेध्यं श्लेष्मलं गुरुभोजनम् ॥ २३३ ॥
तदत्यग्निहितं सर्व भुक्त्वा प्रस्वपनं दिवा । ( १४ ) सामान्य रूप मे -- जो कुछ मधुर, जो कुछ मेध्य ( मेदुर मेद- बहुल ), कफ बहुल और गुरु होता है, वह सब भोजन अनि वृद्धि को शान्त करने के लिये हितकारी है, इसी प्रकार से भोजन करके दिन मे सोना भी लाभदायक है ॥२३३ ॥
मेध्यान्यन्नानि योऽत्यनावप्रशान्तः समश्रुते ॥ २३४ ॥
न तन्निमित्तं व्यसनं लभते पुष्टिमेव च ।
कफे वृद्धे जिते पित्ते मारुते चानलः समः ॥ २३५ ॥
समधातोः पचत्यन्नं पुष्टयायुर्बलवृद्धये । जो मनुष्य अग्नि के बढने पर विना उपेक्षा किये मेद- बहुल भोजनों को खाता रहता है, उसको इससे उत्पन्न विकार नही होते, अपि तु शरीर मे पुष्टि आती है । कफ के बढ़ने से, वायु और पित्त के शान्त होने पर अनि समान हो आता है । धातुओं के समान होने पर अग्नि भी आयु, पुष्टि, बल की वृद्धि के लिये अन्न को पचाता है ॥ २३४-२३५ ॥ भवन्ति चात्र — पथ्यापथ्यमिहैकत्र मुक्तं समशनं मतम् ॥ २३६ ॥
विषमं बहु वाऽल्पं वाऽप्यप्राप्तातीतकालयोः ।
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अ ० १५ ] चिकित्सितस्थानम् ६३१ भुक्तं पूर्वान्नशेषे तु पुनरध्यशनं मतम् ॥ २३७ ॥
येतानि मृत्युं वा घोरान्व्याधीन्सृजन्ति वा । पथ्य ( हितकारी ) और अपथ्य ( अहितकारी ) को मिला कर एक साथ खाने को ' मशन ' कहते हैं । मात्रा से बहुत या थोड़ा भोजन करने अथवा भोजन के समय से पूर्व अथवा पीछे भोजन करने को ' विषमाशन ' कहते हैं । प्रथम खाये हुए अन्न शेष के जीर्ण होने से बचे रहने पर पुन • भोजन करने को ' अव्यशन ' कहते है । समान, विषमाशन और अध्यशन ये तीनों ही मृत्यु अथवा भयानक रोगों को उत्पन्न करते है ॥ २३६-२३७– ॥ प्रातराशे वजीर्णेऽपि सायमाशो न दुष्यति ॥ २३८ ॥
दिवा प्रबुध्यतेऽर्केण हृदयं पुण्डरीकवत् ।
तस्मिन्विबुद्धे स्रोतांसि स्फुटत्वं यान्ति सर्वशः ॥ २३६ ॥
व्यायामाच्च विचाराच्च विक्षितत्वाच्च चेतसः ।
न क्लेमपगच्छन्ति दिवा तेनास्य धातवः ॥ २४०
अक्लिन्नेष्वन्नमासिक्तमन्यत्तेषु न दुष्यति ।
अविदग्ध इव क्षीरे क्षीरमन्यद्विमिश्रितम् ॥ २४१
नैव दूष्यति तेनैव समं सपद्यते यथा ।
रात्रौ तु हृदये म्लाने संवृतेष्वयनेषु च ॥ २४२ ॥
यान्ति कोष्ठे च विक्लेदं संवृते देहधातवः ।
क्लिन्नेष्वन्यदपक्केषु तेष्वासितं प्रदुष्यति ॥ २४३
विदग्धेषु पयःस्त्वन्यत्पयस्तप्तेष्विवार्पितम् ।
नैशेवाहारजातेषु नाविपक्केषु बुद्धिमान् ॥
तस्मादन्यत्समश्नीयात्पालयिष्यन्बलायुषी ॥ २४४
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प्रातः काल का किया हुआ भोजन यदि जीर्ण न हो तो भी यदि सायकाल का भोजन कर लिया जाये तो वह दोष उत्पन्न नही करता । क्योंकि दिनमे हृदय कमल के समन सूर्य के द्वारा विकसित रहता है । ( हृदय अधिक क्रियाशील है, मस्तिष्क कार्य करता रहता है ) इस हृदय ( वात - सस्थान ) के जागृत रहने पर सब स्रोत खुले रहते है । मनुष्य के व्यायाम करने, चलने - फिरने से, विचार ( चिन्तन ) से, चित्त के विक्षेप से, दिन मे शरीर के धातु शुष्क हो जाते हैं । इन अक्लिन्न धातुओं मे प्रक्षिप्त अन्य अन्न ऐसे ही दूषित नहीं होता जैसे विना विदग्ध हुए ( फटे ) दूध मे नया दूध मिलाने से कोई भेद नही आता । रात्रि मे हृदय की गति के कम होने से ( वात- संस्थान मस्तिष्क के सो जाने से ) और स्रोतों के बन्द हो जाने पर, कोष्ठ मे पाचन - क्रिया के रुक जाने से शरीर
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६३२ चरकसंहिता [ अ ० १५ के धातु क्लिन्न ( आर्द्र ) हो जाते है । इन अपक्क और क्लिन्न स्रोतो मे जो अन्य आहार आता है, वह भी दूषित हो जाता है । जिस प्रकार गरम दूध यदि विदग्ध ( विकृत ) हो जाये तो उसमे अन्य जो भी दूध मिलाया जाय वह भी दूषित हो जाता है । इसलिये बुद्धिमान् मनुष्य को चाहिये कि बल और आयुष्य की रक्षा करते हुए रात्रि के भोजन के परिपाक न होने पर अन्य भोजन न करे । रात्रि का भोजन जीर्ण होने पर ही भोजन करना चाहिये ॥ २३८ २४४ ॥ तत्र श्लोकाः – अन्तरग्निगुणा देहं यथा धारयते च_सः यथाऽन्नं पच्यते याश्च यथाऽऽहारः करोत्यपि ॥ २४५ ॥
येऽग्नयो यांश्च पुष्यन्ति यावन्तो ये पचन्ति यान् ।
रसादीनां क्रमोत्पत्तिमलानां तेभ्य एव च ॥ २४६ ॥
वृष्याणामाशुकृद्धेतुर्धातुकालोद्भवक्रमः ।
रोगैकदेशकृद्धेतुरन्तरग्निर्यथाऽधिकः ॥ २४७ ॥
सन्दुष्यति यथा दुष्टो या रोगाञ्जनयत्यपि ।
ग्रहणी या समासाच्च ग्रहणीदोषलक्षणम् ॥ २४८ ॥
पूर्वरूपं पृथक् चैव व्यञ्जनं सचिकित्सितम् ।
चतुर्विधस्य निर्दिष्टा तथा चावस्थिकी क्रिया ॥ २४६ ॥
जायते च यथाऽत्यग्निर्यच्च तस्य चिकित्सितम् ।
उक्तवानिह तत्सर्व ग्रहणीदोष के मुनिः ॥ २५० ॥
उपसंहार - भीतरी अग्नि के गुण शरीर को किस प्रकार धारण करते हैं, अन्न का परिपाक किस प्रकार होता है, किस प्रकार आहार किन २ गुणों को करता है, कितने अग्नि हैं, ये किनका पोषण करते हैं, किन को ये पचाते है, रसादि धातुओं की क्रमश उत्पत्ति, इन धातुओं से मलादि की उत्पत्ति, " तृष्णा-ओ का कारण, धातुओ की उत्पत्ति का काल, उनका क्रम, एक देश मे रोगो-त्यत्तिका कारण, अधिक अन्तराग्नि का कारण, दूषित अग्नि से उत्पन्न रोग, ग्रहणी और ग्रहणी दोष के लक्षण, उनके पूर्वरूप, पृथक् २ लक्षण, चिकित्सा अव-स्थानुसारी चिकित्सा, अत्यग्नि की उत्पत्ति और चिकित्सा इस ग्रहणी रोग चिकित्सित अध्याय मे इन सब विषयों का मुनि आत्रेय ने उपदेश कर दिया है ॥ २४५-२५० ॥ इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसस्कृते चिकित्सितस्थाने ग्रहणी रोगचिकित्सित नाम पञ्चदशोऽध्याय ॥ १५ ॥
मुद्रक - प ० बैकुण्ठनाथ भार्गव, आनन्द सागर प्रेस, गायघाट, बनारस ।