चरक संहिता अत्रिदेव गुप्त — पृष्ठ 101–110
चरक संहिता अत्रिदेव गुप्त · पृष्ठ 101–110
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अ०५] सूत्रस्थानम ८३ रत्न आभूषण आदि धारण करने से लाभ- धन्यं मङ्गलमायुष्यं श्रीमद्वयसन-सूदनम् ॥ ६५ ॥
हर्षणं कायमोजस्य रत्नाऽऽभरण- धारणम् । रन हीरे आदि, आभरण इनसे या स्वर्ण आदि से बने आभूषण धारण करना धन्य अर्थात् भाग्यवान्, धनी होने का चिह्न है । इनका धारण करना मङ्गलकारी, दीर्घायु देने वाला एवं शोभा बढ़ाता है । इनके धारण करने से सत्र व्यसन, सर्प कीटादि की विपत्ति न हो जाती है । आभूषण इत्यादि को धारण करने से मन प्रसन्न होता है, सुन्दरता आतीहै और ओज, तेज, कांति बढ़ती है ॥ ६५ ॥
दीघायु के लिये आवश्यक शुचि कर्म- मेध्यं पवित्रमायुष्यमलक्ष्मीक-विनाशनम् ॥ ६६ ॥
पादयोर्मलमार्गाणां शौचाधानमभीक्ष्णशः । बार- बार मल त्याग आदि के पीछे शुद्धि करने से अर्थात् पवित्र रहने से मेधा बुद्धि बढ़ती है, पवित्रता, दीर्घायु मिलती है और दरिद्रता एवं कलि ( पाप या दुःख ) का नाश होता है । इसलिए पांव और मल मार्ग गुद और उपस्थ, और शिर के सात छिद्र -दो नाक, दो कान, दो आंख ओर एक मुख इन सातों छेदोंको बारम्बार साफ करना चाहिये ॥ ६६ ॥
पौष्टिकं वृष्यमायुष्यं शुचि रूप-विराजनम् ॥ ६७ ॥
केश-श्मश्रु-नखादीनां कल्पनं संप्रसाधनम् । केश ( शिर के वाल ), श्मश्रु ( दाढ़ी मूंछ ) और नख आदि का काटना और इनका प्रसाद, शृंगार करने से पुष्टि, पुरुषत्व, दीर्घायु मिलती है एवं रूप भी सुन्दर, पवित्र बन जाता है ॥ ६७ ॥
जूता पहनने का गुण - चक्षुष्यं स्पर्शनहितं पादयोर्व्यसनापहम् ॥ ६८ ॥
बल्यं पराक्रमसुखं वृष्यं पादत्रधारणम् । जूता पहनना आँखों के लिये हितकारी, त्वचा के लिये लाभकारी, एवं कीड़े आदि से बचाता है और बल पराक्रम, सुख और पुरुषत्व को देता है ॥६८॥
छत्र धारण का गुण - ईतेः प्रशमनं बल्यं गुप्त्यावरणसंकरम् ॥ ६६ ॥
घर्मानिलरजोऽम्बुघ्नं छत्रधारणमुच्यते । छत्र धारण करना भावी दुःख को शान्त करने वाला, बलकारक, बुरे
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८४ चरकसंहिता [अ० ५ 2 प्रभावों से भली प्रकार रक्षा करता है । छाता धारण करने से धूप, वायु, धूल
बरसात से बचता है । ॥ ६६ ॥
दण्ड धारण के गुण- स्खलतः संप्रतिष्ठानं शत्रूणां च निषूदनम् ॥ १०० ॥
अवष्टम्भनमायुष्यं भयघ्नं दण्डधारणम् । दण्ड'गिरते हुएको भली प्रकार से रोकता है, शत्रुओं का नाश करता है, बल में सहायता देता है, दीर्घायुष्य कारक और सांप आदि के भय को मिटाता है ॥ १०० ॥
संक्षेप से स्वस्थवृत्त- नगरी नगरस्येव रथस्येव रथी सदा ॥ १०१ ॥
स्वशरीरस्य मेधावी कृत्येष्ववहितो भवेत् । जिस प्रकार नगराधिपति राजा नगर की और रथी अपने रथ की रक्षा करता है उसी प्रकार मेधावी ( बुद्धिमान् मनुष्य ) अपने शरीर के कर्त्तव्यों में सावधान रहे || १०१ ॥
भवति चात्र - वृत्त्युपायान्निषेवेत ये स्युर्धर्माविरोधिनः ।
शममध्ययनं चैव सुखमेव समश्नुते ॥ १०२ ॥
जो धर्म के अविरोधी कार्य हों उन उपायों का ( जीविका के साधनों का ) पालन करना चाहिये । शम (शान्त वृत्ति) और अध्ययन ( वेदादि सद्ग्रन्थों का पठन ), करने से मनुष्य को सुख मिलता है ॥ १०२ ॥
तत्र श्लोकाः -मात्रा द्रव्याणि मात्रां च संश्रित्य गुरुलाघवम् ।
द्रव्याणां गर्हितोऽभ्यासां येषां येषां च शस्यते ॥ १०३ ॥
इस अध्याय में मात्रा को लक्ष्य करके द्रव्य, मात्रा, गुरु लघु का ज्ञान, निन्दित द्रव्य पदार्थ, और जिन जिन पदार्थों का अभ्यास करना चाहिये वे कह दिये हैं ॥ १०२ ॥
अञ्जनं धूम -वर्तिश्च त्रिविधा वर्ति-कल्पना ।
धूमपान- गुणाः कालाः पानमानं च यस्य यत् ॥ १०४ ॥
व्यापत्ति- चिह्नं भैषज्यं धूमो येषां विगर्हितः ।
पेयो यथा यन्मयं च नेत्रं यस्य च यद्विधम् ॥ १०५ ॥
-कर्म -गुणा नस्तः कार्यं यश्च यथा यदा ।
भक्षयेद्दन्त- पवनं यथा यद्यद्गुणं च यत् ॥ १०६ ॥
यदर्थ यानि चाss स्येन धार्याणि कवलप्रहे ।
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अ० ६ ] सूत्रस्थानम् Y तैलस्य ये गुणा दृष्टाः शिरस्तैलगुणाश्च ये ॥ १०७ ॥
कर्णतैले तथाऽभ्यङ्गे पादाभ्यङ्गे च मार्जने ।
स्नाने वाससि शुद्धे च सौगन्ध्ये रत्नधारणे ॥ १०८ ॥
शौचे संहरणे लोम्नां पादत्र-च्छत्र धारणे ।
गुणा मात्राशितीयेऽस्मिन् तथोक्ता दण्डधारणे ॥ १०६ ॥
अञ्जन, धूम वर्शि के तीन प्रकार, प्रायोगिक, वैरेचिक और स्नैहिक धूम की कल्पना, धूमपान के गुण, धूमपान के समय, धूमपान का परिणाम, धूप पान से होनेवाली हानियाँ और इन हानियों की 'भैषज्य' ( औषध ), जिन पुरुषों के लिये धूम निन्दित है, वह जिस प्रकार से पीना चाहिये, नलिका जिस वस्तु और जिस प्रकार की बनी होनी चाहिये वह भी कह दिया है । नस्य कर्म्म के लाभ, उसके बनाने की विधि, नस्य लेने का समय एवं विधि, दन्त धावन के गुण, मुख में धारण करने योग्य वस्तुएँ, तेल-गण्डूष के गुण, शिर पर तेल लगाने के लाभ, कान में तेल डालने के गुण, पाँव में और शरीर में तेल लगाने के लाभ, उबटन, स्नान करने के लाभ, शुद्ध वस्त्र माला आदि सुगन्धि द्रव्य, रत्न धारण करने के गुण, शुचि कर्म के, बालों को काटने, जूता छाता और दण्ड को धारण करने के गुण, लाभ यह सब इस 'मात्राशितीय'
अध्याय में कह दिये हैं । १०४-१०६ ॥
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते सूत्रस्थाने स्वस्थवृथे मात्राशितीयां नाम पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥
षष्ठोऽध्यायः ।
अथातस्तस्याशितीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्माSSह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
इसके आगे 'तस्याशितीय' नामक अध्याय की व्याख्या करते हैं, ऐसा भगवान् आत्रेय ने कहा है ॥ १-२ ॥
तस्याशिताद्यादाहाराद् बलं वर्णश्च वर्धते ।
तस्यर्तुसाम्यं विदितं चेष्टाऽऽहारव्यपाश्रयम् ॥ ३ ॥
परिमित मात्रा में भोजन करने वाले पुरुष के मात्रा में खाने -पीने से बल, वर्ण, कान्ति, सुख और आयुष्य बढ़ता है । मात्राशी पुरुष का सात्म्य ऋतु के गुण के विपरीत चेष्टा, व्यायाम, अभ्यङ्ग आदि, आहार खाना-पीना, चाटना के आभय पर ही ऋतुओं का सात्म्य भी जाना जाता है ॥ ३ ॥
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८६ चरकसंहिता [ अ० ६ इह खलु संवत्सरं षडङ्गमृतुविभागेन विद्यात् । तत्राऽऽदित्यस्यो- दगयनमादानं च त्रीनृतून शिशिरादीन् ग्रीष्मान्तान् व्यवस्येत्, वर्षादीन् पुनर्हेमन्तान्तान् दक्षिणायनं विसर्गं च ॥ ४ ॥
इस संसार में संवत्सर ( वर्ष ) रूपी काल को छः ऋतुओं के विभाग से जानना चाहिये । जब भगवान् सूर्य उत्तरायण होते हैं, तब ' आदान' ( ग्रहण ) काल होता है । इससे शिशिर, वसन्त और ग्रीष्म तीन ऋतुएँ बनती हैं और जब सूर्य दक्षिणायन हो तब 'विसर्ग' काल होता है । इससे वर्षा, शरद् और हेमन्त ये तीन ऋतुएँ बनती हैं ॥ ४ ॥
विसर्गे च पुनर्वायवो नातिक्षाः प्रवान्तीतरे पुनरादाने, सोम- श्राव्याहत वलः शिशिराभिर्भाभिरापूरयज्ञ्जगदाप्याययति शश्वत् अतो विसर्गः सौम्यः | आदानं पुनराग्नेयं तावैतावर्कवायू सामश्च काल- स्वभाव-मार्ग- परिगृहांताः । कालं-रसदीप-- देह-बल-निवृत्ति-प्रत्यय-भूताः समुपदिश्यन्ते । ५ ॥ ' विसर्ग' काल में वायु बहुत अधिक रूखो नहीं बहनी और आदान काल में वायु बहुत रूक्ष खुश्क बहता है । क्योंकि विसर्गकाल में चन्द्रमा का बल परिपूर्ण होता है । इसलिये चन्द्रमा शीतल किरणों से जगत् का पोषण करताहै, जगत्'आदानको 'नित्यकाल आग्नेयकरता( अग्निहै । इसलियेतत्व प्रधानविसर्गकाल) हैसाम्य। इसलियेहै । सूर्य, वायु और चन्द्रमा के समय स्वाभाविक मार्ग से चलते हुए काल, ऋतु, रस, दोष, और शारीरिक बल के बनाने में कारण होते हैं ॥ ५ ॥
तत्र रविर्भाभिराददानो जगतः स्नेहं वायवस्तायाश्चोपशोष-रसान्यन्तः शिशिरवसन्ततिक्तकषाय -कटुकांश्चाभिवर्धयन्तो-ग्रीष्मेष्वृतुषु यथाक्रमंनृणांरौक्ष्यमुत्पादयन्तोल्यमावहन्तिरूझान्|| ६|| आदान काल में सूर्य अपनी किरणों से संसार कीस्निग्धता को ले लेता है, इसलिये वायु तीव्र, तीक्ष्ण, रूखी, मुखाती हुई बहती है । इससे शिशिर, वसन्त और ग्रीष्म में क्रमशः ( शिशिर से अधिक वसन्त में, और वसन्त से अधिक ग्रीष्म में ) रूक्षता उत्पन्न हो जाती है । इस रूक्षता के उत्पन्न होने से रूक्ष रस, यथा-— तिक्त ( तीखा ), कपाय ( कसैला ) और कटु ( कडुवा ) रस बढ़ जाते हैं । इन रसों की वृद्धि से मनुष्यों के शरीर में निर्बलता आ जाती है ॥ ६॥
वर्षा-शरद्धेमन्तेष्वृतुषु तु दक्षिणाभिमुखेऽर्के काल-मार्गमेघ -बात-वर्षाभिहत प्रतापे, शोशिनि चाव्याहतबले, माहेन्द्र-सलिल प्रशान्त
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अ० ६ ] सूत्रस्थानम् ८9 सन्तापे जगति, अरूझा रसाः प्रवर्धन्तेऽम्ल लवण मधुराः, यथाक्रमं तत्र बलमुपचीयते नृणामिति ॥ ७ ॥
वर्षा शरद् ओर हेमन्त ऋतु में जब सूर्य दक्षिणायन हो जाता है. काल के स्वाभाविक मार्ग के कारण, बादल, वायु, वर्षा के कारण सूर्य का तेज घट जाने से और सोम का वल कम न होने से, वर्षाा जल के कारण गरमी के शान्त हो जाने से संसार में अक्ष,स्निग्ध इस बढ़ते हैं । इससे अम्ल लवण और मधुर क्रमशः वपा, शरदजार प्रेमन्त में बढ़ते है । इन रसों के बढ़ने से मनुष्यां का बल भी बढ़ जाता है ॥ ७ ॥
भवन्ति चात्र -आदावन्ते च दवित्यं विसर्गादानयोर्नृणाम् ।
मध्ये मध्यवन्ते श्रेटमग्र च निदिशत् ॥ ८ ॥
शीते शीतानिलस्पर्श संरुद्धा बलिनां बली । वर्ग और आदान काल के आदि आर अन्त में पुरुषों के शरीर में दुर्ब-लता आती है । यथा विसर्ग के आदे काल वर्षा में और आदान के अन्त समय ग्रीष्म ऋतु में मनुष्यों में निर्वाता रहता है । दोनों कालों के मध्य में ( अर्थात् शरद्और बसन्त मध्यम बहताहै । विसर्ग के अन्त समय ( हेमन्त में ) और आदान काल के पहिले ( शिशिर में ) काल में मनुष्यों का मल श्रेष्ठ अर्थात् बढ़ा रहता है ॥ ८ ॥
पक्ता भवति हेमन्ते नत्रा द्रव्या-गुरु नः ॥ ६!;
स यदा नेन्धनं युक्तं लभते देहजं तदा ।
बहिनस्त्यतो वायुः शीतः शांते प्रकुप्यति ॥ १० ॥
तस्मात्तपार- समयेस्निग्वाम्ल-लवणान् रसान् ।
औदकानूप-मांसानां मेध्यानामुपयोजयेत् ॥ ११ ॥
बिलेशयानां मांसानि प्रसानां भृतानि च ।
मदिरां सीधुं मधु चानुपिवेन्नरः ॥ १२ ॥
गोरसानिध्रुविकृती सांतेलं नवोदनम् ।
हेमन्तेऽभ्यस्यतस्तोयमुष्णं चाऽऽयुनं हीयते ॥। १३ ॥
अभ्यङ्गोत्सादनं मूर्ध्नि तैलं जेन्ताकमातपम् ।
भजेद् भूमिगृहं चोष्णमुष्णं गर्भगृहं तथा ॥ १४ ॥
शीतेषु संवृतं सेव्यं यानं शयनमासनम् । हेमन्त काल की परिचय- हेमन्त रूपी शीत काल में ठण्डी वायु के से जठराग्नि, शरीर से बाहर न निकल कर अन्दर ही रुक कर ( जिस
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CC चरकसंहिता [अ० ६ प्रकार कि कुम्हार बर्त्तन पकाते समय या ईंटों के भट्टे में आग को अन्दर ही बन्द कर देते हैं, और वहाँ पर अग्नि तीव्र हो जाती है, उसी प्रकार ) प्रबल हो उठती है । इसलिये मनुष्यों की जठराग्नि काल स्वभाव से ही हेमन्त में प्रबल और अधिक मात्रा में भोजन को पचाने में समर्थ होती है । इस समय यदि जाठराग्नि को अग्नि बल के अनुसार अन्न रूपी आहार न मिले, तो शरीर के सौम्य ( द्रव्य ) भाग को नष्ट करने लगती है । इसलिये शीत काल में शीत गुण के बढ़ने से वायु भी बढ़ती है । इस वायु की वृद्धि को रोकने के लिये स्निग्ध ( मधुर ), अम्ल और नम-कीन पदार्थ खाने चाहिये । चर्बी वाले जलचर प्राणियों का मांस रस, बिल में रहने वाले ( नकुल आदि ) पशुओं का मांस, प्रसह ( कुक्कुट आदि ) पक्षियों का मांस खाना चाहिये, मांस खाकर ऊपर से मदिरा सीधु ( गुड़ की शराब ) और मधु पीना चाहिये । दूध, दही, मावा आदि एवं गन्ने के रस से बनी खीर, राब, शर्करा आदि से बनी वस्तुएँ, वसा, तैल और नये चावल खाने चाहिये | हेमन्त काल में स्नान आदि में गरम पानी का व्यवहार करने वाले की आयु कम नहीं होती । तैलमर्दन, उबटन, शिर पर तेल लगाना, जेन्ताक (स्वेद, ) धूप का सेवन, भूमि के नीचे बने तहखानों में रहना, घर के अन्दर घर बना उसे गरम करके रहना चाहिये, भली प्रकार घिरा हुआ घर हो. आसन या सवारी आदि करते समय खूब लिपटकर बैठे जिससे शीत न लगे ॥ ६-१४ ॥ प्रावाराजिन- कौशेय प्रवेणी- कुथकास्तृतम् ॥ १५ ॥
गुरूष्णवासा दिग्धाङ्गो गुरुणाऽगुरुणा सदा ।
शयने प्रमदां पीनां विशालोपचितस्तनीम् ॥ १६ ॥
आलिङ्गचागुरुदिग्धाङ्गीं सुप्यात्समदमन्मथः ।
प्रकामं च निषेवेत मैथुनं शिशिरागमे ॥ १७ ॥
वर्जयेदन्नपानानि लघूनि वातलानि च ।
प्रवातं प्रमिताहारमुदमन्थं हिमागमे ॥ १८ ॥
भारी कम्बल, मृग छाल ( कौशेय ) रेशम, (प्रवेणी ) कम्बल, गद्दे इनकी फैलाकर भारी और गरम कपड़ों को पहनकर मनुष्य अड्डों पर अगर का गाढ़ा लेप सदा करे । भरे शरीर वाली ( दुबली-पतली नहीं ), कामवती एवं उन्नत स्तनों वाली, अड्डों पर अगर का लेप की हुई स्त्री का आलिङ्गन करके, हर्ष और कामेच्छा के साथ सोये । शिशिर ऋतु में मैथुन यथेच्छ सेवन करे ।
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अ० ६ सूत्रस्थानम् I हेमन्त ऋतु में त्याज्य -– लघु गुण वाले एवं वायुप्रकोपक आहार विहार हेमन्त ऋतु में छोड़ देने चाहियें । एवं सामने की वायु, थोड़ा खाना और पानी में घोलकर सत्तू खाना छोड़ देना चाहिये ॥ १५-१८ ॥
हेमन्तशिशिरे तुल्ये शिशिरेऽल्पं विशेषणम् ।
रौक्ष्यमादानजं शीतं मेघ मारुत वर्षजम् ॥ १६ ॥
तस्मार्द्धमन्तिकः सर्वः शिशिरे विधिरिष्यते ।
निवातमुष्णमधिकं शिशिरे गृहमाश्रयेत् ॥ २० ॥
कटुतिक्तकषायाणि वातलानि लघूनि च ।
वर्जयेदन्नपानानि शिशिरे शीतलानि च ॥ २१ ॥
हेमन्त और शिशिर ऋतुएँ, प्रायः शीत की दृष्टि से समान हैं । परन्तु शिशिर काल मे हेमन्त से इतना भेद है कि शिशिर का आदान काल होने से वायु रूक्ष होती है एवं बाइल, वायु और बरसात शिशिर में अधिक होने से इस ऋतु में शीत अधिक होता है । इसलिये शिशिर ऋतु में हेमन्त की संपूर्ण विधि पालन करनी चाहिये । परन्तु शिशिर में हेमन्त से अधिक गरम और वायु रहित घरों में ( खुली वायु जहाँ न आये ) रहे । शिशिर काल में कड़वे, तिक्त, कसैले वायुकारक और लघु तथा टण्डे खान-पानको छोड़ दे ॥ १६-२१॥
वसन्त की ऋतुचर्या - हेमन्ते निचितः श्लेष्मा दिनकृद्भाभिरीरितः ।
कायाग्नि बाधते रोगांस्ततः प्रकुरुते बहून् ॥ २२ ॥
तस्माद्वसन्ते कर्माणि वमनादीनि कारयेत् ।
गुर्व -स्निग्ध-मधुरं दिवास्वप्नं च वर्जयेत् ॥ २३ ॥।
व्यायामोद्वर्तनं धूमं कवल-ग्रह-मञ्जनम् ।
सुखाम्बुना शौचविधि शीलयेत्कुसुमागमे ॥ २४ ॥
चन्दनागुरु -दिग्धाङ्गो यव-गोधूम- भोजनः ।
शारभं शाशमैणेयं मांसं लावक पिञ्जलम् ॥ २५ ॥
भक्षयेन्निदं सीधुं पिवेन्माध्वीकमेव वा ।
वसन्तेऽनुभवेत्स्त्रीणां काननानां च यौवनम् ॥ २३ ॥
हेमन्त काल में सञ्चित हुआ कफ सूर्य की किरणों से ( घी के समान ) पिघल कर द्रव बनकर शरीर की अग्नि को ( धातुओं की अग्नि को नहीं ) कम करके कफजन्य बहुत से रोगों को उत्पन्न करता है । इसलिये कफ को निकालने के लिये वसन्त ऋतु में वमन, शिरोविरेचन कार्य करने चाहिये ।
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६० चरकसंहिता [ अ० ६ व्यायाम उबटन, धूमपान, कवल (गरारे करना ) और अञ्जन लगाना चाहिये । स्नान एवं शौच कार्य में गरम पानी का व्यवहार करना चाहिये ( पीने में नहीं) । शरीर पर चन्दन और अगर का लेप करना चाहिये, जी और गेहूँ, शरभ बारहसींगे, खरगांश, हरिण, बटेर, कपिञ्जल ( कट फोड़ा ) इनका मांस खाना
चाहिये । कफ दोष नाशक सीधु या अंगूरों का बना शराब पीना चाहिये ।
वसन्त काल में युवती स्त्रियों और जङ्गलों में मनोरंजन करे ॥ २२-२६ ॥
ग्रीष्मचय्या- मयूखर्जगतः सारं ग्रीष्मे पेपीयते रविः ।
स्वादु शीतं द्रयं स्निग्धमन्नपानं तदा हितम् ॥ २७ ॥
शीतं सशर्करं मन्यं जाङ्गलान्मृगपक्षिणः ।
घृतं पयः सशात्यन्नं भजन ग्रीम न सीदति ॥ २८ ॥
मद्यमल्पं न वा पंचमथवा सुहृदकम् ।
लवणाम्ल-कटूष्णानि व्यायामं चात्र वर्जयेत् ॥ २६ ॥
दिवा शीतगृह निद्रां निशि चन्द्रांशुशांतले ।
भजेश्चन्दन-दिग्धाङ्गः प्रवति हम्य नस्तके ॥ ३० ॥
व्यजनैः पाणिसंस्पश्चिन्दनोदक-शीतलः ।
सेव्यमानो भजेदास्यां मुक्तामणिविभूषितः ॥ ३१ ॥
काननानि च शीतानि जलानि कुसुमानि च ।
श्रीष्मकाल निषेवेत मैथुनाद्विरतो नरः ॥ २५ ॥
ग्रीष्म ऋतु मे सूर्प अपनी किरणों द्वारा संसार का सार खींचता रहता हूँ | इसलिये इस समय मोटा, ठण्डा द्रव पदार्थ पीना, चिकने ( घो आदि ) खान पान हितकारी है । ठण्डे और शर्करा मिश्रित सत्तु खाने त, जंगली पशु-पक्षियों का मांस खाने से, घा और दूध के साथ चावल खाने से ग्रीष्म ऋतु में कष्ट नहीं होता । इस ऋतु में भय नहीं पीना चाहिये आर यदि पीना ही हो तो बहुत पानी मिलाकर पीना चाहिये । नमकीन, खट्टे, कडुवे और गरम रस पदार्थ तथा व्यायाम इस ऋतु में छोड़ देना चाहिये । दिन के समय ठण्डे मकानों में सोना चाहिये और रात में चन्द्रमा की किरणों से ठण्डी की हुई मकान की छत पर खुली वायु में शरीर पर चन्दन मलकर सोना चाहिये । चन्दन और पानी से ठण्डे किये हुए पलों से या हाथ के स्पर्श से, मोती और
१ मन्थ -सक्तवः सर्पिषा युक्ताः शीत -वारि-यरिप्लुताः ।
नात्यच्छा नातिसान्द्राश्च मन्थ इत्यभिधीयते ॥
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अ०६ ] सूत्रस्थानम् १ मणियों से शोभित होकर पलंग पर सोये । जङ्गलों को, ठण्डे पानी ( झरने आदि ) को और फूलों को ग्रीष्म काल में सेवन करे । ग्रीष्म ऋतु में मैथुन से अलग रहे ॥ २७-३२ ॥
वर्षा काल की ऋतुचव्या- आदान-दुर्बले देहे पक्ता भवति दुर्बलः ।
स वर्षावनिलादीनां दूपणवध्यत पुनः ॥ ३३ ॥
भू-बाष्पान्मेघ-निस्यन्दात्पाकादुम्लाजरस्य च ।
वस्वग्निवले शीणे कुप्यन्ति पवनादयः ॥ ३४ ॥
तस्मात्साधारणः सर्दी ( ।
मन्थं दिवाण ॥ ३५ ॥
व्यायामाचात्र वर्जयेत् ।
पान-भोजन-संस्काराच् द्राविभजेत् ॥ ३३ ॥
व्यक्ताम्ल लवण-स्नेहं वाऽहनि ।
विशेषशीते भोक्तवं वर्षास्वनिलशान्तये ॥ ३७ ॥
अग्नि संरक्षणवा यवगोधूम-शादयः ।
पुराणा जाङ्गलेसिया यूपश्च संस्कृतेः ॥ ३८ ॥
पिवेत्सोद्रान्वितं चापं साकार वा । माहेन्द्रं तप्तशीदं वा कप सारसमेव वा ।
प्रधर्षोद्वर्तन स्नान-गन्धमाल्य- परो भवेत् ।
लघुशुद्धाम्बरः स्थानं भजेदक्लेदि वार्षिकम् ॥ ४० ॥
आदान काल में शरीर के निर्बल होने से अग्नि भी निर्बल हो जाती है । यह अग्नि वषां ऋतु में वायु, पित्त, कफ तीनों के दूषणों से दूपित हो जाती है । ग्रीष्म ऋतु में प्रचण्ड सूर्य को गरमा से भूमि के तप जाने से, वर्षा में बरसात पढ़ने से, पानी के स्पर्श से भूमि में से गरम भाप के निकलने से तीनों दोष कुपित हो जाते हैं, इसी प्रकार बादलों के बरसने से वात, कफ कुपित होते हैं, जल के अम्लपाक होने से पित्त कुपित होता है । वर्षा ऋतु में अग्नि-बल के क्षीण होने से बात, पित्त कफ तीनों कुपित हो जाते हैं । इसलिये वर्षा में साधा- विधि का पालन करना चाहिये । पानी में घुला सत्तू, दिन में सोना, ओख, ।का पानी, सम्भोगमैथुन, धूप और व्यायाम इस ऋतु में नहीं सेवन करने
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हर चरकसंहिता [ अ० ६ चाहिये । वर्षा काल में खान पान के अन्दर प्रायः करके शहद का उपयोग करना चाहिये । बरसात के दिनों में जिस दिन वायु और बरसात जोर का पड़ रहा हो और सर्दी बहुत हो, उस दिन वायु को शान्त करने के लिये अम्ल, लवण रस तथा स्नेह घी जिस अन्न में सष्ट दीखता हो, उसे विशेष करके खाना चाहिये । अग्नि की रक्षा करने के लिये जौ, गेहूँ, चावल ( पुराने ), जंगली- वन के पशुओं का मांस एवं घी आदि से संस्कृत यूत्र खाने चाहिये । पित्त को शान्त करने के लिये थोड़ा शहद मिला माध्वीकारिष्ट ( द्राक्षासव ), अथवा पानी में शहद ( थोड़ा ) मिलाकर पीना चाहिये । वर्षा ऋतु में या तो आकाश से गिरा स्वच्छ पानी पीना चाहिये अथवा कुएं या तालाब के पानी को गरम करके ठण्डा करके पीना चाहिये । तैल का मर्दन, उबटन लगाना, स्नान करना सुगन्ध धारण करना, माला पहिनना, हलका और साफ वस्त्र पहिनना, तथा सूखे स्थान पर रहना चलना आदि कार्य वर्षा ऋतु में करना चाहिये ॥ ३३-४० ॥
शरद् ऋतु की परिचय- वर्षा -शीतोचिताङ्गानां सहसैवार्करश्मिभिः ।
तप्तानामाचितं पित्तं प्रायः शरदि कुप्यति ॥ ४१ ॥
तत्रान्नपानं मधुरं लघु शीतं सतिक्तकम् ।
पित्त-प्रशमनं सेव्यं मात्रया सुप्रकाशितैः ॥ ४२ ॥
लावान् कपिञ्जलान् हरिणानुरभ्राञ्छरभाच्छशान् ।
शालीन् सयवगोधूमान् सेव्यानाहुर्घनात्यये ॥ ४३ ॥
तिक्तस्य सर्पिषः पानं विरेको रक्तमोक्षणम् धाराधरात्यये कार्यमातपस्य च वर्जनम् ॥ ४४ ॥
वस तैलमवश्या मोदकानूपमामिषम् ।
क्षारं दधि दिवास्वप्नं प्राग्वातं चात्र वर्जयेत् ॥ ४५ ॥
वर्षा ऋतु में काल स्वभाव से संचित हुआ पित्त शरद् काल में बादलों के हट जाने से, सूर्य के किरणों के ताप से सहसा कुपित होता है । इसलिये इस ऋतु में मधुर, लघु, शीत और तिक्त, पित्तशामक खान पान परिमाण में खाना चाहिये । बटेर, कटफोड़ा, हरिण, मेढ़ा, बारहसिींगा और खरगोश इनका मांस, चावल, जौ, गेहूँ इनको शरद् काल में खाना चाहिये । तिक्त औषधियों से संस्कृत घृत ( पंचतिक्त घृत ), विरेचन, रक्तमोक्षण, शिरावेध,, जोंक आदि से रक्त का निकलवाना और धूप का सेवन न करना ये काम बादलों के चले जानेने पर शरद् ऋतु में करने चाहिये । इस ऋतु में चर्बी, तेल, ओस, जलचर प्रा