श्रीगणेशाय नमः।
शास्त्रों के जीवन-सूत्र
मर्म
जो पद्य अपने आप में एक शिक्षा है — कथा का प्रसङ्ग जाने बिना भी जिसका उपदेश समझ में आ जाय। हर पद्य के नीचे वही हिन्दी अर्थ है जो ग्रन्थ स्वयं छापता है, और वह पृष्ठ जहाँ से वह लिया गया।
Verses from the Rāmcharitmānas, the Mahābhārata, the Purāṇas and the Smṛtis that teach on their own — each with the Hindi rendering the book itself prints, and a link to the scanned page it stands on. Nothing here is paraphrased or generated.
- पद्य
- 2763
- विषय
- 16
- ग्रन्थ
- 14
कुछ मर्मवचन
सौति उवाच
धर्मे मतिर्भवतु वः सततोत्थितानां ।
स ह्येक एव परलोकगतस्य बन्धुः ॥
अर्थाः स्त्रियश्च निपुणैरपि सेव्यमाना ।
नैवाप्तभावमुपयान्ति न च स्थिरत्वम् ॥
तपस्वी महर्षियो! (तथा महाभारतके पाठको!) आप सब लोग सदा सांसारिक आसक्तियोंसे ऊँचे उठें और आपका मन सदा धर्ममें लगा रहे; क्योंकि परलोकमें गये हुए जीवका बन्धु या सहायक एकमात्र धर्म ही है । चतुर मनुष्य भी धन और स्त्रियोंका सेवन तो करते हैं, किंतु वे उनकी श्रेष्ठतापर विश्वास नहीं करते और न उन्हें स्थिर ही मानते हैं ।
सौतिजी ने अनुक्रमणिका के अन्त में ऋषियों से कहा।
वैशम्पायन उवाच
येषां त्रीण्यवदातानि विद्या योनिश्च कर्म च ।
ते सेव्यास्तैः समास्या हि शास्त्रेभ्योऽपि गरीयसी ॥
निरारम्भा ह्यपि वयं पुण्यशीलेषु साधुषु ।
पुण्यमेवाप्नुयामेह पापं पापोपसेवनात् ॥
जिन पुरुषोंके विद्या, जाति और कर्म — ये तीनों उज्ज्वल हों, उनका सेवन करना चाहिये; क्योंकि उन महापुरुषोंके साथ बैठना शास्त्रोंके स्वाध्यायसे भी बढ़कर है । हमलोग अग्निहोत्र आदि शुभ कर्मोंका अनुष्ठान नहीं करते, तो भी पुण्यात्मा साधुपुरुषोंके समुदायमें रहनेसे हमें पुण्यकी ही प्राप्ति होगी । इसी प्रकार पापीजनोंके सेवनसे हम पापके ही भागी होंगे ।
श्रीकृष्ण उवाच
शक्तैर्विजेतुं तरसा महीं च ।
सत्ये स्थितैः सत्यरथैर्यथावत् ।
पाण्डोः सुतैस्तद् व्रतमुग्ररूपं ।
वर्षाणि षट् सप्त च चीर्णमग्र्यैः ॥
पाण्डव सदा सत्यपर आरूढ़ रहते हैं । सत्य ही इनका रथ (आश्रय) है । इनमें वेगपूर्वक समस्त भूमण्डल-को जीत लेनेकी शक्ति है तथापि इन वीराग्रगण्य पाण्डु-कुमारोंने सत्यका खयाल करके तेरह वर्षोंतक वनवास और अज्ञातवासके उस कठोर व्रतका धैर्यपूर्वक पालन किया है, जिसका स्वरूप बड़ा ही उग्र है ।
श्रीकृष्ण ने उपस्थित सुहृद्गणों को सम्बोधित करते हुए पाण्डवों के सत्यनिष्ठ चरित्र और उनके कठिन वनवास व अज्ञातवास का वर्णन किया।
अर्जुन → ब्रह्मन
गुरुर्भवान् न मे शत्रुः शिष्यः पुत्रसमोऽस्मि ते ।
न चास्ति स पुमाँल्लोके यस्त्वां युधि पराजयेत् ॥
अर्जुन बोले — ब्रह्मन्! आप मेरे गुरु हैं । शत्रु नहीं हैं । मैं आपका पुत्रके समान प्रिय शिष्य हूँ। इस जगत्में ऐसा कोई पुरुष नहीं है, जो युद्धमें आपको पराजित कर सके ।
अर्जुन ने द्रोणाचार्य से कहा।
युधिष्ठिर उवाच
संयुक्ताः काममन्युभ्यां क्रोधहर्षासमञ्जसाः ।
न ते जयफलं किंचिद् भोक्तारो जातु कर्हिचित् ॥
जो लोग कामना और खीझसे युक्त हो क्रोध और हर्षके कारण अपना संतुलन खो बैठते हैं, वे कभी कहीं किंचिन्मात्र भी विजयका फल नहीं भोग सकते ।
भीष्म उवाच
अनुक्रोशो हि साधूनां महद्धर्मस्य लक्षणम् ।
अनुक्रोशश्च साधूनां सदा प्रीतिं प्रयच्छति ॥
श्रेष्ठ पुरुषोंके लिये दूसरोंपर दया करना ही महान् धर्मका सूचक है । दयाभाव श्रेष्ठ पुरुषोंको सदा ही आनन्द प्रदान करता है ।
यह संग्रह कैसे बना
पद्य का पाठ और उसका हिन्दी अर्थ — दोनों गीताप्रेस के मुद्रित पृष्ठ से ज्यों-का-त्यों लिये गये हैं। कोई श्लोक, चौपाई या दोहा यहाँ रचा नहीं गया है। चुनाव में सहायता ली गयी है, किन्तु चुनने का अर्थ केवल यह है कि किस पद्य को सम्मिलित किया जाय; पाठ सदा ग्रन्थ से ही आता है।
Both the verse and its Hindi rendering are copied verbatim from the printed Gita Press page. No verse here was composed, completed or translated by a machine — selection is assisted, text never is. Every entry links back to the scan it came from.