चरक संहिता अत्रिदेव गुप्त — पृष्ठ 111–120
चरक संहिता अत्रिदेव गुप्त · पृष्ठ 111–120
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अ० ६ ] सूत्रस्थानम् ६३ का मांस, क्षार, दही दिन मे साना सामने मे आती हुई वा पुरवा वायु का त्याग करना चाहिये ॥ ४१-४५ ॥
इंसोदक का लक्षण- दिवा सूर्यांशु सन्तप्तं निशि चन्द्रांशु शीतलम् ।
कालेन पक्कं निर्दोषमस्त्येनाविपाकृतम् ॥ ४६ ॥
हंसोदकमिति ख्यात शारदं विमलं शुचि ।
स्नानपानावगाहपु द्दितमम्नु यथाऽमृतम् ॥ ४७ ॥
शारदानि च माल्यानि वासांसि विमलानि च ।
शरत्काले प्रशस्यन्त प्रदोषे चेन्दुरश्मयः ॥ ४ = ॥
दिन में सूर्य की किरणा से गरम और रानि में चन्द्रमा की शीतल किरणों से ठण्डा होने वाला कालस्वभाव से पका हुआ अर्थात् वत्रा का जल जिसमें न रहा हो; इससे दाष रहित; अगस्त्य नक्षत्र के उदय होने के प्रभाव से निर्मल, ( विष रहित ) पाना का हसाइक ( चन्द्रार्क ) कहत है । यह हसोदक शरद् ऋतु में निर्मल और पवित्र है । इसलिये स्नान काय में, पीने में अवगाहन, पानी में बैठने आदि कार्यो मे उत्तम ओर अमृत के समान है । शरत्काल मे रात्रि के प्रथम प्रहर में चन्द्रमा को किरणों का सेवन करना तथा शरत् वालीन मालायें, ओर निर्मल वस्त्र प्रशस्त हे ॥ ४६-४८ ॥
इत्युक्तमृतुसात्म्यं यचेाऽऽहारन्व्यपाश्रयम् ।
उपशेते यदाचित्यादाकः सात्म्यं तदुच्यते ॥ ४६ ॥
देशनामामयाना च विपरीतगुणं गुणः ।
सात्म्यमिच्छन्ति सात्म्यज्ञाश्चेष्टितं चाद्यमेव च ॥ ५० ॥
( चेष्टा ) क्रिया और आहार, खान बिहार के आश्रित अर्थात्ऋतुओं के अनुकूल जो कर्म है, वे कह दिये । पुरुष को प्रकृति के अनुसार जो उचित अनुकूल पड़ता है, उसे 'आकः सात्म्य' कहते है । जो आहार या बिहार देश ( जागल आनूप ओर साधारण ) एवं रोग इनके गुणों से विपरीत, गुण वाले होते है उस आहार विहार को 'सात्म्य' को जानने वाले विद्वान् ' सात्म्य' कहते है ॥ ४६-५० ॥
तत्र श्लोकाः- ऋतावृतौ नृभिः सेव्यमसेव्यं यच्च किञ्चन ।
तस्याशितीये निर्दिष्टं हेतुमत्सात्म्यमेव च ॥ ५१ ॥
अप्रत्येक ऋतु में मनुष्यों को क्या २ सेवन करना चाहिये और क्या २ नहीं
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६४ चरकसंहिता [अ०७ सेवन करना चाहिये; तथा कारण रूपसात्म्य को भी इस 'तस्याशितीय अध्याय में कह दिया ॥ ५१ ॥
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते सूत्रस्थाने स्वस्थवृत्तचतुष्के तस्याशितीयो नाम षष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥
अथ सप्तमोऽध्यायः ।
अथातो न वेगान्धारणीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्माSSE भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
मल मूत्रादि के उपस्थित वेगों को रोकने का प्रतिषेध करने के लिये 'न वेगान् धारणीय' नामक अध्याय का व्याख्यान करते हैं । जैसा भगवानात्रेय ने कहा था ॥ १-२ ॥
न वेगान् धारयेद्धीमाञ्जातान्मूत्रपुरीषयाः ।
न रेतसो न वातस्य न वस्याः क्षवथानं च ॥ ३ ॥
नोद्गारस्य न जृम्भाया न वेगान् चुलिपासयोः ।
बाप न निद्राया निःश्वासस्य श्रमेण च ॥ ४ ॥
एतान् धारयती जातान् वेगान् रोगा भवन्ति ये ।
पृथक्पृथक चिकित्सार्थ तन्मे निगदतः शृणु ॥ ५ ॥
बुद्धिमान मनुष्य को चाहिये कि उपस्थित हुए नूत्र मल के वेगों को नहीं रोके । इसी प्रकार शुक्र, अपान आदि वायु, वमन, छींक, डकार, जम्भाई, भूख और प्यास, हर्प या शोक के कारण उत्पन्न आंसू; नींद और श्रमजनित तीव्र प्रश्वास के वेगों को भी नहीं रोकना चाहिये । इन उपस्थित वेगों को रोकने से जो जो रोग होते हैं, उनकी चिकित्सा के लिये पृथक् पृथक् उपदेश करते हैं, सुनो ।
बस्ति मेहनयोः शूलं मूत्रकृच्छं शिरोरुजा ।
विनामो वङ्क्षणानाहुः स्याल्लिङ्ग मूत्रनिग्रहे ॥ ६ ॥
मूत्र के उपस्थित वेगको रोकने से 'बस्ति' ( मूत्राशय ) और लिंग में दर्द होती है, मूत्र त्याग में कष्ट होता है, शिर में दर्द, मूत्र वेग के कारण खींच होने से शरीर झुक जाता है वंक्षण प्रदेश ( पेडू ) जकड़ा हुआ प्रतीत होता है, अथवा उस प्रदेश में फुलाव प्रतीत होता है ये लक्षण मूत्र के उपस्थित वेगमें रोकने से होते हैं ॥ ६ ॥
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ॐ० ७ ] सूत्रस्थानम हपू
इस की चिकित्सा- स्वेदावगाहनाभ्यङ्गान् सर्पिषश्चावपीडकम् ।
मूत्रे प्रति कुर्यात् त्रिविधं बस्तिकर्म च ॥ ७ ॥
( स्वेद ) पसीना देना, ( अवगाहन ) गरम पानी की नाद में बेटना, ( अभ्यंग ) तेल आदि मर्दन और घी का नस्य देना, तीन प्रकार का बस्ति कर्म ( निरूहण, अनुवासन और उत्तर बस्ति ) मूत्र के उपस्थित वेग को रुकने के प्रतीकार हैं ॥ ७ ॥
पक्काशय-शिरःशूलं वात-वर्च-निरोधनम् ।
पिण्डिकोष्टनामानं पुरीषे स्याद्विधारिते ॥ ८ ॥
भल के उपस्थित वेग को रोकने से पद्माशय अधान नाभि के नीचे के भाग और शिर में वेदना होती है, अगन वायु और मल बन्द हो जाते हैं, पिण्ड-लियों में एंटन होने लगती है, पेट में अपरा चढ़ जाता है ॥ ८ ॥
चिकित्सा- स्वेदाभ्यङ्गावगाहाय वर्तयतिकर्म च । स्वेदहितंपसीनाप्रतिहतेदेना, वर्चस्यन्नपानंअभ्यंग, अगहनप्रमाथिनांदाच ॥ १ ॥ आदि में स्नान ),
फलवति, और बस्तिकर्म करे । विरेचन द्रव्यों का घी और तेल आदि द्वारा चूर्ण, क्वाथ, कल्कादि के रूप में बनाकर देना और बात को अनुलोमन करने वाली औषध मल के रोकने में हितकारी है ॥ ६ ॥
मेढे वृपण्याः शूलनङ्गमर्दों हृदि व्यथा ।
भवेत्प्रतिते शुक्रं विषद्धं मूत्रमेव च ॥ १० ॥
वीर्य के उपस्थित वेन को रोकने से लिंग और अण्डकोषों में वेदना होती है, अंग टूटते हुए प्रतीत होते हैं, चेतना के स्थान हृदय में वेदना अनुभूत होती है और मूत्र भी बन्द हो जाता है || १० || चिकित्सा—
तत्राभ्यङ्गावगाहच मदिरा चरणायुधाः ।
शालिः पया निरूहाच शस्तं मैथुनमेव च ॥ ११ ॥
मर्दन, अवगाहन स्नान ( द्रोणीस्नान ), मद्य, कुक्कुट का मांस, हैम- न्तिक धान्य, दूध, बस्तिकर्म और मैथुन कर्म ये शुक्र वेग के निरोध से उत्पन्न रोगों की चिकित्सा है ॥ ११ ॥
वात-मूत्रपुरीषाणां सङ्गो ध्मानं क्लमो रुजा ।
जठरे बातजाश्चान्ये रोगाः स्युर्वात निप्रहात् ॥ १२ ॥
अपान वायु के रोकने से, अपान वायु, मूत्र और पुरीष रुक जाते हैं ।
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६६ चरकसंहिता [अ० ७ SIMI अफरा हो जाता है थकान की अंगों में प्रतीति होना, पेट में पीड़ा और अन्य वातजन्य रोग भी हो जाते हैं ॥ १२ ॥ चिकित्सा- स्नेह -स्वेद-विधिस्तत्र वर्तयो भोजनानि च ।
पानानि बस्तयश्चैव शस्तं वातानुलोमनम् ॥ १३ ॥
स्नेह ( तैल ) एवं स्वेद देना चाहिये, फलवर्त्तियाँ, वातनाशक खान-पान और वातनाशक बस्तिकर्म उत्तम हैं ॥ १३ ॥
कण्डू- कोठ-रुचि व्यङ्ग-शोथ-पाण्ड्वामय-ज्वराः ।
कु -हृल्लास वीसर्पाश्छर्दि-निग्रहजा गदाः ॥ १४ ॥
वमन के रोकने से खाज, कोढ, भोजन में अनिच्छा, झांई, मुखपर काले- काले दाग आना, सूजन, पाण्डु रांग, ज्वर, कोढ़, हल्लास ( वमन की रुचि ), जी मिचलाना, वीसर्प ये रोग उत्पन्न होते है || १४ || चिकित्सा—
भुक्त्वा प्रच्छर्दनं धूमो लङ्घनं रक्तमोक्षणम् ।
रूक्षान्नपानं व्यायामो विरेकश्चात्र शस्यते ॥ १५ ॥
भोजन खिलाकर वमन कराना चाहिये, धूम्रपान, उपवास, शिराव्यधन करके रक्त का निकालना, रून्चे अन्न और पान, व्यायाम और विरेचन ये उपाय उत्तम हैं ॥ १५ ॥
मन्यास्तम्भः शिरः -शूलमदितार्थावभेदको ।
इन्द्रियाणां च दौर्बल्यं क्षवथाः स्याद्विधारणात् ॥ १६ ॥
छींक के रोकने से ग्रीवा का जकड़ जाना, शिरोवेदना, चेहरे का लकवा, आधासीसी, आँख आदि इन्द्रियों की निर्बलता हो जाती है ॥ १६ ॥
तत्रोर्ध्व जत्रुकेऽभ्यङ्गः स्वेदो धूमः सनावनः ।
हितं वातघ्नमाद्यं च घृतं चोत्तरभक्तिकम् ॥ ११ ॥
चिकित्सा - प्रोवा से ऊपर के भागों में मालिश, पसीना देना, धूम्रपान नस्य, वातनाशक भोजन और खाना खानेके पीछे वृतपान करना हितकारी है ॥
हिक्का श्वासोऽरुचिः कम्पो विबन्धो हृदयोरसोः ।
उद्गार- निग्रहात्तत्र हिक्कायास्तुल्यमाषधम् ॥ १८ ॥
डकार को रोकने पर हिचकी का आना, श्वास, भोजन में अनिच्छा, सिर- छाती का काँपना, छाती और हृदय का रुक जाना ये रोग हो जाते हैं । चिकित्सा - डकार के रोकने से उत्पन्न विकार की शान्ति के लिये हिचकी के समान औषध करनी चाहिये ॥ १८ ॥
विनामाक्षेपसङ्कोचाः सुप्तिः कम्पः प्रवेपनम् ।
जृम्भाया निप्रात्तत्र सर्व वातघ्नमौषधम्॥ १६ ॥
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अ० ७ ] सूत्रस्थानम् भाई के रोकने से शरीर का झुकना, आक्षेप अर्थात् हाथ-पाँव का जोर से कम्पन, पर्वसन्धियों का आकुंचन, अङ्गां का सो जाना, ( स्पर्श ज्ञान का अभाव ), काँपना-दिलना आदि होता है । चिकित्सा के लिये वातनाशक उप-चार करना चाहिये ॥ १६ ॥
कार्य-दौल्य -वदङ्गरुविक्रमः ।
क्षुद्वेग-निग्रहात्तत्र स्विग्वा लघु भोजनम् ॥ २० ॥
भूख रोकने से कृशता, दुर्वा, रंगका वदर जाना, अजन्त्रत्यङ्गों में,,लक्षणवेदना होतउनकाहैं ।टूटतेचिकित्साहुए -हितवनिका ), अनिच्छाभरन ओरचक्करहल्काआना. भोजनये देना चाहिये || २० ||
कण्ठास्य झोपी धिय अनः वात हृदि व्यथा ।
पिपासा -निमद्दात्तत्र ज्ञातं तपणामध्यते ॥ २१ ॥
प्यास के रोकने से गले और मुख का खुश्क हो जाना, बहरापन, थकान, श्वास, दम का चढ़ना, हृदय प्रदेश में दर्द ये लक्षण होते है । चिकित्सा - शीतल, तृप्ति करनेवाले खानमान देने चाय ॥ २१ ॥
प्रतिश्यायोऽक्षिरागश्च हृद्रोगश्चारुचिमः ।
बाप-निमणात्तत्र स्वप्ना मद्यं प्रियाः कथाः ॥ २२ ॥
आँसुओं के रोकने से नाक से पानी झरना, कफ का स्राव होना, आँखों के रोग, हृदय रोग, अनिच्छा और भ्रम, (तिरमं चक्कर ) आदि होते हैं । चिकित्सा- नींद, मदिरा का पान, आनन्ददायक प्रिय बातचात करना चाहिये ॥ २२ ॥
जृम्भाऽङ्गनस्तन्द्रा च शिरो-रांगाक्ष -गौरवम् ।
निद्रा-विधारणात्तत्र स्वप्नः संवाहनानि च ॥ २३ ॥
नींद रोकने से जम्भाई, अङ्गां का टूटना ( शरीर में भारीपन ), शिर की वेदना और आँखें भारी हो जाता है । चिकित्सा -नींद लाना, अड्डों का संवा-इन अर्थात् हाथों से अां की दवाना कल्याणकारी है ॥ २३ ॥
गुल्म- हृद्रोग- संमोहाः श्रम- निश्वास-धारणात् ।
जायन्ते तत्र विश्रामो वातघ्नाश्च क्रिया हिताः ॥ २४ ॥
थकान से उत्पन्न निःश्वास को रोकने से गुल्म रोग, हृद्-रोग, मूर्च्छा ) उत्पन्न होती है । इस के लिये विश्राम, ( आराम ) एवं गौक उपचार करने चाहियें ॥ २४॥
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चरकसंहिता [ अ० ७
वेग-निहजारोगा य एते परिकीर्तिताः ।
इच्छंस्तेषामनुत्पत्ति वेगानेतान्न धारयेत् ॥ २५ ॥
उपस्थित वेगों को रोकने से उत्पन्न होने वाले जो ये रोग कहे हैं, रोगों की उत्पत्ति को न चाहने वाले व्यक्ति को चाहिये कि वह इन वेगों को न रोका करे || २५ ||
इमांस्तु धारयेद्वेगान् हितैषी प्रेत्य चेह च ।
साहसानामशस्तानां मनोवाक्काय कर्मणाम् ॥ २६ ॥
लोभ -शोक- भय-क्रोध -मान-वेगान् विधारयेत् ।
नैर्लज्ज्येयतिरागाणामभिध्यायाश्च बुद्धिमान् ॥ २७ ॥
परुषस्यातिमात्रस्य सूचकस्यानृतस्य च ।
वाक्यस्याकालयुक्तस्य धारयेद्वेगमुत्थितम् ॥ २८ ॥
देहप्रवृत्तिर्या काचिद्वर्तते परपीडया ।
स्त्रीभोगस्तेय -हिंसाया तस्या वेगान्विधारयेत् ॥ २६ ॥
पुण्यशब्दो विपापत्वान्मनो-वाक्काय कर्मणाम् ।
धर्मार्थकामान् पुरुषः सुखी भुङ्क्ते चिनोति च ॥ ३० ॥
इहलोक और परलोक की हित कामना करने वाले मनुष्य को चाहिये कि इन आगे कहे वेगों को धारण करें, जैसे- अयोग्य अनुचित साहस और मन वाणी और शरीर के निन्दित कर्मों के उपस्थित वेगों का रोके । मन के निन्दित कार्य जैसे – लोभ, अनुचित विषय में मन की प्रवृत्ति, ( शोक ) धन बान्धव आदि के कारण दुःख में मन की प्रवृत्ति, भय, क्रोध जिसके कारण मनुष्य अपने को जलता हुआ प्रतीत करता है, ( द्वेष ) वैर, दूसरे के अपकार करने में मन की प्रवृत्ति, ( मान ) महत्व, अभिमान में मन की प्रवृत्ति, ( जुगुप्सित ) दूसरे की निन्दा, ( निर्लज्जा ) लजा का अभाव, ( ईर्ष्या ) कुढ़ना, ( अभिध्या ) दूसरे के द्रव्य को लेने की लालसा बुद्धि, इन मन के निन्दित कार्यों को रोकना चाहिये । वाणी के निन्दित कर्म- कर्कश, कठोर विशेषतः दूसरे की निन्दा या अनिष्ट करने की इच्छा से झूठी और अप्रासंगिक वाणी को रोकना चाहिये । शरीर के निन्दित कर्म—-दूसरे को दुःख देने की जो कोई शरीर की चेष्टा हो, उसे स्त्री-भोग ( पर- स्त्रीसम्भोग), स्तेय ( चारा ), हिंसा ( दुःख कष्ट देना., मारना ) आदि शरीर कार्यों के उपस्थित वेगों का रोकना चाहिये । अपनी आत्मा के प्रतिकूल जो कार्य हों वे कार्य दूसरे के लिये भ
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०७ ] सूत्रस्थानम् I करने चाहिये । मनुष्य मन बचन और शरीर से पापरहित होकर ही 'पुण्य' शब्द का भागी होता है । उसमें 'पुण्य' शब्द तभी सार्थक होता है और तभी वह धर्म, अर्थ और काम इनको प्राप्त करता है, और सुख का भी भोग कर सकता है || २६-३० ॥
व्यायाम-- 'शरीरचेष्टा या चेष्टा स्थैर्यार्था बलवर्धिनी ।
देह-व्यायाम-संख्याता मात्रया तां समाचरेत् ॥ ३१ ॥
लाघवं कर्म -सामध्यं स्थैर्यं क्लेश सहिष्णुता ।
दोषक्षयोऽभिवृद्धिश्च व्यायामादुपजायते ॥ ३२ ॥
जो शारीरिक चेष्टायें शरीर की स्थिरता, दृढ़ता के लिये शरीर के बल को बढ़ाने की इच्छा से की जाती हैं, उनको ' व्यायाम' कहते हैं । इस व्यायाम को 'मात्रा' में सेवन करना चाहिये । व्यायाम के गुण--- व्यायाम करने से शरीर में हल्कापन, काम करने की शक्ति, शरीर एवं यौवन का टिकाऊपन, दुःख को सहन करने की शक्ति, वात आदि दोषों का शमन, जठराग्नि की प्रदीसि होती है । ॥३१-३२॥
अधिक व्यायाम से हानियां- श्रमः क्लमः क्षयस्तृष्णा रक्तपित्तं प्रतामकः ।
अतिव्यायामतः कासो ज्वरश्छर्दिश्च जायते ॥ ३३ ॥
शरीर का थकान, मन और इन्द्रियों का थकान धातुओं का क्षय, रक्तपित्त रोग, प्रथमक संज्ञक श्वास, खांसी, ज्वर और वमन अधिक व्यायाम से उत्पन्न होते हैं ॥ ३३ ॥
व्यायाम-हास्य-भाष्याध्व-प्राम्यधर्म- प्रजागरान् ।
नोचितानपि सेवेत बुद्धिमानतिमात्रया ॥ ३४ ॥
एतानेवंविधांश्चान्यान् योऽतिमात्रं निषेवते ।
गजः सिंहमिवाऽऽकर्षन् सहसा स विनश्यति ॥ ३५ ॥
उचितादद्दिताद्धीमान् क्रमशो विरमेन्नरः । शरीर का परिश्रम, हँसना, ऊँचा या अधिक बोलना, ( मार्ग चलना सफर करना ), ग्राम्यधर्म, ( मैथुन ), प्रजागर ( रात को जागना ), इन उचित कार्यों को भी बुद्धिमान् मनुष्य अधिक मात्रा में सेवन न करे । इन ऊपर लिखे हुए या अन्य इसी प्रकार के कार्यों को जो मनुष्य अधिक सेवन करता है, जिस प्रकार कि हाथी सिंह, को खींचता हुआ पता है, उसी प्रकार वह मनुष्य भी नष्ट हो जाता है । इसलिये बुद्धि-
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१०० चरकसंहिता [ अ० ७ 25 मान् मनुष्य को चाहिये कि छोड़ने योग्य उन दुःखदायी कर्मों से क्रमशः हट जावे ॥ ३४-३५ ॥ हितं क्रमेण सेवेत, क्रमश्चात्रोपदिश्यते ॥ ३६ ॥
प्रक्षेपापचयेताभ्यां क्रमः पादांशिको भवेत् ।
एकान्तरं ततो व्यान्तरं व्यन्तरं तथा ॥ ३७ ॥
क्रमेण रचिता दोषाः क्रमेणोपचिता गुणाः ।
सन्तो यान्त्यपुनर्भावमप्रकम्प्या भवन्ति च ॥ ३८ ॥
हितकारी कार्यों की ( क्रमशः ) सेवन करना चाहिये । यहां अब क्रम का उपदेश करते हैं । छोड़ने लायक ( सचय करन योग्य ) कार्य को चौथाई भाग करके क्रम से सेवन करना चाहिये । फिर दो और फिर तीन भाग छोड़ कर ग्रहण करना चाहिये । अर्थात् छोड़ने योग्य एवं ग्रहण करने योग्य कार्य दोनों के चार चार भाग करने चाहिये । छोड़ने योग्य कर्म का एक भाग छोड़कर ग्रहण करने योग्य कर्म का एक भाग उसके स्थान पर ग्रहण करना चाहिये । फिर दो भाग छोड़ कर दो भाग ग्रहण करने चाहिये और फिर तीन भाग छोड़ कर तीन भाग ग्रहण करने चाहिये और पुनः सारा छोड़कर सारा ग्रहण कर लेना चाहिये । ग्रहण करते समय एक दो तीन चार दिन का अन्तर क्रम से देना चाहिये । छोड़ने योग्य कर्म की चतुर्थी छोड़ कर ग्रहण करनेयंग्य कर्म का चतुर्थाश ग्रहण करें । इस विधान को एक दिन बरते । तीसरे दिन छोड़ने योग्य कर्म के दो भाग छोड़ कर ग्रहण करने योग्य कर्म के दो भाग ग्रहण करे इस प्रकार दो दिन करें । फिर तीन भाग छोड़कर ग्रहण करने योग्य कर्म के तीन भाग प्रक्षण करे इस प्रकार तीन दिन करे और फिर सारा कर्म छोड़कर सम्पूर्ण को ग्रहण कर लेवें । ऊपर बताये हुए क्रम पूर्वक छोड़े हुए दोष फिर पैदा नहीं होते और क्रम से ग्रहण किये हुए गुण नष्ट नहीं होते, चिरकाल तक स्थिर रहते हैं । हितकारी पदार्थ भी सहसा उपयोग करने से अग्निनाश, अरुचि आदि करते हैं, इसलिये इनको भी क्रम से ही ग्रहण करना चाहिये । इन सब कार्यों में मनुष्य की प्रकृति का ज्ञान अपेक्षित है, क्योंकि कुछ कार्य ऐसे हैं जो कि एक के लिये अहितकारी हों, परन्तु दूसरे के लिये हितकारी ॥ ३६-३८ ॥
सम-पित्तानिल- कफाः केचिद् गर्भादि-मानवाः ।
दृश्यन्ते वातलाः केचित्पित्तलाः श्लेष्मलास्तथा ॥ ३६ ॥
तेषामनातुराः पूर्वे, बातलाद्याः सदाऽऽतुराः ।
दोषानुशयिता ह्येषां देहप्रकृतिरुच्यते ॥ ४० ॥
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अ० ७ ] सूत्रस्थानम १०१
विपरीत- गुणस्तेषां स्वस्थवृत्तेर्विधिहितः ।
सम-सर्व रसं सात्म्यं समधातोः प्रशस्यते ॥ ४१ ॥
कुछ मनुष्य जन्म या गर्भकाल से ही पित्त, वायु, कफ की असमानावस्था वाले होते हैं और कुछ मनुष्य गर्भाधान काल से ही वात प्रकृति वाले, पित्त प्रकृति वाले और कफ प्रकृति वाले होते हैं । इन में पित्त वायु और कफ की साम्यावस्था वाले मनुष्य प्रायः सग रहते है और बात प्रकृति या पित्त प्रकृति अथवा कफ प्रकृति के मनुष्य सदा रोगी रहते हैं । इन में वातादि दोषों का सात्म्य अर्थात् अनुकूल हो जाना ही शरीरकीप्रकृति कही जाती है । अर्थात् वात प्रकृति वाले मनुष्य में वात दोष उसके शरीर के अनुकूल हो जाता है । इसलिये वही उसकी प्रकृति है, प्रकृति होने में बात उस में दोष नहीं, परन्तु जब स्वस्थावस्था में बाद बढ़ेगा तभी दोष होगा । जिस प्रकार कि विषकीट अपने विष से नहीं मा उनी प्रकार प्रकृतिस्थ वात से भी वात प्रकृति का मनुष्य पीड़ित नहीं होना । इन वात आदि को अधिकता में वात आदि के विपत विरुद्ध गुणों का इनके कारणों के विपरीत गुण भी सेवन करना स्वास्थ्य के लिये कल्याणकारी उपाय है । और पित्त, वायु और कफ की समानता वाली प्रकृति के मनुष्यों के लिये सत्र ( मधुर अम्ल, लवण, तिक्त, कटु और कषाय ) रसों का समानावस्था में अभ्यास करना उत्तम है । समान धातुवों वाला आदमी प्रशस्त है ॥ ३६-४१ ॥
द्वे अधः सप्त शिरसिखानि स्वेदमुखानि च ।
मायनानि वाध्यन्ते दुष्टेर्मात्राधिकैर्मः ॥ ४२ ॥
मलवृद्धि गुरुत्वेन लाघवान्मलसंक्षयम्।
मलायनानां बुद्धचेत सङ्गोत्सर्गादतीव च ॥ १३ ॥
तान्दीपलिङ्गैरादिश्य व्याधीन साध्यानुपाचरेत् ।
व्याधि-हेतु प्रतिद्वन्द्वेर्मात्रा-काली विचारयन् ॥ ४४ ॥
विषम स्वस्थ वृत्तानामेते रोगास्तथाऽपरे ।
जायन्तेनातुरस्तस्मात्स्वस्थ वृत्त परो भवेत् ॥ ४५ ॥
जब मल परिमाण से अधिक हो जाते हैं, तब वे विकृत होकर मल के स्थानों को पीड़ित करते हैं, मल के स्थान नीचे के दो-गुदा और उपस्थ (स्त्रियों योनि भी); शिर में सात -दो नाक, दो कान, दो आंखें और एक मुख, निकलने के सब छिद्र ये मल के स्थान हैं, मल इनको पीड़ित करते हैं । भारीपन होने से मल की वृद्धि समझनी चाहिये और शरीर में हल्कापन
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१०२ चरकसंहिता [अ० ७ होने से मल का क्षय समझना चाहिये । मल के स्थानों से मल के न निकलने से मल का क्षय, मल स्थानों से मल का बार-बार अधिक बाहर निकलना वृद्धि को बताता है । मलों की वृद्धि और क्षय दूसरों के कारण हुए हैं, यह समझकर उनके चिन्हों से पहिचानकर उन से उत्पन्न साध्य रोगों को रोग और व्याधि के हेतु इन दोनों के विपरीत गुण, वीर्य, विपाक और प्रभाव से विरुद्ध औषध, आहार और विहार द्वारा चिकित्सा करनी चाहिये । चिकित्सा करते समय वैद्य मात्रा औषध, आहार और विहार का परिमाण काल, दोष, व्याधि के प्रकोप, ऋतु, रात दिन आदि समयों का विचार कर ले । ये विषम धातु वाले रोगी और नीरोगी इन दोनों के लिये हितकारी हैं, धातु की विषमता से उत्पन्न होने वाले रोग और मानस या आगन्तुज रोग नहीं उत्पन्न होते । इसलिये मनुष्य रोगी नहीं होता, रोगी न हो अतः रोगी होने से पूर्व ही स्वस्थवृत्त का सेवन करना चाहिये ॥ ४२-४५ ॥ कारण से उत्पन्न होने वाले रोगों से बचने के उपाय- माधव प्रथमे मासि नभस्य प्रथमे पुनः । स्निग्धसहस्यस्विन्न---प्रथमे चैवशरीराणामूध्वंहारयेद्दोषसंचयम्चाघच बुद्धिमान्॥ ४६ ॥ ।
बस्तिकर्म ततः कुर्यान्नस्तः कर्म च बुद्धिमान् ॥ ४७ ॥
यथाक्रमं यथायोगमत ऊर्ध्वं प्रयोजयेत् ।
रसायनानि सिद्धानि वृष्ययोगांच कालवित् ॥ ४८ ॥
रोगास्तथा न जायन्ते प्रकृतिस्थेषु धातुषु ।
धातवश्चाभिवर्धन्ते जरा-मान्यमुपैति च ॥ ४६ ॥
विधिरेष विकाराणामनुत्पत्तौ निदर्शितः ।
निजानामितरेषां तु पृथगेवोपदिश्यते ॥ ५० ॥
वैशाख और इस से पूर्व के मास अर्थात् चैत्र में, और भाद्रपद, इससे पूर्वके मास अर्थात् श्रावण में तथा पौष इससे मास पूर्व के मार्गशीर्ष में एकत्रित दोषों को वमन विरेचन आदि से निकाल देना चाहिये । हेमन्त ऋतु में संचित कफ को चैत्र मास में ग्रीष्म में संचित वायुको भावण मास में, वर्षा में संचित पिस को मार्गशीर्ष में निकाल देना चाहियेहोने से पूर्व। इनहीमासोंदोषों मेंकोदोषोंनिकालके प्रकोपदेना चाहियेहोने का । भयपहिलेरहताशरीरहै,कोइसलियेस्नि प्रकोर..और आदि से चिकना करके पसीना देना चाहिये जिससे कि शरीर के कै